बुधवार, 30 जनवरी 2013

मनुष्य को देवत्व की ओर ले जाने वाली शिक्षा चाहिए -भैयाजी जोशी




                         राजस्थान विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय शिक्षक संघ का 51वां अधिवेशन

 मनुष्य को देवत्व की ओर ले जाने वाली शिक्षा चाहिए

 -भैयाजी जोशी, सरकार्यवाह, रा.स्व.संघ

                                         अच्छे नागरिक बनने के लिए शिक्षा की उपयोगिता

                                              -वी.एस.कोकजे, पूर्व राज्यपाल, हिमाचल प्रदेश

           राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री सुरेशराव उपाख्य भैयाजी जोशी ने कहा कि परिवर्तन अच्छा और बुरा दोनों तरह का होता है। सकारात्मक परिवर्तन जहां उत्थान की ओर ले जाता है, वहीं नकारात्मक परिवर्तन पतन की ओर। हमें शिक्षा में सकारात्मक परिवर्तन करना होगा। वे गत दिनों जोधपुर (राजस्थान) में राजस्थान विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय शिक्षक संघ (राष्ट्रीय) के दो दिवसीय 51वें प्रांतीय अधिवेशन के उद्घाटन कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। आयोजन समिति के अध्यक्ष प्रो. ए.के. गुप्ता ने स्वागत उद्बोधन दिया। शिक्षक संघ के प्रांतीय महामंत्री श्री एम.एम. रंगा ने प्रतिवेदन प्रस्तुत किया तथा अध्यक्ष डा. ग्यारसीलाल जाट ने शिक्षक संघ के संगठन एवं रचनात्मक पहलुओं की चर्चा की। अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के अध्यक्ष डा. विमल प्रसाद अग्रवाल ने अध्यक्षीय उद्बोधन में महासंघ की जानकारी दी।
      श्री भैयाजी जोशी ने शिक्षा नीति की चर्चा करते हुए प्रश्न किया कि इस देश की शिक्षा नीति मनुष्य को मनुष्य बनाने में पहल करती है या फिर सिर्फ आजीविका की मशीन बनाने में ? उन्होंने कहा कि सिर्फ भिन्न-भिन्न उपाधियों को हासिल करना ही शिक्षित होना नहीं है, हमें छात्रों को सुशिक्षित बनाने की ओर पहल करनी होगी। भ्रष्टाचार की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार की ओर कौन ले जा रहा है, पढ़ा लिखा या फिर अनपढ़ ? अनपढ़ तो भ्रष्टाचार नहीं कर रहा। ऊंचे पदों पर बैठे लोग जो शिक्षित हैं वहां भ्रष्टाचार हो रहा है? इसका कारण ढूंढना होगा, हमें यह सोचना होगा कि ऐसी कैसी शिक्षा है कि लोग गलत मार्ग को अपना रहे हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा के साथ जीवन मूल्यों की शिक्षा देने से ही हम समाज को सुशिक्षित बना सकते हैं।
श्री भैयाजी जोशी ने कहा कि आज की शिक्षा का तरीका मात्र जानकारी उपलब्ध कराने वाला है। रोजगारोन्मुखी शिक्षा होनी चाहिए मगर सिर्फ रोजगार उपलब्ध कराना ही काफी नहीं है। उन्होंने कहा कि आधुनिकता के नाम पर हम क्या परोस रहे हैं उसके बारे में भी सोचें। हम आधुनिकता के विरोधी नहीं हैं, आधुनिकता जो पशुता की ओर ले जाती है वह स्वीकार्य नहीं है उसका विरोध है, मगर जो देवत्व की ओर ले जाये वह इस समाज और राष्ट्र को स्वीकार्य है। संस्कारों के वर्धन की जगह विकारों का वर्धन हो तो ऐसी शिक्षा बेकार है। नीतियों से ही सिर्फ परिवर्तन संभव नहीं है, नीतियों का क्रियान्वन सही ढंग से होना आवश्यक है। मनुष्य को मनुष्यता और देवत्व की ओर ले जाने वाली शिक्षा चाहिए, सिर्फ भोगवाद की ओर ले जाने वाली नहीं।
शिक्षा के पुराने स्वरूप की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि पहले घर, मंदिर तथा विद्यालय में बालक को शिक्षा मिलती थी, गुरुकुल पद्धति थी, यह पद्धति कुछ जगह अभी भी है। माता-पिता शिक्षा का मूल केंद्र हैं, वहां अब समस्या है। जीवन शैली में बदलाव आया है उसका असर भी दिखने लगा है। माता-पिता ने अपना दायित्व सीमित कर लिया है। साधन उपलब्ध कराना ही सब कुछ हो गया है। जीविकोपार्जन के कारण जीवन शैली में आये परिवर्तन से खेलने और माता-पिता के मध्य रहने की आयु में बच्चों को दूसरे के हाथों में छोड़ना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों में जो चल रहा है उसका प्रभाव हमारे यहां भी है।
अधिवेशन के दूसरे सत्र में देराश्री स्मृति व्याख्यानमाला में हिमाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल एवं राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्री वी.एस. कोकजे ने 'दशा एवं दिशा: शिक्षा में गुणवत्ता की चुनौती' विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में कहा कि अंग्रेजों ने शिक्षा का व्यावसायिक उपयोग प्रारंभ किया। शिक्षा में गुरु गौण हो गया और संस्था प्रमुख हो गयी। स्वतंत्रता के बाद यह अंतर आया है कि शिक्षा पहले सीमित हुआ करती थी अब उसका विस्तार हो गया है। अच्छे नागरिक बनने के लिए शिक्षा की उपयोगिता है। व्याख्यानमाला के विशिष्ट अतिथि के रूप में डा. भोमेश्र देराश्री और डा. अखिल रंजन गर्ग थे। अध्यक्षता जोधपुर के विधायक श्री कैलाश भंसाली विधायक जोधपुर ने की।

शिवताण्डवस्तोत्रम् : मोक्ष दायनी महामन्त्र





 मोक्ष दायनी महा मन्त्र 
शिवताण्डवस्तोत्रम् ।
जटारूप अटवी वन निकसलि जाह्नवीक पावन धारा
गरदनि अवलम्बित फणिमाला ताण्डव नृत्य प्रचण्ड परा,
डिमिक डिमिक डिम डमरु बाजे स्वर लहरी अनुगुंज करे,
करू कल्याण हमर शिवशंकर जयशिव जयशिव हरे हरे।1।
जटा कड़ाही मध्य तरंगित गंग सुशोभित शीश जनिक,
धह-धह ज्वाल ललाटक मध्ये राजित बालक शोम तनिक,
शुचि शरीर सुन्दर शशि शेखर सदा हृदय अनुराग भरे
करु कल्याण हमर शिवशंकर जयशिव जयशिव हरे हरे।2।
धन-धन गिरि तनया विलास निर्लिप्त निरासक्ते योगी,
हुलसित लखि चहुँदिशि प्रकाश निज शिर-भूषण जन-उपयोगी,
सतत् कृपा दृग पाबि दिगम्बर कष्ट हरे आमोद भरे,
करु कल्याण हमर शिव शंकर जयशिव जयशिव हरे-हरे ।3।
जटाजूट आवर्तित फणि-मणि कुंकुम रागालेप प्रभा,
आलोकित चहुँ दिशा हस्ति चर्माम्बर पहिरन हरक सदा,
ताहि विलक्षण भूतनाथ मे मन विनोद सदिकाल करे,
करू कल्याण हमर शिव शंकर जयशिव जयशिव हरे हरे।4।
इन्द्रादिक मस्तक आवर्तित पुष्प पराग चरण-पनही,
नागराज केर हार निबद्धित जटा शिखर शशि टा धनही,
चिर संपत्ति घटय नहि कहियो रिक्त हमर भंडार भरे,
करु कल्याण हमर शिव शंकर जयशिव जयशिव हरे-हरे ।5।
अग्नि प्रज्वलित भालक वेदी मन्मथ शमन तेज सं भेल,
भाल विशाल कलाधर शोभित छथि आराध्य इन्द्रहुक लेल,
मस्तक महाजटिल शिवशंभुक मम अभिष्ट श्री सिद्ध करे,
करू कल्याण हमर शिवशंकर जयशिव जयशिव हरे हरे ।6।
धह धह अनल भाल विकराले कयल कामदेवहुक हवन,
गिरितनया-कुच पत्रभंग रचना कारीगर शिवा रमण,
अटल भक्ति एकाग्रचित्त हो तीन नयन मे ध्यान धरे,
करू कल्याण हमर शिव शंकर जयशिव जयशिव हरे हरे ।7।
अमारात्रि केर नवल मेघमाला सन कारी कण्ठ जनिक,
हस्तिचर्म धारक तारक विश्वेश गंगपति चन्द्रमणिक,
परम मनोहर कान्तिवान भगवान धनक विस्तार करे,
करू कल्याण हमर शिव शंकर जयशिव जयशिव हरे हरे।8।
नील कमल दल श्याम प्रभा अनुगमना हरिणी-छवि ग्रीवा,
त्रिपुर काम भव दक्ष यक्ष हरि अन्धक यम हति देव-शिवा,
विघ्न विनाशक पिता महादेव सकल ताप परिताप हरे,
करू कल्याण हमर शिवशंकर जयशिव जयशिव हरे हरे।9।
दंभ रहित गिरिजाक मधुप जे कला कदम्ब मंजरी पान,
दक्ष यक्ष हरि यम भव अन्तक मन्मथ त्रिपुर असुर अवशान,
महादेव मम कष्ट विनाशक दिवा राति मन भजन करे,
करू कल्याण हमर शिवशंकर जयशिव जयशिव हरे हरे।10।
सिर भुजंग फुफकार वेग सं अनल ललाट धधकि रहलइ,
शिव प्रचणड ताण्डव आलोकित धिमि धिमि नाद धमकि रहलइ,
गुंजित मंगल घोष चहुँदिशि मंगल मंगल सदा करे,
करू कल्याण हमर शिवशंकर जयशिव जयशिव हरे हरे।11।
पाथरवत् पुनि कोमल सेजे साँप आर मुक्ता माला,
रत्न माँटि मित शत्रु अभेदे दुर्वादल अक्षी-कमला,
प्रजा आर पृथ्वीपति में समभाव राखि मन जपन करे,
करू कल्याण हमर शिवशंकर जयशिव जयशिव हरे हरे।12।
ललित ललाट भाल चन्दा मे सदिखन स्थिर चित्त रहय,
सुरसरि तट करजोरि भाव निर्मल मन शिव केँ जाप करय,
सजल नेत्र शिव चरण कमल मे पल पल छिन छिन नमन करे,
करू कल्याण हमर शिवशंकर जयशिव जयशिव हरे हरे ।13।
अति उत्तम स्तोत्रक वर्णन पाठ नित्य स्मरण करय,
शिवगुरू भक्ति मिलय तहि जन केँ नहि विलोम गति लेश रहय,
गिरिजापति पद भक्ति अहर्निश भवबंधन सं मुक्त करे,
करू कल्याण हमर शिव शंकर जयशिव जयशिव हरे हरे ।14।
इति पूजा संध्याकाले दसकंधर पठितक पाठ करे,
से नर गज रथ सुत धन पावे सदा सुखी संतान रहे,
अटल भक्ति सं अचल संपदा आशुतोष धन धान्य भरे,
करू कल्याण हमर शिवशंकर जयशिव जयशिव जयशिव हरे हरे ।15। 


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इति श्रीरावण- कृतम् शिव- ताण्डव- स्तोत्रम् सम्पूर्णम्

शिवताण्डवस्तोत्रम्
जटा टवी गलज्जल प्रवाह पावितस्थले, गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्ग तुङ्ग मालिकाम् |
डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद वड्डमर्वयं, चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ||१||
जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिम्प निर्झरी, विलो लवी चिवल्लरी विराजमान मूर्धनि |
धगद् धगद् धगज्ज्वलल् ललाट पट्ट पावके किशोर चन्द्र शेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ||२||
धरा धरेन्द्र नंदिनी विलास बन्धु बन्धुरस् फुरद् दिगन्त सन्तति प्रमोद मानमानसे |
कृपा कटाक्ष धोरणी निरुद्ध दुर्धरापदि क्वचिद् दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ||३||
लता भुजङ्ग पिङ्गलस् फुरत्फणा मणिप्रभा कदम्ब कुङ्कुमद्रवप् रलिप्तदिग्व धूमुखे |
मदान्ध सिन्धुरस् फुरत् त्वगुत्तरीयमे दुरे मनो विनोद मद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ||४||
सहस्र लोचनप्रभृत्य शेष लेखशेखर प्रसून धूलिधोरणी विधूस राङ्घ्रि पीठभूः |
भुजङ्ग राजमालया निबद्ध जाटजूटक श्रियै चिराय जायतां चकोर बन्धुशेखरः ||५||
ललाट चत्वरज्वलद् धनञ्जयस्फुलिङ्गभा निपीत पञ्चसायकं नमन्निलिम्प नायकम् |
सुधा मयूखले खया विराजमानशेखरं महाकपालिसम्पदे शिरोज टालमस्तु नः ||६||
कराल भाल पट्टिका धगद् धगद् धगज्ज्वल द्धनञ्जयाहुती कृतप्रचण्ड पञ्चसायके |
धरा धरेन्द्र नन्दिनी कुचाग्र चित्रपत्रक प्रकल्प नैक शिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम |||७||
नवीन मेघ मण्डली निरुद् धदुर् धरस्फुरत्- कुहू निशीथि नीतमः प्रबन्ध बद्ध कन्धरः |
निलिम्प निर्झरी धरस् तनोतु कृत्ति सिन्धुरः कला निधान बन्धुरः श्रियं जगद् धुरंधरः ||८||
प्रफुल्ल नीलपङ्कज प्रपञ्च कालिम प्रभा- वलम्बि कण्ठकन्दली रुचिप्रबद्ध कन्धरम् |
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छि दांध कच्छिदं तमंत कच्छिदं भजे ||९||
अखर्व सर्व मङ्गला कला कदंब मञ्जरी रस प्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम् |
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्त कान्ध कान्त कं तमन्त कान्त कं भजे ||१०||
जयत् वदभ्र विभ्रम भ्रमद् भुजङ्ग मश्वस – द्विनिर्ग मत् क्रमस्फुरत् कराल भाल हव्यवाट् |
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः ||११||
स्पृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्- – गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः |
तृष्णारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समप्रवृत्तिकः ( समं प्रवर्तयन्मनः) कदा सदाशिवं भजे ||१२||
कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरः स्थमञ्जलिं वहन् |
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ||१३||
इदम् हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसंततम् |
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम् ||१४||
पूजा वसान समये दशवक्त्र गीतं यः शंभु पूजन परं पठति प्रदोषे |
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्र तुरङ्ग युक्तां लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शंभुः ||१५||
इति श्रीरावण- कृतम् शिव- ताण्डव- स्तोत्रम् सम्पूर्णम्