बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

बालिगा और नाबालिग मानना : विज्ञान सम्मत होना चाहिए

- अरविन्द सिसोदिया

मेरा मानना हे कि न्यायलय को सिर्फ उम्र के किसी सरकार द्वारा कानून बना देने को नजर अंदाज यह कह कर कर देना चाहिए कि कोई भी व्यक्ति शारीरिक और मानसिक वयस्क 14 से 16 के बीच  हो जाता हे । बालिगा और नाबालिग  का मानना किसी सरकार के बजाये विज्ञान सम्मत होना चाहिए । एक व्यक्ति दोबार बलात्कार करके हत्या कर रहा हे , वह किसी भी तरह से नाबालिग नहीं हे ।

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सुप्रीम कोर्ट 'जुविनायल जस्टिस एक्ट' यानी किशोर न्याय क़ानून के भीतर किशोर की परिभाषा पर दायर एक जनहित याचिका की सुनवाई के लिए तैयार हो गया है.
न्यायालय में दाख़िल याचिका में कहा गया है कि साल 2000 के इस क़ानून में कई ऐसे प्रावधान हैं जो संविधान के भीतर मौजूद मूलभूत अधिकारों का उलंघन करते हैं.कहा गया है कि ये प्रावधान बराबरी, जीवन और आज़ादी के अधिकारों के मूलभूत अधिकारों के विरूद्ध हैं.
न्याय बोर्ड
किशोर न्याय क़ानून किशोरों के अपराध से संबंधित है और इस तरह के मामले किशोर न्याय बोर्ड में सुने जाते हैं.
क़ानून के भीतर प्रावधान है कि जो किशोर या किशोरी 18 साल से कम उम्र के हैं, और वो अगर किसी अपराध में लिप्त पाए जाते हैं तो उनकी सुनवाई इसी बोर्ड में होगी.ख़बरों के मुताबिक़ दो वकीलों- सुकुमार और कमल कुमार पांडे की याचिका में कहा गया है कि किसी कम उम्र के अभियुक्त का मामला इस किशोर क़ानून के भीतर सुना जाएगा या सामान्य भारतीय दंड संहिता के दायरे में ये अपराध की गंभीरता के आधार पर तय किया जाना चाहिए.
वर्मा समिति
हाल में हुए दिल्ली सामुहिक बलात्कार मामले के बाद किशोर न्याय क़ानून पर नए सिरे से बहस शुरू हो गई है.एक वर्ग की मांग है कि अगर अपराध गंभीर हो तो उम्र की सीमा कड़ी कारवाई के आड़े नहीं आनी चाहिए. दूसरी ओर बाल अधिकारों के लिए काम करने वालों का कहना है कि कम उम्र के लोगों को सुधरने का मौक़ा फिर से दिया जाना चाहिए.औरतों के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों पर क़ानून की समीक्षा और सुझाव के लिए तैयार जस्टिस वर्मा समिति ने भी किशोरों की परिभाषा में तबदीली न करने की सलाह दी है.

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        किसी खास केस में नाबालिग को सजा हो सकती है या नहीं इसकी समीक्षा अब सु्प्रीम कोर्ट करेगा. एक पीआईएल पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जुवेनाइल जस्टिस एक्‍ट की समीक्षा किए जाने की जरूरत है. इस मामले की अगली सुनवाई 3 अप्रैल को होगी. पिछले साल दिसंबर में दिल्‍ली गैंगरेप में फंसे 6 आरोपियों में एक ने अपने आपको 17 साल का बताया है, जिसके बाद से पूरे देश भर में यह बहस हो रही है कि क्‍या ऐसे मामलों में नाबालिग को भी सजा होनी चाहिए या नहीं.
           इस मामले में बाकी 5 आरोपियों पर आईपीसी की 11 धाराओं पर केस चलाया जा रहा है जिसमें अधिकतम सजा फांसी तक की है. लेकिन इस जुर्म के लिए उस नाबालिग पर जुवेनाइल कोर्ट में मामला चल रहा है और उसमें अधिकतम सजा 3 साल की है, जिसमें उसे सुधार प्रक्रिया के तहत रखा जाएगा.
पुलिस के अनुसार नाबालिग ही उन छह में सबसे क्रूर था, जिसने मृतक लड़की और उसके दोस्‍त पर लोहे के सरिया से वार किया था. उल्‍लेखनीय है कि कोर्ट ने उसे नाबालिग ही माना है.
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नाबालिग की परिभाषा फिर होगी तय, एक्ट की समीक्षा करेगा सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने किशोर न्याय कानून में ‘किशोर’ की परिभाषा की सांविधानिक वैधता के सवाल पर गौर करने का निश्चय किया है। इसमें अपराध की संगीनता के बावजूद 18 साल से चंद सप्ताह कम आयु का होने पर भी ऐसे अपराधी को नाबालिग ही माना गया है।
न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की खंडपीठ ने कहा कि हम इस मामले पर गौर करेंगे क्योंकि यह आयु निर्धारण से संबंधित है। न्यायाधीशों ने कहा कि यह कानून का सवाल है और गंभीर अपराध में आरोपी पर बालिग के रूप में मुकदमा चलाने का निर्णय करते समय उसकी आयु के निर्धारण का अपराध की गंभीरता से कुछ तो तालमेल होना चाहिए। न्यायालय ने इसके साथ ही इस मामले में उठाए गए मसलों पर विचार के लिए अटार्नी जनरल गुलाम वाहनवती से सहयोग करने का आग्रह किया है। इस याचिका में किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) कानून में प्रदत्त किशोर की परिभाषा को निरस्त करने का भी अनुरोध किया गया है।
न्यायालय ने अटार्नी जनरल को इस मामले में विधि मंत्रालय और गृह मंत्रालय की ओर से हलफनामा तथा संबंधित रिपोर्ट 29 मार्च तक दाखिल करने का निर्देश दिया है। इस मामले में अब तीन अप्रैल को आगे सुनवाई होगी। यह याचिका कमल कुमार पांडे और सुकुमार नाम के वकीलों ने दायर की है। याचिका में किशोर न्याय कानून की धारा 2 (एल), धारा 10 और 17 के प्रावधानों के तर्कहीन, मनमाना और असंवैधानिक होने का दावा किया गया है। अटार्नी जनरल ने कहा कि न्यायमूर्ति जेएस वर्मा समिति की रिपोर्ट ने सभी बिंदुओं पर गौर किया है लेकिन उसने किशोर का वर्गीकरण करने के लिए उसकी उम्र कम करने की सिफारिश करने से परहेज किया है। इस पर न्यायाधीशों ने कहा कि वे न्यायमूर्ति वर्मा समिति की रिपोर्ट पर गौर नहीं करेंगे क्योंकि उसके समक्ष शुद्ध रूप से कानून का मसला था।
अटार्नी जनरल वाहनवती ने कहा कि केन्द्र सरकार इस मामले में न्यायालय के साथ सहयोग के लिए तैयार है और राज्य सरकारों से भी इस विषय पर गौर करने के लिए कहा जा सकता था। उन्होंने कहा कि कुछ गैर सरकारी संगठन भी इस विषय पर काफी सक्रिय हैं। न्यायाधीशों ने इस पर कहा कि राज्यों की इसमें कोई भूमिका नहीं है और हम गैर सरकारी संगठनों को नहीं सुनेंगे। न्यायालय ने कहा कि चूंकि यह मामला आयु निर्धारण से संबंधित है और किशोर न्याय कानून अंतरराष्ट्रीय कंनवेन्शन पर आधारित है। ऐसे भी कई देश हैं, जिन्होंने किशोर की उम्र परिभाषित करने के इरादे से इसे 16 साल निर्धारित किया है तो कुछ ने 18 साल ही रखा है।
न्यायाधीशों ने कहा कि हम सिर्फ संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के संदर्भ में ही इस पर विचार कर रहे है। इससे पहले, जनहित याचिका में आरोपी व्यक्ति को ‘किशोर’ के रूप में वर्गीकृत करना विधि के विपरीत है और किशोर न्याय कानून में प्रदत्त संबंधित प्रावधान नागरिकों के मौलिक अधिकारों के खिलाफ है। याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि इस कानून में प्रदत्त किशोर की परिभाषा कानून के प्रतिकूल है। उनका तर्क है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 82 और 83 में किशोर की परिभाषा में अधिक बेहतर वर्गीकरण है। धारा 82 के अनुसार सात साल से कम आयु के किसी बालक द्वारा किया गया कृत्य अपराध नहीं है जबकि धारा 83 के अनुसार सात साल से अधिक और 12 साल से कम आयु के ऐसे बच्चे द्वारा किया गया कोई भी कृत्य अपराध नहीं है जो किसी कृत्य को समझने या अपने आचरण के स्वरूप तथा परिणाम समझने के लिये परिपक्व नहीं हुआ है।
न्‍यायालय का यह निश्चय दिल्ली में पिछले साल 16 दिसंबर को 23 साल की लड़की से सामूहिक बलात्कार की घटना में शामिल छह आरोपियों में से एक के नाबालिग होने की बात सामने आने के बाद से अधिक महत्वपूर्ण है। इस वारदात के बाद से ही किशोर न्याय कानून के तहत किशोर की आयु का मामला चर्चा में है। वाहनवती ने कहा कि इस मसले पर गौर करते समय यह ध्यान रखना होगा कि यह किशोर के कृत्य का सवाल नहीं है बल्कि यह भी सोचना होगा कि उसने ऐसा क्यों किया और यह भी संबंधित तथ्य है कि समाज ने उसे विफल घोषित कर दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि किशोर को वर्गीकृत करते समय उसकी उम्र सीमा कम करके 16 साल की जाये या फिर इसके 18 साल रखा जाये या इस मसले पर निर्णय का सवाल अदालत के विवेक पर छोड़ना होगा।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो की वर्ष 2011 की रिपोर्ट के अपराध के आंकड़ों से पता चलता है कि 18 साल से कम आयु के किशोरों द्वारा किए गए अपराधों में कुल मिलाकर करीब दो फीसदी का इजाफा हुआ है। यही नहीं, 2011 में किशोरों ने 33887 अपराध किये जिसमें से 4443 अपराध करने वाले किशोरों ने उच्चतर माध्यमिक तक शिक्षा प्राप्त की थी और 27577 किशोर अपराधी अपने परिवारों के साथ रह रहे थे जबकि सिर्फ 1924 किशोर ही बेघर थे।
याचिका के अनुसार इन किशोर अपराधियों में से लगभग दो तिहाई किशोर 16 से 18 आयु वर्ग के हैं। याचिका में कहा गया है कि 2010 की तुलना में 2011 में किशोरों द्वारा किए गए अपराधों में 34 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। (एजेंसी)
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‘भगवा आतंकवाद’ : गैर जिम्मेदाराना शब्द प्रयोग

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हिंदू आतंकवाद
- मा. गो. वैद्य
‘हिंदू आतंकवाद’, ‘भगवा आतंकवाद’ जैसे गैरजिम्मेदाराना शब्दों का प्रयोग करने के लिए गृहमंत्री शिंदे का निषेध करने वाला लेख मैंने गत भाष्य में ही लिखा था. फिर उस विषय की चर्चा का वैसे कोई प्रयोजन नहीं था. लेकिन, वह लेख लिखने के बाद उसी विषय पर दो बहुत ही अच्छे लेख मैंने पढ़े. उन लेखों का भी मेरे वाचकों को परिचय हो, इस हेतु से उन लेखों का स्वैर अनुवाद यहॉं प्रस्तुत कर रहा हूँ.

एस. गुरुमूर्ति का लेख
पहला लेख है एस. गुरुमूर्ति का. वह चेन्नई से प्रकाशित होने वाले ‘न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ के २४ जनवरी के अंक में प्रकाशित हुआ है. विषय मुख्यत: भारत-पाकिस्तान के बीच चलने वाली ‘समझौता एक्सप्रेस’में, भारत में पानिपत में हुए बम विस्फोट और उसके लिए बहुत देर बाद सरकारी जॉंच यंत्रणा ने तथाकथित हिंदू आतंकवादियों को धर दबोचने के बारे में है. वह इस प्रकार है -

दाऊद इब्राहिम की मदद
‘‘२० जनवरी १३ को, जयपुर में कॉंग्रेस के तथाकथित चिंतन शिबिर में केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने समझौता एक्सप्रेस, मक्का मसजिद और मालेगॉंव में हुए बम विस्फोट के लिए रा. स्व. संघ और भाजपा को जिम्मेदार बताया था. शिंदे का वक्तव्य प्रसिद्ध होने के दूसरे ही दिन लष्कर-ए-तोयबा का नेता हफीज सईद ने संघ पर पाबंदी लगाने की मांग की थी. अत: सईद की इस मॉंग के लिए शिंदे ही गवाह साबित होते है. अब हम इस बम विस्फोट के सबूतों पर विचार करेंगे.’’
‘‘राष्ट्र संघ की सुरक्षा समिति ने २९ जून २००९ को पारित किए प्रस्ताव में कहा है कि, ‘२००७ के फरवरी माह में समझौता एक्सप्रेस में जो बम विस्फोट हुआ उसके लिए लष्कर-ए-तोयबा का मुख्य समन्वयक कासमानी अरिफ जिम्मेदार है.’ इस कासमानी को दाऊद इब्राहिम ने पैसा दिया था. दाऊद ने ‘अल् कायदा’ इस आतंकी संगठन को भी पैसों की मदद की थी. इस मदद के बदले समझौता एक्सप्रेस पर हमला करने के लिए ‘अल् कायदा’ने आतंकी उपलब्ध कराए थे. सुरक्षा समिति का यह प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र संघ की साईट पर उपलब्ध है. दो दिन बाद मतलब दि. १ जुलाई २००९ को अमेरिका के (युएसए) कोषागार विभाग (ट्रेझरी डिपार्टमेंट) ने एक सार्वजनिक पत्रक में कहा है कि, अरिफ कासमानी ने बम विस्फोट के लिए लष्कर-ए-तोयबा के साथ सहयोग किया. अमेरिका ने अरिफ कासमानी सहित कुल चार पाकिस्तानी नागरिकों के नाम भी घोषित किए है. अमेरिका सरकार के इस आदेश का क्रमांक १३२२४ है और वह भी सरकारी साईट पर उपलब्ध है.’’

पाकिस्तान की कबुली
‘‘राष्ट्र संघ और अमेरिका ने लष्कर-ए-तोयबा और कासमानी के विरुद्ध कारवाई घोषित करने के उपरान्त, छ: माह बाद पाकिस्तान के गृहमंत्री रहमान मलिक ने, पाकिस्तान के आतंकवादी, समझौता एक्सप्रेस में हुए बम विस्फोट में शामिल थे, यह मान्य किया. लेकिन उसे एक परन्तुक (रायडर) जोड़ा. वह इस प्रकार कि, लेफटनंट कर्नल पुराहित ने पाकिस्तान में रहने वाले आतंकवादियों को इसके लिए सुपारी दी थी. (संदर्भ - ‘इंडिया टुडे’ ऑन लाईन, २४ - ०१ - २०१०)’’
‘‘राष्ट्र संघ या अमेरिका या पाकिस्तान के गृहमंत्री की बात छोड़ दें. अमेरिका में इस मामले की जिस एक अलग यंत्रणा ने जॉंच की, उसमें से और कुछ जानकारी सामने आई है. करीब १० माह बाद सेबास्टियन रोटेल्ला इस खोजी पत्रकार ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि, समझौता एक्सप्रेस में हुए बम विस्फोट में डेव्हिड कोलमन हेडली का भी हाथ था. यह उसकी तीसरी बीबी फैजा आऊतल्लाह ने अपने कबुलनामें में बताया है. रोटेल्ला के रिपोर्ट का शीर्षक है, ‘२००८ में मुंबई में हुए बम विस्फोट के बारे में अमेरिकी सरकारी यंत्रणा को चेतावनी दी गई थी’ रोटेल्ला आगे कहते है कि, ‘मुझे इस हमले में लपेटा गया है, ऐसा फैजा ने कहा है’ (वॉशिंग्टन पोस्ट - ०५ - ११ - २०१०) २००८ के अप्रेल माह में लिखी अपनी जॉंच के रिपोर्ट के अगले भाग में रोटेल्ला कहते है कि, ‘‘फैजा, इस्लामाबाद के (अमेरिकी) दूतावास में गई थी और २००८ में मुंबई में विस्फोट होगे, ऐसी सूचना भी उसने दी थी.’’   

सीमी का भी सहभाग
‘‘सन् २००७ में, समझौता एक्सप्रेस में हुए बम विस्फोट के मामले की जॉंच के चलते समय ही, इस हमले में ‘सीमी’ (स्टुडण्ट्स इस्लामिक मुव्हमेंट ऑफ इंडिया) संस्था का भी सहभाग था, ऐसे सबूत मिले है. ‘इंडिया टुडे’ के १९ - ०९ - २००८ के अंक के समाचार का शीर्षक था ‘मुंबई में रेलगाडी में हुए विस्फोट और समझौता एक्सप्रेस में हुए बम विस्फोट में पाकिस्तान का हाथ : नागोरी’ उस समाचार में लष्कर-ए-तोयबा और पाकिस्तान के सहभाग का पूरा ब्यौरा दिया गया है. ‘सीमी’ के नेताओं की जो नार्को जॉंच की गई, उससे यह स्पष्ट होता है. इंडिया टुडे के समाचार के अनुसार, सीमी के महासचिव सफदर नागोरी, उसका भाई कमरुद्दीन नागोरी और अमील परवेज की यह नार्को जॉंच बंगलोर में अप्रेल २००७ में की गई थी. इस जॉंच के निष्कर्ष ‘इंडिया टुडे’ के पास उपलब्ध है. उससे स्पष्ट होता है कि, भारत के सीमी कार्यकर्ताओं ने, सीमा पार पाकिस्तानियों की सहायता से, यह बम विस्फोट किए थे. एहतेशाम और नासीर यह ‘सीमी’ के उन कार्यकर्ताओं के नाम है. उनके साथ कमरुद्दीन नागोरी भी था. पाकिस्तानियों ने, खाली सूटकेस इंदौर के कटारिया मार्केट से खरीदी थी. इस जॉंच में यह भी स्पष्ट हुआ कि, उस सूटकेस में पॉंच बम रखे गए थे और टायमर स्विच से उनका विस्फोट किया गया.’’

एटीएस का झूठ
‘‘यह सबूत सामने होते हुए भी महाराष्ट्र का पुलीस विभाग, इस दिशा में आगे क्यों नहीं बढ़ रहा. ऐसा प्रश्न स्वाभाविक ही निर्माण होता है. ऐसा दिखता है कि, महाराष्ट्र पुलीस विभाग के कुछ लोगों को, समझौता एक्सप्रेस में हुए बम विस्फोट का मामला कैसे भी मालेगॉंव बम विस्फोट से जोड़ना था. महाराष्ट्र के दहशतवाद विरोधी दस्ते (एटीएस) ने, अपने वकील के मार्फत, विशेष न्यायाधीश को बताया कि, मालेगॉंव बम विस्फोट मामले के आरोपी कर्नल पुरोहित ने ही समझौता एक्सप्रेस में बम विस्फोट के लिए आरडीएक्स उपलब्ध कराया था. लेकिन ‘नॅशनल सेक्युरिटी गार्ड’ इस केन्द्र सरकार की यंत्रणा ने बताया कि, समझौता एक्सप्रेस में हुए बम विस्फोट में आरडीएक्स का प्रयोग नहीं किया गया था. पोटॅशियम क्लोरेट और सल्फर इन रासायनिक द्रव्यों का उपयोग किया गया था. तत्कालीन केन्द्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटील ने भी इस विधान की पुष्टी की थी. मजे की बात तो यह है कि, उसी दिन मतलब १७-११-२००८ को दहशतवाद विरोधी दस्ते के वकील ने भी अपना पहले का बयान वापस लिया था. लेकिन जो हानि होनी थी वह तो हो चुकी थी. पाकिस्तान ने घोषित किया की, सचिव स्तर की बैठक में समझौता एक्सप्रेस पर हुए हमले में कर्नल पुरोहित के सहभाग का मुद्दा उपस्थित किया जाएगा. अंत में २० जनवरी २००९ को दशतवाद विरोधी दस्ते ने अधिकृत रूप में मान्य किया कि, समझौता एक्सप्रेस में हुए बम विस्फोट के लिए कर्नल पुरोहित ने आरडीएक्स उपलब्ध नहीं कराया था.  इस प्रकार समझौता एक्सप्रेस में हुए बम विस्फोट का केन्द्र, लष्कर-ए-तोयबा और ‘सीमी’ से कर्नल पुरोहित और उसके द्वारा भगवे रंग की ओर मोडा गया. क्या महाराष्ट्र पुलीस यंत्रणा पर दाऊद इब्राहिमब का प्रभाव है? इसकी जॉंच होनी चाहिए.’’
प्रश्न यह है कि, कौन सच बता रहा है? राष्ट्र संघ, अमेरिका, या शिंदे साहब? शिंदे साहब से उत्तर की अपेक्षा है.
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फ्रॅन्कॉई ग्वाटिये का लेख
दूसरा लेख है विदेशी पत्रकार फ्रॅन्कॉई ग्वाटिये (Francois Gautier) का. उनके लेख का शीर्षक है ‘‘हिंदू आतंकवाद नाम की कोई बात है?’’ (Is There Such a Thing As Hindu Terrorism)  उनके लेख को भी शिंदे के वक्तव्य का संदर्भ है. वे लिखते है -

‘‘मैं विदेशी संवाददाताओं में अपवादभूत संवाददाता हूँ. मेरा हिंदूओं पर प्रेम है. मैं जन्म से फ्रेंच हूँ. कॅथॉलिक हूँ. मतलब अहिंदू हूँ. मेरे अपने मतों के लिए मुझे ही श्रेय दिया जाना चाहिए. कारण, वह मत मुझे मेरे माता-पिता से नहीं मिले. मेरी शिक्षा या वंशपरंपरा से भी नहीं आए. १९८० से ‘ला जर्नल दि जिनेव्हा’ और ‘ला फिगॅरो’ समाचार पत्रों के लिए, दक्षिण आशिया के घटनाक्रमों का विश्‍लेषण करते समय मुझे जो दिखा और अनुभव हुआ, उससे मेरे यह मत बने है. धीरे-धीरे मुझे अनुभव हुआ कि, इस देश की विशेषताएँ हिंदू जीवनमूल्यों  (ethos) और हिंदूत्व के आधारभूत सच्ची आध्यात्मिकता में है.’’

हिंदूओं की विशेषता
‘‘लाखों ग्रामीणों में यह सादी, अंगभूत आध्यात्मिकता मैनें अनुभव की है. वह आपकी विविधता का स्वीकार करती है. फिर आप ईसाई हो या मुसलमान, अरब हो या ज्यू, फ्रेंच हो या चिनी. इस हिंदुत्व के कारण ही, भारतीय ईसाई फ्रेंच ईसाई से अलग होता है या भारतीय मुसलमान, सौदी मुसलमान से अलग लगता है. मैंने देखा है कि, हिंदूओं की ऐसी श्रद्धा है कि, ईश्वर अलग-अलग समय पर, अलग-अलग रूपों में, अलग-अलग नाम धारण कर सकता है. इस धारणा के कारण ही, हिंदूओं ने, कम से कम गत साडेतीन हजार वर्षों में, किसी देश पर फौजी हमला नहीं किया; उसी प्रकार, शक्ति या लालच से अपना धर्म किसी पर नहीं लादा.’’

वेदनादायी तुलना
‘‘ऐसा होते हुए भी, गुस्से में अपवादस्वरूप ईसाई चर्च जलाने वाले हिंदूओं की तुलना, निरपराध लोगों का कत्ल करने वाली ‘सीमी’ जैसी संस्था के साथ की जाती है, तब मुझे पीडा होती है. क्रोधावेश में चर्च पर हमले हुए, लेकिन किसी की हत्या नहीं हुई, यह भी ध्यान में रखना चाहिए.’’
‘‘बाबरी मसजिद ध्वंस करना निंदनीय होने पर भी, उस मामले में, किसी मुसलमान की हत्या नहीं हुई थी. इसकी, बाबरी का बदला के लेने के लिए १९९३ में मुंबई में जो बम विस्फोट हुए, उससे जरा तुलना करें. मुंबई में हुए बम विस्फोट में सैकड़ों लोग मारे गए थे.’’

हिंदू ही आघात-लक्ष्य
‘‘मुझे यहॉं, उस तथाकथित हिंदू दहशतवाद के बारे में बताना ही चाहिए. अरबस्थान से आए पहले आक्रमण से ही, हिंदू ही आघात-लक्ष्य रहे हैं. तैमूरलंग ने सन् १३९९ में, एक ही दिन, एक लाख हिंदूओं का कत्ल किया था. पोर्तुगीजों ने इन्क्विझिशन के नाम पर, गोवा में, सैकड़ों ब्राह्मणों को सुली पर चढ़ा दिया था. आज भी हिंदूओं का उत्पीडन समाप्त नहीं हुआ है. कश्मीर के दस लाख हिंदू उसके भोग भोग रहे है. आज कुछ सौ की संख्या में ही हिंदू वहॉं बचे है. अन्य ने, दहशत से स्वयं को बचाने के लिए वहॉं से पलायन किया है. केवल गत चार वर्षों की अवधि में, संपूर्ण भारत में हुए अनेक बम विस्फोटों में सैकड़ों निरपराध हिंदू मारे गए है.’’

भेदभाव का बर्ताव
‘‘इस देश में हिंदू बहुसंख्य है. लेकिन उनका मजाक उडाया जाता है. उन्हें मूलभूत सुविधाएँ भी प्राप्त नहीं होती. अमरनाथ यात्रा का उदाहरण मेरे सामने है. सरकार हिंदूओं की है, फिर भी यह हो रहा है. और हज यात्रा को पुरस्कृत किया जाता है.’’
‘‘हिंदू वनवासीयों को आर्थिक लालच या आर्थिक फन्दें में फँसाकर ईसाई बनाया जाता है. उनमें के एक ८४ वर्षीय साधू और एक साध्वी की नृशंस हत्या की जाती है. लेकिन, कभी-कभी वर्षानुवर्ष भेड-बकरियों की तरह कत्ल सहने वाले हिंदू, जिन्हें महात्मा गांधी ने कायर कहा था, ताकत के साथ उठ खड़े होते है. ऐसा ही गुजरात में हुआ था. जम्मू, कंधमाल, मंगलोर, मालेगॉंव या अजमेर में हुआ था.’’

आँकड़े बताओ
‘‘अन्यत्र भी ऐसी घटनाएँ हो सकती है. हमने यह ध्यान में लेना चाहिए कि, यह घटनाएँ सियासी नेतृत्व ने नहीं कराई. वह उत्स्फूर्त उद्रेक होता है. दुनिया की जनसंख्या में १०० करोड़ हिंदू है. दुनिया के कानूनों का पालन करने वाले और उद्योगों में सफल लोगों में उनकी गिनति होती है. क्या हम उन्हें आतंकवादी कहेंगे? १९४७ से मुसलमानों की ओर से कितने हिंदू मारे गए और हिंदूओं की ओर से कितने मुसलमान मारे गए, इसके आँकड़े अन्य कोई प्रस्तुत करे या न करे कम से कम भाजप ने यह अवश्य करना चाहिए. वे आँकड़े ही सच क्या है यह बताएगे.’’

सुशील कुमार जी, आपके पास है इसका जबाब? शायद नहीं ही होगा; और रहा तो भी आप वह नहीं देगे. कारण वे हिंदू है!


-मा. गो. वैद्य