गुरुवार, 21 मार्च 2013

मुंबई बम धमाकों के मामले में : संजय दत्त को : पांच साल के कठोर कारावास की सजा



अब मेरा परिवार भी भुगतेगा सजा: संजय दत्त

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नई दिल्ली [माला दीक्षित]। मुंबई में हुए श्रृंखलाबद्ध बम धमाकों के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा संजय दत्त को अवैध हथियार रखने के जुर्म में पांच साल के कठोर कारावास की सजा सुनाए जाने के बाद फैसले पर प्रतिक्रिया जताते हुए उन्होंने गुरुवार को कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मैं भावनात्मक तनाव में हूं। पिछले 20 सालों तक मैंने इसे सहा है। 18 महीने जेल में भी रह चुका हूं। अगर वे चाहते हैं कि मैं और पीड़ा उठाऊं तो इसके लिए मुझे मजबूत होना पड़ेगा।
फैसले के बाद उन्होंने आज मेरा दिल टूट गया क्योंकि अब मेरे साथ तीन बच्चे और पत्‍‌नी और मेरा परिवार भी सजा भुगतेगा। मेरी आंखों में आंसू हों तो भी मैंने हमेशा न्यायिक व्यवस्था का सम्मान किया है और करता रहूंगा। उन्होंने कहा कि मैं जानता हूं कि फिल्म इंडस्ट्री का काफी पैसा मुझपर लगा हुआ है। मैं अपनी सभी फिल्में पूरी करूंगा। किसी को निराश नहीं होने दूंगा। मैं अपने प्रशसंकों, मीडिया, बालीवुड के लोगों और शुभचिंतकों के समर्थन से अभिभूत हूं। वे हमेशा मेरे साथ खड़े रहे हैं। मैं जानता हूं कि दिल से मैं एक अच्छा इंसान रहा हूं। मैंने हमेशा व्यवस्था का सम्मान किया और अपने देश के प्रति मैं वफादार रहा हूं। मेरा परिवार इस समय काफी भावुक है और मुझे उनके लिए मजबूत होना पड़ेगा। भगवान बड़ा दयालु है और इस दौर से मुझे वही निकालेगा।
फिल्म अभिनेता संजय दत्त को गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा। सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई में 1993 में हुए श्रृंखलाबद्ध बम धमाकों के मामले में दत्त को अवैध हथियार रखने के जुर्म में पांच साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। इसके अलावा कोर्ट ने हमले के मुख्य साजिशकर्ता टाइगर मेमन के छोटे भाई याकूब अब्दुल रजाक मेमन को फांसी की सजा सुनाई है, जबकि 10 अन्य की फांसी ताउम्र कैद में तब्दील कर दी है। कोर्ट ने 16 और लोगों की उम्रकैद पर भी अपनी मुहर लगा दी है। इस मामले के मुख्य साजिशकर्ता दाऊद इब्राहिम व टाइगर मेमन अभी भी भगोड़े घोषित हैं।
ये फैसला न्यायमूर्ति पी. सतशिवम व न्यायमूर्ति बीएस चौहान की पीठ ने धमाकों के मामलों में दाखिल अपीलों का निपटारा करते हुए सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद संजय दत्त को साढ़े तीन साल और जेल काटनी होगी। 18 महीने की जेल दत्त मामले की सुनवाई के दौरान भुगत चुके हैं। बाकी सजा भुगतने के लिए संजय दत्त को चार सप्ताह के भीतर समर्पण करना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने संजय दत्त की सजा के खिलाफ दाखिल अपील तो जरूर ठुकरा दी। लेकिन टाडा कोर्ट द्वारा उन्हें सुनाई गई छह वर्ष की कठोर कैद को घटाकर पांच साल कर दिया है। पीठ ने दत्त की प्रोबेशन पर छोड़े जाने की अपील ठुकराते हुए कहा कि अपराध की गंभीरता और प्रकृति को देखते हुए दत्त को प्रोबेशन आफ अफेंडर एक्ट का लाभ नहीं दिया जा सकता।
याकूब मेमन की फांसी पर मुहर लगाते हुए कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष अपना मामला साबित करने में सफल रहा। साक्ष्यों और सहअभियुक्तों के अपराध स्वीकृति के बयान से साबित होता है कि हथियारों का प्रशिक्षण पाकिस्तान सरकार की मदद से दिया गया। यह साबित हुआ कि याकूब अब्दुल रजाक मेमन पूरी साजिश में बहुत गहराई से शामिल था। कोर्ट ने जगह-जगह विस्फोटक लदे वाहन खड़े करने के दोषी बाकी दस अभियुक्तों की मौत की सजा जिंदगी भर की कैद में तब्दील करते हुए कहा कि इन लोगों ने मुख्य साजिशकर्ता के इशारे पर काम किया। इनकी और मुख्य साजिशकर्ता याकूब मेमन के अपराध की डिग्री में अंतर है। हालांकि कोर्ट ने साफ किया कि इन दस लोगों को दी गई कम सजा भविष्य में नजीर नहीं मानी जा सकती। प्रत्येक मामले को उसकी परिस्थितियों और तथ्यों के आधार पर निर्णीत किया जाएगा।
मालूम हो कि 12 मार्च 1993 को मुंबई में 12 जगह श्रृंखलाबद्ध धमाके हुए थे, जिनमें 257 लोग मारे गए थे, जबकि 713 घायल हुए थे। मुंबई की टाडा अदालत ने दत्त सहित 100 लोगों को सजा सुनाई थी, जिसमें 12 को फांसी और 22 को उम्रकैद दी गई थी।

उम्र कैद मतलब जिंदगी भर की कैद
कोर्ट ने साफ किया कि उम्र कैद की सजा का मतलब जीवनभर की कैद होता है। यह गलत धारणा है कि उम्रकैद 14, 20 या 30 साल के लिए होती है। कोर्ट ने साफ किया है कि राज्य अपनी माफी के अधिकार का प्रयोग करते समय कोर्ट द्वारा फैसले में दिए गए कारणों पर जरूर ध्यान दें। फैसले में कोर्ट ने राष्ट्रपति, राज्यपाल और सरकार के माफी के अधिकार पर भी चर्चा की है और इसके सावधानी से उपयोग की बात कही है।

फिर साबित हुई पाकिस्तान की भूमिका
नई दिल्ली [जागरण ब्यूरो]। भारत में आतंकवाद को बढ़ावा देने में पाकिस्तान की भूमिका एक बार फिर साबित हुई है। मुंबई बम धमाकों की साजिश से लेकर उसे अंजाम तक पहुंचाने का प्रशिक्षण पाकिस्तान में दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई बम धमाकों पर पाकिस्तान की इन करतूतों को फैसले में दर्ज करते हुए कहा है कि पाकिस्तान ने न तो आतंकवाद रोकने के अंतरराष्ट्रीय दायित्व का निर्वाह किया और न ही पड़ोसी धर्म निभाया।
सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा है कि अभियुक्तों के अपराध स्वीकृति के बयानों से खुलासा होता है कि इस मामले में भगोड़ा घोषित अपराधियों सहित साजिश में शामिल अपराधियों ने आरडीएक्स से बम बनाने, एके 56 जैसे अत्याधुनिक हथियार चलाने और हथगोले फेंकने की ट्रेनिंग पाकिस्तान में ली थी। यह सब दाऊद इब्राहिम, अनीस इब्राहिम, मोहम्मद दौसा और सलीम बिस्मल्लाह द्वारा तैयार योजना के अनुरूप किया गया था। कोर्ट ने कहा कि मुंबई में सीरियल धमाके पाकिस्तान में दिए गए प्रशिक्षण का ही नतीजा था।
कोर्ट ने कहा है कि यह बड़ी अफसोस की बात है कि संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य होने के बाद भी पाकिस्तान ने आतंकवाद रोकने के अंतरराष्ट्रीय दायित्व का निर्वाह नहीं किया। संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2 (4) कहता है कि एक देश दूसरे देश में आतंकवादी हमले रोकेगा। पाकिस्तान इसमें पूरी तरह विफल रहा।
घटनाओं को देखने से पता चलता है कि अभियुक्त प्रशिक्षण पाने के लिए पाकिस्तान गए और आइएसआइ संचालकों ने उनका स्वागत किया। इतना ही नहीं वे उन्हें बिना इमीग्रेशन औपचारिकताओं के एयरपोर्ट से बाहर निकाल ले गए। इसका मतलब है कि उन लोगों [आतंकवादियों] को पाकिस्तान में ग्रीन चैनल से प्रवेश और निकलने की सुविधा प्राप्त थी। कोर्ट ने कहा कि एक अन्य अपराध स्वीकृति के बयान से पता चलता है कि उन लोगों [दोषियों] को कई बार आइएसआइ के अधिकारियों ने खुद प्रशिक्षण दिया था। इससे साबित होता है कि पाकिस्तान आतंकवाद को बढ़ावा देता है और उसके प्रति सहिष्णु है।
पूरा घटनाक्रम देखने से पड़ोसी राज्य की भूमिका साफ हो जाती है। न सिर्फ बड़े पैमाने पर अभियुक्तों को पाकिस्तान में प्रशिक्षण दिया गया। बल्कि वहां की सरकार ने इस बात का भी पूरा खयाल रखा कि साजिश में पाकिस्तान का नाम न आए। इसके लिए अभियुक्तों को आतंकवाद के प्रशिक्षण के लिए मुंबई से दुबई और दुबई से पाकिस्तान लाया गया और फिर पाकिस्तान से दुबई और दुबई से भारत भेजा गया। कहीं पर भी पाकिस्तान से दुबई जाने की इमीग्रेशन औपचारिकता नहीं हुई ताकि पाकिस्तान का नाम सामने ना आए।

ढाई साल में रिहा हो सकते हैं संजू बाबा
मुंबई [विनोद कुमार मेनन]। संजय दत्त के फैन्स को उम्मीद की एक किरण दिख रही है। हो सकता है कि उनके 'मुन्नाभाई' को साढ़े तीन साल जेल में नहीं रहना पड़े। यदि जेल में व्यवहार अच्छा रहा तो ढाई साल में भी बाहर आ सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने संजय दत्त को शस्त्र अधिनियम के तहत दोषी करार दिया है और पांच साल की सजा सुनाई है। डेढ़ साल वह पहले ही जेल में बिता चुके हैं। अब शेष बचे साढ़े तीन साल के बारे में एक वरिष्ठ जेल अधिकारी का कहना है कि हो सकता है कि संजू बाबा को ढाई साल ही जेल में रहना पड़े। जेल में अच्छे काम और व्यवहार से उन्हें छूट मिल सकती है। यह छूट हर माह सात दिन तक की हो सकती है।
हर कैदी सात दिन छूट पाने का पात्र है। इसमें चार दिन अच्छे काम के लिए और तीन दिन अच्छे व्यवहार के आधार पर छूट दी जाती है। इस तरह संजय को हर साल 84 दिन की छूट पाकर जेल की सजा की वास्तविक अवधि घट सकती है। [मिड डे]

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में पास हो गया है श्रीलंका के खिलाफ प्रस्ताव


श्री लंका में सिहल और तमिल दो बड़े जातीय समूह हें , तमिलों का विवाद राजनैतिक और ५ ० साल से है , इसी क्रम में यह मामला तमिल नर संहार तक आ पंहुचा ....जो अनुचित था ..!



भारत ने दिया श्रीलंका के खिलाफ वोट, प्रस्ताव पास
नई दिल्ली: संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में पास हो गया है श्रीलंका के खिलाफ प्रस्ताव. श्रीलंका में तमिलों के मानवाधिकार हनन के मुद्दे पर भारत ने श्रीलंका के खिलाफ वोट दिया.संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में श्रीलंका के खिलाफ अमेरिका का लाया प्रस्ताव पास हो गया है. वोटिंग में कुल 25 देशों ने अमेरिका के प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया जबकि 13 देशों ने प्रस्ताव के खिलाफ वोट दिया.

आठ देशों ने वोट नहीं डाला. ये प्रस्ताव श्रीलंका में एलटीटीई के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के दौरान तमिलों के मानवाधिकार हनन से जुडा हुआ था. जिस पर भारत ने श्रीलंका के खिलाफ वोट दिया है. खास बात ये है कि पाकिस्तान ने श्रीलंका के पक्ष में वोट दिया. भारत ने अमेरिका के लाए गए प्रस्ताव में एक भी संशोधन पेश नहीं किया.


जेनेवा। भारत ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद [यूएनएचआरसी] में गुरुवार को 24 अन्य देशों के साथ श्रीलंका के खिलाफ मानवाधिकारों के उल्लंघन को लेकर अमेरिका प्रायोजित प्रस्ताव का समर्थन किया। भारत ने श्रीलंका से कहा कि वह मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोपों की स्वतंत्र एवं विश्वसनीय जांच करे। यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर द्रमुक भारत में सत्तारूढ़ संप्रग गठबंधन से अलग हो गया है। 47 सदस्यीय यूएनएचआरसी के पाकिस्तान सहित कुल 13 सदस्य देशों ने इस विवादित प्रस्ताव के विरोध में मतदान किया व श्रीलंका का साथ दिया। आठ सदस्यों ने मतदान में भाग नहीं लिया जबकि एक सदस्य गैबन मताधिकार के मुद्दे की वजह से वोट नहीं डाल सका।
सूत्रों का कहना है कि यह भी देखा गया कि 'प्रमोटिंग रेकंसिलिएशन एंड अकाउंटबिलिटी इन श्रीलंका' यानी 'श्रीलंका में फिर से मेल मिलाप एवं जवाबदेही को बढ़ावा देना' नामक इस प्रभावहीन प्रस्ताव में भारत कुछ लिखित प्रावधान जोड़ना चाहता था। जिसे प्रस्तावकों ने प्रस्ताव के अंतिम दस्तावेज में शामिल नहीं किया।
उनका कहना था कि इससे उद्देश्य पूरा नहीं होगा। अमेरिकी प्रस्ताव में कहा गया कि 'यह चिंता की बात है कि श्रीलंका की कार्रवाई की राष्ट्रीय योजना और आयोग की रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून और अंतरराष्ट्रीय मानवता कानून के उल्लंघन के गंभीर आरोपों का पर्याप्त ढंग से निवारण नहीं करतीं।' इसमें इस पर भी ंिचंता जताई गई है कि श्रीलंका में मानवाधिकारों के उल्लंघन की खबरें आनी जारी हैं।
इनमें बगैर अदालती आदेश के हत्याएं, उत्पीड़न और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हक का उल्लंघन, संघ या शांतिपूर्ण ढंग से लोगों के एक जगह जमा होने के साथ मानवाधिकारों की रक्षा के लिए आगे आने वाले नागरिकों एवं पत्रकारों को डराना-धमकाना और बदला लेना, न्यायिक स्वतंत्रता और कानून के शासन को खतरा और धर्म या आस्था के आधार पर भेदभाव के मामले शामिल हैं। इस प्रस्ताव में हस्तक्षेप करते हुए भारत के स्थायी प्रतिनिधि दिलीप सिन्हा ने कहा, 'हम मानवाधिकारों के उल्लंघन एवं नागरिकों के जीवन को हुई क्षति के आरोपों की एक स्वतंत्र एवं विश्वसनीय जांच की अपनी मांग दोहराते हैं। हम चिंता के साथ इसका उल्लेख करते हैं कि श्रीलंका द्वारा इस परिषद से वर्ष 2009 में किए गए वादों को पूरा करने में अपर्याप्त प्रगति हुई है।'
इस तरह भारत ने छह पैराग्राफ में सात लिखित संशोधन दिए थे। जिस पर श्रीलंका ने आधिकारिक प्रतिक्रिया में कहा है कि वह भारत सरकार की घरेलू मजबूरियों को समझता है। इस अवसर पर अमेरिका ने कहा कि कुछ क्षेत्रों में हुई प्रगति की उसे जानकारी है लेकिन अभी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। श्रीलंका हर हाल में सार्थक कार्रवाई करे और बढ़ती चिंता का निवारण करे। श्रीलंका ने इस प्रस्ताव की निंदा करते हुए कहा है कि यहां जो प्रस्ताव पेश किया गया है वह स्पष्ट रूप से उसके लिए अस्वीकार्य है।

प्रस्ताव के समर्थन में मतदान करने वाले प्रमुख देश -भारत,बेनिन, लीबिया, सिएरा लियोन, अर्जेटीना, ब्राजील, ऑस्ट्रिया, जर्मनी, आयरलैंड, इटली, स्पेन, स्विटजरलैंड और दक्षिण कोरिया।
प्रस्ताव के विरोध में मतदान करने वाले प्रमुख देश -पाकिस्तान, कांगो, मालदीव, थाइलैंड, यूएई, कतर, कुवैत, इक्वाडोर।
मतदान में भाग नहीं लेने वाले देश- केन्या, जापान, मलेशिया, कजाखिस्तान इथापिया, बोत्सवाना।