बुधवार, 2 अक्तूबर 2013

मां त्रिपुरा सुंदरी,बांसवाड़ा, राजस्थान



मां त्रिपुरा सुंदरी
राजस्थान में बांसवाड़ा से लगभग 14 किलोमीटर दूर तलवाड़ा ग्राम से मात्र 5 किलोमीटर की दूरी पर ऊंची रौल श्रृखलाओं के नीचे सघन हरियाली की गोद में उमराई के छोटे से ग्राम में माताबाढ़ी में प्रतिष्ठित है मां त्रिपुरा सुंदरी। कहा जाता है कि मंदिर के आस-पास पहले कभी तीन दुर्ग थे। शक्तिपुरी, शिवपुरी तथा विष्णुपुरी नामक इन तीन पुरियों में स्थित होने के कारण देवी का नाम त्रिपुरा सुन्दरी पड़ा
तीनों पुरियों में स्थित देवी त्रिपुरा के गर्भगृह में देवी की विविध आयुध से युक्त अठारह भुजाओं वाली श्यामवर्णी भव्य तेजयुक्त आकर्षक मूर्ति है। इसके प्रभामण्डल में नौ-दस छोटी मूर्तियां है जिन्हें दस महाविद्या अथवा नव दुर्गा कहा जाता है। मूर्ति के नीचे के भाग के संगमरमर के काले और चमकीले पत्थर पर श्री यंत्र उत्कीण है, जिसका अपना विशेष तांत्रिक महत्व हैं । मंदिर के पृष्ठ भाग में त्रिवेद, दक्षिण में काली तथा उत्तर में अष्ट भुजा सरस्वती मंदिर था, जिसके अवशेष आज भी विद्यमान है। यहां देवी के अनेक सिद्ध उपासकों व चमत्कारों की गाथाएं सुनने को मिलती हैं।

पर्व उत्सव

मंदिर शताब्दियों से विशिष्ट शक्ति साधकों का प्रसिद्ध उपासना केन्द्र रहा है। इस शक्तिपीठ पर दूर-दूर से लोग आकर शीष झुकाते है। नवरात्रि पर्व पर इस मंदिर के प्रागण में प्रतिदिन विशेष कार्यक्रम होते है, जिन्हें विशेष समारोह के रूप में मनाया जाता है। नौ दिन तक प्रतिदिन त्रिपुरा सुंदरी की नित-नूतन श्रृंगार की मनोहारी झांकी बरबस मन मोह लेती है। चेत्र व वासन्ती नवरात्रि में भव्य मूर्ति के दर्शन प्राप्त करने दूरदराज से लोग आते हैं। चौबीसों घंटे भजन कीर्तन जागरण, साधना, उपासना, जप व अनुष्ठान की लहर में डूबा हर भक्त हर पल केवल मात की जय को उद्घोष करता दिखाई देता है। प्रथम दिवस शुभ मुहूर्त में मंदिर में घट स्थापना की जाती है। शुद्ध स्थान पर गोबर मिट्टी बिछा कर उसमें जौ या गेहूं बोये जाते हैं। इसके समीप ही अखण्ड ज्योति जलाई जाती है। मिट्टी-गोबर में बोये गए धान पर एक मिट्टी के कलश में जल भर कर रखा जाता है। इसे घट स्थापना कहते हैं। जल कलश के ऊपर मिट्टी के ढ़क्कन में गोबर-मिट्टी रखकर जौ बोये जाते हैं। दो तीन दिन पश्चात्‌ धान के अंकुर फूटते हैं, जिन्हें जवारे कहते हैं। इनके सामने देवी मां के चित्र की धूप, अगरबत्ती, नारियल, पुष्प, रोली, मोली आदि से पूजा करते हैं। नवरात्रि की अष्टमी और नवमीं को यहां हवन होता है। नवमीं या दशहरे पर जवारों को माताजी पर चढ़ाते हैं। तत्पश्चात्‌ पूजा अर्चना करके इस कलश को जवारों सहित माही नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। विसर्जन स्थल पर पुनः एक मेला सा जुटता है, जहां त्रिपुरे माता की जय से समस्त वातावरण गूंज उठता है। अष्टमी पर यहां दर्शनार्थ पहुंचने वालों में राजस्थान के अलावा गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली और महाराष्ट्र के भी लाखों श्रद्धालु शमिल होते है।

श्री मोहन जी भागवत : मानगढ़ धाम



राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक परम पूजनीय मोहन जी भागवत को वागड़ के अमर बलिदानी गोविन्द गुरु की तस्वीर भेंट करते राजस्थान सरकार के पूर्व चिकित्सा एवं स्वास्थ्य राज्य मंत्री श्री भवानी जोशी 
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक परम पूजनीय श्री मोहन जी भागवत ने आज मानगढ़ धाम पहुँच कर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की।




राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक परम पूजनीय श्री मोहन जी भागवत ने  मानगढ़ धाम पहुँच कर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की।

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शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले....।।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक परम पूजनीय श्री मोहन जी भागवत ने आज मानगढ़ धाम पहुँच कर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की।



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दूसरा जलियावाला बाग हत्याकांड
राजस्थान के डूंगरपुर, बांसवाड़ा, दक्षिणी मेवाड़, सिरोही तथा गुजरात व मालवा के मध्य पर्वतीय अंचलों की आबादी प्रमुखतया भीलों और मीणा आदिवासियों की है। इन आदिवासियों में चेतना जागृत करने एवं उन्हें संगठित करने का बीड़ा डूंगरपुर से 23 मील दूर बांसिया गाँव में जन्मे बणजारा जाति के गुरु गोविंद ने उठाया था। गोविन्द गुरु ने आदिवासियों को संगठित करने के लिए संप-सभा की स्थापना की।
संप का अर्थ है एकजुटता, प्रेम और भाईचारा। संप सभा का मुख्य उद्देश्य समाज सुधार था। उनकी शिक्षाएं थी - रोजाना स्नानादि करो, यज्ञ एवं हवन करो, शराब मत पीओ, मांस मत खाओ, चोरी लूटपाट मत करो, खेती मजदूरी से परिवार पालो, बच्चों को पढ़ाओ, इसके लिए स्कूल खोलो, पंचायतों में फैसला करो, अदालतों के चक्कर मत काटो, राजा, जागीरदार या सरकारी अफसरों को बेगार मत दो, इनका अन्याय मत सहो, अन्याय का मुकाबला करो, स्वदेशी का उपयोग करो आदि।
शनैः शनैः यह संपसभा तत्कालीन राजपूताना के पूरे दक्षिणी भाग में फैल गई। यहाँ की रियासतों के राजा, सामंत व जागीरदार में इससे भयभीत हो गए। वे समझने लगे कि राजाओं को हटाने के लिए यह संगठन बनाया गया है। जबकि यह आंदोलन समाज सुधार का था। गुरु गोविंद ने आदिवासियों को एकजुट करने के लिए सन् 1903 की मार्गशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा से गुजरात एवं मेवाड़ की सीमा पर स्थित मानगढ़ पहाड़ी पर धूणी में होम { यज्ञ व हवन } करना प्रारंभ किया जो प्रतिवर्ष आयोजित किया जाने लगा।
7 दिसम्बर 1908 को हजारों भील, मीणा आदि आदिवासी रंगबिरंगी पोशाकों में मानगढ़ पहाड़ी पर हवन करने लगे। इससे डूंगरपुर, बांसवाड़ा और कुशलगढ़ के राजा चिंतित हो उठे। उन्होंने अहमदाबाद में अंग्रेज कमिश्नर ए. जी. जी. को सूचना दे कर बताया कि आदिवासी इनका खजाना लूट कर यहां भील राज्य स्थापित करना चाहते हैं। बंदूकों के साथ फौजी पलटन मानगढ़ पहाड़ी पर आ पहुँची तथा
पहाड़ी को चारों और से घेर लिया एवं अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। पहाड़ी पर एक के बाद एक लाशें गिरने लगी। करीब 1500 आदिवासी मारे गए। अंग्रेजो ने गोविंद गुरु गिरफ्तार कर लिया। यह भीषण नरसंहार इतिहास में दूसरा जलियावाला बाग हत्याकांड के नाम से जाना जाता है। 






 




संघ










स्व. राजेन्द्र प्रसाद वर्मा पुत्र स्व0 गणेशराम जी
माता - कंवरी बाई अभी जीवित हैं।
जन्म 1 मई 1952
ग्राम - रायथल, जिला बूंदी ।
छैः भाई बहनों में सबसे छोटे थे।
किसान परिवार में जन्म हुआ ।
शिक्षा बूंदी एवं कोटा में हुई ।
बी. काम उतीर्ण करने के बाद राजस्थान स्टेट इलेट्रिकसिटि बोर्ड में लगे बाद में पदोन्नति होकर कोटा थर्मल पावर स्टेशन में नियुक्त हुये । हालही में 31 मई 2013 में वे सेवानिवृत हुये थे। 30 अक्टूबर को कोटा से उदयपुर जाते समय सड़क दुर्घटना में निधन हो गया ।
संघ प्रवेश:- 1970में छावनी शाखा कोटा से संघ प्रवेश किया, तब से निरंतर आप मुख्य शिक्षक , कार्यवाह मण्डल कार्यवाह रहते हुये 1985 में तृतीय वर्ष किया,1988 में महानगर शारीरिक प्रमुख, 2000 में विभाग शारीरिक प्रमुख, तत् पश्चात विभाग सेवा प्रमुख पर कार्य करते हुये, 2012 में वै चित्तौड़ प्रांत सह सेवा प्रमुख के दायित्व निर्वहन कर रहे थे।