रविवार, 13 जनवरी 2013

अखंडता पर सवाल : धारा ३७० : मुकेश कुमार



अखंडता पर सवाल:धारा ३७०

(Article 370:A Threat to Nation's Integrity)

लेखक: मुकेश कुमार

कितने आश्चर्य की बात है की देश के किसी भी भाग में बसने की हमारी संवैधानिक स्वतंत्रता जम्मू-कश्मीर की सीमा के पास जाकर घुटने टेक देती है. वर्षों से जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा के लिए जान की वाजी लगाकर डटे रहनेवाले भारतीय सैनिक जम्मू-कश्मीर में दो गज जमीन पाने के हकदार नही है. वहाँ की नागरिकता पृथक मानी जाती है. करोडो भारतियों का गौरव भारतीय सम्विधान जम्मू-कश्मीर में कुछ लाख लोंगो के बिच गौरवहिन हो जाती है क्योंकि जम्मू-कश्मीर का अपना अलग सम्विधान है. यहाँ तक की भारतियों की आँखों का तारा तिरंगा झंडा, जिसके लिए हजारों लोगों ने हंसते-हंसते प्राण न्योछावर किये है वही जम्मू-कश्मीर में महत्वहीन हो जाते है. स्वतंत्रता पश्चात सरदार पटेल के नेतृत्व में देश के तमाम रियासतों के झंडे अतीत के गर्भ में विलीन हो चुके है, परन्तु जम्मू-कश्मीर का झंडा देश की सम्प्रभुता पर प्रश्न चिन्ह लगाने के लिए बचा ही है. संविधान में वर्णित राज्य के नीति के निदेशक तत्वों से जम्मू-कश्मीर राज्य को कोई सरोकार नही है. जम्मू-कश्मीर को प्रतिवर्ष भारतीय संसद द्वारा दी गयी रकम के खर्च का हिसाब भातीय संसद नही मांग सकती. राष्ट्रपति द्वारा वित्तीय आपात की घोषणा भी इस राज्य पर लागु नही हो सकती है और कश्मीरी लड़कियों की सबसे दुखद स्थिति यह है की जम्मू-कश्मीर के अन्येतर किसी व्यक्ति से शादी करने पर वह न केवल पैत्रिक सम्पत्ति वरन स्वार्जित सम्पत्ति से भी बेदखल हो जाती है..
इन सभी परिस्थितियों का कारन काला कानून के नाम से कुख्यात रही धारा ३७० है जिसने जम्मू-कश्मीर को भारत से अलहदा कर रखा है. जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग होते हुए भी किंचित भिन्न प्रतीत होता है और यही वजह है की जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों, अलगाववादियों की पौ बारह है. यही वज़ह है की पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर की ५१८० वर्ग मिल जमीन हड़पने के पश्चात शेष भाग पर गिद्ध दृष्टि लगाये बैठा है. धारा ३७० के कारन जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में अलगाववादियों को दुष्प्रचार का पर्याप्त जगह मिलता है और वह शेख अब्दुल्ला द्वारा जम्मू-कश्मीर में तानाशाह स्थापित करने के स्वप्न को साकार करने के लिए प्रयत्नशील है जिसे वह आजाद कश्मीर का नाम देकर पूरा करना चाहता है. उधर पाकिस्तान भी इस कमजोरी का फायदा उठाकर आतंकवाद, अलगाववाद को लगातार बढ़ावा देता रहा है. धारा ३७० की कंदिकाए उसके इस नापाक इरादे की पूर्ति हेतु तुरुप का पत्ता है क्योंकि इसके कारन जम्मू-कश्मीर भारत के अन्य राज्यों से दूर और नितांत अकेली खड़ी प्रतीत होती है. इसी कमजोर परिस्थिति का लाभ उठाकर अलगाववादी, आतंकवादी और पाकिस्तान इसे क्षत-विक्षत कर लुट लेने को आमादा है.
कहा जाता है की जब इस विधेयक को पारित करने हेतु संविधान सभा में पेश किया गया तो सभी सदस्यों ने इसकी प्रतियों को काला कानून और देश की अखंडता के लिए घातक कहकर फाड़कर फेंक दिया. कश्मीर मसले को बेहद पेचीदे एवं घातक मोड पर ला खड़ा करने के लिए बदनाम नेहरु खुद संसद में इसे पेश करने की हिम्मत नही जुटा पाए और गोपाल स्वामी अयंगर को इसे पारित करने की जिम्मेदारी सौंप अमेरिका चले गए. परन्तु गोपाल स्वमी की किसी ने एक न सुनी. आश्चर्य है सरदार पटेल जो धारा ३०६-क के नए रूप धारा ३७० के बिलकुल खिलाफ थे, उन्होंने इसे पारित करने के लिए सदस्यों से अनुरोध किया. सफाई में उनका कहना था की यदि ऐसा नही करते तो नेहरु नाराज हो जाते.
ज्ञातव्य है की हैदराबाद में सैनिक अभियान के बाद ही नेहरु जी जम्मू-कश्मीर मामले को व्यक्तिगत रूप से हल करने के लिए सरदार पटेल से अपने हाथ में ले लिए थे. वे शेख अब्दुल्ला से गिटर-पिटर कर धारा ३०६ की कन्दिकाएं तय कर आये थे. बाद में जब इस पर चर्चा चली तो उसमे बेहद आपत्तिजनक विषयों पर संशोधन किया गया जिसे शेख अब्दुल्ला ने मानने से इंकार कर दिया. उसका मानना था की यदि भारतीय संविधान में वर्णित मौलिक अधिकार, नागरिकता और निर्देशक सिद्धांत, सुप्रीम कोर्ट की सर्वोच्चता आदि जम्मू-कश्मीर पर लागु हो जाती है तो उनका कानून अर्जित सम्पत्ति आदि के मामले में तथ्यहीन हो जायेगा. फिर उसका कहना था की ये तो अस्थायी उपबन्ध है. अगर ये कहा जाये की इस ‘अस्थायी’ शब्द से शेख अब्दुल्ला नेहरु को और नेहरु जनता को मुर्ख बना रहे थे तो शायद गलत नही होगा.
ज्ञातव्य है की नेहरु के लगातार समर्थन के कारन जम्मू-कश्मीर के मुसलमानों पर शेख अब्दुल का बहुत प्रभाव हो गया था और उसके इसी प्रभाव के कारन शेख अब्दुल्ला पर भरोसा कर नेहरु जम्मू-कश्मीर में शांति पर्यंत स्वघोषित प्लेबिसाईट जितने का स्वप्न संजोये थे. श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने नेहरु से इस विषय पर सवाल करते हुए पूछा था, ‘जम्मू-कश्मीर के लिए धारा ३७० जैसे कानून लाने की आवश्यकता क्यों पड़ी?’ जवाब में नेहरु बोले, ‘हम किसी के साथ जबरदस्ती ब्याह नही रचा सकते.’
कैसी बिडम्बना है की नेहरु जम्मू-कश्मीर को भारत से अलहदा एक पड़ोसी राज्य ही समझते रहे, भारत का एक अभिन्न अंग नही. डॉ मुखर्जी नेहरु के जम्मू-कश्मीर के प्रति उपेक्षित दृष्टिकोण को नजर में रखते हुए कहा था, ‘कश्मीर का सवाल केवल भू-भाग का नही है, भारत की अंतरात्मा एवं चेतना का प्रश्न है. राष्ट्र अपनी सीमाओं को सिमटते हुए नही देख सकता है. भारतीय राष्ट्र में कश्मीरियत भी ठीक उसी प्रकार है जैसे अन्य भाषाई, मजहबी, और क्षेत्रीय पहचान.’
परन्तु देश को सिर्फ शासन का क्षेत्र समझनेवाले, राष्ट्रीयता को ‘बू’ और विशुद्ध हिंदुत्व विचारधारा वाले को देशद्रोही कहनेवाले संकीर्ण मस्तिष्क में भावनात्मक अभिव्यक्ति की चरम विन्दु तक पहुंची इन शब्दों के लिए कोई जगह नही था. इस बात का एहसास उन्हें तब हुआ जब वे माउन्टबेटन और शेख अब्दुल्ला के शिकंजे में फंसकर अपने साथ-साथ भारत को भी दुनिया की नजर में गिरा चुके थे. इनकी यह भूल पाकिस्तान का पक्ष विश्व के समाने स्वतः मजबूत कर दिया था. न्यूयार्क टाईम्स में छपे एक लेख ने उनकी आँखें खोल दी जिसमे कहा गया था-“भारत और पाकिस्तान झगड़े की उत्पत्ति के कारन को असंगत बताकर राष्ट्रिय आत्मघात करने का तरीका अपना रहे है. पाकिस्तान तुच्छ और महत्वहीन बदलाव की सलाह मैल्कम नायिटन के प्रस्ताव में दिया था जिसके जवाब में भारत ने एसी सुधर की बात रखी जिसका अर्थ प्रस्ताव को अस्वीकार करना ही था. स्पस्ट है की भारत पञ्च निर्णय को ठुकरा रहा है. भारत बाहरी लोगों को निर्णय की रूप रेखा तैयार करने का दोषी नही ठहरा सकता है.....भारत ने हैदराबाद पर कब्जा कर लिया क्योंकि वहाँ की प्रजा हिंदू थी भले ही राजा मुस्लमान. अब वह मुस्लिम बहुल कश्मीर पर इसलिए अधिकार होने का दवा कर रहा है क्योंकि वहाँ के हिंदू रजा ने विलय पत्र पर दस्तखत कर दिया है. यह दोनों लाभ लेना चाहता है......यदि भारत में अछी भावना है तो वह यु.एन.ओ. की मध्यस्थता स्वीकार करेगा.
और अब नेहरु के शब्द बदल गए थे. जैसा की घोर दुःख व्यक्त करते हुए उन्होंने सरदार पटेल से कहा था, ‘वे पञ्च निर्णय की बात कर रहे है. हमलोगों ने निर्णय कर लिया है की हमलोग इसका बहिष्कार करेंगे... भले ही वे हमे दोषी ठहराएँ. हम उनसे कहेंगे कश्मीर की समस्या का समाधान वर्तमान स्थिति इतिहास, भूगोल, भाषा और संस्कृति को ध्यान में रखकर किय जाना चाहिए.’
धारा ३७० जैसे काले कानून की आवश्यकता आखिर क्यों पड़ी? जम्मू-कश्मीर की एतिहासिक पृष्ठभूमि पर थोडा दृष्टिपात करने से पता चलता है की पंद्रहवी सदी के आरम्भ तक कश्मीर हिंदू-प्रदेश था, परन्तु थोड़ी सी भूल ने लाखों हिंदुओं को मुस्लिम बनने पर मजबूर कर दिया. अमृतसर में हुए अंग्रेजों और गुलाबसिंह के बिच उभयानवय संधि के पश्चात १८४६ में जम्मू-कश्मीर के महाराज गुलाब सिंह के दरबार में लाखों की संख्या में मुस्लिम स्त्री पुरुष बड़ी उम्मीद लेकर अपने एवं अपने परिवारवालों पर मुस्लिम आक्रमणकारियों, आततायियों द्वारा हुए अत्याचार एवं जबरन धर्म परिवर्तन कराए जाने का हवाला देते हुए उन्हें शुद्ध कर फिर से अपने प्यारे हिंदू धर्म में वापस लेने की प्रार्थना की, परन्तु मुर्ख पुरोहित की मूर्खता के कारन यह समाज उद्धारक कार्य नही हो सका. गुलाब सिंह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र रणवीर सिंह फिर प्रताप सिंह और अब हरिसिंह कश्मीर के महाराजा हुए. इतने दिनों तक जम्मू-कश्मीर में शांति एवं हिंदू-मुस्लिम भाईचारा बना रहा. लेकिन जैसे जैसे धर्मान्तरित मुस्लिम अपना हिंदू इतिहास भूलते गए हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की नीव कमजोर पड़ने लगी. १९३१ में शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में कुछ लोग सत्ता के लिए हिंदुओं की हत्या, लुट-मार करने लगे. परिणामतः शेख अब्दुल्ला को कई बार गिरफ्तार कर नजरबंद किया गया. भारतीय नेताओं की मुस्लिम परस्त बन चुकी मनोवृति एवं शेख अब्दुल्ला की दोस्ती के कारन नेहरु कश्मीर राज्य प्रशासन एवं महाराज पर नाना प्रकार के आरोप लगाकर विषवमन करने लगे. उन्होंने शेख अब्दुल्ला को शेर-ए-कश्मीर एवं लोगो का प्रिय हीरो बताते हुए अपने भाषण में कहा, “यह बड़े दुःख की बात है की कश्मीर प्रशासन अपने ही आदमियों का खून बहां रही है. मैं कहूँगा की उसका यह कृत्य प्रशासन को कलंकित कर रही है और अब यह ज्यादा दिन तक नही टिक सकती. मै कहता हू की कश्मीर की जनता को अब और अपनी आजादी पर हमला एक पल भी बर्दाश्त नही करना चाहिए. यदि हम अपने शासक पर काबू पाना चाहते है तो हमे पूरी शक्ति के साथ उसका विरोध करना चाहिए.
नेहरु इतना पर ही नही रुके और शेख अब्दुल्ला के समर्थन में कश्मीर में दंगे भडकाने आ पहुंचे. परिणामतः उन्हें महाराज के आदेश से गिरफ्तार कर वापस भेज दिया गया. दरअसल नेहरु को यही बात चुभ गयी थी. इसी व्यक्तिगत मित्रता और शत्रुता के कारन कश्मीर को महाराज से जबरन छीनकर शेख अब्दुल्ला को दिला दिया और महाराज को दर-दर भटकने को मजबूर किया गया. इसी कारन कश्मीर का मसला अत्यधिक उलझ जाने के कारन भारत माँ के सिने का नासूर बन गया.
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम के तहत देशी रियासतों को यह अधिकार दिया गया की वे इच्छानुसार भारत या पाकिस्तान किसी भी डोमिनियन में शामिल हो सकते है. १५ अगस्त, १९४७ तक जूनागढ़, हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर को छोडकर शेष सभी देशी रियासतें भारत या पाकिस्तान में शामिल हो चुकी थी. महाराज हरिसिंह भारत या पाकिस्तान किसी में भी विलय करने का निर्णय नही ले पा रहे थे. यद्यपि प्रारम्भिक तौर पर लगता था की वे अपने स्वतंत्र शासन बनाये रखने की महत्वाकांक्षा के वशीभूत थे, परन्तु जैसा की उनके कथन से स्पष्ट होता है वे अपने अल्पसंख्यक हिंदू सिक्ख और बौद्ध प्रजा का भविष्य किसी भी डोमिनियन में शामिल होकर सुरक्षित नही देख रहे थे. कारन, पाकिस्तान में हिंदुओं और सिक्खों पर हो रहे अमानवीय अत्याचार से तो वाकिफ हो ही रहे थे, अतः पाकिस्तान में विलय का तो प्रश्न ही नही था. एक जनवरी १९४७ को गाँधी जी कश्मीर का दौड़ा किये और घोषणा की की जम्मू-कश्मीर में शांति के पश्चात प्लेबीसाईट के आधार पर विलय भारत या पाकिस्तान में सुनिश्चित किया जायेगा. माउन्टबेटन भी कुछ ऐसा ही कह आये थे और नेहरु तो उनसे खार ही खाए बैठे थे. प्लेबीसाईट के नाम से ही जम्मू-कश्मीर के हिंदू और सिक्ख बहुत भयभीत थे. बहुतों ने तो पलायन भी करना शुरू कर दिया था. ७८% मुस्लिम आबादी वाले जम्मू-कश्मीर में प्लेबीसाईट का निर्णय भारत के पक्ष में जाने का भरोसा नेहरु के अतिरिक्त शायद ही किसी को हो. जम्मू-कश्मीर के सर्वेक्षण पर गए शिवानलाल सक्सेना ने अपने रिपोर्ट में लिखा था-“मैंने कश्मीर का सर्वेक्षण किया है और प्लेबीसाईट जितने की उम्मीद महापागलपन (mid night madness) प्रतीत होता है. शेख अब्दुल्ला का कश्मीरी मुस्लिमों पर बेशक प्रभाव है, पर नेहरु और गाँधी जी के घोषणा के बदौलत मुस्लिम हिंदुस्तान के पक्ष में मत देंगे ऐसा किसी को भी उम्मीद नही है. प्लेबीसाईट की अनावश्यक घोषणा कर हमने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार लिया है और मामले को यु एन ओ में ले जाना और फिर जब हम जीत रहे थे उस वक्त युद्ध बंदी की घोषणा बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण रहा है.”
तत्पश्चात परिणाम की कल्पना से ही हिंदू, सिक्ख और स्वयम महाराज सहमे हुए थे. माउन्टबेटन कश्मीर को पाकिस्तान की झोली में डालने को उद्धत था तो गाँधी प्लेबीसाईट थोपने पर आमादा और नेहरु एक ऐसा घोडा था जिसकी नकेल इन दोनों के हाथ में ही था. जैसा की हरिसिंह ने भी कहा, “गाँधी, नेहरु और माउन्टबेटन के चंगुल में फंसा भारतीय संघ किसी मुस्लिम अतिक्रमणकारी शासक के शिकंजे से कम नही है.”
परन्तु, जब २२ अक्टूबर को पाकिस्तान ने जिगरेवालों को आगे कर जम्मू-कश्मीर पर आक्रमण कर दिया और रियासत के आधे सैनिक जो मुसलमान थे आक्रमणकारियों से मिलकर हिंदुओं और सिक्खों का कत्लेआम, लूट-मार, आगजनी और बलात्कार का तांडव करने लगे तो हरिसिंह मजबूर होकर भारत में शामिल होने के विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए. परन्तु नेहरु इस विलय पत्र को तभी स्वीकार किये जब हरिसिंह से शेख अब्दुल्ला को रिहा कर प्रधानमंत्री बनाने की बात मनवा ली. इस पर भी माउन्टबेटन की चाल में फंसकर इस विलय को ‘अस्थायी’ करार देने और प्लेबीसाईट के आधार पर अंतिम निर्णय लेने एवं मामले को यु एन ओ में ले जाकर पाकिस्तान को अकारण ही एक पक्ष बनाकर घोर बिडम्बना का परिचय दिए. पाकिस्तान को अब कश्मीर पर हक जताने का अनर्थकारी हक प्राप्त हो गया. इसप्रकार उन्होंने कश्मीर को पाकिस्तान के हवाले किये जाने के अभियान पर १९४५ से चली आ रही ब्रिटिश लीग षड्यंत्र को बल दिया. बाद इसके शुरू हुआ महाराज को शासन से बाहर करने और शेख अब्दुल्ला को तख्त पर बिठाने का सिलसिला. महाराज हरिसिंह को कश्मीर की राजनीती से जबरन दूध की मक्खी की तरह निकालकर मुंबई जाने को विवश किया गया. जैसा की श्री मेनन ने अपने रिपोर्ट में कहा था-“शेख अब्दुल्ला महाराज हरिसिंह की आखिरी बूंद खून तक चूस जाना चाहता है.”
दरअसल नेहरु को शेख अब्दुल्ला पर अंध विश्वास था और इसी के भरोसे वे प्लेबीसाईट जितने के प्रति निश्चिन्त थे. परन्तु सत्ता प्राप्ति के पश्चात शेख अब्दुल्ला धीरे-धीरे अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया. शेख अब्दुल्ला अब खुलकर आजाद कश्मीर का राग अलापने लगा. उसके इंटरव्यू में दिए एक बयान ने नेहरु की कल्पना की उड़ान को थोडा ब्रेक लगाया. शेख अब्दुल्ला ने कहा, “जम्मू-कश्मीर का किसी भी डोमिनियन में विलय शांति बहाल नही कर सकती है. हमलोग दोनों डॉमिनियनो के साथ मित्रवत व्यवहार बनाये रखना चाहते है, यही एक मध्यमार्ग है. कश्मीर की स्वतंत्रता की गारंटी न केवल भारत और पाकिस्तान को देनी होगी वरन ब्रिटेन, संयुक्त राष्ट्र संघ तथा इसके दूसरे सदस्यों को भी देनी होगी.....भारत ने महाराज के साथ स्थायी समझौता कर इसे ठुकराकर जवाब दिया है, पाकिस्तान ने भी कुछ ऐसा ही किया है. परन्तु, भारत ने विलय के वक्त यह स्पष्ट घोषणा किया है की यह विलय अस्थायी है और बाद में यहाँ की जनता निर्णय करेगी की वे क्या करेंगे.......”
सच्चाई यही थी की शेख अब्दुल्ला जानता था जम्मू-कश्मीर का पाकिस्तान में विलय होने पर यहाँ का तानाशाह शासक बनने का उसका स्वप्न स्वप्न ही रह जायेगा. इसीलिए वह नेहरु जैसे नरम चारा का हाथ थामे हुए था. आज भी नेशनल कांफ्रेंस के पूर्व अध्यक्ष फारुक अब्दुल्ला का कहना है की यदि जम्मू-कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा होता तो वे प्रधान मंत्री होते और हुर्रियत कांफ्रेंस आदि अलगाववादी लोग शेख अब्दुल्ला की आजाद कश्मीर की भांति ही राग अलापते है.
प्रारम्भ में पाकिस्तान शेख अब्दुल्ला का कश्मीरी मुस्लिमों पर प्रभाव को देखते हुए प्लेबीसाईट से मुकर गया. नेहरु भी शेख अब्दुल्ला के आजाद कश्मीर की मांग से बौखला गए थे लेकिन जम्मू-कश्मीर के भाग्य का फैसला करने वाला तुरुप का पत्ता तो शेख अब्दुल्ला के हाथों में जा पड़ा था. अब जम्मू कश्मीर के भाग्य का फैसला करने का हक न भारत संघ के हाथ में रह गया था न भारतियों के और न ही महाराज हरिसिंह के हाथ में. अब देश का हित अनहित और जम्मू-कश्मीर एवं वहाँ के अल्पसंख्यकों के भाग्य का फैसला करने का हक चंद कश्मीरी मुसलमानों के हाथ में आ गया था. अब नेहरु को समझौता के आलावा कोई रास्ता दिखाई नही पड रहा था. इसलिए आजाद कश्मीर तो नही परन्तु उसके समकक्ष प्रास्थिति प्रदान करनेवाला धारा ३७० को दहेज में देकर जम्मू-कश्मीर की सगाई भारत के साथ करावा दी. परिस्थिति यह थी की नेहरु अपने ही शब्दों के जाल में बुरी तरह उलझ चुके थे. शेख अब्दुल्ला पर से तो भरोसा उठ ही गया था साथ ही टूट चूका था प्लेबीसाईट जितने का दिवास्वप्न. अब प्लेबीसाईट से मुकरना मजबूरी थी. जैसा की नेहरु के कथन से पता चलता है, “अफ़सोस, वर्तमान परिस्थिति प्लेबीसाईट के लिए उचित नही है....परन्तु मैं इसके लिए मना भी नही कर सकता.” उस एक भूल के कारन ही आज तक भारत कश्मीर के सम्बन्ध में अपना मजबूत पक्ष अमेरिका और यु एन ओ को समझाने में असफल रहा है और पाकिस्तान हमेशा से ही अमेरिका के समर्थन का लाभ उठाता आ रहा है.
धारा ३७० के इतिहास पर भी एक नजर डालना आवश्यक है. जम्मू-कश्मीर को विशेष प्रास्थिति देने सम्बन्धी ड्राफ्ट ३०६-क बनाया गया जिसे बाद में १७ अक्टूबर १९४७ को सम्बिधान सभा में धारा ३७० के रूप में अयंगर द्वारा पारित करवाया गया. भारतीय सम्विधान का जो प्रावधान जम्मू-कश्मीर पर लागु हुआ उसकी घोषणा राष्ट्रपति १९५० ने सम्विधान आदेश १९५० द्वारा जारी किया जिसमे प्रावधान था की संसद प्रतिरक्षा, विदेश कार्य तथा संचार के विषय में जम्मू-कश्मीर के सम्बन्ध में कानून बना सकती है. धारा ३७० के अनुसार जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा राज्य के संविधान का निर्माण करेगी और यह निश्चित करेगी की संघ की अधिकारिता किन क्षेत्रों में या विषयों पर होगी. जम्मू-कश्मीर संविधान संशोधन अधिनियम १९५१ के तहत वंशानुगत प्रमुख के पद को समाप्त कर निर्वाचित सदर-ए-रियासत को राज्य का प्रमुख बनाया गया. १९५२ में दिल्ली में भारत सरकार तथा जम्मू-कश्मीर राज्य संविधान सभा के लंबित रहने पर कुछ विषयों पर संघ को अधिकारिता प्रदान की गयी. इस समझौते की अन्य महत्वपूर्ण बातें निम्नलिखित है:
१. भारत सरकार इस बात पर सहमत हुए की जहाँ अन्य राज्यों के मामले में अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र के पास होगी वही जम्मू-कश्मीर की स्थिति में ये शक्तियाँ राज्य के पास ही रहेगी.
२. जम्मू-कश्मीर के निवासी भारत के नागरिक माँने जायेंगे लेकिन उन्हें विशेष अधिकार एवं प्राथमिकताएँ देने संबंधी कानून बनाने का अधिकार राज्य विधान सभा को होगा.
३. भारत संघ के झंडे के अतिरिक्त जम्मू-कश्मीर का अपना अलग झंडा होगा.
४. सदर-ए-रियासत अन्य राज्यों के राज्यपाल के समकक्ष की नियुक्ति जहाँ अन्य राज्यों में संघ सरकार तथा राष्ट्रपति द्वारा की जायेगी वहीँ जम्मू-कश्मीर के मामले में यह अधिकार राज्य विधान सभा की होगी.
५. राज्य में न्यायिक सलाहकार मंडल के अस्तित्व के कारन सर्वोच्च न्यायलय को केवल अपीलीय क्षेत्राधिकार होगा.
६. दोनों पक्ष इस बात पर सहमत है की राज्य विधान मंडल के निलंबन से सम्बन्धित अनुच्छेद ३५६ तथा वित्त आपात से सम्बन्धित अनुच्छेद ३६० जरूरी नही है.
१९५४ में जम्मू-कश्मीर संविधान सभा ने पुष्टि की की भारत संघ में जम्मू-कश्मीर का विलय अंतिम है. इसके बाद राष्ट्रपति ने राज्य सरकार से परामर्श करके संविधान आदेश जारी किया जिसके तहत १९६३, १९६४, १९६५, १९६६, १९७२, १९७४, १९७६, एवं १९८६ में संशोधन किया गया. बाबजूद इसके धारा ३७० की विकरालता बनी हुई है. इन संशोधनों का उद्देश्य उस महाभूल का आंशिक शोधन मात्र ही है जिसकी परिणति सिर्फ इतना है की जम्मू-कश्मीर भारत के हाथ से खिसकने के स्थान पर कानूनी शिकंजों के सहारे जकडा हुआ है जिसे तोडने के लिए पाकिस्तान, पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी, उग्रावादी एवं अलगाववादी जी जन से जुटे हुए है. इन संशोधनों के बाबजूद संसद:
१. सातवी अनुसूची में वर्णित विषयों पर जम्मू-कश्मीर के सम्बन्ध में कानून नही बना सकती.
२. जम्मू-कश्मीर राज्य के नाम या राज्य क्षेत्र में संघ सरकार अपनी मर्जी से कोई परिवर्तन नही कर सकती है.
३. राज्य के किसी भाग के व्ययन को प्रभावित करने वाले किसी अंतर्राष्ट्रीय करार या संधि के सम्बन्ध में कानून नही बना सकती है.
४. राष्ट्रपति द्वारा अनु. ३५२ के अधीन जारी राष्ट्रिय आपात की घोषणा राज्य सरकार की सहमति के बिना प्रभावी नही हो सकती है.
५. अनु. ३६० के अधीन राष्ट्रपति द्वारा घोषित वित्तीय आपात लागु नही होगी.
६. अनु. १९(१)(ड.) में वर्णित भारत के राज्य क्षेत्र के किसी भी भाग में निवास करने तथा बस जाने की स्वतंत्रता जम्मू-कश्मीर में लागु नही होगी.
७. राज्य के नीति के निदेशक तत्व जम्मू-कश्मीर में लागू नही होगी.
८. संसद द्वारा संविधान में किया गया संशोधन राज्य में तभी लागू होगी जब राज्य सरकार की सहमति से अनु. ३७०(१) के अधीन घोषणा की जाय.
इतना कुछ होने के बाबजूद नेशनल कांफ्रेंस की सरकार गला फाड़कर अधिक स्वायत्तता की मांग करता रहता है. राज्य विधान मंडल में ध्वनि मत से स्वायत्तता प्रस्ताव पारित हो जाता है और १९५३ के पूर्व की स्थिति बहाल करने की मांग की जाती है, परन्तु आतंकवाद की समाप्ति और बेरोजगारी दूर करने आदि पर विधेयक नही लाया जाता है. सच कहा जाय तो यह अधिक स्वायत्तता की आड. में जम्मू-कश्मीर राज्य को वापस उसी गर्त में ले जाने का षड्यंत्र है जहाँ अलगाववादियों तानाशाह स्थापित करने का ख्वाब देखनेवालों एवं पाकिस्तान परस्त आतंकवादियों को मनमानी करने की खुली छूट मिल जाये. जैसा की राज्य स्वायत्तता समिति की रिपोर्ट में कहा गया है:

१. भारतीय संविधान के भाग २१ के शीर्षक से ‘अस्थायी’ शब्द हटा दिया जाय और धारा ३७० के सम्बन्ध में ‘अस्थायी’ उपबन्ध के स्थान पर ‘विशेष उपबन्ध’ लिखा जाय.
२. संघ सूची के विषय जो सुरक्षा, विदेशी मामलों एवं संचार अथवा उसके अनुषंगी न हो उसे राज्य में लागु नही किया जाय.
३. जम्मू-कश्मीर विधान मंडल का चुनाव राज्य संचालन बोर्ड के अधीन हो न की केन्द्रीय चुनाव कमीशन के.
४. आपात स्थिति लागू करने से पूर्व राज्य सरकार की सहमती आवश्यक होगी. अनु. ३५२ में संशोधन किया जाय एवं अनु. ३५५-३६० जम्मू-कश्मीर में लागु न किया जाय जैसा की १९५४ के पूर्व था.
५. जम्मू-कश्मीर की संविधान में मूलभूत अधिकारों का एक अलग अध्याय जोडने की जरूरत है.
६. अनु. २१८ जम्मू-कश्मीर में लागु नही किया जाय और इस सम्बन्ध में राज्य विधान मंडल फिर से कानून बनाने के लिए स्वतंत्र हो.
७. संघलोक सेवा आयोग के सदस्यों की नियुक्ति राज्य में समाप्त कर दिया जाय.
८. भारतीय संविधान द्वारा दलितों को दिए गए आरक्षण को जम्मू-कश्मीर के मामले में राज्य संविधान में स्थानांतरित कर दिया जाय.
९. मुख्यमंत्री वजीर-ए-आजम एवं राज्यपाल सदर-ए-रियासत कहा जाय एवं राज्यपाल की नियुक्ति राज्य सरकार की सहमति से हो.
उपर्युक्त तथ्यों का आधार धारा ३७० ही है और उपर्युक्त बातों के अध्ययन से स्पष्ट है की इसके तहत दो प्रधान, दो विधान और दो निशान की बात आती है जो किसी भी राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए खतरा है. यह दुखद है की भारत एवं जम्मू-कश्मीर सहित पुरे भारतीय प्रारंभिक गलतियों का दुष्परिणाम आज तक झेलते आ रहे है. इसी का दुष्परिणाम है की कश्मीरी मुसलमान कश्मीर को भारत से अलग मुल्क समझते है और पाक स्थित आतंकवादी, अलगाववादी कश्मीरियों को बरगलाकर आतंकवाद, उग्रवाद के रास्ते पर ले जाने में सफल होते है. वे कश्मीरी नवयुवकों को यह बताने में पूरी तरह सफल होते है की कश्मीर भारतीय संविधान द्वारा शासित भारत से जुड़ा एक अलग मुल्क है. यही कारन है की २४ आतंकवादी दलों का समूह हुर्रियत कांफ्रेंस कश्मीर घाटी में अपना प्रभाव होने की बात करता है और आजाद कश्मीर का स्वप्न देखता है. हुर्रियत कांफ्रेंस का चेहरा एक ओर पाकिस्तान से घिरा मुखौटा है तो दूसरी ओर जम्मू-कश्मीर में तानाशाह शासक बनने की ललक. पाकिस्तान दुहरी चल चल रहा है. एक तरफ तो तथाकथित जेहादियों, आतंकवादियों और अलगाववादियों को खुला समर्थन देकर कश्मीर को भारत से अलग करना चाहता है तो दूसरी ओर राजनीती में इनका प्रवेश कराकर अपना उल्लू सीधा करना चाहता है. राजनीती और जनता तक इनका प्रवेश जम्मू-कश्मीर से बाहर के भारतीय क्षेत्रों में भी हो चूका है जो देश के लिए खतरनाक है. वृहत स्वायत्तता की मांग करनेवालों का ध्यान वहाँ की आर्थिक बदहाली, बेकारी, अपराध और आतंकवाद आदि समस्याओं पर नही जाता है. स्कुल और कॉलेज नही है, परिणामतः मदरसों का सहारा लेना पड़ता है और मदरसों में मुल्ला क्या पढते है य जग जाहिर है. पाकिस्तान में अधिकांश मदरसों पर जेनरल मुशर्रफ ने इसलिए प्रतिबंध लगा दिया क्योंकि वे कट्टरवाद और आतंकवाद की शिक्षा दे रहे थे. कलम और बंदूक की शिक्षा साथ-साथ चो रही थी. आतंक्वादियों, अलगाववादियों को जम्मू-कश्मीर में राजनितिक संरक्षण प्राप्त है. राज्य के विकास के लिए हर साल दी जानेवाली रकम का क्या होता है कुछ पता नही. इन पैसों का दुरूपयोग बम-गोला खरीदने में होता हो तो कोई आश्चर्य नही. रुबिया अपहरण कांड का नाटक ऐसे ही राजनितिक संलिप्तता को उजागर करता है जिसमे जे के एल एफ के नेता यासीन मलिक एवं अडतीस उग्रवादियों, अलगाववादियों को बेबजह रिहा किया गया.
प्रश्न यह है की यह कबतक चलता रहेगा? कबतक धरती का स्वर्ग कश्मीर खून की होली खेलता रहेगा? शायद तबतक जबतक धारा ३७० जैसे काले कानून को निरस्त कर आतंकवादियों का समूल नष्ट न कर दिया जाये. दूसरा कार्य होगा कश्मीर की जनता में राष्ट्रीयता, राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रवाद एवं इस्लाम के बीच सम्बन्ध को स्पष्ट करना. उनमे भारत सरकार में विश्वास पैदा करना एवं पाक अधिकृत कश्मीर की बदहांलियो को उजागर कर पाकिस्तान एवं आतंकवाद, अलगाववाद के विरुद्ध खड़ा करना. परन्तु, ये कार्य तभी संभव है जब कश्मीर समस्या को मुस्लिम समस्या और पाकिस्तान हित को मुस्लिम हित के रूप में देखनेवाले और इसका दुष्प्रचार कर देश के भाई-भाई में अलगाव पैदा करने वाले देशद्रोही राजनीतिज्ञों पर अंकुश लगे. ऐसे भ्रष्ट राजनीतिज्ञों के विरुद्ध जनता में जाग्रति पैदा करना भी आवश्यक है. राष्ट्रवाद और राष्ट्रप्रिती समझौते की वस्तु नही होती. सच तो यह है की किसी भी राजनितिक पार्टी के भरोसे देश की भला होने की अपेक्षा करना आज के माहौल में ठूंठ पेड से फल प्राप्ति की अपेक्षा करना है. इनकी प्रत्येक निति वोट बैंक के मद्दे नजर निर्धारित होती है और राष्ट्रहित पार्टी हित के आगे घुटने टेक देती है. कही ऐसा न हो की शेख अब्दुल्ला जो काम जीते जी नही कर सका इन तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के नाम पर जाती सापेक्षता करनेवाली पार्टियां अपनी कुकर्मों से बरबस हो कर गुजरे. अतः भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है की समय रहते भारतीय संविधान का ये काला कानून जो भारत माँ के सिने का नासूर बनकर आतंकवाद, अलगाववाद का पीव सतत निस्सृत कर रहा है, को एकजुट होकर खत्म किये जाने की अभियान पर जुट कर देश के सच्चे नागरिक एवं भारत माता के सच्चे सपूत होने का परिचय दे.
लेखक: मुकेश कुमार

आधार ग्रन्थ:
1. Sardar Patel’s Correspondence-Durga Sinh
2. My Frozen Turbulence In Kashir-Jagmohan
3. Bharat Gandhi Nehru Ki Chhaya me-Gurudutt
4. Frontlines
5. Unique Guide, Newspapers and Others.

कब-कब लगता है कुंभ मेला?





Allahabad Kumbhamela Holy Bathing

27th Jan 2013 Paush Purnima

06th Feb 2013 Ekadashi Snan

10th Feb 2013 Mauni Amavasya Snan

15th Feb 2013 Basant Panchami Snan

17th Feb 2013 Rath Saptami Snan

18th Feb 2013 Bhisma Ekadashi Snan

25th Feb 2013 Maghi Purnima Snan


क्‍यों महत्‍वपूर्ण है महाकुंभ, कब करें स्‍नान

 में गंगा नदी के तट पर महाकुंभ का मेला चल रहा है। इस मेले में करोड़ों लोग अगले दस दिनों तक गंगा नदी में डुबकी लगायेंगे। करोड़ों लोगों की आस्‍था इस महापर्व से जुड़ी हुई है। ऐसे मौके पर लखनऊ के ज्‍योतिषाचार्य पं. अनुज के शुक्‍ला बता रहे हैं कुंभ का इतिहास, उसका महत्‍व और कब-कब आप गंगा नदी में स्‍नान करें। विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक व सामाजिक उत्सव वाला महाकुंभ एक व्यापक जनसम्पर्क का स्थान है। महाकुंभ भारत का धार्मिक ही नहीं, अपितु यह एक सामाजिक उत्सव भी है। यहां आने वाले सभी श्रद्धालु एक धर्म यात्री है, जिसमें सम्पूर्ण भारत के प्रतिनिधि एकत्रित होकर परस्पर परिचय प्राप्त के साथ-साथ सामाजिक समस्याओं पर विचार कर उनके समाधान के मार्ग खोजने का एक सामूहिक केन्द्र है। महाकुंभ का इतिहास देश के सबसे बड़े धार्मिक मेले की परम्परा कितनी प्रचीन है, इसका सही अनुमान लगाना कठिन है। वास्तव में कुंभ का आयोजन कब और क्यों हुआ? यह एक यक्ष प्रश्न है। इतिहास में कुंभ के मेले का सबसे पुराना उल्लेख महाराजा हर्ष के समय का मिलता है, जिसको चीन के प्रसद्धि बौद्ध भिक्षु ह्रेनसान ने ईसा की सातवीं शताब्दी में आंखों देखी वर्णन का उल्लेख किया है।
ऐसी मान्यता है कि 7 हजार धनुष निरन्तर मां गंगा की रक्षा करते-रहते है, इन्द्र पूरे प्रयाग की रक्षा करते है। विष्णु भीतर के मण्डल की रक्षा करते है एंव अक्षयवट की रक्षा शिव जी करते है। प्रयागराज में एक माह तक सत्य, अहिंसा और ब्रहमचर्य का पालन करने से मनुष्य को असीम उर्जा की प्राप्ति होती है। पृथ्वी की एक लाख बार प्रवीक्षण करने का फल कुंभ पर स्नान, दान आदि कर्म करने से प्राप्त होता है।
--------
 

कब-कब लगता है कुंभ मेला?

महाकुंभ- यह अमृत कलश जिन-2 स्थानों पर पर छलका या रखा गया था। उस समय सूर्य, चन्द्र व गुरु जिन राशि में स्थित थे, ये ग्रह जब उन्ही राशियों में भ्रमण करते है, तो उस स्थान पर पूर्ण कुंभ का आयोजन होता है।
पहला- जब सूर्य और चन्द्रमा मकर राशि में तथा गुरु वृष राशि में आते हैं, तो प्रयाग में भव्य महाकुंभ होता है।
दूसरा- जब कुंभ राशि में गुरु हो एंव सूर्य मेष राशि में होता है, तब हरिद्वार में कुंभ का आयोजन होता है।
तीसरा- सिंह राशि में गुरु और सूर्य एंव चन्द्र कर्क राशि में भ्रमण करते है, तब नासिक (पंचवटी) में कुंभ मेले का आयोजन होता है।
चौथा कुंभ- जब तुला राशि में सूर्य आये तथा गुरु वृश्चिक राशि में भ्रमण करें, इस योग में अवनितकापुरी (उज्जैन) में कुंभ के पर्व को बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।

महाकुम्भ प्रयाग : पृथ्वी पर सबसे बड़ा मेला




इलाहाबाद कुम्भ मेला 2013 : मुख्य स्नान तिथियां
जब सूर्य एवं चंद्र मकर राशि में होते हैं और अमावस्या होती है तथा मेष अथवा वृषभ के बृहस्पति होते हैं तो प्रयाग में कुम्भ महापर्व का योग होता है। मुख्य स्नान तिथियों पर सूर्योदय के समय रथ और हाथी पर संतों के रंगारंग जुलूस का भव्य आयोजन होता है। पवित्र गंगा नदी में संतों द्वारा डुबकी लगाई जाती है।

विक्रम संवत् 2069 में प्रयागराज (इलाहाबाद) में पड़ने वाले महापर्व में निम्न शाही स्नान और सामान्य स्नान की तिथियां यहां प्रस्तुत हैं -
स्नान सूचीपर्व नामदिनांकवारस्नान महत्व
प्रथम स्नानमकर संक्रांति 14 जनवरी 2013 सोमवारशाही स्नान
द्वितिय स्नानपौष पूर्णिमा 27 जनवरी 2013रविवारशाही स्नान
तृतीय स्नानएकादशी6 फरवरी 2013गुरुवारसामान्य स्नान
चतुर्थ स्नानमौनी अमावस्या10 फरवरी 2013रविवारशाही स्नान
पंचम स्नानबसंत पंचमी15 फरवरी 2013 शुक्रवार शाही स्नान
छठवां स्नानरथ सप्तमी17 फरवरी 2013रविवारसामान्य स्नान
सप्तम स्नानभीष्म एकादशी18 फरवरी 2013सोमवारसामान्य स्नान
अष्टम स्नानमाघी पूर्णिमा 25 फरवरी 2013सोमवारशाही स्नान
नवम स्नानमहाशिवरा‍त्रि10 मार्च 2013 रविवारसामान्य स्नान

कुम्भ: विश्व का सबसे विशालतम मेला...

पृथ्वी पर सबसे बड़ा महाकुम्भ मेला

आगामी 14 जनवरी, 2013 को गंगा और यमुना के तट पर शुरू होने जा रहे इस महाकुम्भ में 10 करोड़ लोगों के भाग लेने की संभावना है। ब्रिटिश और भारतीय शोधकर्ताओं ने चार साल के अध्ययन के बाद कहा है कि अगले साल इलाहाबाद में गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर होने जा रहा महाकुम्भ विश्व के सबसे विशालतम धार्मिक जमावड़े में से एक है और यह पृथ्वी पर सबसे बड़ा मेला है।
चार साल तक हुए इस अध्ययन में ब्रिटिश और भारतीय शोधकर्ताओं के दल ने देखा कि लोग एक-दूसरे के साथ किस तरह से व्यवहार करते हैं, भीड़ का उनका क्या अनुभव है और इस भीड़ का उनके रोजमर्रा के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है।
ये शोधकर्ता 24 जनवरी, 2013 को इलाहाबाद विश्वविद्यालय में एक विशेष कार्यक्रम में अपने निष्कर्षों को पेश करेंगे। इस अध्ययन में कुम्भ मेला को एक अविश्वसनीय कार्यक्रम और पृथ्वी पर सबसे बड़ा मेला बताया गया है। महाकुम्भ मेले में पूरी दुनिया के लोग आते हैं और लाखों श्रद्धालु गंगा नदी में डुबकी लगाते हैं।
महाकुम्भ के दौरान धर्मगुरुओं का जुलूस तथा राख लपेटे नगा साधु सभी के आकार्षण का केंद्र होते हैं। यह अध्ययन डूंडी विश्वविद्यालय के निक हॉपकिंस और सेंट एंड्रियूज विश्वविद्यालय के प्रोफेसर स्टीफन रेइसर तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर नाराय श्रीनिवासन के नेतृत्व में किया गया है। (भाषा)
--------------------------------------

प्रयाग कुम्भ मेला 2013 : नगा साधुओं की ‘पेशवई’
इलाहाबाद कुम्भ मेला 2013
गंगा, यमुना और सरस्वती नदी के संगम पर हजारों नगा साधुओं द्वारा निकाले गए जुलूस के साथ ही आगामी महाकुम्भ मेले की उल्टी गिनती इलाहाबाद में 18 दिसंबर से शुरू हो गई। 5000 से ज्यादा नगा साधुओं ने ‘पेशवई’ के पहले दिन कुम्भ मेले में प्रवेश किया। इसी नाम से संन्यासियों के प्रवेश को जाना जाता है। जुलूस में सजे..धजे दर्जनों घोड़े, हाथी और संगीत बैंड शामिल थे जिसे कीदगंज इलाके में मौजागिरी आश्रम के पास निकाला गया और तीन किलोमीटर दूर चलकर यह पवित्र संगम के नजदीक पहुंचा।
जुलूस के लिए सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे जिसमें स्थानीय पुलिस, प्रोविंशियल आम्र्ड कांस्टेबुलरी और बम निरोधक दस्ते के कर्मी शामिल थे। ‘अखाड़ा’ उन संतों का समुदाय है जो आदि शंकराचार्य को अपना पूर्वज मानते हैं जिन्होंने ‘सनातन धर्म’ की रक्षा के उद्देश्य से इन समूहों की स्थापना की थी। (भाषा)

पवित्र मकर संक्राति




                                                  गंगा स्नान करते श्रद्धालु , मकर संक्राति पर

मकर संक्रांति

भारत डिस्कवरी प्रस्तुति  
http://bharatdiscovery.org/india
मकर संक्रान्ति भारत के प्रमुख त्यौहारों में से एक है। यह पर्व प्रत्येक वर्ष जनवरी महीने में समस्त भारत में मनाया जाता है। इस दिन से सूर्य उत्तरायण होता है, जब उत्तरी गोलार्ध सूर्य की ओर मुड़ जाता है। परम्परा से यह विश्वास किया जाता है कि इसी दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है। यह वैदिक उत्सव है। इस दिन खिचड़ी का भोग लगाया जाता है। गुड़–तिल, रेवड़ी, गजक का प्रसाद बाँटा जाता है। इस त्यौहार का सम्बन्ध प्रकृति, ऋतु परिवर्तन और कृषि से है। ये तीनों चीजें ही जीवन का आधार हैं। प्रकृति के कारक के तौर पर इस पर्व में सूर्य देव को पूजा जाता है, जिन्हें शास्त्रों में भौतिक एवं अभौतिक तत्वों की आत्मा कहा गया है। इन्हीं की स्थिति के अनुसार ऋतु परिवर्तन होता है और धरती अनाज उत्पन्न करती है, जिससे जीव समुदाय का भरण-पोषण होता है।

सूर्य प्रार्थना
संस्कृत प्रार्थना के अनुसार "हे सूर्य देव, आपका दण्डवत प्रणाम, आप ही इस जगत की आँखें हो। आप सारे संसार के आरम्भ का मूल हो, उसके जीवन व नाश का कारण भी आप ही हो।" सूर्य का प्रकाश जीवन का प्रतीक है। चन्द्रमा भी सूर्य के प्रकाश से आलोकित है। वैदिक युग में सूर्योपासना दिन में तीन बार की जाती थी। पितामह भीष्म ने भी सूर्य के उत्तरायण होने पर ही अपना प्राणत्याग किया था। हमारे मनीषी इस समय को बहुत ही श्रेष्ठ मानते हैं। इस अवसर पर लोग पवित्र नदियों एवं तीर्थ स्थलों पर स्नान कर आदिदेव भगवान सूर्य से जीवन में सुख व समृद्धि हेतु प्रार्थना व याचना करते हैं।

मान्यता
यह विश्वास किया जाता है कि इस अवधि में देहत्याग करने वाले व्यक्ति जन्म-मरण के चक्र से पूर्णत: मुक्त हो जाते हैं। महाभारत महाकाव्य में वयोवृद्ध योद्धा पितामह भीष्म पांडवों और कौरवों के बीच हुए कुरुक्षेत्र युद्ध में सांघातिक रूप से घायल हो गये थे। उन्हें इच्छा-मृत्यु का वरदान प्राप्त था। पांडव वीर अर्जुन द्वारा रचित बाणशैया पर पड़े भीष्म उत्तरायण अवधि की प्रतीक्षा करते रहे। उन्होंने सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर ही अंतिम सांस ली, जिससे उनका पुनर्जन्म न हो।

तिल संक्राति
देश भर में लोग मकर संक्रांति के पर्व पर अलग-अलग रूपों में तिल, चावल, उड़द की दाल एवं गुड़ का सेवन करते हैं। इन सभी सामग्रियों में सबसे ज़्यादा महत्व तिल का दिया गया है। इस दिन कुछ अन्य चीज भले ही न खाई जाएँ, किन्तु किसी न किसी रूप में तिल अवश्य खाना चाहिए। इस दिन तिल के महत्व के कारण मकर संक्रांति पर्व को "तिल संक्राति" के नाम से भी पुकारा जाता है। तिल के गोल-गोल लड्डू इस दिन बनाए जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि तिल की उत्पत्ति भगवान विष्णु के शरीर से हुई है तथा उपरोक्त उत्पादों का प्रयोग सभी प्रकार के पापों से मुक्त करता है; गर्मी देता है और शरीर को निरोग रखता है। मंकर संक्रांति में जिन चीज़ों को खाने में शामिल किया जाता है, वह पौष्टिक होने के साथ ही साथ शरीर को गर्म रखने वाले पदार्थ भी हैं।

सूर्य के उत्तरायण होने का पर्व
जितने समय में पृथ्वी सूर्य के चारों ओर एक चक्कर लगाती है, उस अवधि को "सौर वर्ष" कहते हैं। पृथ्वी का गोलाई में सूर्य के चारों ओर घूमना "क्रान्तिचक्र" कहलाता है। इस परिधि चक्र को बाँटकर बारह राशियाँ बनी हैं। सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करना "संक्रान्ति" कहलाता है। इसी प्रकार सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने को "मकर संक्रान्ति" कहते हैं।
     सूर्य का मकर रेखा से उत्तरी कर्क रेखा की ओर जाना 'उत्तरायण' तथा कर्क रेखा से दक्षिणी मकर रेखा की ओर जाना 'दक्षिणायन' है। उत्तरायण में दिन बड़े हो जाते हैं तथा रातें छोटी होने लगती हैं। दक्षिणायन में ठीक इसके विपरीत होता है। शास्त्रों के अनुसार उत्तरायण देवताओं का दिन तथा दक्षिणायन देवताओं की रात होती है। वैदिक काल में उत्तरायण को देवयान तथा दक्षिणायन को पितृयान कहा जाता था। मकर संक्रान्ति के दिन यज्ञ में दिये हव्य को ग्रहण करने के लिए देवता धरती पर अवतरित होते हैं। इसी मार्ग से पुण्यात्माएँ शरीर छोड़कर स्वर्ग आदि लोकों में प्रवेश करती हैं। इसलिए यह आलोक का अवसर माना जाता है। इस दिन पुण्य, दान, जप तथा धार्मिक अनुष्ठानों का अनन्य महत्त्व है और सौ गुणा फलदायी होकर प्राप्त होता है। मकर संक्रान्ति प्रत्येक वर्ष प्रायः 14 जनवरी को पड़ती है।
आभार प्रकट करने का दिन
पंजाब, बिहार व तमिलनाडु में यह समय फ़सल काटने का होता है। कृषक मकर संक्रान्ति को 'आभार दिवस' के रूप में मनाते हैं। पके हुए गेहूँ और धान को स्वर्णिम आभा उनके अथक मेहनत और प्रयास का ही फल होती है और यह सम्भव होता है, भगवान व प्रकृति के आशीर्वाद से। विभिन्न परम्पराओं व रीति–रिवाज़ों के अनुरूप पंजाब एवं जम्मू–कश्मीर में "लोहड़ी" नाम से "मकर संक्रान्ति" पर्व मनाया जाता है। सिन्धी समाज एक दिन पूर्व ही मकर संक्रान्ति को "लाल लोही" के रूप में मनाता है। तमिलनाडु में मकर संक्रान्ति 'पोंगल' के नाम से मनाया जाता है, तो उत्तर प्रदेश और बिहार में 'खिचड़ी' के नाम से मकर संक्रान्ति मनाया जाता है। इस दिन कहीं खिचड़ी तो कहीं चूड़ादही का भोजन किया जाता है तथा तिल के लड्डु बनाये जाते हैं। ये लड्डू मित्र व सगे सम्बन्धियों में बाँटें भी जाते हैं।

खिचड़ी संक्रान्ति
चावल व मूंग की दाल को पकाकर खिचड़ी बनाई जाती है। इस दिन खिचड़ी खाने का प्रचलन व विधान है। घी व मसालों में पकी खिचड़ी स्वादिष्ट, पाचक व ऊर्जा से भरपूर होती है। इस दिन से शरद ऋतु क्षीण होनी प्रारम्भ हो जाती है। बसन्त के आगमन से स्वास्थ्य का विकास होना प्रारम्भ होता है। इस दिन गंगा नदी में स्नान व सूर्योपासना के बाद ब्राह्मणों को गुड़, चावल और तिल का दान भी अति श्रेष्ठ माना गया है। महाराष्ट्र में ऐसा माना जाता है कि मकर संक्रान्ति से सूर्य की गति तिल–तिल बढ़ती है, इसीलिए इस दिन तिल के विभिन्न मिष्ठान बनाकर एक–दूसरे का वितरित करते हुए शुभ कामनाएँ देकर यह त्योहार मनाया जाता है।

संक्रान्ति दान और पुण्यकर्म का दिन
संक्रान्ति काल अति पुण्य माना गया है। इस दिन गंगा तट पर स्नान व दान का विशेष महत्त्व है। इस दिन किए गए अच्छे कर्मों का फल अति शुभ होता है। वस्त्रों व कम्बल का दान, इस जन्म में नहीं; अपितु जन्म–जन्मांतर में भी पुण्यफलदायी माना जाता है। इस दिन घृत, तिल व चावल के दान का विशेष महत्त्व है। इसका दान करने वाला सम्पूर्ण भोगों को भोगकर मोक्ष को प्राप्त करता है, ऐसा शास्त्रों में कहा गया है। उत्तर प्रदेश में इस दिन तिल दान का विशेष महत्त्व है। महाराष्ट्र में नवविवाहिता स्त्रियाँ प्रथम संक्रान्ति पर तेल, कपास, नमक आदि वस्तुएँ सौभाग्यवती स्त्रियों को भेंट करती हैं। बंगाल में भी इस दिन तिल दान का महत्त्व है। राजस्थान में सौभाग्यवती स्त्रियाँ इस दिन तिल के लड्डू, घेवर तथा मोतीचूर के लड्डू आदि पर रुपय रखकर, "वायन" के रूप में अपनी सास को प्रणाम करके देती है तथा किसी भी वस्तु का चौदह की संख्या में संकल्प करके चौदह ब्राह्मणों को दान करती है।

पतंग उड़ाने का दिन
यह दिन सुन्दर पतंगों को उड़ाने का दिन भी माना जाता है। लोग बड़े उत्साह से पतंगें उड़ाकर पतंगबाज़ी के दाँव–पेचों का मज़ा लेते हैं। बड़े–बड़े शहरों में ही नहीं, अब गाँवों में भी पतंगबाज़ी की प्रतियोगिताएँ होती हैं।

गंगास्नान व सूर्य पूजा
पवित्र गंगा में नहाना व सूर्य उपासना संक्रान्ति के दिन अत्यन्त पवित्र कर्म माने गए हैं। संक्रान्ति के पावन अवसर पर हज़ारों लोग इलाहाबाद के त्रिवेणी संगम, वाराणसी में गंगाघाट, हरियाणा में कुरुक्षेत्र, राजस्थान में पुष्कर, महाराष्ट्र के नासिक में गोदावरी नदी में स्नान करते हैं। गुड़ व श्वेत तिल के पकवान सूर्य को अर्पित कर सभी में बाँटें जाते हैं। गंगासागर में पवित्र स्नान के लिए इन दिनों श्रद्धालुओं की एक बड़ी भीड़ उमड़ पड़ती है।

पुण्यकाल के शुभारम्भ का प्रतीक
मकर संक्रान्ति के आगामी दिन जब सूर्य की गति उत्तर की ओर होती है, तो बहुत से पर्व प्रारम्भ होने लगते हैं। इन्हीं दिनों में ऐसा प्रतीत होता है कि वातावरण व पर्यावरण स्वयं ही अच्छे होने लगे हैं। कहा जाता है कि इस समय जन्मे शिशु प्रगतिशील विचारों के, सुसंस्कृत, विनम्र स्वभाव के तथा अच्छे विचारों से पूर्ण होते हैं। यही विशेष कारण है, जो सूर्य की उत्तरायण गति को पवित्र बनाते हैं और मकर संक्रान्ति का दिन सबसे पवित्र दिन बन जाता है।

खगोलीय तथ्य
सन 2012 में मकर संक्रांति 15 जनवरी यानी रविवार की थी। अगले 68 सालों तक यह पर्व 15 जनवरी को ही पड़ेगा। राजा हर्षवर्द्धन के समय में यह पर्व 24 दिसम्बर को पड़ा था। मुग़ल बादशाह अकबर के शासन काल में 10 जनवरी को मकर संक्रांति थी। शिवाजी के जीवन काल में यह त्योहार 11 जनवरी को पड़ा था।

आखिर ऐसा क्यों?
सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करने को मकर संक्रांति कहा जाता है। साल 2012 में यह 14 जनवरी की मध्यरात्रि में है। इसलिए उदय तिथि के अनुसार मकर संक्रांति 15 जनवरी को पड़ेगी। दरअसल हर साल सूर्य का धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश 20 मिनट की देरी से होता है। इस तरह हर तीन साल के बाद सूर्य एक घंटे बाद और हर 72 साल एक की देरी से मकर राशि में प्रवेश करता है। मतलब 1728 (72 गुणे 24) साल में फिर सूर्य का मकर राशि में प्रवेश एक दिन की देरी से होगा और इस तरह 2080 के बाद मकर संक्रांति 16 जनवरी को पड़ेगी।

ज्योतिषीय आकलन
ज्योतिषीय आकलन के अनुसार सूर्य की गति प्रतिवर्ष 20 सेकेंड बढ़ रही है। माना जाता है कि आज से 1000 साल पहले मकर संक्रांति 31 दिसंबर को मनाई जाती थी। पिछले एक हज़ार साल में इसके दो हफ्ते आगे खिसक जाने की वजह से 14 जनवरी को मनाई जाने लगी। अब सूर्य की चाल के आधार पर यह अनुमान लगाया जा रहा है कि 5000 साल बाद मकर संक्रांति फ़रवरी महीने के अंत में मनाई जाएगी।

विभिन्न राज्यों में मकर संक्रांति
मकर संक्रान्ति भारत के भिन्न-भिन्न लोगों के लिए भिन्न-भिन्न अर्थ रखती है। किन्तु सदा की भॉंति, नानाविधी उत्सवों को एक साथ पिरोने वाला एक सर्वमान्य सूत्र है, जो इस अवसर को अंकित करता है यदि दीपावली ज्योति का पर्व है तो संक्रान्ति शस्य पर्व है, नई फ़सल का स्वागत करने तथा समृद्धि व सम्पन्नता के लिए प्रार्थना करने का एक अवसर है।

पंजाब में लोहड़ी
मकर संक्रान्ति भारत के अन्य क्षेत्रों में भी धार्मिक उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है। पंजाब में इसे लोहड़ी कहते हैं जो ग्रामीण क्षेत्रों में नई फ़सल की कटाई के अवसर पर मनाया जाता है। पुरुष और स्त्रियाँ गाँव के चौक पर उत्सवाग्नि के चारों ओर परम्परागत वेशभूषा में लोकप्रिय नृत्य भांगड़ा का प्रदर्शन करते हैं। स्त्रियाँ इस अवसर पर अपनी हथेलियों और पाँवों पर आकर्षक आकृतियों में मेहन्दी रचती हैं।

बंगाल में मकर-सक्रांति
पश्चिम बंगाल में मकर सक्रांति के दिन देश भर के तीर्थयात्री गंगासागर द्वीप पर एकत्र होते हैं, जहाँ गंगा बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। एक धार्मिक मेला, जिसे गंगासागर मेला कहते हैं, इस समारोह की महत्त्वपूर्ण विशेषता है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि इस संगम पर डुबकी लगाने से सारा पाप धुल जाता है।

कर्नाटक में मकर-सक्रांति
कर्नाटक में भी फ़सल का त्योहार शान से मनाया जाता है। बैलों और गायों को सुसज्जित कर उनकी शोभा यात्रा निकाली जाती है। नये परिधान में सजे नर-नारी, ईख, सूखा नारियल और भुने चने के साथ एक दूसरे का अभिवादन करते हैं। पंतगबाज़ी इस अवसर का लोकप्रिय परम्परागत खेल है।

गुजरात में मकर-सक्रांति
गुजरात का क्षितिज भी संक्रान्ति के अवसर पर रंगबिरंगी पंतगों से भर जाता है। गुजराती लोग संक्रान्ति को एक शुभ दिवस मानते हैं और इस अवसर पर छात्रों को छात्रवृतियाँ और पुरस्कार बाँटते हैं।

केरल में मकर-सक्रांति
केरल में भगवान अयप्पा की निवास स्थली सबरीमाला की वार्षिक तीर्थयात्रा की अवधि मकर संक्रान्ति के दिन ही समाप्त होती है, जब सुदूर पर्वतों के क्षितिज पर एक दिव्य आभा ‘मकर ज्योति’ दिखाई पड़ती है।

मकर संक्रांति पर खान-पान
मकर संक्रांति में सूर्य का दक्षिणायन से उत्तरायण में आने का स्वागत किया जाता है। शिशिर ऋतु की विदाई और बसंत का अभिवादन तथा अगहनी फ़सल के कट कर घर में आने का उत्सव मनाया जाता है। उत्सव का आयोजन होने पर सबसे पहले खान-पान की चर्चा होती है। मकर संक्रांति पर्व जिस प्रकार देश भर में अलग-अलग तरीके और नाम से मनाया जाता है, उसी प्रकार खान-पान में भी विविधता रहती है। किंतु एक विशेष तथ्य यह है कि मकर संक्राति के नाम, तरीके और खान-पान में अंतर के बावजूद सभी में एक समानता है कि इसमें व्यंजन तो अलग-अलग होते हैं, किन्तु उनमें प्रयोग होने वाली सामग्री एक-सी होती है।

यह महत्त्वपूर्ण पर्व माघ मास में मनाया जाता है। भारत में माघ महीने में सबसे अधिक ठंढ़ पड़ती है, अत: शरीर को अंदर से गर्म रखने के लिए तिल, चावल, उड़द की दाल एवं गुड़ का सेवन किया जाता है। मकर संक्रांति में इन खाद्य पदार्थों के सेवन का यह भौतिक आधार है। इन खाद्यों के सेवन का धार्मिक आधार भी है। शास्त्रों में लिखा है कि माघ मास में जो व्यक्ति प्रतिदिन विष्णु भगवान की पूजा तिल से करता है और तिल का सेवन करता है, उसके कई जन्मों के पाप कट जाते हैं। अगर व्यक्ति तिल का सेवन नहीं कर पाता है तो सिर्फ तिल-तिल जप करने से भी पुण्य की प्राप्ति होती है। तिल का महत्व मकर संक्रांति में इस कारण भी है कि सूर्य देवता धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। मकर राशि के स्वामी शनि देव हैं, जो सूर्य के पुत्र होने के बावजूद सूर्य से शत्रु भाव रखते हैं। अत: शनि देव के घर में सूर्य की उपस्थिति के दौरान शनि उन्हें कष्ट न दें, इसलिए तिल का दान व सेवन मकर संक्राति में किया जाता है। चावल, गुड़ एवं उड़द खाने का धार्मिक आधार यह है कि इस समय ये फ़सलें तैयार होकर घर में आती हैं। इन फ़सलों को सूर्य देवता को अर्पित करके उन्हें धन्यवाद दिया जाता है कि "हे देव! आपकी कृपा से यह फ़सल प्राप्त हुई है। अत: पहले आप इसे ग्रहण करें तत्पश्चात प्रसाद स्वरूप में हमें प्रदान करें, जो हमारे शरीर को उष्मा, बल और पुष्टता प्रदान करे।"

अन्य राज्यों का खान-पान
मकर संक्रांति पर भारत के विभिन्न राज्यों में अपना-अपना खान-पान है-

बिहार तथा उत्तर प्रदेश
बिहार एवं उत्तर प्रदेश में खान-पान लगभग एक जैसा होता है। दोनों ही प्रांत में इस दिन अगहनी धान से प्राप्त चावल और उड़द की दाल से खिंचड़ी बनाई जाती है। कुल देवता को इसका भोग लगाया जाता है। लोग एक-दूसरे के घर खिंचड़ी के साथ विभिन्न प्रकार के अन्य व्यंजनों का आदान-प्रदान करते हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश के लोग मकर संक्राति को "खिचड़ी पर्व" के नाम से भी पुकारते हैं। इस प्रांत में मकर संक्राति के दिन लोग चूड़ा-दही, गुड़ एवं तिल के लड्डू भी खाते हैं। चूड़े एवं मुरमुरे की लाई भी बनाई जाती है।

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में मकर संक्रांति के दिन बिहार और उत्तर प्रदेश की ही तरह खिचड़ी और तिल खाने की परम्परा है। यहाँ के लोग इस दिन गुजिया भी बनाते हैं।

दक्षिण भारत
दक्षिण भारतीय प्रांतों में मकर संक्राति के दिन गुड़, चावल एवं दाल से पोंगल बनाया जाता है। विभिन्न प्रकार की कच्ची सब्जियों को लेकर मिश्रित सब्जी बनाई जाती है। इन्हें सूर्य देव को अर्पित करने के पश्चात सभी लोग प्रसाद रूप में इसे ग्रहण करते हैं। इस दिन गन्ना खाने की भी परम्परा है।

पंजाब एवं हरियाणा
पंजाब एवं हरियाणा में इस पर्व में विभिन्न प्रकार के व्यंजनों में मक्के की रोटी एवं सरसों के साग को विशेष तौर पर शामिल किया जाता है। इस दिन पंजाब एवं हरियाणा के लोगों में तिलकूट, रेवड़ी और गजक खाने की भी परम्परा है। मक्के का लावा, मूँगफली एवं मिठाईयाँ भी लोग खाते हैं।