गुरुवार, 10 जनवरी 2013

आपराधिक छवि के नेताओं पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल

संसद द्वारा बने गए कानूनों को तोड़ने वाला कैसे, सांसद  या विधायक बन सकता है .....?
इस तरह के व्यक्ति चार्ज लगने के बाद, जब तक की अंतिम रूप से निर्दोष साबित नहीं हो जाते , तब तक इनका प्रवेश चुने हुए प्रतिनिधि के रूप में भी, अनुमत नहीं होना चाहिए । यह संविधान के साथ घिनौना खिलवाड़ हे । निर्वाचन आयोग इसे रोके ।
- अरविन्द सिसोदिया , कोटा 


आपराधिक छवि के नेताओं पर सुप्रीम कोर्ट  ने उठाए सवाल

Thursday, January
नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने आज केन्द्र सरकार से सवाल किया कि आपराधिक पृष्ठभूमि के मामले में सांसदों और विधायकों के साथ अलग बर्ताव क्यों होता है। न्यायमूर्ति ए.के. पटनायक और न्यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्र की खंडपीठ ने जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा आठ, नौ और 11-ए निरस्त करने के लिए दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान ये टिप्पणी की। न्यायाधीशों ने केन्द्र सरकार से जानना चाहा है, ‘क्यों उन्हें (सांसदों और विधायकों) विशेष वर्ग के रूप में माना जाए? उनके लिए क्यों कानून अलग हो? क्या संसद अपने सदस्यों के लिए अलग और साधारण नागरिकों के लिए दूसरा कानून बना सकती है?’

यह जनहित याचिका अधिवक्ता लिली थॉमस ने दायर कर रखी है। याचिका में कहा गया है कि जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा आठ, नौ और 11-ए के प्रावधानों से संविधान के अनुच्छेद 84, 173 और 326 का उल्लंघन हो सकता है क्योंकि इनके तहत अपराधियों के बतौर मतदाता पंजीकृत होने या सांसद और विधायक बनने पर प्रतिबंध है।

जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा आठ, नौ और 11-ए के तहत सांसद या विधायक को अदालत द्वारा दोषी ठहराये जाने के बावजूद यदि उसकी अपील या पुनरीक्षण याचिका लंबित हो तो वह अपने पद पर बना रह सकता है। यही नहीं, ये प्रावधान दोषी ठहराये जाने या जेल से रिहाई के छह साल बाद ऐसे व्यक्ति को मतदाता के रूप में पंजीकृत होने और चुनाव में उम्मीदवार बनने की अनुमति भी देते हैं।

न्यायाधीशों ने कहा, ‘यदि सांसद के रूप में उनके काम के लिए कोई कानून बनाया जाता है तो समझ में आता है लेकिन अन्य मामलों के लिए कोई विशेष कानून नहीं होना चाहिए।’ लिली थॉमस की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता फली नरिमन ने कहा कि 274 सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं और सरकार इस पर अंकुश के लिए कुछ नहीं कर रही है।
उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 326 या इसमें कहीं और किसी प्रावधान के बगैर इस तरह की अयोग्यता के प्रति किसी प्रकार की नरमी नहीं बरती जा सकती है। (एजेंसी) Thursday, January 10, 2013,

'मेरे शेर का सिर लाओ'-शहीद हेमराज की मां मीनादेवी


शहीदों को पूरे देश की और से नमन
सरकार की कायरता का ही यह नतीजा हे
कि सैनिकों के सर दुश्मन काट ले गए
सेना को इसका बदल लेना ही चाहिए

भारत वन्दे मातरम्....!

'मेरे शेर का सिर लाओ'-शहीद हेमराज की मां मीनादेवी

(तस्वीर: शहीद हेमराज की मां)
dainikbhaskar.com,Jan 10, 2013
सीधी/मथुरा.  मध्य प्रदेश के सीधी जिले के डढिय़ा गांव में मातमी सन्नाटा है। गांव के सपूत लांस नायक सुधाकर सिंह की शहादत पर गर्व तो है लेकिन गम भी है। पिता सच्चिदानंद सिंह को बेटे की शहादत की खबर बुधवार को मिली। आज दिन में 11 बजे शहीद का अंतिम संस्कार किया जाएगा। वहीं, सुधाकर सिंह के साथ वीरगति को प्राप्त हुए मथुरा के कोसीकलां इलाके के गांव शेरगढ़ के रहने वाले लांसनायक हेमराज के गांव ने अपने शहीद को 'शेरगढ़ का शेर' नाम दिया है। कल से दहाड़े मारती मां मीना देवी बेटे का शव घर पहुंचते दहाड़ उठीं। पहले मेरे बेटे का सिर लाओ। सेना के जवानों ने हेमराज का शव चिता पर लिटाया तो गांव के बाकी लोग भी आगे आए और मीना देवी की आवाज बन गए-शहीद का सिर चाहिए। सेना ने शहीद हेमराज को सलामी दी। 5 साल के बेटे प्रिंस ने शहीद हेमराज को मुखाग्नि दी। (हाफिज सईद है भारतीय सैनिकों की मौत का जिम्मेदार!)

मंगलवार शाम से ही शोक के कोहरे में लिपटा कोसी कलां का पूरा इलाका बुधवार को क्रोध की ज्वाला में धधक रहा था। देर शाम उनका पार्थिव शरीर एक विशेष विमान से आगरा पहुंचा और वहां से सड़क मार्ग से उनके गांव तक ले जाया गया। तिरंगे में लिपटा शहीद हेमराज का शव जब गांव पहुंचा तो लोग 'शहीद हेमराज अमर रहे' के नारे लगाए। गर्व भी अपार था और गम अथाह। अपने वीर बेटे का अंतिम संस्कार कैसे कर दें? असमंजस में क्रोध और शोक के बीच का संतुलन खोज रहा था शेरगढ़। गांव पहुंचने पर गांववालों ने उनका अंतिम दर्शन कराने की इच्छा व्यक्त की। लेकिन शव की हालत ठीक न होने से सैन्य अधिकारी ने बॉक्स खोलने की इजाजत नहीं दी। दो घंटे की कशमकश के बाद सभी मान गए ताकि शहीद के शव का अपमान न हो। अंतत: घुप्प अंधेरे में रात के नौ बजे शव को अग्नि को समर्पित कर दिया गया। मीना देवी को गर्व है कि उनका सपूत देश पर न्यौछावर हो गया, गम है बेटा खो देने का।

गांव शोक में है कि बहादुरी का उदाहरण बन गया हेमराज रहा नहीं, क्रोध पड़ोसी मुल्क के दैत्यों पर जो मानवीय मर्यादा भूल शहीद का सिर काट ले गए। शेरगढ़ सैनिकों का गढ़ है। पूर्व सैनिकों की तादाद भी बहुत है, ब्रजभूमि के अन्य गांवों की तरह। बुधवार को उनमें से बहुत हेमराज को श्रद्धांजलि देने आए थे। नम आंखों में ख़ून की डोरी साफ़ झलक रही थी। जुबान पर यही कि सरकार पूर्व सैनिकों को एक मौका दे, दुश्मन (दो जवानों के सिर काट ले गए पाकिस्तानी) से उसी भाषा में बात करने का जो वह बोलता है। 80 किलोमीटर दूर दिल्ली में राजनयिक और राजनीतिक स्तर पर भाषा में जो भी रोष हो, पर भारी गले से निकले शब्दों की ईमानदारी अलग होती है।
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पढ़ाई में अच्छा होने के बावजूद अफसर नहीं बनना चाहते थे हेमराज

हेमराज के बचपन के दोस्त तेजेन्द्र सिंह बताते हैं कि वह बहादुरी का नमूना था। पढ़ाई में बहुत अच्छा पर अफसरी करने की तमन्ना नहीं थी। आतुरता थी सेना में होने की। 2001 में भर्ती होने के बाद तब ही मिलना होता था जब वह घर आते। पत्नी धर्मवती और तीन बच्चों के साथ अपने भाइयों की जिम्मेदारी भी हेमराज पर ही थी। पिता पीताम्बर के गुजर जाने के बाद से। पिछली बार तीन महीने पहले ही आए थे। फोन अक्सर करते। शहादत के दो दिन पहले ही फोन पर बच्चों का हाल पूछते रहे। 7 साल की निर्मला और 5 साल के प्रिंस को तो कुछ एहसास है कि उनके हंसते-खेलते जीवन पर कोई बिजली गिर गई है। वह बिलखते परिवार वालों के बीच सिसक रहे हैं पर तीन साल की शिवानी नहीं समझ पा रही है कि पापा के नहीं आने का मतलब क्या है। छुट्टी मिल गई
थी। टिकट कंफर्म हो गया था। सात फरवरी को आने वाले थे। उसके पापा को शाम सात बजे सेना की एक टुकड़ी आगरे से लेकर आई। पूरे सैन्य सम्मान के साथ। तिरंगे से लिपटे कॉफिन में। आज ही हेमराज का शव जम्मू-कश्मीर के राजौरी से हवाई रास्ते से आगरा पहुंचा। शेरगढ़ की जिद है कि सिर चाहिए, इसी सम्मान के साथ। या उन दरिंदों के सिर लाओ, उसी नृशंसता से। राजनेताओं की सधी टिप्पणियों और प्रतिक्रिया से कोसों दूर हैं कोसी कलां के लोगों की सीधी, पीड़ा से फटी छाती से निकली आवाज। इन्होंने अपने जिगर का टुकड़ा खोया है। दिल्ली को इनके दिल के दर्द का अंदाजा नहीं है।