शनिवार, 4 मई 2013

टूट गया तीस्ता का तिलिस्म-अरुण कुमार सिंह




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शनिवार, 4 मई 2013
टूट गया तीस्ता का तिलिस्म
तीस्ता का जन्म एक  गुजराती हिन्दू परिवार में 1961 में हुआ था। मुंबई में पढ़ने के दौरान वह एक मुस्लिम युवक के प्यार में पड़ गईं। कुछ दिनों तक पति-पत्नी ने पत्रकारिता की। 1992 में बाबरी ढांचे के ढहने के बाद तथाकथित साम्प्रदायिक ताकतों से लड़ने के लिए इन दोनों ने अगस्त 1993 में कम्युनल काम्बेट की शुरुआत की। कम्युनल काम्बेट के प्राय: हर अंक में हिन्दुत्वनिष्ठ संगठनों को गाली दी जाती है।  शायद इसीलिए सोनिया के निर्देश पर चलने वाली केंद्र सरकार ने तीस्ता को पद्मश्री से नवाजा है। तीस्ता राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् की भी सदस्या हैं। सोनिया गांधी की अध्यक्षता में इसी परिषद् ने साम्प्रदायिक हिंसा रोकथाम विधेयक तैयार किया है। इस विधेयक में अनेक ऐसी बातें हैं, जो देश को साम्प्रदायिकता के आधार पर बांटती हैं।
 अरुण कुमार सिंह

आपने  तीस्ता जावेद सीतलवाड का नाम जरूर सुना होगा। वही तीस्ता, जिन्होंने एक हल्ला, एक ढोंग और गुजरात के दंगा पीड़ितों की आड़ में एक मायाजाल रचा था। लेकिन छद्म सेकुलरवाद का वह गढ़ दरकने लगा है। तीस्ता का झूठ बाहर आने लगा है। न्यायालय से उन्हें डांट भी पड़ी है।
तीस्ता ने  अपने आपको देश - विदेश में यह बताने की कोशिश की है कि वह बड़ी सामाजिक कार्यकर्ता हैं और गुजरात के दंगा पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए काम कर रही हैं। किन्तु अब उनकी पोल उनके अपने लोग ही खोल  रहे हैं। यही नहीं तीस्ता  जिनको  न्याय दिलाने का  दंभ भरती हैं  वे लोग ही अब उन्हें अपने घर में घुसने तक नहीं देते हैं। वे लोग तीस्ता से उन 75 लाख रुपए का हिसाब भी मांग रहे हैं जो  दंगा पीड़ितों की मदद के नाम पर दुनिया भर से इकट्ठे  किये गए हैं।
तीस्ता और उनके पति जावेद आनंद  'सिटीजन ऑफ जस्टिस एंड पीस' नाम से एक गैर-सरकारी संस्था चलाते हैं। ये दोनों 'कम्युनल काम्बेट' नामक एक अंग्रेजी  मासिक पत्रिका का संपादन भी करते हैं। गौरतलब है कि 1999 के आम चुनाव के दौरान एक अभियान भाजपा और राष्ट्रवादी शक्तियों को निशाना बनाते हुए इसी बैनर तले चलाया गया था। अपनी संस्था के लिए ये दोनों जमकर विदेशी चन्दा जमा करते हैं। कुछ समय पहले यह भी खुलासा हुआ है कि ये दोनों  कांग्रेस, माकपा, भाकपा आदि राजनीतिक दलों से पैसे लेकर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भाजपा और अन्य हिन्दुत्वनिष्ठ संगठनों के खिलाफ  लेख और विज्ञापन प्रकाशित करते हैं। 1999 के आम चुनाव से पहले कांग्रेस, माकपा और भाकपा से कम्युनल काम्बेट को एक करोड़ 50 लाख रु. सिर्फ इसलिए मिले थे कि भाजपा के खिलाफ पूरे देश में  मुहिम चलाओ।
यूं कूटा जाता है माल
2002  के दंगों के बाद गुजरात में गैर-सरकारी संगठनों की बाढ़ आ गई थी। अपने को सेकुलर और प्रगतिशील मानने वाले अनेक लोगों ने एन.जी.ओ. बनाकर पीड़ितों की मदद करने का ढोंग रचा। इन्हें देश की कथित सेकुलर सरकारों और राजनीतिक दलों से पैसा तो मिला ही, विदेशों से भी पैसा खूब मिल रहा है। तीस्ता की संस्था 'सिटीजन ऑफ जस्टिस एण्ड पीस' को नीदरलैण्ड की एक संस्था एच.आई.वी.ओ.एस. से 23 नवम्बर 2009 को लगभग 7 लाख रुपए मिले थे। इसके अलावा तीस्ता के वकील मिहिर देसाई को नवम्बर 2009 में ही पहली बार 45 हजार और दूसरी बार 75 हजार रुपए मिले थे।

जैसे-जैसे सच सामने आ रहे हैं तीस्ता का तिलिस्म टूट रहा है। गत 28 फरवरी को अमदाबाद की गुलबर्ग सोसायटी में तीस्ता को वहां के लोगों ने घुसने तक नहीं दिया। मालूम हो कि हर साल 28 फरवरी को दंगा पीड़ितों की याद में गुलबर्ग सोसायटी में एक कार्यक्रम होता है और लोग फातिहा पढ़ते हैं। जब तीस्ता को गुलबर्ग सोसायटी में नहीं जाने दिया गया तब उन्होंने दंगा-पीड़ितों की एक अन्य बस्ती सिटीजन नगर में मृतकों की याद में फातिहा पढ़ा। इस बार गुलबर्ग सोसायटी के लोगों ने तीस्ता पर यह आरोप लगाया कि उन्होंने दंगा पीड़ितों की आड़ में देश- विदेश से करोड़ों रुपए जमा किये पर लोगों के बीच एक पैसा नहीं बांटा गया।
इधर तीस्ता के एक सहयोगी रहे रईस खान पठान ने भी तीस्ता पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं। पठान ने अदालत में शपथपत्र देकर आरोप लगाया है कि तीस्ता ने  गुजरात दंगों के सिलसिले में बहुत सारे झूठे मामले दायर किये हैं। नरोदा पाटिया का मामला पूरी तरह मनगढ़ंत है। पठान के इस दावे के  बाद गुजरात उच्च न्यायालय ने 11 जुलाई 2011 को आदेश दिया था कि इस मामले की जांच की जाय। इस आदेश के खिलाफ तीस्ता सर्वोच्च न्यायालय पहुंचीं और 2 सितम्बर 2011 को न्यायमूर्ति आफताब आलम की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने इस जांच पर रोक लगा दी। इस साल अप्रैल के प्रथम सप्ताह में रईस खान पठान ने सर्वोच्च न्यायालय से निवेदन किया है कि जांच होने दी जाय नहीं तो यह मामला बिगड़ सकता है, गवाहों को भटकाया जा सकता है। ऐसा होने पर सच कभी सामने नहीं आएगा। पठान ने कुछ दिन पहले सर्वोच्च न्यायालय में एक और शपथपत्र दाखिल किया है जिसमें कहा गया है कि तीस्ता की संस्था को नीदरलैंड की एक संस्था एच.आई.वी.ओ.एस. से अनुदान मिलता है। उसी शपथपत्र में यह भी कहा गया है कि न्यायमूर्ति आफताब आलम की बेटी शाहरुख आलम को भी उसी संस्था से पैसा मिलता है। पठान ने अदालत से यह भी निवेदन किया है  कि  गुजरात दंगों से जुड़े मामलों से न्यायमूर्ति आलम को दूर रखा जाय। (हालांकि न्यायमूर्ति आलम अब सेवानिवृत्त हो गए हैं।)
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एस आई टी) ने भी अपनी रपट में तीस्ता के झूठों का पर्दाफाश किया है । एस आई टी ने लिखा है कि कौसर बानो नामक गर्भवती महिला के साथ सामूहिक बलात्कार नहीं हुआ है और न ही पेट फाड़कर उसका बच्चा निकालने की कोई घटना हुई है। नरोदा पाटिया में कुएं में लाशों को दफनाने की बात भी गलत है। जरीना मंसूरी नामक महिला, जिसे नरोदा पाटिया में जिन्दा जलाने की बात की गयी थी, कुछ महीने पहले ही टी बी से मर चुकी थी। एस आई टी ने यह भी कहा है कि  तीस्ता ने अदालत से भी झूठ बोला है।
अदालत से झूठ बोलने के मामले में न्यायालय ने भी तीस्ता को कई बार फटकार लगाई है। कुछ समय पहले विदेशी संस्थाओं के सामने गुजरात दंगों के मामले उठाने पर भी न्यायालय ने तीस्ता को डांट लगाई थी। इसके बावजूद तीस्ता गुजरात सरकार को बदनाम करने के लिए झूठ  बोलती   रहती हैं।






पोर्न साइट्स पर सरकार रोक लगाने जा रही हे


एक अच्छी खबर आ रही हे कि सरकार पोर्न सीटों पर रोक लगाने जा रही हे

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पोर्न साइट्स पर सरकार का हमला! 546 साइट्स बैन करने की तैयारी
अमित मिश्रा  |  Apr 22, 2013

नई दिल्ली। दुष्कर्म की बढ़ती घटनाओं और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद सरकार पोर्न साइट्स पर पाबंदी लगाने की तैयारी में है। साइबर अपराध शाखा और खुफिया विभाग की जांच टीम ने सरकार को सौंपी रिपोर्ट में बताया है कि इंटरनेट के जरिए 60 प्रतिशत तक अश्लील साइट्स को देखा जाता है। यानी इंटरनेट के जरिए की जाने वाली कुल सर्फिंग में से करीब 60 फीसदी ये साइट्स देखी जाती हैं। लगभग 546 साइट्स को प्रतिबंधित करने के लिए चिह्नित किया जा चुका है। इन साइट्स पर प्रतिबंध लगाने के लिए सरकार गूगल और याहू जैसी इंटरनेट सेवा देने वाली कंपनियों की भी मदद लेगी। उल्लंघन करने पर सर्च इंजन पर रोक जैसे कड़े कदम भी उठाए जा सकते हैं।

गुडिय़ा से दुष्कर्म के मुख्य आरोपी मनोज ने यह स्वीकार किया है कि वारदात को अंजाम देने से पहले उसने अश्लील साइट्स पर कई क्लिपिंग्स देखी और उसके बाद उसने यह कुकर्म किया। इस खुलासे के बाद अब समाज के हर वर्ग से इन वेबसाइट्स को बंद करने की मांग उठने लगी है।


रेलमंत्री पवन कुमार बंसल के भांजे विजय सिंगला रिश्वत कांड में गिरिफ्तर





 रेलमंत्री पवन कुमार बंसल के भांजे विजय सिंगला रिश्वत कांड में गिरिफ्तर  

Dainik Jagran Hindi News

04 May 2013
नई दिल्ली [जागरण ब्यूरो]।

करोड़ों की रिश्वत देकर रेलवे बोर्ड का सदस्य बनाए जाने के मामले में रेल मंत्री पवन कुमार बंसल भले ही भांजे विजय सिंगला से अपने संबंधों को नकार रहे हों, लेकिन उनके लिए सीबीआइ के सवालों का जवाब देना मुश्किल हो सकता है। छापे के दौरान जब्त दस्तावेजों और गिरफ्तार आरोपियों से जो कुछ जानकारी मिली है, उससे जांच का दायरा बड़ा हो गया है।

मामले को तूल पकड़ता देख रेल मंत्री पवन बंसल ने प्रधानमंत्री से मुलाकात कर अपने इस्तीफे की पेशकश की। हालांकि कांग्रेस ने उनका बचाव करते हुए कहा है कि इस मामले में रेल मंत्री ने अपनी सफाई दे ही है और उनके इस्तीफे का सवाल ही नहीं उठता।

कांग्रेस के प्रवक्ता जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि इस मामले में रेल मंत्री का सफाई आ गया है। उन्होंने खुद कहा है कि इस मामले में पूरी जांच होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि इससे ज्यादा आप रेल मंत्री से अपेक्षा नहीं कर सकते हैं। उनके इस्तीफे का सवाल ही नहीं उठता। उन्होंने विपक्षी पार्टियों पर निशाना साधते हुए कहा कि उन्हें इस्तीफा मांगने का रोग हो गया है। शनिवार की शाम हुई कांग्रेस कोर कमिटी की बैठक में भी इस मामले पर कोई फैसला नहीं हो पाया। ऐसा कयास लगाया जा रहा है कि अभी संप्रग देखो और इंतजार करो की नीति पर अमल करेगी।

ऐसा माना जा रहा है कि महेश कुमार को रेलवे बोर्ड का सदस्य [स्टाफ] बनाने के साथ-साथ टेलीकम्युनिकेशन और सिग्नलिंग का अतिरिक्त प्रभार देने का सौदा भी हुआ था। जीएम पश्चिम रेलवे का प्रभार भी उन्हीं के पास है। रेलमंत्री बंसल से सीबीआइ इस खास मेहरबानी की वजह जरूर जानना चाहेगी। जांच एजेंसी ने एफआइआर में स्पष्ट रूप से कहा है कि ये सारे पद महेश कुमार को एक साजिश के तहत दिए जाने थे, जिसके लिए दो करोड़ रुपये का सौदा हुआ था। सूत्रों के मुताबिक सीबीआइ को इसकी भनक लग चुकी थी, जिसके आधार पर महेश कुमार और सिंगला के टेलीफोन से होने वाली बातचीत जहां सुनी जा रही थी, वहीं मोबाइल फोन के जरिये उनकी लोकेशन पर लगातार नजर रखी जा रही थी। जिन लोगों पर संदेह था, उन्हें सर्विलांस पर रखा गया था। लेकिन उन्हें गिरफ्तार करने के लिए रिश्वत देने का इंतजार किया जा रहा था।

आरोपियों की रिमांड मांगते हुए पटियाला हाऊस अदालत में सीबीआइ ने दलील भी दी है कि उसे 90 लाख रुपये की रिश्वत का अंतत: लाभ लेने वाले का पता करना है। इसकी जांच के लिए इन अभियुक्तों से पूछताछ करना जरूरी है। जांच एजेंसी ने यह कहकर बंसल की मुश्किलें बढ़ाने के संकेत दे दिए हैं।

सीबीआइ का कहना है कि महेश कुमार को बोर्ड सदस्य [इलेक्ट्रिकल] बनाने के लिए दस करोड़ में सौदा हुआ था। सौदे के तहत महेश कुमार ने मांग रखी थी कि जब तक उन्हें सदस्य इलेक्ट्रिकल नहीं बनाया जाता, तब तक उन्हें टेलीकम्यूनिकेशन और सिग्नलिंग का अतिरिक्त प्रभार भी दिया जाए। इसके लिए दो करोड़ रुपये देने पर महेश कुमार ने हामी भरी थी। बाकी पैसे सदस्य [इलेक्ट्रिकल] बनने के बाद देने थे।

मामले में चौतरफा दबाव के बाद रेल मंत्री ने शनिवार की सुबह सफाई देते हुए कहा है कि इस रिश्वत कांड से मेरा कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने कहा कि मेरे सरकारी कामकाज में किसी का दखल नहीं है। विजय का भी नहीं। रेल मंत्री ने यहां तक कहा कि इस मामले की उन्हें कोई जानकारी नहीं थी। उन्होंने सीबीआई से मांग की कि वह इस मामले में जल्दी जांच करे। शनिवार को बंसल को चंड़ीगढ़ जाना था, लेकिन उन्होंने अपना दौरा रद्द कर दिया है।

इस बीच इस मुद्दे पर एनडीए में भी फूट दिख रही है। जेडीयू के नेता शरद यादव ने कहा है कि अगर किसी मंत्री का कोई रिश्तेदार रिश्वतखोरी में शामिल है तो उसका यह मतलब नहीं कि मंत्री इसके लिए जिम्मेदार है। उन्होंने कहा कि मुझे नहीं लगता कि रेल मंत्री को इस्तीफा देना चाहिए। उधर, भाजपा ने प्रधानमंत्री से बंसल का इस्तीफा मंजूर करने और खुद पीएम को भी इस्तीफा देने की मांग की है। रेलवे के वरिष्ठ अधिकारी द्वारा नब्बे लाख रुपये की घूस दिए जाने के मामले में भाजपा रेल मंत्री के इस्तीफे और उन पर सीबीआइ द्वारा मामला दर्ज कराने पर अड़ी है। भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद ने आरोप लगाया है कि रेलवे में ऊंचे पदों की बोली लग रही है। उन्होंने रिश्वत मामले में रेल मंत्री की भूमिका जांच की भी मांग की है।

उद्योगपतियों के हवाले था रिश्वत का इंतजाम
रिश्वत के इंतजाम की जिम्मेदारी महेश कुमार के कहने पर उद्योगपतियों ने संभाली थी, लेकिन बेंगलूर का उद्योगपति मंजूनाथ केवल 90 लाख का इंतजाम कर पाया था, जो पकड़ा गया। जांच एजेंसी के निशाने पर बेंगलूर की जीजी ट्रॉनिक्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के साथ वे कंपनियां भी हैं, जो महेश कुमार को रेलवे बोर्ड का सदस्य (इलेक्ट्रिकल) बनाने के लिए रिश्वत देने के इंतजाम में जुड़ी थीं। इस पूरे मामले में बिचौलिये की भूमिका पंचकुला के संदीप गोयल ने निभाई। दरअसल आने वाले दिनों में इलेक्ट्रिकल क्षेत्र में 2000 करोड़ रुपये की परियोजनाएं शुरू होने वाली हैं। सूत्रों के मुताबिक उद्योगपतियों की नजर इसी परियोजना पर थी।