रविवार, 17 फ़रवरी 2013

भारत में सुपर कम्प्यूटर : पदमश्री डॉ.विजय भाटकर




सुपर कम्प्यूटर के भारतीय पितामह - पद्मश्री डा. विजय भाटकर

प्रस्तुतकर्ता - अरविन्द सीसौदिया,कोटा            
पदमश्री डॉ.विजय भाटकर ने अमरीका के द्वारा भारत को सुपर कम्प्यूटर दिये जाने से इन्कार के बाद, सुपर कम्प्यूटर का स्वदेशी तकनीक से निर्माण किया। जिससे हमारे वैज्ञानिक तारापुर बिजली घर हेतु अपना परमार्णु इंधन बनाने में सफल हुए हैं, स्वदेशी तकनीक से क्रायोजेनिक इंजन बनाने में सफल हुए वहीं स्वयं के राकेट जी.एस.एल.वी. द्वारा 36,000 कि.मी. दूर उपग्रहों को स्थापित करने में भी सफल हुए हैं ।
            डॉ भाटकर ने अपने एक सम्बोधन में कहा है कि ”2030 तक भारत अमरीका और चीन से आगे होगा“
उन्होने एक सम्बोधन में कहा था कि ”अमरीकी खुफिया एजेंसी की रपट में कहा गया है कि 2030 तक भारत अमरीका और चीन से आगे होगा। हमें स्वयं को इस चुनौती के लिये तैयार करना होगा और जो कमियां हैं उन्हें दूर करने की जरूरत है।“
            उन्होने कहा है कि ” हमारे पास प्रतिभा की कमी नहीं है, कमी है तो बस प्रशासन की।“ 
स्वामी विवेकानंदजी का उल्लेख करते हुये डा. भाटकर ने कहा कि शिकागो भाषण के बाद स्वामीजी ने भविष्यवाणी की थी कि आने वाले 50 साल में भारत को स्वतंत्रता मिल जाएगी और उसके आगे 100 साल में भारत जगद्गुरु बनकर विश्व में छा जाएगा। उनकी पहली भविष्यवाणी 1947 में सत्य साबित हो गई और दूसरी अब होने को है।

सुपर कम्प्यूटर की परम श्रृंखला के वास्तुकार के रूप में डॉ.विजय पाडुंगर भाटकर का नाम सर्वविदित है। वह आईटी वैज्ञानिकों में एक उल्लेखनीय नाम हैं। भाटकर का जन्म अकोला, महाराष्ट्र में एक मराठा परिवार में 11 अक्तूबर, 1949 को हुआ। परम-10,000 महासंगणक के जनक डा. भाटकर ने प्रांरभिक शिक्षा महाराष्ट्र में अकोला गांव में ही पूरी हुई। इसके उपरांत वह 1965 में इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने के लिए वीएनआईटी, नागपुर चले गए। वीएनआईटी महाराष्ट्र के बेहतरीन और प्रतिष्ठित कालेजो में से एक है। इस कालेज की स्थापना जून 1960 में भारतीय सरकार के एजुकेशनल कार्यक्रम के तहत हुई। इस कालेज का प्रथम सत्र 1960 से शुरू हुआ। इसे बोर्ड ऑफ गवर्नर ने सर  एम.विश्वेश्वरैया के नाम पर इस कालेज का नामकरण किया। इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने के बाद 1968 में मास्टर डिग्री के लिए वह इंजीनियरिंग विश्वविद्यालय ,बड़ौदा चले गए। 1972 में आईआईटी दिल्ली से इंजीनियरिंग में डाक्ट्रेट की डिग्री प्राप्त की।
इसके बाद भाटकर ने आईटी में शिक्षा,अनुसंधान के लिए अंतराष्ट्रीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान की स्थापना की । इस संस्थान में उच्चतर शिक्षा के लिए शोध सुविधाओं के साथ शिक्षण की योजना बनायी गई। श्री भाटकर द्वारा लिखी और सम्पादित बारह पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं और अस्सी से अधिक शोध प्रपत्र वह प्रस्तुत कर चुके हैं। 2003 में रॉयल  सोसायटी की तरफ से दक्षिण अफ्रीका भेजे गए वैज्ञानिक दल का नेतृत्व विजय भाटकर ने किया। वर्तमान में वह घर शिक्षा प्रणाली ईटीएच, सहित जनकल्याण को बढ़ाने वाली कई परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं। वह भारत सरकार वैज्ञानिक सलाहकार समिति के सदस्य के रूप में भी कार्यरत हैं। इसके अलावा भाटकर ने भारत में ब्राडबैंड इंटरनेट का दूर-दराज के क्षेत्रों तक पहुंचाने के लिए भी कार्यरत हैं। भारतीय आईटी क्षेत्र में महान योगदान के लिए भाटकर को कई प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पुरस्कारों  से सम्मानित किया गया है। 1999-2000 में महाराष्ट्र भूषण पुरस्कार, 2000 में प्रियदर्शनी पुरस्कार और 2001 में सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में ओमप्रकाश भसीन फाउंडेशन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। कहा जाता है कि आज का युग ज्ञान का युग है । इस युग में आगे बढ़ने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अग्रणी बने रहना जरूरी है। विजय पी भाटकर का परम श्रृंखला के कम्प्यूटरों का निर्माण कर  भारत को नई ऊचाइयां छूने के लिए आधारभूमि उपलब्ध करवाई है। मिसाइल और नाभिकीय क्षेत्र में भारत ने जो ऊंचाई हासिल की है,उसका श्रेय  विजय भाटकर को भी जाता है।
गायत्री परिवार से जुड़कर उन्होने भारतीय संस्कृति की समृद्ध विरासत को गहराई से समझा और परम पूज्य गुरुदेव श्रीराम आचार्य के साहित्य के प्रति हमेषा उत्सुकता रहते हैं।

अध्यक्ष-ई.टी.एच. रिसर्च लैब एवं डिशनेट डी.एस.एल. तथा संस्थापक कुलपति - इंडिया इंटरनेशनल मल्टीवर्सिटी पदमश्री डॉ. विजय भाटकर ने 1980 में ई.आर.एंड डी.सी. (इलेक्ट्रानिक्स रिसर्च एंड डेवलेपमेंट सेंटर), तिरुअनन्तपुरम के निदेशक के रूप में सुपर कम्प्यूटर क्षैत्र में अनेक उत्पादों और तंत्रों के विकास में महती भूमिका निभाई है। तत्पश्चात् अनेक संस्थानों के प्रमुख पद पर रहे हैं। डा. भाटकर ने महासंगणकों अर्थात सुपर कम्प्यूटरों की श्रृंखना में स्वदेशी परम कम्प्यूटर श्रृखंला की सुविधा एवं निर्माण किया, जो एशिया महाद्वीप के सबसे बडेे महासंगणक तंत्रों में से एक है।
सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में उन्नत शिक्षा व अनुसंधान के लिए उन्होंने इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट आफ इंफोर्मेशन टेक्नालाजी की स्थापना की। भारत को विशिष्ट स्थान पर देखने की इच्छा रखने वाले डा. भाटकर कहते हैं कि विद्या की तलाश में खुद को लगाए रखना ही हमारी नियति है।
भारत के प्रति अपने सपने के बारे में वे कहते हैं: -
आज सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में दुनियाभर में भारत को सम्मानित स्थान प्राप्त है। इस क्षेत्र में हमारे विकास की गति सबसे तेज है। मैं चाहता हूं कि विद्या-आधारित (सोफ्टवेयर) प्रौद्योगिकी भारत के विकास का केन्द्र बने। भारत से होने वाले निर्यात का 50 प्रतिशत विद्या पर आधारित प्रौद्योगिकी के क्षेत्र से होना चाहिए। एक धारणा है कि गुरुवर (हार्डवेयर) क्षेत्र में चीन कहीं आगे है, जबकि भारत लघुवर ( सोफटवेयर) के क्षेत्र में अच्छा है। हमें इस ओर ध्यान देते हुए गुरुवर (हार्डवेयर) निर्माण में तेजी लानी है। अगर ऐसा हो जाता है तो इसमें कोई शक नहीं कि भारत देष, इलेक्ट्रानिक्स और दूरसंचार यंत्र निर्माण में भी प्रमुख भूमिका निभाएगा। अगर हमें इस शताब्दी के पहले आधे कालखण्ड में अपनी विकास दर 25 प्रतिशत बनाए रखनी है तो हमें प्रौद्योगिकी सर्जक और उत्पाद निर्माता के रूप में उभरना होगा। दुनियाभर की सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियां अपनी अनुसंधान व विकास इकाइयां भारत में स्थापित कर रही हैं। हमें नवसर्जक बनना है तो सूचना प्रौद्योगिकी शिक्षा व अनुसंधान के लिए बडे-बडे संस्थान बनाने होंगे।
हमने लोगों को संगणक ( कम्प्यूटर ) - शिक्षित बनाने के लिए विशेष कम्प्यूटर शिक्षा कार्यक्रम तैयार किए हैं जिसके जरिए लाखों लोग कम्प्यूटर-शिक्षित हुए हैं। मेरा सपना है कि भारत में सबसे अधिक कम्प्यूटर-शिक्षित लोग हों।
आज की पीढ़ी के पुरुषार्थ से ही हम अपने देश को परम वैभव अर्थात् सर्वांगीण उन्नति के पथ पर अर्थात् अभ्युदय और निरूश्रेयस प्राप्ति के मार्ग पर ले जाने में समर्थ होंगे तथा हमारा देश विश्व मानवता के कल्याण के लिए नियति निर्दिष्ट अपनी भूमिका के निर्वाह में सफल होगा। परमेश्वर इस महती कार्य हेतु हमें संकल्प, प्रेरणा और सामर्थ्य प्रदान करें। भारत की असली पूंजी तो इसकी विद्या पर आधारित विरासत और संस्कृति है जो 5000 वर्ष पूर्व वैदिक काल से आरम्भ हुई। भारत की उन्नति और नियति यही सर्वोच्च विद्या है। यही है “भारत” नाम में गुंथा संदेश और यही है हमारी नियति।
डॉ विजय भाटकर परम कम्प्यूटर के अविष्कारक 
मिसाइल तकनीक, क्रायोजनिक इंजन और नाभिकीय विस्फोटों के समय एक साथ करोड़ों की गणनाएं करनी पड़ती है। इसके लिए सुपर कम्प्यूटर की आवश्यकता होती है।  परम शृंखला के सुपर कम्प्यूटर का अविष्कार कर डॉ.विजय भाटकर ने भारत को विष्व पटल पर एक शक्तिशाली देश के रूप में स्थापित कर दिया है।
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सुपर कम्प्यूटर

आधुनिक परिभाषा के अनुसार वे कम्प्यूटर जिनकी मेमोरी स्टोरेज (स्मृति भंडार) 52 मेगाबाइट से अधिक हो एवं जिनके कार्य करने की क्षमता 500 मेगा फ्लॉफ्स (Floating Point operations per second & Flops) हो, उन्हें सुपर कम्प्यूटर कहा जाता है। सुपर कम्प्यूटर में सामान्यतया समांतर प्रोसेसिंग (Parallel Processing) तकनीक का प्रयोग किया जाता है। सुपर कम्प्यूटिंग शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1920 में न्यूयॉर्क वर्ल्ड न्यूजपेपर ने आई बी एम द्वारा निर्मित टेबुलेटर्स के लिए किया था। 1960 के दशक में प्रारंभिक सुपरकम्प्यूटरों को कंट्रोल डेटा कॉर्पोरेशन, सं. रा. अमेरिका के सेमूर क्रे ने डिजाइन किया था।
सुपरकम्प्यूटर की परिभाषा काफी अस्पष्टड्ढ है। वर्तमान के सुपर कम्प्यूटर आने वाले समय के साधारण कम्प्यूटर करार दिए जा सकते हैं। 1970 के दशक के दौरान अधिकाँश सुपर कम्प्यूटर वेक्टर प्रोसेसिंग पर आधारित थे। 1980 और 1990 के दशक से वेक्टर प्रोसेङ्क्षसग का स्थान समांतर प्रोसेसिंग तकनीक ने ले लिया। समांतर प्रोसेसिंग तकनीक में बहुत सारे माइक्रोप्रोसेसरों का प्रयोग एक-दूसरे से जोड़कर किया जाता है। ये माइक्रोप्रोसेसर किसी समस्या को उनकी माँगों (demands) में विभाजित करके उन माँगों पर एक साथ कार्य करते हैं। सुपर कम्प्यूटर में 32 या 64 समानांतर परिपथों में कार्य कर रहे माइक्रोप्रोसेसरों के  सहयोग से विभिन्न सूचनाओं पर एक साथ कार्य किया जाता है, जिससे सुपर कम्प्यूटर में 5 अरब गणनाओं की प्रति सेकेण्ड क्षमता सुनिश्चित हो जाती है। इस प्रकार बहुत सारी गणनाओं की आवश्यकताओं वाली जटिल समस्याओं के समाधान हेतु सुपर कम्प्यूटर का उपयोग किया जाता है।
प्रारंभिक सुपर कम्प्यूटर की गति मेगा फ्लॉफ्स (10X6 फ्लॉफ्स) में पाई जाती थी, परंतु अब यह गति साधारण सुपर कम्प्यूटर की गति बनकर रह गई है। वर्तमान में सुपर कम्प्यूटरों में गीगा फ्लॉफ्स (10X9 फ्लाफ्स) की गति पाई जाती है।

प्रयोग
सुपर कम्प्यूटरों का प्रयोग उच्च-गणना आधारित कार्यों में किया जाता है। उदाहरण- मौसम की भविष्यवाणी, जलवायु शोध (वैश्विक ऊष्णता से सम्बंधित शोध भी इसमें शामिल है), अणु मॉडलिंग (रासायनिक यौगिकों, जैविक वृहद् अणुओं, पॉलीमरों और क्रिस्टलों के गुणों और संरचनाओं की कम्प्यूटिंग) इत्यादि। सैन्य और वैज्ञानिक एजेंसियां इसका काफी उपयोग करती हैं।
सुपर कम्प्यूटर चुनौतियाँ और तकनीक
    सुपर कम्प्यूटर भारी मात्रा में ऊष्मा पैदा करते हैं और उनका शीतलन आवश्यक है। अधिकाँश सुपर कम्प्यूटरों को ठंडा करना एक टेढ़ी खीर है।किसी सुपर कम्प्यूटर के दो भागों के मध्य सूचना प्रकाश की गति से अधिक तेजी से नहीं पहुँच सकती है। इसकी वजह से सेमूर क्रे द्वारा निर्मित सुपर कम्प्यूटर में केबल को छोटे से छोटा रखने की कोशिश की गई, तभी उनके क्रे रेंज के सुपर कम्प्यूटरों का आकार बेलनाकार रखा गया।
    सुपर कम्प्यूटर अत्यन्त अल्प काल के दौरान डाटा की विशाल मात्रा का उत्पादन व खपत कर सकते हैं। अभी ”एक्स्टर्नल स्टोरेज बैंडविड्थ“ (eÛternal storage bandwidth) पर काफी कार्य किया जाना बाकी है। जिससे यह सूचना तीव्र गति से हस्तांतरित और स्टोर कीध्पाई जा सके।

सुपर कम्प्यूटरों के लिए जो तकनीक विकसित की गई हैं वे निम्न हैं-
    वेक्टर प्रोसेसिंग
    लिक्विड कूलिंग
    नॉन यूनीफॅार्म मेमोरी एक्सेस (NUMA)
    स्ट्राइप्ट डिस्क
    पैरेलल फाइल सिस्टम्स

सामान्य प्रयोजन वाले सुपर कम्प्यूटरों के प्रयोग
इनके तीन प्रकार होते हैं-
    वेक्टर प्रोसेसिंग सुपर कम्प्यूटरों में एक साथ काफी विशाल मात्रा के डाटा पर कार्य किया जा सकता है।
    काफी कसकर जुड़े हुए क्लस्टर सुपर कम्प्यूटर कई प्रोसेसरों के लिए विशेष रूप से विकसित इंटरकनेक्ट्स का उपयोग करते हैं और उनकी मेमोरी एक-दूसरे को सूचना देती है। सामान्य प्रयोग वाले तेज गति के सुपर कम्प्यूटर आज इस तकनीक का उपयोग करते हैं।
    कॉमोडिटी क्लस्टर्स सुपर कम्प्यूटर काफी संख्या में कॉमोडिटी पर्सनल कम्प्यूटरों का प्रयोग करते हैं, जो उच्च बैंडविड्थ के लोकल एरिया नेटवर्कों से जुड़े रहते हैं।

विशेष प्रयोजन वाले सुपर कम्प्यूटर
विशेष प्रयोजन वाले सुपर कम्प्यूटर उच्च-कार्य क्षमता वाली कम्प्यूटिंग मशीनें होती हैं जिनका हार्डवेयर आर्किटेक्चर एक समस्या विशेष के लिए होता है। इनका प्रयोग खगोल-भौतिकी, गणनाओं और कोड ब्रेकिंग अनुप्रयोगों में किया जाता है।

भारत में सुपर कम्प्यूटर

भारत में प्रथम सुपर कम्प्यूटर क्रे-एक्स MP/16 1987 में अमेरिका से आयात किया गया था। इसे नई दिल्ली के मौसम केंद्र में स्थापित किया गया था। भारत में सुपर कम्प्यूटर का युग 1980 के दशक में उस समय शुरू हुआ जब सं. रा. अमेरिका ने भारत को दूसरा सुपर कम्प्यूटर क्रे-एक्स रूक्क देने से इंकार कर दिया। भारत में पूणे में 1988 में सी-डैक (C&DAC) की स्थापना की गई जो कि भारत में सुपर कम्प्यूटर की तकनीक के प्रतिरक्षा अनुसंधान तथा विकास के लिए कार्य करता है। नेशनल एयरोनॉटिक्स लि. (NAL) बंगलौर में भारत का प्रथम सुपर कम्प्यूटर ”फ्लोसॉल्वर“ विकसित किया गया था। भारत का प्रथम स्वदेशी बहुउद्देश्यीय सुपर कम्प्यूटर ”परम“ सी-डैक पूणे में 1990 में विकसित किया गया। भारत का अत्याधुनिक कम्प्यूटर ”परम 10000“ है, जिसे सी-डैक ने विकसित किया है। इसकी गति 100 गीगा फ्लॉफ्स है। अर्थात् यह एक सेकेण्ड में 1 खरब गणनाएँ कर सकता है। इस सुपर कम्प्यूटर में ओपेन फ्रेम (Open frame) डिजाइन का तरीका अपनाया गया है। परम सुपर कम्प्यूटर का भारत में व्यापक उपयोग होता है और इसका निर्यात भी किया जाता है। सी-डैक में ही टेराफ्लॉफ्स क्षमता वाले सुपर कम्प्यूटर का विकास कार्य चल रहा है। यह परम-10000 से 10 गुना ज्यादा तेज होगा।
सी-डैक ने ही सुपर कम्प्यूटिंग को शिक्षा, अनुसंधान और व्यापार के  क्षेत्र में जनसुलभ बनाने के उद्देश्य से पर्सनल कम्प्यूटर पर आधारित भारत का पहला कम कीमत का सुपर कम्प्यूटर ”परम अनंत“ का निर्माण किया है। परम अनंत में एक भारतीय भाषा का सर्च इंजन ”तलाश“, इंटरनेट पर एक मल्टीमीडिया पोर्टल और देवनागरी लिपि में एक सॉफ्टवेयर लगाया गया है। यह आसानी से अपग्रेड हो सकता है, जिससे इसकी तकनीक कभी पुरानी नहीं पड़ती है।
अप्रैल 2003 में भारत विश्व के उन पाँच देशों में शामिल हो गया जिनके पास एक टेरॉफ्लॉफ गणना की क्षमता वाले सुपरकम्प्यूटर हैं। परम पद्म नाम का यह कम्प्यूटर देश का सबसे शक्तिशाली कम्प्यूटर है।

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