सोमवार, 29 जुलाई 2013

सस्पेंड अखिलेश यादव होना चाहिए :असली साम्प्रदायिक अखिलेश

सत्ता-माफिया गठजोड़ के खिलाफ मोर्चा मुश्किल

 सस्पेंड अखिलेश यादव होना चाहिए
असली साम्प्रदायिक अखिलेश
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने आई ए एस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल  को गलत सस्पेंड किया है, उन्होने अपनी शक्तियों का अपाराधिक दुरउपयोग किया है। असल में साम्प्रदायिकता तो मुख्यमंत्री ने की है। जो कि मूल साम्प्रदायिकता अवैध निर्माण कर्ता पर कार्यवाही के बजाये कानून की रक्षा करने वाले को सस्पेंड किया । 
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क्या धर्म की राजनीति कर रहे हैं अखिलेश यादव?
एबीपी न्यूज़ ब्यूरो
Thursday, 01 August 2013
नोएडा / लखनऊ: यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा है कि दुर्गा शक्ति नागपाल का निलंबन सही फैसला है. अखिलेश के मुताबिक लोकल इंटेलीजेंस यूनिट की रिपोर्ट पर कार्रवाई हुई.
अखिलेश ने डीएम की उस रिपोर्ट पर कुछ नहीं कहा जिसमें कहा गया है कि मस्जिद की दीवार गांव वालों ने गिराई. केंद्र सरकार ने निलंबन पर रिपोर्ट मांगी है. बड़ा सवाल ये है कि क्या अखिलेश अफसर के तलाबदले को धर्म का रंग देकर राजनीति कर रहे हैं?
दुर्गा नागपाल के निलंबन को लेकर भले ही लखनऊ से लेकर दिल्ली तक बवाल मचा है, लेकिन यूपी की सरकार को लगता है कि दुर्गा को हटाकर कोई गलती नहीं हुई है. अखिलेश यादव ने आईएएस दुर्गा को हटाने की कार्रवाई जिस रिपोर्ट पर की है वो रिपोर्ट एलआईयू यानी लोकल इंटेलीजेंस यूनिट ने दी थी. इस यूनिट के मुखिया इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारी होते हैं जो जिले के एसएसपी को अपनी रिपोर्ट देते हैं, जबकि जिले के मुखिया यानी कलेक्टर की रिपोर्ट दुर्गा को क्लीन चिट दे रही है.
डीएम की रिपोर्ट के मुताबिक ग्रेटर नोएडा के कादलपुर गांव में मस्जिद की दीवार दुर्गा नागपाल ने नहीं गिरवाई. डीएम के मुताबिक अवैध निर्माण को लेकर दुर्गा ने गांववालों से बातचीत कर विवाद को सुलझा लिया था, जिसके बाद दीवार गांव के लोगों ने ही गिराई थी. इस काम में न तो जेसीबी का और ना ही किसी बड़ी मशीन का इस्तेमाल हुआ.
विवाद के दिल्ली तक पहुंचने के बाद अब केंद्र सरकार भी हरकत में आई है. केंद्र  यूपी सरकार से रिपोर्ट मांगी है. यूपी सरकार भले ही धार्मिक स्थल की दीवार को मुद्दा बताकर निलंबन को सही बता रही है लेकिन विपक्षी पार्टियों का साफ कहना है कि खनन माफिया को बचाने के लिए ईमानदार आईएस को सस्पेंड किया गया है.
आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता तो ग्रेटर नोएडा में धरने पर बैठे हुए हैं. आईएएस एसोसिएशन ने कोर्ट जाने तक की धमकी दी है. एक आईएएस के पक्ष में ऐसी गोलबंदी इसलिए दिख रही है क्योंकि 2009 बैच की आईएएस 28 साल की दुर्गा की गिनती ईमानदार अफसरों में होती है.
ये बात किसी से छिपी नहीं है कि नोएडा में दुर्गा के खौफ से खनन माफिया खार खाये हुए थे. इसलिए ये सवाल उठ रहे हैं कि क्या रेत माफिया को बचाने के लिए ही निलंबन को धार्मिक रंग दिया जा रहा है ?
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Bjp Itcell Tonk
नई दिल्ली. दुर्गा शक्ति नागपाल। 2009 बैच की पंजाब कैडर की आईएएस अफसर। पिछले साल अगस्त में पंजाब से उत्तर प्रदेश कैडर में तबादले के बाद पिछले दिनों वे गौतम बुद्ध नगर में एसडीएम के पद पर तैनात थीं। लेकिन दुर्गा को उत्तर प्रदेश सरकार ने बिना कसूर ही सस्पेंड कर उनकी 'शक्ति' छीन ली। इस मामले में चौंकाने वाला खुलासा यह हुआ है कि दुर्गा शक्ति नागपाल ने रबूपुरा थाने के तहत आने वाले एक गांव में धार्मिक स्थल की दीवार गिराने का आदेश दिया ही नहीं था। दरअसल, गौतम बुद्ध नगर के डीएम कुमार रविकांत ने शासन को भेजी रिपोर्ट में कहा है कि दुर्गा शक्ति ने गांव में जाकर लोगों को अवैध निर्माण न करने को लेकर समझाया था। इसके बाद गांव वालों ने खुद ही दीवार को गिरा दिया था। जबकि इस मामले में विवाद बढ़ने के बाद अखिलेश यादव की सरकार ने सफाई दी थी कि दुर्गा को एक धार्मिक स्थल की दीवार गिरवाने की वजह से गौतम बुद्ध नगर के एसडीएम (सदर) की कुर्सी से हटा दिया था। इस खुलासे के बाद समाजवादी सरकार की पोल खुल गई है।
दुर्गा का निलंबन खत्म करने को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार किसी तरह की हड़बड़ी नहीं दिखाना चाहती है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कर्नाटक की दो दिनी यात्रा के बाद मंगलवार को लखनऊ लौट आए। उन्होंने उच्च अधिकारियों से निलंबन प्रकरण से उपजी स्थिति पर पूरी जानकारी ली। इस बीच दुर्गा शक्ति नागपाल को राजस्व परिषद (रेवेन्यू बोर्ड) से अटैच (संबंद्ध) कर दिया गया है।
मंगलवार की दोपहर तीन बजे के करीब दुर्गा शक्ति नागपाल राजस्व परिषद पहुंची। उन्होंने राजस्व परिषद के अध्यक्ष जगन मैथ्यूज व सचिव अनिल कुमार से मुलाकात कर संबद्धता के सम्बंध में रिपोर्ट किया। नागपाल लगभग 10 मिनट राजस्व परिषद में रहीं और फिर चली गईं। उनके बैठने के लिए एक कमरा भी तैयार कर दिया गया है।
इस बीच, आईएएस एसोसिएशन ने इस मामले में केंद्र सरकार से दखल देने की अपील की है। कहा जा रहा है कि दुर्गा को निलंबित किए जाने की असली वजह उनकी ईमानदार कार्यशैली है। दुर्गा जिले के खनन माफियाओं पर कहर बनकर टूट रही थीं। उनके आदेश पर दो दर्जन से ज्यादा खनन माफियाओं पर मुकदमे दर्ज किए गए और लाखों रुपये का जुर्माना वसूला गया। बस, काम करने का यही अंदाज माफियाओं को खल गया और पूरी खनन माफिया लॉबी उन्हें चूना लगाने वाली अफसर के खिलाफ लग गई। कहा जा रहा है कि अंत में माफिया दुर्गा शक्ति को सस्पेंड कराने में कामयाब हो गए।
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 मस्जिद {अवैध }बनाने से रोका इसलिए IAS दुर्गा शक्ति सस्पेंड: अखिलेश यादव
लखनऊ।। आईएएस दुर्गा शक्ति नागपाल की पहली पोस्टिंग ग्रेटर नोएडा में हुई। वह सब-डिविजनल मैजिस्ट्रेट (एसडीएम) बनकर आई थीं। इनकी पोस्टिंग के मुश्किल से 6 महीने हुए थे कि अखिलेश यादव सरकार ने उन्हें सस्पेंड कर दिया। शनिवार को नागपाल ने ग्रेटर नोएडा में अवैध रूप से सरकारी जमीन पर बनाई जा रही मस्जिद की दीवार को तोड़ने का आदेश दिया था। उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार का कहना है कि नागपाल ने रमजान के पवित्र महीने में समस्या खड़ा करने वाला फरमान जारी किया था। अखिलेश यादव ने कहा कि सांप्रदायिक तनाव से बचने के लिए हमें यह फैसला लेना पड़ा। मुख्यमंत्री के इस फैसले पर यूपी आईएएस असोसिएशन ने नाराजगी जताई है।
यूपी आईएएस असोसिएशन के सचिव पार्थसारथी सेन शर्मा के साथ दुर्गा नागपाल ने यूपी के ऐक्टिंग मुख्य सचिव आलोक रंजन से मुलाकात की। असोसिएशन ने आलोक रंजन से निलंबन वापस लेने की मांग की है। इस बीच यूपी सरकार ने इस निलंबन पर सफाई दी है कि दुर्गा सांप्रदायिक सौहार्द्र कायम रखने में नाकाम रही हैं।
अखिलेश यादव सरकार के इस तर्क को लोग बहाने के रूप में देख रहे हैं। लोगों का मानना है कि दुर्गा शक्ति नागपाल जिस तरीके से काम कर रही थीं, उसका नतीजा अखिलेश सरकार में यही होना था। नागपाल रेत खनन माफियाओं पर लगातार शिकंजा कसती जा रही थीं। ऐसे में अखिलेश सरकार पर खनन माफियाओं का भारी दबाव था कि नागपाल को हटाया जाए।
नागपाल 2009 बैच की आईएएस ऑफिसर हैं। कुछ हफ्तों से ग्रेटर नोएडा में अवैध खनन पर लगाम कसने के लिए नागपाल युद्धस्तर पर काम कर रही थीं। उन्होंने यमुना नदी से रेत से भरी 300 ट्रॉलियों को अपने कब्जे में किया था। नागपाल ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यमुना और हिंडन नदियों में खनन माफियाओं पर नजर रखने के लिए विशेष उड़न दस्तों का गठन किया था। नागपाल ने सस्पेंड होने से पहले ही कहा कि था इन माफियाओं पर कार्रवाई की वजह से धमकियां मिलती हैं।
नागपाल पर सरकार के फैसले के बाद विपक्ष हमलावर तेवर में आ गया है। विपक्ष ने एक सुर में कहा कि अखिलेश सरकार को माफिया चला रहे हैं, इसलिए ईमानदार आईएएस को सजा दी गई। बीजेपी से सीनियर नेता कलराज मिश्रा ने कहा कि अब यह साबित हो गया है कि सरकार उन ऑफिसरों को बर्दाश्त नहीं करेगी जो माफियाओं के खिलाफ हैं। आखिर दुर्गा शक्ति नागपाल की गलती क्या थी कि उन्हें सस्पेंड कर दिया गया? पहले से ही उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था को लेकर चिंता कायम है। वहीं अखिलेश सरकार के इस फैसले की चौतरफा आलोचना हो रही है।
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सत्ता-माफिया गठजोड़ के खिलाफ मोर्चा मुश्किल
बिजनेस भास्कर | Aug 02, 2013
विरोध जारी - सत्ता और माफिया के गठजोड़ के खिलाफ खैरनार से खेमका जैसे अफसरों के अभियान की एक लंबी परंपरा रही है। इस कड़ी में हालिया नाम दुर्गा शक्ति नागपाल का जुड़ा है। लेकिन सरकारें ऐसी ताकतों को दबाने में जी-जान से जुट जाती हैं।
एसोसिएशन की मांग - आईएएस एसोसिएशन दुर्गा शक्ति के निलंबन का खात्मा चाहता है। साथ ही एसोसिएशन की मांग यह है कि बदली परिस्थितियों में अफसरों के निलंबन के नियम-कायदों में संशोधन भी किया जाना जरूरी हो गया है।
उत्तर प्रदेश सरकार ने साफ कह दिया है कि वह एसडीएम दुर्गा शक्ति नागपाल का निलंबन वापस नहीं लेगी। यूपी सरकार का कहना है कि दुर्गा को एक धार्मिक स्थल की दीवार ध्वस्त करने के आरोप में निलंबित किया गया है। लेकिन माना जा रहा है कि उन्हें रेत माफिया के खिलाफ कदम उठाने का खमियाजा भुगतना पड़ा है।
इससे एक बार फिर राजनीति बनाम नौकशाही का बहस तेज हुई है। सिविल सर्विस या ऐसी ही उच्च स्तर की प्रतियोगिताओं के बाद कार्यक्षेत्र में आने वाले अधिकारियों को जब सत्ता और उसके नापाक गठजोड़ों का पता चलता है तो वे इसे तोडऩे का उत्साह दिखाते हैं।
नए अधिकारियंों में यह आदर्शवाद ज्यादा होता है। हालांकि कई पुराने अफसरों ने भी भ्रष्टाचार और माफिया को खत्म करने और अपराधियों और राजनीतिक नेताओं की सांठगांठ को खत्म करने के कदम उठाए हैं। लेकिन दुर्गाशक्ति की तरह ही उन्हें भी सत्ता के गुस्से का शिकार होना पड़ा है।
हर पार्टी की सरकार बदनाम
दुर्गा शक्ति नागपाल के निलंबन के खिलाफ आम लोगों में गुस्सा है और उन्हें समर्थन मिल रहा है। विरोधी पार्टियां यूपी में सरकार चला रही सरकार और मुख्यमंत्री को घेरने में लगी है।
मुख्य विरोधी दल बीएसपी ने दुर्गा शक्ति नागपाल के निलंबन की वापसी की मांग की है। हालांकि बीएसपी के शासनकाल में भी ईमानदार अफ सरों को टिकने नहीं दिया गया था। मायावती के शासनकाल में वरिष्ठ आईएएस अधिकारी प्रोमिला शंकर को सिर्फ इसलिए निलंबित कर दिया था कि उन्होंने यमुना एक्सप्रेस-वे अथॉरिटी के मास्टर प्लान पर एतराज जताते हुए उसे मंजूर करने से इनकार कर दिया था।
हालांकि उन्हें भी बहाने से निलंबित किया गया था लेकिन उस समय आईएएस एसोसिएशन इसका विरोध करने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाई थी। दुर्गा शक्ति के मामले में केंद्र भी दिलचस्पी ले रहा है और उसने कहा है कि वह उसके निलंबन के मामले पर नजदीकी निगाह बनाए हुए है।
कई अफसरों के हैं उदाहरण
बहरहाल, सरकार से किसी ईमानदार अफसर का टकराने का यह पहला मामला नहीं है। हाल में हरियाणा काडर के चर्चित आईएएस अधिकारी अशोक खेमका का हुड्डा सरकार से टकराव हो चुका है। खेमका ने निबंधन महानिरीक्षक के तौर पर मनेश-शिकोहपुर स्थि 3.53 एकड़ के प्लॉट का दाखिल-ख्रारिज रद्द कर दिया था।
इसे रॉबर्ट वाड्रा की कंपनी स्काई लाइट हॉस्पेटिलिटी प्राइवेट लिमिटेड ने 58 करोड़ रुपये में रियल एस्टेट की दिग्गज कंपनी डीएलएफ को भेजा था। इस जमीन का सौदा रद्द होने की वजह से खेमका का तबादला कर दिया गया था। इस साल सराहनीय सेवा के लिए राष्ट्रपति मेडल से नवाजे गए गोवा के पुलिस अधिकारी आत्माराम देशपांडे का नवंबर, 2011 में मिजोरम तबादला कर दिया गया।

लेकिन देशपांडे निजी समस्याओं का हवाला देते हुए राज्य सरकार से यह आग्रह किया कि उन्हें एक साल तक राज्य में रखा जाए। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इसे नामंजूर कर दिया। बाद में गृह मंत्रालय की ओर से उन्हें नोटिस जारी कर कहा गया कि उन्होंने आदेश का पालन क्यों नहीं किया और इसके लिए उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाए।
पिछले महीने भारतीय आर्थिक सेवा की 1981 बैच की अधिकारी रुग्मिणी परमार ने आत्महत्या करने की कोशिश की। उन्हें संयुक्त सचिव स्तर की एक महिला अधिकारी ने प्रताडि़त किया था। परमार ने बिहार के एक गैर सरकारी संगठन सेवा संकल्प एवं विकास समिति को अनुदान जारी करने के लिए परमार की खिंचाई की थी।
खैरनार से खेमका तक
बहरहाल, भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार से मुकाबला करने वाले अफसरों की एक लंबी परंपरा रही है। इसमें मुंबई नगरपालिका के डिप्टी कमिश्नर जी.आर. खैरनार, किरण बेदी , सीबीआई की पूर्व चीफ जोगिंदर सिंह से लेकर अशोक खेमका और अब दुर्गा शक्ति नागपाल शामिल हो चुकी हैं।
इनके अलावा राजस्थान के विकास कुमार हरियाणा के संजीव चतुर्वेदी, राजस्थान की मुग्धा सिन्हा, पश्चिम बंगाल में दमयंती सेन, राजस्थान के समित शर्मा और तमिलनाडु में उमाशंकर जैसे अफसर माफिया और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठा चुके हैं और एक्शन भी ले चुके हैं ।
राजस्थान में आईपीएस अफसर विकास कुमार ने पिछले साल भरतपुर में अवैध खनन माफिया का भंडाफोड़ किया था। पुलिस जांच होने वाली थी लेकिन उनका ट्रांसफर कर दिया गया। इस तरह 2002 के हरियाणा कैडर के भारतीय वन सेवा के अधिकारी संजीव चतुर्वेदी ने सात साल की सर्विस के दौरान कई घोटालों को उजागर किया। इसके बदले उनके खिलाफ ही पांच आपराधिक मामले दर्ज कराए गए।
उन्होंने सितंबर 2012 में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर उजागर किए गए घोटोलों की सीबीआई जांच की मांग की थी। सितंबर, 2010 में झुंझनूत की पहली महिला कलक्टर का स्थानीय माफिया से टक्कर लेने के कारण तबादला करा दिया गया। कोलकाता पुलिस की क्राइमर बांच की पहली महिला चीफ ने पार्क स्ट्रीट गैंग रेप केस की जांच की।
उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के दावे को गलत साबित किया। दो महीने के बाद उनका ट्रांसफर कर दिया गया। 1990 बैच के आईएएस अधिकारी उमाशंकर ने ज्वाइंट विजिलेंस कमिश्नर रहते हुए मारन बंधुओं के खिलाफ कार्रवाई की। इसके चलते इन्हें निलंबित कर दिया गया था।


राज्यसभा : यहां सब करोड़पति हैं, जीतने वाले भी और हारने वाले भी



यहां सब करोड़पति हैं, जीतने वाले भी और हारने वाले भी
शमशेर सिंह/ [Edited By: संदीप कुमार सिन्हा] | नई दिल्ली, 29 जुलाई 2013
http://aajtak.intoday.in/story
कांग्रेस के पूर्व महासचिव और राज्यसभा सांसद चौधरी बीरेंद्र सिंह ने खुलासा किया है कि 100 करोड़ में राज्यसभा की सीट बिकती है.  ऐसे में सभी की भौहें तन गईं कि क्या वाकई में संसद पहुंचने के लिए करोड़ों का चढ़ावा चढ़ता है. बवाल खड़ा हुआ तो बीरेंद्र सिंह अपने बयान से पलट गए. नया बयान दे डाला कि सिर्फ करोड़पतियों को राज्यसभा नहीं जाना चाहिए.
सवाल यह उठता है कि राज्यसभा ही क्यों, लोकसभा या विधानसभा में जो हुक्मरान बैठते हैं, क्या उन पर मां लक्ष्मी की कृपा नहीं है?  जवाब हैं हां. यह हम नहीं, आंकड़ें बयान कर रहे हैं. ऐसे आंकड़ें जो बताते हैं कि चाहे कोई सांसद बने या फिर ना बने, चाहे कोई विधायक बने या फिर ना बने. सियासत के अखाड़े में जो भी कूदा, औसतन हर पहलवान करोड़पति तो है ही.
2004 से लेकर अब तक जितने भी नेताओं ने विधानसभा और लोकसभा के चुनाव में अपनी किस्मत अजमाई है, करीबन सभी पर मां लक्ष्मी की अपार कृपा है.
हमारे नेताओं की संपत्ति का औसतन ब्यौरा
1. चुनाव में खड़े होने वाले सभी उम्मीदवारों की औसतन संपत्ति- 1.37 करोड़
2. सांसदों और विधायकों की औसतन संपत्ति-3.83 करोड़
3. दागी सांसदों और विधायकों की औसत संपत्ति-4.30 करोड़
4. गंभीर मामलों में फंसे सांसदों और विधायकों की औसत संपत्ति-4.38 करोड़
5. चुनाव में किस्मत आजमाने वाले सबसे अमीर पार्टी (अकाली दल-6.02 करोड़, टीडीपी-5.61 करोड़, जेडीएस-4.72 करोड़, कांग्रेस-4.32 करोड़ और बीजेपी-1.79 करोड़)
6. सबसे अमीर सांसदों और विधायकों की पार्टी (टीडीपी-8.72 करोड़, जेडीएस-7.72 करोड़, अकाली दल-6.27 करोड़, निर्दलीय-7.23 करोड़, कांग्रेस-5.81 करोड़ और बीजेपी 2.88 करोड़)

कई करोड़ों में है राजनीतिक पार्टियों की कमाई
गौरतलब है कि देश के राजनीतिक दलों ने 2004 के बाद से चंदा और अन्य स्रोतों से 4,662 करोड़ रुपये की कमाई की है. सितंबर 2012 में दो एनजीओ ने दावा किया कि 2,008 करोड़ रुपये की कमाई के साथ सत्तारूढ कांगेस सूची में शीर्ष पर है, जबकि मुख्य विपक्षी दल बीजेपी 994 करोड़ रुपये की कमाई के साथ दूसरे पायदान पर है.
आयकर रिटर्न और 2004 -2011 के दौरान चुनाव आयोग को दानकर्ताओं की दी गई सूची के आधार पर एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और नेशनल इलेक्शन वॉच ने 23 बड़ी पार्टियों के आय की रिपोर्ट जारी की था.
आश्चर्यजनक तौर पर, माकपा की कमाई 2004-2011 के बीच 417 करोड़ रुपये रही जिनमें ज्यादातर योगदान 20,000 रुपये से कम का योगदान देने वाले व्यक्तियों का रहा.
माकपा, बीएसपी की 484 करोड़ रुपये की कमाई के थोड़ा ही पीछे रही जबकि अन्य बड़े वाम दल भाकपा ने केवल 6.7 करोड़ रुपये कमाए. एनजीओ के मुताबिक समाजवादी  पार्टी ने 278 करोड़ रुपये की कमाई की.