रविवार, 6 अक्तूबर 2013

राजस्थान की जनता कांग्रेस के सफाये को तैयार है - कौशल





पूजा अर्चना के बाद विधानसभा क्षैत्रों में सुराज संकल्प रथ रवाना
पूर्व सांसद कौशल ने हरी झंडी दिखा कर रवाना किये रथ
राजस्थान की जनता कांग्रेस के सफाये को तैयार है - कौशल

कोटा 06 अक्टूबर । भारतीय जनता पार्टी , राजस्थान प्रदेश की ओर से सभी 200 विधानसभा क्षैत्रों में जनजागरण हेतु खुले मझोले चार पहिया वाहन सुराज संकल्प रथ के नाम से भेजे गये है। इन रथों पर बैनर - पोस्टर लगे हुये हैं। ये रथ प्रत्येक विधानसभा के लिये अलग - अलग हैं तथा लगातार 20 दिन तक विधानसभा क्षैत्र में रह कर जनजागरण करेंगे और आम मतदाताओं से कांग्रेस से कुशासन से मुक्ती  दिला कर सुराज स्थापना का आग्रह करेंगे।
कोटा देहात जिला एवं कोटा शहर जिले के लिये आये रथों को खडे गणेशजी मंदिर के बाहर पूर्जा अर्चना कर पूर्व सांसद रघुवीरसिंह कौशल ने हरी झंडी दिखा कर विधानसभा क्षैत्र हेतु प्रस्थान करवाया । इस अवसर पर कौशल सहित पूर्वमंत्री एवं वरिष्ठ भाजपा नेता हरीकुमार औदिच्य, रामगंजमण्डी से विधायक एवं प्रदेश मंत्री भाजपा चंद्रकांता मेघवाल, जिला अध्यक्ष प्रहलाद पंवार एवं जिला अध्यक्ष श्याम शर्मा ने उपस्थितों को सम्बोधित किया ।
पूर्व सांसद रघुवीरसिंह कौशल ने कहा जनता का मूड कांग्रेस के सफाये का है, बार - बार आ रहे सर्वे परिणाम यह तथ्य उजागर कर रहे हैं। कि देश से और राजस्थान से कांग्रेस साफ होने जा रही है। कार्यकर्ता पूरे परिश्रम से पार्टी को जितानें में जुट जायें।
वरिष्ठ भाजपा नेता हरीकुमार औदिच्य ने कहा जनता और पार्टी के बीच की कडी कार्यकर्ता ही है, पार्टी की बात को लेकर जनता में जायें और कांग्रेस के कष्टकारी शासन से राजस्थान को मुक्ति दिलायें। प्रदेशमंत्री चन्द्रकांता मेघवाल ने कहा हम प्रत्येक बूथ पर कांग्रेस के कुशासन की पोल खोली जायेगी और भाजपा को जिताने की अपील की जावेगी।
भाजपा के कोटा देहात जिला अध्यक्ष प्रहलाद पंवार ने कहा आज रथ आगये हैं , आज से ही हमें जनजागरण में जुट जाना है। मण्डल स्तरों पर रूट तय करके सभी गांवों तक पहुचना है। इसी के साथ गांव गांव चलो अीिायान प्रारथ्भ हो गया है।
भाजपा कोटा शहर जिला अध्यक्ष श्याम शर्मा ने कहा भाजपा की लहर है पूरे देश में पूरे प्रदेश में परिवर्तन की आंधी है। कार्यकर्ता चुनावों के परिणाम पार्टी के पक्ष में लाने में जुट जायें।

भाजपा जिला उपाध्यक्ष अरविन्द सिसौदिया ने बताया कि जयपुर से आये विधानसभा क्षैत्र सुराज संकल्प रथ लगभग 1 बजे खडे गणेशजी मंदिर के बाहर पहुंच गये थे, बाहर ही रथों कीं पूजा अर्चना की गई , रामगंजमण्डी , कोटा उत्तर और कोटा दक्षिण के रथों को वरिष्ठ नेतृत्व ने रथों को हरी झंडी दिखा कर अपने - अपने विधानसभा क्षैत्रों में रवाना किया । इससे पूर्व भाजपा कार्यकर्ता रथों की अगुवाई हेतु खडे गणेशजी मंदिर परिसर के बाहर एकत्र हुये थे।

सिसौदिया ने बताया कि इस अवसर पर पार्टी की ओर से प्रमुख तौर पर जिला महामंत्री कुंजबिहारी गौतम, जिला महामंत्री तुलसीराम नागर, जिला उपाध्यक्ष अरविन्द सिसौदिया, प्रदेश कार्यकारणी सदस्य हीरालाल नागर, कोटा कोपरेटिव बैंक के उपाध्यक्ष नरेन्द्र मोहन गौतम, भाजयूमो के जिला अध्यक्ष लोकेन्द्रसिंह राजावत, युवा मोर्चा जिला अध्यक्ष प्रद्युमनसिंह पौमी, किसान मोर्चा जिला अध्यक्ष ओम मेहता, मण्डल अध्यक्ष नरेश गूजर, मण्डल अध्यक्ष मनीष शर्मा , शहर जिला भाजपा की जिला उपाध्यक्ष शशी शर्मा, शहर जिला प्रवक्ता योगेन्द्र गुप्ता बिल्लू और जिला कार्यकारणी सदस्य किशन पाठक विशेष रूप से मौजूद थे।  चिकित्सा प्रकोष्ठ के जिला संयोजक डाॅ. आर सी गौतम, आई टी प्रकोष्ठ के जिला संयोजक श्याम गौड, मीडिया सेल के सह संयोजक रघुराजसिंह हाडा , जिल कार्यसमिति सदस्य तेजेश शर्मा  सहित बडी संख्या में कार्यकर्ता उपस्थित थे।


अरविन्द सिसौदिया, जिला उपाध्यक्ष
भाजपा जिला कोटा देहात । 9414180151

'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' - आडवाणी

 http://www.lkadvani.in/hin/content/view/378/329/
माननीय लालकृष्ण आडवाणी जी
'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' की अवधारणा में भारत के विभिन्न धर्म अनुयायियों को यह आदेश दिया गया है कि विविधताओं को कायम रखते हुए प्राचीन देश की साझा संस्कृति का आदर करो, गर्व महसूस करो। अन्य राष्ट्र के प्रति निष्ठा न रखी जाए, न ही अन्य धर्मों को झूठा या हीन समझें, बल्कि यह सीखें कि प्रत्येक धर्म की अपनी विशेषताएँ हैं। छल-कपट से, धर्मांतरण के माध्यम से अपने धर्मानुयायियों की संख्या बढ़ाने के लिए धार्मिक स्वतंत्रता का दुरुपयोग न करें। अलगाववाद के प्रचार के प्रयोजन के लिए या धर्मतंत्र की स्थापना के लिए राजनीतिक वर्चस्व प्राप्त करने की कोशिश न करें। 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' का अर्थ इससे न ज्यादा है, न इससे कम।'

सैमुअल हंटिग्टन की पुस्तक ''हू आर वी?'' का मैंने यह सुझाव देने के लिए उल्लेख किया है कि सभी भारतीयों को स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए, 'हम कौन हैं?' अमेरिका से भिन्न हमारा राष्ट्र प्राचीन है। इसका इतिहास मानव सभ्यता के प्रादुर्भाव से प्रारंभ होता है। अमेरिका के विपरीत, हमारी अधिकांश जनसंख्या सदियों से भारत में ही रहतh आ रहh है। जनसंख्या के किसी वर्ग की धार्मिक पहचान बदलने से राष्ट्र की पहचान नहीं बदल सकती। भारत के इतिहास में कभी यहाँ के किसी वर्ग का सामूहिक संहार नहीं किया गया, जैसा अमेरिका में वहाँ के मूल निवासियों के संदर्भ में हुआ। इसलिए यदि चार सौ वर्षों में अमेरिका की भावना वहाँ के लोगों को एकसूत्र में बाँध सकती है तो निश्चित रूप में अधिक संतुलित, दृढ़ तथा अंतर्भूत मानवतावादी 'भारतीयता' की भावना भी हजारों वर्षों से रह रहे विभिन्न धार्मिक, जातीय, भाषायी तथा नस्लीय समूहों को एकता के सूत्र में बाँध सकती है। चूँकि 'इंडियन' शब्द हाल ही की नई विचारधारा पर आधारित है, इसलिए एकीकरण का सिध्दांत 'हिंदुत्व' ही है। उदार विचारों से परिपूर्ण, सहनशील, बहुवादी तथा व्यापक भारतीय परंपरा का यह पर्यायी नाम है। यदि भारत को अ-हिंदु किया गया तो भारत का कोई अस्तित्व ही नहीं रहेगा।

(इस विषय पर पूरा उध्दरण श्री आडवाणी की आत्मकथा से पढ़ें)

हिंदुत्व : 'हम कौन हैं' प्रश्न के लिए भारत का उत्तर

'हिंदुत्व' संकल्पना की व्याख्या के बिना अल्पसंख्यकवाद तथा छद्म पंथनिरपेक्षता पर बहस पूर्ण व कारगर नहीं हो सकती। यह किसी विशिष्ट राजनीतिक पार्टी की विचारधारा नहीं है। चूँकि भाजपा ऐसी एकमात्र राष्ट्रीय पार्टी है, जो कभी भी इसके समर्थन में पीछे नहीं हटी, इसलिए 'हिंदुत्व' को केवल भाजपा की विचाधारा के रूप में देखना सही नहीं है।

अपने पूरे राजनीतिक जीवन में मैंने इस पर बल दिया है कि 'हिंदुत्व' का अर्थ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है। इससे धार्मिक या मजहब आधारित राष्ट्रवाद ध्वनित नहीं होता। 'हिंदुत्व' में 'हिंदू' शब्द सांस्कृतिक अर्थों से जुड़ा है, न कि धार्मिक संदर्भ से। यह संकीर्ण रूप में केवल हिंदुओं के लिए भारतीय राष्ट्रीयता की अवधारणा नहीं है। इसकी जड़ें सांस्कृतिक एकता से ही प्रस्फुटित हुई हैं। हम में से कुछ इस राष्ट्रीयता को 'हिंदुत्व' कहते हैं। पं. दीनदयाल उपाध्याय इसे 'भारतीयता' कहते थे, कुछ अन्य लोग इसे 'इंडियननेस' कहते हैं। मैं इन तीनों शब्दों में कोई अंतर नहीं देखता। ये परस्पर स्थान पर प्रयुक्त किए जा सकते हैं। इसलिए उस समय मुझे दु:ख पहुँचा, जब 'हिंदुत्व' की गलत ढंग से व्याख्या की गई तथा सबसे ज्यादा मार्क्सवादियों ने यह टिप्पणी दी कि स्वयं को हिंदू कहलवाने में उन्हें शर्म आती है।

तथापि, जब सर्वोच्च न्यायालय ने 11 दिसंबर, 1995 को अपने अभूतपूर्व निर्णय में निम्नलिखित टिप्पणी दी, तब इस शब्द के बारे में फैला भ्रम दूर हो गया

   '...हिंदू, हिंदुत्व और हिंदू धर्म का सटीक निश्चित अर्थ नहीं बताया जा सकता। भारतीय संस्कृति और विरासत के अंश को छोड़कर इसके अमूर्त अर्थ को धर्म की सीमाओं में नहीं बाँधा जा सकता। यह भी बताया जाता है कि 'हिंदुत्व' शब्द इस उपमहाद्वीप के लोगों के जीवन जीने के तरीके से अधिक जुड़ा है।

यह ऑंकना कठिन है कि इन निर्णयों (पूर्ववर्ती सर्वोच्च न्यायालय) के बावजूद 'हिंदू धर्म' या 'हिंदुत्व' शब्दों को अमूर्त रूप में संकीर्ण हिंदू कट्टरवाद के अर्थ में स्वीकारा जाए या उसके बराबर रखा जाए।'

     सन् 2004 में मैंने विख्यात अमेरिकी विद्वान् सैमुअल हंटिंग्टन की नई पुस्तक 'हू आर वी?' पढ़ी, जिसमें अमेरिका में व्यापक स्तर पर आप्रवास की पृष्ठभूमि के संबंध में संयुक्त राज्य अमेरिका की राष्ट्रीय पहचान के महत्त्वपूर्ण विषयों पर विचार किया गया है। इस पुस्तक का मूल प्रश्न यह है कि सिकुड़ते विश्व में, भूमंडलीकरण के युग में जहाँ अंतरराष्ट्रीय सीमाओं का अर्थ कम, और कम होता जा रहा है, अमेरिका की पहचान क्या है? उन्होंने इस प्रश्न का जवाब दिया है कि इस देश की पहचान शक्तिशाली 'राष्ट्रीय चेतना' ही है। उनका मानना है कि अमेरिका की सफलता या विफलता में इस चेतना का बहुत ज्यादा महत्त्व है। वस्तुत: भविष्य में एक राष्ट्र के रूप में बने रहने की दृष्टि से भी इस चेतना का अत्यधिक महत्त्व है।

हंटिंग्टन का आग्रह है कि, क्योंकि समूचे विश्व के आप्रवासी यहाँ आ रहे हैं, अमेरिका की सार्वदेशिकता (युनिवर्सलिज्म) इसकी विशिष्ट राष्ट्रीय पहचान को भुलाने का बहाना न हो। उनके अनुसार, अमेरिका की विशिष्टता उसकी 'संस्कृति' पर आधारित है, जिसे उन्होंने 'अमेरिकी धर्म', 'एंग्लोसेंट्रिक, प्रोटेस्टेंट-प्रभावित विचारधारा' के रूप में परिभाषित किया है। यह संस्कृतिस्वतंत्रता, समुदाय की भावना, व्यक्ति का सम्मान, उद्यमिता, कार्य संबंधी आचार तथा सफलता के उपदेश (गोस्पैल) जैसे अमेरिका के मौलिक मूल्यों की रक्षा करती है। इसलिए हंटिंग्टन के तर्कानुसार, यह आशा करना युक्तिसंगत भी है तथा न्यायोचित भी कि हाल ही में यहाँ आकर बसे अप्रवासी लोग अपनी-अपनी पहचानों को सँजोए रखते हुए 'अमेरिका' की विचारधारा में रच-बस जाए और 'अमेरिकनैज' हो जाए।

मुझे संयुक्त राज्य अमेरिका की राष्ट्रीय पहचान के बारे में हंटिंग्टन का पूर्णत: समर्थन नहीं करना है। इस पुस्तक का उल्लेख इसलिए किया गया है कि सभी भारतीयों को स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए, 'हम कौन हैं?' अमेरिका से भिन्न हमारा राष्ट्र प्राचीन है। इसका इतिहास मानव सभ्यता के प्रादुर्भाव से प्रारंभ होता है। पुन: अमेरिका से अलग, हमारी जनसंख्या का बहुमत सदियों से भारत में ही रहता आ रहा है। जनसंख्या के किसी वर्ग की धार्मिक पहचान बदलने से राष्ट्र की पहचान नहीं बदल सकती। भारत के इतिहास में कभी यहाँ के किसी वर्ग का सामूहिक संहार नहीं किया गया, जैसा अमेरिका में वहाँ के मूल निवासियों के संदर्भ में हुआ। इसलिए यदि चार सौ वर्षों में अमेरिका की भावना वहाँ के लोगों को एकसूत्र में बाँध सकती है तो निश्चित रूप में अधिक संतुलित, दृढ़ तथा अंतर्भूत मानवतावादी 'भारतीयता' की भावना भी हजारों वर्षों से रह रहे विभिन्न धार्मिक, जातीय, भाषायी तथा नस्लीय समूहों को एकता के सूत्र में बाँध सकती है। चूँकि 'इंडियन' शब्द हाल ही की नई विचारधारा पर आधारित है, इसलिए एकीकरण का सिध्दांत 'हिंदुत्व' ही है। उदार विचारों से परिपूर्ण, सहनशील, बहुवादी तथा व्यापक भारतीय परंपरा का यह पर्यायी नाम है। यदि भारत को अ-हिंदु किया गया तो भारत का कोई अस्तित्व ही नहीं रहेगा।

रवींद्रनाथ टैगोर के निबंध 'नेशनलिज्म' (राष्ट्रीयतावाद) में भारत की विविधता में एकता की सुबोध व्याख्या देखने को मिली। उन्होंने लिखा है'मैं आपका ध्यान भारत की कठिनाइयों तथा उनपर काबू पाने में इसके संघर्ष की ओर दिलाना चाहता हूँ। उसकी समस्या लघु रूप में पूरे विश्व की समस्या है। भारत का बहुत विशाल क्षेत्र है तथा यहाँ अनेक विविधतापूर्ण जातियाँ हैं। ऐसा लगता है, एक ही भौगोलिक पात्र में अनेक देश समाए हैं। यह यूरोप के एकदम विपरीत है, जहाँ एक देश से अनेक देश बने हैं। इस प्रकार से संस्कृति और वृध्दि की दृष्टि से यूरोप में 'अनेक' की शक्ति है, साथ ही 'एक' की शक्ति भी। इसके विपरीत भारत हमेशा अपनी 'अनेकता' की शिथिलता से तथा 'एकता' की दुर्बलता से ग्रस्त रहा है। सच्ची एकता गोल ग्लोब की तरह होती है। यह ग्लोब घूमता है, लेकिन अपना भार आसानी से सँभालकर रखता है। लेकिन विविधता में कई कोने होते हैं, जिन्हें खींचना पड़ता है तथा पूरी शक्ति से धकेलना पड़ता है। परंतु भारत के पक्ष में यह कहना आवश्यक है कि विविधता उसकी स्वयं की रचना नहीं थी। इतिहास के प्रारंभ से ही उसे विविधता को स्वीकार करना पड़ा। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में यूरोप ने वहाँ के मूल निवासियों को निर्मूल करके अपनी समस्या हल कर ली; लेकिन भारत ने पहले से ही विभिन्न जातियोंनस्लों के प्रति सहिष्णुता बरती तथा समूचे इतिहास में सहिष्णुता की भावना के साथ कार्य किया। भारत सामाजिक एकता के विकास में हमेशा ऐसे एक प्रयोग करता रहा है, जिसके भीतर अलग-अलग लोग एक होकर रहे;  साथ ही, अलग पहचान बनाए रखने की स्वतंत्रता का उपभोग भी करें। यह बंधन यथासंभव ढीला रहा है परंतु परिस्थितियों के अनुसार घनिष्ठ भी। इस बंधन ने यहाँ सामाजिक संघ के रूप में संयुक्त राज्य (युनाइटेड स्टेट्स ऑफ एसोशियल फेडरेशन) को जन्म दिया, जिसका नाम है हिंदुत्व या हिंदुइज्म।

जनसंघ के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण के बावजूद पं. जवाहरलाल नेहरू भी अपने जीवन के अंतिम दौर में 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' की मूलभूत विशेषताओं का समर्थन करने लगे थे। मदुरै में अक्तूबर 1961 में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के अधिवेशन में उन्होंने अनूठा भाषण दिया था। उन्होंने सहस्राब्दियों से भारत को एकता के सूत्र में पिरोनेवाला मुख्य कारक पहचाना। उनके शब्दों में, 'भारत युगों-युगों से तीर्थयात्राओं, तीर्थस्थानों का देश रहा। समूचे देश में आपको प्राचीन स्थान मिलेंगे। हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियों पर बदरीनाथ, केदारनाथ तथा अमरनाथ से दक्षिण में कन्याकुमारी तक आपको तीर्थस्थल मिल जाएँगे। दक्षिण से उत्तर तक तथा उत्तर से दक्षिण तक कौन सी प्रेरणा-शक्ति लोगों को इन महान् तीर्थस्थलों की ओर आकर्षित करती आ रही है? यह एक राष्ट्र की भावना तथा एक संस्कृति की भावना है और इस भावना से हम परस्पर बँधे हुए हैं। हमारे प्राचीन ग्रंथों में कहा गया है कि भारतभूमि उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में समुद्र तक फैली है। सदियों से भारत की यह संकल्पना चली आ रही है तथा इसने हमें परस्पर बाँध रखा है। इस महान् धारणा से प्रभावित होकर लोगों ने इसे 'पुण्यभूमि' माना है। जबकि हमारे यहाँ अनेक साम्राज्य हुए है तथा यहाँ हमारी विभिन्न भाषाएँ प्रचलित रही हैं। यह कोमल बंधन ही हमें अनेक तरीकों से बाँधे रखता है।'

नेहरू ने 'हिंदू' शब्द का इस्तेमाल नहीं किया था। लेकिन मदुरै भाषण में उन्होंने भारत की प्राचीन और अनवरत रूप में स्वयं को नवीकृत करनेवाली संस्कृति को 'कोमल बंधन' के रूप में बताया है, जिसने असीम विविधता को भी 'एक राष्ट्र' तथा 'एक संस्कृति' के रूप में समाविष्ट किया है। वास्तव में मैं यह जानकर विस्मित हूँ कि अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं के बावजूद देश के अधिकांश देशभक्त विचारकों ने 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' पर एक जैसे विचार व्यक्त किए हैं।

यहाँ मैं अन्य महत्त्वपूर्ण टिप्पणी उध्दृत करना चाहूँगा। भारत के प्रमुख संविधान निर्माता डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की संकल्पना के समर्थन में यह टिप्पणी दी थी। वर्ष 1956 में बड़ी संख्या में अपने समर्थकों के साथ उन्होंने बौध्द धर्म की दीक्षा ली थी। उन्होंने कुछ बुराइयों के विरोध में, सबसे ज्यादा तो हिंदू समाज में व्याप्त अस्पृश्यता के विरोध में, बौध्द धर्म अपनाया। उस समय उन्हें अनेकों ने इस्लाम या ईसाई मत में धर्मांतरण के लिए आकर्षित करने का प्रयास किया था। लेकिन उन्होंने ऐसा करने से केवल मना ही नहीं किया, बल्कि बौध्द धर्म अपनाने के संबंध में कारण भी स्पष्ट किया, 'इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाने का अर्थ था भारत की सांस्कृतिक मिट्टी से दूर होना। मैं ऐसा कदापि नहीं चाहता।' 

उपर्युक्त उध्दरण से भारत में इस्लाम और ईसाई धर्म के स्थान के बारे में गलत अर्थ भी निकल सकता है। मैं यहाँ दोहराना चाहूँगा कि मैं इस तथ्य को मानता हूँ और उसपर गर्व महसूस करता हूँ कि भारत बहु-धर्मवाला देश है, जिसमें हमारा संविधान तथा सदियों पुरानी संस्कृति धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करती। मुसलमानों तथा ईसाइयों को अन्य लोगों की तरह समान अधिकार, उत्तरदायित्व तथा अवसर हैं। मैं राष्ट्रीय जीवन के विभिन्न पक्षों को समृध्द बनाने में उनके द्वारा दिए गए महत्त्वपूर्ण योगदान की प्रशंसा करता हूँ। मैं सभी धर्मों का आदर करता हूँ। मैं यहाँ एक उदाहरण देना चाहूँगा। मैं वर्ष 2006 में भारत सुरक्षा यात्रा के दौरान राजस्थान, अजमेर, गया था। मेरी पार्टी के सहयोगियों ने सलाह दी कि मुझे पवित्र हिंदू तीर्थ पुष्कर अवश्य जाना चाहिए। इसके बारे में माना जाता है कि पुष्कर में स्वयं ब्रह्माजी ने झील का सृजन किया था। मैंने झट से 'हाँ' कह दी। लेकिन मैंने उन्हें कहा कि मैं अजमेर में पूजनीय सूफी संत हजरत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह शरीफ** पर भी जाऊँगा। यद्यपि उनमें से कुछ की भौंहें तन गई थीं, लेकिन मैं दोनों तीर्थस्थलों पर गया।

    * वर्ष 2000 में अजमेर दरगाह पर मेरी तीर्थयात्रा के बारे में रिपोर्ट दी गई है'गृहमंत्री एल.के. आडवाणी ने रविवार को हजरत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर प्रार्थना की। स्थानीय मुसलमान इतने भावातिरेक में थे कि उन्हें देखने के लिए बहुत बड़ी भीड़ दरगाह में एकत्र हो गई। भीड़ ने बार-बार अनुरोध किया था कि थोड़ा सा कुछ कहें। आडवाणी मान गए और उन्होंने कहा, 'भारत एक बहु-धर्मवाला देश है तथा सभी धर्मों के लोग अच्छे इनसान बनने की कोशिश करते हैं। इसीलिए प्रत्येक समुदाय इस दरगाह पर आता है। पहले हम नेक इनसान बनें। इसका कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनका आराध्य ईश्वर है या अल्लाह है।' उन्होंने कहा कि 'हालाँकि बीसवीं शताब्दी पश्चिमी जगत् की रही, लेकिन यदि सभी समुदाय एकजुट होकर मिलकर कार्य करेंगे तो निश्चित रूप से इक्कीसवीं शताब्दी भारत की होगी।' इस पर भीड़ ने जवाब दिया, 'आमीन!' (आश्चर्य! आडवाणी ने अजमेर दरगाह पर प्रार्थना की, द टाइम्स ऑफ इंडिया, 4 दिसंबर, 2000)। बाद में जब एक पत्रकार ने मुझसे पूछा कि क्या दरगाह में मेरी यात्रा अपनी छवि को बदलने का प्रयास है, तो मैंने जवाब दिया, 'मेरा दृष्टिकोण हमेशा स्पष्ट रहा है। मैंने पच्चीस वर्ष पहले जो कहा था, आज भी, अब भी मैं वही सब कह रहा हूँ।'

     'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' की अवधारणा में भारत के विभिन्न धर्म अनुयायियों को यह आदेश दिया गया है कि विविधताओं को कायम रखते हुए प्राचीन देश की साझा संस्कृति का आदर करो, गर्व महसूस करो। अन्य राष्ट्र के प्रति निष्ठा न रखी जाए, न ही अन्य धर्मों को झूठा या हीन समझें, बल्कि यह सीखें कि प्रत्येक धर्म की अपनी विशेषताएँ हैं। छल-कपट से, धर्मांतरण के माध्यम से अपने धर्मानुयायियों की संख्या बढ़ाने के लिए धार्मिक स्वतंत्रता का दुरुपयोग न करें। अलगाववाद के प्रचार के प्रयोजन के लिए या धर्मतंत्र की स्थापना के लिए राजनीतिक वर्चस्व प्राप्त करने की कोशिश न करें। 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' का अर्थ इससे न ज्यादा है, न इससे कम।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद - बाळ आपटे




 

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का अर्थ

लेखक: प्रा. बाळ आपटे
(लेखक भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व सांसद हैं)
अनुवादक: रामनयन सिंह

 http://www.pravakta.com/development-means


images1शाब्दिक तौर पर राष्ट्रवाद एक आधुनिक ‘पद’ है। ऐसा माना जाता है कि आधुनिक राष्ट्र-राज्य की अवधारणा फ्रांस की क्रांति (1789) के बाद विकसित हुई। सामाजिक विकास या राजनैतिक सिध्दांत के तौर पर राष्ट्रवाद की संकल्पना आधुनिकता की ऐतिहासिक व्याख्या हो सकती है, लेकिन मूल स्वीकार्य बात यह है कि राष्ट्रों का अस्तित्व प्राचीन काल से था।
किसी राष्ट्र की पहचान एक राष्ट्र के रूप में कैसे होती है? या दूसरे शब्दों में वे क्या घटक हैं, जिनसे राष्ट्र का निर्माण होता है? राजनैतिक विचारक एंथोनी डी. स्मिथ (जिन्होंने राष्ट्रवाद की संकल्पना पर काफी कुछ लिखा है) ने राष्ट्र को कुछ इस तरह परिभाषित किया है, ‘मानव समुदाय जिनकी अपनी मातृभूमि हो, जिनकी समान गाथाएं और इतिहास एक जैसा हो, समान संस्कृति हो, अर्थव्यवस्था एक हो और सभी सदस्यों के अधिकार व कर्तव्य समान हों।’ रूपर्ट इमर्सन ने राष्ट्र को इस तरह परिभाषित किया है, ‘एक संबध्द समुदाय जिसकी विरासत समान हों और जो एक जैसा भविष्य पसंद करते हैं।’
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरूजी ने राष्ट्र-जन के विभिन्न घटकों का उल्लेख किया है: समान इतिहास, समान पंरपरा, शत्रु-मित्रता का भाव समान, भविष्य की आकांक्षा समान ऐसी भूमि का पुत्र संबंध समाज राष्ट्र कहलाता है।
फ्रांसीसी लेखक अर्नेस्ट रेनन(1882) के अनुसार ‘आधुनिक राष्ट्र केंद्राभिमुख घटकों की ऐतिहासिक परिणति है।’ एक जैसा अतीत गौरव, वर्तमान की एकसमान इच्छा तथा एक साथ महान कार्य के निष्पादन व उसे बेहतर करने की इच्छा, ये सभी घटक ‘जन’ बनने की आवश्यक शर्त है और ऐसे ‘जन’ की आत्मा राष्ट्र है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरूजी ने राष्ट्र-जन के विभिन्न घटकों का उल्लेख किया है: समान इतिहास, समान पंरपरा, शत्रु-मित्रता का भाव समान, भविष्य की आकांक्षा समान ऐसी भूमि का पुत्र संबंध समाज राष्ट्र कहलाता है।
हालांकि, जब हम विश्व के इतिहास पर नजर डालते हैं, तो बहुत कुछ यह राजवंशों व साम्राज्य का इतिहास मिलता है। हम स्वतंत्र संप्रभु राजनैतिक इकाई के रूप से राष्ट्र नहीं पाते। हालांकि राष्ट्र, सांस्कृतिक अस्तित्व में रूप नहीं रहा, लेकिन पिछले पांच सौ सालों के दौरान इसका अस्तित्व स्वीकार किया जाने लगा। यूरोप पवित्र रोमन साम्राज्य के अधीन था। रोमन साम्राज्य के अधीन स्वतंत्र इकाई के रूप में फ्रांस की स्वीकृति की शुरूआत 1648 की वेस्टफेलिया संधि से मानी जाती है। इस संधि के तहत फ्रांस के राजा को पवित्र सामाज्य से धर्म की स्वतंत्रता और अपनी भाषा इस्तेमाल करने की छूट मिली। 19वीं और 20वीं शताब्दी में आधुनिक यूरोप व राज्य केंद्रित विश्व के लिए ‘वेस्टफेलियन’ एक विशेषण के रूप में प्रयोग किया जाने लगा। ऐसा माना जाता है कि 1648 की वेस्टफेलिया की संधि ने आधुनिक अंतर-प्रादेशीय व्यवस्था की आधारशिला रखी। यहां तक कि जब राष्ट्र-राज्य के रूप में ब्रिटेन का उदय नहीं हुआ था और इंग्लैंड में केवल राज्यतंत्र था, पिट द् यंगर ने अपील की, ‘our existence as a nation………. our very name as Englishmen.’ 1775 के अपने शब्दकोश में जॉनसन ने राष्ट्र को इस तरह परिभाषित किया है, ‘लोग जो अपनी भाषा, उत्पत्ति या सरकार के मामले में दूसरे लोगों से अलग हैं।’
प्रवासी राज्य – आस्ट्रेलिया, संयुक्त राज्य अमेरिका, सिंगापुर
देशी राज्य - इंडोनेशिया, मलेशिया
प्राचीन स्थापित राज्य और आधुनिक राष्ट्र – फ्रांस और ब्रिटेन
प्राचीन राज्य और आधुनिक राष्ट्र – जापान, चीन और भारत
राष्ट्र निर्माण और राष्ट्र विनाश – रूस और यूगोस्लाविया
गौरतलब है कि राष्ट्र का अस्तित्व तब भी था, जब संप्रभु राज्य नहीं थे (जैसा कि हम इस समय समझते हैं)। सरकार की अनुपस्थिति में भी राष्ट्रीय समाज का निर्माण करने वाली एक सामान्य जन संस्कृति और भाइचारे की भावना थी। ये राष्ट्रीय समुदाय सिर्फ ऐसे समुदाय नहीं थे, जिनके वंश एक समान थे, बल्कि उनकी सामान्यजन संस्कृति भी समान थी, जो उनके सामाजिक नियमों व आदर्शों को परिभाषित करती थी।
आधुनिक राष्ट्रवाद फ्रांस की क्रांति के बाद विकसित हुआ, जहां राजनैतिक इकाई के रूप में फ्रांस राष्ट्र-राज्य का उदय स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे स्पष्ट राजनीतिक सिध्दांतों पर हुआ। राष्ट्रवाद पर संपूर्ण चिंतन राष्ट्र का एक राजनैतिक इकाई के रूप में मानने लगा। यह दृष्टिकोण, राष्ट्र/राष्ट्र राज्य को आधुनिक इतिहास का उत्पाद कहने लगा। राष्ट्र राज्य के उदय से पहले राष्ट्रों के अस्तित्व को केवल जातीय ग्रुपों के रूप में माना गया। इस पर भी जोर दिया गया कि विश्व के अधिकांश राष्ट्र बहु-जातीय राष्ट्र हैं और इन्हें सोशल नेशंस के रूप में माना गया। Leo Suryadinata द्वारा संकलित पुस्तक ‘Nationalism and Globalization East and west’ में एक अमेरिकी विद्वान की टिप्पणी है कि ‘चीन वास्तव में एक ‘सिविलाइजेशन’ है, जो राष्ट्र होने का बहाना करता है।
इन परिस्थितियों में नागरिकता को राष्ट्रीयता के बराबर माना जाता है, लेकिन यहां मूलभूत अंतर है। जब कोई राष्ट्रीय समुदाय के अंग के रूप अपनी राष्ट्रीयता प्राप्त करता है, तो वह इसे जन्मजात प्राप्त करता है। यह एक सामाजिक-राजनैतिक दर्जा है। वहीं दूसरी तरफ नागरिकता कानूनी प्रक्रिया के तहत सरकार के जरिए हासिल की जाती है। जन्मजात नागरिकता मुल्क के कानूनी प्रावधानों से ही संभव है। इस प्रकार यह राजनैतिक-विधिक दर्जा है। लेकिन आज के राष्ट्र-राज्य के दौर में दोनों ‘शब्द’ एक ही अर्थ में प्रयुक्त किए जाते हैं।
संपूर्ण आधुनिक चिंतन इस दिशा में है कि केवल राष्ट्र-राज्य ही राष्ट्र हैं। संयुक्त राष्ट्र, 1945 का चार्टर सरकारों के समझौतों पर आधारित दस्तावेज है। बाद के सभी चार्टर या परिपाटी सदस्य राज्यों या सहमत सरकारों द्वारा स्वीकार किए गए। इस दृष्टिकोण के परिप्रेक्ष्य में राज्यों का हम एक रोचक वर्गीकरण एडीटर Leo Suryadinata द्वारा पुस्तक ‘Nationalism and Globalization East and west’ में पाते हैं:
चीन, भारत और जापान को प्राचीन राज्य व आधुनिक राष्ट्र के रूप में वर्गीकृत करते समय वर्गीकरण का दृष्टिकोण स्पष्ट हो जाता है, जबकि वास्तविक वर्गीकरण इस प्रकार है, ये सभी प्राचीन राष्ट्र व नए राज्य हैं।
पूर्ववर्ती दृष्टिकोण, भारतीय इतिहास की अज्ञानता तथा वर्तमान भारत की अस्पष्ट समझ के कारण राष्ट्र के रूप में भारत की मान्यता हमेशा प्रभावित रही है। ब्रिटिश राज के दौरान हमें यह बताया गया कि उपमहाद्वीप पर ब्रिटिश राज की स्थापना के कारण ‘भारत’ राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में है। साम्यवादी हमेशा यह कहते रहे कि भारत बहुत से राष्ट्रों का समुच्च है। यह बहुधा कहा गया कि भारत की कोई सामान्य संस्कृति नहीं है, बल्कि तमाम संस्कृतियों का मिलन है, जो अपनी-अपनी पहचान को बरकरार रखे हुए है। इसलिए यह कहा गया कि भारत एक समान धरोहर पर आधारित राष्ट्र नहीं है, बल्कि यह ‘सामाजिक व नागरिक’ राज्य है।
इसे भंलीभांति समझ लेना चाहिए कि यह सर्वव्यापक रूप से स्वीकार किया जा चुका है कि ‘भारत की संस्कृति चिरंतन है, जो 5000 वर्षों से भी अधिक पहले विकसित हुई। इसने आने वाली भारतीय पीढ़ियों के मानसिक क्षितिज, मूल्य व्यवस्था और जीवन शैली को विकसित किया, जो आज भी अनेक विदेशी आक्रांताओं व विपुल जनसंख्या विस्तार के बाद आश्चर्यजनक रूप से बरकरार है। यह आज भी भारतीयों व भारत के मूल लोगों को एक अलग व्यक्तित्व प्रदान करती है, जैसा कि पहले देती आई है।’
‘कल्चर एंड डेमोक्रेसी इन इंडिया- आर. सी. अग्रवाल’
सर्वोच्च न्यायालय ने डॉ. प्रदीप जैन के मामले में इस वास्तविकता की पहचान की है, जब न्या. पी. एन. भगवती ने टिप्पणी की, ‘इतिहास का यह रोचक तथ्य है कि राष्ट्र के रूप में भारत का निर्माण न तो एकसमान भाषा के आधार पर हुआ और न ही इसके भू-भाग पर एक राजनैतिक सत्ता के निरंतर अस्तित्व के कारण, बल्कि इसका आधार सदियों से विकसित हुई एक समान संस्कृति के कारण हुआ। यह एक सांस्कृतिक एकता है, देश के लोगों को एकजुट रखने वाले दूसरे बंधनों से ज्यादा मजबूत व आधारभूत, जिसने इस देश का राष्ट्र में पिरोया।’ इतिहासकार सर विसेंट स्मिथ लिखते हैं, ‘बिना किसी संदेह के, भारत के पास अन्तर्निहित मूलभूत एकता है, जो राजनैतिक प्रभुता या भौगोलिक विगलन से ज्यादा शक्तिशाली है। यह एकता जाति, धर्म, वंश, रंग, भाषा व रीति-रिवाज की तमाम विभिन्नताओं को पार करती है। यह वेद काल से ही एक पवित्र घोषणा है: ‘पृथिव्यै समुद्र पर्यन्ताया: एकराट।’
यह अन्तर्निहित सांस्कृतिक एकता, हमारी राष्ट्रीय पहचान की सभ्यतामूलक आधार के साथ-साथ चरम जीवन मूल्य हैं। यह हमारे जीवन शैली की व्याख्या करते हैं और हमारी राष्ट्रीयता की आधारशिला है। अतएव राष्ट्रवाद, जिसका हम उद्धोष करते हैं, वास्तव में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है।
यहां पर सिध्दांत व विचारधारा के रूप राष्ट्रवाद के विकास का संक्षिप्त हवाला देना उचित होगा, ‘राष्ट्रवाद की विचारधारा राष्ट्र की संस्कृति से ओतप्रोत होती है- इतिहास की पुन:खोज, देशी भाषाओं का पुनरूज्जीवन, साहित्य का विकास (खास तौर पर कविता और नाटक) और संगीत, लोकनृत्य व लोकगीत के साथ-साथ देशज कला तथा शिल्प की पुन:स्थापना।’ (एंथनी डी स्मिथ)
यह राष्ट्रवाद राजनैतिक सिध्दांत के रूप विकसित हुआ, जिसने राष्ट्र को ऐसे सामाजिक संरचना के रूप में देखा, जो एक समुदाय द्वारा एकसमान कानूनों के आधार एक निश्चित भू-भाग पर निर्मित की जाती है। इसे ‘सिविक नेशन’ के तौर पर देखा गया और लोगों के राष्ट्रप्रेम की प्रकृति को राष्ट्रवाद, जो समुदाय की बंधुत्व भावना से ज्यादा शासन की व्यवस्था से प्रेरित था।
सिध्दांत के तौर पर राष्ट्रवाद का विकास दो स्थितियों पर आधारित हैं:
• राष्ट्र के प्रति निष्ठा।
• स्वशासित राष्ट्रों का समुदाय विश्व शांति का आधार है।
विश्व में हुए हाल के बदलाव, राष्ट्रों के सांस्कृतिक आधार की नई समझ को दर्शाते हैं। पिछली शताब्दी में खासतौर पर शुरूआती दशकों में पांच साम्राज्यों के ढहने के बाद नक्शों पर लकीरें खींचकर अनेक राष्ट्रों का उदय हुआ। इसके बाद कुछ राष्ट्र साम्यवादी आधिपत्य में चले गए। सोवियत संघ के विघटन के बाद कृत्रिम सीमाएं टूटी और एकसमान धरोहर, रीति-रिवाज व मूल्यों के आधार पर बनी ऐतिहासिक एकता से नए राष्ट्रों का उदय हुआ। यह सिर्फ विखंडन नहीं था, बल्कि राष्ट्रों का उदय था, जो राष्ट्र राज्यों के भीतर अव्यक्त थे।
चीन के बारे में यह कहा जाता है कि यहां पर राष्ट्रवाद (राजनैतिक अर्थ में) एक नई अवधारणा थी और इसका उभार 19वीं शताब्दी के मध्‍य से शुरू हुआ। बतौर राष्ट्र चीन शुरू से ही समुदायों का ढीला-ढाला बंधा था, जो एकसमान जीवन शैली से जुड़ा था न कि किसी मसीहा की अपील से। अनेक विभिन्न वर्गों के साथ वे एक लोग हैं। चीन में राष्ट्रवाद की सबसे प्रमुख विशेषता है कि यह राजनैतिक से ज्यादा सांस्कृतिक है। यूगोस्लाविया का उदाहरण सुप्त राष्ट्रीय पहचान को रेखांकित करता है। सोवियत साम्राज्य के विघटन के बाद सर्ब व क्रोएट की तमाम राष्ट्रीय पहचान सामने आई। उसके बाद की हिंसा व संघर्ष तथा अमेरिकी हस्तेक्षप की चर्चा किए बगैर जो बात गौरतलब है वह है सर्ब की चेतना।
यह सर्व चेतना कोसोवा के उदाहरण से स्पष्ट हो जाती है। कुछ शताब्दी पहले सर्ब तुर्कों के हाथों 1389 में कोसोवो की निर्णायक लड़ाई में पराजित होने पर दुखी थे। उस दौरान तत्कालीन यूगोस्लाविया तुर्की साम्राज्य का हिस्सा बन गया। आज भी सर्ब उसे याद करते हैं और पराजय के दिन को राष्ट्रीय शोक के रूप में मनाते हैं। यूगोस्लाविया के विघटन के बाद तीन राज्यों का उदय दरअसल, एक अलग अध्‍ययन का मामला है। लेकिन उल्लेखनीय पहलू यह है कि शताब्दियों तक राष्ट्रीय पहचान जीवित रही, हालांकि कोई राज्य इसका प्रतिनिधित्व नहीं करता था।
वैश्वीकरण के शोरगुल के बावजूद राष्ट्रवाद विश्व के राष्ट्रों के लिए एक प्रधान विचारधारा है। संसार भले ही ‘सम’ हो जाए, लेकिन राष्ट्रों की व्यक्तिगत पहचान राष्ट्रवाद की आधारशिला पर सर्वशक्तिमान सत्ता के आधिपत्य से बचाए रखेगी।
फ्रांस के नए राष्ट्रपति की घोषणा इसका उदाहरण है। चुनाव के बाद अपने पहले बयान में निकोलस सारकोजी ने वादा किया कि वह फ्रांस की पहचान व स्वाधीनता को को सुरक्षित रखेंगे। (वैश्वीकरण के आवरण में अमेरिकी आधिपत्य से देष की स्वतंत्रता की रक्षा व आतंकवाद के दबाव में बढ़ते इस्लामीकरण से देष की अस्मिता की रक्षा) यह ऐतिहासिक स्थापित तथ्य है कि एक राष्ट्र का अस्तित्व भूमि, जन व संस्कृति के त्रि-आधार पर टिका होता है। यही त्रि-आधार एक जन, एक भूमि व एक संस्कृति से राष्ट्र का निर्माण होता है। भारतीय संदर्भ में विषेशकर यही सच है कई अवसरों पर अस्पष्ट सोच के कारण संस्कृति की अवधारणा तथा धर्मनिरेपक्षता के सिध्दांत पर धुंध छा जाती है।
बाहर से आए अनेक मत भारत में पले हैं और तमाम कारणों से कुछ वर्गों ने इन्हें अपनाया भी, जिसकी कारणों की व्याख्या हम यहां पर नहीं करेंगे। लोग यह भूल जाते हैं कि हजारों छोटी, बड़ी नदियों के समागम के बाद भी गंगा की मूल धारा वही रहती है। इस देश में पूर्णरूपेण आध्‍यात्मिक स्वतंत्रता है और रीति-रिवाजों की वैभिन्यता है, लेकिन सभी में मानवीय संबंधों को निर्धारित करने वाले जीवन-मूल्य एक ही है। इस अनोखी परंपरा का आप कुछ भी नामकरण कर सकते हैं। आप इसे हिन्दू कह सकते हैं, भारतीय कह सकते हैं या सनातन या इंडियन का नाम भी दे सकते है। लेकिन वह एक ही है यह तथ्य है।
हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक भारत सर्वदा से ही एक भूमि है। वे उत्तरी-पश्चिमी सीमा प्रांत के जरिए आए हों या दक्षिणी-पश्चिम से, खैबर से आए हों या केरल के जरिए, सभी ने इसे इंडिया कहा, जिसका अर्थ भारत-भूमि है। इस भूमि की चर्चा वेदों, पुराणों और बाद के साहित्यों में हुई है। महान एकीकर्ता आदि शंकराचार्य ने इस धरती के चारों कोनों पर चार मठों की स्थापना की।
इस राष्ट्र व राष्ट्र के प्रति विशुद्व प्रेम ही हमारा मूल सिध्दांत है। हम इसके लिए जीते हैं और इसके लिए मरने को सिध्द हैं। हमारी संस्कृति हमारे अस्तित्व को परिभाषित करती है, जैसा कि दीनदयाल जी ने कहा था, ‘हमारी राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक सोच का आधार हमारी संस्कृति ही है।’
हम इसका पहले ही उल्लेख कर चुके हैं कि हमारी सांस्कृतिक एकता हमारी राष्ट्रीय पहचान की सभ्यतामूलक आधारशिला है, साथ ही ये अपरिवर्तनीय जीवन मूल्य भी हैं। इस समस्त भारतीय क्षेत्र की राष्ट्रीय पहचान को हम भारतमाता के रूप में आदर देते हैं, जिसे पिछले हजारों सालों से यहां आए लोगों ने समझा।
हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक भारत सर्वदा से ही एक भूमि है। वे उत्तरी-पश्चिमी सीमा प्रांत के जरिए आए हों या दक्षिणी-पश्चिम से, खैबर से आए हों या केरल के जरिए, सभी ने इसे इंडिया कहा, जिसका अर्थ भारत-भूमि है। इस भूमि की चर्चा वेदों, पुराणों और बाद के साहित्यों में हुई है। महान एकीकर्ता आदि शंकराचार्य ने इस धरती के चारों कोनों पर चार मठों की स्थापना की।
संस्कृति की आधारशिला हमारे जीवन शैली का निर्माण करती है। यह हमें मानव-मानव के बीच, मानव व राज्य के बीच, मानव व प्रकृति के बीच तथा मानव व उदात्त ईश्वर के बीच के संबंधों के बारे में निर्देशित करती है। यह मूल्यों, व्यवहारों और सामाजिक समरसता की अलिखित संहिता का उल्लेख करती है। यहां पर हमारे अस्तित्व व उद्देश्यों में अन्तर्निहित एकता है और ऐसा हमेशा महसूस होता है। यह हमारा दृढ़ विश्वास है कि मानवीय व्यवहारों की यह संहिता, जो धर्म है, विश्व में शांति व प्रसन्नता की राह दिखाएगी। यह विशाल उद्धोष है, लेकिन इस देश की यही नियति है। हटिंगटन, ‘जिन्होंने ‘क्लैश ऑफ सिविलाइजेशनस’ लिखी, का दावा है कि वर्तमान शताब्दी भी अमेरिकी शताब्दी होगी।
वे कहते हैं कि यदि पिछली शताब्दी सैनिक ताकत से अभिभूत थी, तो इस शताब्दी में अमेरिका अपनी जीवन शैली का विस्तार शक्ति से नहीं, बल्कि 1-व्यक्तिगत स्वतंत्रता, 2-लोकतंत्र, 3-मुक्त बाजार इन सिध्दांतों के जरिए करेगा। हमारा विश्वास देश की संस्कृति में है, जो विश्व को निर्देशित करेगी।
यह चार सिध्दांतों पर आधारित है:
1- विश्व के समस्त चर या अचर में जीव है, जिसमें एक ही चेतना और ऊर्जा का निवास है।
2-धर्म मानवीय व्यवहारों का दिव्य आदेश है।
3-परिवार, कुटुंब
4-सहमति।
 इन मान्यताओं में हर आह्वान का समाधान है- पर्यावरण व उसकी रक्षा, नागरी कर्तव्य व सामाजिक समरसता, सामंजस्य व संघर्ष का निराकरण, कल्याण और षासन।