रविवार, 5 मई 2013

आजादी या धोखा



2G घोटाला 1.76 लाख करोड़,

CWG घोटाला 70 हजार करोड़,

कोल घोटाला 10.26 लाख करोड़,

सैन्य हेलीकॉप्टर घोटाला याद रहे,

लोकपाल याद रहे, CBI का दुरुपयोग याद रहे,

शहीद राजबाला याद रहे,

डीजल, पेट्रोल और मंहगाई याद रहे,

सैनिकोँ के कटे सर याद रहे और फिर अजमेर मेँ पाक पीएम का लंच याद रहे,

FDI याद रहे,

लद्दाख की घुसपैठ याद रहे,

असम, हैदराबाद और बंगाल मेँ हिन्दुओँ का कत्लेआम याद रहे,
सोनिया का खासमखास अकबरुद्दीन याद रहे,

हिन्दुओँ को आतंकवादी कहना याद रहे,

और अंत मेँ अपना शेर सरबजीत सिँह याद रहे....

तब ही अपने को जागरुक नागरिक समझेँ। याद रखेँ आपकी कमजोर याददाश्त ही कांग्रेस की संजीवनी है।


Saadda HAQ! Etthey RAKH
05-05-2013 Facebook
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आजादी नहीं धोखा है, देश का समझौता है शासन नहीं शासक बदला है, गोरा नहीं अब काला है 15 अगस्त 1947 को देश आजाद नहीं हुआ तो हर वर्ष क्यों ख़ुशी मनाई जाती है ?

क्यों भारतवासियों के साथ भद्दा मजाक किया जा रहा है l इस सन्दर्भ में निम्नलिखित तथ्यों को जानें .... :

1. भारत को सत्ता हस्तांतरण 14-15 अगस्त 1947 को गुप्त दस्तावेज के तहत, जो की 1999 तक प्रकाश में नहीं आने थे (50 वर्षों तक ) l
...
2. भारत सरकार का संविधान के महत्वपूर्ण अनुच्छेदों में संशोधन करने का अधिकार नहीं है l

3. संविधान के अनुच्छेद 348 के अंतर्गत उच्चतम न्यायलय, उच्च न्यायलय तथा संसद की कार्यवाही अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी में होने के बजाय अंग्रेजी भाषा में होगी l

4. अप्रैल 1947 में लन्दन में उपनिवेश देश के प्रधानमंत्री अथवा अधिकारी उपस्थित हुए, यहाँ के घोषणा पात्र के खंड 3 में भारत वर्ष की इस इच्छा को निश्चयात्मक रूप में बताया है की वह ...
क ) ज्यों का त्यों ब्रिटिश का राज समूह सदस्य बना रहेगा तथा
ख ) ब्रिटिश राष्ट्र समूह के देशों के स्वेच्छापूर्ण मिलाप का ब्रिटिश सम्राट को चिन्ह (प्रतीक) समझेगा, जिनमे शामिल हैं .. .(इंग्लैंड, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैण्ड, दक्षिण अफ्रीका, पाकिस्तान, श्री लंका) ... तथा
ग ) सम्राट को ब्रिटिश समूह का अध्यक्ष स्वीकार करेगा l

5. भारत की विदेश नीति तथा अर्थ नीति, भारत के ब्रिटिश का उपनिवेश होने के कारण स्वतंत्र नहीं है अर्थात उन्हीं के अधीन है l

6. नौ-सेना के जहाज़ों पर आज भी तथाकथित भारतीय राष्ट्रीय ध्वज नहीं हैl

7. जन गन मन अधिनायक जय हे ... हमारा राष्ट्र-गान नहीं है, अपितु जार्ज पंचम के भारत आगमन पर उसके स्वागत में गाया गया गान है, उपनिवेशिक प्रथाओं के कारण दबाव में इसी गीत को राष्ट्र-गान बना दिया गया ... जो की हमारी गुलामी का प्रतीक है l

8. सन 1948 में बने बर्तानिया कानून के अंतर्गत भाग 1 (1) 1948 के बर्तानिया के कानून के अनुसार हर भारतवासी बर्तानिया की रियाया है और यह कानून भारत के गणराज्य प्राप्त कर लेने के पश्चात भी लागू है l

9. यदि 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ तो प्रथम गवर्नर जनरल माउन्ट-बेटन को क्यों बनाया गया ??

10. 22 जून 1948 को भारत के दुसरे गवर्नर के रूप में चक्रवर्ती राजगोपालचारी ने निम्न शपथ ली l"मैं चक्रवर्ती राजगोपालचारी यथाविधि यह शपथ लेता हूँ की मैं सम्राट जार्ज षष्ठ और उनके वंशधर और उत्तराधिकारी के प्रति कानून के मुताबिक विश्वास के साथ वफादारी निभाऊंगा, एवंमैं चक्रवर्ती राजगोपालचारी यह शपथ लेता हूँ की मैं गवर्नर जनरल के पद पर होते हुए सम्राट जार्ज षष्ठ और उनके वंशधर और उत्तराधिकारी की यथावत सव्वा करूँगा l "

11. 14 अगस्त 1947 को भारतीय स्वतन्त्रता विधि से भारत के दो उपनिवेश बनाए गए जिन्हें ब्रिटिश Common-Wealth की ...धारा नं. 9 (1) - (2) - (3) तथाधारा नं. 8 (1) - (2)धारा नं. 339 (1)धारा नं. 362 (1) - (3) - (5)G - 18 के अनुच्छेद 576 और 7 के अंतर्गत ....इन उपरोक्त कानूनों को तोडना या भंग करना भारत सरकार की सीमश्क्ति से बाहर की बात है तथा प्रत्येक भारतीय नागरिक इन धाराओं के अनुसार ब्रिटिश नागरिक अर्थात गोरी सन्तान है l

12. भारतीय संविधान की व्याख्या अनुच्छेद 147 के अनुसार गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट 1935 तथा indian independence act 1947 के अधीन ही की जा सकती है ... यह एक्ट ब्रिटिश सरकार ने लागू किये l

13. भारत सरकार के संविधान के अनुच्छेद नं. 366, 371, 372 एवं 392 को बदलने या रद्द करने की क्षमता भारत सरकार को नहीं है l

14. भारत सरकार के पास ऐसे ठोस प्रमाण अभी तक नहीं हैं, जिनसे नेताजी की वायुयान दुर्घटना में मृत्यु साबित होती है l इसके उपरान्त मोहनदास गांधी, जवाहरलाल नेहरू, मोहम्मद अली जिन्ना और मौलाना अबुल कलाम आजाद ने ब्रिटिश न्यायाधीश के साथ यह समझौता किया कि अगर नेताजी ने भारत में प्रवेश किया, तो वह गिरफ्तार ककर ब्रिटिश हुकूमत को सौंप दिया जाएगाlबाद में ब्रिटिश सरकार के कार्यकाल के दौरान उन सभी राष्ट्रभक्तों की गिरफ्तारी और सुपुर्दगी पर मुहर लगाईं गई जिनको ब्रिटिश सरकार पकड़ नहीं पाई थी l

15. डंकल व् गैट, साम्राज्यवाद को भारत में पीछे के दरवाजों से लाने का सुलभ रास्ता बनाया है ताकि भारत की सत्ता फिर से इनके हाथों में आसानी से सौंपी जा सके lउपरोक्त तथ्यों से यह स्पष्ट होता है की सम्पूर्ण भारतीय जनमानस को आज तक एक धोखे में ही रखा गया है, तथाकथित नेहरु गाँधी परिवार इस सच्चाई से पूर्ण रूप से अवगत थे परन्तु सत्तालोलुभ पृवृत्ति के चलते आज तक उन्होंने भारत की जनता को अँधेरे में रखा और विश्वासघात करने में पूर्ण रूप से सफल हुए l सवाल उठता है कि ... यह भारतीय थे या .... काले अंग्रेज ? नहीं स्वतंत्र अब तक हम, हमे स्वतंत्र होना हैकुछ झूठे देशभक्तों ने, किये जो पाप, धोना हैसरदार भगत सिंह कि मृत्यु के पीछे अंग्रेजों के कानूनों के बहाने गुंडागर्दी एवं क्रूरता के राज्य का पर्दाफाश करना एवं भारत के नौजवानों को भारत कि पीड़ा के प्रति जागृत करना उद्देश था l

राजीव दीक्षित कि शहादत भी षड्यंत्रकारी प्रतीत होती है, SEZ , परमाणु संधि, विदेशी बाजारों के षड्यंत्र ... आदि योजनाओं एवं कानूनी मकडजाल में फंसे भारत को जागृत करने तथा नवयुवकों को इन कार्यों के लिए आगे लाने के कारण l यदि भगत सिंह और राजीव दीक्षित और समय तक जीवित रहते तो परिवर्तन और रहस्यों कि परत और खुल सकती थी l भारत इतना गरीब देश है कि 100000,0000000 (1 लाख करोड़) के रोज रोज नए नए घोटाले होते हैं.... ?

क्या गरीब देश भारत से साड़ी दुनिया के लुटेरे व्यापार के नाम पर 20 लाख करोड़ रूपये प्रतिवर्ष ले जा सकते हैं ? विदेशी बेंकों में जमा धन कितना हो सकता है ? एक अनुमान के तहत 280 लाख करोड़ कहा जाता है ? पर यह सिर्फ SWISS बेंकों के कुछ बेंकों कि ही report है ... समस्त बेंकों कि नहीं, इसके अलावा दुनिया भर के और भी देशों में काला धन जमा करके रखा हुआ है ?

भारत के युवकों, अपनी संस्कृति को पहचानो, जिसमे शास्त्र और शस्त्र दोनों कि शिक्षा दी जाती थी l आज तुम्हारे पास न शास्त्र हैं न शस्त्र हैं .. क्यों ?? क्या कारण हो सकते हैं ??भारत गरीब नहीं है ... भारत सोने कि चिड़िया था ... है ... और सदैव रहेगा l तुम्हें तुम्हारे नेता, पत्रकार और प्रशासक झूठ पढ़ाते रहे हैं l

वो इतिहास पढ़ा है तुमने जो नेहरु के प्रधानमंत्री निवास में 75 दिनों तक अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय और अंग्रेजों के निर्देशों पर बनाया गया lजिसमे प्राचीन शिव मन्दिर तेजो महालय को ताज महल, ध्रुव स्तम्भ को क़ुतुब मीनार और शिव मन्दिर को जामा मस्जिद ही पढ़ाया जाता है lसारे यूरोप - अमेरिका के लिए लूट का केंद्र बने भारत को गुलामी कि जंजीरों से मुक्त करवाने हेतु आगे आओ l उठो.... सत्य और धर्म की संस्थापना कि हुंकार तो भरो एक बार, विश्व के सभी देशों कि बोद्धिक संपदा बने भारत l

जय हिंद..

100 वर्षों में भारत के कितनी बार टुकडे किये गए





क्या आप जानते हैं पिछले 100 वर्षों में भारत के कितनी बार टुकडे किये गए
और उसके पीछे किसकी सरकार और सोच रही है ......

सन 1911 में भारत से श्री लंका अलग हुआ ,जिसको तत्कालीन कांग्रेसी नेताओं का समर्थन प्राप्त था

सन 1947 में भारत से बर्मा -म्यांमार अलग हुआ ,

सन 1947 में भारत से पाकिस्तान अलग हुआ । कारण कांग्रेस ही थी

सन 1948 में भारत से आज़ाद कश्मीर काटकर अलग कर दिया गया और नेहरु जी की नीतियों ने सरदार पटेल के हाथ बांधे रखे

सन 1950 में भारत से तिब्बत को काटकर अलग कर दिया गया और नेताओं ने मुह बंद रखा

सन 1954 में बेरुबादी को काट कर अलग कर दिया गया

सन 1957 में चीन ने भारत के कुछ हिस्से हड़प लिए और नेहरु ने कहा की यह घास फूंस वाली जगह थी

सन 1962 में चीन ने अक्साई चीन का 62000 वर्ग मिल क्षेत्र भारत से छीन लिया ,और नेहरु जी हिंदी चीनी भाई-भाई कहते रहे । जब हमारी सेनाओं ने चीन से लड़ाई लड़ने का निर्णय किया और कुछ मोर्चों पर जीत की स्थिति में थी तो इन्ही नेहरु ने सीज फायर करा दिया

सन 1963 में टेबल आइलैंड पर बर्मा ने कब्ज़ा कर लिया ,और हम खामोश रहे । वहां पर म्यामांर ने हवाई अड्डा बना रखा है

सन 1963 में ही गुजरात का कच्छ क्षेत्र छारी फुलाई को पाकिस्तान को दे दिया गया

सन 1972 में भारत ने कच्छ तिम्बु द्वीप सर लंका को दे दिया

सन 1982 में भारत के अरुणांचल के कुछ हिस्से पर चीन ने कब्ज़ा कर लिया , और हम बात करते रहे

सन 1992 में भारत का तीन बीघा जमीनी इलाका बांगला देश ने लेकर चीन को सौंप दिया ।

सान 2012 मे भी बांग्लादेश को कुछ वर्गमील इलाका कॉंग्रेस ने दिया और कहा की ये दलदली इलाका था

इसके अलावा भी अनेक छोटी बड़ी घटनाएं होती रहती हैं जिनका रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है , जैसे कि हाल ही की चीन की घटना है , जिस पर कोई अधिकारिक दस्तावेज अभी जारी नहीं किया गया है।

वैसे एक बात और ध्यान देने वाली है की जब भारत की धरती यूंही बंजर, घास-फूस वाली तथा दलदली है तो इन कोंग्रेसियों को हमारी इस धरती मे इतनी दिलचस्पी क्यूँ है। या जैसे अमुक सारे देशों से ये कोंग्रेसी खतम हो चुके हैं वैसे ही यहाँ से भी खतम हो कर ही मानेंगे।

अब आप स्वयं विचार करें की हम कहाँ जा रहे हैं ?

नाथद्वारा : पुष्टि मार्ग के प्रवर्तक महाप्रभु वल्लभाचार्य


http://epaper.bhaskar.com/Kota

पुष्टि मार्ग के प्रवर्तक महाप्रभु वल्लभाचार्य


- पं. बाबूलाल जोशी

॥जब तुलसी के मानस, मीरा की भक्ति, कबीर के पद व सूर के गीतों द्वारा भक्ति आंदोलन मुखर हो उठा था। तब महाप्रभु वल्लभाचार्य ने पुष्टि मार्ग को प्रशस्त किया। जानते हैं उनकी महिमा को।


चौरासी शिष्यगणों को किया मनोनीत

ऐसे विश्व विख्यात हुआ नाथद्वारा 

बाल मनोहारी सिद्धांतों में ब्रह्म, जीव, जगत, माया, आविर्भाव-तीरोर्भाव तथा ब्रह्म संबंधों की जानकारियां प्रदान कराने वाला वल्लभाचार्य अरावली की श्रेणियों के बीच उदयपुर राजस्थान से 50 किलोमीटर दूर विक्रम संवत् 1564 में श्रीनाथ मुख्य पीठ के रूप में स्थापित किया। श्री वल्लभाचार्य ने श्रीनाथ मंदिर की स्थापना से पहले संपूर्ण पृथ्वी की न केवल परिक्रमा की अपितु भारतभर में चौरासी बैठकों द्वारा चौरासी शिष्यगणों को मनोनीत किया। वर्षभर में सृष्टि आरंभ दिवस चैत्र शुक्ल प्रतिपदा संवत्सर उत्सव, गणगौर, वैशाख कृष्ण एकादशी, अक्षय तृतीया, नरसिंह जयंती, स्नान यात्रा, वृत यात्रा, श्रावण शुक्ल एकादशी, पवित्रा एकादशी, जन्माष्टमी, नंद महोत्सव, दशहरा, शरद पूर्णिमा, दीपमालिका, अन्नकूट, यम द्वितीया, गोपाष्टमी, प्रबोधिनी एकादशी, डोलोत्सव के अलावा हवेली संगीत, फागुन के रास-रंग उत्सव, दुनियाभर में ख्याति लिए हैं।

आचार्यश्री ने श्री गोवर्धननाथ की बाल सेवा की परिपाटी को महत्व दिया और श्रीनाथ के नाम से उसे प्रसिद्ध किया। उस समय देश में आक्रांताओं के उत्पाद चरम की ओर बढ़ रहे थे। ब्रज मंडल उत्तर प्रदेश न केवल घिर गया था, अपितु श्री विग्रह का मंदिर भी ध्वस्त कर दिया गया था। ऐसे में प्रभु वल्लभाचार्य ने श्री विग्रह को सुरक्षित स्थान पर ले जाना उपयुक्त समझा।
         विक्रम संवत् 1726 आश्विन पूर्णिमा की रात के पिछले प्रहर में श्री वल्लभाचार्य ने एकमात्र अपने आराधक श्रीनाथजी को लेकर रथ में सवार होकर ब्रज में प्रस्थान किया। वे लक्ष्य विहीन यात्रा पर चल पड़े। ब्रज से आगरा पहुंचे, वहां से ग्वालियर, कोटा, पुष्कर, कृष्णगढ़, पीतांबरजी, जोधपुर चौपासनी में मेवाड़ राज्य के सिंहाड़ पहुंचकर स्थाई रूप से उन्हें प्रतिष्ठित किया गया। उस समय मेवाड़ के महाराणा राजसिंह सर्वाधिक शक्तिशाली शासकों में थे। संवत् 1728 फाल्गुन कृष्ण सप्तमी शनिवार को सिंहाड़ में ही उनका पाटोत्सव किया गया। वह सिंघाड़ ग्राम नाथद्वारा के नाम से दुनियाभर में विख्यात हो गया।

भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में आचार्य वल्लभ का स्थान व योगदान कालजयी है। उन्होंने पुष्टिमार्ग का प्रवर्तन कर जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास किया। उन्होंने जिस कृष्ण भक्ति को प्रतिपादित किया, आज उसका प्रचार समूचे भारत में है। विशेषकर पूरे उत्तर भारत में उनके लाखों अनुयायी हैं। यही कारण है कि उन्हें श्रद्धा के साथ महाप्रभु वल्लभ भी कहा जाता है। वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को उनका प्राकट्य दिवस मनाया जाता है। यह इस बार 5 मई को है।

पुष्टि पोषण को प्राथमिकता दी 
उस समय तुलसी के मानस, मीरा की भक्ति, कबीर के पद व सूर के गीतों द्वारा भक्ति आंदोलन मुखर हो उठा था। 'एक तुणीर में चारों तीर-तुलसी, मीरा, सूर, कबीर' की धारा अपनी-अपनी भूमिका का निर्वाह कर रहे थे। तब प्रभु वल्लभाचार्य ने पुष्टि मार्ग के सिद्धांत के तहत श्रीमद् भागवत के द्वितीय स्कंध के दशम अध्याय के चौथे श्लोक में पुष्टि पोषण को प्राथमिकता दी। 'पोषण तद्नुग्रह' भगवान के अनुग्रह से जीव का पोषण बनाया गया है। उसमें पूजा-कर्मकांड का स्थान नहीं होकर मात्र सेवा ही सर्वोपरि स्वीकार की गई है। इससे ग्रहों की दुषितता ग्रहों के बुरे असर स्वयमेव समाप्त हो जाते हैं। भक्ति रस के सामने ग्रहों की विपरीत रश्मियां भी नतमस्तक हो जाती हैं और जातक का कुछ नहीं बिगाड़ पाती। क्योंकि यह भी एक ऐसी आलौकिक साधना है, जिसके बल पर व्यक्ति विपरीत स्थिति में भी सूर्य द्वारा आत्म बल व चंद्रमा द्वारा शांत मनोहारी धैर्यवान बन जाता है। मंगल द्वारा बलशाली, बुद्ध से ज्ञानवान, बृहस्पति से दर्शन योग, शुक्रद्वारा रास, रंग एवं शनि द्वारा सेवा भाव की ओर तत्पर हो उठता है।

भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में आचार्य वल्लभ का स्थान व योगदान कालजयी है। उन्होंने पुष्टिमार्ग का प्रवर्तन कर जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास किया। उन्होंने जिस कृष्ण भक्ति को प्रतिपादित किया, आज उसका प्रचार समूचे भारत में है। विशेषकर पूरे उत्तर भारत में उनके लाखों अनुयायी हैं। यही कारण है कि उन्हें श्रद्धा के साथ महाप्रभु वल्लभ भी कहा जाता है। वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को उनका प्राकट्य दिवस मनाया जाता है। यह इस बार 5 मई 2 0 1 3  को है।

भक्ति आंदोलन के प्रवर्तक रहे 
भक्ति परंपरा में आचार्य वल्लभ के किए कार्यों को समझने से पहले तत्कालीन परिदृश्य को जानना जरूरी है। 12वीं-13वीं शताब्दी ई. में दक्षिण भारत में भक्ति की लहर शुरू हो चुकी थी। इसके 200 वर्ष बाद श्रीमद् वल्लभ, रामानंद और चैतन्य महाप्रभु के नेतृत्व में एक प्रबल भक्ति, संकीर्तनों की धारा उत्तर भारत में भी फैल गई। इन तीनों में आचार्य श्री वल्लभ भक्ति आंदोलन और भारतीय दर्शन के भी महास्तंभ रहे। श्री वल्लभ दक्षिण के एक ब्राह्मण कुल से थे। उनके पिता लक्ष्मणभट्ट पत्नी इलम्मा गुरु के साथ काशी में आ बसे थे। मगर, वहां आक्रांताओं के चलते उन्हें निर्वासित जीवन जीना पड़ा। उस समय चंपारण्य नामक घने वन में वरुथिनी एकादशी वैशाख कृष्ण एकादशी विक्रम संवत् 1535 में ई. सन् 1473 में श्रीवल्लभ का जन्म हुआ। माता-पिता श्री वल्लभ को लेकर वापस बनारस आ गए। श्री वल्लभ को पं. नारायण भट्ट व माधवेंद्रपुरी के सान्निध्य में शिक्षा-दीक्षा दी गई। वह ११ वर्ष की आयु तक वेद शास्त्रों में पारंगत हो गए थे। वेश्वानर अवतार (अग्नि का अवतार भी) कहा जाता है।

बाल लीला में समर्पित भक्ति 
भक्तिकालीन सगुण धारा की श्रीकृष्ण भक्ति शाखा के आधार स्तंभ वल्लभाचार्य को तात्कालीन श्री रूद्र संप्रदाय के बिल्व मंगल आचार्यजी द्वारा दशाक्षर गोपाल मंत्र की दीक्षा दी गई। उन्हें त्रिदंड संन्यास की दीक्षा स्वामी नारायणेंद्र तीर्थ ने दी। उनका विवाह पं. देवभट्ट की पुत्री महालक्ष्मी से हुआ। श्रीमद् वल्लभाचार्य ने अपने आराध्य श्रीकृष्ण को बालस्वरूप की छवि में (आत्मा, लक्ष्मी, कीर्ति, संपन्नता, समृद्धता) भक्ति समर्पण के अंतर्गत आठों प्रहर सेवा विधान आरंभ किया। विष्णु के अवतारी श्रीकृष्ण की अनेक लीलाओं में बाल लीला उनके शिशु अवस्था के लालन-पालन में प्रात: जगाने से लेकर सुलाने तक के दिनचर्या स्थापित करते हुए जनसामान्य को ऐसा मोड़ दिया कि परम तत्व दर्शन की एकात्मता लिए यह भाव मां और उसके पुत्र के वात्सल्य प्रेम दूसरा कोई नहीं दिखाई देता । वह संसार के प्रपंच और मायाजाल  से विमुख रह कर अपने शिशु के लालन पालन और देख रेख में ही अपने आप को न्योछावर और धन्य अनुभव करती हैं । ठीक उसी भांति भक्त भी उस छवि के प्रति परम तत्व दर्शन की एकात्मता में  कृत कृत्य अनुभव करता है ।

हल्दीघाटी युद्ध : त्याग, बलिदान और शौर्य




हल्दीघाटी : -18 जून 1576 को महाराणा प्रताप और अकबर के बीच हुए ऐतिहासिक युद्ध की गवाह है हल्दीघाटी !

या माटी हल्दीघाटी री लागे केसर और चन्दन हे ,
माथा पर तिलक करो इणरो इण धरती ने नित वंदन है !

विश्व इतिहास में बहुत कम ही ऐसे युद्धस्थल हैं जो हल्दी घाटी की तरह प्रसिद्ध हुए हों। यूं देखा जाए तो हल्दी घाटी का युद्ध न तो बहुत लम्बा चला और न ही कोई विशेष प्रलयंकारी था।
भारतीय इतिहास में इससे पूर्व हुए तराईन, खानवा और पानीपत के युद्ध ऐतिहासिक और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण एवं समय को मोड़ देने वाले थे।
किन्तु जहां तक शौर्य, पराक्रम और श्रद्धा का प्रश्न है, हल्दी घाटी का युद्ध इन सबसे आगे है।
प्रश्न उठता है कि आखिर इस युद्ध में ऐसी क्या बात थी जिसके कारण यह चार सौ अट्ठाईस वर्ष के पश्चात् भी हम सभी के लिए प्रेरणा का प्रतीक बना हुआ है।
इस युद्ध के दिवस ( इस वर्ष 18 जून) पर उन बिन्दुओं का अध्ययन करना समीचीन होगा जिनके फलस्वरूप हल्दी घाटी की माटी हम सभी के लिए चंदन बन गई।
हल्दी घाटी का युद्ध मात्र पांच घण्टे का था। मगर इस अल्प समय में महाराणा प्रताप के स्वातन्त्र्य प्रेम, झाला माना की स्वामी- भक्ति, ग्वालियर नरेश राम सिंह तंवर की अटूट मित्रता, हकीम खां सूरी का प्राणोत्सर्ग, वनवासी पूंजा का पराक्रम, भामाशाह का अनुपम न्योछावर भाव, शक्ति सिंह का विलक्षण भ्रातृ-प्रेम व प्रताप के घोड़े चेतक के पावन बलिदान से हल्दी घाटी की माटी का कण-कण आज भी भीगा हुआ लगता है और यहां आने वाले प्रत्येक जन को श्रद्धावश नमन करने को प्रेरित करता है।
हल्दी घाटी का युद्ध इतिहास में इसलिए भी स्वर्णाक्षरों में अंकित है क्योंकि यह युद्ध उस समय के विश्व के सर्वशक्तिमान शासक अकबर के विरुद्ध लड़ा गया एक सफल संग्राम था।
अकबर को हल्दी घाटी के इस युद्ध से पूर्व कल्पना भी नहीं थी कि एक छोटा-सा मेवाड़ राज्य और उसका शासक राणा प्रताप इतना भंयकर संघर्ष कर सकेगा।
इतिहास साक्षी है कि प्रताप ने न केवल जमकर संघर्ष किया बल्कि मुगल सेनाओं की दुर्गति कर इस तरह भागने को मजबूर किया कि अकबर ने फिर कभी मेवाड़ की ओर मुंह नहीं किया।
प्रताप की इस सफलता के पीछे उनके प्रति प्रजा का प्यार और सहयोग प्रमुख कारण था।

उल्लेखनीय है कि हल्दी घाटी के युद्ध में केवल राजपूत ही नहीं लड़े बल्कि वनवासी, ब्राह्मण, वैश्य आदि सभी ने स्वतंत्रता के इस समर में तलवारें उठाईं और बलिदान दिए। यह आश्चर्य ही है कि एक मुस्लिम शक्ति को ललकार देने के लिए इस समरांगण में प्रताप ने हरावल दस्ते में हकीम खां सूरी को आगे रखा। यही नहीं, बहुत कम लोगों को पता होगा कि प्रताप की सेना के एक भाग का नेतृत्व जहां वैश्य भामाशाह के हाथों में था तो पहाड़ियों पर मुगलों को रोकने के लिए मेवाड़ के वनवासी और उनके मुखिया पूंजा ने अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया।
प्रताप का यह युद्ध एक शासक का दूसरे शासक के विरुद्ध नहीं बल्कि मुगल साम्राज्यवाद एवं मेवाड़ की जन-स्वातन्त्र्य भावना के बीच था
और इसमें मेवाड़ की स्वातन्त्र्य भावना की विजय हुई, जिसका उल्लेख युद्ध में उपस्थित लेखक अल-बदायूंनी ने भी अप्रत्यक्ष रुप में किया है।

हल्दी घाटी युद्ध में कई स्थलों पर ऐसी घटनाएं भी घटित हुईं जिन्हें देखकर लगता है कि यह मात्र युद्ध भूमि ही नहीं बल्कि श्रेष्ठ जीवन मूल्यों का संदेश देती वह पावन स्थली है जिसे बार-बार नमन किया जाना चाहिए।
कौन भूल सकता है उस प्रसंग को जब प्रताप मुगल सेनापति मानसिंह को निहत्था पाकर जीवन-दान देकर छोड़ देते हैं।
यही वह भूमि है जहां झाला माना अपने स्वामी की रक्षा करने के लिए उनका राजमुकुट स्वयं धारण कर बलिदान दे देता है।
इसी युद्धस्थली की माटी साक्षी है जब प्रताप के सेनापति हकीम खां सूरी अपनी अन्तिम सांसों में खुदा से मेवाड़ की विजय की दुआ करते हैं।
यही वह स्थल है जहां मनमुटाव के बावजूद शक्ति सिंह अपने भाई के प्राणों की रक्षा के लिए आगे आए।
स्मरण रहे कि अपने इस भ्रातृ-प्रेम के लिए शक्ति सिंह को अकबर की नाराजगी भी झेलनी पड़ी थी।
रक्त तलाई में खड़े स्मारकों में एक स्मारक है ग्वालियर नरेश राम सिंह तंवर का, जो आज भी हम सभी को मित्रता एवं कृतज्ञता का आदर्श सन्देश दे रहा है।
युद्धभूमि से कुछ ही दूर खड़ा प्रताप के प्रिय घोड़े चेतक का स्मारक हमें झकझोर देता है। एक मूक पशु भी किस तरह स्वामीभक्ति का पाठ दे सकता है, यह बात इसी माटी की जुबान से हमें सुनने को मिलती है।
हल्दी घाटी की इस पावन युद्धस्थली की न केवल हिन्दू लेखकों ने वरन् अनेक मुस्लिम इतिहासकारों ने भी जमकर प्रशंसा की है।
युद्ध-भूमि पर उपस्थित अकबर के दरबारी लेखक अल बदायूंनी के वृतांत में भी प्रताप और उनके साहसी साथियों के त्याग, बलिदान और शौर्य का बखान ही मिलता है।
अत: आज जब हम इस युद्ध का पावन स्मरण करने जा रहे हैं तो क्यों न इसकी माटी से उठी स्वातंत्र्य की भावना को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयत्न करें
ताकि हमारी स्वतंत्रता चिरस्थायी बन सके और फिर कभी इस पर पराधीनता की काली बदली न आ पाए।

हल्दी घाटी का युद्ध मात्र पांच घण्टे का था। मगर इस अल्प समय में महाराणा प्रताप के स्वातन्त्र्य प्रेम, झाला माना की स्वामी- भक्ति, ग्वालियर नरेश राम सिंह तंवर की अटूट मित्रता, हकीम खां सूरी का प्राणोत्सर्ग, वनवासी पूंजा का पराक्रम, भामाशाह का अनुपम न्योछावर भाव, शक्ति सिंह का विलक्षण भ्रातृ-प्रेम व प्रताप के घोड़े चेतक के पावन बलिदान से हल्दी घाटी की माटी का कण-कण आज भी भीगा हुआ लगता है और यहां आने वाले प्रत्येक जन को श्रद्धावश नमन करने को प्रेरित करता है।
इस युद्ध में हाकिम खां जैसे लडाका ने महाराणा प्रताप की सेना की कमान संभालते हुये अपने प्राणों को न्यौछावर करके सांप्रदायिक एकता की अनूठी मिसाल कायम की थी.
इसमें झाला मान सिंह, भीलू राणा., शमशाह तंवर और दानवीर भामाशाह सहित अनगिनत योद्धाओं ने मेवाड की आन बान और शान की खातिर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था.
इसी हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप के जग प्रसिद्ध घोडे चेतक ने स्वामि भक्ति का अनूठा अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करते हुए महाराणा की प्राण. रक्षा के लिए अपने प्राण दे दिये थे !

जय हो उन शूरवीरो और दानवीरों की !!
जय महाराणा !!
जय चेतक !!
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महाराणा प्रताप सिंह जी को उनके जन्मदिवस पर शत शत नमन ...!!


धन्य हुआ रे राजस्थान,जो जन्म लिया यहां प्रताप ने।धन्य हुआ रे सारा मेवाड़, जहां कदम रखे थे प्रताप ने॥फीका पड़ा था तेज़ सुरज का, जब माथा उन्चा तु करता था।फीकी हुई बिजली की चमक, जब-जब आंख खोली प्रताप ने॥जब-जब तेरी तलवार उठी, तो दुश्मन टोली डोल गयी।फीकी पड़ी दहाड़ शेर की, जब-जब तुने हुंकार भरी॥था साथी तेरा घोड़ा चेतक, जिस पर तु सवारी करता था।थी तुझमे कोई खास बात, कि अकबर तुझसे डरता था॥हर मां कि ये ख्वाहिश है, कि एक प्रताप वो भी पैदा करे।देख के उसकी शक्ती को, हर दुशमन उससे डरा करे॥करता हुं नमन मै प्रताप को,जो वीरता का प्रतीक है।तु लोह-पुरुष तु मातॄ-भक्त,तु अखण्डता का प्रतीक है॥हे प्रताप मुझे तु शक्ती दे,दुश्मन को मै भी हराऊंगा।मै हु तेरा एक अनुयायी,दुश्मन को मार भगाऊंगा॥है धर्म हर हिन्दुस्तानी का,कि तेरे जैसा बनने का।चलना है अब तो उसी मार्ग,जो मार्ग दिखाया प्रताप ने॥