शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

विवेकानंद मेरी दृष्टि में -रजनी भारद्वाज

मुझे यह लेख स्वामी जी के विषय में लिखे गए अनेकों लेखों में सर्वोपरी प्रतीत हुआ सो लेखिका की अनुमति के बिना ही आप की सेवा में जनहित में प्रस्तुत है .....
- अरविन्द सिसोदिया 
 

लेखिका - रजनी भारद्वाज  Rajani Bhardwaj 

Lecturer in Biology
Jaipur City, Rajasthan, India
Friday, January 11, 2013


विवेकानंद मेरी दृष्टि में


                स्वामी विवेकानंद शब्द जब मन और मस्तिष्क पे दस्तक देता है तो प्रथमतः गेरुआ वस्त्र पहने, सिर पे पाग बांधें ,चौड़े कंधे और तेजमय ओज से भरा एक धीर गंभीर चेहरा कौंधता है . फिर कुछ पल ठहर एक विचारक ,एक दार्शनिक ,एक आध्यात्म गुरु  या विश्व में जन जागरण की अलख जगाने वाला युवा ..अनेक छवियाँ एक के बाद एक बरबस ही चेतना के मानस पटल पे अंकित होने लगती हैं और अंतस के गर्भ में समाने लगती हैं .
               कलकत्ता के प्रसिद्द वकील श्री राम मोहन दत्त व श्रीमती भुवनेश्वरी जी के यंहा विजयादशमी के दिन 12 जनवरी 1863  ई. की सुबह जन्म हुआ स्वामी विवेकानंद का . कायस्थ वंश में जन्मे विवेकानंद का वास्तविक नाम था नरेन्द्र दत्त . नरेन्द्र बचपन से ही एक बहुआयामी व्यक्तित्व के रूप में विकसित हो रहे थे क्योकि घर का खुला आध्यात्मिक,पारिवारिक वातावारण उनके विकास के विभिन्न पहलुओं को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर रहा था जहाँ शास्त्र चर्चा व अध्ययन के प्रति घोर अनुराग था इसलिए आनुवांशिक गुणों के साथ साथ अनुकूल वातावरणीय प्रभाव से नरेन्द्र के व्यक्तित्व का सर्वांगीड़ विकास हो रहा था . वे न केवल पढने में मेधावी थे बल्कि चित्रकला ,संगीत, गीत ,गणित, योग, व्यायाम आदि अनेक विधाओं में भी दक्ष हो रहे थे .और इन विविध आयामी गुणों से सुसंस्कृत ,परिष्कृत व परिमार्जित होता हुआ ये बालक बड़ा होकर बना स्वामी विवेकानंद .

              स्वामी विवेकानंद समुंद्र की अथाह जलराशि के समान विशाल व अतल गहरे तो वहीं पर्वत समान अडिग,
अविचल तो आकाश जैसे विस्तृत असीमित और अपरिमित. श्री रामकृष्ण परमहंस के परम शिष्य विवेकानंद को जितना मैंने पढ़ा ,जाना या समझा है उस से मेरे मानस पे उनकी छवि एक ऐसे असाधारण युगदृष्टा शिक्षक के रूप में उभर के आती है जिन्होंने शिक्षा,समाज,संस्कृति,अध्यात्म,मुक्ति,विज्ञान व सम सामयिक परिपेक्ष्य में उभरते अनेकानेक सवालो पे ना केवल युवाओं का आह्वान किया वरन उनकी मौलिकता, नैतिकता, चारित्रिक दृढ़ता व वैज्ञानिक तथ्यात्मकता को पोषित भी किया साथ ही मानव के समक्ष जीवन के वे आधारभूत सिद्धांत प्रस्तुत किये जिससे वह जीवन के चरम लक्ष्य को प्राप्त कर सके इन सब के बावजूद वे स्वयं भी एक शिष्य के समान ज्ञान पिपासु ,खोजी, अन्वेषी ,व जिज्ञासु उपासक बने रहे और ज्ञान के निरंतर अवबोध व परिमार्जन को ग्राह्य करते रहे . वे सम्पूर्ण  जीवन सरल सलिल से बहते रहे पूरे वेग से और उसमे उतरने वाले अनगिनत लोगों को सही दिशा दी.
         स्वामी विवेकानंद के शिक्षक स्वरूप को समझे तो उन्होंने ज्ञान ,ज्ञानी और ज्ञान पिपासु तीनों को इस प्रकार से एक कड़ी में पिरोया की हर एक ने उन्हें जीवन के अध्यात्म गुरु के पद पर प्रतिष्ठित किया . मेरी दृष्टि में मैं बात करना चाहूंगी उन छोटे छोटे कथन व व्यक्तव्यों की जिन्हें उन्होंने उदृत किया बहुत ही अनौपचारिक रूप से और  पूरे विश्व को खुले विद्यालय में बदल दिया और हर ज्ञान पिपासु को विद्यार्थी में, जो जानना चाहता है स्वयं के बारे में, स्वयं  के होने के बारे में समझना चाहता है, अस्तित्व की अवधारणा को, धर्म की धारणा को, कर्मयोग को ...और इस प्रकार से विवेकानंद का सबसे अहम् ,सुनहरा और उत्कृष्ट पक्ष एक गुरु या शिक्षक के रूप में अवतरित होता है जो ज्ञान को थोपता नही है और ना ही उसे महिमा मंडित कर मानने पे विवश करता है वरन आध्यात्म  के आधार पर तर्क की कसौटी पे कस के आत्मसात करने को अभिप्रेरित करता है

              शिक्षा या ज्ञान का उद्देश्य आत्म निर्भरता के साथ साथ आध्यात्मिक चेतनता को जागृत करना भी है. शिक्षा वह जो मानव को जीवन संघर्ष के लिए तैयार करें, उसके पलायनवादी रुख को पलट दे, नया करने व प्राप्त करने को तत्पर बना दे इसलिए शिक्षा में आध्यात्म तत्व के साथ विज्ञान व तकनीकी का पुट भी सम्मिलित होना चाहिए .और इन सबसे अहम बात जो कही वो आज के परिपेक्ष्य में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है कि मानव को अपने व्यक्तित्व विकास की स्वतंत्रता होनी चाहिए , शारीरिक भी और मानसिक भी इसलिए उन्होंने वर्तमान प्रचलित शिक्षा प्रणाली का खंडन किया क्योकि उनका मानना रहा कि इस तरह की शिक्षा पद्दति से चिंतन शक्ति के विकास में बाधा आती है अतः शिक्षा में प्रयोग विधि उचित है

                 शिक्षा देने में विवेकानंद व्यक्ति विभेद को भी बहुत ही स्पष्ट तरीके से विभेदित करते हुए कहते हैं कि यूँ तो प्रत्येक मनुष्य में ज्ञान प्राप्त करने कि क्षमता होती है किन्तु प्रत्येक शिक्षार्थी का ग्राह्य शक्ति एक जैसी नही होती है अतः शिक्षार्थी की व्यैक्तिक भिन्नता व मानसिक योग्यता व समझ के अनुरूप ही शिक्षा दी जानी चाहिए जहाँ भय या दंड का कोई स्थान नही होना चाहिए .

                   स्वामी विवेकानंद के गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस थे अतः उन्होंने गुरु के पद ,मान ,नाम ,व प्रतिष्ठा की शिक्षक के रूप में विशद विवेचना की है और बहुत ही सरल अर्थो में बताया है की गुरु कैसा?? गुरु कौन ??? उन्होंने कहा कि एक गुरु वे जो केवल विषय या शास्त्र का सैद्धांतिक व वस्तुनिष्ठ ज्ञान को माध्यम के रूप में हस्तांतरित करते हैं और एक गुरु वे जो कार्य व व्यवहार से हमारी सुसुप्त जिज्ञासाओं को जगा देते हैं हमारी इन्द्रियों को जागृत करते हैं और हमे जड़ से चेतनता व स्थूल ,मूर्त चिंतन से अमूर्त सूक्ष्म चेतना तक ले जाते हैं , जो विवश कर देते है श्री कृष्ण के समान ये मानने को कि मुझे ही आचार्य मानो . और इसीलिए गुरुओं की आवश्यकता सदैव बनी रही व संसार में आचार्य का पद कभी रिक्त नही हुआ . वास्तव में गुरु ही आत्मानुभूति का साधन है ..पूर्णता का मार्ग है .

               स्वामी विवेकानंद ने कहा कि शिक्षा समस्त मानव जाति के प्रति विशुद्ध प्रेम से ही प्रेरित होनी चाहिए जिसमे लाभ या यश की कामना का विलोपन हो क्योकि ये प्रेम तत्व को नष्ट कर देते हैं साथ ही उन्होंने भारतीय व पाश्चात्य विचारधारा का प्रबल सर्थन किया और वे भारतीय शिक्षा की वैचारिक चिंतन शीतलता व पाश्चात्य वैज्ञानिक गतिशीलता के बीच सेतु बने.

               स्वामी विवेकानंद ने शिष्य को इंगित करते हुए कहा की शिष्य वह जिसमें ज्ञान प्राप्त करने की प्यास हो , लगन के साथ वह परिश्रम युक्त हो एवं वाणी ,विचार व कार्य की पवित्रता से पूर्ण हो . ज्ञान पिपासा से तात्पर्य अन्तःकरण की चाहना से रहा तात्पर्य जब तक ह्रदय में उच्चतर आदर्श के सच्ची व्याकुलता उत्पन्न न हो जाये तब तक कोई भी मनुष्य शिष्य नही हो सकता . गुरु के प्रति सहज विश्वास, विनम्रता व श्रृद्धा का भाव उसमे होना नितांत अपरिहार्य है और वाणी, मन व तन में ब्रह्मचार्य का पालन हो . दृढ संकल्प शक्ति हो ,सत्य का उपासक हो ,सूक्ष्म तत्व को समझने व धारण करने की उत्कट लालसा हो . स्वामीजी ने कहा कि-- गुरु तो लाखो मिल जाते है किन्तु एक श्रेष्ठ शिष्य मिल पाना अत्यंत कठिन होता है क्योकि ज्ञान की प्राप्ति में शिष्य की मनोवृति सर्वाधिक महवपूर्ण होती है. जब प्राप्त करने वाला योग्य होता है तो उसमे ज्ञान के दिव्य प्रकाश का आभिर्भाव होता ही है इसलिए शिष्य में मुक्त होने की भावना उत्कृष्ट होनी चाहिए और तीव्र इच्छा शक्ति भी.. जैसे किसी व्यक्ति के हाथ पैर इस प्रकार बांध दिए जाये की वह हिल डुल न सके और उसके शरीर पे दहकता अंगारा रख दिया जाये तो वह उसे हटाने केलिए अपनी सम्पूर्ण चेतना शक्ति व उर्जा को लगा देगा और तब उसका ह्रदय कमल सा खिल उठेगा और वह अनुभव करेगा  कि गुरु उसके तन में ही विद्यमान है और यही अनुभूति उसे मुक्ति का मार्ग दिखाएगी .

                  इस प्रकार मैं देखती हूँ कि विवेकानंद द्वारा प्रदत्त शिक्षा जीवन रह्स्योंकी परतों को खोलती है, ज्ञान का उदय करती है व उसका विस्तार करती है. मन, वाणी ,विचार, सोच व कार्य में एकरूपता लाती है .श्रृद्धा,विश्वास,प्रेम, नम्रता सिखाती है .सत्य व असत्य में विवेक सम्मत अंतर करना समझाती है. वह व्यक्ति एवं समाज हित में अंतर नही करती और सामाजिक निर्माण के लिए मानव निर्माण आवश्यक बताती है .एक शिक्षक के सार्वभौमिक गुणों से ओतप्रोत विवेकानंद एक  सह्रदय कवि ,अध्धयन वेत्ता , दार्शनिक, चिन्तक ,राष्ट्रवादी ,विश्वबंधुत्व भाव से भरे एवं   वर्ग ,जाति, वर्ण ,लिंग से ऊपर उठे महामानव दिखते हैं. उनका चिंतन मानव जीवन की वास्तविकता ,उपयोगी मानव-वाद तथा यथार्थता आधारित है , वे व्यवहारिक कर्मयोगी हैं , राष्ट्रवादी हैं और साथ ही विशुद्ध समाज सुधारक भी .कर्मशील समाज के रचनाकार, वेदान्तवादी ,वैयक्तिकता व सामाजिकता के समर्थक व स्त्रियों के प्रति श्रिष्ट सम्मान भाव के पोषक भी हैं . उन्होंने प्राणियों के दुःख दर्द में बराबर का भागिदार बन कर उनकी मुक्ति को ही स्वयं की मुक्ति माना.

             चिंतन, आलोचन ,विश्लेषण, विवेचन के कारण ही शायद उन्हें विवेकानंद कहा गया. 4 जुलाई 1902 को रात्रि नौ  बजे के लगभग ये ज्ञान सूर्य अपने दिव्य प्रकाश से विश्व को आलोकित कर महाप्रयाण कर गये किन्तु उनकी ज्ञान ज्योति आज भी मानव का मार्ग प्रशस्त कर रही है . मेरा उन्हें शत शत नमन………..


लेखिका - रजनी भरद्वाज Rajani Bhardwaj 
Lecturer in Biology
Jaipur City, Rajasthan, India
Friday, January 11, 2013


शास्त्रीजी की मौत का रहस्य अनसुलझा ही रहा

यह देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा की नेताजी सुभाषचंद्र बॊस , जनसंघ के संस्थापक एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री श्यामा प्रशाद मुखर्जी , प्रधान मंत्री लालबहादुर शास्त्री  और जनसंघ के राष्टीय अध्यक्ष पंडित दीनदयाल उपाध्याय हमारे देश के महान  नेता  रहे हें , मगर इनकी मृत्यु संदिग्धता में आज तक अपनी हकीकत तलाश रही है  और हम कुछ भी सही जवाब नहीं दे पाए हें ...यह हमारी त्रासदी ही कही जायेगी



शास्त्रीजी की मौत का रहस्य अनसुलझा ही रहा 

कुछ मौतें ऐसी होती हैं जो तमाम उम्र रहस्य बनी रहती हैं. ऐसी ही मौत लालबहादुर शास्त्री जी ( Lal Bahadur Shastri ) की भी थी जो आज भी रहस्य बनी हुई है. लालबहादुर शास्त्री( Lal Bahadur Shastri ) भारत के दूसरे प्रधानमंत्री थे. लालबहादुर शास्त्री की सादगी ऐसी थी कि उन्हें देखने वाला व्यक्ति उनकी तरफ आकर्षित हो जाता था. लालबहादुर शास्त्री जी( Lal Bahadur Shastri ) का नाम भले ही इतिहास के पन्नों में नजर नहीं आता है पर यह वो नाम है जिसने जय जवान-जय किसान का नारा देकर देश के किसानों और सीमा पर तैनात जवानों का आत्मबल बढ़ाने की नई मिसाल कायम की थी.

Lal Bahadur Shastri Death Mystery
लालबहादुर शास्त्री: क्या सुलझेगी मौत की गुत्थी ?
लालबहादुर शास्त्री की मौत (Lal Bahadur Shastri Death)को जब कई साल बीत चुके थे तब लालबहादुर शास्त्री ( Lal Bahadur Shastri ) के बेटे सुनील शास्त्री ने लालबहादुर शास्त्री के मौत के रहस्य (Lal Bahadur Shastri Death Secret)की गुत्थी सुलझाने को कहा था. पूर्व सोवियत संघ के ताशकंद में 11 जनवरी, 1966 को पाकिस्तान के साथ ताशकंद समझौते पर दस्तखत करने के बाद शास्त्री जी की मौत हो गई थी. लालबहादुर शास्त्री के बेटे सुनील शास्त्री का कहना था कि जब लालबहादुर शास्त्री की लाश को उन्होंने देखा था तो लालबहादुर शास्त्री की छाती, पेट और पीठ पर नीले निशान थे जिन्हें देखकर साफ लग रहा था कि उन्हें जहर दिया गया है. लालबहादुर शास्त्री की पत्नी ललिता शास्त्री का भी यही कहना था कि लालबहादुर शास्त्री की मौत संदिग्ध परिस्थितियों में हुई थी.

Lal Bahadur Shastri Life
शास्त्री जी का जीवन और मां के साथ लगाव
भारत माता के लिए भी वो दिन खुशी का रहा होगा जब 2 अक्टूबर, 1904 को मुगलसराय, उत्तर प्रदेश में लालबहादुर शास्त्री( Lal Bahadur Shastri ) ने जन्म लिया होगा. लालबहादुर शास्त्री ( Lal Bahadur Shastri ) का वास्तविक नाम लाल बहादुर श्रीवास्तव था. लालबहादुर शास्त्री बचपन से ही शिक्षा में कुशल थे जिस कारण स्नातकोत्तर की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्हें ‘शास्त्री’ की उपाधि से सम्मानित किया गया था.
बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो अपने व्यस्त जीवन में भी मां की नरम-नरम हथेलियों से प्यार और दुलार लेना नहीं भूलते हैं. लालबहादुर शास्त्री ( Lal Bahadur Shastri ) पर उनके पुत्र सुनील शास्त्री द्वारा लिखी पुस्तक ‘‘लालबहादुर शास्त्री, मेरे बाबूजी’’ में बताया गया है कि शास्त्री जी की मां उनके कदमों की आहट से उनको पहचान लेती थीं और बड़े प्यार से धीमी आवाज में कहती थीं ‘‘नन्हें, तुम आ गये?”  लालबहादुर शास्त्री ( Lal Bahadur Shastri ) का लगाव अपनी मां के साथ इतना था कि वे दिन भर अपनी मां का चेहरा देखे बगैर नहीं रह सकते थे.
लालबहादुर शास्त्री ( Lal Bahadur Shastri ) कहा करते थे कि ‘हम चाहे रहें या न रहें, हमारा देश और तिंरगा झंडा रहना चाहिए’. लालबहादुर शास्त्री ( Lal Bahadur Shastri ) उन राजनेताओं में से एक थे जो अपने पद के दायित्व को भली प्रकार समझते थे. आजादी के बाद उत्तर प्रदेश में गोविंद वल्लभ पंत जब मुख्यमंत्री बने तो लाल बहादुर शास्त्री को उत्तर प्रदेश का गृहमंत्री बना दिया गया. नाटे कद व कोमल स्वभाव वाले शास्त्री को देखकर किसी को कल्पना भी नहीं थी कि वह कभी भारत के दूसरे सबसे सफल प्रधानमंत्री बनेंगे. एक समय ऐसा आया जब लालबहादुर शास्त्री को रेल मंत्री बनाया गया. लाल बहादुर शास्त्री ऐसे राजनेता थे जो अपनी गलती को सभी के सामने स्वीकार करते थे जिसके चलते लालबहादुर शास्त्री( Lal Bahadur Shastri ) ने रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था.

लालबहादुर शास्त्री( Lal Bahadur Shastri ) को 1964 में देश का दूसरा प्रधानमंत्री बनाया गया था. 1966 में  उन्हें भारत का पहला मरणोपरांत भारत रत्न का पुरस्कार भी मिला था. लालबहादुर शास्त्री( Lal Bahadur Shastri ) को चाहने वाले लोगों को वो दिन आज भी याद आता है जब 1965 में अचानक पाकिस्तान ने भारत पर सायं 7.30 बजे हवाई हमला कर दिया था तो उस समय तीनों रक्षा अंगों के चीफ ने लालबहादुर शास्त्री से पूछा ‘सर आप क्या चाहते है आगे क्या किया जाए…आप हमें हुक्म दीजिए’ तो ऐसे में लालबहादुर शास्त्री ( Lal Bahadur Shastri ) ने कहा कि “आप देश की रक्षा कीजिए और मुझे बताइए कि हमें क्या करना है?” ऐसे प्रधानमंत्री बहुत कम ही होते हैं जो अपने पद को सर्वोच्च नहीं वल्कि अपने पद को जनता के लिए कार्यकारी मानकर चलते है. किसी ने सच ही कहा है कि वीर पुत्र को हर मां जन्म देना चाहती है. लालबहादुर शास्त्री ( Lal Bahadur Shastri ) उन्हीं वीर पुत्रों में से एक हैं जिन्हें आज भी भारत की माटी याद करती है.

प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ केदारनाथ धाम




यहां स्थापित प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ केदारनाथ मंदिर अति प्राचीन है। कहते हैं कि भारत की चार दिशाओं में चार धाम स्थापित करने के बाद जगद्गुरू शंकराचार्य ने ३२ वर्ष की आयु में यहीं श्री केदारनाथ धाम में समाधि ली थी। उन्हीं ने वर्तमान मंदिर बनवाया था। यहां एक झील है जिसमें बर्फ तैरती रहती है इस झील के बारे में प्रचलित है इसी झील से युधिष्ठिर स्वर्ग गये थे। श्री केदारनाथ धाम से छह किलोमीटर की दूरी चौखम्बा पर्वत पर वासुकी ताल है यहां ब्रह्म कमल काफी होते हैं तथा इस ताल का पानी काफी ठंडा होता है। यहां गौरी कुण्ड, सोन प्रयाग, त्रिजुगीनारायण, गुप्तकाशी, उखीमठ, अगस्तयमुनि, पंच केदार आदि दर्शनीय स्थल हैं।

युग प्रवर्तक महानायक स्वामी विवेकानंद - गिरीश पंकज



 
विश्व धर्म संसद का विहंगम द्रश्य : स्वामी जी ने इसी में भारत के सनातन ज्ञान की गंगा बहा कर सर्वोच्चता स्थापित की थी ..........

कालजयी महानायक स्वामी विवेकानंद
- गिरीश पंकज

स्वामी विवेकानंद के जीवन की शुरुआत देखें तो अद्भुत रोमांच होता है। कैसे एक संघर्षशील नवयुवक धीरे-धीरे महागाथा में तब्दील होता चला जाता है। उनका जीवन हम सबके लिए प्रेरणास्पद है। अपनी महान मेधा के बल पर दुनिया में भारत की आध्यात्मिक पहचान बनाने में सफल हुए स्वामी विवेकानंद ने सौ साल पहले जो चमत्कार कर दिखाया, वह आज दुर्लभ है। यह ठीक है कि तकनीकी या आर्थिक क्षेत्र में कुछ उपलब्धियाँ अर्जित करके कुछ लोगों ने यश और धन अर्जित किया है, मगर वह उनका व्यक्तिगत लाभ है, लेकिन स्वामी विवेकानंद ने व्यक्तिगत लाभ अर्जित नहीं किया, वरन देश की साख बनाने में अपना योगदान किया। उनके कारण पूरी दुनिया भारत की ओर निहारने लगी। वेद-पुराणों के हवाले से उन्होंने पूरी दुनिया में भारतीय चिंतन की नूतन व्याख्या की। ‘लेडीज एंड जेंटलमेन’ कहने की परम्परा वाले देश को उन्होंने यह ज्ञान पहली बार दिया कि बहनों और भाइयों जैसा आत्मीय संबोधन भी दिया जा सकता है। उन्होंने दुनिया को मनुष्य या परिवार का एक सदस्य समझने का संस्कार दिया क्योंकि स्वामी विवेकानंद को यही ज्ञान मिला था। यानी वसुधैव कुटुम्बकम का ज्ञान ।

स्वामी विवेकानंद की जीवन-यात्रा की शुरुआत देखें तो उनका जीवन भी मध्यमवर्गीय परेशानियों से भरा रहा। पढ़ाई में वे मेधावी थे तो खेल-कूद में भी माहिर थे। कुश्ती में निपुण थे। कुशल तैराक थे। तलवार चलाने में माहिर थे। नाटक और संगीत कला में रुचि थी। इसीलिए उन्होंने एक नाटक कम्पनी भी बनाई थी। उनका शरीर भी सुगठित था। किशोरावस्था में ही उन्होंने एक व्यायाम शाला बनाई थी। इसलिए आज जब हम युवा पीढ़ी के सामने कोई आदर्श प्रस्तुत करने की बात हो तो सबसे पहले कम से कम मुझे तो स्वामी विवेकानंद का नाम ही याद आता है। दुर्भाग्य से नई पीढ़ी के सामने नायक के रूप में फिल्मी कलाकार ही आ कर खड़े हो जाते हैं। इन कलाकारों में ज्यादातर का जीवन अनेक लंपटताओं से भरा रहता है। उनकी हरकतें देख कर युवक समझते हैं कि यही सब हमें ग्रहण करना है। फटी चिथड़ी जींस फुलपैंट भी अब फैशन है. यह विवेकहीनता का चरम है. आज समाज में जो पतन नजर आता है, उसका असली कारण सिनेमा और टीवी के अश्लील कार्यक्रम भी है। इसलिए नई पीढ़ी का ध्यान इन सबसे हटाने के लिए कुछ न कुछ जतन करना जरूरी है। सिनेमा के नकली नायक हमारे आदर्श बिल्कुल नहीं हो सकते । हमारे सामने महान नायकों की लम्बी फेहरिश्त मौजूद है। इनमें स्वामी विवेकानंद अग्रिम पंक्ति में हैं। उन्होंने किसी पटकथा के सहारे अभिनय नहीं किया और न संवाद बोले। उन्होंने तो अपने महान ग्रंथों का अवगाहन करके जीवन जीने की नई वैज्ञानिक-आध्यात्मिक-दृष्टि अर्जित की।

स्वामी जी युवकों से कहते थे, कि ”अपने पुट्ठे मजबूत करने में जुट जाओ। वैराग्य-वृत्ति वालों के लिए त्याग-तपस्या उचित है लेकिन कर्मयोग के सेनानियों को चाहिए-विकसित शरीर, लौह मांस-पेशियाँ और इस्पात के स्नायु।” तरुण मित्रों को संबोधित करते हुए उन्होंने हमेशा यही संदेश दिया कि ”शक्तिशाली बनो। मेरी तुम्हें यही सलाह है। तुम गीता के अध्ययन की अपेक्षा फुटबाल द्वारा ही स्वर्ग के अधिक समीप पहुँच सकोगे। तुम्हारे स्नायु और माँसपेशियाँ अधिक मजबूत होने पर तुम गीता अच्छी तरह समझ सकोगे। तुम अपने शरीर में शक्तिशाली रक्त प्रवाहित होने पर श्रीकृष्ण के तेजस्वी गुणों और उनकी अपार शक्ति को हृदयंगम कर पाओगे।” स्वामी विवेकानंद यह नहीं कहते थे, कि पूजा-पाठ करो, भगवत-भजन करो या अध्यात्म में डूब जाओ। वे अपने समकाल से काफी आगे की सोच वाले थे। वे दकियानूस नहीं थे। वैज्ञानिक दृष्टिसम्पन्न युवक थे। एक युवक जब एक बार स्वामी जी से मिला तो उसने कहा कि मैं घर के सारे दरवाजे-खिड़कियाँ बंद करके आँखें मींच लेता हूँ। पर ध्यान ही नहीं लगाता। मन को शांति ही नहीं मिलती। तब स्वामी जी ने मुसकराते हुए कहा था, कि ”तुम सबसे पहले दरवाजे-खिड़कियाँ खोल दो और अपनी खुली आँखों से बाहर की दुनिया देखो। तुम्हें सैकड़ों गरीब-असहाय लोग दिखाई देंगे। तुम उनकी सेवा करो। इससे तुम्हें मानसिक शांति मिलेगी। वे गरीबों की सेवा करने के लिए सबको प्रेरित करते थे। भूखे को खाना खिलाना, बीमार को दवाई देना और जो अनपढ़ हैं उन्हें ज्ञान देना। यही है सच्चा अध्यात्म। इसी से मिलती है मन की शांति।”

स्वामी विवेकानंद का सौभाग्य था, कि उन्हें अपने माता-पिता से अच्छे संस्कार मिले। सत्य निष्ठा की सीख मिली। बेहतर गुरू मिले। रामकृष्ण परमहंस जैसे सच्चे मार्गदर्शक मिले। पिता विश्वनाथदत्त जी के असामयिक निधन के बाद घर चलाने के लिए नरेंद्र नाथ को नौकरी भी करनी पड़ी। यानी उनके जीवन में सघर्ष का यह दौर भी आया लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपने जीवन को कर्मयोग के साथ-साथ आध्यात्मिकता से भी अनुप्राणित करते रहे। और एक समय आया जब वे विदेश जाने से पहले स्वामी विवेकानंद में रूपांतरित हुए और पूरी दुनिया में भारतीय संस्कृति की पहचान के रूप में आलोकित हो गए। स्वामी जी के जीवन एवं विचारों को पढ़ते हुए मैंने यह महसूस किया कि उन्होंने कहीं भी साम्प्रदायिकता को या नफरत को बढ़ाने वाले संकुचित विचारों का प्रचार-प्रसार नहीं किया। उन्हाने विदेश में प्रवचन देते हुए कहा था, कि ”हमें मानवता को वहाँ ले जाना चाहते हैं, जहाँ न वेद है, न बाइबिल है और न कुरान। लेकिन यह काम वेद, बाइबिल और कुरान के समन्वय द्वारा किया जाना है। मानवता को सीख देनी है कि सभी धर्म उस अद्वितीय धर्म की ही विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं, जो एकत्व है। सभी को छूट है कि वे जो मार्ग अनुकूल लगे उसको चुन लें।” स्वामी जी की सबसे बड़ी विशेषता यही है, कि वे ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं’ कहने के बावजूद वैसे हिंदू बिल्कुल नहीं थे, जैसे आजकल के नजर आते हैं। ये लोग अलगाव फैलाने का काम करते हैं। दंगे भड़काने में सहायक होते हैं। हमें बनना है तो स्वामी विवेकानंद जैसा हिंदू बनना है। शिकागों में व्याख्यान देते हुए उन्होंने कहा था, कि ”मैं अभी तक के सभी धर्मों को स्वीकार करता हूँ। और उन सबकी पूजा करता हूँ। मैं उनमें से ऐसे प्रत्येक व्यक्ति के साथ ईश्वर की उपासना करता हूँ। वे स्वयं चाहे किसी रूप में उपासना करते हों। मैं मुसलमानों के मस्जिद जाऊँगा। मैं ईसाइयों के गिरजा में क्रास के सामने घुटने टेक कर प्रार्थना करूँगा: मैं बौद्ध मंदिरों में जा कर बुद्ध और उनकी शिक्षा की शरण लूँगा। मैं वन में जा कर हिंदुओं के साथ ध्यान करूँगा जो हृदयस्थ ज्योतिस्वरूप परमात्मा को प्रत्यक्ष करने में लगे हुए हैं।” सच्चा मनुष्य धर्मस्थलों में भेद नहीं करता। मुझे याद आती है गोस्वामी तुलसीदास की पंक्तियाँ कि ‘माँग के खाइबो और मसीद में सोइबो’। महान ग्रंथ रामचरित मानस के रचयिता ने समाज को जागरण का पथ दिखाने के साथ यह भी साबित कर दिया कि मुझे कट्टर हिंदू समझने की भूल न करना। कोई भी सच्चा ज्ञानी साम्प्रदायिक बातें नहीं करेगा। स्वामी जी का समूचा जीवन-दर्शन देखें तो वे कहीं भी यह नहीं कहते कि हिंदुओं, तुम अपनी ताकत पहचानो और जो विधर्मी हैं, उनका नाश कर दो। या फिर यह भी नहीं कहते कि यह देश केवल तुम्हारा है। जो गैर हिंदू हैं उन्हें यहाँ रहने का हक नहीं है। उल्टे स्वामी जी समूची उदारता के साथ बार-बार यही कहते हैं, कि च्मैं भारतीय हूँ और प्रत्येक भारतीय मेरा भाई है।..मनुष्य। केवल मनुष्य ही हमें चाहिए। समाज में व्याप्त छुआछूत की भावना को देख कर वे आहत होते थे इसीलिए उन्होंने कहा था, ”भूल कर भी किसी को हीन मत मानो। चाहे वह कितना ही अज्ञानी, निर्धन अथवा अशिक्षित क्यों न हो और उसकी वृत्ति भंगी की ही क्यों न हो क्योंकि हमारी-तुम्हारी तरह वे सब भी हाड़-माँस के पुतले हैं और हमारे बंधु-बांधव हैं।”

कुल मिला कर देखें तो स्वामी विवेकानंद अपने आप में समूची पाठशाला हैं। यहाँ आने वाला गंभीर विद्यार्थी जीवन में कभी फेल हो ही नहीं सकता। हर हालत में पास ही होगा। बशर्ते वह इनकी पाठशाला में भरती तो होना चाहे. स्वामी जी का जीवन, उनका चिंतन हमें सौ साल बाद भी ऊर्जा से, जोश से भर देता है। वे अपने जीवन के चालीस साल भी पूर्ण नहीं कर सके थे। चालीस साल में उन्होंने दुनिया को जो ज्ञान दिया, जो दृष्टि दी, वह हमें मार्ग दिखाने के लिए पर्याप्त है। सिखों के दसवें गुरू गुरू गोबिंदसिंघ जी भी चालीस साल तक ही जीए मगर उन्होंने भी अपने जीवन को एक मिसाल बना दिया था। ये सब उदाहरण हैं जिन्हें देख कर लगता है कि प्रतिभा के लिए उम्र का कोई बंधन नहीं रहता। ऐसे अनेक उदाहरण है जो हमें बताते हैं, कि विचारों का अमृत-पान कराने में युवा पीढ़ी का ही ज्यादा अवदान है। गाँधी जी भले ही अस्सी साल के आसपास हमारे बीच से गए लेकिन उनका युवाकाल में ही अपने कर्म से दक्षिण अफ्रीका और और बाद में भारत आ कर सामाजिक जागरण का सूत्रपात कर दिया था। चालीस साल की उम्र में लिखी गई उनकी कृति ‘हिंद स्वराज’ आज भी ताजा लगती है। इसलिए यह मान लेना कि युवा काल मौजमस्ती का काल होता है, बहुत बड़ी नादानी है। मूर्खतापूर्ण सोच है। युवा पीढ़ी को गुमराह करने की साजिश है। स्वामी विवेकानंद के जीवन-वृत्त को देखें तो हम कह सकते हैं कि एक युवक अगर ठान ले तो वह अपने जीवन को नरेंद्रनाथ से विवेकानंद में तब्दील कर सकता है। इसलिए आज की युवा पीढ़ी को समझाया जाना चाहिए, या उसे खुद समझना चाहिए कि उसके नायक रुपहले पर्दें के नकली हीरों नहीं हो सकते। उसे नायक तलाश करना है तो पीछे मुड़ कर देखना होगा। अतीत के पन्ने खंगालने होंगे। इतिहास से गुजरना होगा। भारत को भारत बनाने में युवा पीढ़ी का ही महती योगदान रहा है।

आश्चर्य होता है,कि सौ साल पहले स्वामी विवेकानंद ने जैसा भारत देखा था, आज अनेक मोर्चो पर भारत की वैसी की वैसी हालत बनी हुई है। इसलिए लगता है, कि विवेकानंद के सपने को पूरा करने का दायित्व हम सब का है। युवा पीढ़ी का है। उन्होंने एक बार कहीं कहा था, कि ”ओ माँ, जब मेरी मातृभूमि गरीबी में डूब रही हो तो मुझे नाम और यश की चिंता क्यों हो? हम निर्धन भारतीयों के लिए यह कितने दु:ख की बात है, कि जहाँ लाखों लोग मुट्ठी भर चावल के अभाव में मर रहे हों, वहाँ हम अपने सुख-साधनों के लिए लाखों रुपये खर्च कर रहे हैं। भारतीय जनता का उद्धार कौन करेगा? कौन उनके लिए अन्न जुटाएगा? मुझे राह दिखाओ माँ, कि मैं कैसे उनकी सहायता करूँ?” स्वामी विवेकानंद आज अगर सशरीर मौजूद होते तो वे अपनी यही वेदना फिर दुहराते हुए यही बात फिर कहते। आज भी देश में लाखों लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। किसान आत्महत्या कर रहे हैं। अशिक्षा, अज्ञानता से ग्रस्त लोगों की संख्या भी करोड़ों में है। धर्म-अध्यात्म अब भरपेट लोगों का शगल बन गया है। एक पाखंड चारों तरफ पसरा हुआ है कि लोग बड़े धार्मिक हैं। दरिद्रनारायण के उन्नयन पर कोई खर्च नहीं करना चाहता लेकिन धर्मस्थल या अपनी जाति या समाज के भवन बनाने में लोगों की बड़ी दिलचस्पी देखी जा रही है। ऐसे समय में निर्धन वर्ग से नैतिकता या धर्म-कर्म की बातें करना बेईमानी है। छल है। स्वामी विवेकानंद जी ने गरीबी के मर्म को समझा था, इसीलिए वे कहते थे, ”पहले रोटी, फिर धर्म। जब लोग भूखों मर रहे हों, तब उनमें धर्म की खोज करना व्यर्थ है। भूख की ज्वाला किसी भी मतवाद से शांत नहीं हो सकती। जब तक तुम्हारे पास संवेदनशील हृदय नही, जब तक तुम गरीबों के लिए तड़प नहीं सकते, जब तक तुम उन्हें अपने शरीर का अंग नहीं समझते, जब तक तुम अनुभव नहीं करते कि तुम और सब दरिद्र और धनी, संत और पापी-उसी एक असीम पूर्ण के -जिसे तुम ब्रह्म कहते हो, अंश हैं, तब तक तुम्हारी धर्म-चर्चा व्यर्थ है।” आज इस दौर में बदहाली में कोई कमी नहीं आई है। ये और बात है कि हमारा समाज इंटरनेट के युग में प्रविष्ट कर चुका है, गरीब से गरीब व्यक्ति के पास भी मोबाइल हो सकता है, लेकिन उसकी बदहाली कम नहीं हुई है। बेरोजगारी, भूख, वर्गभेद, छुआछूत, अशिक्षा, अंधविश्वास, सामंती मनोवृत्ति, राष्ट्रविरोधी प्रवृत्ति आदि अनेक बुराइयों से ग्रस्त भारतीय समाजको एक बार फिर स्वामी विवेकानंद के चिंतनों से रूबरू कराने का समय आ गया है। आज की अधिकांश तरुणाई फिल्मी हीरो-हीराइनों को अपना रोल मॉडल बनाने की कोशिश कर रही है। जबकि हमारे रोल मॉडल स्वामी विवेकानंद समेत अनेक युवा क्रांतिकारी, विचारक ही युग प्रवर्तक हो सकते हैं इसलिए हमें अतीत की ओर निहारते हुए ही भविष्य का सफर तय करना होगा।