मंगलवार, 13 अगस्त 2013

हिंदुओं के दमन की विश्वव्यापी दास्तान- उमाशंकर मिश्र



हिंदुओं के दमन की विश्वव्यापी दास्तान
September 17, 2008
- उमाशंकर मिश्र
यह दास्तान है भारत समेत एशिया के अनेक देशों में हिन्दुओं के साथ होने वाले सौतेले व्यवहार की, जो बताती है कि अमरनाथ श्राईन बोर्ड की जमीन छीनकर हिन्दुओं की आस्था एवं उनके धार्मिक प्रतीकों पर पहली बार हमला नहीं हुआ है, इसकी जड़ें बहुत अधिक गहरी एवं विषैली हैं।
अमरनाथ श्राईन बोर्ड से जमीन वापस लिये जाने का मसला पर्याय है मुस्लिम तुष्टीकरण का जो हिन्दुओं की आस्था और उनसे जुड़े प्रतीकों के समक्ष एक चुनौती बनकर आ खड़ी हुई है। हालांकि इस तरह से हिन्दुओं के साथ व्यवहार पहली बार किया गया हो ऐसा नहीं है और ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ भारत में ही इस तरह का जातीय भेदभाव हिन्दुओं को झेलना पड़ा है, बल्कि एशिया के अनेक देशों में वहां की सरकारों की शह पर हिन्दुओं पर न केवल अत्याचार किए गए बल्कि उनकी आस्था के प्रतीकों पर भी हमले हुए हैं।
अमरनाथ श्राईन बोर्ड से जमीन छीने जाने के खिलाफ हिन्दुओं का उग्र होना लाजमी था। जम्मू-कश्मीर के नये राज्यपाल श्री एन.एन. वोहरा ने पद संभालते ही अमरनाथ श्राईन बोर्ड से जमीन वापिस लेने के आदेश दे दिये। हिन्दुओं की भावनाओं पर मुस्लिम समाज की भावनाओं को तरजीह देते हुये आनन-फानन में श्राईन बोर्ड के सभी अधिकार प्रदेश की सरकार को सौंप कर एकतरफा तानाशाही फैसला थोप दिया गया। राज्यपाल ने श्राईन बोर्ड की बैठक नहीं बुलाई, हिन्दुओं के धार्मिक नेताओं से बात करना उचित नहीं समझा और न ही कश्मीरी नेताओं के राजनीतिक पैंतरों को भीतर से झांका।

आज कश्मीर में जो कुछ हो रहा है, उसकी बुनियाद बहुत पहले रख दी गयी थी। 1989 में 3 लाख कश्मीरी पंडितों को घाटी से निकाला जाना इसी कड़ी का हिस्सा कहा जा सकता है। 1990 में आतंकवाद के कहर के बाद से लेकर आज तक लाखों कश्मीरी पंडितों को जम्मू तथा बाहर कैम्पों में रहना पड़ रहा है। अपने ही देश में इन लोगों की स्थिति शरणार्थी सी बनी हुई है और सियासत की फांस में जकड़े इन लोगों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जम्मू में 55,476, दिल्ली में 34,088 और अन्य राज्यों में 19,338 रजिस्टर्ड कश्मीरी पंडितों के परिवारों को सरकारी राहत मिल रही है। सरकार की ओर से इन परिवारों को करीब तीन हजार रुपये और राशन प्रतिमाह दिया जाता है। लेकिन लोगों को उनकी जड़ों से उखाड़कर शरणार्थी कैम्पों में ठूंस देने की यह कीमत क्या जायज ठहरायी जा सकती है? क्या यह उन लोगों की पीड़ा और समस्या का अंतिम समाधान हो सकता है? इसमें भी देखने वाली बात होगी कि इस तरह की राहत क्या सभी परिवारों को मिल पा रही होगी? यह सोचने का विषय है।

हुर्रियत के नेता आज जिस तरह से फुंफकार रहे हैं उससे कट्टरपंथी अलगाववादियों द्वारा कश्मीर घाटी से हिन्दुओं को खदेड़े जाने का मकसद साफ हो जाता है। घाटी में अलगाववाद की जिस आग को हवा दी जा रही है क्या वह देश की संवैधानिक मर्यादा का उल्लंघन नहीं है? राष्ट्र की एकता अखंडता को तार-तार करने वाले कृत्य एवं बयानों के बावजूद क्या केन्द्र सरकार को इन विषैले नागों का फन नहीं कुचलना चाहिए था? लेकिन ऐसा नहीं हुआ! सबसे बड़ा दुख तो तब होता है जब खुद को जनता का रहनुमा बताने वाली महबूबा मुफ्ती जैसे लोग भी गीदड़ों की तरह हू-हू करने लगते हैं। इस तरह की घटनाओं के पीछे के निहितार्थों को समझने की भी जरूरत है। करीब से समझने के लिए इतिहास के पन्नों को थोड़ा सा पलटना पड़ेगा। आजादी के बाद हिन्दू मान्यताओं के उलट ढेर सारे कानून बनाये गये और बहुसंख्यकों ने उसे वक्त की नजाकत समझ, स्वीकार भी किया। लेकिन मुसलमानों की छह सौ साल पुरानी मान्यताओं में तनिक भी बदलाव नहीं कर उन्हें विशेष नागरिक की हैसियत प्रदान कर दी गयी। हालांकि इससे मुस्लिम समाज फायदे में रहा ऐसी बात नहीं लेकिन देश मेँ विघटन के बीज तो पड़ ही गये।

उसके बाद तो ऐसे उदाहरणों की लंबी शृंखला है। मुस्लिम पर्सनल ला से लेकर शाहबानो और अब अमरनाथ तक। बहुसंख्यक लोग यह पूछने को तो विवश हुए ही हैं कि जब दुनिया में इकलौते भारत में ही हज सब्सिडी दिये जाने पर किसी को आपत्ति नहीं, हज टर्मिनल बनाने, अल्पसंख्यकों के लिए दिये जाने वाले ढेर सारे अनुदानों पर कोई भी भारतीय विरोध दर्ज नहीं कराता तो करोड़ों हिन्दुओं की आस्था से जुड़ी अमरनाथ यात्रा को थोड़ा सा आसान बना देने में किसका क्या बिगड़ जाता?
हिन्दुओं के मानवाधिकारों के हनन की बात सिर्फ भारत तक सीमित हो ऐसा नहीं है। एशिया के अन्य कई देशों में हिन्दू नागरिकों के अधिकारों का हनन किया जाता रहा है। अफगानिस्तान, बांग्लादेश, फिजी, भूटान, कजाकिस्तान, मलेशिया, पाकिस्तान, सऊदी अरब, श्रीलंका, त्रिनिडाड एंड टोबैगो में हिन्दू नागरिकों पर हो रहे अत्याचारोँ के खिलाफ आवाज उठाने के लिए शायद ही कोई मानवाधिकारवादी आगे आता हो। वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें तो दुनिया भर में हिन्दुओं की आबादी एक अरब से भी अधिक है। एक जानकारी के मुताबिक इस समुदाय को विश्व का तीसरा सबसे बड़ा धार्मिक समूह बताया गया है। यही नहीं हिन्दू धर्म को दुनिया के सबसे फरातन धर्मों में माना जाता है। हिन्दू अपनी मान्यताओं को लेकर बहुलतावादी माने जाते हैं और आध्यात्मिक शांति प्राप्त करने के लिए अनेक प्रकार की पूजा पध्दतियोँ का प्रयोग करते हैं।

दक्षिण एशिया में और भारत के बाहर रह रहे करीब 2 करोड़ हिन्दुओं में से बहुसंख्य को भेदभाव, आतंक, हत्या, शारीरिक प्रताड़ना, जबरन धर्म परिवर्तन, मंदिरों को तोड़ना, सामाजिक एवं राजनीतिक बहिष्कार के अलावा धार्मिक, भाषाई एवं जातीय आधार पर निर्वासन का तो सामना करना ही पड़ता है, इसके साथ-साथ वोटिंग समेत तमाम नागरिक अधिकारों से भी उन्हें वंचित कर दिया जाता है। कई देशों में तो अन्य धर्मों के चरमपंथी भेदभाव की नीति अपनाते हुए राजनेताओं एवं सरकारी अधिकारियों की मार्फत प्रशासनिक स्तर पर भी धार्मिक उन्माद की जड़ों को सींचने का काम करते हैं।
अफगानिस्तान को ही लीजिए, जहां वैदिक काल के समय से ही हिन्दू सभ्यता का इतिहास मौजूद रहा है, वहां तालिबानियों द्वारा मंदिरों को सिलसिलेवार ढंग से ध्वस्त कर दिया गया। कुछेक मंदिरों पर मुस्लिम समुदाय के लोगों ने कब्जा कर लिया है। आज हालत यह है कि अफगानिस्तान में शायद ही हिन्दुओं की आस्था का कोई केन्द्र बचा होगा। क्या भारत में भी कश्मीरी अलगाववादी कुछ इसी तरह की बिसात नहीं बिछा रहे हैं? वहां हिन्दू अपने बच्चों को स्कूलों में इसलिए भेजने से डरते हैं कि उनके बच्चे अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण कहीं उपहास एवं भेदभाव का शिकार न बन जायें। हिन्दू नागरिकों के फनर्वास और नुकसान की भरपाई के लिए सरकार भी पहल नहीं करती। दूसरी ओर हिन्दू नागरिकों के हितों को तार-तार करने के लिए कट्टरपंथी हर समय तैयार बैठे रहते हैं।

1947 में बांग्लादेश में हिन्दुओं की आबादी कुल जनसंख्या के करीब 30 प्रतिशत के बराबर थी। लेकिन 1991 तक इस आबादी में बढ़ोतरी होने की बजाय ठीक उलटा देखने को मिलता है। तब तक करीब 2 करोड़ बांग्लादेशी हिन्दू पूर्ववत् जनसंख्या में से कहां लुप्त हो चुके थे, यह एक बहुत बड़ा सवाल है। यहां तो मानवाधिकार कार्यकर्ताओं एवं पत्रकारों को भी नहीं बख्शा जाता। मानवाधिकार संस्था एच.ए.एफ. के आंकड़े के मुताबिक वर्ष 2007 में हिन्दुओं की हत्या, बलात्कार, अपहरण, मंदिरों का ध्वस्तीकरण और जमीन हड़पने संबंधी 270 से भी अधिक मामले सामने आए हैं। यही नहीं कुल जनसंख्या के करीब 44 प्रतिशत हिन्दू परिवार यहां ‘एनेमी प्रॉपर्टी एक्ट-1965′ का दंश झेलने को मजबूर हैं। इसके कारण हिन्दुओं की जमीन को जब्त कर लिया जाता है।

भूटान जैसे देश में भी हिन्दू भेदभाव के शिकार रहे हैं। 90 के दशक के शुरुआती दौर में भूटान में रह रहे 100,000 हिन्दू अल्पसंख्यकों समेत न्यींगमापा बौध्द समुदाय के नागरिक अधिकारों को छीन लिया गया और उन्हें धार्मिक एवं जातीय कारणों से जबरन देश से निकाल दिया गया। ये सभी लोग नेपाल में यूनाईटेड नेशन्स हाई कमीशन फार रिफ्यूजी द्वारा लगाए राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं। जबकि करीब 20 हजार से अधिक लोगों के नेपाल तथा भारत के कई हिस्सों में बिखरे होने की बात कही जाती है।

ईसाई बहुल देश फिजी में हिन्दुओं की आबादी करीब 34 प्रतिशत है। हिन्दुओं के खिलाफ विषवमन और उनकी आस्था के प्रतीकों को ध्वस्त करना यहां आम बात है। वहां का मेथोडिस्ट चर्च फिजी को पूरी तरह से ईसाई राष्ट्र बनाने की इच्छा रखता है। ईसाई चरमपंथियों द्वारा हिन्दुओं पर होने वाले अत्याचारों को वहां की सरकार का भी समर्थन प्राप्त होता है। यही नहीं हिन्दुओं से जुड़ी संस्थाओं का ईसाईकरण करके भी उनके अधिकारों का यहां हनन किया जाताहै।

1947 में पाकिस्तान में रह रहे हिन्दुओं की आबादी कुल जनसंख्या का करीब 25 फीसदी थी। लेकिन आज पाकिस्तान में कुल आबादी में मात्र 1.6 फीसदी हिन्दू रह गए हैं। पाकिस्तान में तो आधिकारिक तौर पर ही ईशनिन्दा जैसे कानूनों की आड़ में गैर इस्लामिक लोगों के साथ सौतेला व्यवहार किया जाता है। हालांकि यहां कानूनी तौर पर बंधुआ मजदूरी पर प्रतिबंध है, लेकिन ऐसे अनेक मामले सामने आते रहे हैं, जिनमें हिन्दुओं से बंधुआ मजदूरों की तरह काम करवाया जाता है। स्कूलों की किताबों में भी इस्लाम को प्रोत्साहन दिया जाता है, जबकि हिन्दुओं समेत अन्य धर्मानुयायियों के खिलाफ घृणा फैलाने का काम किया जाता है। यही नहीं हिन्दू लड़कियों के अपहरण, बलात्कार और मदरसों में ले जाकर उनके धर्म परिवर्तन की बात भी सामने आती रहती है।

दुनिया भर में महाशक्ति के रूप में अपनी पहचान बना चुका रूसी संघ भी हिन्दुओं को प्रताड़ित करने में शामिल रहा है। यहां के संविधान के मुताबिक सभी समुदायों को धार्मिक आजादी दी गई है और सभी धर्मों को समान माना गया है। यही नहीं चर्च को स्टेट से अलग रखने की बात भी कही गई है। लेकिन सरकार इन प्रावधानों का खुद ही सम्मान नहीं करती है। अभी हाल ही में इस्कान के सदस्यों को जिस प्रकार यहां प्रताड़ित किया गया, उससे रूसी सरकार का असली चरित्र सबके सामने आ गया है।

सऊदी अरब में तो कुरान के मुताबिक इस्लामिक कानून संविधान में शामिल हैं। यहां कानूनी धाराएं सुन्नी इस्लाम को ध्यान में रखते हुए बनाई गई हैं। हत्या, चोरी, दैहिक शोषण, समलैंगिकता और व्यभिचार जैसे अपराधों के लिए भीषण प्रताड़ना के साथ-साथ फांसी जैसी सजा देने का अधिकार जजों को प्राप्त है। मुतव्वा-ए-इन (सऊदी धार्मिक फलिसश् के दबाव के चलते यहां नागरिकों को मुस्लिम एवं गैर मुस्लिम की पहचान के लिए अलग से पहचान पत्र लेकर चलना पड़ता है। धार्मिक स्वतंत्रता का कोई प्रावधान यहां नहीं है। गैर मुस्लिमों को अपने धार्मिक प्रतीकों की पूजा अर्चना की इजाजत नहीं है।

सार्वजनिक तो दूर निजी तौर पर भी किसी भगवान की उपासना को लेकर सजा दी जा सकती है। अन्य धर्मों के प्रति भेदभाव की बू शैक्षिक संस्थानों में भी साफ देखने को मिलती है। हिन्दुओं को तो यहां काला जादू करने वालों और भूत प्रेत में विश्वास करने वालों की श्रेणी में रखा जाता है। संयुक्त राष्ट्र के ‘अंतरराष्ट्रीय रिलिजीयश प्रफीडम कमीशन’ ने सऊदी अरब को ‘कंट्री आफ पर्टिक्यूलर कन्सर्न्स’ की संज्ञा दी है। इसके बावजूद अपने सैन्य, तेल एवं अन्य आर्थिक हितों के चलते अमेरिका यहां किसी तरह के बदलाव की पहल करने से कतराता है। सऊदी अरब को इस्लामिक चरमपंथ का केन्द्र माना जाता है और यहां से दुनिया भर के इस्लामिक संस्थानों एवं चरमपंथी संस्थाओं को फंडिंग भी की जाती है। इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए विचार करने की जरूरत है कि दुनिया भर में क्यों कभी हिन्दुओं पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ आवाज नहीं उठाई जाती है? इसके लिए कौन जिम्मेदार है?

संपर्क: इंडिया फांउडेशन फॉर रूरल डेवलमेंट रूम नं. 406, 49-50 रेड रोज बिल्डिंग, नेहरू प्लेस,
नई दिल्ली-110019
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TUESDAY, 26 MARCH 2013
हिन्दु घट ही रहा है इसके कारण क्या है ?
आचार्य चाणक्य के नगर अफगानिस्तान सेहिंदू मिट गया ?
काबुल जो भगवान राम के पुत्र कुश का बनाया शहर था आज वहाँ एक भी मंदिर नही बचा
गंधार जिसका विवरण महाभारत मे है जो चाणक्य के अखंड भारत की सीमा हुआ करता था जहां की रानी गांधारी थी आज उसका नाम कंधार हो चूका है और वहाँ आज एक भी हिंदू नही बचा
कम्बोडिया जहां राजा सूर्य देव बर्मन ने दुनिया का सबसे बड़ा मंदिर अंकोरवाट बनाया आज वहा भी हिंदू नही है
बाली द्वीप मे २० साल पहले तक ९०% हिंदू थे आज सिर्फ २०% बचे
कश्मीर घाटी मे सिर्फ २० साल पहले ५०% हिंदू थे , आज एक भी हिंदू नही बचा
केरल मे १० साल पहलेतक ६०% जनसंख्या हिन्दुओ की थी आज सिर्फ १०% हिंदू केरल मे है
नोर्थ ईस्ट जैसे सिक्किम, नागालैंड , आसाम आदि मे हिंदू हर रोज मारे या भगाएजाते है या उनका धर्मपरिवर्तन हो रहा है
1569 तक ईरान का नाम पारस
या पर्शिया होता था और वहाँ एक भी मुस्लिम नही था सिर्फ पारसी रहते थे .. जब पारस पर
मुस्लिमो का आक्रमणहोता था तब पारसी बूढ़े बुजुर्ग अपनेनौजवान को यही सिखाते थे की हमे कोई मिटा नही सकता . लेकिन ईरान से सारे के सारे पारसी मिटा दिये गए .. धीरे धीरे उनका कत्लेआम और धर्मपरिवर्तन होता रहा ..
एक नाव मे बैठकर २१ पारसी किसी तरह
गुजरात के नवसारी जिले के उद्वावाडा गांव मे पहुचे और आजपारसी सिर्फ भारत मे ही गिनती की संख्या मे बचे है
अफनिस्तान मेँ हिन्दू खत्म हो गया पाकिस्तान बाँग्लादेश मेँ हिन्दू खत्म होने की कगार पर है और भारत मेँ भी हिन्दु घट ही रहा है इसके कारण क्या है ????
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│  नरेन्द्र सिसोदिया
│  स्वदेशी प्रचारक, नई दिल्ली
│  http://narendrasisodiya.com

१९४७ में आजादी के दौरान पाकिस्तान में हिन्दू जनसंख्या 24% थी, अब वह घटकर 1% रह गई है, उसी समय तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब आज का अहसानफ़रामोश बांग्लादेश) में हिन्दू जनसंख्या 30% थी जो अब 7% से भी कम हो गई है । क्या हुआ गुमशुदा हिन्दुओं का ? क्या वहाँ (और यहाँ भी) हिन्दुओं के कोई मानवाधिकार हैं ?

आधुनिक पूंजीवाद का क्रूर जंगल





आधुनिक पूंजीवाद का क्रूर जंगल
- केबिन रैफट्री
http://epaper.bhaskar.com/kota
ब्रिटेन के केंद्रीय बैंक, बैंक ऑफ इंग्लैंड के पहले विदेशी गवर्नर मार्क कार्नी को चर्चा में रहना पसंद है। पिछले हफ्ते दो साहसी बयान दिए हैं। पहले तो उन्होंने कहा कि वे मौजूदा 0.5 फीसदी की कम ब्याज दरें तब तक नहीं बढ़ाएंगे जब तक कि बेरोजगारी की दर 7 फीसदी तक नहीं गिरती, जो शायद 2016 तक न हो। इसके बाद उन्होंने और भी बड़ा विवादास्पद बयान दिया। उन्होंने देश के बैंकों को चेताते हुए कहा कि उन्हें निवेश के जरिये बिजनेस की मदद कर रोजगार पैदा करने चाहिए वरना वे 'सामाजिक रूप से अनुपयोगी' हो जाएंगे। उन्होंने बैंकों की संस्कृति में बदलाव लाने की भी बात कही।

उन्होंने जो कहा वह काफी हद तक सही है, लेकिन कुछ लोगों को यह सलाह हजम नहीं होगी। इसकी वजह यह है कि यह बात ऐसे व्यक्ति के मुंह से आ रही है जिसने खून चूसने वाले दैत्य जिसे प्यार से गोल्डमैन सैक्स भी कहते हैं, में 15 साल तक वरिष्ठ पद पर काम किया है। बेहतर होगा कि वे बदलती दुनिया में बैंकों की भूमिका पर गहरा और व्यापक चिंतन करें।

कार्नी की बजाय क्योटो की दोशिशा यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर नोरिको हामा ने आर्थिक स्थिति पर अधिक गहरा वैश्विक दृष्टिकोण रखा है। उन्होंने आज के मानव-जंगल में व्याप्त खतरों को लेकर चेतावनी दी है और एबोनॉमिक्स यानी जापानी के प्रधानमंत्री शिंजो अबे की आर्थिक नीतियों पर भी जमकर प्रहार किए। वे नीतियां जिनके बलपर वे एक दशक से डिफ्लेशन (अपस्फीति) में चल रहे जापान को वृद्धि के नए युग में लाने का प्रयास कर रहे हैं। हामा की आधारभूत दलील यह है कि आधुनिक पूंजीवाद ने जिस जंगल का निर्माण किया है उसके केंद्र में मानवता को वापस लाना होगा वरना दुनिया खत्म हो जाएगी। उन्होंने कहा, 'मानवता अर्थशास्त्र से अधिक बड़ी और महत्वपूर्ण है। मानव ही हैं जो आर्थिक गतिविधियों को चलाते हैं।' हामा के मुताबिक दुनिया जिस प्रकार चल रही है तथा विजेताओं और पराजितों पर केंद्रित प्रसार माध्यम उसे जिस तरह और बिगाड़ रहे हैं उसमें मजबूत व शक्तिशाली फल-फूल रहे हैं जबकि कमजोर लगातार हाशिये पर धकेले जा रहे हैं। उन्होंने सिर्फ आर्थिक वृद्धि पर जोर देने वालेे जापानी प्रधानमंत्री की निंदा की और ध्यान दिलाया कि पिछले माह एक भाषण में उन्होंने इस शब्द का 42 बार उल्लेख किया। उन्हें जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे के इस मुहावरे पर भी आपत्ति है जिसमें दुनिया जीतने की जरूरत बताई गई है। हामा के मुताबिक दुनिया में अधिक तालमेल व एक-दूसरे के लिए सहारे की भावना होनी चाहिए। उन्होंने दावा किया कि असली जंगल में भी शेर चाहे राजा होगा पर उसके लालच व प्रभुत्व की भी सीमा है। जंगल जानवरों, पक्षियों, सरिसृपों, कीटों व पेड़-पौधों के एक जटिल इकोसिस्टम को सहारा देता है, जिसमें तालमेल व परस्पर सहयोग भी प्रतिद्वंद्विता जितना महत्वपूर्ण है।

संभव है हामा का वल्र्ड विजन बाइबिल में वर्णित स्वर्ग की कल्पना से प्रेरित हो जहां मेमना निश्चिंतता से शेर के साथ रह सकता है। इसे हासिल करना मानव या प्राणियों के संसार में असंभव लगता है। पर आधुनिक पूंजीवादी विश्व को घोर लालच कहां ले जा रहा है इस बात पर चिंतित होने वाली वे अकेली नहीं हैं। द ऑटोमेटिक अर्थ के एडिटर इन चीफ राउल मीजर ने हाल ही तर्क दिया था कि हर चीज को पैसे से जोडऩे से पता चलता है कि पूंजीवाद दिवालिया हो गया है। भंवरे यदि लुप्त हो रहे हैं तो कहेंगे 6000 करोड़ रुपए के भंवरे गायब हो गए हैं, मीथेन गैस छोड़े जाने से आर्कटिक को 3600 खरब रुपए की क्षति हो गई। यह क्या बकवास है! उनका कहना है कि आपके पास यदि हर चीज के लिए डॉलर वेल्यू ही बची है तो हो सकता है कि आपकी कोई कीमत न बची हो। वे कहते हैं, 'हम अपनी भावनाएं, प्रेम, दुख या उम्मीदों को तो आंकड़ों में बयां नहीं कर सकते न! टेक्नोलॉजी को लेकर हमारा सपना यह है कि हम ऐसे रोबोट बनाएं जिनमें मानवीय चेतना, भावनाएं हों न कि यह कि हम आदमी को रोबोट बना डालें। पूंजीवाद और टेक्नोलॉजी जिस शाश्वत प्रगति का वादा करते हैं वह विनाश को जायज ठहराने के भरोसे पर आधारित है और हमें इस भरोसे पर सवाल खड़े करने होंगे।'

बेहतर होता कि कार्नी अपने ही विभाग में फाइनेंशियल स्टेबिलिटी के डायरेक्टर एंडी हैल्डेन से बात कर लेते, जो ग्लोबल फाइनेंस के सबसे प्रखर विचारक माने जाते हैं। हैल्डेन ने हाल ही चेतावनी दी थी कि आधुनिक वित्तीय व्यवस्था का नियमन बहुत जटिल हो गया है। चूंकि जटिलता से अनिश्चितता पैदा होती है, नियमन जटिलता पर नहीं सरलता पर आधारित होना चाहिए। उन्होंे बड़े बैंकों की -टू बिग टू फेल- अवधारणा पर सवाल उठाते हुए कहा कि अपने विशाल आकार के कारण ही वे सालभर में ही खरबों डॉलर की सरकारी सब्सिडी हजम कर जाते हैं। दुर्भाग्य यह है कि कनाडा से ब्रिटेन आने के पहले ही कार्नी सार्वजनिक रूप से हैल्डेन की निंदा कर चुके हैं और अपने डेप्यूटी के रूप में उन्होंने हैल्डेन के बजाय ट्रेजरी के आदमी को लिया।

कार्नी को मेगा बैंकों से कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन उन्होंने रोजगार पैदा करने वाले निवेश को मदद करने की जो बात कही है वह उससे एकदम उलट है जो ये बड़े बैंक कर रहे हैं। ब्याज की नीची दरों के रहते भी वे निवेश बढ़ाकर रोजगार बढ़ाने के लिए प्रयास करते नजर नहीं आते। अमेरिका में तो बैंकों के कमॉडिटी बाजार में काम करने पर बड़ी बहस चल रही है।

ओहियो के सीनेटर शेरॉड ब्राउन सवाल करते हैं, 'हम बैंकों से क्या चाहते हैं? वे बिजनेस लोन जारी करें या तेल को रिफाइन व ट्रांसपोर्ट करें? सरकारी गारंटी व फंड तक पहुंच होने के कारण बैंक बड़ी औद्योगिक कंपनियों पर भी भारी पड़ते हैं।' शून्य ब्याज जैसी स्थितियों का सामना करने वाले बचतकर्ताओं के हश्र की बात तो छोड़ें यदि कार्नी को बिजनेस और नौकरियों की भी वाकई चिंता है तो उन्हें उचित स्पद्र्धा सुनिश्चित करनी पड़ेगी। उन्हें यह देखना होगा कि बैंक गारंटियों का दुरुपयोग न करें और आधुनिक पूंजीवादी जंगल वास्तविक जंगल से ज्यादा डरावना व खतरनाक न बन जाए।