सोमवार, 9 सितंबर 2013

भारत की आध्यात्मिक विश्व विजय का स्मरण ; 11 सितम्बर 1893 : शिकागो सर्वपंथ सभा


भारत की आध्यात्मिक विश्व विजय का स्मरण
पांचजन्य / तारीख: 30 Aug 2013 
मन के हारे हार है मन के जीते जीत’, यह कहावत जितनी व्यक्ति पर लागू होती है उतनी ही समाज पर भी लागू होती है। विजय की आकांक्षा व विजय की अनूभूति समाज मन का शक्तिवर्धन करती हैं। जब समूचा राष्टÑ ही अपनी निहित शक्तियों के प्रति अनभिज्ञ होने के कारण आत्मग्लानि से ग्रस्त हो जाता है तब कोई अद्वितीय विजय ही उसे मानसिक लकवे से बाहर ला सकती है। आत्म-विस्मृति की मानसिकता पराभव की मानसिकता होती है, अकर्मण्यता की मानसिकता होती है। ऐसे में स्वप्न भी संकुचित हो जाते हैं।
19 वीं शताब्दी के अंत में भारत की यही स्थिति थी। कहीं से कोई आशा नहीं दिखाई देती थी। पराधीनता तो थी ही, स्वाधीनता के लिए प्रयत्न करने का आत्मविश्वास भी नष्ट प्राय: सा हो गया था।
इस बौद्घिक, मानसिक व आर्थिक दासता की पृष्ठभूमि में 11 सितम्बर 1893 को शिकागो की सर्वपंथ सभा में हुए दिग्विजयी चमत्कार को समझा जाना चाहिए। सनातन हिंदू धर्म का गर्वोन्नत प्रतिनिधित्व करते हुए युवा संन्यासी स्वामी विवेकानन्द ने प्राचीन ऋषियों के दिव्य सम्बोधन जब समूचे विश्व के सामने रखे तब केवल सभागार में बैठे 7000 श्रोता ही नहीं अपितु पूरा अमरीका बंधुत्व भाव से अनुप्राणित हो गया। उपस्थितों को आध्यात्मिक अनूभूतियां होने लगीं। किसी ने कहा-‘अमरीका निवासी मेरे प्यारे भगिनी और बंधु, इन पांच शब्दों को सुनकर हमारे शरीर में विद्युत तरंग सी दौड़ने लगी थी।’ किसी ने अपनी दैनंदिनी मे लिखा,  ‘मुझे मेरा खोया भाई मिल गया।’ वैसे बंधुत्व के संबोधन का प्रयोग करने वाले स्वामी विवेकानंद उस दिन की सभा के पहले वक्ता नहीं थे। उनसे पूर्व महाबोधि सोसायटी के प्रतिनिधि श्रीलंका से पधारे धम्मपाल अंगिकारा, भारत से ही थियोसॉफिकल सोसायटी का प्रतिनिधित्व कर रहे प्रताप चंद्र मजूमदार तथा जापान के एक बौद्घ भिक्षु ने लगभग ऐसे ही संबोधन से सभा को संबोधित किया था। उसी समय लगभग आधे घंटे के उपरांत चौथी बार यह संबोधन सुनने के बाद श्रोताआें ने ऐसी अनूठी प्रतिक्रिया दी थी। इसके पीछे का कारण केवल नावीन्य नहीं था, अपितु वैदिक ऋषियों की परंपरा से उत्पन्न भारतीय संस्कृती के एकात्म जीवन दर्शन की प्रत्यक्षानुभूती थी। इसीलिए यह केवल एक व्यक्ति का जागतिक मंच पर प्रतिष्ठित होना नहीं था, अपितु चिरपुरातन नित्यनूतन हिंदू जीवन पद्घति की विश्वविजय थी।
वर्तमान संचार व्यवस्था के समान  संवाद के ज्यादा साधन उपलब्ध न होते हुए भी यह समाचार किसी वडवानल की भांति प्रथम अमरीका, तत्पश्चात ्यूरोप व अंतत: भारत में प्रसारित हुआ। इस अद्भुत घटना के मात्र एक वर्ष के अंदर ही देश का सामान्य किसान भी इसके बारे में चर्चा करने लगा था। इस दिग्विजय की घटना ने भारत के मानस को झकझोर दिया और यह सुप्त देश जागृत हुआ। ‘हम भी कुछ  कर सकते हैं,’ ‘हमारे अपने धर्म, संस्कृती, परंपरा में विश्वविजय की क्षमता हंै’, इसका भान आत्मग्लानि से ग्रसित राष्टÑ देवता को अपनी घोर निद्रा से बाहर लाने के लिए पर्याप्त था। अत: शिकागो की परिषद् में हुई आध्यात्मिक दिग्विजय को हम भारत की सर्वतोमुखी विश्वविजय का शुभारंभ कह सकते हैं।
इतिहास इस घटना के गांभीर्य को भले ही अभी पूर्णता से न समझा पाया हो और संभवत: आने वाले निकट भविष्य में भारत की विजय के पश्चात इसे जान सके, किंतु स्वामी विवेकानंद स्वयं अपने पराक्रम को पहचानते थे। अत: 2 जनवरी 1897 को रामनाड में बोलते हुए उन्होंने अपने अभूतपूर्व स्वागत के प्रत्युत्तर का प्रारंभ इन शब्दों से किया,‘सुदीर्घ रजनी अब समाप्तप्राय: सी जान पड़ती है, यह काली लंबी रात अब टल गयी, नभ में उषा काल की लाली ने समूचे विश्व के सम्मुख यह उद्घोष कर दिया है कि यह सोया भारत अब जाग उठा है।’
1897 में अंग्रेजों की पराधीनता से ग्रस्त भारत के प्रति स्वामी विवेकानन्द का अद्भुत आत्मविश्वास तो देखिए कि वे आगे कहते हैं, ‘केवल चक्षुहीन देख नहीं सकते और विक्षिप्त बुद्घि समझ नहीं सकते कि यह सोया हुआ अतिकाय अब जाग उठा है। अब यह नहीं सोयेगा। विश्व की कोई शक्ति इसे तब तक परास्त नहीं कर सकती जब तक यह अपने दायित्व को न भुला दे।’ स्वामी विवेकानंद ने मृतप्राय: से हिंदू समाज के सम्मुख विश्व विजय का उदात्त लक्ष्य रखा।
एक स्थान पर बोलते हुए उन्होंने स्पष्टता से कहा है, ‘कोई अन्य नहीं व तनिक भी कम नहीं, केवल विश्वविजय ही मेरा लक्ष्य है।’ जब हम स्वामी विवेकानन्द की 150वीं जयंती को पूरे विश्व में तथा भारत के गांव-गांव में मना रहे हैं तब हमें भारत की इस आध्यात्मिक विश्वविजय के जीवनलक्ष्य का पुन:स्मरण करना चाहिए। स्वतंत्रता के पश्चात हमारी शिथिलता ने हमारी नयी पीढ़ी को राष्टÑध्येय के प्रति विस्मृत कर दिया है। भारत के स्वातंत्र्य का अर्थ ही वर्तमान पीढ़ी भूल गई है। इस कारण जब थोड़े से देशाभिमान से आज का युवा प्रेरित भी हो जाए तो भारत को विश्व का सबसे अमीर देश बनाने का स्वप्न देखता है। वैश्विक महाशक्ति का स्वप्न वर्तमान पीढ़ी आर्थिक महासत्ता के रूप में ही देखती है। यह भारत के स्वभावानुरूप नहीं हैं। और इसीलिए स्वामी विवेकानन्द को अभिप्रेत विश्वविजय भी नहीं है। स्वामी विवेकानन्द ने स्पष्ट कहा है, ‘भारत विश्वविजय करेगा यह निश्चित है।  किन्तु यह विजय राजनीतिक, सामाजिक अथवा आर्थिक बल से नहीं होगी, अपितु आत्मा की शक्ति से ही होगी।’ स्वामी जी ने सिंह गर्जना की थी, ‘उठो भारत! अपनी आध्यात्मिक शक्ति से संपूर्ण विश्व पर विजय   प्राप्त करो।’
आर्थिक सम्पन्नता, कूटनीतिक सम्प्रभुता इस आध्यात्मिक जगत्गुरु पद के प्रतिबिम्ब मात्र होंगे। अत: प्रयत्न राष्टÑ की संस्कृति के आध्यत्मिक जागरण के लिए होने चाहिए। आर्थिक व राजनीतिक समृद्घि तो इस सांस्कृतिक पुनर्जागरण के सहज सहउत्पाद होंगे। स्वामी विवेकानन्द की सार्द्धशती पर हमारी सम्यक श्रद्घाञ्जलि यह होगी कि हम चिरविजय की अक्षय आकांक्षा को राष्टÑजीवन में पुन: जागृत कर दें।  भारत का स्वधर्म, ज्ञान प्रवण अध्यात्म है और इसका व्यावहारिक आचरण जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में धर्म संस्थापना है। अत: 17वीं शताब्दी के प्रारंभ तक विश्व की सकल संपदा के 66 प्रतिशत हिस्से का उत्पादन करने वाला समृद्घ राष्टÑ विश्व व्यापार का आकांक्षी नहीं रहा। हर्षवर्धन, चंद्रगुप्त, समुद्रगुप्त, विक्रमादित्य आदि की पराक्रमी सेनाओं ने राजनीतिक विजय के लिए कभी राष्टÑ की सीमाओं का उल्लंघन नहीं किया। भारत न तो अपने सामरिक सामर्थ्य से जगत को पदाक्रांत करने की अभिलाषा रखता है, न ही अपनी आर्थिक सम्पत्ति से अन्य राष्ट्रों को बाजार बनाकर उनका शोषण करना चाहता है। भारत की तो सहस्त्राब्दियों से एक ही आकांक्षा रही है कि विश्व की मानवता को ऋषियों की वैज्ञानिक जीवनपद्घति की सीख दे।
आइए, स्वामी जी की 150वी जयंती के उपलक्ष्य में संकल्प लें कि अपने जीते जी इस दृष्टि को जीवंत करने का प्राणपण से पराक्रम करेंगे
 मुकुल कानिटकर (लेखक भारतीय शिक्षण मण्डल के
अ़ भा़ सह संगठन मंत्री हैं)

हिन्दुत्व के योद्धा संन्यासी


मानव जाति के इतिहास में एक युग की शुरुआत 11  सितम्बर, 1883 को शिकागो (अमरीका) के कोलम्बस हॉल में हुई थी। इसके सूत्रधार थे स्वामी विवेकानन्द। हिन्दू धर्म के पुनरुथान के लिए एक महाशक्ति-उनके दिवंगत गुरु रामकृष्ण परमहंस की शक्ति-स्वामी विवेकानंद में घनीभूत हुई थी।
आयरलैण्ड की विदूषी महिला श्रीमती ऐनी बीसेन्ट, जो बाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्षा बनीं (1917), ने हिन्दुत्व की वैचारिक दिग्विजय का सूत्रपात शिकागो धर्म महासभा में अपनी आंखों से देखा था और उन्होंने स्वामी विवेकानन्द का जो वर्णन किया, वह अद्भुत है- ‘विवेकानन्द संन्यासी के नाम से विख्यात हैं, पर वास्तव में हैं वे एक योद्धा। दूसरे उपस्थित प्रतिनिधियों में उम्र में सबसे छोटे होने पर भी प्राचीनतम व श्रेष्ठतम सत्य की जीती जागती मूर्ति। उन्नत पाश्चात्य जगत में दूत का काम करने के लिए अपनी योग्यतम संतान को नियुक्त कर भारतमाता गौरवान्वित हुई थीं।’
उनकी शिकागो वक्तृत्वता के प्रभाव के बारे में समकालीन समाचारपत्र दि प्रेस आॅफ अमेरिका ने लिखा था- ‘हिन्दू दर्शन व विज्ञान में निष्णात स्वामी विवेकानन्द ने अपने भाषणों द्वारा विराट् सभा को मुग्ध कर दिया। तमाम ईसाई चर्चों के पादरी वहां उपस्थित थे। पर स्वामी जी की वाक्पटुता की आंधी में उनके सभी वक्तव्य- विषय बह गए।’
‘न्यूयार्क हैरल्ड’ नामक पत्र ने लिखा- ‘शिकागो धर्म महासभा में विवेकानन्द ही सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति हैं। उन्हें सुनकर ऐसा लगता है कि धर्म के मामले में भारत जैसे समुन्नत राष्ट्र में हमारे (अर्थात् ईसाई मत के) मिशनरियों को भेजना बुद्धिहीनता है।' मेरी लुई बर्क नामक अमरीकी लेखिका, जो बाद में स्वामी जी की शिष्या बनकर भगिनी गार्गी कहलाईं, ने लिखा- ‘धर्म महासभा के हजारों श्रोताओं की दृष्टि में स्वामी जी ईसाई चर्चों की नीरस-विचार शून्य बातों के विरोध में खड़े हुए एक विजयी            योद्धा थे।'
 इन्हीं श्रोताओं में एक थे सर हीरम मैक्सिम, जिन्होंने 1883 में पहली स्वचालित मशीनगन का आविष्कार कर पर्याप्त ख्याति अर्जित की थी। उन्होंने लिखा- ‘...अमरीका के प्रोटेस्टैंट ईसाइयों ने सोचा था कि अन्य पंथों को धर्म महासभा में परास्त करना उनके लिए बाएं हाथ का खेल है और इस पूरे आत्मविश्वास के साथ, कि ‘देखो तो सही, तुम्हारा किस तरह खात्मा करते हैं’, उन्होंने सम्मेलन शुरू किया। किन्तु जब विवेकानन्द बोले तब वे जान गए कि उनका पाला एक नेपोलियन के साथ पड़ा है। स्वामी जी ने बीज बो दिया था तथा अमरीकी लोग सोचने लगे थे कि इस देवदूत के देश में मतांतरण करने को पादरी भेजने के लिए हम अपने पैसों का अपव्यय क्यों करें। परिणाम स्पष्ट था- मिशनरियों की वार्षिक आय दस लाख डॉलर से भी अधिक घट गयी। मिशनरी मतान्तरण पर कमरतोड़ चोट पड़ चुकी थी।
अपने एक मद्रासी शिष्य को स्वामी जी ने 28, जून 1894 को एक पत्र में लिखा- ‘मिशनरी लोग घर-घर जाकर प्रयास करते हैं कि मेरे अमरीकी मित्र मुझे त्याग दें? एक तो ये लोग मेरे पीछे पड़े हुए थे, साथ ही यहां के कुछ हिन्दू भी ईर्ष्या के कारण उनका साथ दे रहे हैं।’21 सितम्बर, 1894 को वे फिर लिखते हैं- ‘आजकल यहां कट्टरपंथी ईसाई ‘त्राहिमाम’ मचाये हुए हैं। वे मुझे यम जैसा देखते हैं और कहते हैं, यह पापी कहां से टपक पड़ा, देशभर के नर-नारी इसके पीछे लग फिरते हैं। यह कट्टरपंथियों की जड़ ही काटना चाहता है। समय आएगा, जब कट्टरपंथियों का दम निकल जाएगा। अपने यहां बुलाकर बेचारों ने एक मुसीबत मोल ले ली है, ये अब यही महसूस करने लगे हैं।’
सत्य ही कहा है कि एक विवेकानन्द ही जान सकता है कि विवेकानन्द ने क्या किया।  फिर केवल पश्चिम ही क्यों, स्वदेश लौटकर यहां जो राष्ट्रभक्ति की लहर उन्होंने पैदी की, जिसके ज्वार ने अंग्रेजी साम्राज्य डुबोया और जिसमें आज तक भारतवासी अवगाहन कर रहे हैं, वह उन्हें सार्वकालिक श्रेष्ठतम राष्ट्रसाधकों की श्रेणी में ख    करता है। 
अजय   मित्तल

स्वामी विवेकानन्द का शिकागो धर्मसंसद में ऐतिहासिक भाषण



शिकागो धर्मसंसद में स्वामी विवेकानन्द का ऐतिहासिक भाषण

अमेरिकावासी बहनों और भाइयों ,
आपने जिस सौहार्द और स्नेह के साथ हम लोगों का स्वागत किया है , उसके प्रति आभार प्रकट करने के निमित्त खडा होते समय मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से पूर्ण हो रहा है । संसार में सन्यासियों की सबसे प्राचीन परम्परा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूँ , धर्मो की माता की ओर से धन्यवाद देता हूँ और सभी सम्प्रदायों एवं मतों के कोटि - कोटि हिन्दुओं की ओर से भी धन्यवाद देता हूँ । मैं इस मंच पर बोलने वाले उन कतिपय वक्ताओं के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ जिन्होंने प्राची के प्रतिनिधियों का उल्लेख करते समय आपको यह बताया है कि सुदूर देशों के ये लोग सहिष्णुता का भाव विविध देशों में प्रसारित करने के गौरव का दावा कर सकते है ।
मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति दोनों की ही शिक्षा दी है । हम लोग सब धर्मो के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते वरन् समस्त धर्मो को सच्चा मानकर स्वीकार करते है । मुझे एक ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मो और देशों के उत्पीडितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है । मुझे आपको यह बताते हुये गर्व होता है कि हमने अपने वक्ष में यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट अंश को स्थान दिया था , जिन्होंने दक्षिण भारत जाकर उसी वर्ष शरण ली थी जिस वर्ष उनका पवित्र मन्दिर रोमन जाति के अत्याचार से धूल में मिला दिया गया था । ऐसे धर्म का अनुयायी होने मे मैं गर्व का अनुभव करता हूँ जिसने महान जरथुस्त जाति के अवशिष्ट अंश को शरण दी और जिसका पालन वह अब तक कर रहे है । भाइयों , मैं आप लोगों को एक स्तोत्र की कुछ पंक्तियाँ सुनाता हूँ जिसकी आवृति मैं अपने बचपन से करता रहा हूँ और जिसकी आवृति प्रतिदिन लाखों मनुष्य किया करते हैं -
रूचीता वैचित्र्यादृजुकटिल नाना पथजुषाम् ।
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णक इव ।।
जैसे विभिन्न भिन्न - भिन्न स्रोतों से होकर समुन्द्र में मिल जाती है , उसी प्रकार हे प्रभु ! भिन्न रूचि के अनुसार विभिन्न टेडे - मेढे अथवा सीधे रास्ते से जाने वाले लोग अन्त में तुझमें ही आकर मिल जाते है । यह सभा जो अभी तक आयोजित सर्वश्रेष्ठ पवित्र सम्मेलनों में से एक है स्वतः ही गीता के इस अद्भुत उपदेश का प्रतिपादन एवं जगत् के प्रति उसकी घोषणा है -
ये यथा मां प्रपद्यते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
मम वर्त्मनुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ।।
जो कोई मेरी ओर आता है चाहे वह किसी भी प्रकार से हो मैं उसको प्राप्त होता हूँ लोग भिन्न - भिन्न मार्ग द्वारा प्रयत्न करते हुये अन्त में मेरी ही ओर आते है ।
साम्प्रदायिकता , हठधर्मिता और उनकी वीभत्स वंशधर धर्मान्धता इस सुन्दर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी है । वे पृथ्वी को हिंसा से भरती रही है , उसको बारम्बार मानवता के रक्त से नहलाती रही है , सभ्यताओं को विध्वस्त करती और पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही है । यदि ये वीभत्स दानवी नहीं होती , तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अन्नत हो गया होता । पर अब उनका समय आ गया है और मैं आन्तरिक रूप से आशा करता हूँ कि आज सुबह इस सभा के सम्मान में जो घण्टा ध्वनि हुई है , वह समस्त धर्मान्धता का , तलवार या लेखनी के द्वारा होने वाले सभी उत्पीडनों का तथा एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होने वाले मानवों की पारस्परिक कटुताओं का मृत्यु - निनाद सिद्ध हो ।

शिकागो के भाषणों की ओडियो MP 3  के लिए लिंक
- http://roopkt.blogspot.in/2006/07/blog-post.html

Meaning Of Lord GANESHA - Neena sharma



 बहुत सारे गणेशजी अपने अपने जजमानों के घर प्रस्थान कर गये हें। कल गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक भक्तों के साथ रहेगे ।
Neena sharma
Meaning Of Lord GANESHA
G- Get
A- Always
N- New
E- Energy
S- Spirit &
H- Happiness
A- At All Times!
Happy Ganesh Chaturthi!
विघ्नहर्ता,मंगलकर्ता आप सब के जीवन में नूतन उत्साह का संचार करे समस्त विपत्तियों से आप सबकी और आपके परिवार की रक्षा करे...हे गणपति बप्पा सारी बुराइयो से दूर रख कर आप हमें अपने चरणों में स्थान दे...!!!
गणपति बाप्पा मोरया
मंगल मूर्ति मोरया
सिद्धि विनायक चतुर्थी |
Siddhi Vinayaka Chaturthi 2013 (Vinayak Chaturthi Vrat Method) Ganesh Chaturthi Vrat Katha in Hindi--

भाद्रपद मास, शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन सिद्धि विनायक व्रत किया जाता है. हिन्दू शास्त्रों के अनुसार वर्ष 2013, में यह व्रत 9 सितम्बर, सोमवार के दिन किया जायेगा. इस व्रत के फल इस व्रत के अनुसार प्राप्त होते है. भगवान श्री गणेश को जीवन की विध्न-बाधाएं हटाने वाला कहा गया है. और श्री गणेश सभी कि मनोकामनाएं पूरी करते है. गणेशजी को सभी देवों में सबसे अधिक महत्व दिया गया है. कोई भी नया कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व भगवान श्री गणेश को याद किया जाता है.
विनायक चतुर्थी व्रत विधि (Vinayak Chaturthi Fast Method)

श्री गणेश का जन्म भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन हुआ था. इसलिये इनके जन्म दिवस को व्रत कर श्री गणेश जन्मोत्सव के रुप में मनाया जाता है. जिस वर्ष में यह व्रत रविवार और मंगलवार के दिन का होता है. उस वर्ष में इस व्रत को महाचतुर्थी व्रत कहा जाता है.

इस व्रत को करने की विधि भी श्री गणेश के अन्य व्रतों के समान ही सरल है. गणेश चतुर्थी व्रत प्रत्येक मास में कृ्ष्णपक्ष की चतुर्थी में किया जाता है,. पर इस व्रत की यह विशेषता है, कि यह व्रत सिद्धि विनायक श्री गणेश के जन्म दिवस के दिन किया जाता है. सभी 12 चतुर्थियों में माघ, श्रावण, भाद्रपद और मार्गशीर्ष माह में पडने वाली चतुर्थी का व्रत करन विशेष कल्याणकारी रहता है.

व्रत के दिन उपवासक को प्रात:काल में जल्द उठना चाहिए. सूर्योदय से पूर्व उठकर, स्नान और अन्य नित्यकर्म कर, सारे घर को गंगाजल से शुद्ध कर लेना चाहिए. स्नान करने के लिये भी अगर सफेद तिलों के घोल को जल में मिलाकर स्नान किया जाता है. तो शुभ रहता है. प्रात: श्री गणेश की पूजा करने के बाद, दोपहर में गणेश के बीजमंत्र ऊँ गं गणपतये नम: का जाप करना चाहिए.

इसके पश्चात भगवान श्री गणेश धूप, दूर्वा, दीप, पुष्प, नैवेद्ध व जल आदि से पूजन करना चाहिए. और भगवान श्री गणेश को लाल वस्त्र धारण कराने चाहिए. अगर यह संभव न हों, तो लाल वस्त्र का दान करना चाहिए.

पूजा में घी से बने 21 लड्डूओं से पूजा करनी चाहिए. इसमें से दस अपने पास रख कर, शेष सामग्री और गणेश मूर्ति किसी ब्राह्मण को दान-दक्षिणा सहित दान कर देनी चाहिए.
विनायक चतुर्थी पर्व | Vinayaka Chaturthi Festival

विनायक चतुर्थी व्रत भगवान श्री गणेश का जन्म उत्सव का दिन है. यह दिन गणेशोत्सव के रुप में सारे विश्व में बडे हि हर्ष व श्रद्वा के साथ मनाया जाता है. भारत में इसकी धूम यूं तो सभी प्रदेशों में होती है. परन्तु विशेष रुप से यह महाराष्ट में किया जाता है. इस उत्सव को महाराष्ट का मुख्य पर्व भी कहा जा सकता है. लोग मौहल्लों, चौराहों पर गणेशजी की स्थापना करते है. आरती और भगवान श्री गणेश के जयकारों से सारा माहौळ गुंज रहा होता है. इस उत्सव का अंत अनंत चतुर्दशी के दिन श्री गणेश की मूर्ति समुद्र में विसर्जित करने के बाद होता है.
गणेश चतुर्थी व्रत कथा | Ganesh Chaturthi Vrat Story

श्री गणेश चतुर्थी व्रत को लेकर एक पौराणिक कथा प्रचलन में है. कथा के अनुसार एक बार भगवान शंकर और माता पार्वती नर्मदा नदी के निकट बैठे थें. वहां देवी पार्वती ने भगवान भोलेनाथ से समय व्यतीत करने के लिये चौपड खेलने को कहा. भगवान शंकर चौपड खेलने के लिये तो तैयार हो गये. परन्तु इस खेल मे हार-जीत का फैसला कौन करेगा?

इसका प्रश्न उठा, इसके जवाब में भगवान भोलेनाथ ने कुछ तिनके एकत्रित कर उसका पुतला बना, उस पुतले की प्राण प्रतिष्ठा कर दी. और पुतले से कहा कि बेटा हम चौपड खेलना चाहते है. परन्तु हमारी हार-जीत का फैसला करने वाला कोई नहीं है. इसलिये तुम बताना की हम मे से कौन हारा और कौन जीता.

यह कहने के बाद चौपड का खेल शुरु हो गया. खेल तीन बार खेला गया, और संयोग से तीनों बार पार्वती जी जीत गई. खेल के समाप्त होने पर बालक से हार-जीत का फैसला करने के लिये कहा गया, तो बालक ने महादेव को विजयी बताया. यह सुनकर माता पार्वती क्रोधित हो गई. और उन्होंने क्रोध में आकर बालक को लंगडा होने व किचड में पडे रहने का श्राप दे दिया. बालक ने माता से माफी मांगी और कहा की मुझसे अज्ञानता वश ऎसा हुआ, मैनें किसी द्वेष में ऎसा नहीं किया. बालक के क्षमा मांगने पर माता ने कहा की, यहां गणेश पूजन के लिये नाग कन्याएं आयेंगी, उनके कहे अनुसार तुम गणेश व्रत करो, ऎसा करने से तुम मुझे प्राप्त करोगें, यह कहकर माता, भगवान शिव के साथ कैलाश पर्वत पर चली गई.

ठिक एक वर्ष बाद उस स्थान पर नाग कन्याएं आईं. नाग कन्याओं से श्री गणेश के व्रत की विधि मालुम करने पर उस बालक ने 21 दिन लगातार गणेश जी का व्रत किया. उसकी श्रद्वा देखकर गणेश जी प्रसन्न हो गए. और श्री गणेश ने बालक को मनोवांछित फल मांगने के लिये कहा. बालक ने कहा की है विनायक मुझमें इतनी शक्ति दीजिए, कि मैं अपने पैरों से चलकर अपने माता-पिता के साथ कैलाश पर्वत पर पहुंच सकूं और वो यह देख प्रसन्न हों.

बालक को यह वरदान दे, श्री गणेश अन्तर्धान हो गए. बालक इसके बाद कैलाश पर्वत पर पहुंच गया. और अपने कैलाश पर्वत पर पहुंचने की कथा उसने भगवान महादेव को सुनाई. उस दिन से पार्वती जी शिवजी से विमुख हो गई. देवी के रुष्ठ होने पर भगवान शंकर ने भी बालक के बताये अनुसार श्री गणेश का व्रत 21 दिनों तक किया. इसके प्रभाव से माता के मन से भगवान भोलेनाथ के लिये जो नाराजगी थी. वह समाप्त होई.
यह व्रत विधि भगवन शंकर ने माता पार्वती को बताई. यह सुन माता पार्वती के मन में भी अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा जाग्रत हुई. माता ने भी 21 दिन तक श्री गणेश व्रत किया और दुर्वा, पुष्प और लड्डूओं से श्री गणेश जी का पूजन किया. व्रत के 21 वें दिन कार्तिकेय स्वयं पार्वती जी से आ मिलें. उस दिन से श्री गणेश चतुर्थी का व्रत मनोकामना पूरी करने वाला व्रत माना जाता है.
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MODAK GANPATI JI KI PASAND KAUN BANAYEGA ?
---गणपति जी की मनपसंद मिठाई मोदक कौन बनाकर खिलायेगा ?--लीजिये विधि --नीना शर्मा

मोदक (Steamed Dessert Dumplings) महाराष्ट्र में खाया जाने वाला, गणेश जी का प्रिय व्यंजन है. महाराष्ट्र में, गणेश पूजा के अवसर पर मोदक (Rice modak) घर घर में बनाया जाता है. मोदक बनाने में घी तो लगता ही नही इसलिये आप इसे जितना चाहें उतना खा सकते हैं.
आवश्यक सामग्री - Ingredients for Modak

चावल का आटा - 2 कप
गुड़ - 1 .5 कप (बारीक तोड़ा हुआ )
कच्चे नारियल - 2 कप ( बारीक कद्दूकस किया हुआ )
काजू - 4 टेबल स्पून ( छोटे छोटे टुकड़ों में काट लीजिये )
किशमिश - 2-3 टेबल स्पून
खसखस - 1 टेबल स्पून ( गरम कढ़ाई में डालकर हल्का सा रोस्ट कर लीजिये)
इलाइची - 5 -6( छील कर कूट लीजिये )
घी - 1 टेबल स्पून
नमक - आधा छोटी चम्मच

विधि - How to make Modak-गुड़ और नारियल को कढ़ई में डाल कर गरम करने के लिये रखें. चमचे से चलाते रहें, गुड़ पिघलने लगेगा चमचे से लगातार चला कर भूने, जब तक गुड़ और नारियल का गाढ़ा मिश्रण न बन जाय. इस मिश्रण में काजू, किशमिश, खसखस और इलाइची मिला दें. यह मोदक में भरने के लिये पिठ्ठी तैयार है2 कप पानी में 1छोटी चम्मच घी डाल कर गरम करने रखिये. जैसे ही पानी में उबाल आ जाय, गैस बन्द कर दीजिये और चावल का आटा और नमक पानी में डाल कर चमचे से चला कर अच्छी तरह मिला दीजिये और इस मिश्रण को 5 मिनिट के ढक कर रख दीजिये.

अब चावल के आटे को बड़े बर्तन में निकाल कर हाथ से नरम आटा गूथ कर तैयार कर लीजिये. यदि आटा सख्त लग रहा हो तो 1 - 2 टेबल स्पून पानी और डाल सकते हैं, एक प्याली में थोड़ा घी रख लीजिये. घी हाथों में लगाकर आटे को मसलें, जब तक कि आटा नरम न हो जाय. इस आटे को साफ कपड़े से ढक कर रखें.हाथ को घी से चिकना करें और गूथे हुये चावल के आटे से एक नीबू के बराबर आटा निकाल कर हथेली पर रखें, दूसरे हाथ के अँगूठे और उंगलियों से उसे किनारे पतला करते हुये बढ़ा लीजिये, उंगलियों से थोड़ा गड्डा करें और इसमें 1 छोटी चम्मच पिठ्ठी रखें. अँगूठे और अँगुलियों की सहायता मोड़ डालते हुये ऊपर की तरफ चोटी का आकार देते हुये बन्द कर दीजिये. सारे मोदक इसी तरह तैयार कर लीजिये.किसी चौड़े बर्तन में 2 छोटे गिलास पानी डाल कर गरम करने रखें. जाली स्टैन्ड लगाकर चलनी में मोदक रख कर भाप में 10 - 12 मिनिट पकने दीजिये. आप देखेंगे कि मोदक स्टीम में पककर काफी चमक दार लग रहे हैं. मोदक तैयार हैं.
नोट : आप चाहो तो तेल में तल के भी बना सकते हो जैसा आप को पसंद हो
मोदक (Modak) को प्लेट में निकाल कर लगायें, और गरमा गरम परोसिये और खाइये.........गणपति बापा मोरिया ........ॐ गणेशाये नम :
नीना शर्मा