गुरुवार, 31 अक्तूबर 2013

लौहपुरुष सरदार पटेल,गांधीजी के कारण प्रधानमंत्री नहीं बन पाये




गांधी जी ने नेहरू को ही देश का नेतृत्व क्यों सौंपा? - डा.सतीश चन्द्र मित्तल
http://panchjanya.com/arch/2011/3/6/File22.htm
देश-विदेश के अनेक विद्वानों के मन में आज भी यह प्रश्न जस का तस है कि लोकमान्य तिलक के बाद देश के सर्वोच्च राष्ट्रीय नेता महात्मा गांधी ने देश की बागडोर नेहरू तथा पटेल में से नेहरू को ही क्यों सौंपी? इसके पीछे उनकी कौन-सी मनोभूमिका रही होगी? इस प्रश्न के उत्तर के लिए गांधी जी के नेहरू एवं पटेल के साथ संबंधों को जानना महत्वपूर्ण होगा।

गांधी-नेहरू संबंध

जवाहर लाल नेहरू ने गांधी जी को सर्वप्रथम 1916 में लखनऊ में देखा था। असहयोग आंदोलन में दोनों एक-दूसरे के निकट आए। 1924 में बेलगाम में गांधी जी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने पर नेहरू ने उन्हें कांग्रेस का स्थायी सुपर प्रेसीडेंट (नेहरू आत्मकथा, पृ.132) कहा था। फिर धीरे-धीरे उनके संबंध गहरे होते गये थे। परंतु यह भी सत्य है कि दोनों व्यक्तिगत जीवन तथा वैचारिक दृष्टि से एक-दूसरे के विपरीत थे। गांधी जी पूर्ण हिन्दू थे, उनकी हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति तथा हिन्दू धर्म ग्रंथों के प्रति गहरी आस्था थी जबकि नेहरू हिन्दू होते हुए ही उसकी विचारधारा से कटे हुए थे। नेहरू का कथन था, "मैं संभवत: एक भारतीय की अपेक्षा अंग्रेज अधिक था। मैं विश्व को अंग्रेजों के दृष्टिकोण से देखता था और जब मैं भारत लौटा तो मैं इंग्लैण्ड के प्रति तथा अंग्रेजों के प्रति ज्यादा हितैषी था।" (जकारिया- ए स्टोरी आफ नेहरू, पृष्ठ 8) नेहरू ने बैरिस्टरी पास की पर उनकी वकालत चली नहीं, अत:राजनीति में प्रवेश किया। नेहरू ने गांधी जी द्वारा संचालित असहयोग आंदोलन तथा बाद में सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लिया, परंतु दोनों आंदोलन वापस लिए जाने पर नेहरू ने गांधी जी की तीखी आलोचना की थी। 1942 के असहयोग आंदोलन के प्रारंभ में वे विरोधी थे पर बाद में गांधी जी के मनाने पर भाग लेने को तैयार हो गये थे। नेहरू आजादी से पूर्व चार बार कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे परंतु प्रत्येक बार गांधी जी की अनुकम्पा से। नेहरू ने स्वयं स्वीकार किया कि "वह मुख्य द्वार या किनारे के द्वार से नहीं बल्कि पीछे के द्वार से आए थे (आत्मकथा पृ.134-135)

गांधी जी और पंडित नेहरू के राजनीतिक और आर्थिक विचारों में भी बड़ा अंतर था। गांधी जी का चिंतन भारतीय प्रजा की सोच पर आधारित था। वे ब्रिटिश संसद को वेश्या तथा बांझ तक कहते थे। वे ब्रिटिश संसद को बहुत महंगा खिलौना मानते थे। उन्होंने रामराज्य की कल्पना की थी जिसमें सभी की भागीदारी हो। जबकि नेहरू ने गांधी जी के हिन्द स्वराज को पढ़ा परंतु उसे पूर्णत: अस्वीकार कर दिया। गांधी जी ग्रामीण समाज के विकास के लिए स्वावलंबन तथा आत्मनिर्भरता पर बल देते, जबकि नेहरू ग्रामीण समाज को "गाय के गोबर का समाज" कहते थे। गांधी जी गोभक्त थे, नेहरू गोहत्या बंदी के लिए कानून के पक्ष में नहीं थे। गांधी जी परम्पराओं को महत्व देते थे जबकि नेहरू आधुनिक तथा पाश्चात्य सभ्यता के पोषक थे तथा वे गांधी जी को रूढ़िवादी तथा पुरानी पीढ़ी की सोच वाला भी मानते थे। गांधी जी आधुनिक साम्यवाद तथा समाजवाद के घोर विरोधी थे तथा वे 1929 तथा 1936 में नेहरू की समाजवाद की वकालत से क्षुब्ध थे। गांधी जी भारत की आत्मा का गांवों में वास मानते थे तथा ग्राम पंचायतों को महत्व देते हुए भारतीय संविधान इसके अनुरूप बनाना चाहते थे। जबकि नेहरू के पत्रों से ज्ञात होता है कि वे इसे हास्यास्पद समझते थे। गांधी जी स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का विघटन चाहते थे परन्तु नेहरू इसके लिए तैयार न थे। अत: दोनों में वैचारिक मतभेद चरम पर थे।

गांधी-पटेल संबंध

वल्लभ भाई पटेल एक गुजराती किसान के पुत्र थे। 1911 में उन्होंने बैरिस्टरी की शिक्षा 36 महीने की बजाय 30 महीनों में पूरी की थी तथा ब्रिटिश साम्राज्य के सभी विद्यार्थियों में प्रथम आए थे। वापस आने पर वे भारत के एक सफल तथा उच्च कोटि के वकील सिद्ध हुए। वे गांधी जी के व्यक्तित्व एवं विचारों से अत्यधिक प्रभावित थे तथा उनके साथ चम्पारण गए थे। उन्होंने बारडोली सत्याग्रह में भी प्रसिद्धि प्राप्त की थी और तभी से सरदार की उपाधि से विभूषित किए गए थे। यरवदा जेल में वे गांधी जी के साथ 16 महीने रहे जहां दोनों को एक-दूसरे को समझने का अवसर मिला। वहीं पटेल ने संस्कृत भी सीखी थी। पटेल भारतीय कृषक की नब्ज को पहचानते थे। उन्होंने एक बार कहा भी था "मैंने कला या विज्ञान के विशाल गगन में कभी उड़ान नहीं भरी, मेरा विकास कच्ची झोपड़ियों में गरीब किसान के खेती की भूमि और शहरों के गंदे मकानों में हुआ है।" उन्हें गांव की गंदगी तथा जीवन से चिढ़ नहीं थी बल्कि स्वतंत्रता के पश्चात उन्होंने देश के नौकरशाहों को आदेश दिया था कि वे जब गांवों में जाएं तो मोटरगाड़ी गांव के बाहर खड़ी करें, नहीं तो उसकी आवाज से गांव के बैल बिगड़ जाएंगे। पटेल का चिंतन गांवों की मिट्टी से रचा-पगा था तथा वे गांधी जी के अनुरूप ऐसे ही भारत के भविष्य का विचार करते थे।

गांधी जी का हस्तक्षेप

1920 से 1946 तक कांग्रेस के कुल 20 अधिवेशन हुए और सभी में (एक को छोड़कर-1939) गांधी जी की इच्छा से ही अध्यक्ष बनाए जाते थे। प्राय: ये सभी संवैधानिक अध्यक्ष होते, परंतु गांधी जी वास्तविक अध्यक्ष रहते थे। इसी भांति कांग्रेस संगठन पर सरदार पटेल का प्रभुत्व था। परंतु यह आश्चर्यजनक है कि गांधी जी सरदार पटेल की राय को उतना महत्व नहीं देते थे, इससे कई बार पटेल क्षुब्ध भी हुए। उदाहरण के लिए 1927 में कांग्रेस अध्यक्ष के लिए सरदार पटेल का नाम आया, पर गांधी जी ने एक हिन्दू की बजाय एक मुसलमान को बनाया जाना उचित बतलाया (कलैक्टेड वक्र्स, भाग 34, पृ.57) 1928 में भी पटेल का नाम अध्यक्षता के लिए प्रस्तुत हुआ पर गांधी के हस्तक्षेप से वे न बन सके। 1929 में प्रांतीय समितियों से अध्यक्ष के लिए गांधी जी के पक्ष में पांच, पटेल के पक्ष में तीन तथा नेहरू के पक्ष केवल दो मत आए, परंतु गांधी जी ने नेहरू का समर्थन किया। गांधी जी ने कहा-पटेल मेरे साथ रहेगा तथा वह अगले वर्ष होगा। आखिरकार सरदार पटेल को अपना नाम वापस लेना पड़ा। 1931 में जबकि कांग्रेस से प्रतिबंध अभी पूरी तरह हटा न था, तब कराची अधिवेशन में सरदार पटेल को अध्यक्ष बनाया गया। मार्च, 1936 में भी सरदार पटेल, डा.अंसारी व राजगोपालाचारी के प्रस्तावित नामों में से अध्यक्ष न बनाकर दूसरी बार नेहरू को अध्यक्ष बनाया। तीसरी बार नवम्बर, 1936 में नेहरू को अध्यक्ष बनाते समय गांधी जी ने एक पत्र में इसे देशहित में बतलाया (कलैक्टेड वक्र्स, भाग 62, पृ.50) कांग्रेस अध्यक्ष की दृष्टि से 1946 का चुनाव अत्यंत महत्वपूर्ण था क्योंकि तब अंतरिम सरकार बननी थी । और जो कांग्रेस अध्यक्ष बनता उसे ही आजाद भारत का प्रधानमंत्री बनाना था । 16 प्रांतीय समितियों में से 13 के मत पटेल के पक्ष में, 2 डा.राजेन्द्र प्रसाद के पक्ष में तथा 1 गांधी जी के पक्ष से आया। परंतु चौथी बार भी अपने प्रभाव का उपयोग करके गांधी जी ने पंडित नेहरू को अध्यक्ष बनाया। सम्पूर्ण कांग्रेस संगठन को गांधी जी की हठ के सामने झुकना पड़ा। पटेल इससे पूर्व 1936 में भी नेहरू के अध्यक्ष बनने तथा कार्यसमिति में दक्षिणपंथियों को हटाकर वामपंथियों को नियुक्त करने से नाराज थे तथा उन्होंने कार्यसमिति से त्यागपत्र दे दिया था। परंतु गांधी जी के कहने पर वे मान गये।

नेहरू को गद्दी क्यों सौंपी?

अब महत्वपूर्ण प्रश्न यही उभरकर आता है कि क्या गांधी जी का नेहरू को देश के भविष्य की बागडोर सौंपना उचित था? तथ्यों से तो यह भी लगता है कि वे नेहरू की मानसिक पृष्ठभूमि तथा तत्कालीन ब्रिटिश सरकार की सोच से भी भलीभांति परिचित थे तथा राष्ट्रहित की बजाय अन्तरराष्ट्रीय जगत की घटनाओं तथा उनके अपेक्षित परिणामों से ज्यादा चिंतित थे। उन्होंने कहा था कि आज जवाहरलाल नेहरू का स्थान कोई अन्य नहीं ले सकता। वह हैरो का छात्र, कैम्ब्रिज का स्नातक तथा एक बैरिस्टर है तथा अंग्रेजों से बातचीत करने के लिए उपयुक्त है। (तेंदुलकर-महात्मा, भाग-आठ पृष्ठ-13) जे.बी.कृपलानी का निश्चित मत था कि गांधी जी पटेल की तुलना में नेहरू को अधिक चाहते थे। गांधी जी को लगता था कि सरकारी गाड़ी को चलाने के लिए दो बैल हैं-इसमें अन्तरराष्ट्रीय कार्य के लिए नेहरू तथा राष्ट्र के अन्तर्गत कार्यों के लिए पटेल होंगे (दुर्गादास, इंडिया फ्राम कर्जन टू नेहरू एंड आफ्टर, पृ.230)। गांधी जी को लगता था कि पं.नेहरू यूरोप, चीन, रूस आदि गये हुए हैं तथा वहां की मनोरचना से परिचित हैं। साथ ही यह भी सम्भव है कि गांधी जी ब्रिटिश सरकार के नेहरू के प्रति उदार विचारों से भी परिचित हों। कांग्रेस नेताओं में नेहरू ही लार्ड वैवल, लार्ड माउंटबेटन तथा भारत मंत्री सर लारेंस के चहेते थे। इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री ऐटली ने नेहरू को गांधी का आध्यात्मिक उत्तराधिकारी कहा था। विश्वविख्यात इतिहासकार अर्नाल्ड टायन्बी से जब इस प्रश्न पर पूछा गया तो उन्होंने भी नेहरू के प्रति अंतरराष्ट्रीय रुचि को इसका कारण बताया। गांधी जी ने अपनी राजनीतिक विरासत सौंपते हुए कहा था "मेरे मरने के पश्चात जवाहर लाल मेरी ही बात बोलेगा।"

संक्षेप में नेहरू की लालसा, ब्रिटिश सरकार की चाहत तथा गांधी जी के नेहरू के प्रति मोह ने उन्हें भारत की भावी बागडोर नेहरू को देने के लिए उद्यत किया। अन्तरराष्ट्रीय राजनीति राष्ट्रीय हितों पर छा गई। गांधी जी के प्रति सम्मान ने राष्ट्र समर्पित लौहपुरुष सरदार पटेल को झुका दिया। अब यह प्रश्न आप सबके सोचने का है कि क्या यह गांधी जी की महान भूल नहीं थी?

देश को वोट बैंक वाला सेक्युलरिज्म नहीं चाहिए : नरेंद्र मोदी



देश को सरदार पटेल वाला सेक्युलरिज्म चाहिए, वोट बैंक वाला नहीं: नरेंद्र मोदी
आज तक वेब ब्यूरो [Edited By: सौरभ द्विवेदी] | भरूच, 31 अक्टूबर 2013 |
http://aajtak.intoday.in/story/we-need-sardar-patels-secularism-narendra-modi-1-745970.html
बीजेपी के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को पटेल जयंती पर कहा कि देश को सरदार पटेल के सेक्युलरिज्म की जरूरत है, वोट बैंक के सेक्युलरिज्म की नहीं. वह गुजरात के भरूच में 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' के शिलान्यास कार्यक्रम में बोल रहे थे. प्रस्तावित सरदार पटेल की मूर्ति दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति होगी. इसकी ऊंचाई 182 मीटर होगी और इसका चेहरा नर्मदा बांध की ओर होगा. यह अमेरिका की मशहूर 'स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी' से दोगुना ऊंची होगी. 2500 करोड़ के खर्च वाली इस योजना को मोदी ने बड़ी चालाकी से प्रदेश के विकास, आकर्षण, देश के गौरव और पटेल के सपने से जोड़ा.

उन्होंने संकेतों में कहा कि सरदार पटेल की यह प्रतिमा भारत को वैसा स्थान दिला सकती है जैसा चीन को उसके विकसित शहर शंघाई ने या जापान को बुलेट ट्रेन ने दिलाया. उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत को अब हल्के में लेने के दिन अब लद गए हैं.

पढ़िए उनका भाषण ज्यों का त्यों.

भाइयों-बहनों
नर्मदा के तट पर आज नए इतिहास और नए संकल्प का शिलान्यास हो रहा है. कई सालों से इस सपने को मैंने मन में संजोया था. कई लोगों ने इस सपने में रंग भरे थे, सुझाव दिए थे. कई मनोमंथन के बाद इस योजना गर्भाधान हुआ. अनेक लोगों का मार्गदर्शन, प्रेरणा, आशीर्वाद मिला. उन सबका अभिनंदन-नमन करता हूं. यह हम सबका सपना है.

नर्मदा जिला छोटा जिला है, इसके विकास के लिए और आने वाले दिनों में यह काम और सरलता से हो, इसके लिए प्रशासनिक स्तर पर कई फैसले हुए हैं. लेकिन सबका मूल्यांकन करने के बाद सरकार को लगा कि अच्छा होगा कि इस काम को गति देने के लिए यहां एक छोटे से तालुका (कस्बा) का निर्माण हो.

मुझे पानी के मुद्दे पर कई सुझाव आए. आदिवासी भाइयों का पूरा अधिकार है, पानी उनको मिलेगा. किसानों को भी पानी मिलेगा. हमने टेक्निकल सॉल्यूशन खोजा है. नर्मदा के बाएं किनारे को भी सिंचाई का लाभ मिले, इसके लिए भी काम किया जाएगा.

नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बांध और इसके जरिये गुजरात-राजस्थान में पानी पहुंचाने का प्रयास सरदार पटेल का सपना था. किसी जमाने में प्यासों के लिए पानी की मटकी भी घर के बाहर रखने वालों को समाज आदर से देखता था. हमारे यहां, खास तौर से गुजरात-राजस्थान में पानी का मू्ल्य है, क्योंकि हमने पानी की तंगी झेली है.

आज भी गुजरात सरकार का सबसे ज्यादा बजट पानी के काम के लिए दिया जाता है. सरदार सरोवर बांध परियोजना के लिए पिछली सरकारों ने जितना खर्च किया, उससे डबल खर्च हमारी सरकार ने पिछले दस सालों में किया. लेकिन इस सारे काम का सपना सरदार पटेल ने देखा. यह उन्हीं के सपने पर सारा काम हो रहा है.

अगर हम पानी की व्यवस्था न कर पाते तो कहां होते, कौन जानता हमें. गुजरात में नेगेटिव ग्रोथ थी, लोग छोड़कर जा रहे थे. आज राजस्थान के किसी भी व्यक्ति से मिलते हैं तो कहता है कि आपने बहुत अच्छा काम किया, जो हमें पानी दिया. इस सबके लिए सरदार पटेल जिम्मेदार हैं.

अब भी गुलामी का इतना बोझ है, आजादी के इतने साल बाद भी. हम गुलामी की छाया से अब तक निकल नहीं पाए हैं. और हमने गुलामी की छाया से निकलने के लिए इस गुलामी के साये को तोड़ने के लिए कुछ ऐसे काम करने होंगे. जिसके कारण हम गर्व के साथ आत्मसम्मान के साथ दुनिया के सामने खड़े हों. आज मैं आपको याद दिलाता हूं. 15-17 साल पहले हिंदु्स्तान में जब बजट पेश किया जाता था, तो उसे शाम को पांच बजे पार्लियामेंट में रखा जाता था. आजादी के पचास साल बाद भी ऐसा होता था. किसी ने सोचा ये क्यों ऐसा था. इसलिए था क्योंकि अंग्रेजों के जमाने से परंपरा थी. जब हमारे यहां शाम के पांच बजते थे, तब ब्रिटेन में 11 बजते थे और उस समय उनके यहां संसद का काम शुरू होता था. जब वाजपेयी जी प्रधानमंत्री बने तब यह परंपरा तोड़ी गई औऱ सुबह 11 बजे बजट रखा जाना शुरू हुआ.

हमारी सोच में पता भी नहीं चलता है कि गुलामी किस कदर दबोच रही है. मित्रों इस सोच के सामने एक स्वाभिमान के साथ खड़े होने की आवश्यकता है. भारत को हीन भाव से देखे जाने की आदत सी हो गई है. भारत से हो, चलो बाजू जाओ. जब वाजपेयी जी ने शासन में आने के कुछ ही समय बाद परमाणु बम विस्फोट किया, तो पूरी दुनिया ने लोहा माना. दुनिया अब हिंदुस्तान का नाम सुनती है, तो कहती है, हां कुछ तो है. मित्रों दुनिया के अंदर हमारे देश का कोई नागरिक क्यों न हो. कोई परंपरा क्यों न हो. आज के युग में समय की मांग की. हिंदुस्तान आजाद होने के बाद भी अगर दूसरे देशों को गौरव से देखा जाता हो, तो हमारे हिंदुस्तान को क्यों न देखा जाए

किसी जमाने में चाइना को कौन देखता था. चाइना ने एक शंघाई बना दिया. दुनिया के सामने पेश कर दिया. लोगों की चाइना की तरफ सोचने की आदत बदल गई. ये जो पुराने पर नया चाइना बना, शांघाई के आसपास बना. जापान ने जब बड़ी स्पीड की बुलेट ट्रेन बनाई तो दुनिया ने कहा, अरे भाई कुछ तो है. अमेरिका ने अरबों डॉलर खर्च कर चांद पर भेजा, दुनिया ने लोहा माना.

हमारा भी एक ग्लोबल पोजिशनिंग करना चाहिए. सवा अऱब का देश एक ताकत बनकर उभरना चाहिए। अनेक मार्ग हो सकते हैं. अनेक क्रिया प्रतिक्रिया हो सकती हैं.

आज ये सरदार पटेल का स्मारक सिर्फ...सरदार सरोवर डैम बना, सरदार साहब का सपना पूरा हुआ. वो हमारे गुजरात के थे. मगर ये सपना बहुत बड़ा है. ये भव्य स्मारक. जिसकी ऊंचाई हिंदुस्तान की तरह देखने के लिए मजबूर करेगी.

इतने बड़े राजे रजवाड़ों को एक करने का काम. अंग्रेजों की कुटिल कूटनीति का पर्दाफाश, ये भारत का सामर्थ हम दुनिया के सामने पेश करना चाहते हैं. अगर इतिहास की धरोहर देखें तो चाणक्य के बाद इस देश को एक करने का काम किसी ने किया, तो वह हैं सरदार पटेल.

क्या हम राणा प्रताप का सम्मान करेंगे. हम छत्रपति शिवाजी महाराज का सम्मान करेंगे. हम भगत सिंह, सुखदेव राजगुरु का सम्मान करेंगे. क्या वो बीजेपी के मेंबर थे क्या. क्या उन्हीं का सम्मान होगा देश में, जो भाजपा का सदस्य हो.

दल से बड़ा देश होता है. और देश के लिए मरने वाला हमारे लिए सबसे बढ़कर है. और इसीलिए सरदार साहब को किसी दल के साथ जोड़ना उनका अपमान है. वो दल उनके इतिहास का हिस्सा है. इससे नरेंद्र मोदी भी इनकार नहीं कर सकता.

हमें विरासत को कभी बांटना नहीं चाहिए. हमारी विरासतें सांझी होती हैं. लेकिन देश आजाद होने के बाद गांधी जी छुआछूत के खिलाफ जीवन भर लड़ते रहे. मगर ये जो नई राजनीतिक छुआछूत बढ़ गई है. हम इसे भी नष्ट करें.

मित्रों मुझे दो दिन पूर्व पीएम से मिलने का अवसर मिला. उन्होंने एक बात बहुत अच्छी कही. मैं आभार व्यक्त करता हूं. मीडिया के मित्र समझ नहीं आए. बात उलटी तरफ चली. हो सकता है उनकी रोजी रोटी की डिमांड थे.

पीएम ने कहा कि सरदार साहब सच्चे सेकुलर थे. हम भी कहते हैं कि देश को सरदार साहब वाला सेकुलरिज्म चाहिए. वोट बैंक वाला नहीं. और इसलिए प्रधानमंत्री जी, सरदार साहब का सेकुलरिज्म चाहिए इस देश को.

भारत एक हुआ. राजे रजवाड़े किसी एक संप्रदाय या समाज के नहीं थे. सब अलग अलग परंपराओँ से थे.

इसलिए मित्रों मैं भारत के प्रधानमंत्री का अभिनंदन करता हूं. आग्रह करता हूं. हम सब मिलकर सरदार साहब का सेकुलरिज्म आगे बढ़ाएं

कुछ लोगों के मन में आता होगा क्यों इतना बड़ा स्मारक. बाबा साहेब आंबेडकर, उनके कई स्मारक हैं. मगर मानना पड़ेगा कि दलित शोषित समाज के लिए वह भगवान का रूप हैं. और जो भी पीड़ित दलितों के लिए भला चाहते हैं, उन्हें बाबा साहेब आंबेडकर को प्रेरणा मिलती है. तब ये नहीं पूछा जाता कि वो किस दल से थे. उनका जीवन हमें प्रेरणा देता है.

ये सांझी विरासत है, हम सबको गर्व होना चाहिए. हम सबका दिल देश के लिए होना चाहिए.

नई पीढ़ी को कहा पता चलेगा कि लौह पुरुष कैसे हुए। वो कौन सी शक्ति थी उनके अंदर. हम सरदार साहब का स्मारक बनाने के साथ साथ हिंदुस्तान के कोने कोने में फिर से एक बार एकता का मंत्र पहुंचाना चाहते हैं. हम इस बात से भली भांति परिचित हैं.कि भारत की प्रगति शांति एकता और सदभाव के बिना नहीं हो सकती. मां के दूध में कभी दरार नहीं हो सकती. प्रांतवाद के झगड़े, भाषावाद के झगड़े, जातिवाद और ऊंच नीच के झगड़े. इन चीजों ने हमारे देश को तबाह कर दिया. किसी दल के किसी राजनेता की झोली तो भर गई होगी, लेकिन मेरी भारत मां का गौरव क्षीण हुआ. अगर हमें वो गौरव फिर से हासिल करना है, तो एकता के मंत्र को घर घऱ तक पहुंचाना होगा. इस स्मारक के जरिए सरदार साहब के सपनों का स्मरण करते हुए, उनकी आवाज जिसे कई बरसों से दबोचा गया था. उसे बुलंद करके. कई लोगों ने सरदार साहब की आवाज पहली बार सुनी होगी. रोंगटे खड़े हो गएं. मन में फीलिंग आता है.

हमने सबसे पहले महात्मा मंदिर बनाया. ये मजे की बात है, जब हमने ये मंदिर बनाया. काम अभी भी चल रहा है. लेकिन उस समय हमें किसी ने चैलेंज किया, कि मोदी तुम तो बीजेपी वाले हो, गांधी बीजेपी में नहीं थे. तो क्यों बना रहे हो. मगर जब सरदार साहब की बात आई, तो परेशानी क्यों हो रही है. मित्रों आज गुजरात गर्व महसूस कर रहा है. पहले 31 अक्टूबर को जो सरकारी एड आते थे, उसमें सरदार साहब कहीं नहीं होते थे. आज ऐसा नहीं है. ये गुजरात इफेक्ट है. हमारे महापुरुषों को भुला कैसे दिया जा सकता है.हमारी भी किसी ने आलोचना की हो, तब भी उनके महान कामों की पूजा करना आगे वाली पीढ़ी का काम होता है. हमारी कोशिश है कि हिंदुस्तान की आने वाली पीढ़ी इतिहास को जिए और जाने ये हमारा प्रयास है.

कोई समाज अपने इतिहास को भूलकर के, अपने इतिहास के ग्रासरूट से अगर बिखर जाता है, तो जैसे मूल से उखड़ा हुआ पेड़ कितना भी बड़ा क्यों न हो. वैसे ही समाज की धारा सूख जाती है, इतिहास से उसको ताकत और प्रेरणा मिलती है. रास्ते खोजने को मिलते हैं. हमारे देश के लिए अगर समाज के मन में आवश्यकता है. तो हमारे समाज का इतिहास बोध होना चाहिए.

ये सरदार साहब की प्रतिमा के माध्यम से हम आने वाली पीढ़ी को वो नजराना देना चाहते हैं. भाइयों बहनों ये मूर्ति कैसे बनेगी. इसमें हम दुनिया भर के एक्सपर्ट लगाएंगे. छोटा काम नहीं है. कितनी धातुओं को मिलना होगा.

ये बता देता हूं कि मूर्ति ऐसी बनेगी, जो सदियों तक सलामत रहे. इस काम को हम हिंदुस्तान की एकता के लिए जोड़ना चाहते हैं. इसलिए तिजोरी से रुपये निकाल मूर्ति बन जाए. ये नहीं चाहते. जन जन को जोड़ना चाहते हैं. क्योंकि सरदार साहब ने एकता का काम किया था, वही सरदार साहब का संदेश बन जाए, इसलिए हर गांव को जोड़ना चाहते हैं. उनसे हम कुछ मांग रहे हैं. क्या मांग रहे हैं. कुछ लोगों ने गंदे शब्द प्रयोग किए। उनके दिमाग में गंदगी है.

किसान, उसके घर में तलवार तोप भी है, तब भी वह सबसे ज्यादा किसी को प्रेम करता है, तो खेती के औजार को करता है. उसके लिए वह सबसे ज्यादा मूल्यवान होता है. सरदार वल्लभ भाई पटेल किसान थे, लौह पुरुष थे. सरदार पटेल ने एकता का काम किया था. इसलिए हिंदुस्तान के हर कोने को जोड़ना है. वह किसान थे, इसलिए किसान को जोड़ना है. वह लौह पुरुष थे, इसलिए लोहे को मांगना है. हमने हर गांव पंचायत से प्रार्थना की है. कि किसान ने खेत के अंदर जिस औजार का प्रयोग किया है. वो औजार जो भारत मां की गोद में खेला है. जिसने गरीब के पेट को भरने के लिए भारत मां के साथ कष्ट झेला है. मुझे तोप नहीं चाहिए. मुझे तलवार चाहिए. मुझे तो मेरे किसान ने खेत में जो औजार इस्तेमाल किया है, उसका टुकड़ा चाहिए. उसे पिघलाएंगे. अच्छे से अच्छा स्टील निकालेंगे. उस लोहे का अर्क उस मूर्ति में जगह पाएगा, तब हिंदुस्तान का हर नागरिक कहेगा, मेरा गांव भी इसमें है.

हम गांव के मुखिया के तस्वीर लेंगे, गांव का छोटा सा इतिहास लेंगे. पूरा स्मारक बनेगा, उसमें एक वर्चुअल वर्ल्ड होगा, जिसमें हिंदुस्तान के सात लाख गांवों की तस्वीर होगी, कथा होगी, कोई पचास साल बाद आएगा, तो अपने गांव का इतिहास देखेगा.ये पवित्र काम हम करेंगे.

आज देश में ताज महल देखने के लिए यात्री आते हैं. अमेरिका में स्टेचू ऑफ लिबर्टी देखने के लिए यात्री जाएंगे. हम चाहते हैं ये पूरे विश्व के लिए महान केंद्र बने. हमारी ऊंचाई को देखे. इस देश की ऊंचाई को नापे. और जब ये पूरा स्मारक बनेगा. हम देशवासियों के लिए वह प्रेरणा का तीर्थ होगा. विश्व भर के लिए प्रवासन का धाम बन जाएगा. हर एक को अपने अपने लिए जो चाहिए वो मिलेगा.

इस स्मारक में भारत के भविष्य को हमने जोड़ा है. देश में आदिवासियों के कल्याण के लिए चाहे जिस सरकार ने जो काम किए हों. उन सबको हम संग्रहित करना चाहते हैं. मेरे आदिवासी भाई बहनों के जीवन में नया उमंग उत्साह कैसे आए, वे संपन्न कैसे बनें. अगुवा कैसे बनें. उसके रिसर्च का काम भी इसी स्मारक के तहत हो.
ये देश गांव का देश है. पटेल किसान पुत्र थे. किसान के कल्याण के लिए कौन से नए विज्ञान की जरूरत है, गांव आधुनिकता की तरफ कैसे बढ़े. किसान आधुनिकता के मार्ग को कैसे आगे बढ़ाए. ये उनको शिक्षा दीक्षा कैसे मिले, एग्रीकल्चर के लिए. गांव गरीब किसान के लिए. ये काम भी हम इससे जोड़ना चाहते हैं.

मित्रों दुनिया में इस काम को करने वाली श्रेष्ठ कंपनियों को बुलाया है. तीन साल पहले उस कल्पना को सामने रखा. उसे साकार करने के लिए एक्सपर्ट आए. तीन साल उसके पहलुओं की बारीकी में लगे. तब जाकर हम इसे आगे बढ़ा रहे है. जब हमने पहली बार कहा था इस काम का. मुझे कच्छ के लोगों ने चांदी से तौलकर भेंट दी थी. मैंने पूछा, भई अभी इतनी जल्दी क्यों दे रहे हो. अभी तो योजना बन रही है. तब कच्छ के लोगों ने जवाब दिया. मोदी जी, अगर सरदार साहब न होते, इस बांध का सपना न देखा होता, तो हमारे कच्छ में पानी न पहुंचता, हम उनके कर्जदार हैं. मुंबई गया. वहां चांदी से तौला, वह भी इसी में लगेगा.

हमें हिंदुस्तान के जन जन को जोड़ना है. शासन, जन देश की शक्ति, भारत सरकार की शक्ति सबको जोड़ना है. धरती भले गुजरात की हो, सपना हिंदुस्तान का है.

हम कई बरसों से कह रहे हैं कि सरदार सरोवर बांध का काम पूरा हो. मगर कुछ लोग हैं, जो बयान नहीं देते, पेट में रोटी नहीं जाते. कुछ मित्रों ने मोदी को समाप्त करने की सुपारी फैलाई है. पता नहीं क्या क्या गंध फैलाते रहते हैं.

मुझे पता कि पीएम की टीम हर शब्द सुनती है, उनके बॉस की टीम सुनती है. इसलिए मैं कहना चाहता हूं, सरदार सरोवर डैम में बस गेट लगाना बाकी है. बाकी काम हो चुका है. गेट के बाद ही सबसे ज्यादा पानी भरेगा. कई बार पीएम से मिला. कहा, तीन साल लगेंगे. बंद मत करने देना, खड़े तो करने तो, मिले पीएम तो बोले कि बात तो आपकी समझने की है. एक साल बाद मिला, तो बोले कि अरे अभी तक नहीं हुआ. फिर मिले तो फिर वही बात.

इतना ही नहीं एमपी वगैरह में पुनर्वास को देखने के लिए पूर्व जजों की अध्यक्षता में कमेटी हो. भले महाराष्ट्र में कांग्रेस की और बाकी दो में हमारी सरकार हो. इन तीनों राज्यों ने पुनर्वास का काम पूरा कर दिया. भारत सरकार की कमेटी ने स्वीकार कर लिया. मौखिक रूप से कहा, अखबारों में छपा. अब बस मीटिंग बुलाकर फाइनल ऑर्डर देना है. गेट बना लीजिए. पिछले आठ महीनों से रुका पड़ा है. मैं अफसरों से कहता हूं. पूछो क्या तकलीफ है.साहब आप समझते तो हैं. मैं खुला बोलूं. समझ गए न. मुझे नहीं बोलना.

इसीलिए काम रुका है. मैं आज फिर नर्मदा मैया के तट से पीएम को आग्रह करता हूं. महाराष्ट्र गुजरात को पानी चाहिए. मध्य प्रदेश को बिजली चाहिए. महाराष्ट्र का चार सौ करोड़ मिल जाएगा.

मैं यहां बड़ा शिलालेख लगाने को तैयार हूं. ये काम केंद्र सरकार ने किया. मोदी का नाम भी मत लो. कम से कम डैम का काम पूरा करने की इजाजत दो. ऐसे काम में राजनीति नहीं होनी चाहिए. भाइयों बहनों मैं आशा करता हं. इस नर्मदा के तट पर, गुजरात के पशुओं की, गरीबों की, किसानों की, पेड़ पौधों की आवाज देश के प्रधानमंत्री तक पहुंचेगी. दल से बड़ा देश होता है, ये भाव उनके मन में जगेगा और भारत के लिए इतना बड़ा अच्छा काम, पूरा करें, गर्व करें, रिबन कटें. वो चाहें तो मैं आऊंगा नहीं. मैं आज कहता हूं आपका है. आप आनंद कीजिए, मगर पूरा कीजिए.

भाइयों बहनों, आज जब हम एकता का मंत्र लेकर चले हैं, तब देश को जोड़ना ये सपना लेकर चले हैं तब, सरदार पटेल के भव्य स्मारक का निर्माण करने जा रहे हैं तब, विश्व का सबसे ऊंचा स्टेचू ऑफ लिबर्टी से दो गुना बड़ा, उसका निर्माण करने जा रहे हैं तब, एकता का स्मारक है, एकता का संदेश है, भाषा अनेक, भाव एक, राज्य अनेक, राष्ट्र एक, पंथ अनेक, लक्ष्य एक. बोली अनेक, स्वर एक, रंग अनेक, तिरंगा एक, समाज अनेक, भारत एक, रिवाज अनेक, संस्कार एक, कार्य अनेक, संकल्प एक, राह अनेक, मंजिल एक, चेहरे अनेक, मुस्कान एक. ये एकता का संदेश हम लेकर चले और भाइयों बहनों. ये भारत की विशेषता है,विविधता में एकता.
हम अनेक संप्रदाय पंथ बोली भाषा होंगे, हम सब एक हैं.हमारी एकता की गारंटी ही. हमारे उज्जवल भविष्य की गारंटी है. इस स्मारक से सदियों तक एकता को बनाए रखने का काम इसी तीर्थ क्षेत्र से मिले.

मैं आदरणीय आडवाणी जी का बहुत आभारी हूं. सरदार साहब से उनका लगाव रहा है. इस महान काम में उनका आशीर्वाद मिले, इसके लिए आभारी हूं. देश से प्रार्थना है, हर गांव मिलकर जिम्मेदारी ले. 15 दिसंबर को उनके जम्मदिन के दिन रन फॉर यूनिटी है, देश के नौजवान दौड़ें. हर स्कूल कॉलेज में भाषण हों. निबंध प्रतियोगिता हों. पूरे देश में एकता का ही माहौल बने.

राष्ट्रयाम जाग्रयाम वयम. एकता के लिए निरंतर जागरण चाहिए. पुण्य स्मरण चाहिए. एकता के लिए एक होकर चलना चाहिए. सोचना चाहिए, इस मंत्र को पहुंचाने के लिए आज पवित्र काम का प्रारंभ हो रहा है.
दोनों हाथ ऊपर कर पूरी ताकत से बोलिए, सरदार पटेल अमर रहें.