रविवार, 27 जनवरी 2013

कोंग्रेस का डी एन ए : यूरोपियन

- अरविन्द सिसोदिया  
कोंग्रेस के चिंतन शिविर जयपुर में , राहुल गांधी ने डी एन ए की चर्चा छेड़ कर इस बहस को फिर से जन्म दे दिया की क्या कोंग्रेस में हिन्दुस्तानीयत हे ? ब्रिटिश ह्युम से इटालियन सोनिया तक.......अब इस डी एन ए को क्या कहेंगे ? मेरा व्यक्तिगत अनुभव यह हे की; कोंग्रेस का डी एन ए यूरोपियन है , जो मूलतः ईसाइयत है .......



आर्य समाज आंदोलन ए ओ हयूम कांग्रेस की स्थापना
Vijai Mathur ने कहा…
    1857 की क्रांति को कुचल देने के बाद ब्रिटिश शासकों ने शुरुआत मे मुसलमानों को दबाया क्योंकि 'क्रान्ति'का नेतृत्व मुगल शासक बहादुर शाह जफर ने किया था।
    इस क्रांति मे भाग ले चुके स्वामी दयानन्द 'सरस्वती'ने क्रांति को कुचले जाने की भयावहता को देख कर ईस्वी सन 1875 मे चैत्र प्रतिपदा के दिन 'आर्यसमाज'की स्थापना की जिसका मूल उद्देश्य देश को स्वाधीन करना था।
   आर्यसमाज को विफल करने हेतु गवर्नर जनरल लार्ड डफरिन ने अवकाश प्राप्त ICS एलेन आक्टावियन हयूम के सहयोग से वोमेश चंद्र बेनर्जी (ईसाई मतानुयायी ) की अध्यक्षता मे इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना कराई जो पूर्ण आज़ादी की विरोधी थी। अतः दयानन्द जी ने आर्यसमाजियों को कांग्रेस मे घुस कर उसे आज़ादी की दिशा मे मोड़ने का आदेश दिया और हुआ भी वैसा ही । बाद मे कांग्रेस ने पूर्ण स्वाधीनता को लक्ष्य घोषित किया। डॉ पट्टाभि सीता रम्मइया ने 'कांग्रेस का इतिहास' मे स्वीकार किया है कि कांग्रेस के असहयोग आंदोलन मे जेल जाने वालों मे 85 प्रतिशत आर्यसमाजी थे।
    अतः कांग्रेस को कमजोर करने हेतु ढाका के नवाब मुश्ताक हुसैन के सहयोग से 1906 मे मुस्लिम लीग की स्थापना ब्रिटिश सरकार ने कराई जिसने मुस्लिम सांप्रदायिकता को भड़काया। पंडित मदन मोहन मालवीय की आद्यक्षता मे 1920 मे 'हिन्दू महासभा' की स्थापना हिन्दू सांप्रदायिकता भड़काने हेतु ब्रिटिश सरकार ने कारवाई किन्तु आर्यसमाजियों के प्रभाव से यह प्रयास विफल रहा।
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सवा सौ साल की कांग्रेस और ए ओ ह्यूम की याद
28 December, 2009 04:47;00 दिने्श शाक्य
28 दिसंबर को कांग्रेस सवा सौ साल की हो गयी. इस मौके पर दिल्ली में कांग्रेस भवन का शिलान्यास किया गया. लेकिन सवा सौ साल की इस कांग्रेस को जब याद करते हैं तो न तो किसी को इसके संस्थापक ए ओ ह्यूम की याद आती है और न ही उस इटावा की जहां ह्यूम कलक्टर थे और पहली बार एक ऐसा प्रयोग किया जिससे कांग्रेस के गठन का विचार पैदा हुआ.'इटावा के हजार साल` पुस्तक के अनुसार इटावा के कलक्टर ए.ओ.हयूम ने इटावा में 30 मई 1857 को राजभक्त जमीदारों की अध्यक्षता में ठाकुरों की एक स्थानीय रक्षक सेना का गठन किया,जिसका उददेश्य इटावा में शांति स्थापित करना था.अपने उददेश्य के मुताबिक इस सेना को यहां पर शांति स्थापित करने में काफी हद तक सफलता मिली थी. रक्षक सेना की सफलता को देखते हुये 28 दिसंबर 1885 को मुबंई में ब्रिटिश प्रशासक ए.ओ.हयूम ने काग्रेंस की नीवं डाली जो आज देश की एक प्रमुख राजनैतिक पार्टी हैं. हयूम के जहन में काग्रेंस के गठन की भूमिका एक सेफ्टीवाल्व की तरह थी. ह्यूम मानते थे कि वफादार भारतीयों का एक राजनैतिक संस्था के रूप में काग्रेंस के गठन से भारत में 1857 जैसे भीषण जन विस्फोट की पुनरावृत्ति से बचा जा सकता था.
    इटावा में स्थानीय रक्षक सेना के गठन की भी बडी दिलचस्प कहानी है. 1856 में ए.ओ.हयूम इटावा के कलक्टर बन कर आये. कुछ समय तक यहां पर शांति रही. डलहौजी की व्ययगत संधि के कारण देशी राज्यों में अपने अधिकार हनन को लेकर ईस्ट इंडिया कंपनी के विरद्ध आक्रोश व्याप्त हो चुका था. चर्बी लगे कारतूसों क कारण 6 मई 1857 में मेरठ से सैनिक विद्रोह भडक था. उत्तर प्रदेश तथा दिल्ली से लगे हुये अन्य क्षेत्र ईस्ट इंडिया कंपनी ने अत्यधिक संवेदनशील घोषित कर दिये थे.ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में भारतीयों की संख्या भी बडी मात्रा में थी.हयूम ने इटावा की सुरक्षा व्यवस्था को घ्यान में रख कर शहर की सडकों पर गश्त तेज कर दी थी.16 मई 1857 की आधी रात को सात हथियारबंद सिपाही इटावा के सडक पर शहर कोतवाल ने पकडे.ये मेरठ के पठान विद्रोही थे और अपने गांव फतेहपुर लौट रहे थे.कलक्टर हयूम को सूचना दी गई और उन्हें कमंाडिग अफसर कार्नफील्ड पर गोली चला दी लेकिन वी बच गया.विद्रोहियों ने कार्नफील्ड पर गोली चला दी लेकिन वह बच गया. इस पर क्रोधित होकर उसने चार को गोली से उडा दिया परन्तु तीन विद्रोही भाग निकले.
   इटावा में 1857 के विद्रोह की स्थिति भिन्न थी। इटावा के राजपूत विद्रोहियों का खुलकर साथ नहीं दे पा रहे थे,19 मई 1857 को इटावा आगरा रोड पर जसवंतनगर के बलैया मंदिर के निकट बाहर से आ रहे कुछ सशस्त्र विद्रोहियों और गश्ती पुलिस के मध्य मुठभेड हुई.विद्राहियों ने मंदिर के अंदर धुस कर मोर्चा लगाया.कलक्टर हयूम और ज्वाइंट मजिस्ट्रेट डेनियल ने मंदिर का घेरा डाल दिया.गोलीबारी में डेनियल मारा गया और हयूम वापस इटावा लौट आये जब कि पुलिस घेरा डाले रही लेकिन रात को आई भीषण आंधी का लाभ उठा कर विद्रोही भाग गये.
   इस बीच मैनपुरी और अलीगढ में नौ नबंबर की देशी पल्टन ने विद्रोह कर दिया.इटावा के लिये खतरा और भी बढ गया था। ए.ओ.हयूम की देशी पलटन को बढपुरा की ओर रवाना करने के निर्देश दिया गया इस पलटन के साथ इटावा में रह रहे अग्रेंज परिवार भी थे,इटावा के यमुना तट पर पहुंचते ही सिपाहियों को छोडकर बाकी सभी इटावा वापस लौट आये.इसी बीच हयूम ने एक दूरदर्शी कार्य किया कि उन्होंने इटावा में स्थित खजाने का एक बडा हिस्सा आगरा भेज दिया था तथा शेष इटावा के ही अग्रेंजो के वफादार अयोध्या प्रसाद की कोठी में छुपा दिया था.इटावा के विद्रोहियों ने पूरे शहर पर अपना अधिकार कर लिया और खजाने में शेष बचा चार लाख रूपया लूट लिया.इसके बाद अगेंजों को विद्रोहियों ने इटावा छोडने का फरमान दे दिया.
    देश के प्रमुख राजनैतिक दल काग्रेंस की स्थापना उत्तर प्रदेश के इटावा में 30 मई 1857 में क्रांतिकारियों से निपटने के लिये गठित की गई रक्षक सेना की सफलता से प्ररित हो कर की गई थी. आजादी पूर्व इटावा के कलक्टर रहे काग्रेंस संस्थापक ए.ओ.हयूम ने इटावा में क्रांतिकारियों से निपटने में कामयाबी पाई.रक्षक सेना से प्रेरण लेकर 28 दिसंबर 1885 को बंबई में काग्रेंस की स्थापना अंग्रेज सरकार के लिये ´सेफ्टीवाल` के रूप में की थी. फिर भी कांग्रेस के स्थानीय नेता विदेशी मूल की होने के बावजूद सोनिया गांधी को तो अपना सर्वोच्च नेता मानते हैं लेकिन ए ओ ह्यूम से कोई नाता नहीं जोड़ना चाहते.
पुस्तक में उल्लेख है कि डिप्टी कलक्टर लक्ष्मण सिंह,कु.जोर सिंह तथा अन्य वफादारों ने अग्रेंज परिवारों को बढपुरा से आगरा पहुंचा दिया,इटावा में अब केवल हयूम तथा अग्रेंज अफसर ही बचे.हयूम ने स्थानीय जमीदारों की एक रक्षक सेना बनाई.इसी बीच इटावा के सैनिको ने हयूम और उनके परिवार को मार डालने की योजना बनाई जिसकी भनक लगते ही 17 जून 1857 को ए.ओ.हयूम गा्रमीण वेश बना कर गुप्त रूप से इटावा से निकल कर बढपुरा पहुंच गये और सात दिनों तक वे बढपुरा में छिपे रहे.25 जून 1857 को ग्वालियर से अग्रेंजों की रेंजीमेंट इटावा आ गई तथा यहां पर पुन:अग्रेंजों का अधिकार हो गया लेकिन अभी यह अघिकार हो ही था,इटावा में क्रांति की ज्वालायें अभी ठंडी नहीं पडी थी.
    अगस्त 1857 में हयूम ने भावी शासन नीति पर अपनी रिर्पोट सरकार को भेजी.इसके अनुसार राजपूतों और अन्य युद्ध प्रिय जातियों के लोगों को उचित साधनों द्वारा सुखी बनाओं.उन्हें ग्रामीण साहूकारों और अदालतों के कष्ट से दूर रखा,वे लोग उस सरकार की ओर से लडेगें जिसने उन्हें पनपाया है.गुर्जर,अहीर तथा अन्य जाति के लोगों को कृषि के द्वारा उन्नति करने का अवसर दो.फौजदारी की अदालतें कम खर्चीली बनाओं तो वे लोग सरकार के द्वारा मालामाल होकर इन लोगों को उनके पुस्तैनी घर और खेती से उन्हें वंचित कर देते हैं और स्वंय अपनी जानमाल की रक्षा न कर पाते ळै और न सरकार की सहायता करते है.ए.ओ.हयूम ने वर्ष 1885 में मुंबई में अखिल भारतीय काग्रेंस की नींव डाली परन्तु इटावा में इसका प्रभाव बहुत पहले ही देखने को मिलने लगा था.एक छोटे से पंडाल में एकत्रित होकर कभी कभी प्रस्ताव पास कर लेना इसका उददेश्य था.
    इटावा में अपने कलक्टर कार्यकाल के दौरान हयूम ने अपने नाम के अग्रेंजी शब्द के एच.यू.एम.ई.के रूप में चार इमारतों का निर्माण कराया जो आज भी हयूम की दूरदर्शिता की याद दिलाते है लेकिन इटावा के काग्रेंसी किसी भी तरह का हयूम का महिमामंडन करने से परहेज करते हुये नजर आते है. भले ही इटावा के कांग्रेसी इस बात पर गर्व महसूस करते हो की हयूम को इटावा में कार्यकाल के दौरान इस तरह का इल्म हुआ की भारतीयो को एक तार में जोडने के इरादे से एक दल की जरूरत है लेकिन जब बात आती है कि उन्हे साद करने के सवाल पर तो इटावा के काग्रेसी एक दूसरे की ओर देखने लगते है. अब बदलते हुए दौर में इटावा के काग्रेंसियों का कोई गुरेज नहीं होगा कि ए.ओ.हयूम की कोई प्रतिमा या स्टेचू स्थापित किया जाये.
   इटावा के वरिष्ठ काग्रेंसी नेता सूरज सिंह यादव का कहना है कि जब देश आजाद हुआ था तब देश में विदेशी आक्रांताओ के खिलाफ जोरदारी के साथ माहौल बना हुआ था ऐसे में हयूम की कोई भी तस्वीर या फिर प्रतिमा की स्थापना देश हित में नहीं हो सकती थी इस लिये अपने संस्थापक की कोई भी प्रतिमा इटावा तो क्या देश किसी भी दूसरे हिससे में स्थापित नहीं है लेकिन जब उनसे सोनिया के विदेशी होने के सिलसिले से जुडा हुआ सवाल किया गया तो वे सही ढंग से जबाब दे पाने की हालत में नहंी दिखे अलबत्ता वे इतना जरूर कहते है कि अगर अब हयूम की कोई तस्वीर या फिर प्रमिता की स्थापना की जाती है तो उन्हें क्या शायद किसी भी काग्रेंसी को कोई गुरेज नहीं होगा.
    इसके ठीक विपरीत दूसरी काग्रेंसी फजल युसूफ का कहना है कि ह्यूम देश के अपमान से जुडा हुआ शब्द है इसलिये देश के काग्रेंसी उनसे नफरत करते है,आजादी के दौरान देश के स्वतंत्रता सेनानियों के नरसंहार के लिये हयूम को दोषी मानते हुये काग्रेंसी उनसे परहेज करते दिख रहे है.