शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

विवेकानन्द ने काशी से ही शिकागो जाने निर्णय लिया था



Sunday, July 7, 2013
स्वामी विवेकानन्द ने काशी से ही शिकागो जाने निर्णय लिया था
भगवान शंकर की पवित्र नगरी काशी में ही स्वामी विवेकानंद ने धर्म संसद शिकागो जाने का निर्णय लिया था। वर्ष 1889 में प्रतिज्ञा की थी कि ‘शरीर वा पातयामि, मंत्र वा साधयामि’ (आदर्श की उपलब्धि करूंगा, नहीं तो देह का ही नाश कर दूंगा)।
अर्दली बाजार स्थित ‘गोपाल लाल विला’ (अब एलटी कालेज परिसर) से स्वामी विवेकानंद का जन्म से नाता रहा है, वह यहां अनेक बार स्वास्थ्य लाभ के लिए आए। कई संदर्भ इतिहास के पन्नों में मिलता है। वह प्रवास स्थल आज भी है। यह कभी ‘गोपाल लाल विला’ के नाम से जाना जाता था। स्वामी जी ने ‘गोपाल लाल विला’ को अपने स्वास्थ्य लाभ की दृष्टि से उत्तम स्थान माना था। स्वामीजी ने भगिनी निवेदिता, स्वामी ब्रतानंद व सुश्री वुली बुल को जो पत्र लिखा था, उसमें इसका उल्लेख है। स्वामी विवेकानंद ने काशी की अंतिम यात्रा 1902 में की थी। उस दौरान वह बीमार थे। वह ‘गोपाल लाल विला’ में ठहरे व एक महीने तक यहीं स्वास्थ्य लाभ किया। 14 मार्च, 1902 को यहां से बहन निवेदिता को भेजे पत्र में लिखा था कि ‘मुझे सांस लेने में काफी तकलीफ है। यहां आम, अमरूद के बड़े-बड़े पेड़ हैं, गुलाब का खूबसूरत बगीचा है और तालाब में सुंदर कमल खिले रहते हैं। ये जगह मेरे स्वास्थ्य के लिए उत्तम है। यहां से कुछ मील दूर बुद्ध की प्रथम उपदेश स्थली सारनाथ भी है।’ (पत्रवली नामक किताब में यह प्रकाशित है)। कुछ दिन बाद स्वास्थ्य खराब होने के कारण स्वामीजी बेलूर मठ चल गए। चार जुलाई, 1902 को महामानव विवेकानंद महासमाधि में लीन हो गए। 39 वर्ष पांच माह और 24 दिन की आयु में उन्होंने शरीर त्याग दिया।
स्वामी विवेकानंद के जन्म से पूर्व उनकी मां भुवनेश्वरी देवी ने एक रात स्वप्न में भोले शंकर को ध्यान करते देखा। उस दौरान वह संतान को लेकर बहुत परेशान थीं। मंदिरों में मन्नत मांग रही थीं। उन्होंने इस स्वप्न की बात काशी में रहने वाली अपनी एक महिला रिश्तेदार से बताई। बाकायदा इस बात का जिक्र ‘स्वामी निखिलानंद जी’ ने अपनी किताब में किया है। विवेकानंद की मां भुवनेश्वरी देवी, पिता विश्वनाथ दत्त काशी आए और सूतटोला स्थित वीरेश्वर मंदिर में पूजा अर्चना की, मन्नत मांगी। बताते हैं कि जब कुछ दिनों बाद यहां से कोलकाता वापस गए तो विवेकानंद, मां की गर्भ में थे। 12 जनवरी, 1863 को उनका जन्म हुआ व मां ने उनका बचपन का नाम वीरेश्वर रखा। बाद में जब स्कूल में गए तो नरेंद्रनाथ नाम रखा गया। वर्ष 1887 में पहली बार 24 वर्ष की अवस्था में स्वामी विवेकानंद काशी आए। गोलघर स्थित दामोदर दास की धर्मशाला में ठहरे। सिंधिया घाट पर गंगास्नान के दौरान बाबू प्रमदा दास मित्र से सामना हुआ। बगैर शब्दों के दोनों के बीच संवाद हुआ। प्रमदा दास स्वामीजी को घर ले आए। इसके बाद स्वामीजी का काशी आने का सिलसिला कायम रहा और पांच बार यहां आए। पूरा देश स्वामी विवेकानन्द की 150वीं जयंती मना रहा है। उक्त स्थल आज सरकार द्वारा उपेक्षित है। इस ऐतिहासिक स्थल को सजाने और संवारने की जरूरत है। sabhar : Dainik jagran
भगवान शंकर की पवित्र नगरी काशी में ही स्वामी विवेकानंद ने धर्म संसद शिकागो जाने का निर्णय लिया था। वर्ष 1889 में प्रतिज्ञा की थी कि ‘शरीर वा पातयामि, मंत्र वा साधयामि’ (आदर्श की उपलब्धि करूंगा, नहीं तो देह का ही नाश कर दूंगा)।
अर्दली बाजार स्थित ‘गोपाल लाल विला’ (अब एलटी कालेज परिसर) से स्वामी विवेकानंद का जन्म से नाता रहा है, वह यहां अनेक बार स्वास्थ्य लाभ के लिए आए। कई संदर्भ इतिहास के पन्नों में मिलता है। वह प्रवास स्थल आज भी है। यह कभी ‘गोपाल लाल विला’ के नाम से जाना जाता था। स्वामी जी ने ‘गोपाल लाल विला’ को अपने स्वास्थ्य लाभ की दृष्टि से उत्तम स्थान माना था। स्वामीजी ने भगिनी निवेदिता, स्वामी ब्रतानंद व सुश्री वुली बुल को जो पत्र लिखा था, उसमें इसका उल्लेख है। स्वामी विवेकानंद ने काशी की अंतिम यात्रा 1902 में की थी। उस दौरान वह बीमार थे। वह ‘गोपाल लाल विला’ में ठहरे व एक महीने तक यहीं स्वास्थ्य लाभ किया। 14 मार्च, 1902 को यहां से बहन निवेदिता को भेजे पत्र में लिखा था कि ‘मुझे सांस लेने में काफी तकलीफ है। यहां आम, अमरूद के बड़े-बड़े पेड़ हैं, गुलाब का खूबसूरत बगीचा है और तालाब में सुंदर कमल खिले रहते हैं। ये जगह मेरे स्वास्थ्य के लिए उत्तम है। यहां से कुछ मील दूर बुद्ध की प्रथम उपदेश स्थली सारनाथ भी है।’ (पत्रवली नामक किताब में यह प्रकाशित है)। कुछ दिन बाद स्वास्थ्य खराब होने के कारण स्वामीजी बेलूर मठ चल गए। चार जुलाई, 1902 को महामानव विवेकानंद महासमाधि में लीन हो गए। 39 वर्ष पांच माह और 24 दिन की आयु में उन्होंने शरीर त्याग दिया।
स्वामी विवेकानंद के जन्म से पूर्व उनकी मां भुवनेश्वरी देवी ने एक रात स्वप्न में भोले शंकर को ध्यान करते देखा। उस दौरान वह संतान को लेकर बहुत परेशान थीं। मंदिरों में मन्नत मांग रही थीं। उन्होंने इस स्वप्न की बात काशी में रहने वाली अपनी एक महिला रिश्तेदार से बताई। बाकायदा इस बात का जिक्र ‘स्वामी निखिलानंद जी’ ने अपनी किताब में किया है। विवेकानंद की मां भुवनेश्वरी देवी, पिता विश्वनाथ दत्त काशी आए और सूतटोला स्थित वीरेश्वर मंदिर में पूजा अर्चना की, मन्नत मांगी। बताते हैं कि जब कुछ दिनों बाद यहां से कोलकाता वापस गए तो विवेकानंद, मां की गर्भ में थे। 12 जनवरी, 1863 को उनका जन्म हुआ व मां ने उनका बचपन का नाम वीरेश्वर रखा। बाद में जब स्कूल में गए तो नरेंद्रनाथ नाम रखा गया। वर्ष 1887 में पहली बार 24 वर्ष की अवस्था में स्वामी विवेकानंद काशी आए। गोलघर स्थित दामोदर दास की धर्मशाला में ठहरे। सिंधिया घाट पर गंगास्नान के दौरान बाबू प्रमदा दास मित्र से सामना हुआ। बगैर शब्दों के दोनों के बीच संवाद हुआ। प्रमदा दास स्वामीजी को घर ले आए। इसके बाद स्वामीजी का काशी आने का सिलसिला कायम रहा और पांच बार यहां आए। पूरा देश स्वामी विवेकानन्द की 150वीं जयंती मना रहा है। उक्त स्थल आज सरकार द्वारा उपेक्षित है। इस ऐतिहासिक स्थल को सजाने और संवारने की जरूरत है। sabhar : Dainik jagran

बिहार में : 10 प्रमुख दागदार नेताओं के बारे में


इनके 'दामन' पर लग चुका है 'दाग', अब बजेगी इन 10 नेताओं की 'पुंगी'!
Dainikbhaskar.com   |  Jul 12, 2013,
पटना। जन प्रतिनिधित्व कानून पर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने कानून बनाने वाले नेताओं और राजनीतिक दलों की बेचैनी बढ़ा दी है। औपचारिक रूप से कांग्रेस, भाजपा समेत दूसरे दल भले ही इसका स्वागत करें। लेकिन, सच्चाई यह है कि अधिकतर दलों के छोटे-बड़े नेताओं पर इसकी गाज गिर सकती है।

इससे पहले जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 (4) के मुताबिक अगर कोई सांसद या विधायक को दो वर्ष से ज्यादा के कारावास की सजा सुनाई जाती है और वह तीन महीने के अंदर ऊपरी अदालत में अपील दाखिल कर देता है तो वह सदस्यता से अयोग्य नहीं माना जाएगा। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से यह धारा निरस्त हो गई है और सरकार के लिए आगे इस तरह का कोई कानूनी इंतजाम करने का रास्ता भी बंद हो गया है। इससे पहले पटना हाई कोर्ट ने 2004 में गैर सरकारी संगठन जन-चौकीदार की याचिका स्वीकार करते हुए जेल में बंद व्यक्ति के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी। पटना हाई कोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद देश के कई नेताजिन पर आरोप सिद्ध हो चुके हैं, वे चुनाव लड़ने से वंचित हो जाएंगे।

बिहार में कई ऐसे नेता हैं जिन्होंने अपनी दबंगई से राजनीति में एंट्री ली, लेकिन किसी ने घोटाले की वजह से तो कोई अपने अपराधिक चरित्र की वजह से सजा पा चुका है ये उसके कगार पर है। ऐसे में हम आपको बता रहे हैं बिहार के ऐसे 10 प्रमुख नेताओं के बारे में जो या तो घोटालों के कारण या फिर अपने अपराधिक छवि के कारण चरित्र पर दाग लगा चुके हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से इनका राजनीतिक करियर खत्म हो जाएगा...
01- लालू यादव: चारा घोटाले में लालू पहले भी जेल जा चुके हैं। वहीं, हाल-फिलहाल भी इन पर तलवार लटकी हुई है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने चारा घोटाले के इस मामले में सीबीआई के विशेष न्यायालय को फिलहाल फैसला देने पर रोक लगा दिया है, लेकिन दोषी करार दिए जा चुके लालू की राजनीतिक करियर से संकट टला नहीं है।
2- राजन तिवारी- गोविंदगंज के पूर्व विधायक राजन तिवारी की गिनती भी बाहुबलियों में होती है। रहने वाले तो वे हैं गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) के, लेकिन राजनीति करते हैं बिहार में। 'शॉर्प शूटर' माने जाने वाले राजन पर कई हाई प्रोफाईल मर्डर के आरोप हैं। कहा जाता है कि यूपी में अपने शागिर्द श्रीप्रकाश शुक्ला की हत्या का बदला लेने के लिए राजन ने लखनऊ में इंस्पेक्टर आरके सिंह और गाजियाबाद में एक अन्य इंस्पेक्टर को मौत के घाट उतार दिया था। यूपी के विधायक वीरेंद्र प्रताप शाही की हत्या में भी इनका नाम आया था।
राजन फिलहाल स्पीडी ट्रायल के तहत सूबे की सरकार में मंत्री रहे बृज बिहारी प्रसाद और पूर्णिया के माकपा विधायक रहे अजीत सरकार की हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं। राजन जेल में भी एक जगह नहीं बैठते, घूमते रहते रहते हैं। कभी पटना की बेउर जेल तो कभी यूपी और कभी झारखंड की जेलों में। जहां सुनवाई शुरू हुई, बोरिया-बिस्तर बंध जाता है, वहीं के लिए।
3-शहाबुद्दीन: बिहार में राजद के शासन में पूर्व सांसद शहाबुद्दीन खौफ का दूसरा नाम हुआ करते थे। फिलहाल वो जेल में बंद हैं। कोर्ट ने उनके चुनाव लड़ने पर भी रोक लगा दी थी। इस दौरान उनकी पत्नी ने विरासत सम्हालने की कोशिश की, लेकिन जीत नसीब नहीं हो सकी। अगर जमानत पर रिहा भी होते हैं तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश के हिसाब से ये चुनाव लड़ने लायक नहीं रहेंगे, क्योंकि इन पर पहले से ही आरोप सिद्ध हो चुके हैं।
4-पप्पू यादव: कभी लालू के कंधे को सहारा देने वाले पप्पू यादव इन दिनों कांग्रेस का दामन थामे हुए हैं। वामपंथी विधायक अजीत सरकार की हत्या के आरोप में फिलहाल ये जमानत पर जेल से बाहर हैं, लेकिन इन्हें भी चुनाव लड़ने से वंचित रहना पड़ सकता है। बता दें कि बिहार की राजनीति में खास पहचान बनाने वाले बाहुबली का नाम तो है राजेश रंजन पर पहचान है पप्पू यादव के नाम से। पप्पू की खास पहचान तब बनी जब वह 1990 में निर्दलीय विधायक बनकर बिहार विधानसभा में पहुंचे। उसके बाद का उनका सियासी सफर आपराधिक मामलों में विवादों से भरा रहा। मारधाड़ से भरपूर। तब बड़े-बड़े दबंग भी पप्पू से टकराने से बचते रहे। हालांकि पप्पू मानते रहे हैं कि सामाजिक अंतरविरोधों के कारण उनकी ऐसी छवि गढ़ दी गयी।
5-सुनील पांडे: नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यू के बाहुबली विधायक सुनील पांडे भी कई दफा जेल की हवा खा चुके हैं। इन पर कई अपराधिक मामले लंबित हैं। अगर कोर्ट ने इन्हें दोषी ठहरा दिया तो फिर ये राजनीति से दूर होकर अपनी दबंगई के चर्चे ही लोगों को सुनाते नजर आएंगे। इनका नाम कभी रणवीर सेना सुप्रीमो ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या के मामले में, तो कभी राजधानी पटना के होटल में हंगामा करने के मामले में सामने आता रहा है। हमेशा से ही इन पर आरोप लगते रहे हैं। यहां तक की इन्हें पार्टी से भी कुछ समय के लिए निकाला गया था, बाद में वापसी भी हो गई। इनके खिलाफ हत्या, अपहरण और रंगदारी के दो दर्जन से अधिक मामले थे। पुलिस अफसरों की मानें तो कत्ल करवाने में सुनील का कोई सानी नहीं है। कई हाई प्रोफाईल अपहरण के मामलों में भी इनका नाम आया।
 6-सूरजभान सिंह: राम विलास पासवान की पार्टी लोजपा से सांसद चुने गए सूरजभान सिंह इन दिनों जेल में बंद हैं। इन पर रामी सिंह की हत्या का आरोप था। कोर्ट इन्हें दोषी ठहरा चुका है, ऐसे में ये अब चुनाव लड़ने के योग्य नहीं रह गए हैं। कहा जाता है कि बिहार में एक समय इनका ऐसा दबदबा था कि इनके गुर्गे इशारा मिलते ही बड़े से बड़े अपराध को चुटकियों में अंजाम दे देते थे।
7-मुन्ना शुक्ला: बिहार के पूर्व मंत्री बृजबिहारी प्रसाद की हत्या के मामले में अदालत ने मुन्ना शुक्ला को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। इन पर जिलाधिकारी की हत्या के भी आरोप हैं। फिलहाल, मंत्री की हत्या के मामले में वे जेल में बंद हैं। जेल के अंदर रहते हुए जहां नर्तकी के डांस का लुत्फ उठाते हुए मीडिया में उनके फोटोग्राफ आए, तो कभी पीएचडी की डिग्री हासिल करने की खबर। सुप्रीम कोर्ट का डंडा इन पर भी पड़ेगा। अब ये चुनाव लड़ने के योग्य नहीं हैं।
8-आनंद मोहन- पूर्व सांसद आनंद मोहन फिलहाल गोपालगंज के डीएम जी. कृष्णैया की हत्या के मामले में जेल में बंद हैं। जिलाधिकारी की हत्या के मामले में हाई कोर्ट ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसे उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसे अस्वीकार किया जा चुका है। वे पांच सालों से जेल में बंद हैं। बिहार में कभी इनकी दबंगई के चर्चे आम थे। आनंद मोहन ने एक पार्टी भी बनाई थी, जिसका नाम बिहार पीपुल्स पार्टी था। बाद में जद (यू) से जुड़ गए। लेकिन, जदयू की सरकार बनते ही इन्हें जेल में डाल दिया गया। अब ये भी चुनाव लड़ने से वंचित रह जाएंगे।
9-रामा सिंह- बिहार के इस दबंग राजनेता पर हत्या और बलात्कार समेत कई मामले दर्ज हैं। रामा सिंह राम विलास पासवान की पार्टी लोजपा से जुड़े रहे हैं। बिहार के महनार से लोजपा के टिकट पर चुनाव भी जीते। अगर इन पर आरोप सिद्ध हो जाते हैं तो ये भी चुनाव लड़ने लायक नहीं रहेंगे।
10-तस्लीमुद्दीन- कभी सीमांचल की राजनीति में राजद के अगुवा एवं लालू के प्रबल सहयोगी रहे तस्लीमुद्दीन आए दिन पार्टियां बदलते रहते हैं। पहले राजद फिर जदयू और अब फिर से राजद के साथ हैं। इनकी दबंगई के चर्चे भी खूब हुआ करते थे। 69 वर्षीय इस राजनेता के खिलाफ हत्या और बलात्कार के कई मामले दर्ज हैं। तस्लीमुद्दीन केंद्र में मंत्री भी रह चुके हैं।

ईश्वरीय वैभव जगाने का पर्व : गुरुपूर्णिमा


 22 जुलाई 2013 (सोमवार) को
अपना ईश्वरीय वैभव जगाने का पर्व : गुरुपूर्णिमा
(पूज्यश्री की दिव्य अमृतवाणी)

गुरुपूर्णिमा का दूसरा नाम है व्यासपूर्णिमा । वेद के गूढ रहस्यों का विभाग करनेवाले कृष्णद्वैपायन की याद में यह गुरुपूर्णिमा महोत्सव मनाया जाता है । भगवान वेदव्यास ने बहुत कुछ दिया मानव-जाति को । विश्व में जो भी ग्रंथ हैं, जो भी मत, मजहब, पंथ हैं उनमें अगर कोई ऊँची बात है, बडी बात है तो व्यासजी का ही प्रसाद है ।
व्यासोच्छिष्टं जगत्सर्वम् ।

एक लाख श्लोकों का ग्रंथ ‘महाभारत' रचा उन महापुरुष ने और यह दावा किया कि जो महाभारत में है वही और जगह है व जो महाभारत में नहीं है वह दूसरे ग्रंथों में नहीं है : यन्न भारते तन्न भारते । चुनौती दे दी और आज तक उनकी चुनौती को कोई स्वीकार नहीं कर सका । ऐसे व्यासजी, इतने दिव्य दृष्टिसम्पन्न थे कि पद-पद पर पांडवों को बताते कि अब ऐसा होगा और कौरवों को भी बताते कि तुम ऐसा न करो । व्यासजी का दिव्य ज्ञान और आभा देखकर उनके द्वारा ध्यानावस्था में बोले गये ‘महाभारत' के श्लोकों का लेखनकार्य करने के लिए गणपतिजी राजी हो गये । कैसे दिव्य आर्षद्रष्टा पुरुष थे !

ऐसे वेदव्यासजी को सारे ऋषियों और देवताओं ने खूब-खूब प्रार्थना की कि हर देव का अपना तिथि-त्यौहार होता है । शिवजी के भक्तों के लिए सोमवार और शिवरात्रि है, हनुमानजी के भक्तों के लिए मंगलवार व शनिवार तथा हनुमान जयंती है, श्रीकृष्ण के भक्तों के लिए जन्माष्टमी है, रामजी के भक्तों के लिए रामनवमी है तो  आप जैसे महापुरुषों के पूजन-अभिवादन के लिए भी कोई दिन होना चाहिए। हे जाग्रत देव सद्गुरु !  हम आपका पूजन और अभिवादन करके कृतज्ञ हों । कृतघ्नता के दोष से विद्या फलेगी नहीं ।

गुरुब्र्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः...
जैसे ब्रह्मा सृष्टि करते हैं ऐसे आप हमारे अंदर धर्म के संस्कारों की सृष्टि करते हैं, उपासना के संस्कारों की सृष्टि करते हैं, ब्रह्मज्ञान के संस्कारों की सृष्टि करते हैं । जैसे विष्णु भगवान पालन करते हैं ऐसे आप हमारे उन दिव्य गुणों का पोषण करते हैं और जैसे शिवजी प्रलय करते हैं ऐसे आप हमारी मलिन इच्छाएँ, मलिन वासनाएँ, मलिन मान्यताएँ, लघु मान्यताएँ, लघु ग्रंथियाँ क्षीण कर देते हैं, विनष्ट कर देते हैं । आप साक्षात् परब्रह्मस्वरूप हैं... तो गुरु का दिवस भी कोई होना चाहिए । गुरुभक्तों के लिए गुरुवार तय हुआ और व्यासजी ने जो विश्व का प्रथम आर्ष ग्रंथ रचा ‘ब्रह्मसूत्र', उसके आरम्भ-दिवस आषाढी पूर्णिमा का ‘व्यासपूर्णिमा, गुरुपूर्णिमा' नाम पडा ।

तो इस दिन व्यासजी की स्मृति में ‘अपने-अपने गुरु में सत्-चित्-आनंदस्वरूप ब्रह्म-परमात्मा का वास है', ऐसा सच्चा ज्ञान याद करके उनका पूजन करते हैं । गुरुपूनम पर हम तो अपने गुरुदेव को मन-ही-मन स्नान करा देते थे, मन-ही-मन गुरुदेव को वस्त्र पहना देते, मन-ही-मन तिलक करते और सफेद, सुगंधित मोगरे के फूलों की माला गुरुजी को पहनाते, फिर मन-ही-मन आरती करते । और फिर गुरुजी बैठे हैं, उनका मानसिक दर्शन करते- करते उनकी भाव-भंगिमाएँ सुमिरन करके आनंदित होते थे, हर्षित होते थे । हम तो ऐसे व्यासपूनम मनाते थे ।अपने व्यासस्वरूप गुरु के ध्यान में प्रीतिपूर्वक एकाकार... फिर मानों, गुरुजी कुछ कह रहे हैं और हम सुन रहे हैं ।

गुरुजी प्रीति भरी निगाहों से हम पर कृपा बरसा रहे हैं, हम रोमांचित हो रहे हैं, आनंदित हो रहे हैं । हम गुरुजी से मानसिक वार्ताएँ करते थे और अब भी यह सिलसिला जारी है । गुरुदेव का शरीर नहीं है तब भी गुरुतत्त्व तो व्यापक है, सर्वत्र है, अमिट है ।

व्यासपूर्णिमा का पर्व हमारी सोयी हुई शक्तियाँ जगाने को आता है । हम जन्म-जन्मांतरों से भटकते-भटकते सब पाकर सब खोते-खोते कंगाल होते आये । यह पर्व हमारी कंगालियत मिटाने, हमारे रोग-शोक को हरने और हमारे अज्ञान को हर के भगवद्ज्ञान, भगवत्प्रीति, भगवद्रस, भगवत्सामथ्र्य भरनेवाला पर्व है । हमारी दीनता- हीनता को छीनकर हमें ईश्वर के वैभव से, ईश्वर की प्रीति से, ईश्वर के रस से सराबोर करनेवाला पर्व है गुरुपूर्णिमा । व्यासपूर्णिमा हमें स्वतंत्र सुख, स्वतंत्र ज्ञान, स्वतंत्र जीवन का संदेश देती है, हमें अपनी महानता का दीदार कराती है ।

मानव ! तुझे नहीं याद क्या, तू ब्रह्म का ही अंश है ।
व्यासपूर्णिमा कहती है कि तुम अपने भाग्य के आप विधाता हो, तुम अपने आनंद के स्रोत आप हो । सुख हर्ष देगा, दुःख शोक देगा लेकिन ये हर्ष-शोक आयेंगे-जायेंगे, तुम तुम्हारे आनंदस्वरूप को जगाओ फिर सब बौने हो जायेंगे । यह वह पूनम है जो हर जीव को अपने भगवत्स्वभाव में स्थिति करने में बडा सहयोग देती है । जैसे बनिये के लिए हर दिवाली हिसाब-किताब और नया कदम आगे बढाने के लिए है, ऐसे भी साधकों के लिए गुरुपूर्णिमा एक आध्यात्मिक हिसाब-किताब का दिवस है । पहले के वर्ष में  सुख-दुःख में जितनी चोट लगती थी, अब उतनी नहीं लगनी चाहिए । पहले जितना समय देते थे नश्वर चीजों के लिए, उसे अब थोडा कम करके शाश्वत में शांति पायेंगे, शाश्वत का ज्ञान पायेंगे और शाश्वत ‘मैं' को मैं मानेंगे, इस मरनेवाले शरीर को मैं नहीं मानेंगे । दुःख आता है चला जाता है, सुख आता है चला जाता है, qचता आती है चली जाती है, भय आता है चला जाता है लेकिन एक ऐसा तत्त्व है जो पहले था, अभी है और बाद में रहेगा, वह मैं कौन हूँ ?... उस अपने ‘मैं' को जाँचो तो आप पर इन लोफरों के थप्पडों का प्रभाव नहीं पडेगा । इनके सिर पर पैर रखकर मौत के पहले अमर आत्मा का साक्षात्कार हो जाय, इसी उद्देश्य से गुरुपूनम होती है ।

गुरुपूनम का संदेश है कि आप दृढनिश्चयी हो जाओ सत् को पाने के लिए, समता को पाने के लिए । आयुष्य
बीता जा रहा है, कल पर क्यों रखो !
संत कबीरजी ने कहा :
जैसी प्रीति कुटुम्ब की, तैसी गुरु सों होय ।
कहैं कबीर ता दास का, पला न पकडै कोय ।।
जितना इस नश्वर संसार से, छल-कपट से और दुःख देनेवाली चीजों से प्रीति है, उससे आधी अगर भगवान
से हो जाय तो तुम्हारा तो बेडा पार हो जायेगा, तुम्हारे दर्शन करनेवाले का भी पुण्योदय  हो जायेगा ।
        * ऋषि प्रसाद, अंक २२२, जुन २०११
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गुरु पूर्णिमा(व्यास पूर्णिमा) का पर्व/त्यौहार इस वर्ष 22 जुलाई 2013 (सोमवार) को मनाया जायेगा
Posted on जुलाई 8, 2013 by vastushastri08
गुरु पूर्णिमा(व्यास पूर्णिमा) का पर्व/त्यौहार इस वर्ष 22 जुलाई 2013 (सोमवार) को मनाया जायेगा —-

अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाले गुरु को समर्पित,गुरू पूर्णिमा का पर्व/utsav 22 जुलाई 2013, को सोमवार के दिन मनाई जाएगी—-
| Guru Purnima 2013 | Guru Purnima | गुरु पूर्णिमा का पर्व/त्यौहार—

आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा या व्यास पूर्णिमा कहते हैं। भारत भर में यह पर्व बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस दिन गुरुपूजा का विधान है।

गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णु र्गुरूदेवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है और इसी के संदर्भ में यह समय अधिक प्रभावी भी लगता है. इस वर्ष गुरू पूर्णिमा 22 जुलाई 2013, को सोमवार के दिन मनाई जाएगी. गुरू पूर्णिमा अर्थात गुरू के ज्ञान एवं उनके स्नेह का स्वरुप है. हिंदु परंपरा में गुरू को ईश्वर से भी आगे का स्थान प्राप्त है तभी तो कहा गया है कि हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर. इस दिन के शुभ अवसर पर गुरु पूजा का विधान है. गुरु के सानिध्य में पहुंचकर साधक को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त होती है.

गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी होता है. वेद व्यास जी प्रकांड विद्वान थे उन्होंने वेदों की भी रचना की थी इस कारण उन्हें वेद व्यास के नाम से पुकारा जाने लगा.

भारत भर में गुरु पूर्णिमा पर्व बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है। आषाढ़ के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को ही गुरु पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। वैसे तो देश भर में एक से बड़े एक अनेक विद्वान हुए हैं, परंतु उनमें महर्षि वेद व्यास, जो चारों वेदों के प्रथम व्याख्याता थे, उनका पूजन आज के दिन किया जाता है।

गुरुपूर्णिमा का दूसरा नाम है व्यासपूर्णिमा । वेद के गूढ रहस्यों का विभाग करनेवाले कृष्णद्वैपायन की याद में यह गुरुपूर्णिमा महोत्सव मनाया जाता है । भगवान वेदव्यास ने बहुत कुछ दिया मानव-जाति को । विश्व में जो भी ग्रंथ हैं, जो भी मत, मजहब, पंथ हैं उनमें अगर कोई ऊँची बात है, बडी बात है तो व्यासजी का ही प्रसाद है ।
व्यासोच्छिष्टं जगत्सर्वम् ।

एक लाख श्लोकों का ग्रंथ ‘महाभारत’ रचा उन महापुरुष ने और यह दावा किया कि जो महाभारत में है वही और जगह है व जो महाभारत में नहीं है वह दूसरे ग्रंथों में नहीं है : यन्न भारते तन्न भारते । चुनौती दे दी और आज तक उनकी चुनौती को कोई स्वीकार नहीं कर सका । ऐसे व्यासजी, इतने दिव्य दृष्टिसम्पन्न थे कि पद-पद पर पांडवों को बताते कि अब ऐसा होगा और कौरवों को भी बताते कि तुम ऐसा न करो । व्यासजी का दिव्य ज्ञान और आभा देखकर उनके द्वारा ध्यानावस्था में बोले गये ‘महाभारत’ के श्लोकों का लेखनकार्य करने के लिए गणपतिजी राजी हो गये । कैसे दिव्य आर्षद्रष्टा पुरुष थे !

प्राचीन काल में जब विद्यार्थी गुरु के आश्रम में निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करता था, तो इसी दिन श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर अपने गुरु का पूजन करके उन्हें अपनी शक्ति, अपने सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देकर कृतकृत्य होता था।

हमें वेदों का ज्ञान देने वाले व्यासजी ही हैं, अतः वे हमारे आदिगुरु हुए। इसीलिए इस दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। उनकी स्मृति हमारे मन मंदिर में हमेशा ताजा बनाए रखने के लिए हमें इस दिन अपने गुरुओं को व्यासजी का अंश मानकर उनकी पाद-पूजा करनी चाहिए तथा अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए गुरु का आशीर्वाद जरूर ग्रहण करना चाहिए। साथ ही केवल अपने गुरु-शिक्षक का ही नहीं, अपितु माता-पिता, बड़े भाई-बहन आदि की भी पूजा का विधान है।

वेद व्यास की जयंती :—–
गुरु पूर्णिमा जगत गुरु माने जाने वाले वेद व्यास को समर्पित है.. माना जाता है कि वेदव्यास का जन्म आषाढ़ मास की पूर्णिमा को हुआ था. वेदों के सार ब्रह्मसूत्र की रचना भी वेदव्यास ने आज ही के दिन की थी. वेद व्यास ने ही वेद ऋचाओं का संकलन कर वेदों को चार भागों में बांटा था. उन्होंने ही महाभारत, 18 पुराणों व 18 उप पुराणों की रचना की थी जिनमें भागवत पुराण जैसा अतुलनीय ग्रंथ भी शामिल है. ऐसे जगत गुरु के जन्म दिवस पर गुरु पूर्णिमा मनाने की परंपरा है.वैसे तो दुनिया में कई विद्वान हुए हैं। परंतु चारों वेदों के प्रथम व्याख्याता व्यास ऋषि थे, जिनकी आज के दिन पूजा की जाती है। हमें वेदों का ज्ञान देने वाले व्यासजी ही हैं। अतः वे हमारे आदिगुरु हुए। इसीलिए गुरुपूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। उनकी स्मृति को ताजा रखने के लिए हमें अपने-अपने गुरुओं को व्यासजी का अंश मानकर उनकी पूजा करके उन्हें कुछ न कुछ दक्षिणा अवश्य देनी चाहिए।
हमें यह याद रखना चाहिए कि महात्माओं का श्राप भी मोक्ष की प्राप्ति कराता है। यदि राजा परीक्षित को ऋषि का श्राप नहीं होता तो उनकी संसार के प्रति जो आसक्ति थी वह दूर नहीं होती। आसक्ति होने के कारण उन्हें वैराग्य नहीं होता और वैराग्य के बिना श्रीमद्भागवत के श्रवण का अधिकार प्राप्त नहीं होता। साधु के श्राप से ही उन्हें भगवान नारायण, शुकदेव के दर्शन और उनके द्वारा देव दुर्लभ श्रीमद्भागवत का श्रवण प्राप्त हुआ।

बुद्ध ने दिया था प्रथम उपदेश :—–
बौद्ध ग्रंथों के अनुसार ज्ञान प्राप्ति के पांच सप्ताह बाद भगवान बुद्ध ने सारनाथ पहुंच आषाढ़ पूर्णिमा के दिन अपने प्रथम पांच शिष्यों को उपदेश दिया था. इसे बौद्ध ग्रंथों में ‘धर्मचक्र प्रवर्तन’ कहा जाता है. बौद्ध धर्मावलंबी इसी गुरु-शिष्य परंपरा के तहत गुरु पूर्णिमा मनाते हैं.

गुरु पूर्णिमा के दिन क्या करें..????

—- प्रातः घर की सफाई, स्नानादि नित्य कर्म से निवृत्त होकर साफ-सुथरे वस्त्र धारण करके तैयार हो जाएं।
—-घर के किसी पवित्र स्थान पर पटिए पर सफेद वस्त्र बिछाकर उस पर 12-12 रेखाएं बनाकर व्यास-पीठ बनाना चाहिए।
—– फिर हमें ‘गुरुपरंपरासिद्धयर्थं व्यासपूजां करिष्ये’ मंत्र से पूजा का संकल्प लेना चाहिए।
—- तत्पश्चात दसों दिशाओं में अक्षत छोड़ना चाहिए।
—-फिर व्यासजी, ब्रह्माजी, शुकदेवजी, गोविंद स्वामीजी और शंकराचार्यजी के नाम, मंत्र से पूजा का आवाहन करना चाहिए।
—-अब अपने गुरु अथवा उनके चित्र की पूजा करके उन्हें यथा योग्य दक्षिणा देना चाहिए।

यह भी करें गुरु पूर्णिमा पर :—-

—-गुरु पूर्णिमा पर व्यासजी द्वारा रचे हुए ग्रंथों का अध्ययन-मनन करके उनके उपदेशों पर आचरण करना चाहिए।
—-यह पर्व श्रद्धा से मनाना चाहिए, अंधविश्वास के आधार पर नहीं।
—–इस दिन वस्त्र, फल, फूल व माला अर्पण कर गुरु को प्रसन्न कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।
—–गुरु का आशीर्वाद सभी-छोटे-बड़े तथा हर विद्यार्थी के लिए कल्याणकारी तथा ज्ञानवर्द्धक होता है।
—- इस दिन केवल गुरु (शिक्षक) ही नहीं, अपितु माता-पिता, बड़े भाई-बहन आदि की भी पूजा का विधान है।

यह हें गुरु पूर्णिमा का महत्त्व—-

गुरु का दर्जा भगवान के बराबर माना जाता है क्योंकि गुरु, व्यक्ति और सर्वशक्तिमान के बीच एक कड़ी का काम करता है. संस्कृत के शब्द गु का अर्थ है अन्धकार, रु का अर्थ है उस अंधकार को मिटाने वाला.

आत्मबल को जगाने का काम गुरु ही करता है. गुरु अपने आत्मबल द्वारा शिष्य में ऐसी प्रेरणाएं भरता है, जिससे कि वह अच्छे मार्ग पर चल सके. साधना मार्ग के अवरोधों एवं विघ्नों के निवारण में गुरु का असाधारण योगदान है. गुरु शिष्य को अंत: शक्ति से ही परिचित नहीं कराता, बल्कि उसे जागृत एवं विकसित करने के हर संभव उपाय भी बताता है.

शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है – अंधकार या मूल अज्ञान और रु का का अर्थ किया गया है – उसका निरोधक। अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को ‘गुरु’ कहा जाता है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है। इस दिन सुबह घर की सफ़ाई स्नान आदि के बाद घर में किसी पवित्र स्थान पर सफेद वस्त्र फैलाकर उस पर बारह-बारह रेखाएँ बनाकर व्यास-पीठ बनाएँ।

‘गुरुपरंपरासिद्धयर्थं व्यासपूजां करिष्ये’ मंत्र से संकल्प करें। इसके बाद दसों दिशाओं में अक्षत छोड़ें।

अब ब्रह्माजी, व्यासजी, शुकदेवजी, गोविंद स्वामीजी और शंकराचार्यजी के नाम मंत्र से पूजा आवाहन आदि करें। फिर अपने गुरु अथवा उनके चित्र की पूजा कर उन्हें दक्षिणा दें।

जैसे विष्णु भगवान पालन करते हैं ऐसे आप हमारे उन दिव्य गुणों का पोषण करते हैं और जैसे शिवजी प्रलय करते हैं ऐसे आप हमारी मलिन इच्छाएँ, मलिन वासनाएँ, मलिन मान्यताएँ, लघु मान्यताएँ, लघु ग्रंथियाँ क्षीण कर देते हैं, विनष्ट कर देते हैं । आप साक्षात् परब्रह्मस्वरूप हैं… तो गुरु का दिवस भी कोई होना चाहिए । गुरुभक्तों के लिए गुरुवार तय हुआ और व्यासजी ने जो विश्व का प्रथम आर्ष ग्रंथ रचा ‘ब्रह्मसूत्र’, उसके आरम्भ-दिवस आषाढी पूर्णिमा का ‘व्यासपूर्णिमा, गुरुपूर्णिमा’ नाम पडा । हे जाग्रत देव सद्गुरु ! हम आपका पूजन और अभिवादन करके कृतज्ञ हों । कृतघ्नता के दोष से विद्या फलेगी नहीं ।

“”गुरुब्र्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः”"

गुरु व्यक्ति को अंधकार से प्रकाश में ले जाने का कार्य करता है, सरल शब्दों में गुरु को ज्ञान का पुंज कहा जा सकता है. आज भी इस तथ्य का महत्व कम नहीं है. विद्यालयों और शिक्षण संस्थाओं में विद्यार्थियों द्वारा आज भी इस दिन गुरू को सम्मानित किया जाता है. मंदिरों में पूजा होती है, पवित्र नदियों में स्नान होते हैं, जगह जगह भंडारे होते हैं और मेलों का आयोजन किया जाता है.गुरु ही साक्षात महादेव है, क्योकि वह अपने शिष्यों के सभी दोषों को माफ करता है. गुरु का महत्व सभी दृष्टि से सार्थक है. आध्यात्मिक शांति, धार्मिक ज्ञान और सांसारिक निर्वाह सभी के लिए गुरू का दिशा निर्देश बहुत महत्वपूर्ण होता है. गुरु केवल एक शिक्षक ही नहीं है, अपितु वह व्यक्ति को जीवन के हर संकट से बाहर निकलने का मार्ग बताने वाला मार्गदर्शक भी है.

प्राचीनकाल में जब विद्यार्थी गुरु के आश्रम में नि:शुल्क शिक्षा ग्रहण करता था, तो इसी दिन श्रद्धाभाव से प्रेरित होकर अपने गुरू का पूजन करके उन्हें अपनी शक्ति, सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देकर कृतार्थ होता था। आज भी इसका महत्व कम नहीं हुआ है। पारंपरिक रूप से शिक्षा देने वाले विद्यालयों में, संगीत और कला के विद्यार्थियों में आज भी यह दिन गुरु को सम्मानित करने का होता है। मंदिरों में पूजा होती है, पवित्र नदियों में स्नान होते हैं, जगह-जगह भंडारे होते हैं और मेले लगते हैं।

गुरू आत्मा – परमात्मा के मध्य का संबंध होता है. गुरू से जुड़कर ही जीव अपनी जिज्ञासाओं को समाप्त करने में सक्षम होता है तथा उसका साक्षात्कार प्रभु से होता है. हम तो साध्य हैं किंतु गुरू वह शक्ति है जो हमारे भितर भक्ति के भाव को आलौकिक करके उसमे शक्ति के संचार का अर्थ अनुभव कराती है और ईश्वर से हमारा मिलन संभव हो पाता है. परमात्मा को देख पाना गुरू के द्वारा संभव हो पाता है. इसीलिए तो कहा है—
“”गुरु गोविंददोऊ खड़े काके लागूं पाय. बलिहारी गुरु आपके जिन गोविंद दियो बताय”"….

गुरु पूर्णिमा का संदेश है कि आप दृढनिश्चयी हो जाओ सत् को पाने के लिए, समता को पाने के लिए । आयुष्य
बीता जा रहा है, कल पर क्यों रखो !

संत कबीरजी ने कहा :—–
जैसी प्रीति कुटुम्ब की, तैसी गुरु सों होय ।
कहैं कबीर ता दास का, पला न पकडै कोय ।।

जितना इस नश्वर संसार से, छल-कपट से और दुःख देनेवाली चीजों से प्रीति है, उससे आधी अगर भगवान
से हो जाय तो तुम्हारा तो बेडा पार हो जायेगा, तुम्हारे दर्शन करनेवाले का भी पुण्योदय हो जायेगा ।

गुरु पूर्णिमा के दिन साधक अपने जीवन में साधना का नया संकल्प लेता है, उसकी पूर्ति के लिए गुरुदेव से प्रार्थना करता है और वर्ष भर में हुई साधना की गलतियों का निरीक्षण कर उसे दूर करने के लिए दृढ़ संकल्पित होता है. गुरु पूर्णिमा का पर्व साधक को अपने जीवन में साधना के प्रति सचेत करने का पर्व है. मंत्रदाता सदगुरु के प्रति जितनी श्रद्धा होगी, जितना आदर होगा, उतना ही अधिक लाभ होता है.जिसके जीवन में गुरुदीक्षा होती है वह कभी नरक में नहीं जाता.

इस दिन वस्त्र, फल, फूल व माला अर्पण कर गुरु को प्रसन्न कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए क्योंकि गुरु का आशीर्वाद ही सबके लिए कल्याणकारी तथा ज्ञानवर्द्धक होता है।