रविवार, 7 जुलाई 2013

साम्प्रदायिक आधार पर भारत को नष्ट करने का षडयन्त्र - विश्वजीत सिंह ' अनंत '

भारत के छद्म सेक्यूलर नेताओं द्वारा साम्प्रदायिक आधार पर भारत को नष्ट करने का भयानक षडयन्त्र !
- विश्वजीत सिंह ' अनंत '
प्रिय राष्ट्र प्रेमियों -
एक वो समय था जब गाय माँ की रक्षा के लिये 1857 ईश्वी में क्रांति हो गई थी और हमारे पूर्वजों ने 4 लाख गद्दारों व अंग्रेजों को काट डाला था, ओर एक समय ये है जब 3500 हजार कत्लखानों में रोज माँ को काटा जा रहा है और हम तथाकथित अहिंसा व सेक्यूलरिज्म की आड़ में नपुंसकता की चादर ओढ़े घरों में दुबके बैठे है। एक प्रदेश की मुख्यमंत्री सार्वजनिक मंच से 'गौ मांस खाना मेरा मौलिक अधिकार है' कहने का दुश्साहस करती है, किन्तु देश में उसके खिलाप कोई सशक्त प्रतिक्रिया नहीं आती, कारण भारत के नेतृत्व का भारतीयता विरोधी छद्म सेक्यूलरों के हाथों में होना, इनके द्वारा नित्य प्रति भारत के स्वाभिमान को ठेस पहुँचाने के कुचक्र रचे जा रहे है। देश की सीमाओं, संस्कृति, पुरातन धरोहर, हमारी शिक्षा पद्धति, हमारे मंदिर, साधु - सन्यासी, हमारी परंपराओं एवं राष्ट्रीय स्वाभिमान पर सदैव सुनियोजित रीति से बहु - आयामी आक्रमण किये जा रहे है। हमारा देश छद्म सेक्यूलर नेताओं के कारण भीषण संकट के दौर से गुजर रहा है।
भारत में छद्म सेक्यूलरिज्म की संगठित शुरूआत 20 अगस्त 1920 को मोहनदास गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन के नाम से खिलापत आंदोलन (अरबपंथी कट्टर जेहादियों द्वारा तुर्की के खलीपा के समर्थन में चलाया गया एक विशुद्ध साम्प्रदायिक आंदोलन, जिसका भारत या भारत के मुसलमानों से कोई संबंध नहीं था।) को अपना नेतृत्व प्रदान करने से हुई। गांधी के शब्दों में - मुसलमानों के लिए स्वराज्य का अर्थ है - जो होना ही चाहिए खिलापत की समस्या के लिए भारत की क्षमता का, प्रभाव पूर्ण व्यवहार, इस दृष्टिकोण के साथ सहानुभूति न रखना एकदम असंभव है, खिलापत आंदोलन की पूर्ति के लिए आवश्यक लगने पर मैं स्वराज प्राप्ति की कार्यवाही को सहर्ष स्थगित करने के लिए आग्रह कर दूंगा। जब खिलापत आंदोलन असफल हो गया तो अरबपंथी जेहादियों का गुस्सा हिन्दुओं पर उतरा, मोपला में हिन्दुओं की संपत्ति, धन व जीवन पर सबसे बड़ा हमला हुआ। हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनाया गया, स्त्रियों के अपमान हुये। गांधी जो अपनी नीतियों के कारण इसके उत्तरदायी थे, मौन रहे। प्रत्युत यह कहना शुरू कर दिया कि मालाबार में हिन्दुओं को मुसलमान नहीं बनाया गया। यद्यपि उनके मुस्लिम मित्रों ने यह स्वीकार किया कि सैकड़ों घटनाऐं हुई है। और उल्टे मोपला मुसलमानों के लिए फंड शुरू कर दिया।
मोहनदास गांधी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआता में हिन्दी को बहुत प्रोत्साहन दिया। लेकिन जैसे ही उन्हें पता चला कि कुछ साम्प्रदायिक मुसलमान इसे पसंद नहीं करते, तो वे उन्हें खुश करने के लिए हिन्दी के स्थान पर हिन्दुस्तानी (फारसी लिपि में लिखे जाने वाली उर्दू भाषा) का प्रचार करने लगे। बादशाह दशरथ, शहजादा राम, बेगम सीता, मौलवी वशिष्ठ जैसे नामों का प्रयोग होने लगा। सम्प्रदाय विशेष को खुश करने के लिए हिन्दुस्तानी भाषा विद्यालयों में पढ़ाई जाने लगी। इसी अवधारणा से मुस्लिम तुष्टिकरण का जन्म हुआ, जिसके मूल से ही उन्नीसवीं सदी की सबसे भयानक त्रासदी साम्प्रदायिक आधार पर हिन्दुस्थान का पाकिस्तान और भारत के रूप में विभाजन हुआ, जिसमें लगभग 25 लाख निर्दोष लोगों को अपने प्राण गवाने पड़े।
14 - 15 जून 1947 को दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक में हिन्दुस्थान विभाजन का प्रस्ताव अस्वीकृत होने वाला था कि गांधी ने वहां पहुँच कर प्रस्ताव का समर्थन कराया। यह भी तब जबकि उन्होंने स्वयं कहा था कि देश का बटवारा उनकी लाश पर होगा। देश का साम्प्रदायिक आधार पर विभाजन हुआ, मुसलमानों का पाकिस्तान और हिन्दुओं का भारत, तो जिन्ना ने सम्पूर्ण साम्प्रदायिक जनसंख्या के स्थानांतरण की बात रखी, जिसे गांधी और नेहरू ने अस्वीकार कर दिया। नास्तिक नेहरू ने हिन्दू विद्वेषवश भारत को हिन्दू राष्ट्र न बनाकर सेक्यूलर राष्ट्र बना दिया। विभाजन के पश्चात भारत में कुल 3 करोड़ मुस्लिम जनसंख्या थी, जो आज बढ़कर 23 करोड़ हो गयी है, दूसरी ओर पाकिस्तान में हिन्दुओं की जनसंख्या 21 प्रतिशत थी, जो अब घटकर 1.4 प्रतिशत रह गयी है। तुर्क और मुगलों की प्रापर्टी की सुरक्षा व्यवस्था के लिए वफ्फ तैयार किया गया और और उनको पाकिस्तान में प्रापर्टी वफ्फ के द्वारा सौपी गयी और कमी समझने पर उनकी जमीन का पेमेन्ट भी किया गया। मुसलमानों के हिस्से की जमीन पाकिस्तान में चली गयी और वफ्फ के द्वारा मुसलमानों को सभी सुविधाऐं दी गयी, परन्तु पाकिस्तान से भारत आने वाले हिन्दुओं के लिये कुछ नहीं किया गया। आखिर ऐसा विद्वेष हिन्दुओं के साथ क्यों किया गया और यह विद्वेष आज भी जारी क्यों है ! जो मुसलमान पाकिस्तान चले गये उनकी संपत्ति की खातिर सरकार फिर ऐसा कानून बनाना चाहती है कि वह संपत्ति उन पर पहुँच जाये। मुगलकाल में हिन्दुओं के लिए नियम अलग और मुस्लिमों के लिए अलग होता था, आज भी वह नियम लागू है, जब कोई हिन्दू मेला या तीर्थयात्रा होती है तो टैक्स या किराया बढ़ा दिया जाता है और मुसलमानों को हज यात्रा में आर्थिक अनुदान दिया जाता है। छात्रवृत्ति, बैंक लोन, शिक्षा, रोजगार आदि क्षेत्रों में सम्प्रदायिक तुष्टिकरण व मजहबी आरक्षण की भेदभाव पूर्ण नीति अपनायी जाती है। इसपर स्वयं भारत का सुप्रीम कोर्ट सभी भारतीय नागरिकों के लिए समान कानून बनाने का सुझाव दे चुका है तथा साम्प्रदायिक समुदायों के पर्सनल लॉ में बदलाव नहीं करने पर केन्द्र सरकार को लताड़ चुका है। लेकिन फिर भी भारत का छद्म सेक्यूलर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह देश के समस्त संसाधनों पर पहला अधिकार एक सम्प्रदाय विशेष (मुसलमानों) का बताता है। साम्प्रदायिक आधार पर भारत को नष्ट करने के लिए कट्टर साम्प्रदायिक चरित्र वाले व्यक्तियों की सोनिया गांधी के नेतृत्व में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद गठित कर सांप्रदायिक एवं लक्ष्य केन्द्रित हिंसा निवारण विधेयक 2011 बनाया जाता है तो कभी राजिन्द्र सच्चर के नेतृत्व में कमेटी गठित कर मुसलमानों के लिए विशेषाधिकार की बात की जाती है।लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान कहते है कि असली प्रजातंत्र हम जब समझेगें जब देश का प्रधानमंत्री मुसलमान होगा। हैदराबाद का एक विधायक मौलाना ओवैसी दुर्गा मंदिर में बजने वाले घण्टे को गैर इस्लामी बताकर प्रतिबंधित कराने का प्रयास करता है, तो बरेली की खचाखच भरी एक चुनावी सभा में एक मौलवी सार्वजनिक रूप से कहता है कि शहजिल इस्लाम (प्रत्यासी) को वोट देकर इतना मजबूत कर दो कि वो गैर मुस्लिम का सिर कलम कर सके। चुनाव जितने पर विधायक शहजिल इस्लाम ओसामा बिन लादेन को आतंकी नहीं जेहादी बताता है। इसका अर्थ यह हुआ कि जिस प्रकार पहले तलवार के बल पर कत्ले आम मचाकर नंगा नाच होता था, मतांतरण कराया जाता था, कच्चे चमड़े के बोरों में जीवित लोगों को ठूँस - ठूँस भरकर सीलकर तडफते हुये मरने के लिये डाल दिया जाता था, नारियों का शील भंग किया जाता था, इन जेहादियों के आतंक से कन्याओं की भ्रुण हत्या कर दी जाती थी तथा नारियाँ सामूहिक रूप से एकत्र होकर अग्नि में प्राण गवाँ देती थी, जैसे मुगलकाल में हिन्दुओं के लिए नियम अलग और मुसलमानों के लिए अलग थे आज भी वो प्रक्रिया जारी है । जब हकीकत को मौत की सजा सुनाई गई तो हकीकत ने कहा अगर यह बोलने पर मैं दोषी हूँ तो मेरे से पहले यह मुस्लिम बच्चे दोषी है , जिन्होनें दुर्गा माता के लिए यह शब्द कहे थे मैंने तो केवल उनके शब्द दोहराये है। मुसलमान सेक्यूलरिज्म को नहीं मानता है और सरकार सेक्यूलरिज्म को मानती है तो मजहब (आधुनिक शब्दों में धर्म) के नाम पर आरक्षण क्यों देती है। सरकार में बैठे हुये व्यक्ति मजहब के आधार पर आतंकवादियों की मदद क्यों करते है। बाटला हाऊस में इस्पेक्टर शर्मा आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में शहीद हो जाते है, इस्पेक्टर शर्मा के बलिदान को कोई महत्व नहीं दिया जाता, उल्टा कांग्रेस का महासचिव दिग्विजय सिंह आजमगढ़ जिले के सरजूपुर ग्राम में आतंकवादियों के घर जाकर मुठभेड़ को फर्जी बताता है और उनका उत्साहवर्धन करता है कि हम स्पेशल अदालत बैठाकर आपके बच्चों को न्याय दिलायेगे। हापुड़ के पास मंसूरी ग्राम में आतंकवादियों की सूचना मिलने पर पुलिस छापा मारती है तो एक आतंकवादी उसी समय गाडी में बैठकर आता है तो गाडी ड्राइवर व मकान मालिक को भी पुलिस हिरासत में ले लेती है तो सेक्यूलर नेता चिल्लाते है कि मानव अधिकार का हनन हो रहा है। इसी प्रकार एक दरगाह में 40 आतंकवादी थे तो सरकार कहती है दरगाह पर हमला मत करना और मौका पाकर आतंकवादी फरार हो जाते है, स्वर्ण मंदिर को तो तहस नहस कर सकती है सरकार लेकिन दरगाह में आतंकवादी पाकर हमली नहीं कर सकती। जामा मस्जिद का इमाम कहता है कि मैं आई एस आई का एजेन्ट हूँ सरकार में हिम्मत है तो मुझे गिरफ्तार करे। एक योगगुरू काले धन के लिए शांतिपूर्वक अनशन करता है तो सरकार सोते हुये बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गो पर घिनौने तरीके से बल प्रयोग करती है। हिन्दू साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को कोई पुष्ट प्रमाण न मिलने पर भी अमानवीय यातनाऐ दी जाती है और आतंकवादियों को बिरयानी खिलायी जाती है, जामा मस्जिद के इमाम के नाम पर गर्दन नीची कर ली जी जाती है।
सरकार की भारत विरोधी मानसिकता देखिये भारतीय नगरों के नाम अरब साम्राज्यवादी आक्रांताओं के नाम पर रखे गये, भारतीय महापुरूषों को हाशिये पर फेंक दिया गया, देखिये विजयनगर हिन्दू राज्य था उसका नाम बदलकर सिकंदराबाद रख दिया गया। महाराणी कर्णावती के नाम से नगर का नाम कर्णावती रखा गया परन्तु इसका नाम बदलकर क्रुर आतंकी के नाम पर अहमदाबाद रख दिया गया और अकबर ने प्रयाग का नाम बदलकर इलाहाबाद रख दिया और साकेतनगर जो राम के राज्य से नाम था उसे बदलकर फैजाबाद कर दिया गया, शिवाजी नगर का नाम बदलकर आतंकी औरंगजेब के नाम पर औरंगाबाद कर दिया गया, लक्ष्मीनगर का नाम बदलकर नबाब मुजफ्फर अली के नाम पर मुजफ्फरनगर रख दिया, भटनेरनगर का नाम गाजियाबाद रख दिया, इंद्रप्रस्थ का नाम दिल्ली रख दिया गया। इसी प्रकार आज भी हमारे उपनगरों व रोडों के नाम आतंकवादियों के नाम पर रखे जा रहे है, तुगलक रोड, अकबर रोड, औरंगजेब रोड, आसफ अली रोड, शाहजहाँ मार्ग, जहागीर मार्ग, लार्ड मिन्टो रोड, लारेन्स रोड, डलहोजी रोड आदि - आदि। जरा विचार करो, नीच किस्म के आतंकवादियों के नामों का इस प्रकार से भारत पर जबरदस्ती थोपा जाना एक षडयन्त्र है नहीं है क्या, यह वैचारिक गुलामी का प्रतिक है। अयोध्या के श्री राम मंदिर को विश्व जानता है कि यहां राम का जन्म हुआ और उसका भव्य मंदिर था, एक अरबपंथी लुटेरा जेहादी सेना लेकर आया उसने लूट मचाई, भारतीय स्वाभिमान को नीचा दिखाने के लिए उसने मंदिर को तोड दिया, लुटेरा भी चला गया और देश का एक भाग भी चला गया, परन्तु फिर भी मुकदमा भारतीय स्वाभिमान के प्रतिक श्रीराम और एक लुटेरे के बीच में ? कैसी है यह आजादी !
आज भारतीयों की मानसिकता देखकर मुझे दुःख होता है और मैं विचार करता हूँ कि जब आर्य महान थे तो उनकी संतान इतनी निकृष्ट कैसे हो गई। जब राष्ट्रगीत वंदे मातरम् पर कुछ संकिर्ण विचारधारा के व्यक्ति आपत्ति जताते है तो तुरंत वंदे मातरम् गायन को स्वैच्छिक कर दिया जाता है और राष्ट्रगान जन गन मन जो जार्ज पंचम का स्वागत गीत था, उस पर कोई आपत्ति नहीं सुनी जाती। इसी प्रकार भारत माता व हिन्दू देवी - देवताओं की मूर्तियां बनाकर भारतीयता को अपमानित करने वाले को सहयोग और उसके खिलाप बोलने वालों पर मुकदमे। आज भारतीय हिन्दू समाज के छद्म सेक्यूलर नेता तात्कालिक लाभ के लिए देश को गद्दारों के हवाले करने का काम कर रहे है। भारत के सात राज्यों में तो हिन्दू अल्पसंख्य हो ही चुका है, अब सम्पूर्ण भारत की बारी है। हे भारत वंशियों अभी भी समय है चेत जाओं, वरना आने वाले समय में तुमको भयंकर यातनाओं का शिकार होना पडेगा और तुम्हारी बहन - बेटियों को जेहादी विधर्मीयों की रखैल बनकर रहना पडेगा, इसका इतिहास साक्षी है।

वन्दे मातरम्
जय माँ भारती ।

वोट की खातिर कुछ भी करेंगे दिग्विजय सिंह



सोमवार, 13 दिसम्बर 2010
वोट की खातिर कुछ भी करेंगे दिग्विजय सिंह
विनोद उपाध्याय
http://siyasatnama.blogspot.in
कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने फिर कमाल कर दिया, धोती को फाड़ के रूमाल कर दिया। ऊपर वाले की कृपा से भले वाराणसी बम धमाके में जान-माल की अधिक क्षति नहीं हुई, पर दिग्गी राजा ने जो राजनीतिक धमाका किया, खुद कांग्रेस-बीजेपी और अपनी कूटनीति भी लहुलुहान होती दिख रही।

अभी 26/11 हमले की दूसरी बरसी को बीते महज पखवाड़ा भर हुए पर दिग्गी राजा ने नई कहानी गढ़ दी। खुलासा किया- ‘मालेगांव बम धमाके की जांच में हिंदुवादी संगठनों की भूमिका उजागर करने की वजह से एटीएस चीफ हेमंत करकरे को कट्टर हिंदू संगठनों से जान का खतरा था।’ दिग्गी की मानें, तो मुंबई पर हुए आतंकी हमले से ठीक दो घंटे पहले फोन पर बातचीत में खुद करकरे ने यह बात उन्हें बताई थी। पर सवाल यह कि दिग्गी राजा को 26 नवंबर 2008 को करकरे से हुई बात हमले की दूसरी बरसी के बाद अचानक कैसे याद आ गई? अगर करकरे को सचमुच धमकियां मिल रही थी, तो उनने दिग्विजय सिंह को ही क्यों बताया? करकरे अपने वरिष्ठ अधिकारी या महाराष्ट्र के गृह मंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री या फिर पीएम-सीएम से बात कर सकते थे। पर उनने सिर्फ दिग्गी राजा को ही क्यों बताई?
इससे भी अलग सवाल, जब किसी को कोई धमकी मिलती है, तो वह सबसे पहले अपने परिवार से शेयर करता है। पर शहीद हेमंत करकरे की पत्नी कविता करकरे ने फौरन इनकार किया। अलबत्ता जांच में जुड़े अधिकारी के नाते ऐसी बातों को सामान्य बताया। पर दिग्गी राजा की टिप्पणी को कविता करकरे ने वोट बैंक की ओछी राजनीति से प्रेरित बताने में देर नहीं की। सचमुच दिग्गी राजा की दलील आतंकवाद के खिलाफ अपनी लड़ाई को कमजोर करेगा। जब सारी दुनिया और अदालत मुंबई हमले और करकरे जैसे बहादुर ऑफीसरों की शहादत के पीछे पाकिस्तानी आतंकियों की करतूत मान चुका। यों विशेष अदालत से फांसी की सजा पा चुका आतंकी कसाब अब हाई कोर्ट में पैतरेबाजी कर रहा। हाल ही में कसाब ने हेमंत करकरे को मारने में अपनी भूमिका से इनकार किया था। अब करीब-करीब वही बात कांग्रेस महासचिव दिग्गी राजा कह रहे। उन ने दो-टूक कह दिया- ‘जब रात में करकरे की मौत की खबर मिली, तो मैं सन्न रह गया था और मेरे मुंह से निकला, ओह गॉड, मालेगांव जांच के विरोधियों ने उन्हें मार डाला।’ अब आप क्या कहेंगे? क्या शहादत पर बखेड़ा खड़ा करना सचमुच कांग्रेस की फितरत बन गई? या फिर वोट बैंक के लिए कसाब को भी अफजल बनाएगी कांग्रेस?
आज को संसद पर हमले की नौंवीं बरसी है पर लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर पर हमले का मास्टरमाइंड अफजल गुरु वोट बैंक के राजनीतिक तवे में सेंकी रोटियां तोड़ रहा है। फिर भी संसद में श्रद्धांजलि का ढक़ोसला करते दिखेंगे अपने माननीय नेतागण। जो अफजल की फांसी से जुड़ी फाइल पर कुंडली मारकर बैठे हुए। सिर्फ अफजल ही नहीं, बटला हाउस मुठभेड़ में शहीद इंस्पेक्टर मोहनचंद शर्मा पर भी उंगली उठा चुकी कांग्रेस। खुद दिग्गी राजा ने मोर्चा खोला था। आतंकियों के परिजनों से सहानुभूति जताने आजमगढ़ जाने में भी कोई हिचक नहीं दिखाई थी। पर दिग्गी राजा के हर विवादास्पद स्टैंड में कांग्रेस की बड़ी राजनीति निहित होती। सो कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने तो बेबाक कह दिया। बोले- ‘दिग्विजय सिंह उपन्यास के पार्ट जरुर हैं, पर उपन्यासकार नहीं।’ अब कोई पूछे, उपन्यासकार कौन है? अब मुंबई जैसे आतंकी हमले को भी वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा बनाने का क्या मकसद? क्या अब कांग्रेस ‘कसाब बचाओ मुहिम’ में जुट गई? अगर करकरे आतंकी हमले में शहीद नहीं हुए, तो क्या विरोधियों ने हत्या कर दी?
अगर यह सच है तो बहुत बुरा है। मुंबई पुलिस के आतंकवाद विरोधी दस्ते के मुखिया, बहादुर, जांबाज़ और वतनपरस्त अफसर हेमंत करकरे की शहादत के दो साल से भी ज्यादा वक़्त के बाद कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने जो बात दिल्ली की एक सभा में कही, वह किसी के भी होश उड़ा सकती है। आपने फरमाया कि अपनी हत्या के करीब दो घंटे पहले हेमंत करकरे ने उन्हें फ़ोन किया था और कहा था कि वे उन लोगों से बहुत परेशान थे जो मालेगांव की धमाकों के बारे में उनकी जांच से खुश नहीं थे। दिग्विजय सिंह ने कहा कि वे बहुत परेशान थे। स्व करकरे को इस बात से बहुत तकलीफ थी कि किसी हिन्दुत्ववादी अखबार में छपा था कि उनका बेटा दुबई में रहता है और वहां खूब पैसा पैदा कर रहा था। अखबार ने यह संकेत करने की कोशिश की थी कि उनका बेटा इनकी नंबर दो की कमाई को अपनी कमाई बताकर खेल कर रहा था। जबकि सच्चाई यह है कि उनका बेटा मुंबई के किसी स्कूल में अपनी पढाई पूरी कर रहा था।
करकरे परिवार को पता नहीं था कि तानाशाही और फासिस्ट ताक़तों का सबसे बड़ा हथियार झूठ होता है और उसी झूठ को सैकड़ों बार कहकर वे सच बनाने की कोशिश करते हैं । इस विधा के आदिपुरुष हिटलर के साथी गोबल्स हैं जो उनकी फासीवादी पार्टी के सूचना विभाग के इंचार्ज थे। दिल्ली की उसी सभा में दिग्विजय सिंह ने बताया कि जब रात को उन्हें पता चला कि हेमंत करकरे की ह्त्या हो गयी है तो वे सन्न रह गए और उनकी शुरुआती प्रतिक्रिया यही थी कि ‘हे भगवान,मार डाला उनको।’ वह तो बाद में उन्हें पता चला कि हेमंत करकरे की हत्या मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले के दौरान हुई थी। दिग्विजय सिंह ने बताया कि करकरे के परिवार से उनका पारिवारिक सम्बन्ध था। उनके पिता जी रेल कर्मचारी थे और मध्य प्रदेश के छतरपुर में बहुत दिनों तक रहे थे। बाद में उनका तबादला नागपुर के लिए हो गया था, जहां हेमंत करकरे का परिवार बहुत दिनों तक रहा।

दिग्विजय को यह बयान हेमंत करकरे की हत्या के तुरंत बाद देना चाहिए था। इतनी बड़ी बात को आज दो साल बाद क्यों बता रहे हैं दिग्विजय सिंह। इस सूचना का मामले की जांच पर सीधा असर पड़ता। पांच दिन पहले दिए गए उनके इस बयान को जब इंडियन एक्सप्रेस अखबार ने प्रमुखता से छापा तो पूरे देश में चर्चा शुरू हो गयी। बीजेपी वालों ने आसमान सर पर उठा लिया और कांग्रेस ने अपने आपको बयान से अलग कर लिया। लेकिन दिग्विजय सिंह अपना काम कर चुके थे। दो साल बाद दिया गया उनका यह बयान राजनीति खेल लगता है।
उत्तर प्रदेश एक कांग्रेसी इंचार्ज दिग्विजय सिंह को मालूम है कि राज्य का मुसलमान वोट अब मुलायम सिंह के यहां नहीं जा रहा है। साक्षी महराज, कल्याण सिंह और राजबीर सिंह के प्रति मुलायम सिंह ने जो मुहब्बत दिखाई है, उसकी वजह से मुसलमान मुलायम सिंह यादव से बहुत नाराज़ है। रामपुर के विधायक आज़म खां को एक बार निकाल कर दुबारा वापस लेने की राजनीति का भी मुस्लिम इलाकों में मजाक उड़ाया जा रहा है। लोग कह रहे हैं कि यह तो वही आज़म्खन हैं जीके क्षेत्र में उनकी मर्जी के खिलाफ जयाप्रदा जीत कर आई हैं। यहां तक कि आज़म खां के घर के सामने जयाप्रदा के समर्थकों ने मीटिंग और उनेक मोहल्ले में जयाप्रदा को जिताया। ज़ाहिर है मुसलमानों में आज़म खां की वोट दिलाने की हैसियत बिलकुल नहीं है। शायद इसीलिये मायावती ने मुसलमानों के नफरत के ख़ास दावेदार वरुण गांधी को जेल में ठूंसने के प्रोजेक्ट पर काम शुरू कर दिया है। दिग्विजय सिंह का यह बयान भी शहीद हेमंत करकरे के प्रति मुसलमानों की श्रद्धा को कांग्रेस के फायदे के लिए इस्तेमाल करने की गरज से दिया गया बयान नज़र आ रहा है।
हेमंत करकरे की हत्या निश्चित रूप से आतंकवाद के खिलाफ जारी लड़ाई में एक बहुत बड़ी बाधा है। अपनी ईमानदारी और लगन से हेमंत करकरे ने आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष को एक सार्थक मुहिम का रूप दिया था। करकरे ने जब मालेगांव के धमाकों के संदिग्धों को पकड़ा उसके पहले फासिस्ट हिंदुत्व के ढिंढोरची देश की लगभग एक चौथाई आबादी को आतंकवादी कहने की जिद करते पाए जाते थे। अक्सर सुनायी पड़ता था कि सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं होते लेकिन सभी आतंकवादी मुसलमान होते हैं। मालेगांव के धमाकों के लिए ज़िम्मेदार लोगों को जब हेमंत करकरे की टीम ने पकड़ा तो इस तरह का प्रचार कर रहे गोबल्स के वारिस थोडा शांत हुए लेकिन करकरे के खिलाफ हर तरह के घटिया आरोप प्रत्यारोप लगाना शुरू कर दिया।
संघी हिंदुत्व और उसके सहयोगी संगठनों ने करकरे को उनके पद से हटवाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया। उनको डर था कि कहीं करकरे अपनी मुहिम को जारी रखने में सफल हो गये तो उनकी बहुत सारी आतंकवादी गतिविधियों से पर्दा उठ जाएगा। मुंबई और अन्य जगहों पर करकरे के खिलाफ ऐसे जुलूस निकाले गए मानों करकरे किसी राजनीतिक पार्टी के नेता हों। गुजरात के मुख्यमंत्री और २००२ के गुजरात नरसंहार से दुनिया भर में ख्याति पाने वाले नरेंद्र मोदी ने भी स्व करकरे के खिलाफ तरह तरह के बयान दिए। करकरे के खिलाफ जो भी अभियान चला, उसकी अगुवाई मोदी के चेले चपाटे ही कर रहे थे। लेकिन मोदी की हिम्मत की भी दाद देनी पड़ेगी कि जब हेमंत करकरे की हत्या हो गयी तो इन्हीं मोदी साहब ने मुंबई में करकरे के घर जाकर उनकी पत्नी को कुछ लाख रूपए देने की कोशिश की। श्रीमती करकरे को सारी बातें मालूम थीं लिहाजा उन्होंने मोदी को फटकार दिया और साफ़ कह दिया कि अपना पैसा अपने घर रखो।
दिग्विजय सिंह के बयान के बाद स्व करकरे की शहादत में एक और आयाम जुड़ गया है दिल्ली में जिस सभा में दिग्विजय सिंह ने यह बयान दिया उसी सभा में नामी पत्रकार अज़ीज़ बर्नी की किताब, ” आरएसएस की साज़िश —26/11 ” का विमोचन भी हुआ। इस किताब में लिखा हुआ है कि अज़ीज़ बर्नी को भरोसा था कि मुंबई में -26/11 के हमलों की साज़िश के पीछे आरएसएस का हाथ था जो करकरे के काम में बाधा डालना चाहते थे। अगर यह बातें सच हैं तो फ़ौरन इनकी जांच की जानी चाहिए और शहीद करकरे की मौत के लिए ज़िम्मेदार लोगों को कानून के हवाले किया जाना चाहिए।

मुस्लिम राजनीति का सच -पाञ्चजन्य

मुस्लिम राजनीति का घिनौना सच
तारीख: 3/23/2013 उत्तर प्रदेश
पाञ्चजन्य
http://www.panchjanya.com
- लखनऊ से शशि सिंह।
उत्तर प्रदेश में मुस्लिम राजनीति अपने घटिया स्तर तक पहुंच चुकी है और इसको इस स्तर तक पहुंचाने का घृणित कार्य किया है राज्य में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी और केन्द्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस ने। दोनो का लक्ष्य है 2014 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिमों का एकमुश्त वोट प्राप्त करना। इस लड़ाई में दोनों इस कदर उलझ गये हैं जिससे न सिर्फ मर्यादाएं तार-तार हो रहीं हैं बल्कि समाज का बंटवारा भी हो रहा है। कांग्रेस की ओर से बेनी प्रसाद वर्मा, सलमान खुर्शीद और दिग्विजय सिंह लगे हैं तो समाजवादी पार्टी की ओर से खुद मुलायम सिंह यादव, आजम खां, अहमद हसन और दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी इस खेल में शामिल है। केन्द्रीय मंत्री बेनी प्रसाद के 'आतंकवाद से रिश्ते' वाले मुलायम सिंह के संदर्भ में दिए बयान के तूल पकड़ने पर बेनी ने भले माफी मांग ली हो। पर सपा उनके इस्तीफे की मांग नहीं छोड़ रही है।
बेनी ने वह बयान अपने संसदीय क्षेत्र गोण्डा में दिया था। उन्होंने कहा कि मुलायम सिंह के आतंकवादियों से रिश्ते भी है। बात यही खत्म हो जाती तो ठीक था बेनी वर्मा ने यह आरोप संसद में भी दोहराया हालांकि इस मामले में कांग्रेस को माफी भी मांगनी पड़ी लेकिन यह माफी दिखावा है। मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति में शामिल कांग्रेस ने बेनी को अपने शब्द वापस लेने के लिए नहीं कहा, किरकरी से बचने के लिए उसने बयान से अपने को अलग कर लिया। लेकिन उसकी ओर से केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद लखनऊ में आकर मुसलमानों को आरक्षण की बात कह गए। उनका कहना था कि आन्ध्रप्रदेश की तर्ज पर पूरे देश में 4.5 प्रतिशत आरक्षण मुस्लिमों को दिया जाना चाहिए।
मुलायम सिंह मुस्लिम वोटो के पुराने ठेकेदार निकले, उन्होंने फटाफट मुस्लिमों के पक्ष में बोलना शुरू कर दिया। उन्होंने कहा कि उत्तरप्रदेश की जेलों में बन्द मुसलमानों (उनकी नजर में निर्दोष) को रिहा किया जाएगा। मालूम हो कि कुछ साल पहले फैजाबाद, गोरखपुर, वाराणसी और लखनऊ में मुस्लिम आतंकवादियों ने सिलसिलेवार विस्फोट किये जिसमें कई लोग मारे गये थे। लेकिन मुलायम सिंह ऐसे लोगों को निर्दोष मान रहे हैं। माना जा रहा है कि अयोध्या में कारसेवा के दौरान गोली चलवाने वाले मुलायम सिंह आतंकवादियों को छोड़ भी सकते हैं। 1990 के उनके मुख्यमंत्री काल में बहराईच में सिमी के अध्यक्ष को जेल से रिहा कराया जा चुका है। सरकार ने उसके खिलाफ लंबित मुकदमों को वापस कर  लिया था।
यही नहीं, उनके पुत्र और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इस घटनाक्रम के बाद आल इण्डिया पर्सनल ला बोर्ड के अध्यक्ष राबे हसनी नदवी से मिलने के लिए नदवा कालेज तक चले गये। वहां उन्होंने मुस्लिमों के लिए अपनी सरकार द्वारा किए जा रहे कार्यों की सूची तक सौप दी और कहा कि आगे भी मुस्लिमों के लिए बहुत कुछ किया जाएगा। उन्होंने उत्तरप्रदेश में हाईस्कूल व इण्टर पास मुस्लिम लड़कियों को 30000 रुपए की मदद का भी जिक्र किया। इधर सपा की ओर से आजम भी सक्रिय हो गये हैं। मुस्लिमों के बीच पैठ बढ़ाने के लिए आजम खां का दौरा लगातार चल रहा है। इस सिलसिले को अहमद हसन भी आगे बढ़ा रहे हैं। दिल्ली में बैठे-बैठे  वोटों की सौदागरी करने वाले इमाम अहमद बुखारी की मुलायम सिंह यादव से तनातनी है। लेकिन यह केवल दिखावा है। मुस्लिम वोटों के लिए इमाम बुखारी किसी भी स्थिति तक जा सकते हैं। यहां बताते चले कि उत्तरप्रदेश में 1990 के बाद कभी ऐसा नहीं हुआ कि सपा ने मुस्लिम वोटों का मोह छोड़ा हो। इस बार भी यही खेल खेला जा रहा है। यह भी महत्वपूर्ण है कि लोकसभा चुनाव के मद्देनजर कांग्रेस भी पीछे नहीं रहने वाली है। केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह द्वारा हिन्दू आतंकवाद का मुद्दा उठाया जाना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
इन दोनों पार्टियों द्वारा मुस्लिम वोट बैंक का यह खेल अनायास नहीं खेला गया है। उत्तर प्रदेश में कम से कम 20 लोकसभा सीटें और सौ से अधिक विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां एकमुश्त मुस्लिमों का वोट जिधर जाता है उधर जीत की संभावना बढ़ जाती है। अपनी काली करतूतों के कारण जनता में अलोकप्रिय हो चुकी कांग्रेस और सपा अपना वजूद बचाने के लिए अर्थहीन किन्तु समाज विरोधी बयानबाजी में लिप्त है। यह लड़ाई बढ़नी ही है और लोकसभा चुनाव आते-आते और घिनौना रूप लेगी।



आतंकवाद पर कांग्रेस के दो चेहरे


इशरत जहाँ अकेली नहीं तीन और आतंकवादियों के साथ थी , जब मुठभेड़ हुई , कांग्रेस के नेता गृह मंत्री से यह क्यों नहीं पूछ रहे की इशरत के साथ जो थे वे कौन थे ? मुस्लिम आतंकवाद के खिलाफ कांग्रेस पिछले 9 0  सालों से  कायर और कमजोर ही नहीं डरपोक साबित हो रही है ....
===========
IB का CBI को खत : हेडली ने बताया था, इशरत जहां लश्कर की फिदायीन
NDTVIndia,

नई दिल्ली: आईबी ने फरवरी 2013 में सीबीआई को एक चिट्ठी लिखी थी। इस चिट्ठी में यह जानकारी दी गई थी कि लश्कर के आतंकी डेविड हेडली ने अमेरिकी जांच एजेंसी एफबीआई को यह बात बताई थी कि अहमदाबाद में मुठभेड़ में मारी गई इशरत एक फिदायीन हमलावर थी।
यह चिट्ठी एनडीटीवी के हाथ लगी है। सीबीआई को लिखी इस चिट्ठी में लिखा गया था कि लश्कर-ए-तैयबा के एक कमांडर ने हेडली को इशरत के बारे में बताया था। चिट्ठी के मुताबिक, हेडली ने कहा था कि इशरत को लश्कर−ए−तैयबा ने भर्ती किया था। आईबी के मुताबिक, एफबीआई ने 25 मई 2010 को इशरत के बारे में जानकारी दी थी, लेकिन भारत में जांच एजेंसी एनआईए ने हेडली की बातों पर भरोसा नहीं किया।
एनआईए सूत्रों के मुताबिक, हेडली का इशरत से सीधे कोई संपर्क नहीं था। एनआईए ने इशरत पर तैयार अंतिम रिपोर्ट से इस बात को हटा दिया था। एनआईए सूत्रों के मुताबिक, इशरत के बारे में हेडली के बयान का कोई रिकॉर्ड नहीं है और यह सबूत के तौर पर मान्य भी नहीं है।
कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने ट्वीट किया है कि इशरत जहां के आतंकी रिश्तों को लेकर जो गैर−सरकारी सूचनाएं आ रही हैं, उससे लोगों में भ्रम फैल रहा है और यह देश की आंतरिक सुरक्षा के हित में नहीं है... गृह मंत्रालय को यह स्पष्ट करना चाहिए कि क्या हेडली ने अमेरिका गई भारतीय जांच टीम से इशरत के आतंकी रिश्तों की बात कही थी।

आतंकवाद पर कांग्रेस के दो चेहरे
Wed 11 May ,2011 
http://swadesh.in
ओसामा बिन  लादेन जैसे खूंखार आतंकवादी के मारे जाने के बाद उत्तर  प्रदेश के वाराणसी शहर  में कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह एक प्रेस कांफ्रेंस  में मारे गए इस खतरनाक  आतंकवादी को ‘ओसामा जी’ कहकर संबोधित करते हैं। इससे पहले अलकायदा के इस आतंकवादी को समुद्र में फेंके जाने पर दिग्विजय सिंह ने कहा था कि ‘कोई चाहे जितना बड़ा आतंकवादी हो लेकिन मरने के बाद उसका अंतिम संस्कार उसके धार्मिक रीति-रिवाज से ही करना चाहिए।’ ये कोई पहला वाकया नहीं है जब दिग्विजय सिंह ने इस तरह का बयान दिया हो, इसके पहले भी वह बटला हाउस मुठभेड़ पर सवाल खड़े कर चुके हैं। बटला हाउस मुठभेड़ में मारे गए आतंकवादी आजमगढ़ के संजरपुर इलाके के थे। दिग्विजय सिंह को भले ही इस मुठभेड़ में मारे गए शहीद पुलिस निरीक्षक मोहन चंद शर्मा के परिवार से सहानुभूति न हो लेकिन उन्होंने आजमगढ़ के संजरपुर में इस मुठभेड़ में मारे गए आतंकवादियों के परिजनों से मुलाकात जरूर की। इसके पहले भी दिग्विजय सिंह कभी भगवा आतंकवाद तो कभी मुंबई आतंकवादी हमले में शहीद हेमंत करकरे से टेलीफोन पर हुई बातचीत का हवाला देकर सुर्खियों में बने रहते हैं। दिग्विजय सिंह ही नहीं देश के गृहमंत्री को भी सीमा पार आतंकवाद से ज़्यादा ख़तरनाक भगवा आतंकवाद नजऱ आता है। ओसामा बिन लादेन को ‘ओसामा जी’ बोलना या फिर उसके दफनाए जाने पर सवाल खड़े करने वाले बयान से कांग्रेस भले ही किनारा करती नजर आ रही हो लेकिन ये दिग्विजय सिंह की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है और इस बात को कांग्रेस पार्टी भी बखूबी समझती है। दुनिया का सबसे दुर्दांत आतंकवादी, आतंकवाद का गढ़ बन चुके पड़ोसी मुल्क में मारा जाता है और देश की सबसे बड़ी पार्टी का एक महासचिव उसके दफनाए जाने पर सवाल खड़े करता है। दिग्विजय सिंह का ये बयान क्या आतंकवाद जैसी गंभीर समस्या पर भी ‘तुष्टिकरण की राजनीति’ करने वाला नहीं है ? क्या ये अच्छा नहीं होता कि दिग्विजय सिंह ‘ओसामा जी’ बोलने या फिर उसे समुद्र में डुबोए जाने पर सवाल खड़े करने वाले बयान से कांग्रेस भले ही किनारा करती नजर आ रही हो लेकिन ये दिग्विजय सिंह या यूपीए सरकार ने इस पूरे मसले पर कड़े शब्दों में पाकिस्तान को साफ शब्दों में ये चेतावनी क्यों नहीं दी कि अब हम मुंबई हमले की साजिश में शामिल आतंकवादियों का ख़ात्मा चाहते हैं? अमेरिका में 11 सितंबर 2001 को वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकवादी हमला होता है और अमेरिकी सरकार पाकिस्तान में घुसकर लादेन जैसे आतंकवादी को मारकर उसकी लाश को समुद्र में फेंक देती है। हमारे देश की सर्वोच्च अदालत संसद पर हमले के लिए अफजल गुरू को फांसी की सजा सुना देती है लेकिन सरकार इस आतंकवादी को फांसी दिए जाने की बजाय मामले को टालना ज़्यादा पसंद करती है। सरकार को ये लगता है कि अफजल गुरू को फांसी दिए जाने पर देश का मुस्लिम तबका उससे नाराज नहीं हो जाए। आतंकवाद के मसले पर कांग्रेस की तुष्टिकरण की ये नीति देश की मुस्लिम आबादी की निष्ठा पर सवाल खड़े करने वाली है। मुस्लिम समाज समेत देश का हर तबका आज ये मानता है कि आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता है और अगर कोई दोषी है तो उसे सजा ज़रूर मिलनी चाहिए। ओसामा बिन लादेन जैसा आतंकवादी जेहाद के नाम पर बेकसूर लोगों को मौत के घाट उतार रहा था और ऐसे ख़तरनाक आतंकवादी के मारे जाने पर तुष्टिकरण की राजनीति करना आतंकवाद के खिलाफ हमारी लड़ाई को कमजोर करना है। इसमें कोई दो मत नहीं कि आजादी के बाद से अब तक देश की मुस्लिम आबादी एक बड़ा हिस्सा अभी भी पिछड़ेपन का शिकार है और खुद को विकास की मुख्य धारा से नहीं जोड़ सका है लेकिन सवाल ये उठता है कि इसके लिए कसूरवार कौन है? दरअसल कांग्रेस जैसी पार्टियों ने मुस्लिम आबादी को हमेशा एक वोट बैंक की तरह माना और यही वजह है कि आज भी उनकी स्थिति में कोई सुधार दिखाई नहीं देता। राष्ट्रीय विकास परिषद की कुछ बरस पहले हुई एक बैठक में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बयान दिया था कि देश के संसाधनों पर मुसलमानों का पहला दावा होना चाहिए और उन्होंने ये माना था कि देश में मुसलमानों की स्थिति बहुत खराब है। सच्चर कमेटी और रंगनाथ आयोग की रिपोर्ट के बहाने कांग्रेस हमेशा ये जतलाने की कोशिश करती रही है कि मुस्लिम आबादी के एक बड़े हिस्से की दुर्दशा को लेकर वो चिंतित है लेकिन ये सारी चिंताए किसी चुनाव विशेष तक ही सीमित रहीं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह या फिर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं को ये समझने की ज़रूरत है कि देश की मुस्लिम आबादी का एक बड़ा हिस्सा भले ही अभी भी पिछड़ेपन का शिकार हो लेकिन आप अपने राजनीतिक फायदे के लिए उसका इस्तेमाल नहीं कर सकते। यही वजह है कि अयोध्या पर अदालत के फैसले को लेकर जब मुलायम सिंह जैसे नेता ने कुछ भडक़ाऊ बयान दिए तो कई मुस्लिम उलेमाओं ने इसको लेकर उन्हें जमकर फटकार लगाई। भारतीय जनता पार्टी के उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी का कहना है कि अगर दिग्विजय सिंह को लादेन से इतना ही प्यार है तो वे अपने घर पर या कांग्रेस मुख्यालय पर उसकी कब्र बनवा लें और रोज़ ओसामा जी, ओसामा जी कहें। बात सिर्फ राजनीतिक बयानबाजिय़ों की ही नहीं है, दिग्विजय सिंह के ओसामा जी कहने या फिर उसके दफनाए जाने को लेकर कुछ अख़बारों के इंटरनेट संस्करणों में प्रकाशित खबरों में जिस तरह से आम जनता की प्रतिक्रियाएं आई हैं, उसे पढक़र लोगों की नाराजगी का अंदाजा लगाया जा सकता है। कुल मिलाकर देश की मुस्लिम आबादी राजनीतिक तौर पर पूरी तरह जागरूक है और उसे ये समझ में आने लगा है कि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी जैसे दलों ने उसका इस्तेमाल वोट बैंक के तौर पर ही किया है। वाराणसी की प्रेस कांफ्रेंस में ओसामा बिन लादेन जैसे ख़तरनाक आतंकवादी को ओसामा जी बोलकर या फिर आजमगढ़ में संदिग्ध आतंकवादियों के परिजनों से मिलकर दिग्विजय सिंह को शायद ये लग रहा होगा कि ऐसा करके वो उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोट बैंक को कांग्रेस पार्टी के खाते में लेकर आ जाएंगे। आज मुस्लिम समाज के लोगों की भावनाओं को समझने की जरूरत है, उन्हें पांच सौ रूपये के नोट की तरह असली या नकली की कसौटी पर नहीं देखा जाना चाहिए। कांग्रेस पार्टी अभी भी सत्तर और अस्सी के दशक के कलैंडर को ही वर्तमान मानकर चलने की भूल कर रही है जबकि हक़ीक़त में वक्त बदल चुका है। आज मुस्लिम आबादी अपना भला-बुरा समझने लगी है, यही वजह है कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में पिछले कुछ चुनावों के नतीजे कांग्रेस के लिए चौंकाने वाले ही रहे हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मसलों पर अगर कांग्रेस पार्टी के नेता यूं ही राजनीति करते रहे तो न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि देश के बाकी हिस्सों में भी उसे लोगों की नाराजग़ी का सामना करना पड़ेगा। हमें अमेरिका का पिछलग्गू बनने की ज़रूरत नहीं है लेकिन इसमें कोई दो मत नहीं कि आतंकवाद के खिलाफ़ अमेरिकी नीति ज़्यादा सख्त है। अमेरिका को ये डर था कि ओसामा को दफनाए जाने के बाद वहां स्मारक बनाया जा सकता है और कट्टरपंथी ताक़तें इसका इस्तेमाल लोगों के भडक़ाने के लिए कर सकती हैं, इसीलिए ओसामा के शव को समुद्र में डाल दिया गया। आतंकवाद के खिलाफ़ लड़ाई में हमारे नेता अमेरिका से कुछ सीख सकते हैं। आज ज़रूरत इस बात की है कि दिग्विजय सिंह जैसे कांग्रेसी नेता और समूची यूपीए सरकार आतंकवाद जैसे गंभीर मसलों पर राजनीति करने के बजाय एकजुट नजऱ आए ताकि आने वाले दिनों में कोई पड़ोसी मुल्क मुंबई या देश की संसद पर आतंकवादी हमला करने वालों को अपने मुल्क में पनाह देने की हिमाकत न कर सके।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)