शुक्रवार, 8 मार्च 2013

स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक राष्ट्रीयता के पितामह - रामधारी सिंह 'दिनकर'



 स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक राष्ट्रीयता के पितामह 
-रामधारी सिंह 'दिनकर'
उन्नीसवीं सदी के अंग्रेजी पढ़े-लिखे हिन्दू अपने धर्म के कुपरिणामों को समझने लगे थे। इसका एक यह भी कारण था कि धर्म पर से उनकी श्रद्धा हटने लगी थी। अतएव, जब स्वामी विवेकानंद का आविर्भाव हुआ, उन्हें अपने सामने कई प्रकार के उद्देश्य दिखाई पड़े। सब से बड़ा कार्य धर्म की पुन:स्थापना का कार्य था। बुद्धिवादी मनुष्यों की श्रद्धा धर्म पर से केवल भारत में ही नहीं, सभी देशों में हिलती जा रही थी। अतएव, यह आवश्यक था कि धर्म की ऐसी व्याख्या की जाए जो अभिनव मनुष्य को ग्राह्य हो, जो उसकी इहलौकिक विजय के मार्ग में बाधा नहीं डाले। दूसरा काम हिन्दू धर्म पर, कम से कम, हिन्दुओं की श्रद्धा जमाये रखना था। किंतु, हिन्दू यूरोप के प्रभाव में आ चुके थे तथा अपने धर्म और इतिहास पर भी वे तब तक विश्वास करने को तैयार न थे, जब तक कि यूरोप के लोग उनकी प्रशंसा नहीं करें। और तीसरा काम भारतवासियों में आत्म गौरव की भावना को प्रेरित करना था, उन्हें अपनी संस्कृति, इतिहास और आध्यात्मिक परंपराओं के योग्य उत्तराधिकारी बनाना था।

स्वामी विवेकानंद का देहांत केवल 39 वर्ष की आयु में हो गया, किंतु इस छोटी सी अवधि में ही उन्होंने उपर्युक्त तीनों कार्य सम्पन्न कर दिये। राममोहन राय के समय से भारतीय संस्कृति और समाज में जो आंदोलन चल रहे थे, वे विवेकानंद में आकर अपनी चरम सीमा पर पहुंचे। अभिनव भारत को जो कुछ कहना था, वह विवेकानंद के मुख से उद्गीर्ण हुआ। अभिनव भारत को जिस दिशा की ओर जाना था, उसका स्पष्ट संकेत विवेकानंद ने दिया। विवेकानंद वह सेतु हैं, जिस पर प्राचीन और नवीन भारत परस्पर आलिंगन करते हैं। विवेकानंद वह समुद्र हैं, जिसमें धर्म और राजनीति, राष्ट्रीयता और अंतरराष्ट्रीयता तथा उपनिषद् और विज्ञान, सबके सब समाहित होते हैं। रवीन्द्रनाथ ने कहा है, 'यदि कोई भारत को समझना चाहता है तो उसे विवेकानंद को पढ़ना चाहिए।' अरविंद का वचन है कि 'पश्चिमी जगत में विवेकानंद को जो सफलता मिली, वही इस बात का प्रमाण है कि भारत केवल मृत्यु से बचने को नहीं जगा है, वरन वह विश्व विजय करके दम लेगा।'

ये सारी प्रशंसाएं सही हैं। इनमें कोई भी अत्युक्ति नहीं है। स्वामी जी धर्म और संस्कृति के नेता थे। राजनीति से उनका कोई सरोकार नहीं था। किंतु राजनीति तो स्वयं संस्कृति की चेरी है, उसका लघु अंग मात्र है। स्वामी जी ने अपनी वाणी और कर्तृत्व से भारतवासियों में यह अभिमान जगाया कि हम अत्यंत प्राचीन सभ्यता के उत्तराधिकारी हैं। हमारे धार्मिक ग्रंथ संसार में सबसे उन्नत और हमारा इतिहास सबसे महान है, हमारी संस्कृत भाषा विश्व की सबसे प्राचीन भाषा है और हमारा साहित्य सबसे उन्नत साहित्य है। यही नहीं प्रत्युत हमारा धर्म ऐसा है जो विज्ञान की कसौटी पर खरा उतरता है और जो विश्व के सभी मत-पंथों का सार होता हुआ भी उन सबसे अधिक है। स्वामी जी की वाणी से हिन्दुओं में यह विश्वास उत्पन्न हुआ कि उन्हें किसी के भी सामने मस्तक झुकाने अथवा लज्जित होने की आवश्यकता नहीं है। भारत में सांस्कृतिक राष्ट्रीयता पहले उत्पन्न हुई, राजनीतिक राष्ट्रीयता बाद को जन्मी है और इस सांस्कृतिक राष्ट्रीयता के पिता स्वामी विवेकानंद थे।

शिकागो-सम्मेलन

सन् 1893 ई. में शिकागो, अमरीका में निखिल विश्व के मत-पंथों का एक महासम्मेलन हुआ था। स्वामी विवेकानंद के हृदय में यह भाव उत्पन्न हुआ कि वे इस सम्मेलन में अवश्य जाएंगे और अनेक प्रचंड बाधाओं के होते हुए भी वे इस सम्मेलन में सम्मिलित हुए। हिन्दुत्व एवं भारतवर्ष के लिए यह अच्छा हुआ कि स्वामी जी इस सम्मेलन में जा सके। क्योंकि इस सम्मेलन में हिन्दुत्व के पक्ष में ऐसा ऊंचा प्रचार हुआ, जैसा न तो कभी पहले हुआ था, न उसके बाद से लेकर आज तक हो पाया है।

स्वामी जी के विदेश गमन के कई उद्देश्य थे। एक तो वे भारतवासियों के इस अंधविश्वास को तोड़ना चाहते थे कि समुद्र यात्रा पाप है तथा विदेशियों के हाथ का अन्न और जल ग्रहण करने से जाति चली जाती है। दूसरे भारत के अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोगों को वे यह भी दिखलाना चाहते थे कि भारतवासी अपना आदर आप भले ही न करें, किंतु उनके सांस्कृतिक गुरु पश्चिम के लोग भारत से प्रभावित हो सकते हैं। उनका यह अटल विश्वास था कि भारत के आध्यात्मिक विचारों और आदर्शों का प्रचार यदि पश्चिम के उन्नत देशों में किया जाए तो इससे वहां के लोग अवश्य प्रभावित होंगे तथा पृथ्वी पर एक नयी कल्पना, एक नये जीवन का सूत्रपात होगा। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने साधनापूर्वक यह जान लिया था कि विश्व के सभी मत-पंथ एक ही धर्म के विभिन्न अंग हैं एवं संपूर्ण विश्व में एक प्रकार की धार्मिक एकता का भाव जगना ही चाहिए। अजब नहीं कि स्वामी जी इस उद्देश्य की सिद्धि के लिए भी शिकागो के धार्मिक सम्मेलन में जाने को आतुर हो उठे हों।

शिकागो सम्मेलन में स्वामी जी ने जिस ज्ञान, जिस उदारता, जिस विवेक और जिस वाग्मिता का परिचय दिया, उससे वहां के सभी लोग मंत्रमुग्ध और, पहले ही दिन से, उनके भक्त हो गये। प्रथम दिन तो स्वामी जी को सबसे अंत में बोलने का अवसर इसलिए दिया गया था कि उनका कोई समर्थक नहीं था, उन्हें कोई जानता या पहचानता नहीं था। किंतु, उसके बाद सम्मेलन में जो उनके दस-बारह भाषण हुए, वे भाषण भी उन्होंने प्रतिदिन सभा के अंत में ही दिये, क्योंकि सारी जनता उन्हीं का भाषण सुनने को अंत तक बैठी रहती थी। उनके भाषणों पर टिप्पणी करते हुए 'द न्यूयार्क हेराल्ड' ने लिखा था कि ʅमत-पंथों की पार्लियामेंट में सबसे महान व्यक्ति विवेकानंद हैं। उनका भाषण सुन लेने पर, अनायास, यह प्रश्न उठ खड़ा होता है कि ऐसे ज्ञानी देश को सुधारने के लिए मत प्रचारक भेजने की बात कितनी बेवकूफी की बात है।'

शिकागो सम्मेलन से उत्साहित होकर स्वामी जी अमरीका और इंग्लैंड में तीन साल तक रह गये और इस अवधि में भाषणों, वार्तालापों, लेखों, कविताओं, विवादों और वक्तव्यों के द्वारा उन्होंने हिन्दू धर्म के सार को सारे यूरोप में फैला दिया है। प्राय: डेढ़ सौ वर्ष से ईसाई मत प्रचारक संसार में हिन्दुत्व की जो निंदा फैला रहे थे, उस पर अकेले स्वामी जी के कर्तृत्व ने रोक लगा दी और जब भारतवासियों ने यह सुना कि सारा पश्चिम जगत स्वामी जी के मुख से हिन्दुत्व का आख्यान सुनकर गद्गद् हो रहा है, तब हिन्दू भी अपने धर्म और संस्कृति के गौरव का अनुभव कुछ तीव्रता से करने लगे।

अंग्रेजी पढ़कर बहके हुए हिन्दू बुद्धिजीवियों को समझाना बहुत कठिन कार्य था। किंतु जब उन्होंने देखा कि स्वयं यूरोप और अमरीका के नर-नारी स्वामी जी के शिष्य बनकर हिन्दुत्व की सेवा में लगते जा रहे हैं, तब उनके भीतर भी ग्लानि की भावना जगी और बकवास छोड़कर वे भी स्थिर होने लगे। इस प्रकार, हिन्दुत्व को लीलने के लिए अंग्रेजी भाषा, ईसाई मत और यूरोपीय बुद्धिवाद के रूप में जो तूफान उठा था, वह स्वामी विवेकानंद के हिमालय जैसे विशाल वक्ष से टकराकर लौट गया।

यूरोप और अमरीका को निवृत्ति की शिक्षा

स्वामी जी की व्यावहारिकता यह थी कि यूरोप तथा अमरीका को उन्होंने संयम और त्याग का महत्व समझाया, किंतु भारतवासियों का ध्यान उन्होंने भारतीय समाज की आर्थिक दुरावस्था की ओर आकृष्ट किया एवं धर्म को उनके सामने ऐसा बनाकर रखा, जिससे मनुष्य की अधिभौतिक उन्नति में कोई बाधा नहीं पड़े। यूरोपीय सभ्यता के जो दोष हैं, वे उनकी आंखों से ओझल नहीं रहे। बोस्टन में दिये गये अपने एक भाषण में स्वामी जी ने इन दोषों का ऐसा पर्दाफाश किया कि वहां की जनता उनसे रुष्ट हो गयी। फिर भी, स्वामी जी ने अमरीकी और यूरोपीय लोगों को उनकी सभ्यता का दोष दिखाना बंद नहीं किया। यूरोप और अमरीका में जो जातीय अहंकार है, स्वार्थ साधन और विलासिता के लिए जो पारस्परिक होड़ है, धर्म और संस्कृति के मामले में वहां जो भयानक असहिष्णुता है, गरीबों के आर्थिक शोषण का जो विकराल भाव तथा राजनीतिक चालबाजियां और हिंसा के जो उद्वेग हैं, उन्हें स्वामी जी यूरोपीय सभ्यता के पाप कहते थे और पश्चिमी देशों के श्रोताओं के सामने वे इनका खुलकर उल्लेख करते थे। व्यक्ति और समाज, दोनों की रक्षा और शांति के लिए स्वामी जी धर्म को आवश्यक मानते थे, अतएव यूरोप को धर्म से विमुख होते देखकर उन्हें चिंता हुई। उनका विचार था कि धर्महीन सभ्यता निरी पशुता का उज्ज्वल रूप है तथा उसका विनाश उसी प्रकार अवश्यंभावी है, जैसे अतीत के अनेक साम्राज्य विनष्ट हुए हैं। उन्होंने कई बार यह चेतावनी दी कि आध्यात्मिकता को अनादृत करके यूरोप उस ज्वालामुखी के मुख पर बैठ गया है जो किसी भी क्षण विस्फोट कर सकता है।

रूढ़ियों, आडम्बरों और बाह्याचारों से ऊपर उठकर स्वामी जी ने धर्म की विलक्षण व्याख्या प्रस्तुत की। ʅधर्म मनुष्य के भीतर निहित देवत्व का विकास है।' ʅधर्म न तो पुस्तकों में है, न धार्मिक सिद्धान्तों में। वह केवल अनुभूति में निवास करता है।ʆ ʅधर्म अन्ध-विश्वास नहीं है, धर्म अलौकिकता में नहीं है, वह जीवन का अत्यंत स्वाभाविक तत्व है।ʆ मनुष्य में पूर्णता की इच्छा है, अनंत जीवन की कामना है, ज्ञान और आनंद प्राप्त करने की चाह है। पूर्णता, ज्ञान और आनंद, ये निचले स्तर पर नहीं हैं, उनकी खोज जीवन के उच्च स्तर पर की जानी चाहिए। जहां ऊंचा स्तर आता है, वहीं धर्म का आरंभ होता है। जीवन का स्तर जहां हीन है, इंद्रियों का आनंद वहीं अत्यंत प्रखर होता है। खाने में जो उत्साह भेड़िये और कुत्ते दिखाते हैं, वह उत्साह भोजन के समय मनुष्य में नहीं दिखायी देता। कुत्तों और भेड़ियों का सारा आनंद उनकी इन्द्रियों में केन्द्रित होता है। इसी प्रकार, सभी देशों के निचले स्तर के मनुष्य इंद्रियों के आनंद में अत्यंत उत्साह दिखाते हैं। किंतु, जो सच्चे अर्थों में शिक्षित और सुसंस्कृत व्यक्ति हैं, उनके आनंद का आधार विचार और कला होती है, दर्शन और विज्ञान होता है। किंतु, आध्यात्मिकता तो और भी ऊंचे स्तर की चीज है, अतएव इस स्तर का आनंद भी अत्यंत सूक्ष्म और प्रचुर होता है। अतएव, मनुष्य को चाहिए कि पहले वह पवित्रता, भक्ति, विनयशीलता, सच्चाई, नि:स्वार्थता और प्रेम का विकास करे तथा बाद को अन्य गुणों का।
(साभार:संस्कृति के चार अध्याय)

वे विश्व गुरु थे : नरेन्द्र कोहली



वे विश्व गुरु थे : नरेन्द्र कोहली
तारीख:19/jan/2013

स्वामी विवेकानन्द अथवा बालक नरेन्द्रनाथ दत्त को, उनके माता-  पिता ने काशी-स्थित वीरेश्वर महादेव की पूजा कर प्राप्त किया था। नरेन्द्र के शैशव का दृश्य है कि तीन वर्ष की अवस्था में, वे खेल ही खेल में हाथ में चाकू ले कर, अपने घर के आंगन में उत्पात मचा रहे थे। इसको मार दूं। उसको मार दूं। दो-दो नौकरानियां उनको पकड़ने का प्रयत्न कर रही थीं। और पकड़ नहीं पा रही थीं। अंतत: माता भुवनेश्वरी देवी ने नौकरानियों को असमर्थ मान कर परे हटाया और पुत्र को बांह से पकड़ लिया। स्नानागार में ले जाकर उसके सिर पर लोटे से जल उड़ेला और उच्चारण किया, शिव- शिव। बालक शांत हो गया। उत्पात का शमन हो गया। उस समय तक वे विचारक नहीं थे, साधक नहीं थे, संत नहीं थे, किंतु वे वीरेश्वर महादेव के भेजे हुए थे। उस समय ही नहीं, आजीवन ही वे जब-तब आकाश की ओर देखते थे और उनके मुख से उच्चरित होता था- शिव- शिव। परिणामत: उनका मन शांत हो जाता था। पेरिस की सड़कों पर घूमते हुए भीड़ और पाश्चात्य संस्कृति की भयावहता से परेशान हो जाते थे, तो जेब से शीशी निकाल कर गंगा जल की कुछ बूंदें पी लेते थे। उससे वे हिमालय की शांति और हहराती गंगा के प्रवाह का अनुभव करते थे। स्वामी विवेकानन्द की मान्यता थी कि ज्ञान बाहर से नहीं आता। ज्ञान हमारे भीतर ही होता है। आजीवन उसी सुप्त ज्ञान का विकास होता है। इस प्रकार जन्म के समय नवजात शिशु के भीतर जो संस्कार होते हैं, वे ही उसके भावी व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं।
कौन सा भूत ?   

किंतु यह तो उनके शैशव की घटना है। बालक के शांत हो जाने पर मां भुवनेश्री देवी ने मंदिर में जाकर महादेव शिव के सम्मुख माथा टेक दिया, 'हे प्रभु तुम से एक पुत्र मांगा था। तुमने अपना यह कौन सा भूत भेज दिया है।' नरेन्द्र, धर्म और ईश्वर की ओर बढ़ते ही चले गए। सोने से पहले ध्यान करते थे और उन्हें ज्योति-दर्शन होता था। वह उनके लिए इतना स्वाभाविक था कि जिस समय रामकृष्ण परमहंस ने उनसे पूछा कि क्या उन्हें ज्योति-दर्शन होता है? तो नरेन्द्र ने चकित होकर पूछा था, क्या अन्य लोगों को नहीं होता? तब तक वे यही मानते आ रहे थे कि सोने से पहले सबको ही ज्योति-दर्शन होता है। वह मनुष्य के जीवन की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है।

 वे ब्राह्म-समाज में जाते थे। भजन-कीर्तन करते थे। ब्राह्म-समाज के नियमों के ही अनुसार, मूर्ति-पूजा में उनका विश्वास नहीं था। संसार के सारे ही माता-पिता चाहते हैं कि उनकी संतानें धार्मिक और ईश्वर-भीरु हों। वे सद्गुरु हों, मंदिर जाएं, पूजा-पाठ करें और सद्गृहस्थ बनें। किंतु नरेन्द्र निरंतर धर्म और ईश्वर की ओर बढ़ते जा रहे थे। सद्गृहस्थ बनने के स्थान पर संन्यासी बनने की दिशा में बढ़ रहे थे। माता-पिता को लगा कि ऐसे तो पुत्र हाथ से ही निकल जाएगा। हाथ में रखने का एक ही उपाय था कि उसका विवाह कर दिया जाए किंतु नरेन्द्र विवाह के लिए तैयार नहीं थे। बहुत प्रयत्न के पश्चात् भी जब माता-पिता सफल नहीं हुए तो उन्होंने रामचंद्र दत्त नाम के, नरेन्द्र के एक मामा से कहा, तुम्हारी बात शायद मान जाए। उसे जरा समझा दो। रामचंद्र दत्त ने नरेन्द्र को पकड़ लिया, क्यों रे, विवाह क्यों नहीं करना चाहता? क्योंकि मैं ईश्वर को खोज रहा हूं, पत्नी को नहीं। नरेन्द्र का उत्तर था। नरेन्द्र सचमुच ईश्वर को खोज रहे थे। यह खोज इतनी प्रबल थी कि उसके सम्मुख संसार कुछ भी नहीं था।

रामचंद्र दत्त ने विवाह का आग्रह छोड़ दिया। वे नरेन्द्र से सहमत हो गए। बोले, ईश्वर को खोजना है तो फिर इधर-उधर कहां भटक रहा है। ... जाकर ठाकुर के चरण पकड़ ले।

नरेन्द्र बहुत सारे संशयों में घिरे, ठाकुर के पास आए और उनके निकट जाकर पूछा, आपने ईश्वर को देखा है? हां। उत्तर मिला, देखा है और तुम्हें भी दिखाऊंगा।
... तो कष्ट पाएगा ही

 नरेन्द्र मानते थे कि यदि ईश्वर है तो उसे देखा भी जा सकता है। यदि ईश्वर है, तो उससे बातें भी की जा सकती हैं। यदि ईश्वर है, तो उसके साथ वैसे ही व्यवहार भी किया जा सकता है, जैसे सामान्य लोगों के साथ किया जाता है। केवल यह मान लेना कि ईश्वर है और उसे प्राप्त करने का प्रयत्न न करना, सर्वथा अनुचित है।

वे अभी अपने गुरु के पास पहुंचे ही हैं। वहां पहुंच गए हैं किंतु अभी न तो मूर्तिपूजा करते हैं, न मां काली को प्रणाम करते हैं। उनके गुरु-भाई ब्रह्मानन्द, मां काली को प्रणाम करते हैं तो नरेन्द्र उन्हें डांटते हैं। उन दोनों ने एक साथ ही ब्राह्म-समाज के शपथ पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। विचित्र स्थिति है, जिन्हें गुरु मान रहे हैं, उनका विरोध भी कर रहे हैं। उनकी आराध्या के सम्मुख झुकते नहीं। उन्हें प्रणाम नहीं करते। एक दिन रुष्ट होकर गुरु डांट देते हैं, जब तुझे मेरी बात नहीं माननी तो मेरे पास क्या करने आता है ? नरेन्द्र का उत्तर था, आपसे प्रेम करता हूं, इसलिए आता हूं। क्या आवश्यक है कि आपकी बात भी मानूं? अर्थात् प्रेम आवश्यक है, आज्ञापालन नहीं। किंतु प्रेम ही आज्ञा पालन भी सिखा देता है। वह समय भी आया।

पिता का देहांत हो गया। घर में निर्धनता आ गई। नरेन्द्र अपनी माता और दो छोटे भाइयों के भरण-पोषण के लिए चिंतित हैं। कोई आजीविका ढूंढ़ रहे हैं। गुरु से भी चर्चा करते हैं। गुरु कहते हैं, तू सब को छोड़ कर मेरे पास आ जा। किंतु नरेन्द्र कैसे आ जाएं। गुरु से कहते हैं, अपनी मां से कहिए कि वे मेरी मां और भाइयों के भरण-पोषण का प्रबंध कर दें। गुरु का उत्तर है, तू जिसके राज्य में रहता है, अर्थात् मां काली की सृष्टि में, उस मां को ही स्वीकार नहीं करता, तो कष्ट तो पाएगा ही। अत: तुझे भी शेष लोगों के समान ही व्यवहार करना पड़ेगा। मां के मंदिर में जा। मैं तुझे वचन देता हूं कि वहां जो कुछ मांगेगा, वह तुझे मिलेगा। नरेन्द्र पहली बार मां के मंदिर में गए। उस समय के उनके अनुभव के विषय में जो वर्णन हमें मिलता है, उसके अनुसार वहां उन्हें मां की जीवन्त उपस्थिति का अनुभव हुआ। मां ने कहा, मांग, क्या चाहिए तुझे। नरेन्द्र ने कहा, मां, भक्ति दो, विवेक दो, वैराग्य दो। लौट कर गुरु के पास आए तो गुरु ने पूछा, क्यों रे, मां से मांग आया अपने परिवार के लिए रोटी, कपड़ा और मकान? नरेन्द्र ने सत्य बता दिया। गुरु ने डपट दिया, यदि तू ही नहीं मांगेगा, तो फिर तेरे लिए कौन मांगेगा? इस प्रक्रिया की तीन बार आवृत्ति की गई और नरेन्द्र ने हर बार भक्ति, विवेक और वैराग्य की ही मांग की। अंत में गुरु के डांटने पर वे भी बिफर गए  समुद्र के सम्मुख जाकर कोई कटोरा भर पानी मांगता है क्या? संसार की स्रष्टा के सम्मुख जा कर मैं कद्दू-कोंहड़ा मांगूंगा? अंतत: गुरु ने ही वचन दिया कि उनके परिवार को मोटे कपड़े और मोटे अन्न का अभाव नहीं रहेगा।
अद्वैत का अनुभव

अब वे मूर्तिपूजा का विरोध नहीं करते। अलवर में राजा मंगलसिंह के सामने मूर्तिपूजा के पक्ष में तर्क भी देते हैं। किंतु लाहौर में लोगों के बहुत आग्रह पर भी वे सनातन धर्म और आर्य समाज के झमेले में नहीं पड़ते, क्योंकि वे समाज को विभाजित करना नहीं चाहते। यह ध्यातव्य है कि आरंभ में मूर्तिपूजक गुरु को स्वीकार कर भी वे मूर्तिपूजा का विरोध करते हैं। और जब वही गुरु उन्हें अष्टावक्र संहिता के माध्यम से अद्वैत की शिक्षा देते हैं तो अपनी ब्राह्म-समाजी मान्यताओं के कारण उसका भी उपहास करते हैं। गुरु को ज्ञात हो जाता है तो वे अर्द्ध समाधि की अवस्था में नरेन्द्र को छू देते हैं और नरेन्द्र देखते हैं कि सड़क पर चलने वाले तांगे में जुते घोड़े और स्वयं उनमें कोई अंतर नहीं है। थाली में परोसे गए भात और स्वयं उनमें कोई अंतर नहीं है। गुरु ने उन्हें अद्वैत का साक्षात् अनुभव दे दिया था। यह भी कहा था, जिसे तू ब्रह्म कहता है, उसे ही मैं मां कहता हूं। वह निष्क्रियता की स्थिति में ब्रह्म है और सक्रिय होते ही वह मां काली, जगदंबा अथवा प्रकृति का रूप धारण कर लेता है।

गुरु के देहांत के पश्चात् उनके सारे गुरुभाई बिखर गए। वे लोग अपने-अपने घरों को लौट गए। आखिर तो वे स्कूल-कालेजों के छात्र ही थे। नरेन्द्र को गुरु का आदेश था कि वे अपने गुरु भाइयों को संभाल कर रखें। नरेन्द्र उन लोगों को समझाने के लिए उनके घरों में जाते थे, जहां उनका तिरस्कार ही होता था। कहीं कपाट बंद हो जाते थे। कहीं मिलने से इंकार कर दिया जाता था। कहीं अपशब्द कहे गए। वे विभिन्न प्रकार के अपमानजनक व्यवहारों का सामना कर रहे थे। माता भुवनेश्वरी देवी, पुत्र के निरंतर अपमान की पीड़ा से रो पड़ीं, नरेन्द्र, तू इस तिरस्कार और अपमान को क्यों सहन कर रहा है? क्यों जाता है तू उनके घर? नरेन्द्र हंस पड़े, मां, मेरी माया मर चुकी है। व्यक्ति का मान क्या और अपमान क्या? मानापमान होता है देश का, संस्कृति का, धर्म का। यह उन्होंने कहा ही नहीं, अपने जीवन में कर के भी दिखाया। जहां अपने लिए बड़े से बड़े अपमान को चुपचाप पी गए, वहीं अपने देश और धर्म की अवमानना से बिफर उठे और कठोर से कठोर कदम उठाने को तत्पर दिखाई दिए। अमरीका में उन्होंने कहा था, हिंद महासागर के तल में जितना कीचड़ है, यदि वह सारा का सारा भी अंग्रेजों के मुंह पर मल दिया जाए तो ज्यादती नहीं होगी, क्योंकि उन्होंने उससे भी अधिक मेरी मां को कलंकित किया है।
उनकी भाषा नीति

आज भी बहुत सारे लोग पूछ सकते हैं और मेरे मन में भी यह प्रश्न था कि स्वामी विवेकानन्द ने इतना कुछ सोचा, कहा और किया, किंतु देश की स्वतंत्रता के विषय में उन्होंने क्या किया?

स्वामी जी कहते थे जिस दिन तुम अपने चरित्र को उस ऊंचाई पर ले जाओगे, जहां वह था, जब स्वस्थ हो जाओगे, स्वयं में स्थित हो जाओगे, आध्यात्मिक रूप से उतने ही सात्विक हो जाओगे, जितने कभी तुम थे, तो फिर किसी का साहस नहीं होगा कि बाहर से आकर इस देश पर शासन कर सके।

यह जो विश्वास है कि यदि हम अपने चरित्र को सुधार लेंगे, तो कोई विदेशी हमारे देश में शासक के रूप में घुस नहीं पाएगा, यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। हम अपने चरित्र को सुधारें, उसको निर्मल करें। ईश्वर को प्राप्त करने का एक ही मार्ग है और वही देश की स्वतंत्रता का मार्ग है। वह है सात्विकता का मार्ग। हम देख रहे हैं कि स्वतंत्र होकर भी हम स्वतंत्र नहीं हो पाए, क्योंकि हम अपने चरित्र को स्वच्छ नहीं कर पाए।

नरेन्द्र सातवीं-आठवीं कक्षा में पढ़ रहे थे कि विद्यालय में अंग्रेजी पढ़ने के लिए उन्हें चुना गया। वे रो पड़े, जब उनसे पूछा गया कि भई, तुम अंग्रेजी क्यों नहीं पढ़ना चाहते, तो उनका उत्तर था कि क्या मैंने बंगला पढ़ ली, क्या मैंने संस्कृत पढ़ ली कि मैं अंग्रेजी पढ़ने लगूं?

1902 ई. में जब कांग्रेस का अधिवेशन कोलकाता में हुआ, तो बंगाल के बाहर के कुछ प्रतिनिधि स्वामी जी से मिलने के लिए गए। उन्होंने अपना वार्तालाप अंग्रेजी में आरंभ किया तो स्वामी जी ने उन्हें रोक दिया। उन्होंने कहा कि यदि बंगला नहीं बोल सकते, तो हिंदी बोलो। भारत की भाषा हिंदी है। स्वामी विवेकानन्द की भाषा-नीति कुछ इस प्रकार की थी कि पहले मातृभाषा, फिर हिंदी, हिंदी नहीं आती तो संस्कृत और यदि संस्कृत भी नहीं आती तो अंग्रेजी। अंग्रेजी का स्थान, भारत की तीन भाषाओं के पश्चात् है। विद्यालय में पढ़ने वाले बालक के मन में राष्ट्रीयता का यह भाव था। उसकी ओर ध्यान दिया जाए तो समझ में आता है कि उनका चरित्र क्या था।

कन्याकुमारी की घटना उनके जीवन की एक प्रसिद्ध घटना है, जो उनकी जीवनी में बहुत महत्वपूर्ण ढंग से आती है। वे समुद्र में तैर कर श्रीपाद शिला तक पहुंचे थे। उन्होंने वहां तीन दिन और तीन रातें व्यतीत कीं। कहा जाता है कि वहां उनका अधिकांश समय समाधि में बीता। समाधि की अवस्था में उन्होंने जो कुछ देखा और अनुभव किया, वह या तो वे जानते हैं या फिर ईश्वर। हम तो वह ही जानते हैं, जो कुछ उन्होंने हमें बताया। उन्होंने बताया कि उन्होंने देखा कि जगदंबा और भारतमाता में कोई अंतर नहीं है। जगदंबा की पूजा और भारतमाता की पूजा में कोई अंतर नहीं है। भारत माता की सेवा ही जगदंबा की सेवा है। इससे हम उनकी राष्ट्रीय भावना को समझ सकते हैं। उनकी भाषा नीति भी उसी का अंग है।
ये पैसा लौटा दीजिए

विदेश जाने से पूर्व स्वामी जी एक अज्ञात परिव्राजक के रूप में सारे देश में घूम रहे थे और लोगों से विभिन्न प्रकार की चर्चा कर रहे थे।  स्वामी जी के शिष्यों ने उन्हें अमरीका जाने को प्रेरित किया, किंतु उनमें से किसी के पास भी धर्म-संसद में भाग लेने का निमंत्रण नहीं था। यह सूचना भी किसी को नहीं थी कि उसकी तिथि क्या है, उसमें प्रवेश की शर्ते क्या हैं, विधि क्या है, उसका आयोजन कौन कर रहा है, कहां जाना है, किससे संपर्क करना है, किसी को कुछ भी पता नहीं था। लोगों ने उनके अमरीका जाने के लिए कुछ धन भी एकत्रित कर लिया था। किंतु स्वामी जी का मन नहीं माना। उन्होंने कहा कि इस देश के ये धनी-मानी लोग, राजा-महाराजा, इनमें से किसी के भी मन में निर्धन असहायों के लिए करुणा नहीं है। यह धन भी धर्म का नहीं, अधर्म का है। ये पैसे लौटा दीजिए। मैं इस पैसे से अमरीका जाना नहीं चाहता। अधर्म के पैसे से धर्म कमाने के लिए नहीं जाऊंगा। किंतु राजा अजितसिंह के लिए उनकी मान्यता कुछ और ही थी। स्वामी ने स्वयं कहा था कि अजितसिंह और मैं एक आत्मा और दो शरीर हैं। यदि अजितसिंह न होते तो जितना काम मैंने किया है, उसका आधा भी नहीं कर पाता। एक अजितसिंह ही हैं, जिनका धन मैं मांग सकता हूं, उसका उपयोग कर सकता हूं। परिणामत: उन्होंने राजा अजितसिंह के धन से ही अमरीका की यात्रा की। वे आवश्यक सूचनाओं के बिना ही अमरीका जा पहुंचे थे।

धर्म संसद में तीन बार नाम पुकारे जाने पर स्वामी जी बोलने के लिए उठे। पहले दिन उन्होंने केवल अपना परिचय दिया। कहा, मैं उस देश से आया हूं, जहां यह माना जाता है कि जैसे किसी भी उद्गम से आरंभ होकर और किसी भी मार्ग से चल कर संसार की सारी नदियां समुद्र में ही समाती हैं, वैसे ही  हे प्रभु, कोई किसी भी प्रकार के उलटे-सीधे, टेढ़े-मेढ़े मार्ग से उपासना करे, अंतत: वह तेरे ही चरणों में पहुंचता है। मैं उस धर्म का प्रतिनिधि हूं, बौद्ध धर्म जिसका एक अंग मात्र है। मैं उस देश से आया हूं, जिसने यहूदियों को उनके संकट में आश्रय दिया। हमने पारसियों को नष्ट होने से बचा ही नहीं लिया, उनका पोषण भी किया। मैं उस देश का नागरिक होने पर गर्व करता हूं।

यह उनका ढाई मिनट में दिया गया, आत्म-परिचय मात्र था। उनका मुख्य भाषण उस दिन नहीं था। वह हिंदू धर्म पर एक निबंध था, जिस में उन्होंने हिंदू धर्म का परिचय दिया था। हिंदू धर्म का स्वरूप क्या है, हिंदू होने का अर्थ क्या है। किसी एक ग्रंथ, किसी एक मूर्ति, अथवा किसी एक व्यक्ति पर ईमान ले आना हिंदू होना नहीं है। हिंदू यह नहीं कहता कि केवल उसी का उद्धार होगा, केवल वही ईश्वर को प्राप्त करेगा। हम मानते हैं कि कोई भी व्यक्ति जो अपने ढंग से उपासना करता हुआ, अपना विकास करता हुआ, मानवता की सेवा करता हुआ, सात्विक और निर्मल होता हुआ अपना जीवन व्यतीत करता है, अंतत: ईश्वर को प्राप्त करता है। हिंदू होने का अर्थ है, निरंतर ईश्वर को जानने का प्रयत्न करना, उसके निकट जाने का प्रयत्न करना, उसके समान होने का प्रयत्न करना और अंतत: वही हो जाना। इस प्रकार का निरंतर संघर्ष हिंदू की उपासना है।

पहले ही दिन उस धर्म-संसद में जो कुछ हुआ, वह आप जानते हैं। स्वामी जी ने वहां संबोधन करते हुए कहा, 'माई अमेरिकन ब्रदर्स एण्ड सिस्टर्स' और श्रोताओं ने न केवल तालियां बजा कर अपनी प्रसन्नता प्रकट की, वे एक प्रकार के आवेश में पागल हो कर तालियां बजाते ही चले गए।
व्यक्ति की साधना

अमरीकियों ने किसी वक्ता के मुख से कभी 'ब्रदर्स एण्ड सिस्टर्स' संबोधन नहीं सुना था, इसलिए उन्होंने इतनी तालियां बजाईं। मुझे नहीं लगता कि यह ठीक विश्लेषण है। वहां जो लोग उपस्थित थे, उन्होंने बताया है कि स्वामी जी के बोलते ही जैसे उनके शरीर में विद्युत की एक धारा प्रवाहित हो गई। शरीर के रोंगटे खड़े हो गए। उसका कारण स्वामी जी के शब्द नहीं, उनकी साधना थी। शब्द तो साधारण ही होते हैं किंतु उनका प्रयोग करने वाले व्यक्ति की साधना उन्हें असाधारण बना देती है। यह तो स्वामी जी की साधना का प्रभाव था कि लोग उनका संबोधन सुनते ही इस प्रकार अपना आपा खो बैठे। पहली बार ऐसा हुआ कि ईसाई पादरी उनको जो कुछ पढ़ाया करते थे, उससे कुछ भिन्न घटना घटी। अध्यात्म का वास्तविक रूप उनके सामने आया। उस अनुभूति से ही लोग उत्फुल्ल हो उठे थे। अध्यात्म के इसी रूप को स्वामी जी ने निरंतर विकसित किया।

स्वामी विवेकानन्द के संदर्भ में शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं। वे चरम कोटि के 'महत्वाकांक्षी' थे और अपने देश को तथा देश के युवाओं को भी 'महत्वाकांक्षी' बनाना चाहते थे। किंतु उनके संदर्भ में महत्वाकांक्षा का अर्थ अपने महत्व की आकांक्षा न होकर, 'महत् आकांक्षा' हो जाता है। अपने महत्व की आकांक्षा तो एक तुच्छ लक्ष्य है। वे चाहते थे कि देश के युवा, ऊंचे स्वप्न देखें, महान् कार्य करें, अपनी तुच्छताओं से ऊपर उठें, अपने बंधन तोड़ें। विराटता की ओर बढ़ें, अपनी दिव्यता को पहचानें। जिस व्यक्ति के रूप की प्रशंसा विश्व भर में होती रही और जिसको देख कर अमरीकी सुंदरियां पागलों के समान उसकी ओर उमड़ पड़ीं, उस व्यक्ति का कभी विवाह नहीं हुआ। हुआ नहीं, या किया नहीं? अपने मामा को तो उन्होंने कहा ही था कि वे ईश्वर को खोज रहे थे, पत्नी को नहीं।--- एक अन्य अवसर पर उन्होंने कहा, मैंने जन्म इसलिए नहीं लिया कि विवाह कर बच्चे पैदा करूं और कोई छोटी-मोटी नौकरी कर, उनका पेट पालूं। मैं कुछ और करने के लिए आया हूं। जिस व्यक्ति के लिए हार्वर्ड विश्वविद्यालय के ग्रीक भाषा के अध्यापक और पुरातत्ववेत्ता प्रो. जॉन हैनरी राइट ने लिख कर दिया कि मैं उस विद्वान को आपके पास भेज रहा हूं, जो अमरीका के सारे विद्वानों को मिला कर उनसे बड़ा विद्वान है, उसको एक साधारण-सी नौकरी नहीं मिली। मिली नहीं या की नहीं? जब हार्वर्ड विश्वविद्यालय ने उनके लिए आजीवन प्राच्य दर्शन की पीठ का पद प्रस्तावित किया तो उन्होंने उसको यह कह कर तिरस्कृत कर दिया कि संन्यासी को संसार का कोई पद नहीं चाहिए। वे स्वभाव से जन्मजात शिक्षक थे, किंतु उस क्षमता का उपयोग किसी एक संस्था में नौकरी के लिए न कर, वे संसार को शिक्षा देने में कर रहे थे। वस्तुत: वे विश्व-गुरु थे।

उन्नत राष्ट्र का संकल्प लें - मोहनराव भागवत, सरसंघचालक, रा.स्व.संघ





भारतीय स्वाभिमान और शौर्य का उदघोष
   
१० मार्च २०१३ पाञ्चजन्य 
           
स्वामी विवेकानंद सार्द्धशती समारोह का भव्य उद्घाटन उन्नत राष्ट्र का संकल्प लें -मोहनराव भागवत, सरसंघचालक, रा.स्व.संघ

'किसी भी राष्ट्र, समाज, व्यक्ति की उन्नति जिन तत्वों के कारण होती है, सारी दुनिया की उन्नति जिन तत्वों के कारण होती है उन्हीं बातों को स्वामी विवेकानंद ने भी कहा। उसी सनातन धर्म को उन्होंने 11 सितंबर, 1893 को शिकागो में भी कहा। वह तो जीवनभर कहते रहे कि ईश्वर प्रेम स्वरूप है। सारी दुनिया को प्रेम करना सीखो। वे कहते थे ʅइस प्रकार अपने आत्मीयता के दायरे का विस्तार ही जीवन हैʆ। हम संकुचित हो रहे हैं, हम अपने स्वार्थ में फंस रहे हैं। मैं, अधिक से अधिक मेरा परिवार, इससे आगे हम जाते ही नहीं हैं। हमें इससे बाहर निकलना होगाʆ। उक्त उद्गार रा.स्व.संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने गत 11 जनवरी को नई दिल्ली स्थित सीरीफोर्ट सभागार में स्वामी विवेकानंद सार्द्धशती समारोह समिति के तत्वावधान में आयोजित स्वामी विवेकानंद सार्द्धशती समारोह के उद्घाटन कार्यक्रम को संबोधित करते हुए व्यक्त किये। वे कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता समिति की अध्यक्षा प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु माता अमृतानंदमयी ने की। मंच पर समिति के मानद अध्यक्ष डा. सुभाष चंद्र कश्यप, सचिव श्री अनिरुद्ध देशपांडे, गायत्री परिवार के प्रमुख डा. प्रणव पंड्या, चिन्मय मिशन के स्वामी निखिलानंद, जैन संत लोकेश मुनि, स्वामी ऋतंभरानंद, राष्ट्र सेविका समिति की निवर्तमान प्रमुख संचालिका सुश्री प्रमिला ताई मेढ़े, विवेकानंद केन्द्र के अध्यक्ष श्री पी. परमेश्वरन् एवं अक्षरधाम मंदिर, दिल्ली के न्यासी श्री जयेश भी आसीन थे।  

श्री भागवत ने अपने सारगर्भित उद्बोधन में कहा कि स्वामी विवेकानंद सार्द्धशती समारोह के आयोजन में रा.स्व.संघ तो है ही, क्योंकि स्वामी विवेकानंद की जो दृष्टि है अपने देश के भविष्यकालीन चित्र के बारे में, उसी को लेकर संघ काम करता है। राष्ट्र के नवोत्थान के लिए 1857 के बाद जिन-जिन धाराओं में से प्रामाणिक और निस्वार्थ बुद्धि से जिस किसी भी प्रकार के प्रयास हुये उन सबके मूल में भारत की सनातन धरोहर है। अध्यात्म और उस पर आधारित धर्म को जानने वाले, उसको चरितार्थ करने वाले स्वामी रामकृष्ण परमहंस जैसे साक्षात्कारी महापुरुष के दिग्विजयी शिष्य स्वामी विवेकानंद हुये। यह आध्यात्मिक जागरण अपने भारत की उन्नति में एवं संकट से भारत के बाहर निकलने में सदैव गति देने वाला प्रेरक प्रसंग है।

ʅस्वयं के लिए जीना मृत्यु है, दूसरों के लिए जीना ही जीना हैʆ। स्वामी विवेकानंद द्वारा कहे गये इन शब्दों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि स्वामी रामकृष्ण परमहंस से स्वामी विवेकानंद को जो दृष्टि मिली वह उन्होंने सारी दुनिया को दी। स्वामी जी ने कहा, ʅदीन, हीन, अज्ञानी तुम्हारे बांधव हैं, यही तुम्हारे भगवान हैं। आने वाले 50 वर्ष तक सारे देवी-देवताओं को भूलकर मातृभूमि के अपने इन बांधवांे की उनमें भगवान देखकर सेवा करोʆ। श्री भागवत ने कहा कि हम स्वामीजी की बातों को पढ़ते हैं, सुनते हैं लेकिन अब इनको प्रामाणिकता से, निस्वार्थ बुद्धि से करने में लग जायें।

श्री भागवत ने कहा कि आज मुंह में कुछ और करने में कुछ, ऐसा जो चलता है उससे बाहर निकलना पड़ेगा। अपने लाभ के लिए नहीं, अपनी साख के लिए जीना पड़ेगा। एक इंजीनियर मित्र है, सरकारी नौकरी में है। उसने कहा कि रिश्वत लेने के लिए मुझ पर बहुत दबाव आ रहा है, पर मेरा मन नहीं है, लेकिन दबाव है। उसने कहा कि मैं रिश्वत के पैसे लेकर दान कर दूंगा मैं स्वयं नहीं लूंगा। मैंने उससे कहा कि तुम साख के लिए स्वयंसेवक हो, साख के लिए जियो। उसने रिश्वत नहीं लेने का प्रयास किया, पर ज्यादा दिन तक ऐसा नहीं चल सका तब उसने नौकरी छोड़ दी। इसके बाद अपना व्यवसाय शुरू किया, आज भी कर रहा है, ठीक कर रहा है। उन्होंने कहा कि अगर हमने माना है कि रिश्वत नहीं लेना ठीक है तो उस पर डटे रहने की हमारी प्रामाणिकता चाहिए। और अगर यह ठीक है तो यह हमारे जीवन में रहे इसकी प्रामाणिकता चाहिए।

स्वामीजी ने कहा, ʅगीता नहीं पढ़ोगे तो चलेगा, लेकिन फुटबाल खेलोʆ। भगवा पहने एक भारतीय संन्यासी कहता है, गीता नहीं पढ़ोगे तो चलेगा, फुटबाल खेलो। हमें लोहे के, फौलाद के बाजू चाहिए। उतना मजबूत हृदय चाहिए, उतनी ही मजबूत मज्जाएं चाहिएं। शक्ति की आराधना हमको करनी होगी, यह शक्ति संगठन में होती है। आपस के भेदों को भूल जाओ और भेदों को भूलने के लिए स्वत्व को याद करो। अपने स्व के गौरव पर जो खड़ा नहीं हो सकता वह दुनिया में किसी प्रतिष्ठा की सुरक्षा के लायक नहीं रहता। जो खुदी को लजाएगा वह नीची गर्दन रखकर हमेशा दूसरों की गुलामी करता रहेगा। तुम्हारे पूर्वजों ने कोई रणगौरव, धनगौरव प्राप्त नहीं किया, लेकिन सारी दुनिया को ऐसा गौरवपूर्ण जीवन दिया है।

श्री भागवत ने कहा कि आज भी भारत का व्यक्ति जब दूर देश में जाता है तो वह भारत का है इसलिए वहां के निवासी उससे आदरपूर्वक व्यवहार करते हैं। सनातन ज्ञान की दुनिया को आवश्यकता है। वह तुम्हारा धर्म नहीं है, वह तुम्हारे पास पाथेय रखा है। तुम उसके विश्वस्त हो, समय-समय पर दुनिया को देना है। वह सबके लिए है तुम उसके रखवाले हो, उसके अधिकारी बनकर तुम खड़े रहो, उसका गौरव मन में धारण करके तुम खड़े रहो, उस पर पूर्ण श्रद्धा रखकर खड़े रहो। अपनी मातृभूमि, उसका जल, जंगल, जानवर, परम्परा, संस्कृति, इतिहास को रचने वाले पूर्वजों का गौरव मन में धारण करके सीना तानकर खड़े हो जाओ। ऐसे खड़े होकर सेवा करो, समाज को ऐसे खड़ा करो। इसमें बुद्धि का भाव कम है लेकिन कृतार्थता ऐसे ही आती है।

श्री भागवत ने कहा कि दुनिया के कल्याण के लिए भारत के खड़े होने का अभियान स्वतंत्रता के साथ पूर्ण नहीं हुआ था। स्वतंत्रता के साथ उसका प्रारम्भ बड़ी तेजी के साथ होना था। इसको भूलकर हम बैठ गये। हम आराम में लग गये। फिर हम विलास में फंस गये, फिर हम भूल गये। इसलिए दिखाई देता है कि दुनिया के साथ हम भी भटक रहे हैं। हम दुनिया के साथ भटकने के लिए नहीं हैं, भटकी हुई दुनिया को रास्ते पर लाने के लिए हैं। इसलिए भारत को बड़ा होना है। स्वामीजी ने कहा, ʅबड़े होकर अन्य लोगों के गले काटने के लिए तुम्हारा बड़ा होना नहीं है। तुम्हारा जन्म परोपकार के लिए है। याद रखो, हे भारत! तुम माता की बलिवेदी पर बलि के लिए बांधे जाने वाले पशु हो। विश्व कल्याण के लिए हलाहल ग्रहण करने वाले शिवशंकर के तुम वंशज हो, उसके लिए तुमको बड़ा होना हैʆ। भारत बड़ा होगा यह भारत का हृदय तब कहेगा जब भारत के बड़ा होने से दुनिया को बड़ा बनने की, एक नई सुखी-सुंदर दुनिया बनाने की नई राह निकलेगी। उस भारत को खड़ा करने के लिए हम स्वामीजी का उनकी सार्द्धशती पर स्मरण कर रहे हैं।

श्री भागवत ने कहा कि उत्सवप्रियता इस समारोह का उद्देश्य नहीं है। वास्तव में इसको गांव-गांव, घर-घर में युवकों के प्रत्येक हृदय में ले जाना है। इसकी बहुत आवश्यकता है, क्योंकि परिस्थितियां अनुकूल हैं। प्रतिकूलताएं भी हैं, लेकिन लोग अनुकूलताएं खोज रहे हैं। उत्तर सबको एक मिलता है कि ऐसा करना पड़ेगा। करना पड़ेगा तो करने वाले लोग चाहिए और इसलिए विगत 25 दिसंबर को संकल्प ग्रहण का कार्यक्रम हुआ। हम उस संकल्प ग्रहण के कार्यक्रम में उपस्थित रहे होंगे तो भी और उपस्थित नहीं रहे होंगे तो भी, एक संकल्प यहां पर लें। चार बातें जो स्वामीजी ने बताई हैं- प्रामाणिकता से, निस्वार्थ बुद्धि से करूंगा, स्वगौरव के पक्के आधार पर खड़ा होकर करूंगा, भय का सम्पूर्ण त्याग करते हुए करने के लिए योग्य बनते हुए वैसी शक्ति अपने अंदर पैदा करते हुए अपने समाज के अंदर पैदा करते हुए करूंगा। उन्होंने कहा कि बहुत से सुझाव मंच से आये हैं और भी हो सकते हैं। अपने से इसका प्रारम्भ करूंगा, जहां हूं वहां से इसकी शुरुआत करूंगा। मैं करूंगा, यह संकल्प लें। अपने समाज को ऐसा समाज नहीं रहने दूंगा। अपने देश को उन्नत अवस्था पर ले जाऊंगा और इन सब बातों का विनियोग होगा दुनिया के कल्याण के लिए। इसलिए मेरे घर में मुझे जो प्रारम्भ करना है वह मैं इसी क्षण से प्रारम्भ करूंगा। मेरा करना और बढ़ सके और उपकारक हो सके, ऐसी शक्ति बढ़ाकर करूंगा और इस देश के स्वत्व को सारी दुनिया में बढ़ाकर करूंगा। यह संकल्प हम सिर्फ सार्द्धशती का अवसर है, इसलिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण जीवन के लिए लें।          

इस अवसर पर माता अमृतानंदमयी ने मलयालम भाषा में दिये अपने उद्बोधन में स्वामी विवेकानंद के अनेक प्रसंग सुनाते हुए युवाओं को संस्कारवान बनाने का आह्वान किया। दिल्ली में 23 वर्षीय युवती से हुये सामूहिक दुष्कर्म को उन्होंने आसुरी कर्म बताया। उन्होंने कहा कि इस तरह के अपराध सिर्फ कठोर कानून होने से नहीं रुक सकते, बल्कि परिवार में बच्चों को संस्कारित करना भी इसके लिए जरूरी है।

डा. प्रणव पंडया ने कहा कि स्वामी विवेकानंद के चिंतन को सभी महापुरुषों ने माना है। युवाओं को जगाना, नेतृत्व देना, यह आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। स्वामी निखिलानंद ने कहा कि स्वामी विवेकानंद के विचारों को पढ़ने के बाद उनके अपने व्यक्तित्व में बहुत परिवर्तन आया। आचार्य लोकेश मुनि ने कहा कि स्वामी विवेकानंद की शिक्षाओं की वर्तमान समय में बहुत आवश्यकता है। श्री पी. परमेश्वरन् ने सार्द्धशती समारोह को ऐतिहासिक आयोजन बताया। कार्यक्रम में रा.स्व.संघ के अ.भा.कार्यकारी मंडल के सदस्य श्री मधुभाई कुलकर्णी, भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष श्री नितिन गडकरी, वरिष्ठ नेता श्री लाल कृष्ण आडवाणी सहित बड़ी संख्या में देशभर के प्रबुद्ध नागरिक उपस्थित थे।