गुरुवार, 8 अगस्त 2013

राष्ट्र वंदना : अखंड भारत संकल्प


राष्ट्र वंदना : अखंड भारत संकल्प

14 अगस्त को अखंड भारत दिवस 


ओ भारत के वीर जवानों, माँ का क़र्ज़ चुका देना !!
कटे फटे इस मानचित्र को, अबकी ठीक बना देना !!

पटना साहीब से मीलने को ननकाना बैचेन खड़ा,
अबकी तीरंगा रावलपिंडी में घुस कर फहरा देना  !!
अटक कटक से सिन्धु नदी तक सब कुछ हमको प्यारा है,
कश्मीर मत मांगो कह दो पाकिस्तान हमारा है !!

जो उपवन से घात करे वो शाख तोड़ दी जायेगी,
जो पीछे से वार करे वो बांह मोड़ दी जायेगी !!

जो कुटुंब का नाश करे वो गर्दन तोड़ दी जायेगी,
मेरे देश पे उठती हर एक आँख फोड़ दी जायेगी !!

जो देश द्रोह की बात करे वो मनुष्य हत्यारा है,
कश्मीर मत मांगों कह दो पाकिस्तान हमारा है !!

अपनी झीले, नदीयाँ, पर्वतमाला कैसे दे देंगे?
भारत भर की रूप सुधा का प्याला कैसे दे देंगे?

वैष्णो देवी , बाला अमर उजाला कैसे दे देंगे?
अमरनाथ का बोलो पुण्य शीवाला कैसे दे देंगे?

गंगा से मीलने को झेलम का बैचेन कीनारा है,
कश्मीर मत मांगों कह दो पाकिस्तान हमारा है !!

अखंड भारत - देवेन्द्र स्वरूप



क्या है अखंड भारत का अर्थ
July 17, 2005 -देवेन्द्र स्वरूप
http://www.bhartiyapaksha.com/?p=2887
   अखंड भारत का संकल्प लेने से पहले अखंड भारत की अवधारणा स्पष्ट होनी चाहिए। अगर अखंड भारत का अर्थ भौगोलिक अखंडता है तो वह आज भी अपनी जगह पर है। भूगोल तो जैसा पहले था, वैसा ही आज भी है। केवल उस पर राजनीतिक विभाजन की लकीरें खींच दी गई हैं। वे लकीरें क्यों खींची गईं? दूसरा प्रश्न यह है कि अगर भारत की परंपरागत सीमाओं की बात की जाए तो उन सीमाओं में तो अफगानिस्तान भी आता है, लेकिन अफगानिस्तान को अखंड भारत का अंग हम नहीं मानते।
   अभी हमारे सामने अखंड भारत का जो चित्र है, वह एक प्रकार से ब्रिटिश भारत का चित्र है। अगर हम परंपरा के दृष्टिकोण से देखें तो भारत की सीमाओं में नेपाल भी आता है, भूटान, श्रीलंका और अफगानिस्तान भी आते हैं। भौगोलिक सीमाओं और सांस्कृतिक सीमाओं में हमेशा समन्वय बिठाने की आवश्यकता पड़ती है। फिर इसमें राजनीति भी आती है। भारत का विभाजन क्यों हुआ? वह मजहब के आधार पर हुआ। मुस्लिम बहुल क्षेत्र भारत से अलग हो गए। उनके और भारत के बीच में इस्लाम एक दीवार बनकर खड़ा हो गया। अब खंडित भारत में अधिकतम 20 प्रतिशत मुसलमान हैं और भारत की पूरी राजनीति इन 20 प्रतिशत मुसलमानों के पास गिरवी रखी है। भारत की समूची वोट राजनीति मुस्लिम वोटबैंक के चारों ओर घूम रही है। हर राजनीतिक दल मुस्लिम वोटों को रिझाने के लिए एक ओर हिन्दुओं को लांछित कर रहा है और दूसरी ओर मुस्लिम गठजोड़ के साथ समझौते कर रहा है। आज घुसपैठ के विरुद्ध बोलना कठिन है, कश्मीर का प्रश्न पूरा का पूरा मुस्लिम समस्या से जुड़ गया है।
   कश्मीर के पुराने निवासियों, जिन्होंने कश्मीर की सभ्यता को सुरक्षित रखा था, उनका कश्मीर में कहीं स्थान नहीं है। जब भी बात होती है, हुर्रियत की बात होती है। ऐसी स्थिति में अगर पाकिस्तान और बांग्लादेश मिल जाते हैं और अगर भारत इसी राजनीतिक प्रणाली को लेकर चलता है तो इससे कैसी स्थिति बनेगी? यह एक विचारणीय प्रश्न है। अगर अखंड भारत एक सांस्कृतिक अवधारणा है तो प्रश्न उठता है कि यदि खंडित भारत में वह संस्कृति स्वयं को घिरी हुई पा रही है तो पाकिस्तान और बांग्लादेश को उनके वर्तमान चरित्र के साथ मिला लेने के बाद उस संस्कृति की स्थिति क्या होगी? यही कारण है कि अब पाकिस्तान और बांग्लादेश के बुद्धिजीवी भी अखंड भारत की भाषा बोल रहे हैं।
दूसरा प्रश्न यह है कि अखंड भारत कैसे बनेगा? क्या सैनिक विजय द्वारा बनेगा? क्या आज के युग में यह संभव है? और अगर सैनिक विजय द्वारा नहीं होगा तो क्या वार्तालाप द्वारा एकीकरण के लिए अनुकूल मन:स्थिति उन देशों में विद्यमान है? क्या पाकिस्तान और बांग्लादेश की मानसिकता में कोई परिवर्तन हुआ है? अगर अखंड भारत का स्वप्न पूरा करना है तो खंडित भारत में भारतीय संस्कृति के आधार पर एक श्रेष्ठ और शक्तिशाली सभ्यता का निर्माण् करना होगा। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक अखंड भारत की बात करना अव्यावहारिक है। राजनीतिक सीमाएं तो परिवर्तनशील होती हैं। वे स्थाई नहीं होतीं। भूगोल स्थाई होता है और जब तक उस भूगोल का सांस्कृतिक प्रवाह अवरुद्ध नहीं हो जाता, उसकी अस्मिता और पहचान बनी रहती  है।
   आज खंडित भारत की हिन्दू पहचान नहीं है जबकि पाकिस्तान और बांग्लादेश की मुस्लिम पहचान है। भारत में हिन्दू समाज अपनी प्रकृति के कारण अंदर से विभाजित है। राजनैतिक दृष्टि से भी, जातियों में भी और क्षेत्रीय दृष्टि से भी। हिन्दू समाज का यह विखंडन भारत की राजनीति में भी प्रतिबिम्बित हो रहा है। देश की लोकसभा में जो 44-45 राजनीतिक दल हैं, इनमें से दो-चार को छोड़कर सभी हिन्दू दल हैं और सभी व्यक्ति केंद्रित हैं। ऐसी स्थिति में केवल ऊंची-ऊंची बातें करना अधिक उचित नहीं है। दीनदयाल उपाध्याय और राममनोहर लोहिया ने मिलकर जो भारत-पाकिस्तान महासंघ की बात की थी, क्या उसे अखंड भारत मानेंगे? वे पाकिस्तान और भारत को अलग-अलग राजनीतिक इकाई मानकर कुछेक तालमेल की व्यवस्था सोच रहे थे। ऐसा ही प्रयास विभाजन के पहले भी हुआ था। विभाजन के पहले भी विदेश नीति और मुद्रा आदि कुछ विषयों पर स्थानीय स्वायत्तता के आधार पर एक महासंघ बनाने का प्रस्ताव रखा गया था, लेकिन वह बात मानी नहीं गई।
   नौवीं शताब्दी में मनुस्मृति के एक व्याख्याकार हुए हैं, मेधा तिथि। उन्होंने अपनी व्याख्या में लिखा है कि जहां-जहां वर्ण-व्यवस्था है, वहां-वहां तक आर्यावर्त है। आर्यावर्त की पहचान वर्ण-व्यवस्था और यज्ञ है। यह व्याख्या सांस्कृतिक आधार पर की गई थी। यदि भारतीय संस्कृति आज स्वयं को इतना तेजस्वी और चैतन्य बना सकती है कि दूसरे लोगों में उसे स्वीकार करने की इच्छा पैदा हो तो सांस्कृतिक भारत का विस्तार हो सकता है। आज पश्चिम में भारत के जो साधु-संत जाते हैं, वे किसी को मतांतरित नहीं करते, लेकिन उनके अध्यात्म और प्रवचनों से प्रभावित होकर लोग उनके शिष्य बनते हैं और वे स्वयं ही भारतीय नाम, वेशभूषा आदि धारण कर लेते हैं। यह एक प्रकार से भारत के सांस्कृतिक प्रभाव का ही विस्तार है। आज ईसाई चर्च कह रहा है कि योग का प्रचार तो हिन्दू संस्कृति का प्रचार है। इसलिए हम जो स्वप्न देखते हैं, उन्हें जिस यथार्थ में पूरा करना है, उस यथार्थ को निर्मम होकर समझना आवश्यक है। अखंड भारत यदि बनेगा तो पूरे हिन्दू समाज की आंतरिक स्थिति के आधार पर बनेगा। कोई दो-चार व्यक्तियों के सोचने से नहीं बनेगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अस्सी वर्षों से हिन्दू समाज को संगठित करने का प्रयास कर रहा है और उसके रहते हुए ही हिन्दू समाज विघटन की ओर बढ़ रहा है और उसका चारित्रिक पतन हो रहा है। इसकी विवेचना होनी चाहिए। तात्पर्य यह है कि अखंड भारत की परंपरागत अवधारणा व्यावहारिक नहीं है। यदि अखंड भारत का स्वप्न देखना है तो जो वाल्मिकी रामायण में नवद्वीपवती भारत की व्याख्या है, उसको सामने रखें, ब्रिटिश भारत को क्यों रखें?
   बहुराज्यीय राष्ट्र के रूप में भारत एक राष्ट्र रहा है, लेकिन वह काफी पहले की बात है। वह जिस कालखंड की बात है, उस समय अनेक राज्य होते हुए भी उन सभी राज्यों का सामाजिक और सांस्कृतिक अधिष्ठान समान था। इतने विशाल भूखंड पर एक केंद्रीय राज्य का स्थापित होना और वहां से शासन चलाना संभव ही नहीं था। इसलिए उस विशाल भूखंड में छोटे-छोटे राज्य होते हुए भी वहां के राजा या शासक एक ही आदर्श और व्यवस्था के अंतर्गत कार्य करते थे। सभी एक ही राजधर्म का पालन करते थे। सभी की शब्दावलियां समान थीं। इसलिए उस कालखंड से आज की तुलना नहीं की जा सकती। आज बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल में भाषा व वेशभूषा आदि अनेक चीजें समान हैं, लेकिन इस्लाम एक विभाजनकारी रेखा है। आज के भारत का संकट यह है कि वह इस्लाम के प्रभाव में है जो एक अलग प्रकार की विचारधारा है। यह भौगोलिक राष्ट्रवाद में विश्वास नहीं करता। भौगोलिक राष्ट्रवाद को स्वीकार न करके वह अपना वर्चस्व चाहता है।
   आज के विश्व में विविध प्रकार की प्रवृत्तियां साथ-साथ काम कर रही हैं। सभी अपने-अपने स्वार्थों को लेकर साझा मंच भी तैयार कर रहे हैं और साथ-साथ सब अपने पृथक अस्तित्व को भी सुदृढ़ करने की कोशिश कर रहे हैं। जैसे, भारत में ही बीस दल मिलकर एक गठबंधन तैयार करते हैं। लेकिन गठबंधन बनाने का उनका एकमात्र उद्देश्य गठबंधन के कंधे पर सवार होकर अपने दल की स्थिति मजबूत करना है। इसी प्रकार दक्षेश एक प्रकार से वृहत्तर भारत का ही लघु चित्र है। दक्षेश उसी दिशा में कुछ समान बिंदु खोजने की कोशिश है। हमें विचार करना होगा कि क्या हम अखंड भारत की बात करके ही उस लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं या दक्षेश जैसी प्रक्रियाओं के द्वारा भी उस दिशा में बढ़ा जा सकता है। राजनैतिक रूप से अखंड भारत का स्वप्न देखने वालों को तो व्यावहारिक शिक्षा की बहुत आवश्यकता है। वे भावुकता के जगत में जी रहे हैं, उन्हें यथार्थ से परिचित कराने की आवश्यकता है। केवल कुछ शब्दों का बंदी बने रहने से काम नहीं चलेगा। अखंड भारत की बात करते हुए अंदर से टूटते रहने से अच्छा है कि दक्षेश जैसे प्रयोग किए जाएं। यदि इन प्रयोगों से कुछ सफलता मिलती है तो अच्छी बात है, यदि नहीं मिलती है तो हमारा कुछ नहीं बिगड़ता।

अखंड भारत : इतिहास का सच -गोविन्दाचार्य



इतिहास का सच और भविष्य की चुनौती है अखंड भारत
by ADMIN on JANUARY 16, 2009
akhand bharat-गोविन्दाचार्य
http://www.kngovindacharya.in/?p=43
गत कुछ दिनों से अखंड भारत पर देश भर में काफी चर्चाएं हो रही हैं। इन चर्चाओं में अखंड भारत की व्यावहारिकता, वर्तमान समय में इसकी प्रासंगिकता, इसके राजनैतिक स्वरूप, दक्षिण एशिया महासंघ बनाम अखंड भारत जैसे अनेक प्रश्न और बिन्दु सामने आए। इन्हीं प्रश्नों को लेकर भारतीय पक्ष के कार्यकारी संपादक रवि शंकर ने विख्यात विचारक श्री गोविन्दाचार्य से बातचीत की। प्रस्तुत हैं उसके मुख्य अंश।

प्रश्न: गत कुछ दिनों में देश में अखंड भारत का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है। श्री आडवाणी और श्री मनमोहन सिंह के पाकिस्तान के अस्तित्व और सीमाओं की परिवर्तनशीलता संबंधी बयानों के संदर्भ में आपने भी कहा था कि भारत एक भूसांस्कृतिक सत्य है। भूसांस्कृतिक सत्य से आपका क्या अभिप्राय है?

उत्तर: भारत एक भूराजनैतिक वस्तु ही नहीं है। यह भूसंस्कृति भी है। भूसमाजविज्ञान भी है, भूमनोविज्ञान है, भूदर्शन है। इस भू का काफी महत्व है। भारत ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में शोध, अधययन करने वाले, पढ़ने-लिखने वालों के लिए यह एक रोचक पहलू है। भूगोल पृथ्वी के सूर्य के साथ संबंधों के आधार पर निश्चित होता है। पृथ्वी सूर्य के चारों ओर के साथ-साथ अपने अक्ष पर भी घूमती है।
सूर्य के चारों ओर घूमने से साल बनता है, मौसम बनते हैं और अपने अक्ष पर घूमने से दिन-रात। पृथ्वी के अलग-अलग हिस्सों में सूर्य के प्रकाश की अलग-अलग मात्रा पहुंचती है। इसलिए सूर्य का प्रकाश मिलने की मात्रा, अवधि और तीव्रता अलग-अलग होगी। इससे ही भूगोल की जलवायु संबंधी स्थितियां बदलती हैं। भारत और इंग्लैंड में सूर्य के प्रकाश के पुहंचने का कोण, तीव्रता और समय अलग-अलग है।
भारत में साढ़े दस महीने सूर्य की रोशनी मिलती है, इंग्लैंड में साढ़े दस महीने सूर्य छिपा रहता है। इससे काफी अंतर आ जाएगा। यहां आक्सीकरण की प्रक्रिया तेज होगी, इंग्लैंड में नहीं। यहां बहता पानी पीने लायक होता है, वहां नहीं होगा। भारत की गाय का दूध पीलापन लिए हुए होगा। भारत में गेंहू तीन महीने में पकेगा, इंग्लैंड में सात महीने लगेंगे। इसलिए वहां का जीवन कृषि पर आधारित नहीं होगा। इन्हीं कारणों से भारत में दुनिया की केवल दो प्रतिशत भूमि है लेकिन जैव विविधता  दुनिया का तेरह प्रतिशत भारत में होता है।
इस विशिष्टता के कारण भाषा, भूषा, भोजन, भवन, भेषज, भजन आदि भारत में अलग प्रकार का होगा, इंग्लैंड का अलग होगा। जीवन मूल्य, जीवन आदर्श, जीवन शैली, जीवन लक्ष्य आदि भी भिन्न होंगे। इसके अलावे, समाज की रचना, समाज संचालन की तकनीक, उसका तंत्र और सही-गलत का विवेक भी अलग होगा। इसलिए परिवार संस्था, प्रकृति के साथ मैत्री भाव और अनेकता में एकता व एकता में अनेकता में विश्वास, भारत में जल्दी होगा।
यहां उपासना के सभी मार्ग ईश्वर तक पहुंचते हैं, का भाव स्वाभाविक रूप से होगा, वहां समझाना होगा। इसलिए उनको भी बेहतर बनाने का काम भारत को करना पड़ेगा। यह इस भूमि की विशेषता है। यह अनायास नहीं है कि दुनिया के भूभागों में से भारत वह भूभाग है जहां एक दैवी त्रिकोण का अस्तित्व है। वह त्रिकोण है धरतीमाता, गौमाता और घर की माता। इसमें हरेक कोण शेष दो को मजबूत करता है। घर की मां गोमाता की भी सेवा करे, धरतीमाता की भी करे। गोमाता घर की मां को दूध दे और धरतीमाता को उसकी खुराक गोबर-गोमूत्र दे। इंग्लैंड में भी गाय गोबर-गोमूत्र देगी, लेकिन वहां नमी और उष्णता का मेल अलग होने के कारण वह धरती का भोजन नहीं बन पाएगा, व्यर्थ जाएगा।
 यहां की धरतीमाता घर की माता को पर्याप्त अनाज और गौमाता को पर्याप्त चारा देती है। लेकिन वहां पर्याप्त अनाज व चारा नहीं होगा। यह नमी और उष्णता का विशेष मेल भारत में होने के कारण यहां इतनी जैव विविधता होती है। आदि पराशक्ति का त्रिकोण यहां के सारे जीवनशैली का एक ऐसा हिस्सा बन जाता है जिसमें मातृशक्ति की विशेष उपासना संभव हो पाती है। यह इस भूभाग की विशेषता है। यही इसकी भूसांस्कृतिक सच्चाई है।


प्रश्न : परंतु आज इस भूखंड में जो राजनीतिक और जनसांख्यिक परिवर्तन हो चुके हैं, इनके परिप्रेक्ष्य में अखंड भारत का व्यावहारिक स्वरूप क्या होगा?

उत्तर : ये प्रश्न बहुत छोटे कालक्षितिज में ही तर्कसंगत हैं। आप एक दूसरे दृश्य की कल्पना करें। 1294 में मोहम्मद गोरी का शासन था। सबको लगा कि अब तो सब कुछ समाप्त हो गया। पृथ्वीराज चौहान हार गए थे। विदेशी शासन की यह स्थिति सवा चार सौ साल तक चली। औरंगजेब की मृत्यु 1707 में हुई। इन चार सौ वर्षों में समाज में जो निराशा, हताशा थी, जो राजनीतिक परिदृश्य था, उसमें औरंगजेब की मृत्यु के बाद क्या हुआ? जजिया कर जैसी चीजें प्रासंगिक रह ही नहीं गईं। उल्टा हो गया।
भारतीय संस्कृति की समाजसता में वे समरस होने लगे। समाजसता यानी अपने अंदर समा लेने की क्षमता। भाषा, भूषा, भोजन, भवन, भेषज, भजन आदि के क्षेत्रों में यह समाहित करने की प्रक्रिया चलने लगी। केवल भजन के क्षेत्र में थोड़ा बदलाव हुआ, अन्यथा जो भूसांस्कृतिक पहलू हैं, वह धीरे-धीरे मनोविज्ञान पर हावी होने लगे। तब वे जगह-जगह पर स्थानीय रीति-रिवाज, पर्व-त्योहार आदि में सबके साथ सम्मिलित होने लगे।
भाषा भी बदली भूषा भी बदली। केरल का मुसलमान मलयालम का आग्रह रखता था और कर्नाटक का मुसलमान कन्नड़ का। आज जो फिर से मजहबी चेतना जगी है, वह 1890 के बाद की बात है। पश्चिम उत्तर प्रदेश में ब्रिटिश कलेक्टर ने सुनियोजित दंगे कराए। उसके बाद धीरे-धीरे इसमें उफान आता गया और फिर 1920 में शरीयत पर बहस चली। 1937 में शरीयत को सर्वमान्य करने की जबरदस्ती की गई। इस प्रकार देखें तो 1707 से 1894 तक के कालखंड का प्रकार अलग था।
फिर आप यह क्यों मान लेते हैं कि वह कालखंड फिर नहीं दोहराया जा सकता? मेरा मानना है कि आज अगर मन के स्तर पर विभेद और मजहब का रिश्ता ज्यादा मजबूत दिखाई देता है तो उसके पीछे आज का वह परिदृश्य भी कारण है जिसमें पाकिस्तान की मजहबी जुनून को बढ़ाने वाली हुकूमत और कई इस्लामिक देशों द्वारा पैसा, समाज और रूतबे का अंधाधुंध उपयोग है। इन सबके कारण स्थानीय रिश्तों और संबंधों की बजाय एक विशेष मजहबी भाव मानस पर हावी हो जाता है।
 इसका अर्थ यह हुआ कि आज के परिदृश्य से यदि इन दो कारक तत्वों को मिटा दें तो फिर ये सारे ही समीकरण एकदम बदल जाएंगे और यह प्रश्न ही असंगत हो जाएगा। इसलिए हम यह क्यों मान रहे हैं कि स्थितियां सदैव ऐसी ही होंगी? आज विश्व के वर्तमान परिदृश्य के संदर्भ में हटिंगटन ने सभ्यताओं की लड़ाई की जो बात कही है, वह भले ही पूरी सही नहीं है लेकिन उसमें कुछ तो सत्यता है।
आज यूरोप और अमेरिका मिलकर इस्लामिक आतंकवाद से जूझने के लिए मजबूर हो गए हैं। वे आज चुन-चुनकर लोगों को मार रहे हैं। उनकी मंशा सभी भूरे लोगों पर कहर ढाने की है। दक्षिणी फ्रांस और स्पेन इस्लाम के साथ चार सौ वर्षों तक जूझते रहे, इस बात का उनके मनोविज्ञान पर इतना ज्यादा प्रभाव है कि वे इस्लाम के धुर विरोध में खड़े हो गए हैं। इसलिए आज की स्थिति को हम यदि स्थायी मान कर चल रहे हों तो यह स्थिति की सरलीकृत समझ होगी, जो ठीक नहीं है।

प्रश्न : आपने कहा कि अखंड भारत एक सांस्कृतिक सत्य है यानी यह भूभाग यदि अखंड था तो संस्कृति के कारण। आज वह संस्कृति जब वर्तमान भारत में ही कमजोर पड़ रही है तो जिन स्थानों से वह लुप्त हो गई है, वहां अपना प्रभाव कैसे फैला पाएगी?

उत्तर : यहां फिर गलती हो रही है। वास्तव में समाज का भूसांस्कृतिक पक्ष अंतरतम में रहता है और अपना असर करता रहता है। समाज का भूराजनैतिक पक्ष सतह पर रहता है। काल प्रवाह में भूसांस्कृतिक तथा भूमनोवैज्ञानिक और इसलिए भूसमाजविज्ञानी पक्ष प्रभावी होते जाएंगे। इसके लिए आवश्यक है कि उनको अपने बारे में 700-800 या हजार साल पहले के सभी तथ्य बताए जाएं। उन्हें बताया जाए कि वे पहले क्या थी, अब क्या है? पाणिनी से पाकिस्तान के सामान्य जन का क्या रिश्ता है, इस ओर जब वे सोचने लगेंगे तो उनके मनोविज्ञान में काफी बदलाव होगा।
आज ‘ही’ संस्कृति के पक्षधर भूगोल के एक हिस्से पर हावी दिख रहे हैं। ‘ही’ संस्कृति अर्थात् उनका भगवान भगवान, बाकी सब शैतान। केवल वे ही सच्चे। लेकिन यही हमेशा का सार्वकालिक सत्य तो है नहीं। भारत की मूल संस्कृति भारत में ही कमजोर पड़ रही है, ऐसा आपको लगता है। मेरा दूसरा कहना है। भारत के भूमनोविज्ञान में संश्लेषण की अद्भुत क्षमता है, क्योंकि यहां की भूप्रकृति के कारण अनेकता में एकता और मेल बिठा लेने की एक विशेषता है।
इसके कारण ही सहिष्णुता, समरसता और समजसता का वैशिष्ट्य यहां की भूसंस्कृति में आ जाता है। हम जब इसको देखते हैं तो सतह पर अपकारी तत्व अर्थात् भूराजनीति के दर्षन हो हैं जबकि नीचे सरस्वती के समान प्रवाहित है भूसंस्कृति। थोड़ा बालू हटाने की जरूरत है और यह भूराजनीति का बालू है अर्थात् जो भी ‘ही’ संस्कृति के पक्षधर संप्रदाय हैं, उन्हें समाहित करने, बदलने की आवश्यकता है। भारत में सार्वभौम या पूरे भूभाग में फैले एक राज्य की आज से 2000 साल पहले तो जरूरत नहीं थी।
नाममात्र के लिए एक सार्वभौमत्व व्याप्त था जिसे चक्रवर्तित्व या ऐसा ही कुछ और कहा जाता था। पर उस समय राज्य समाज की संपूर्ण गतिविधियों का नियंता नहीं था, जैसा कि पश्चिम में रहा है। भूसंस्कृति ही यहां की जान रही है। राज्य केवल उसका एक उपकरण रहा है। इसलिए राज्य के बहुतेरे प्रकार अलग-अलग समय पर जरूरत के हिसाब से गढ़े गए और उपयोग में लाए गए।
राष्ट्र के लिए एक सार्वभौम राज्य की आवश्यकता तो आज से 2000 साल पहले ही हुई है जब हमें लुटेरे के रूप में आए सिकंदर का सामना करना पड़ा। तब तात्कालिक तौर पर सब सेनाओं को इकट्ठा कर लिया गया अन्यथा भारतीय समाज में स्थायी सेना रखने की भी आदत नहीं थी। यहां परंपरा थी कि सामान्यत: लोग अपने खेती या व्यवसाय में लगे रहते थे, सबके पास शस्त्र होते थे और वीर्य, शौर्य तथा बल संपदा का अधिकाधिक संपोषण किया जाता था।
जब जरूरत पड़ती थी तो सभी युध्द के लिए आ जाते थे। इसलिए समाज संचालन के पिछले 400 साल के पश्चिमी प्रयोगों को परंपरागत भारतीय समाज संचालन विधि के संदर्भ में अगर देखेंगे तो गलती हो जाएगी।
विगत एक हजार वर्षों में भारत को एक विशेष प्रकार की समस्या का सामना करना पड़ा। एक सहिष्णुता, समरसता और समजसता के गुण वाले समाज को असहिष्णु, एकाकी, सर्वंकश और सर्वग्रासी राजनैतिक पंथसत्ता से लड़ना पड़ा। वह पांथिक राजसत्ता नहीं, राजनैतिक पंथसत्ता थी। वास्तव में इस्लाम एक स्टेटक्राफ्ट है जिसका एक हिस्सा जीव और जगदीश के संबंधों के बारे में भी कुछ सोचता और बोलता है।
 इसमें भौतिक और आधयात्मिक, दोनों का सम्मिश्रण है परंतु भौतिक की ही प्रधानता है। ऐसे असहिष्णु संप्रदाय से जब से भारत का सामना हुआ है तब से अब तक यहां का समाज विभ्रम में है। वह भारत के बाहर उपजे संप्रदायों-मजहबों को भी भारत के अंदर उपजे संप्रदायों के समानधर्मा और समानमनवाला मानने की भूल करता है। भारत के अंदर उपजे संप्रदायों में जैसे परस्पर समादर का रिश्ता है, वैसा ही रिश्ता वह अपने मनोविज्ञान में उनके बारे में अनुभव करने लगता है, जबकि वे ऐसे हैं ही नहीं। इसलिए उनके साथ कैसा व्यवहार किया जाए, यह समस्या है।
 वे तो राज्य के साथ हैं और यहां के मानस में राज्य की वैसी कोई भूमिका ही नहीं है। यह द्वन्द्व है। इस द्वन्द्व में से सीखता-समझता भारतीय समाज गुजर रहा है। इसलिए इसे लगता है कि दुर्गा जैसी सक्षम राजसत्ता और काली जैसी समाजसत्ता की आवश्यकता है। राजसत्ता दुर्गा का काम करे और समाजसत्ता काली का काम करे, इन रक्तबीजों का रक्त अपनी जीभ पर फैला ले, गिरने न दे।
भारतीय समाज अभी इस सीख के साथ थोड़ा-थोड़ा आगे बढ़ रहा है। इसमें उसको यह भी धयान रखना होगा कि रावण से युध्द करते हुए कहीं अपना स्वभाव भी रावणी न बन जाए। असहिष्णु संप्रदायों का सामना करने के क्रम में सहिष्णुता, समरसता और समाजसता के अपने भूसांस्कृतिक वैशिष्टय को बरकरार रखने की विशेष चुनौती है।

प्रश्न : यदि अखंड भारत को हम राजनीतिक इकाई नहीं मानते हैं तो सीमाओं की चर्चा करने की जरूरत क्यों पड़ती है? पाकिस्तान के अस्तित्व पर बहस क्यों होती है? पाकिस्तान के रहने और न रहने से अखंड भारत को क्या फर्क पड़ता है?

उत्तर : मैं पहले ही कह चुका हूं कि भारत से बाहर उपजे संप्रदायों का पुरोधा बनकर यदि कोई राजसत्ता उसका सशस्त्र साथ देती है, तब संपूर्ण विश्व में शांति व भाईचारा फैलाने के भारत के दैवी दायित्व में बाधा होती है। तब भारतीय समाज को सोचने की आवश्यकता पड़ जाती है कि राजसत्ता का आश्रय लेकर जो अभारतीय संप्रदाय सामने आ रहे हैं, उन्हें राजनैतिक प्रत्युत्तर दिए बिना हम कैसे बने रहेंगे।

प्रश्न : इस राजनीतिक प्रत्युत्तर में सैन्य शक्ति का कितना उपयोग हो सकता है?

उत्तर : हम इतना जानते हैं कि सैन्य शक्ति इतनी जरूर हो कि कोई हमें टेढ़ी आंखों से देख न सके। दूसरी बात, सैन्य शक्ति इतनी सक्रिय होनी चाहिए कि राष्ट्रीय संप्रभुता पर यदि हमला हो तो कानूनी दांवपेंच में उलझकर अपनी निष्क्रियता को सही सिध्द न करे। जैसे, कारगिल के युध्द में अपनी सीमाओं में रहने की बेबसी दिखाने की कोई जरूरत नहीं थी।
जब आतंकवाद के अड्डे सीमापार हैं तो उसे नष्ट करने के लिए सीमा पार करना नैतिक है, आवश्यक है और यदि कोई इसका विरोध करता है तो वह अनैतिक है। इसी प्रकार जब भारतीय संसद पर चोट की गई तो वह ऐसा दूसरा अवसर था जब भारतीय सेना को दो-दो हाथ करना ही चाहिए था। केवल सद्भाव, सदाशयता और सदुपदेश से राष्ट्र नहीं चलता। राष्ट्र का मनोबल इससे गिरता है। मैं मानता हूं कि राष्ट्रीय प्रगति का मार्ग केवल सुहावने बगीचे में टहलने जैसा नहीं है। राष्ट्रीय पुनर्निर्माण उतना होता है जितना समाज द्वारा खून, पसीने और आंसू का विनियोग किया जाता है।

प्रश्न : अखंड भारत के बारे में एक विचार यह भी प्रस्तुत किया जाता है कि यूरोपीय संघ की तर्ज पर दक्षिण एशियाई महासंघ बने। अखंड भारत आज के समय में सार्थक बात नहीं है लेकिन यह महासंघ इसका ही एक रूप होगा।

उत्तर : यूरोपीय संघ से दक्षिण एशियाई महासंघ की तुलना करना ठीक नहीं है। वहां जिन देशों का संघ बना है उनमें सभ्यता व सांस्कृतिक स्तर पर अत्यधिक समानताएं हैं। मजहब भी उनका एक है। इसकी तुलना में अभी दक्षिण एशिया की स्थिति काफी भिन्न है। इस पर भी यूरोपीय संघ में ही कई अंतर्विरोध भी हैं। तुर्की यदि यूरोपीय संघ में शामिल होना चाहता है तो वे चिंता में पड़ जाते हैं।
वास्तव में इस्लामिक आबादी के बढ़ाव से वे भी काफी परेशान हैं। स्पेन के लोगों में इस्लाम का विरोध और उसके प्रति कटुता भारत में 50 साल पहले विस्थापित हुए लोगों से भी कहीं अधिक भीषण और तीव्र है। फ्रांस अल्जीरिया से हो रहे घुसपैठ से परेशान है। वस्तुत: यूरोपीय संघ में मजहब और भूसांस्कृतिक स्तर पर एक समानधर्मिता है, इसलिए वे एक हद तक थोड़ा बहुत चल पाए। इस आधार पर सोचें तो भारत महासंघ की कल्पना तथ्यात्मक कैसे हो सकती है?
इसके लिए बहुत से सुधार होने की आवश्यकता है। 1707 से 1894 के बीच समाजसता का जो क्रम चल रहा था, जिसमें विदेशी ताकतों के यहां से मिल रहा प्रश्रय और उनके प्रति सद्भाव बिल्कुल नहीं था, वह फिर से चलना जरूरी है। एक ही परंपरा और आदर्श से ओत-प्रोत जनमानस बनना, ऐसे किसी भी महासंघ बनने की पूर्व शर्त है।

भारत में चलने वाले न्यूज़ चैनल, अखबार वास्तव में भारत के नही



विश्व संबाद केन्द्र , पंजाब

क्या आप जानते है की कोई मीडिया समूह हिन्दू या हिन्दू संघठनो के प्रति इतना बैरभाव क्यों
रखती है. -भारत में चलने वाले न्यूज़ चैनल, अखबार वास्तव में भारत के है ही नही
http://vskpunjab.org/hindi/?p=988

सन २००५ में एक फ़्रांसिसी पत्रकार भारत दौरे पर आया उसका नाम फ़्रैन्कोईस था उसने भारत
में हिंदुत्व के ऊपर हो रहे अत्याचारों के बारे में अध्ययन किया और उसने फिर बहुत हद तक इस
कार्य के लिए मीडिया को जिम्मेवार ठहराया. फिर उसने पता करना शुरू किया तो वह आश्चर्य
चकित रह गया की भारत में चलने वाले न्यूज़ चैनल, अखबार वास्तव में भारत के है ही नहीं…
फीर मैंने एक लम्बा अध्ययन किया उसमे निम्नलिखित जानकारी निकल कर आई जो मै आज
सार्वजानिक कर रहा हु ..विभिन्न मीडिया समूह और उनका आर्थिक श्रोत……
१-दि हिन्दू … जोशुआ सोसाईटी , बर्न, स्विट्जरलैंड , इसके संपादक एन राम , इनकी पत्नी ईसाई में बदल चुकी है.
२-एन डी टी वी … गोस्पेल ऑफ़ चैरिटी, स्पेन , यूरोप
३-सी एन एन , आई बी एन ७, सी एन बी सी …१००% आर्थिक सहयोग द्वारा साउदर्न बैपिटिस्ट चर्च
४-दि टाइम्स ऑफ़ इंडिया, नवभारत , टाइम्स नाउ… बेनेट एंड कोल्मान द्वारा संचालित ,८०% फंड वर्ल्ड क्रिस्चियन काउंसिल द्वारा , बचा हुआ २०% एक अँगरेज़ और इटैलियन द्वारा दिया जाता है. इटैलियन व्यक्ति का नाम रोबेर्ट माइन्दो है जो यु पी ए अध्यक्चा सोनिया गाँधी का निकट सम्बन्धी है.
५-स्टार टीवी ग्रुप …सेन्ट पीटर पोंतिफिसिअल चर्च , मेलबर्न ,ऑस्ट्रेलिया
५-हिन्दुस्तान टाइम्स,दैनिक हिन्दुस्तान…मालिक बिरला ग्रुप लेकिन टाइम्स ग्रुप के साथ जोड़ दिया गया है..
६-इंडियन एक्सप्रेस…इसे दो भागो में बाट दिया गया है , दि इंडियन एक्सप्रेस और न्यू इंडियन एक्सप्रेस
(साउदर्न एडिसन) -Acts Ministries has major stake in the Indian express and later is still विथ
the Indian कौन्तेर्पर्त
७-दैनिक जागरण ग्रुप… इसके एक प्रबंधक समाजवादी पार्टी से राज्य सभा में सांसद है… यह एक मुस्लिम्वादी पार्टी है.
८-दैनिक सहारा .. इसके प्रबंधन सहारा समूह देखती है इसके निदेशक सुब्रोतो राय भी समाजवादी पार्टी के बहुत मुरीद है
९-आंध्र ज्योति..हैदराबाद की एक मुस्लिम पार्टी एम् आई एम् (MIM ) ने इसे कांग्रेस के एक मंत्री के साथ कुछ साल पहले खरीद लिया
१०- दि स्टेट्स मैन… कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया द्वारा संचालित इस तरह से एक लम्बा लिस्ट हमारे सामने है जिससे ये पता चलता है की भारत की मीडिया भारतीय बिलकुल भी नहीं है.. और जब इनकी फंडिंग विदेश से होती है है तो भला भारत के बारे में कैसे सोच सकते है.. अपने को पाक साफ़ बताने वाली मीडिया के भ्रस्ताचार की चर्चा करना यहाँ पर पूर्णतया उचित ही होगा बरखा दत्त जैसे लोग जो की भ्रस्ताचार का रिकार्ड कायम किया है उनके भ्रस्ताचरण की चर्चा दूर दूर तक है , इसके अलावा आप लोगो को सायद न मालूम हो पर आपको बता दू की लगभग ये १००% सही बात है की NDTV की एंकर बरखा दत्त ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया है.. प्रभु चावला जो की खुद रिलायंस के मामले में सुप्रीम कोर्ट में फैस ला फिक्स कराते हुए पकडे गए उनके सुपुत्र आलोक चावला, अमर उजाला के बरेली संस्करण में घोटाला करते हुए पकडे गए. दैनिक जागरण ग्रुप ने अवैध तरीके से एक ही रजिस्ट्रेसन नो. पर बिहार में कई जगह पर गलत ढंग से स्थानीय संस्करण प्रकाशित किया जो की कई साल बाद में पकड़ में आया और इन अवैध संस्करणों से सरकार को २०० करोड़ का घटा हुआ. दैनिक हिन्दुस्तान ने भी जागरण के नक्शेकदम पर चलते हुए यही काम किया उसने भी २०० करोड़ रुपये का नुकशान सरकार को पहुचाया इसके लिए हिन्दुस्तान के मुख्य संपादक सशी शेखर के ऊपर मुक़दमा भी दर्ज हुआ है.. शायद यही कारण है की भारत की मीडिया भी काले धन , लोकपाल जैसे मुद्दों पर सरकार के साथ ही भाग लेती है…..सभी लोगो से अनुरोध है की इस जानकारी को अधिक से अधिक लोगो के पास पहुचाये ताकि दूसरो को नंगा करने वाले मीडिया की भी
सच्चाई का पता लग सके…..
----------------------------------------
भारतीय मीडिया में विदेशी पैसा

FRIDAY, MARCH 28, 2008
(SURESH CHIPLUNKAR
क्या सचमुच भारत का मीडिया विदेशी हाथों में पहुँच चुका है?
Foreign Investment Indian Media Groups
भारत में प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के मालिक कौन हैं? हाल ही में एक-दो ई-मेल के जरिये इस बात की जानकारी मिली लेकिन नेट पर सर्च करके देखने पर कुछ खास हाथ नहीं लग पाया (हालांकि इसमें कितनी सच्चाई है, यह तो मीडिया वाले ही बता सकते हैं) कि भारत के कई मीडिया समूहों के असली मालिक कौन-कौन हैं?

हाल की कुछ घटनाओं के मीडिया कवरेज को देखने पर साफ़ पता चलता है कि कतिपय मीडिया ग्रुप एक पार्टी विशेष (भाजपा) के खिलाफ़ लगातार मोर्चा खोले हुए हैं, गुजरात चुनाव और चुनावों के पूर्व की रिपोर्टिंग इसका बेहतरीन नमूना रहे। इससे शंका उत्पन्न होती है कि कहीं हमारा मीडिया और विख्यात मीडियाकर्मी किन्हीं “खास” हाथों में तो नहीं खेल रहे? भारत में मुख्यतः कई मीडिया और समाचार समूह काम कर रहे हैं, जिनमें प्रमुख हैं – टाइम्स ऑफ़ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस, हिन्दू, आनन्दबाजार पत्रिका, ईनाडु, मलयाला मनोरमा, मातृभूमि, सहारा, भास्कर और दैनिक जागरण समूह। अन्य कई छोटे समाचार पत्र समूह भी हैं। आईये देखें कि अपुष्ट और गुपचुप खबरें क्या कहती हैं…

समाचार चैनलों में एक लोकप्रिय चैनल है NDTV, जिसका आर्थिक फ़ंडिंग स्पेन के “गोस्पेल ऑफ़ चैरिटी” से किया जाता है। यह चैनल भाजपा का खासमखास विरोधी है। इस चैनल में अचानक “पाकिस्तान प्रेम” जाग गया है, क्योंकि मुशर्रफ़ ने इस एकमात्र चैनल को पाकिस्तान में प्रसारण की इजाजत दी। इस चैनल के सीईओ प्रणय रॉय, कम्युनिस्ट पार्टी के कर्ता-धर्ता प्रकाश करात और वृन्दा करात के रिश्तेदार हैं। सुना गया है कि इंडिया टुडे को भी NDTV ने खरीद लिया है, और वह भी अब भाजपा को गरियाने लग पड़ा है। एक और चैनल है CNN-IBN, इसे “सदर्न बैप्टिस्ट चर्च” के द्वारा सौ प्रतिशत की आर्थिक मदद दी जाती है। इस चर्च का मुख्यालय अमेरिका में है और दुनिया में इसके प्रचार हेतु कुल बजट 800 मिलियन डॉलर है। भारत में इसके कर्ताधर्ता राजदीप सरदेसाई और उनकी पत्नी सागरिका घोष हैं। गुजरात चुनावों के दौरान नरेन्द्र मोदी और हिन्दुओं को लगातार गाली देने और उनकी छवि बिगाड़ने का काम बड़ी ही “स्वामिभक्ति” से इन चैनलों ने किया। गुजरात के दंगों के दौरान जब राजदीप और बरखा दत्त स्टार टीवी के लिये काम कर रहे थे, तब उन्होंने सिर्फ़ मुसलमानों के जलते घर दिखाये और मुसलमानों पर हुए अत्याचार की कहानियाँ ही सुनाईं, किसी भी हिन्दू परिवार का इंटरव्यू नहीं लिया गया, मानो उन दंगों में हिन्दुओं को कुछ हुआ ही न हो।

टाइम्स समूह “बेनेट कोलमेन” द्वारा संचालित होता है। “वर्ल्ड क्रिश्चियन काउंसिल” इसका 80% खर्चा उठाती है, एक अंग्रेज और एक इतालवी रोबर्टियो मिन्डो इसके 20% शेयरों के मालिक हैं। यह इतालवी व्यक्ति सोनिया गाँधी का नजदीकी भी बताया जाता है। स्टार टीवी तो खैर है ही ऑस्ट्रेलिया के उद्योगपति का और जिसका एक बड़ा आका है सेंट पीटर्स पोंटिफ़िशियल चर्च मेलबोर्न। 125 वर्ष पुराना दक्षिण के एक प्रमुख समाचार समूह “द हिन्दू” को अब जोशुआ सोसायटी, बर्न्स स्विट्जरलैण्ड ने खरीद लिया है। इसके कर्ताधर्ता एन.राम की पत्नी स्विस नागरिक भी हैं। दक्षिण का एक तेलुगु अखबार “आंध्र ज्योति” को हैदराबाद की मुस्लिम पार्टी “एम-आई-एम” और एक कांग्रेसी सांसद ने मिलकर खरीद लिया है। “द स्टेट्समैन” समूह को कम्युनिस्ट पार्टी संचालित करती है, और “कैराल टीवी” को भी। “मातृभूमि” समूह में मुस्लिम लीग के नेताओं का पैसा लगा हुआ है। “एशियन एज” और “डेक्कन क्रॉनिकल” में सऊदी अरब का भारी पैसा लगा हुआ है। जैसा कि मैने पहले भी कहा कि हालांकि ये खबरें सच हैं या नहीं इसका पता करना बेहद मुश्किल है, क्योंकि जिस देश में सरकार को यह तक पता नहीं लगता कि किसी एनजीओ को कुल कितनी मदद विदेश से मिली, वहाँ किसी समाचार पत्र के असली मालिक या फ़ाइनेन्सर का पता लगाना तो बहुत दूर की बात है। अधिग्रहण, विलय, हिस्सेदारी आदि के जमाने में अन्दर ही अन्दर बड़े समाचार समूहों के लाखों-करोड़ों के लेन-देन हुए हैं। ये खबरें काफ़ी समय से इंटरनेट पर मौजूद हैं, हवा में कानोंकान तैरती रही हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह कि आपके मुहल्ले का दादा कौन है ये आप जानते हैं लेकिन लोकल थानेदार जानते हुए भी नहीं जानता। अब ये पता लगाना शौकिया लोगों का काम है कि इन खबरों में कितनी सच्चाई है, क्योंकि कोई खोजी पत्रकार तो ये करने से रहा। लेकिन यदि इसमें जरा भी सच्चाई है तो फ़िर ब्लॉग जगत का भविष्य उज्जवल लगता है।

ऐसे में कुल मिलाकर तीन समूह बचते हैं, पहला “ईनाडु” जिसके मालिक हैं रामोजी राव, “भास्कर” समूह जिसके मालिक हैं रमेशचन्द्र अग्रवाल और तीसरा है “जागरण” समूह। ये तीन बड़े समूह ही फ़िलहाल भारतीय हाथों में हैं, लेकिन बदलते वक्त और सरकार की मीडिया क्षेत्र को पूरी तरह से विदेशियों के लिये खोलने की मंशा को देखते हुए, कब तक रहेंगे कहना मुश्किल है। लेकिन एक बात तो तय है कि जो भी मीडिया का मालिक होता है, वह अपनी राजनैतिक विचारधारा थोपने की पूरी कोशिश करता है, इस हिसाब से भाजपा के लिये आने वाला समय मुश्किलों भरा हो सकता है, क्योंकि उसे समर्थन करने वाले “पाञ्चजन्य” (जो कि खुद संघ का मुखपत्र है) जैसे इक्का-दुक्का अखबार ही बचे हैं, बाकी सब तो विरोध में ही हैं।

----------------

एफडीआई
http://hi.wikipedia.org/s/4s9e
मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई को लेकर इन दिनों देश में बहस का दौर जारी है। इससे ग्राहकों, स्थानीय खुदरा कारोबारियों और खुदरा कारोबार के वैश्विक दिग्गजों के हित जुड़े हों तो बहस होना स्वाभाविक ही है। पिछले कई साल से इस पर बातचीत जारी है लेकिन 14 सितंबर 2012 को केंद्र सरकार ने भारत में इसे मंजूरी दे दी है। एफडीआई से जहां उपभोक्ताओं को तो फायदा होता ही है, वहीं बुनियादी ढांचे और अर्थव्यवस्था को भी लाभ मिलता है। देश में दूरसंचार, वाहन और बीमा क्षेत्र में एफडीआई की वजह से आई कामयाबी को हम देख ही चुके हैं। इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर हुए निवेश की वजह से ग्राहकों को बेहतर सेवाएं और उत्पाद नसीब हुए हैं।

मनमोहन सिंह की सरकार ने देश में विदेशी निवेश में बढ़ावा देते हुए मल्टी ब्रांड रिटेल क्षेत्र 51 फीसदी विदेश निवेश को मंजूरी दे दी। वहीं एकल ब्रांड में सौ फीसदी विदेशी निवेश को मंजूरी दे दी गई। हालांकि केंद्र सरकार ने विदेशी कंपनियों को राज्यों में प्रवेश देने का फैसला राज्य सरकारों पर छोड़ दिया है। इसके अलावा सीसीईए की बैठक में देसी एयरलाइंस कंपनियों में 49 फीसद की एफडीआई को मंजूरी दे दी गई है। विनिवेश की गाड़ी को आगे बढ़ाते हुए मंत्रिमंडल ने चार सरकारी कंपनियों में विनिवेश को हरी झंडी दे दी है। एमएमटीसी और ऑयल इंडिया में दस फीसदी, हिंदुस्तान कॉपर में 9।59 फीसदी और नाल्को में 12।5 फीसदी विनिवेश हो सकेगा। साथ ही मनमोहन सिंह सरकार ने ब्रॉडकास्ट मीडिया क्षेत्र में एफडीआई की सीमा बढ़ाकर 74 फीसदी कर दिया है।


भारत में खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश को लेकर विशेषज्ञ पहले ही चेतावनी देते रहे हैं। रविवार के स्तंभकार जे के कर के अनुसार भारत में वर्तमान खुदरा व्यवसाय 29।50 लाख करोड़ रुपयों का है, जो देश के सकल घरेलू उत्पाद का करीब 33 प्रतिशत है। अब यदि यह हिस्सा विदेशी धन्ना सेठों के हाथ चला गया तो जितना पैसा मुनाफे के रुप में विदेश चला जाएगा, उससे देश में आयात-निर्यात का संतुलन बिगड़ना तय है। भारत में छोटे और मंझौले खुदरा दुकानों की संख्या 1 करोड़ 20 लाख के आसपास है। इन दुकानों में करीब 4 करोड़ लोगों को रोजगार मिलता है। ऐसे में सवाल पूछने का मन होता है कि अगर इन 4 करोड़ लोगों के बजाये 4 या 5 धन्ना कंपनियों को रोजगार दे दिया जाएगा तो क्या इससे देश का भला होगा ? भारत में अगर एक बार इन महाकाय कंपनियों को खुदरा के क्षेत्र में प्रवेश दे दिया गया तो ये कंपनियां दिखा देंगी कि लूट पर टिकी हुई अमानवीय व्यापार की परिभाषा क्या होती है ! इन दुकानों के सस्ते माल और तरह-तरह के लुभावने स्कीम के कारण भारतीय दुकानों को अपना बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ जाएगा। जब इन कंपनियों का एकाधिकार कायम हो जाएगा, उसके बाद ये अपने असली रुप को सामने लाएंगी।