गुरुवार, 22 अगस्त 2013

राजनीतिक दलों का अनर्थतंत्र




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राजनीतिक दलों का अनर्थतंत्र 

पूर्व सदस्य, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड और पूर्व महानिदेशक, आयकर विभाग (इन्वेस्टिगेशन)
कई राज्यों में विधानसभा चुनाव और केंद्र में लोकसभा चुनाव करीब हैं जिसे देखते हुए देश के राजनीतिक अर्थव्यवस्था की गंदगी साफ करने और राजनीतिक दलों की फंडिंग में पारदर्शिता बढ़ाने की मांग बढ़ गई है। राजनीतिक दलों का खजाना लगातार बढ़ता जा रहा है, लेकिन उन्हें चंदा कौन दे रहा है, उनके द्वारा चुनाव में भारी खर्च के लिए इतना पैसा कहां से आ रहा है, इसका कोई हिसाब नहीं है। राजनीतिक दल खुद को मिली टैक्स छूट का दुरुपयोग करते हैं और उनके द्वारा मनी लांडरिंग करने तक के सबूत मिले हैं। सच तो यह है कि इस तरह के कई छूटों का फायदा उठाने के लिए ही कुकुरमुत्ते की तरह सैकड़ों की संख्या में राजनीतिक दल उग आए हैं। राजनीतिक दलों को २०,००० रुपए से कम के मिले चंदे का कोई हिसाब नहीं देना होता और इसी सहूलियत का फायदा उठाते हुए वे चंदे का स्रोत छिपाए रहते हैं। चुनाव आयोग के अधिकार सीमित होने की वजह से चुनावी खर्च पर भी प्रभावी अंकुश नहीं लग पा रहा।

अचरज की बात यह है कि प्रत्याशी चुनाव आयोग को खर्च का जो हिसाब देते हैं वह आयोग द्वारा तय सीमा का औसतन ५० फीसदी ही होता है, जबकि उनका वास्तविक खर्च कई गुना होता है। लोक सभा के एक प्रत्याशी ने तो अपना खर्च महज १.३२ लाख रुपए ही दिखाया था। कर छूट का दुरुपयोग, मनी लांडरिंग, खर्चों का गलत हिसाब जैसे वर्तमान भारतीय राजनीति के पूरे 'अनर्थतंत्र� पर गहराई से रोशनी डाल रही है इस बार की यह कवर स्टोरी।

कई राज्यों की विधानसभाओं और संसद के लिए चुनाव नजदीक ही हैं और इसलिए अपने-अपने इलाके में इनकी तैयारियों के लिए और इन पर खर्च होने वाले धन को जुटाने के लिए जुनून जोरों पर है। चुनाव नतीजों को प्रभावित करने के लिए बड़े पैमाने पर धन की ताकत के इस्तेमाल पर चुनाव आयोग (ईसीआई) का ध्यान भी खींचा है, जैसा कि पिछले दो साल से नागरिक समाज के विभिन्न वर्गों में इसकी चर्चा होती रही है। चुनाव आयोग को किसी चुनाव के उम्मीदवार, उसके दोस्तों और उसकी राजनीतिक पार्टी द्वारा किए जाने वाले खर्च को नियंत्रित करने, उस पर निगरानी रखने और उसे रेगुलेट करने का अधिकार है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग चुनाव प्रक्रिया में काले धन के इस्तेमाल को वास्तव में रोक पाया है या उसे कुछ नियंत्रित करने में सक्षम हुआ है?

चुनावी प्रक्रिया में वित्तीय पारदर्शिता के एक-दूसरे से जुड़े तीन पहलू हैं- चुनाव अभियान के खर्च का ब्योरा देना, राजनीतिक पार्टियों के खर्च का बंदोबस्त और कुछ चुने हुए जनप्रतिनिधियों की संपत्ति में भारी इजाफा। बिना हिसाब-किताब वाले या काले धन वाली चुनावी प्रक्रिया को साफ-सुथरा बनाने का कोई भी प्रयास समग्र रूप से इन तीनों मसलों का समाधान होना चाहिए। लेकिन चुनाव आयोग का प्रयास सिर्फ प्रचार अभियान के खर्चों को लेकर ही है, दूसरे अन्य पहलुओं पर नहीं।

प्रचार अभियान के खर्चे
पिछले कई वर्षों से चुनाव आयोग ने उम्मीदवारों द्वारा चुनाव में होने वाले खर्चो पर अंकुश और उनकी निगरानी के लिए लगातार कई कठोर कदम उठाए हैं। इन कदमों में अधिकतम खर्च की एक सीमा तय करना, चुनाव प्रचार अभियान की अवधि को कम करना, उम्मीदवार के अभियान में होने वाले सभी खर्चों को उसका चुनाव खर्च मानना, चुनाव खर्च एक निश्चित बैंक एकाउंट से ही करना, ऐसे खर्चों का दिन-प्रतिदिन का हिसाब रखना, खर्चों का पूरा ब्योरा चुनाव आयोग के पास जमा कराना आदि शामिल हैं। हर चुनाव क्षेत्र में चुनाव खर्च निगरानी पर्यवेक्षकों की नियुक्ति जैसी मशीनरी को वीडियो निगरानी टीम, मीडिया निगरानी टीम, उडऩ दस्ता, खर्च कंट्रोल रूम आदि बनाकर और मजबूत किया गया है और इस मशीनरी द्वारा एक शैडो एक्सपेंडीचर रजिस्टर मेन्टेन किया जाता है, ताकि उम्मीदवार ने जो बही खाता दिखाया है उसकी सत्यता की जांच हो सके। इन सब उपायों से ही चुनाव आयोग को चुनाव खर्चों में निगरानी रखने में आसानी हुई है।

एनजीओ एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स (एडीआर) और नेशनल इलेक्शन वाच (एनईडब्ल्यू) ने वर्ष २००९ के लोकसभा चुनावों में लडऩे वाले उम्मीदवारों द्वारा घोषित खर्चों का विश्लेषण किया। चौंकाने वाला तथ्य यह रहा कि उम्मीदवारों द्वारा बताया गया औसत खर्च आयोग द्वारा स्वीकार्य अधिकतम सीमा २५ लाख रुपए के ४५ से ५५ फीसदी तक ही था। औसतन देखें तो विभिन्न राजनीतिक दलों के विजयी उम्मीदवारों ने करीब १५ लाख रुपए का खर्च दिखाया। इसी तरह चुने गए सांसदों में सबसे कम खर्च एक सांसद द्वारा सिर्फ १.३१ लाख रुपए का बताया गया। यह इसलिए भी ज्यादा चौंकाने वाली बात है क्योंकि राजनीतिक दलों का आमतौर पर कहना था कि चुनावी खर्च की सीमा व्यावहारिक नहीं है।

सच तो यह है कि राजनीतिक दलों के इसी मत के आधार पर ही चुनाव आयोग ने लोक सभा चुनावों के लिए खर्च की ऊपरी सीमा वर्ष २०११ में बढ़ाकर ४० लाख रुपए कर दी। बहस का विषय यह है कि चुनाव खर्च की सीमा क्या रखी जाए ताकि कोई उम्मीदवार जो खर्च बताए, वह उसका बहीखाता ईमानदारी से पेश कर सके यानि ऐसे स्रोत से दिखाए जिसका कोई हिसाब-किताब हो, अन्यथा वह स्वीकार्य सीमा का भी एक हिस्सा बिना हिसाब-किताब वाले स्रोत से पूरा करेगा। इसके अलावा इस बात के भी मौखिक साक्ष्य पाए गए हैं कि प्रत्याशियों द्वारा होने वाला वास्तविक खर्च स्वीकार्य सीमा से ५ से १० गुना ज्यादा हो सकती है।

सार्वजनिक जीवन में तीन तरह के साक्ष्यों से यह पता चलता है कि ज्यादातर उम्मीदवारों द्वारा चुनाव आयोग के सामने घोषित चुनावी खर्च वास्तविकता से बहुत कम बताया जाता है:

-कई प्रतिष्ठित अकादमिक संस्थाओं की प्रकाशित रिपोर्ट (देखें: कोलंबिया यूनिवर्सिटी के मिलन वैष्णव की ''दि मार्केट फॉर क्रिमिनाल्टी: मनी, मसल्स ऐंड इलेक्शंस इन इंडिया��, वर्ष २००९ में प्रकाशित ''पार्टी सिस्टम फ्रैगमेंटेशन, इंट्रा-डेमोक्रेसी एंड ओपेेक पॉलिटिकल फाइनेंस, पेनसिलवेनिया यूनिवर्सिटी के ई श्री.धरन की ''इंडिया इन ट्रांजिशन सिरीज) -इस क्षेत्र में कार्यरत स्वतंत्र और भरोसेमंद एनजीओ जैसे सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज, सेंटर ऑफ मीडिया स्टडीज आदि द्वारा किए गए फील्ड सर्वेक्षण - वर्ष २०१२ में राज्य विधानसभा चुनावों के दौरान चुनाव अधिकारियों द्वारा जब्त की गई नकदी, शराब, नशीली दवाओं आदि की रिपोर्ट (नकदी ५२ करोड़ रुपए, शराब ७.५ लाख लीटर, हेरोइन ५६ किग्रा, अफीम १०२ किग्रा आदि)

चुनाव खर्च की निगरानी पर चुनाव आयोग के निर्देशों के हैंडबुक (सितंबर, २०११ में प्रकाशित) में ऐसे कई चालाक तरीके बताए गए हैं जो वोटरों को चुपके से नकदी बांटने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। वोटरों को प्रभावित करने के लिए बिना हिसाब-किताब के इस्तेमाल होने वाले कुछ तरीके इस तरह से हैं-स्वयं सहायता समूहों, एनजीओ, गांव के मुखिया, लाइसेंस वाले दलालों, अखबारों के हॉकर, दूधियों, सामुदायिक बैठकों, दावत, आरती आदि के द्वारा तथा सामूहिक विवाह, स्थानीय मैच, चिकित्सा शिविर, मनोरंजन शो आदि के आयोजनों के द्वारा।

इसके अलावा डमी प्रत्याशियों को लड़ाने, विरोधी पार्टियों के पोल एजेंटों को अपने पाले में करने, बेमतलब खड़े प्रत्याशियों की गाडिय़ों और अन्य सुविधाओं का इस्तेमाल आदि पर भी भारी रकम खर्च की जाती है। हाल में कर्नाटक विधानसभा के राजनीतिक दलों ने चुनाव आयोग द्वारा तय की गई खर्च की ऊपरी सीमा को धता बताने का एक और साधारण तरीका निकाल लिया। इन दलों ने चुनाव अभियान चुनाव आयोग द्वारा घोषित तिथि से काफी पहले ही प्रचार शुरू कर दिया गया था। असल में चुनाव खर्च की गणना तब से की जाती है, जिस दिन से चुनाव की घोषणा की जाती है। शायद लोकसभा चुनावों में भी ऐसा ही कुछ तरीका अपनाया जाएगा।

यह भी गौर करने की बात है कि चुनाव कानून के मुताबिक स्वीकार्य ऊपरी सीमा से ज्यादा खर्च करने को 'भ्रष्ट आचरण� माना जाता है और इसके लिए उम्मीदवार को अयोग्य घोषित किया जा सकता है, लेकिन अभी तक शायद ही किसी को इसके लिए अयोग्य ठहराया गया हो। इसलिए ऐसा लगता है कि चुनाव आयोग जो कठोरता दिखाता है, उसका असर बस यही हो रहा है कि खर्चों को गुप्त तरीके से किया जाता है और इस तरह से खर्च सीमा का लगातार उल्लंघन किया जा रहा है। इसका नतीजा यह है कि वास्तविक खर्चों का बड़ा हिस्सा बिना हिसाब-किताब वाले स्रोत से पूरा किया जाता है।

चुनावी प्रक्रिया में काले धन के इस्तेमाल को रोकने के लिए अक्सर राजनीतिक दलों को सरकारी फंड से चुनाव लड़ाने की सलाह दी जाती है। यह कहा जाता है कि इसके लिए सभी दलों को समान तरीके से फंड वितरण की कोई कारगर व्यवस्था बनानी होगी। सरकारी फंडिंग से उन राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों को राहत मिलेगी जिनके पास चुनावी मैदान में उतरने के लिए संसाधन या हैसियत नहीं है, लेकिन जिनके पास खूब पैसा है उनके द्वारा काले धन के इस्तेमाल पर अंकुश लगने की संभावना कम ही है।

इसलिए चुनाव आयोग द्वारा उठाए गए कई कदमों के बावजूद चुनावी प्रक्रिया में काले धन के प्रभाव पर अंकुश के लिए कुछ अतिरिक्त, वैकल्पिक रास्ते और साधन तलाशने होंगे। संभवत: राजनीतिक दलों को इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों (टीवी, एफएम रेडियो, इंटरनेट, सोशल मीडिया आदि) और अखबारों में विज्ञापन आदि के माध्यम से अभियान चलाने को प्रोत्साहित करना और वोटरों से सीधे संपर्क (रैली, जुलूस आदि) कम से कम करना एक रास्ता हो सकता है। इस संबंध में जिन कदमों पर विचार किया जा सकता है, उनमें सभी उम्मीदवारों को सरकारी प्रसारण माध्यमों पर ज्यादा लंबा मुफ्त एयरटाइम देना और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों पर प्रचार में हुए खर्च को चुनाव आयोग की खर्च सीमा से बाहर रखने जैसे कदम हो सकते हैं।

राजनीतिक दलों की फंडिंग
यह सुनने में बहुत अजीब लगता है, लेकिन तथ्य यही है कि इस देश में करीब १४०० राजनीतिक दल हैं जो जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, १९५२ (आरपी एक्ट) के तहत चुनाव आयोग के पास पंजीकृत हैं। इनमें से बड़ी संख्या ऐसे राजनीतिक दलों की है जिन्होंने कभी चुनाव नहीं लड़ा है, संसद या विधानसभा में सीट जीतने की बात ही छोड़ दें।

चुनाव आयोग के पास कोई राजनीतिक दल पंजीकृत कराने का दो सीधा फायदा मिलता है- पहला कोई पंजीकृत पार्टी चंदा जुटाना शुरू कर सकती है और इस तरह से जुटी रकम पर किसी तरह का आयकर नहीं लगता, दूसरा, रजिस्टर्ड राजनीतिक दल को किसी दानदाता द्वारा दिया गए पूरे चंदे के बदले उन्हें कर कटौती का लाभ मिलता है और इस मामले में कोई ऊपरी सीमा नहीं होती। इसलिए कोई अचरज की बात नहीं कि हर साल १०० से ज्यादा नए राजनीतिक दल चुनाव आयोग के पास रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन करते हैं।

इस तरह के रजिस्ट्रेशन हासिल करने की प्रक्रिया बहुत साधारण है। आवेदक दल को एक आवेदन फॉर्म के साथ अपने संविधान की प्रति, कम से कम १०० सदस्य होने का प्रमाण, १० हजार रुपए के बैंक ड्राफ्ट के साथ ही कुछ वचन देने होते हैं, जैसे वह भारत के संविधान के अनुरूप कार्य करेगा, वह अपना वार्षिक बहीखाता चुनाव आयोग के पास जमा करेगा, वह पांच साल के भीतर चुनाव लड़ेगा आदि। एक बार कागजी प्रक्रिया पूरी होने के बाद रजिस्टे्रशन बहुत हद तक अपने आप ही हो जाता है।

जन प्रतिनिधित्व एक्ट के तहत सभी पंजीकृत राजनीतिक दलों को किसी भी व्यक्ति से २०,००० रुपए से ज्यादा के हासिल सभी चंदे का विवरण उसे हासिल करने के अगले साल ३० सितंबर तक देना होता है। एनजीओ पब्लिक इंफॉर्मेशन फाउंडेशन द्वारा आरटीआई के तहत चुनाव आयोग से हासिल जानकारी के मुताबिक जून, २०१२ तक ११९६ राजनीतिक दलों में से (तब तक पंजीकृत) सिर्फ ९८ ने अपने हासिल चंदे का विवरण दिया था और वित्त वर्ष २०१०-११ के लिए सिर्फ १७४ पंजीकृत राजनीतिक दलों ने अपना वार्षिक बहीखाता जमा किया था। इसके अलावा एक और विचित्र बात यह है कि इस वैधानिक आवश्यकता या पंजीकरण के समय राजनीतिक दलों द्वारा दिए गए वचन के अलावा चुनाव आयोग के पास इन सबके अनुपालन को सुनिश्चित करने का और कोई अधिकार नहीं है। सच तो यह है कि उसे किसी राजनीतिक दल का पंजीकरण रद्द करने का कोई अधिकार नहीं है, चाहे वजह कुछ भी हो। चुनाव आयोग के पास यह भी अधिकार होता है कि वह चुनाव चिह्न आदेश (आरक्षण और आवंटन)१९६८ के तहत किसी पंजीकृत राजनीतिक दल को राज्य स्तर की या राष्ट्रीय स्तर की पार्टी घोषित कर सके, जो इस बात पर निर्भर करता है कि पिछले विधान सभा या लोक सभा आम चुनाव में पार्टी ने कितने फीसदी मत हासिल किए थे। इस तरह की मान्यता किसी वाजिब राजनीतिक दल के लिए बहुत मायने रखती है क्योंकि इससे पार्टी को पूरे राज्य या देश में एक चुनाव चिह्न रखने का अधिकार मिल जाता है।

फिलहाल करीब १४०० रजिस्टर्ड पार्टियों में से सिर्फ ६ राष्ट्रीय दल के रूप में और ४१ राज्य स्तर के दल के रूप में पंजीकृत हंै। इस प्रकार १४०० में से बाकी बचे दलों की कोई पहचान नहीं है, इसका मतलब यह है कि या तो उन्होंने कोई चुनाव ही नहीं लड़ा है या उनके उम्मीदवार चुनाव चिह्न आदेश के तहत जरूरी वोटों या सीटों का न्यूनतम फीसदी भी हासिल नहीं कर पाए। लेकिन इन सभी को आयकर देने से छूट मिलती है और इनको चंदा देने वालों को कर छूट का फायदा मिलता है।

आयकर अधिनियम २००३ में सुधार के द्वारा यह प्रावधान किया गया कि सभी पंजीकृत राजनीतिक दलों के आय को पूरी तरह से कर छूट मिलेगी, यदि वह अपना बहीखाता मेंटेन करते हैं, अपने पसंद के चार्टर्ड एकाउंटेट के माध्यम से अपने एकाउंट का लेखा कराते हैं, २०,००० रुपए से ऊपर के मिले किसी भी चंदे की जानकारी चुनाव आयोग को निर्धारित तिथि तक चंदा देने वाले के नाम और पते के साथ देते हैं। साथ ही, किसी राजनीतिक दल को चंदा देने वाले सभी व्यक्तियों या कंपनियों के लिए भी यह चंदा पूरी तरह से कर मुक्त होता है और इसकी कोई ऊपरी सीमा नहीं होती।

अन्य सभी संगठित इकाइयों जैसे कंपनियों, फर्मा, सोसाइटी, ट्रस्ट आदि के लिए बहीखाता और अन्य रिकॉर्ड मेंटेन करने, लेखा मानक का पालन करने, ऑडिट रिपोर्ट का प्रोफॉर्मा और आयकर रिटर्न दाखिल करने के लिए विस्तृत नियम एवं कायदे बने हुए हैं। लेकिन पंजीकृत राजनीतिक दलों के लिए ऐसा कुछ भी नहीं है। ऐसी कोई बाध्यता भी नहीं होती कि राजनीतिक दल जो चंदा हासिल कर रहे हैं या उनके द्वारा जो कमाई हो रही है वह सिर्फ वास्तविक राजनीतिक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया जाए, न कि अन्य जरूरतों के लिए (जैसे सदस्यों या पदाधिकारियों के व्यक्तिगत इस्तेमाल) ।

इसके अलावा अन्य संगठित एंटिटी के विपरीत राजनीतिक दलों को आयकर रिटर्न कागज पर ही दाखिल करने की ही इजाजत होती है और इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से दाखिल करने की बाध्यता नहीं होती, जिससे किसी भी तरह की पुष्टि कर पाना कठिन होता है। जांच के लिए मामलों को चुनने के लिए आयकर विभाग ने जो दिशा-निर्देश जारी किए हैं उनमें राजनीतिक दलों को शामिल नहीं किया गया है। इसकी वजह से राजनीतिक दलों द्वारा आयकर रिटर्न दाखिल करने के बाद इनकी किसी तरह की जांच नहीं होती और उन्हें संक्षेप में ही स्वीकार कर लिया जाता है।

आयकर विभाग पंजीकृत राजनीतिक दलों का अलग से कोई रिकॉर्ड नहीं रखता। एडीआर-एनईडब्ल्यू की एक रिपोर्ट के अनुसार कई मान्यता प्राप्त राज्य स्तरीय राजनीतिक दल (इनमें से कई अपने राज्य में सत्तारूढ़ हैं) और ज्यादातर पंजीकृत राजनीतिक दल आयकर विभाग के पास न तो आयकर रिटर्न दाखिल कर रहे हैं, न ही चुनाव आयोग के पास अपना चंदे का (२०,००० रुपए से ज्यादा) वार्षिक विवरण दे रहे हैं।

इसी रिपोर्ट में कई बड़े राजनीतिक दलों और राज्य स्तर के पंजीकृत दलों द्वारा चुनाव आयोग को दिए गए सालाना चंदे के विवरण की जांच की गई और फिर उसे वर्ष २००४-०५ से २०१०-११ के लिए उनके द्वारा आयकर विभाग के पास दाखिल रिटर्न से मिलाया गया। इस जांच में यह पाया गया कि एक मामले में एक राजनीतिक दल ने कई करोड़ का पूरा चंदा बीस-बीस हजार से कम रकम के रूप में हासिल दिखाया था, सात ऐसे मामले पाए गए जिनमें ऐसे छोटे चंदे का हिस्सा ८० फीसदी से ज्यादा और ज्यादातर पार्टियों में इस तरह के चंदों का हिस्सा ५० फीसदी से ज्यादा था।

इससे पता चलता है कि बड़ी मात्रा में हासिल चंदों को इन दलों ने अपने बहीखाते में अज्ञात स्रोतों से हासिल नकद चंदा या कूपन बिक्री से हासिल बताया। इस तरह २०,००० रुपए से कम का नकद चंदा और कूपन बिक्री के मद में पार्टी चाहे तो करोड़ों में हासिल चंदे को भी दिखा सकती है और इस राशि पर उसे कोई आयकर भी नहीं देना होगा और उससे कोई सवाल भी नहीं किया जाएगा। दूसरे शब्दों में कहें तो पार्टियों द्वारा स्वीकार्य स्रोत से हासिल चंदे का बड़ा हिस्सा भी अपारदर्शी होता है और उसकी किसी तरह की जांच भी नहीं होती। इससे भी ज्यादा घातक बात यह है कि निष्क्रिय या सुप्त राजनीतिक दलों का इस्तेमाल मनी लॉड्रिँग के लिए किया जा रहा है। एक अंग्रेजी अखबार में १४ जनवरी, २०११ को प्रकाशित एक खबर के अनुसार चुनाव आयोग ऐसा मानता है कि मनी लॉड्रिंग के लिए फर्जी दलों की स्थापना की जा रही है और इनके खाते में जमा पैसे का इस्तेमाल शेयर बाजार में निवेश या ज्वैलरी खरीदने के लिए भी किया जा रहा है। ऐसे फर्जी दल को हासिल चंदे का बहुत कम ही इस्तेमाल किसी चुनाव अभियान या अन्य राजनीतिक खर्चों के लिए होता है।

खबर में कहा गया है कि चुनाव आयोग के अनुमान के मुताबिक करीब १२०० पंजीकृत दलों में से सिर्फ १६ फीसदी या करीब २०० दल ही वास्तव में राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होते हैं, बाकी सभी दलों का गठन चंदे के रूप में अवैध धन जमा करने और इस तरह कर चोरी के लिए किया जाता है।

यह गौर करने वाली बात है कि वर्ष २००३ में आयकर अधिनियम में सुधार से पहले सिर्फ उन्हीं राजनीतिक दलों को कर छूट का लाभ मिलता था जिन्हें चुनाव चिह्न आवंटन आदेश के तहत मान्यता प्राप्त था। सुधार के बाद बने प्रावधानों के दुरुपयोग को देखते हुए इस बात की प्रबल वजह बनती है कि उन राजनीतिक दलों को आंख मंूदकर दिए जा रहे छूट को वापस लिया जाए जो पंजीकरण के पांच साल के भीतर चुनाव चिह्न आवंटन आदेश हासिल करने में विफल रहते हैं। इसकी जगह ऐसे राजनीतिक दलों को पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट को उपलब्ध कर छूट प्रावधानों के तहत छूट का दावा करना चाहिए।

राजनीतिक दलों के वित्तीय मामलों के लिए चाहिए खास कानून
इन सबको देखते हुए राजनीतिक दलों के वित्तीय मामलों की निगरानी और रेगुलेशन के लिए तत्काल एक वैधानिक तंत्र बनाने की जरूरत है। यह ध्यान देने की बात है कि सभी अन्य संगठित एंटिटी जो जनता से धन जुटाते हैं या पब्लिक फंड की डीलिंग करते हैं या जो कर छूट के हकदार होते हैं, उन्हें कुछ वैधानिक संस्थाओं या नियामक कानूनों जैसे कंपनी एक्ट, ट्रस्ट एक्ट, सोसाइटी रजिस्टे्रशन एक्ट आदि के द्वारा संचालित किया जाता है। इन कानून के द्वारा न केवल संबंधित एंटिटी के मामलों को रेगुलेट करने के लिए प्राधिकरण और तंत्र की स्थापना की जाती है, बल्कि डिस्क्लोजर संबंधी ऐसे निर्देश जारी किए जाते हैं जिसके तहत एंटिटी को अपने वित्तीय मामलों की कुछ बुनियादी जानकारी सार्वजनिक करनी पड़ती हैं। ऐसी कोई वजह नहीं दिखती कि आखिर क्यों न पंजीकृत राजनीतिक दलों को ऐसी बाध्यता के तहत लाया जाए।

जन प्रतिनिधियों की संपत्ति में भारी इजाफा
पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज एवं अन्य बनाम भारत सरकार मामले में मार्च २००३ में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद चुनाव आयोग ने संसद और विधान सभाओं के लिए चुनाव लड़ रहे सभी उम्मीदवारों के लिए यह जरूरी कर दिया कि वे नामांकन दाखिल करने के समय अपने पास, अपने पति-पत्नी और परिवार के निर्भर सदस्यों के पास मौजूद सभी चल-अचल संपत्ति का खुलासा करें। इसके अलावा नवीनतम आयकर रिटर्न का भी विवरण देना होता है।

साथ ही, सभी चुने गए सांसदों को शपथ लेने के ९० दिन के भीतर संसद के अपने संबंधित सदन के पीठाधीश के पास अपने प्रॉपर्टी के बारे में एक बार विवरण देना होता है। एडीआर-एनईडब्ल्यू ने१४वीं लोकसभा (२००४) के उन ३०४ सांसदों के चुनावी हलफनामे का विश्लेषण किया जो २००९ में फिर से चुनाव लड़े। इसमें यह पाया गया कि इन सांसदों की औसत आय २००४ के १.९२ करोड़ रुपए से बढ़ कर वर्ष २००९ में ४.८ करोड़ रुपए तक पहुंच गया, यानि उनकी आय में २८० फीसदी की बढ़त हुई। इसी तरह, वर्ष २०१२ में हुए कई विधान सभा चुनावों में दुबारा लडऩे वाले विधायकों की संपत्ति में कई गुना इजाफा हुआ।

एडीआर-एनईडब्ल्यूकी रिपोर्ट में बताया गया है कि बड़ी संख्या में ऐसे उम्मीदवार या विधायक भी रहे हैं जिन्होंने यह स्वीकार किया है कि उन्होंने कभी भी आयकर रिटर्न दाखिल नहीं किया है। जिन उम्मीदवारों ने अपनी संपत्ति करोड़ों में बताई थी, उन्होंने भी चुनावी खर्च कुछ ही लाख दिखाया।

चुनाव आयोग उम्मीदवारों से हलफनामा हासिल करता है, लेकिन आय के ज्ञात स्रोत से जो संपत्ति का खुलासा किया गया है, यदि संपत्ति उससे बहुत ज्यादा रहती है तो भी चुनाव आयोग के पास किसी तरह की कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है। इसलिए एक रूटीन की तरह चुनावी हलफनामों को जांच के लिए आयकर विभाग के पास भेज दिया जाता है। इन हलफनामों में जो जानकारी होती है वह बस संपदा के बारे में एक बयान जैसा ही होता है।

ज्यादातर मामलों में उम्मीदवार के संपत्ति का आकलन इनकम टैक्स के दायरे में नहीं, बल्कि सिर्फ वेल्थ टैक्स के दायरे में किया जाता है। जिन लोगों का आकलन आयकर के दायरे में किया भी गया है, उन्होंने भी सिर्फ रिटर्न ही दाखिल किया है।

पिछले कई वर्षों से आयकर रिटर्न का जो प्रोफॉर्मा इस्तेमाल किया जा रहा है (खासकर सरल, सहज और सुगम) उसमें संपदा के बारे में कोई घोषणा नहीं होती। इसका मतलब यह है कि उम्मीदवार चुनाव के लिए जो हलफनामा दायर करते हैं उसकी आयकर विभाग के पास रहने वाली जानकारी से पुष्टि नहीं की जा सकती। इसलिए कोई अचरज की बात नहीं है कि आयकर विभाग भी कुछ दुर्लभ मामलों के अलावा चुनावी हलफनामे में हासिल जानकारियों की कोई जांच नहीं करता।

इस प्रकार, एक तरफ इस बात के कई संकेत हैं कि देश के चुनावी तंत्र में काले धन का शिंकजा बहुत गहरा हो गया है। दूसरी तरफ, इसके प्रभाव को रोकने के लिए वास्तव में कोई भी प्रभावी तंत्र नहीं है। इसके अलावा यह कोई भी अनुमान लगा सकता है कि इसमें कितना 'गंदा धन� यानि अपराध और भ्रष्टाचार आदि से निकला धन लगा हुआ है।

एक ज्यादा मनहूस बात जो हमें परेशान कर सकती है, वह है काले धन के इस कैंसर का स्थानीय निकाय चुनावों में फैलना। एक अनुमान के अनुसार विकेंद्रित प्रशासन के त्रिस्तरीय ढांचे में जमीनी स्तर पर करीब २९ लाख नए चुनावी पद जुड़े हैं जिससे चुनावों के लिए पैसे मांग में कई गुना इजाफा हुआ है और काले धन के इस्तेमाल की संभावा भी कई गुना बढ़ी है।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)
Issue: 15July, 2013