मंगलवार, 12 मार्च 2013

रॉबर्ट वाड्रा जमीन सौदे के मुद्दे पर संसद के दोनों सदनों में हंगामा



 

रॉबर्ट वाड्रा जमीन सौदे के मुद्दे पर 

संसद के दोनों सदनों में हंगामा

भाषा | Mar 12, 2013,
नई दिल्ली।। यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा एक जमीन सौदे में शामिल होने के आरोप पर मंगलवार को संसद की कार्यवाही रोकनी पड़ी। लोकसभा और राज्यसभा, दोनों की कार्यवाही को एक बार स्थगित करने के बाद दोपहर 2 बजे के लिए स्थगित कर दिया गया। बीजेपी के सदस्य मामले की जांच की मांग को लेकर स्पीकर के पास आकर नारेबाजी करने लगे थे।
मंगलवार को लोकसभा में श्रीलंकाई तमिलों की दुर्दशा और इटली के नाविकों समेत कई मुद्दे उठे, लेकिन वाड्रा से जुड़ा मुद्दा सब पर हावी रहा। जिस वक्त लोकसभा में बीजेपी के सदस्य इस मुद्दे को लेकर हंगामा कर रहे थे, सोनिया गांधी भी सदन में मौजूद थीं। बीजेपी सदस्यों के हाथ में प्लेकार्ड था, जिन पर लिखा था- 'वित्त मंत्री! दामाद का फॉर्यम्युला अपनाइए, घर बैठे कमाइए और घाटा घटाइए।'
बीजेपी ने राजस्थान में वाड्रा से जुड़े जमीन के सौदे में कथित अनियमितताओं के बारे में चर्चा कराने के लिए दोनों ही सदनों में प्रश्नकाल स्थगित करने का नोटिस दिया था। खबरों के मुताबिक राजस्थान में जमीन खरीदने में वाड्रा ने कानून का पालन नहीं किया है। बीजेपी इन्हीं खबरों के आधार पर इस मामले में चर्चा चाहती थी।

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आज तक की एक खास रपट ............... 

हरियाणा के बाद अब राजस्थान में जमीन का खेल सामने आया है. रॉबर्ट वाड्रा पर आरोप है कि राजस्थान के बीकानेर जिले में जमीन खरीदने के लिए उन्होंने कानून तोड़ा. रॉबर्ट वाड्रा की जमीन खरीद का मसला इसलिए गंभीर सवाल उठाता है कि राजस्थान सरकार ने भूमि कानून तक बदल दिया. क्या औने-पौने दाम पर खरीदी जमीन से मोटा मुनाफा कमा लेना वाड्रा की अच्छी किस्मत है या फिर सरकार से मिली जानकारी ने उनकी किस्मत चमका दी.

राजस्थान के बीकानेर जिले में बंजर जमीन से रॉबर्ट वाड्रा को फायदा पहुंचा. भले ही रॉबर्ट वाड्रा ने लैंड सीलिंग एक्टर में संशोधन से ठीक पहले सैकड़ों एकड़ जमीन खरीदी हो, लेकिन आज तक ने उन चार लेन-देन के मामले को उजागर किया है, जिसमें 321.78 एकड़ जमीन ली गयी, जबकि इजाजत तो सिर्फ 175 एकड़ जमीन रखने की ही है.

सितंबर 2010 से पहले 321.8 एकड़ जमीन खरीदी गयी. राजस्थान लैंड सीलिंग एक्ट के तहत सितंबर 2010 से पहले 175 एकड़ अधिकतम जमीन रखने की इजाजत थी. बीकानेर जिले के कोयालत इलाके के बस्ती चौनन गांव में वाड्रा के फ्रंटमैन महेश नागर ने 2009 में 218 एकड़ जमीन खरीदी. नागर ने ही बीकानेर के कोलायत इलाके में रॉबर्ट वाड्रा के लिए सारे डील किये. 9 अप्रैल, 2009 को रीयल अर्थ इस्टेट्स प्राइवेट लिमिटेड की तरफ से महेश नागर ने 218 एकड़ जमीन खरीदी. नागर का वाड्रा का रिश्ता यह था कि वह रीयल अर्थ प्राइवेट लिमिटेड का डायरेक्टर था. विक्रेता अविजीत एग्रो प्राइवेट लिमिटेड के विनीत असोपा रहे. जमीन का खसरा नंबर 58, 63 है.

4 जून 2009 को वाड्रा ने गजनेर गांव में 36 एकड़ से ज्यादा जमीन खरीदी. लैंड डील दस्तावेजों से यहां पता चलता है कि महेश नागर ने ब्लू ब्रीज़ प्राइवेट ट्रेडिंग लिमिटेड की तरफ से ये जमीन खरीदी थी. इस कंपनी में वाड्रा का नाम बतौर डायरेक्टर है. इसमें ब्लू ब्रीज़ प्राइवेट ट्रेडिंग लिमिटेड की तरफ से महेश नागर ने 36.87 एकड़ जमीन खरीदी. यहां वाड्रा से नागर का रिश्ता था कि वह ब्लू ब्रीज़ प्राइवेट ट्रेडिंग लिमिटेड का डायरेक्टर था. जमीन का खसरा नंबर 657/445 था.

12 जून 2009 को वाड्रा ने गजनेर गांव में ही और 39 एकड़ जमीन ले ली. महेश नागर ने ब्लू ब्रीज़ ट्रेडिंग की तरफ से ये जमीन खरीदी. खसरा नंबर 660/445 है. लेकिन नागर तो सिर्फ दस्तखत करने के लिए अधिकृत था, ना कि वो जमीन का मालिक. लैंड डील में रीयल अर्थ और ब्लू ब्रीज नाम की जिन दो कंपनियों की वो नुमाइंदगी कर रहा था, उसमें बड़ा स्टेकहोल्डर रॉबर्ट वाड्रा हैं.

मसलन, रीयल अर्थ में वाड्रा के पास 99 फीसदी इक्विटी है, जबकि बाकी एक फीसदी इक्विटी उनकी मां मौरीन के पास है. कॉर्पोरेट अफेयर्स मंत्रालय की वेबसाइट के मुताबिक, ब्लू ब्रीज ट्रेडिंग प्राइवेट लिमिटेड में सिर्फ दो शेयरहोल्डर्स हैं- रॉबर्ट और उनकी मां मौरीन. कंपनी के असली मालिक वाड्रा हैं. रीयल अर्थ में बड़ा हिस्सा रॉबर्ट वाड्रा (99%) के नाम है. उनकी मां मौरीन वाड्रा के पास 1% है.

आजतक के पास एमएस रीयल अर्थ इस्टेट्स प्राइवेट लिमिटेड के नाम से जारी चेक की कॉपी है, जिसपर रॉबर्ट वाड्रा के दस्तखत हैं. जमीन खरीदने के लिए दिए गये ये चेक साबित करते हैं कि अपने फ्रंटमैन महेश नागर के जरिए सारा काम वाड्रा करा रहे थे.

9 अप्रैल 2009 को अविजीत एग्रो (मालिक विनीत असोपा) को 91,50,000 रुपये की रकम चुकायी गयी. चेक नंबर था 759382 और इस पर रॉबर्ट वाड्रा के साइन थे. 9 अप्रैल 2009 को ही सरिता बोथरा (विनीत असोपा के पास वाले प्लॉट की मालकिन) को चेक नंबर 759384 के जरिए 8,50,000 रकम दी गई. इस पर भी वाड्रा के ही साइन थे.

आजतक ने फरीदाबाद तक रॉबर्ट वाड्रा के फ्रंटमैन महेश नागर की तलाश की. पहले तो उन्होंने आजतक से बातचीत करने का वादा किया, लेकिन बाद में मुकर गए.

ये लेनदेन राजस्थान इंपोजीशन ऑफ सीलिंग ऑन एग्रिकल्चरल होल्डिंग्स एक्ट, 1973 का साफ-साफ उल्लंघन है. क्योंकि वाड्रा ने अप्रैल 2009 में 175 एकड़ जमीन रखने की अधिकतम सीमा को पार किया.

वाड्रा ने अप्रैल 2009 और अगस्त 2010 के बीच 321 एकड़ से ज्यादा जमीन खरीदी. ये राजस्थान इंपोजीशन ऑफ सीलिंग ऑन एग्रिकल्चरल होल्डिंग्स एक्ट, 1973 का उल्लंघन था. रेगिस्तानी और अर्ध रेगिस्तानी इलाकों में वाड्रा के लिए लैंड सीलिंग को अधिकतम सीमा तक खींचा गया. कानून के मुताबिक, रेगिस्तानी और अर्ध रेगिस्तानी इलाकों में 125 से 175 एकड़ जमीन रखने की इजाजत है.
अशोक गहलोत सरकार दो मायने में गुनहगार नजर आती है. पहले जब 2009 में वाड्रा राजस्थान में जमीन खरीद रहे थे, तब उसे नजरअंदाज कर दिया और अब जमीन खरीद ली, तब जमीन एक्ट में संशोधन करके उसे कानूनी तौर पर वैधता दे दी.

वाड्रा के लिए बदला कानून?
सितंबर 2010 में राज्य सरकार ने तीन दशक से भी ज्यादा पुराने कानून में संशोधन किया. साथ ही जमीन पर सीलिंग भी खत्म कर दी. संशोधन में सभी पुराने अधिग्रहण को सही ठहराने के लिए जरूरी नियम जोड़ दिये गये, ताकि उस इलाके में वाड्रा ज्यादा से ज्यादा जमीन खरीद सकें.

जहां वाड्रा के उल्लंघन को कानूनी जामा पहनाने के लिए कांग्रेस शासित राज्य सरकार ने लैंड सीलिंग एक्ट में बदलाव कर दिया, वही करीब तीन साल तक वो सोलर पॉलिसी पर भी बैठी रही। ये वो दौर था, जब वाड्रा ने इस इलाके में बड़ा लैंड बैंक तैयार कर लिया.

यू लगा बंजर जमीन पर जैकपॉट
अप्रैल 2009- वाड्रा ने कोलायत इलाके में जमीन खरीदनी शुरू की.
नवंबर 2009- केंद्र का जवाहरलाल नेहरू नेशनल सोलर मिशन शुरू.
2009- सोलर एनर्जी प्रोजेक्ट्स के लिए केंद्र का राज्यों को लैंड बैंक बनाने का निर्देश.
2009 से 2011 के बीच वाड्रा ने सैकड़ों एकड़ जमीन खरीद ली.
अप्रैल 2011- राजस्थान सरकार की सोलर पॉलिसी शुरू.
जहां सोलर प्रोजेक्ट्स का प्रस्ताव आया, वहां की बंजर जमीन भी महंगी हो गयी.

और यहीं से वो कहानी शुरु होती है कि कैसे बीकानेर में वाड्रा ने मोटा मुनाफा कमाया. उन्होंने बीकानेर के कोलायत इलाके में 81.35 एकड़ जमीन खरीदकर बाद में छह गुने दाम पर सोलर पॉवर प्रोजेक्ट शुरू करने वाली इंडो-फ्रेंच कंपनी फोनरॉक सारस (Fonroche Saaras) को बेच दी. सिर्फ इसी एक ट्रांजैक्शन से वाड्रा ने 612 फीसदी लाभ कमाया. दो साल के भीतर जमीन की कीमत छह गुना बढ़ गयी.

ब्यौरा-
तारीख- 24-03-2010
खसरा नंबर- 452, 450, 461, 462
गांव- गजनेर
क्षेत्र- 81.3 एकड़
कीमत- रुपये 28 लाख
खरीदार- प्रफुल्ल दहिया की तरफ से महेश नागर
कंपनी- स्काइलाइट रियल्टी
बेचा गया- फोनरॉक सारस के प्रमोद राजू
तारीख-23-05-2012
जमीन की कीमत- 1.99 करोड़
फायदा- 1.7 करोड़

4 जून 2009 को गजनेर में वाड्रा के फ्रंटमैन महेश नागर ने 37.29 एकड़ जमीन खरीदी. फिर उसे तीन साल में ही ग्यारह गुना से भी ज्यादा दाम पर इंडो-फ्रेंच कंपनी फोनरॉक सारस एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड को बेच दिया.

ब्यौरा-
तारीख- 4 जून, 2009
खसरा नंबर-657/445
गांव- गजनेर
क्षेत्र- 37.3 एकड़
कीमत- 8.7 लाख रुपये
खरीदार- महेश नागर
कंपनी- ब्लू ब्रीज़ ट्रेडिंग प्राइवेट लिमिटेड
बेचा गया- फोनरॉक सारस एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड
तारीख- 23 मई, 2012
बेचने की कीमत- 1,01,62,599 रुपये
लाभ- 92.9 लाख रुपये (खरीद दाम से 11गुना ज्यादा)

4 जून 2009 को वाड्रा के फ्रंटमैन ने एक बार फिर गजनेर गांव में ही 27.5 एकड़ जमीन खरीदी और उसे छह गुने दाम पर बेच दिया. उन्होंने 13 लाख से कुछ ज्यादा दाम पर जमीन खरीदकर 75 लाख से ज्यादा कीमतपर पर फोनरॉक राजहंस को बेच दिया.

ब्यौरा-
तारीख- 4 जून, 2009
खसरा नंबर-658/445
गांव- गजनेर
क्षेत्र- 27.5 एकड़
कीमत- 13.2 लाख रुपये
खरीदार- महेश नागर
कंपनी- ब्लू ब्रीज़ ट्रेडिंग प्राइवेट लिमिटेड
बेचा गया- फोनरॉक राजहंस प्राइवेट लिमिटेड
तारीख- 23 मई, 2012
बेचने की कीमत- 75 लाख रुपये
लाभ- 62 लाख रुपये (खरीद दाम से 6 गुना ज्यादा)

2009 से 2011 के बीच लैंड बैंक बनाने के केंद्र के निर्देश पर राज्य सरकार बैठी रही.

-राज्य सरकार की काहिली ने वाड्रा को सोलर केंद्रों के आस-पास लैंड बैंक बनाने में मदद की.
-बीकानेर क्षेत्र में सोलर केंद्रों की जानकारी सिर्फ राज्य सरकार और केंद्र को थी.
-राज्य के सोलर पॉलिसी में रियायती दर पर जमीन मुहैया कराने का प्रावधान था.
-राज्य सरकार ने रियायती दर पर जमीन बेचने का प्रस्ताव रखा, मगर राज्य सरकार की अधिग्रहित जमीन को खरीदने कोई नहीं आया.
-इसकी वजह सरकार की अधिग्रहित जमीन का ट्रांसमिशन हब्स से दूरी थी.

इसलिए कुछ बड़े सवाल खड़े होते हैं-

-क्या मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बीकानेर में जमीन खरीदने के लिए वाड्रा से साठ-गांठ की.
-क्या राज्य सरकार ने लैंड सीलिंग एक्ट में बदलाव इसलिए किया ताकि तय सीमा से ज्यादा जमीन खरीदने वाले वा़ड्रा का सौदा कानूनन जायज हो सके.
-क्या जमीन खरीदने से पहले ही वाड्रा को उस इलाके में सोलर पॉवर प्रोजेक्ट्स आने की जानकारी मिल गयी थी.
-तीन साल में सरकार लैंड बैंक बनाने में क्यों नाकाम रही.

वाड्रा के मुद्दे पर आज बीजेपी ने संसद में हंगामा किया. आरोप लगाया जा रहा है कि कांग्रेस सरकारों ने जानबूझकर गड़बड़ी की. वहीं कांग्रेस किसी भी अनियमितता से इनकार कर रही है.

कोयला आवंटन में गड़बड़ी हुई : सुप्रीम कोर्ट




 

 

 

 

अब प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह को ही बताना है कि यह घोटाला क्यों और किसके लिए ...................

CBI ने कोर्ट से कहा, कोयला आवंटन में गड़बड़ी हुई

एबीपी न्यूज़ ब्यूरो Tuesday, 12 March 2013
नई दिल्ली: कोयला घोटाले को लेकर सीबीआई ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि खदानों के आवंटन का कोई आधार नहीं था और कोयला आवंटन में गड़बड़ी हुई है.

सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि कोयला ब्लॉक्स के आवंटन के वक़्त कंपनियों की सही तरह से जांच भी नहीं की गई.

इसके बाद कोर्ट ने सीबीआई से कहा है कि वो इस केस की जांच रिपोर्ट सरकार को नहीं बल्कि सीधे कोर्ट को दे. इसके बाद सरकार की ओर से इस पर आपत्ति भी जताई गई है.

सीबीआई की रिपोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से जानना चाहा है कि आखिर क्यों छोटी कंपनियों को कोयला के खदान आवंटित किए गए. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब बड़ी संख्या में बड़ी कंपनियों ने भी आवेदन दिया था तो कैसे जिसे चाहा उसे ब्लॉक्स आवंटित कर दिए गए.

ग़ौरतलब है कि सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि साल 2004 से 2009 के बीच कोयला आवंटन में भारी गड़बड़ी हुई है और इसमें सरकारी खजाने को करीब 1.86 लाख करोड़ का नुकसान हुआ था.

क्‍या है कोयला घोटाला?

संसद में पिछले साल अगस्त में नीलामी के बिना कोयला खदानें बांटने पर सीएजी की रिपोर्ट पेश की गई. रिपोर्ट में कहा गया कि 2004 से 2009 के बीच कोयला खदानों के ठेके देने में अनियमिताएं बरती गईं. बेहद सस्ती कीमतों पर बगैर नीलामी के खदानों से कोयला निकालने के ठेके निजी कंपनियों को दिए गए. इससे सरकारी खजाने को 1.86 लाख करोड़ रुपये का अनुमानित नुकसान हुआ है. सीएजी ने 25 कंपनियों के नाम का जिक्र अपनी रिपोर्ट में किया है. जिन कंपनियों के नाम रिपोर्ट में दिए गए हैं उनमें एस्सार पावर, हिंडाल्को, टाटा स्टील, टाटा पावर और जिंदल स्टील एंड पावर मुख्‍य हैं.

सरकार ने सीएजी रिपोर्ट से असहमति जताई तो कांग्रेस के प्रवक्ता दो कदम आगे बढ़कर सीएजी के कामकाज पर ही सवाल उठाने लगे. कांग्रेस के प्रवक्‍ता मनीष तिवारी के मुताबिक, कैग को अपनी रिपोर्ट में जीरो लगाने की आदत से बाज़ आना चाहिए.कोयला घोटाले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का नाम भी उछल रहा है. नवंबर 2006 से मई 2009 के बीच देश में कोई कोयला मंत्री नहीं था. प्रधानमंत्री खुद कोयला मंत्री का काम देख रहे थे.

रिपोर्ट में जिस पांच साल की बात की गई है उसमें तीन साल तक मनमोहन सिंह खुद कोयला मंत्री थे. उनके कार्यकाल में भी कोयला खदानों के ठेके दिए गए, वो भी बिना नीलामी किए.

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कोयला घोटाला: 

केंद्र सरकार से SC ने पूछा, किस आधार पर हुए आवंटन

आज तक वेब ब्यूरो | नई दिल्ली, 12 मार्च 2013 |
सुप्रीम कोर्ट ने कोयला ब्लॉक आवंटन के केंद्र सरकार के फैसले को मंगलवार को मनमाना करार देते हुए कहा कि इसके लिए जो प्रक्रियाएं अपनाई गईं, वे प्रथम दृष्टया कानून-सम्मत नहीं लगतीं. अगर सही प्रक्रियाओं का अनुपालन नहीं किया गया है तो ये आवंटन रद्द किए जाएंगे.

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को भी निर्देश दिया कि वह इस मामले की जांच से संबंधित सूचना 'राजनीतिक कार्यकारियों' (केंद्र सरकार) से साझा न करे. गौरतलब है कि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कोयला ब्लॉक आवंटन के लिए उचित प्रक्रिया न अपनाए जाने के कारण सरकारी खजाने को 1.86 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है.

न्यायमूर्ति आर. एम. लोढ़ा की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, 'यदि केंद्र सरकार ने कोयला ब्लॉक आवंटन के आवेदकों के साथ दिशा-निर्देशों या प्रक्रियाओं का अनुपालन नहीं किया है और ए, बी, सी को आवंटन कर दिया गया, लेकिन डी, ई, एफ को इससे दूर रखा गया तो पूरा आवंटन रद्द होगा.'

कोर्ट ने कहा कि सबसे पहले वह कोयला ब्लॉक आवंटन की वैधता की जांच करेगा और फिर सीबीआई यह देखेगा कि क्या कोयला ब्लॉक के आवंटन में किसी तरह की गड़बड़ी हुई है? कोर्ट ने अधिवक्ता मनोहर लाल शर्मा तथा गैर-सरकारी संगठन कॉमन कॉज की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्णय दिया. याचिका में कोयला ब्लॉक आवंटन रद्द करने की मांग की गई थी. केंद्र सरकार का बचाव करते हुए हालांकि महान्यायवादी जी. ई. वाहनवती ने कहा कि कोयला ब्लॉक आवंटन में सभी नियमों का अनुपालन किया गया और केंद्र सरकार बड़े पैमाने पर आवंटन रद्द करने के पक्ष में नहीं है.

इन्होने जाना संघ क्या है ....?





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-पांचजन्य

इन्होंने जाना संघ क्या है....?



तुष्टीकरण की नीति के चलते इस्लामी आतंकवाद के समानांतर भगवा आतंकवाद का जुमला सोनिया कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने उछाला और चिदम्बरम ने स्थापित करने की कोशिश की। गांधी की कांग्रेस से सोनिया की कांग्रेस तक की यात्रा में इतना अंतर आया कि गांधी जी ने संघ के शिविर को देखकर कहा कि ऐसा अच्छा दृश्य कहीं नहीं दिखा, तो आज सोनिया कांग्रेस के गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे को संघ के शिविरों में आतंकवाद का प्रशिक्षण मिलता दिख रहा है।

रा.स्व.संघ के संस्थापक डा. केशव बलिराम हेडगेवार एक क्रांतिकारी तथा कांग्रेस के संगठक रहे थे। उन्होंने गांधी जी के आह्वान पर असहयोग आंदोलन तथा 1931 में जंगल सत्याग्रह में भाग लिया तथा जेल भी गए। ब्रिटिश गुप्तचरों की सूची में उनका नाम मध्य भारत- 114 नम्बर पर दिया गया है। संघ के इतिहास में उसके स्वयंसेवकों का पहला प्रशिक्षिण शिविर 1927 में लगा था, जो दो महीने का था। 1937 से प्रांतों में प्रशिक्षिण शिविर प्रारंभ हुए तथा उस वर्ष लाहौर, पूना तथा नागपुर में शिविर लगे। 1940 में केवल असम, उड़ीसा तथा जम्मू-कश्मीर छोड़कर देश के सभी प्रांतों में प्रशिक्षण वर्ग लगे। 1943-1944 में देश के सभी 11 प्रांतों में शिविर लगे। प्रत्येक शिविर में संघ के स्वयंसेवकों की संख्या तेजी से बढ़ती गई। 1945 में यह संख्या 10,000 तक पहुंच गई। स्वाभाविक है ब्रिटिश सरकार संघ के बढ़ते प्रभाव से विचलित हुई। गुप्त सरकारी दस्तावेजों से 1943-44 में 11 प्रांतों में हुए संघ-शिविरों की पूरी जानकारी मिलती है। इन प्रशिक्षण शिविरों में श्री गुरुजी तथा अन्य प्रमुख विचारकों के भाषणों के सारांश भी दिये गए हैं। इनमें मुख्य रूप से छुआछूत दूर करने, हिन्दुओं में एकता स्थापित करने, भारतीय स्वतंत्रता के लिए प्राणोत्सर्ग करने के लिए तैयार रहने तथा अंग्रेजों के व्यवहार को असहनीय बताते हुए अपने देश की स्वतंत्रता के लिए कटिबद्ध रहने के लिए कहा गया था। अंग्रेज सरकार ने संघ को पहले साम्प्रदायिक कहा, पर गहरी छानबीन तथा गृह विभाग से जिला स्तर की रपटों तथा विश्वकोशों की परिभाषाओं का अध्ययन कर स्वयं ही इस आरोप को गलत माना। ब्रिटिश सरकार ने पहले संघ की वेशभूषा तथा 'परेड़' पर ऐतराज जताया, परंतु बाद में उसे भी वापस लेना पड़ा।
जब ब्रिटिश सरकार के संघ को कुचलने के प्रयास असफल रहे तब तत्कालीन पश्चिमी पंजाब के गर्वनर जैकिन्सन तथा पंजाब के प्रीमियर (मुख्यमंत्री) खिज्र हयात खां ने 24 जनवरी, 1947 को केन्द्र से बिना पूछे पंजाब में रा.स्व. संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। यह वह समय था जब ब्रिटिश सरकार को हिन्दू शिविरों के तेजी से बढ़ने के समाचार मिल रहे थे। परिस्थितियों को भांपते हुए भारत मंत्री पैंटिक लारेंस ने भारत के वायसराय लार्ड वेवल से जानकारी ली। परिणामस्वरूप पंजाब के गवर्नर तथा प्रीमियर को फटकार पड़ी तथा पांच दिन बाद ही प्रतिबंध का आदेश वापस लेना पड़ा।

संघ तथा असली कांग्रेस
वस्तुत: विभाजन से पूर्व गांधी जी की कांग्रेस के अनेक प्रसिद्ध नेताओं ने संघ को अत्यंत निकट से देखा तथा उसके विस्तार तथा विकास हेतु समर्थन व शुभकामना दी। 1927 में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस से डा.हेडगेवार की भेंट हुई थी। तब डा.साहब ने उन्हें संघ का तत्व ज्ञान समझाया था। नेता जी को लगा था कि संघ भारत में पुनर्जीवन का मार्ग बन सकता है। 1940 में नेताजी पुन: नागपुर आये पर उस समय डा. हेडगेवार अस्वस्थ थे, नेताजी जल्दी में थे, इसलिए उनसे बिना मिले ही चले गए। अप्रैल, 1929 में पं. मदन मोहन मालवीय नागपुर स्थित मोहिते के बाड़े में संघ की शाखा पर आए। अपने भाषण में उन्होंने कहा, 'अन्य संस्थाओं के पास बड़ी बड़ी इमारते हैं और बहुत-सा कोष है, पर तुम्हारे संघ में मनुष्य बल अच्छा है, यह देखकर मुझे आनंद हुआ।' बाद में मालवीय जी ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में ही संघ का कार्यालय बनाने की स्वीकृति दी।

दिसम्बर, 1934 में जब वर्धा में संघ का शिविर लगा हुआ था। उसके पास ही सत्याग्रह आश्रम में ठहरे गांधी जी को शिविर देखने की उत्सुकता हुई। वहां उन्होंने ब्राह्मण, महार, मराठे-सभी को एक साथ भोजन करते देखा। गांव के किसान तथा मजदूर भी देखें। गांधी जी ने भगवा ध्वज को संघ के ढंग से प्रणाम किया। गांधी जी बोले, 'मैं सचमुच प्रसन्न हूं। इतना प्रभावी दृश्य मैंने अभी तक कहीं नहीं देखा अगले दिन डा.हेडगेवार उनसे मिलने गए। गांधी जी ने अपने पूर्व दिवस का वर्णन करते हुए कहा, 'डाक्टर जी, अपने चरित्र तथा कार्य पर अटल निष्ठा के बल पर आप अंगीकृत कार्य में निश्चित सफल होंगे।' इसके अनेक वर्षों बाद जब विभाजन के कालखण्ड में समस्त पंजाब में दंगे हो रहे थे, तब गांधी जी की इच्छा पर श्री गुरुजी उनसे मिलने दिल्ली गए। यह भेंट 12 सितम्बर, 1947 को हुई। गांधी जी ने मिलते ही कहा 'मेरी अब कोई सुनता ही नहीं।' श्री गुरुजी की बातों से संतुष्ट होकर 16 सितम्बर को, 1947 उन्होंने स्वयंसेवकों के सम्मुख कहा 'डा. हेडगेवार के जीवन काल में मैंने वर्धा में संघ का शिविर देखा था। उसके बाद से अब संघ बहुत बढ़ गया है। यह मानी हुई बात है कि उच्च सेवा के ध्येय तथा त्याग की भावना से प्रेरित कोई भी संगठन शक्तिशाली ही बनेगा।'

स्वतंत्र भारत के पहले गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल भली भांति जानते थे कि संघ यदि सचेत व मदद न करता तो 10 सितम्बर, 1947 को दिल्ली के लालकिले पर मुस्लिम लीग का झंडा फहरा रहा होता। उन्होंने पाकिस्तान से आये पीड़ितों के प्रति संघ के स्वयंसेवकों की नि:स्वार्थ सेवा को भी देखा था। साथ ही कश्मीर में कबाईलियों के अचानक आक्रमण के समय स्वयंसेवकों के बलिदान की जानकारी भी थी। उन्होंने 6 जनवरी, 1948 को लखनऊ में अपने भाषण में कहा था, 'संघ के लोग स्वार्थ के लिए झगड़ने वालों में से नहीं हैं। वे तो अपनी मातृभूमि से प्रेम करने वाले देशभक्त हैं।' 1975 में श्रीमती इन्दिरा गांधी के अधिनायकवाद के विरुद्ध सम्पूर्ण क्रांति के प्रणेता श्री जयप्रकाश नारायण ने बहुत समय पूर्व, जब उनका संघ से निकट का संबंध भी नहीं था, 1948 में काशी में 'साम्प्रदायिकता विरोधी सप्ताह' का उद्घाटन करते हुए कहा था, 'संघ के स्वयंसेवकों की अनुशासनप्रियता, चारित्र्य, दृढ़ता तथा प्रेम सचमुच में प्रशंसनीय है। संघ ने समाज के लिए पर्याप्त ठोस काम किया है और इसीलिए अभी तक टिका हुआ है। कानून से हम उसे बंद नहीं कर सकते।'
प्रसिद्ध विद्धान श्री कन्हैयालाल माणिक लाल मुंशी संघ के कार्यों से अत्यधिक प्रभावित थे। उन्होंने लिखा था, 'देश-विभाजन के दुर्दिनों में संघ के नवयुवकों ने पंजाब और सिंध में अतुलनीय वीरता प्रकट की। उन नवयुवकों ने आततायी मुसलमानों का सामना कर हजारों स्त्रियों व बच्चों के मान और जीवन बचाये, अनेक नवयुवक इस कर्तव्य पालन में काम आये।'

नकली कांग्रेस और संघ
पर इसके साथ यह भी सत्य है कि गोविंद सहाय जैसे गपोड़ ने संघ का 'फासीस्ट' कहना शुरू किया था। यहां तक की पंडित नेहरू, जो अपने को संयोग से हिन्दू मानते थे, संघ विरोध में आगे आये तथा संघ को 'साम्प्रदायिक' कहने लगे थे। इससे भी अधिक खतरा उन्हें सरदार पटेल के गुट से हो रहा था, जिसका कांग्रेस संगठन पर पूरा नियंत्रण था। दुर्भाग्य से 30 जनवरी, 1948 को गांधी जी की हत्या कर दी गई थी। नेहरू गुट को अवसर मिल गया। नेहरू और पटेल दोनों गुटों में परस्पर कटु विवाद के बाद ही 4 फरवरी, 1948 को संघ पर प्रतिबंध लगाया गया। लगभग बीस हजार स्वयंसेवक बंदी बनाये गये थे। संघ पर प्रतिबंध लगा देख देश के अनेक राष्ट्रवादी नेता स्तंभित हो गये। जिन्हें भारत रत्न मिला, ऐसे कांग्रेस के वयोवृद्ध नेता डा.भगवान दास ने 1948 में ही इसका विरोध किया। उन्होंने कहा, 'उत्साह तथा बलिदानों की भावना से भरे इन नवयुवकों ने उस समय उस षड्यंत्र (10 सितम्बर, 1947) की सूचना न दी होती तो आज के भारत का अस्तित्व ही न होता।' 15 सितम्बर, 1948 को दिल्ली में श्री विनोबा भावे ने लिखा, 'मुझे पूरा विश्वास है कि संघ के कार्यकर्तायों के बारे में गलत धारणा दूर होगी, जोकि उच्च आदर्शों तथा स्वयं त्याग से प्रेरित हैं।'

प्रतिबंध न हटने पर 9 दिसम्बर, 1948 से संघ का सत्याग्रह प्रारंभ हुआ तब 12 जुलाई 1949 को बिना किसी शर्त के प्रतिबंध हटा लिया गया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार सत्याग्रह में 60,000 स्वयंसेवकों ने भाग लिया जबकि संघ के अनुसार इसमें 90,000 लोगों ने भाग लिया। संघ गांधी जी हत्या के झूठे आरोप में पूर्णत: निर्दोष साबित हुआ।

बहरहाल, प्रतिबंध हटने के बाद संघ पुन: सांस्कृतिक तथा राष्ट्रोत्थान के अपने कार्य में लग गया। चीन द्वारा भारत पर हमले के बाद 1963 में पं. नेहरू के अनुरोध पर संघ ने 26 जनवरी की गणतंत्र दिवस परेड में भाग लिया। 1965 के पाकिस्तान के साथ युद्ध के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री संघ के सरसंघचालक श्री गुरुजी एवं सरकार्यवाह श्री एकनाथ रानाडे तथा श्री गुरुजी से मिलते रहे तथा ताशकंद जाने से पूर्व भी उनसे वार्ता की। श्रीमती इंदिरा गांधी ने कांग्रेस में परस्पर फूट तथा राजसत्ता छूट जाने के डर से जब आपातकाल लगाकर लोकतंत्र को कलंकित किया तब उसके विरोध में संघ के स्वयंसेवकों की भागीदार विश्व में हुए किसी भी आंदोलन से अधिक थी। संघ के इस पूरे इतिहास में एक भी घटना ऐसी नहीं है जिससे उसकी या हिन्दू समाज की आतंकवादी घटना कहा जा सके। कांग्रेस सरकार ने एन.आई.ए. की मदद से कुछ हिन्दुओं को कुछ आतंकवादी घटनाओं में आरोपी बनाकर जेलों में भले बंद कर रखा है, पर उनके खिलाफ भी कोई ठोस सुबूत नहीं हैं और न ही किसी न्यायालय में उन्हें दोषी सिद्ध किया जा सका है। हां, यह अवश्य है, कि जब भी कांग्रेस में परस्पर की फूट बढ़े या राजसत्ता खिसकती दिखे, तो कांग्रेस के नेताओं को दौरा-सा पड़ जाता है। वे मुस्लिम वोट को संघ के लिए साम्प्रदायिक, गांधी जी का हत्यारा या फासीस्ट जैसे उपमा देते हैं, फिर माफी मांगते हैं। पर मुस्लिम वोटों की लिप्सा ऐसी है कि आदमी को फिर सूर्य पर थूकने को विवश कर देती है, जो उसी के मुंह पर आकर गिरता है।

-पांचजन्य

लुप्त सरस्वती नदी के संदर्भ में प्रकाशित शोध

लुप्त सरस्वती नदी के संदर्भ में इंडिया टुडे ६ मार्च २० १ ३ के अंक में प्रकाशित शोध





पाताल में मिला सरस्वती का पता


नई दिल्‍ली, 11 मार्च 2013
पीयूष बबेले | सौजन्‍य: इंडिया टुडे
—साथ में राम प्रकाश मील और विमल भाटिया

कालीबंगा के मिट्टी के टीले खामोश खड़े हैं. अगर लोहे की काली सलाखों वाली बड़ी-सी चारदीवारी में इन्हें करीने से सहेजा न गया हो, तो यह एहसास करना कठिन है कि हम पुरखों की उस जमीन पर खड़े हैं, जहां कभी सरस्वती-सिंधु की नदी घाटी सभ्यता सांस लेती थी. मिट्टी के इन ढूहों के पीछे गेहूं के लहलहाते खेत हैं.

बगल में पुरातत्व विभाग के बोर्ड पर खुदा नक्शा याद दिलाता है कि इन टीलों को घेरकर कभी सरस्वती नदी बहा करती थी और आज उसी के बहाव क्षेत्र में 21वीं सदी की फसल लहलहा रही है. वैसे तो आज भी बरसात के मौसम में यहां से एक छोटी-सी नदी घग्घर कुछ दिन के लिए बहती है, लेकिन उस महानदी के सामने इस बरसाती पोखर की क्या बिसात, जिसकी गोद में कभी दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक फल-फूल रही थी.

ओल्डहैम से आइआइटी तक
तो वह नदी कहां लुप्त हो गई? आज से 120 साल पहले 1893 में यही सवाल एक अंग्रेज इंजीनियर सी.एफ. ओल्डहैम के जेहन में उभरा था, जब वे इस नदी की सूखी घाटी से अपने घोड़े पर सवार होकर गुजरे. तब ओल्डहैम ने पहली परिकल्पना दी कि हो न हो, यह प्राचीन विशाल नदी सरस्वती की घाटी है, जिसमें सतलुज नदी का पानी मिलता था. और जिसे ऋषि-मुनियों ने ऋग्वेद (ऋचा 2.41.16) में ''अम्बी तमे, नदी तमे, देवी तमे सरस्वती” अर्थात् सबसे बड़ी मां, सबसे बड़ी नदी, सबसे बड़ी देवी कहकर पुकारा है. ऋग्वेद में इस भूभाग के वर्णन में पश्चिम में सिंधु और पूर्व में सरस्वती नदी के बीच पांच नदियों झेलम, चिनाब, सतलुज, रावी और व्यास की उपस्थिति का जिक्र है.Sarswati

ऋग्वेद (ऋचा 7.36.6) में सरस्वती को सिंधु और अन्य नदियों की मां बताया गया है. इस नदी के लुप्त होने को लेकर ओल्डहैम ने विचार दिया कि कुदरत ने करवट बदली और सतलुज के पानी ने सिंधु नदी का रुख कर लिया. बेचारी सरस्वती सूख गई. एक सदी से ज्यादा के वक्त में विज्ञान और तकनीक ने रफ्तार पकड़ी और सरस्वती के स्वरूप को लेकर एक-दूसरे को काटती हुई कई परिकल्पनाएं सामने आईं. इस बारे में अंतिम अध्याय लिखा जाना अभी बाकी है. 1990 के दशक में मिले सैटेलाइट चित्रों से पहली बार उस नदी का मोटा खाका दुनिया के सामने आया. इन नक्शों में करीब 20 किमी चौड़ाई में हिमालय से अरब सागर तक जमीन के अंदर नदी घाटी जैसी आकृति दिखाई देती है.

अब जिज्ञासा यह थी कि कोई नदी इतनी चौड़ाई में तो नहीं बह सकती, तो आखिर उस नदी कासटीक रास्ता और आकार क्या था? और उसके विलुप्त होने की सच्ची कहानी क्या है? इन सवालों के जवाब ढूंढऩे के लिए 2011 के अंत में आइआइटी कानपुर के साथ काशी हिंदू विश्वविद्यालय (वाराणसी) और लंदन के इंपीरियल कॉलेज के विशेषज्ञों ने शोध शुरू किया. ''इस परियोजना में हमने इलेक्ट्रिकल रेसिस्टिविटी साउंडिंग तकनीक का प्रयोग किया.

इस तकनीक से जमीन के भीतर पानी की परतों की सटीक मोटाई का आकलन किया जाता है. हमें यह सुनिश्चित करना था कि पश्चिम गंगा बेसिन में यमुना और सतलुज नदियों के बीच एक बड़ी नदी बहा करती थी. यह नदी कांस्य युग और हड़प्पा कालीन पुरातत्व स्थलों के पास से बहती थी. कोई साढ़े तीन हजार साल पहले यह सभ्यता नदी के पानी के धार बदल लेने से लुप्त हो गई. हालांकि सभ्यता के लुप्त होने की दूसरी वजहें भी हो सकती हैं.”

परियोजना के प्रभारी और आइआइटी कानपुर में सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर रंजीत सिन्हा ने नई खोज की यह भूमिका रखी. इससे कुछ समय पहले ही अमेरिका में मिसीसिपी नदी घाटी के भूजल तंत्र का अध्ययन करने के लिए इस तकनीक का सफलता से प्रयोग किया जा चुका है. इसके अलावा मिस्र के समानुद इलाके में नील डेल्टा के पास नील नदी की लुप्त हो चुकी धाराओं का नक्शा खींचने में भी इस तकनीक को कामयाबी हासिल हुई है. नील नदी की लुप्त धाराओं के बारे में बने इस नए नक्शे ने कई ऐतिहासिक मान्यताओं को चुनौती भी दी है. साउंड रेसिस्टिविटी तकनीक से सरस्वती नदी के भूमिगत नेटवर्क के इन्हीं साक्ष्यों का पता लगाने के लिए टीम ने पहले चरण में पंजाब में पटियाला और लुधियाना के बीच पडऩे वाले पुरातत्व स्थल कुनाल के पास मुनक गांव, लुधियाना और चंडीगढ़ के बीच के सरहिंद गांव और राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में हड़प्पाकालीन पुरातत्व स्थल कालीबंगा का चयन किया.

2012 के अंत और सदी के पहले महाकुंभ से पहले प्रो. सिन्हा और उनकी टीम का 'इंटरनेशनल यूनियन ऑफ क्वाटरनरी रिसर्च’ के जर्नल क्वाटरनरी जर्नल में एक शोधपत्र छपा. इसका शीर्षक था: जिओ इलेक्ट्रिक रेसिस्टिविटी एविडेंस फॉर सबसरफेस पेलिओचैनल सिस्टम्स एडजासेंट टु हड़प्पन साइट्स इन नॉर्थवेस्ट इंडिया. इसमें दावा किया गया: ''यह अध्ययन पहली बार घग्घर-हाकरा नदियों के भूमिगत जलतंत्र का भू-भौतिकीय (जिओफिजिकल) साक्ष्य प्रस्तुत करता है.” यह शोधपत्र योजना के पहले चरण के पूरा होने के बाद सामने आया और साक्ष्यों की तलाश में अभी यह लुप्त सरस्वती की घाटी में पश्चिम की ओर बढ़ता जाएगा.

 ऊंचे हिमालय से उद्गम
पहले साक्ष्य ने तो उस परिकल्पना पर मुहर लगा दी कि सरस्वती नदी घग्घर की तरह हिमालय की तलहटी की जगह सिंधु और सतलुज जैसी नदियों के उद्गम स्थल यानी ऊंचे हिमालय से निकलती थी. अध्ययन की शुरुआत घग्घर नदी की वर्तमान धारा से कहीं दूर सरहिंद गांव से हुई और पहले नतीजे ही चौंकाने वाले आए. सिन्हा बताते हैं, ''दरअसल 1980 के यशपाल के शोधपत्र में इस जगह पर घघ्घर-हाकरा नदियों की लुप्त हो चुकी संभावित सहायक नदी की मौजूदगी की बात कही गई थी. हम इसी सहायक नदी की मौजूदगी की पुष्टि के लिए साक्ष्य जुटा रहे थे.” लेकिन जो नतीजा सामने आया, उससे सरहिंद में जमीन के काफी नीचे साफ पानी से भरी रेत की 40 से 50 मीटर मोटी परत सामने आई. यह घाटी जमीन के भीतर 20 किमी में फैली है.

इसके बीच में पानी की मात्रा किनारों की तुलना में कहीं अधिक है. खास बात यह है कि सरहिंद में सतह पर ऐसा कोई संकेत नहीं मिलता जिससे अंदाजा लग सके कि जमीन के नीचे इतनी बड़ी नदी घाटी मौजूद है. बल्कि यहां तो जमीन के ठीक नीचे बहुत सख्त सतह है. पानी की इतनी बड़ी मात्रा सहायक नदी में नहीं बल्कि मुख्य नदी में हो सकती है. सिन्हा ने बताया,''भूमिगत नदी घाटी में मिले कंकड़ों की फिंगर प्रिंटिंग बताती है कि यह नदी ऊंचे हिमालय से निकलती थी. कोई 1,000 किमी. की यात्रा कर अरब सागर में गिरती थी. इसके बहाव की तुलना वर्तमान में गंगा नदी से की जा सकती है.”

सरहिंद के इस साक्ष्य ने सरस्वती की घग्घर से इतर स्वतंत्र मौजूदगी पर मुहर लगा दी. इस शोध में तैयार नक्शे के मुताबिक, सरस्वती की सीमा सतलुज को छूती है. यानी सतलुज और सरस्वती के रिश्ते की जो बात ओल्डहैम ने 120 साल पहले सोची थी, भू-भौतिकीय साक्ष्य उस पर पहली बार मुहर लगा रहे थे.

आखिर कैसे सूखी सरस्वती?
तो फिर ये नदियां अलग कैसे हो गईं? विलुप्त सरस्वती नदी की घाटी का पिछले 20 साल से अध्ययन कर रहे पुरातत्व शास्त्री और इलाहाबाद पुरातत्व संग्रहालय के निदेशक राजेश पुरोहित बताते हैं, ''समय के साथ सरस्वती नदी को पानी देने वाले ग्लेशियर सूख गए. इन हालात में या तो नदी का बहाव खत्म हो गया या फिर सिंधु, सतलुज और यमुना जैसी बाद की नदियों ने इस नदी के बहाव क्षेत्र पर कब्जा कर लिया. इस पूरी प्रक्रिया के दौरान सरस्वती नदी का पानी पूर्व दिशा की ओर और सतलुज नदी का पानी पश्चिम दिशा की ओर खिसकता चला गया. बाद की सभ्यताएं गंगा और उसकी सहायक नदी यमुना (पूर्ववर्ती चंबल) के तटों पर विकसित हुईं. पहले यमुना नदी नहीं थी और चंबल नदी ही बहा करती थी. लेकिन उठापटक के दौर में हिमाचल प्रदेश में पोंटा साहिब के पास नई नदी यमुना ने सरस्वती के जल स्रोत पर कब्जा कर लिया और आगे जाकर इसमें चंबल भी मिल गई.”

यानी सरस्वती की सहायक नदी सतलुज उसका साथ छोड़कर पश्चिम में खिसककर सिंधु में मिल गर्ई और पूर्व में सरस्वती और चंबल की घाटी में यमुना का उदय हो गया. ऐसे में इस बात को बल मिलता है कि भले ही प्रयाग में गंगा-यमुना-सरस्वती के संगम का कोई भूभौतिकीय साक्ष्य न मिलता हो लेकिन यमुना के सरस्वती के जलमार्ग पर कब्जे का प्रमाण इन नदियों के अलग तरह के रिश्ते की ओर इशारा करता है. उधर, जिन मूल रास्तों से होकर सरस्वती बहा करती थी, उसके बीच में थार का मरुस्थल आ गया. लेकिन इस नदी के पुराने रूप का वर्णन ऋग्वेद में मिलता है. ऋग्वेद के श्लोक (7.36.6) में कहा गया है, ''हे सातवीं नदी सरस्वती, जो सिंधु और अन्य नदियों की माता है और भूमि को उपजाऊ बनाती है, हमें एक साथ प्रचुर अन्न दो और अपने पानी से सिंचित करो.”

आइआइटी कानपुर के अध्ययन में भी नदी का कुछ ऐसा ही पुराना रूप निखर कर सामने आता है. साउंड रेसिस्टिविटी पर आधारित आंकड़े बताते हैं कि कालीबंगा और मुनक गांव के पास जमीन के नीचे साफ पानी से भरी नदी घाटी की जटिल संरचना मौजूद है. इन दोनों जगहों पर किए गए अध्ययन में पता चला कि जमीन के भीतर 12 किमी से अधिक चौड़ी और 30 मीटर मोटी मीठे पानी से भरी रेत की तह है. जबकि मौजूदा घग्घर नदी की चौड़ाई महज 500 मीटर और गहराई पांच मीटर ही है. जमीन के भीतर मौजूद मीठे पानी से भरी रेत एक जटिल संरचना दिखाती है, जिसमें बहुत-सी अलग-अलग धाराएं एक बड़ी नदी में मिलती दिखती हैं.

सिन्हा के शब्दों में, ''यह जटिल संरचना ऐसी नदी को दिखाती है जो आज से कहीं अधिक बारिश और पानी की मौजूदगी वाले कालखंड में अस्तित्व में थी या फिर नदियों के पानी का विभाजन होने के कारण अब कहीं और बहती है.” अध्ययन आगे बताता है कि इस मीठे पानी से भरी रेत से ऊपर कीचड़ से भरी रेत की परत है. इस परत की मोटाई करीब 10 मीटर है. गाद से भरी यह परत उस दौर की ओर इशारा करती है, जब नदी का पानी सूख गया और उसके ऊपर कीचड़ की परत जमती चली गई. ये दो परतें इस बात का प्रमाण हैं कि प्राचीन नदी बड़े आकार में बहती थी और बाद में सूख गई. और इन दोनों घटनाओं के कहीं बहुत बाद घग्घर जैसी बरसाती नदी वजूद में आई.

सरस्वती से गंगा के तट पर पहुंची सभ्यता
वैज्ञानिक साक्ष्यों की श्रृंखला यहीं नहीं रुकती. इसी शोध टीम के सदस्य और दिल्ली विश्वविद्यालय में जियोलॉजी के सहायक प्रोफेसर डॉ. शशांक शेखर बताते हैं, ''कालीबंगा में घग्घर नदी के दोनों ओर जिस तरह के मिट्टी के ढूह मिलते हैं, उस तरह के ढूह किसी बड़ी नदी की घाटी के आसपास ही बन सकते हैं.” और जिस तरह से कालीबंगा के ढूहों के नीचे से हड़प्पा काल के अवशेष मिलते हैं, उससे इस बात को बल मिलता है कि सरस्वती नदी और हड़प्पा संस्कृति के बीच कोई सीधा रिश्ता था.

कालीबंगा अकेला पुरातत्व स्थल नहीं है बल्कि राजस्थान के हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर जिलों में ऐसे 12 बड़े ढूह चिन्हित किए गए हैं. हड़प्पा सभ्यता के अवशेष पश्चिम में गुजरात तक और पूर्व में मेरठ तक मिले हैं. वहीं इलाहाबाद के पास कौशांबी में हड़प्पा सभ्यता का नया चरण शुरू होने के पुरातात्विक साक्ष्य मिले हैं. इन पुरातात्विक तथ्यों का विश्लेषण करते हुए मेरठ पुरातत्व संग्रहालय के निदेशक डॉ. मनोज गौतम कहते हैं, ''घग्घर-हाकरा या वैदिक सरस्वती के तट पर सिर्फ पूर्व हड़प्पा काल के अवशेष मिलते हैं. जबकि कौशांबी के पास पूर्व हड़प्पा और नव हड़प्पा काल के अवशेष एक साथ मिले हैं. यह संदर्भ सरस्वती नदी के लुप्त होने और गंगा-यमुना के तट पर नई सभ्यता के विकसित होने के तौर पर देखे जा सकते हैं.”

4,000 साल पुराना पानी
आइआइटी ने अभी भले ही पंजाब, हरियाणा और उत्तरी राजस्थान में साउंड रेसिस्टिविटी से सरस्वती का नक्शा तैयार किया हो लेकिन अभी राजस्थान के बाकी हिस्से और गुजरात अपनी बारी की प्रतीक्षा में खड़े हैं. सैटेलाइट इमेज दिखाती है कि सरस्वती की घाटी हरियाणा में कुरुक्षेत्र, कैथल, फतेहाबाद, सिरसा, अनूपगढ़, राजस्थान में श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, थार का मरुस्थल और फिर गुजरात में खंभात की खाड़ी तक जाती थी. अध्ययन के आगे बढऩे पर नदी की बाकी दफन हो चुकी घाटी के मिलने की प्रबल संभावनाएं हैं. राजस्थान के जैसलमेर जिले में बहुत से ऐसे बोरवेल हैं, जिनसे कई साल से अपने आप पानी निकल रहा है. ये बोरवेल 1998 में मिशन सरस्वती योजना के तहत भूमिगत नदी का पता लगाने के लिए खोदे गए थे. इस दौरान केंद्रीय भूजल बोर्ड ने किशनगढ़ से लेकर घोटारू तक 80 किमी के क्षेत्र में 9 नलकूप और राजस्थान भूजल विभाग ने 8 नलकूप खुदवाए. जिले के जालूवाला गांव में गोमती देवी के नलकूप से पिछले दो साल से अपने आप पानी बह रहा है. रेगिस्तान में निकलता पानी लोगों के लिए आश्चर्य से कम नहीं है. इसी तरह अरशद के ट्यूबवेल से भी अविरल जलधारा बह रही है. इस बारे में राजस्थान भूजल विभाग के वैज्ञानिक डॉ. एन.डी. इणखिया कहते हैं कि यह सरस्वती का पानी है या नहीं, यह तो जांच के बाद ही कहा जा सकता है. लेकिन नलकूपों से निकले पानी को भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर ने 3,000 से 4,000 साल पुराना माना था. वैसे आइआइटी की कालगणना अभी बाकी है. यानी आने वाले दिनों में कुछ और रोमांचक जानकारियां मिल सकती हैं.

बचा लो विरासत
वैज्ञानिक साक्ष्य और उनके इर्द-गिर्द घूमते ऐतिहासिक, पुरातात्विक और भौगोलिक तथ्य पाताल में लुप्त सरस्वती की गवाही दे रहे हैं. हालांकि विज्ञान आस्था से एक बात में सहमत नहीं है और इस असहमति के बहुत गंभीर मायने भी हैं. मान्यता है कि सरस्वती लुप्त होकर जमीन के अंदर बह रही है, जबकि आइआइटी का शोध कहता है कि नदी बह नहीं रही है, बल्कि उसकी भूमिगत घाटी में जल का बड़ा भंडार है.

प्रो. सिन्हा आगाह करते हैं कि ऐसे में अगर लुप्त नदी घाटी से लगातार बड़े पैमाने पर बोरवेल के जरिए पानी निकाला जाता रहा तो पाताल में पैठी नदी हमेशा के लिए सूख जाएगी, क्योंकि उसमें नए पानी की आपूर्ति नहीं हो रही है. वे सरस्वती की सही-सही पैमाइश इसीलिए कर रहे हैं, ताकि यह बताया जा सके कि कौन-सा पानी सामान्य भूजल है और कौन सा सरस्वती का संरक्षित जल. वैज्ञानिक तो यही चाहते हैं कि पाताल में जमी नदी के पानी का बेहिसाब इस्तेमाल न किया जाए क्योंकि अगर ऐसा किया जाता रहा तो जो सरस्वती कोई 4,000 साल पहले सतह से गायब हुई थी, वह अब पाताल से भी गायब हो जाएगी. नदी को बचाने की जिम्मेदारी अब उन्हीं लोगों की होगी, जिनके पुरखों को हजारों साल पहले इस नदी ने अपनी घाटी में बसाया था.