मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

चुनाव आयोग का आदेश, मतदान वाले दिन दिल्ली में रहेगी छुट्टी...!




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चुनाव आयोग का आदेश, मतदान वाले दिन रहेगी छुट्टी...!
कई लोग छुट्टी न होने की वजह से मतदान नहीं कर पाते हैं, लेकिन अब जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, वहां के सरकारी और निजी सहित सभी प्रतिष्ठानों के कर्मचारियों को मतदान के दिन सवैतनिक अवकाश मिलेगा।
चुनाव आयोग की ओर से चुनाव वाले राज्यों के मुख्य सचिवों को भेजे गए एक आदेश में कहा गया है कि जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 135 बी में मतदान के दिन सवैतनिक अवकाश का प्रावधान है। आयोग ने कहा कि प्रावधान के तहत जिस क्षेत्र में आम चुनाव या उप चुनाव हो वहां के सभी प्रतिष्ठान और दुकानें बंद रहना जरूरी है। उन संस्थानों का बंद होना भी जरूरी है जहां पाली आधार पर काम होता है।
हालांकि चुनाव आयोग के आदेश के बावजूद उन लोगों के लिए समस्‍या आ सकती है जो वोटर तो दिल्‍ली के हैं, लेकिन एनसीआर में काम करते हैं। दिल्‍ली के ऐसे वोटर बुधवार वाले दिन कैसे मतदान करेंगे, यह बड़ा सवाल है।
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बुधवार को 1.19 करोड़ मतदाता दिल्ली का भाग्यविधाता तय करने के लिए वोट डाल पायेंगे। उनमें से 4.05 लाख पहली बार वोट वोट डालने जा रहे हैं। सत्तर सदस्यीय विधानसभा के लिए 810 उम्मीदवार चुनावी दंगल में हैं। भाजपा ने 66 उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे हैं जबकि कांग्रेस और आप सभी 70 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। बसपा ने 69, राकांपा ने 9 और सपा ने भी 27 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं। कुल 224 निर्दलीय उम्मीदवार भी अपना राजनीतिक भाग्य आजमा रहे हैं।
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कांग्रेस मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के लिए यह सबसे कठोर चुनावी मुकाबला है। सत्ताविरोधी लहर के अलावा उन्हें सब्जियों और फलों के दामों में पिछले दो महीने में तीव्र वृद्धि को लेकर लोगों की नाराजगी झेलनी पड़ रही  है। बिजली के मंहगे बिल पहले से ही मुद्दा है । भाजपा और कांग्रेस के बीच अनाधिकृत कॉलोनियों के नियमितकरण, पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग, पानी और बिजली की ऊंची दरें जैसे स्थानीय मुद्दों पर आरोप-प्रत्योराप का दौर चला

1984 के सिख नरसंहार दंगा मामले में सज्जन को सुप्रीम कोर्ट से भी राहत नहीं


कोंग्रेस यह बताये कि १९८४ के सिख नरसंहार के लिए किसी एक को भी सजा क्यों नहीं हुई……


1984 दंगा मामले में सज्जन कुमार को सुप्रीम कोर्ट से भी राहत नहीं
Updated on: Tue, 03 Dec 2013
नई दिल्ली [जागरण ब्यूरो]। सिख दंगा मामले में आरोपी वरिष्ठ कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने सज्जन कुमार की आरोप निरस्त करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। कुमार ने ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट से निराश होने के बाद सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिका खारिज होने के बाद साफ हो गया है कि सज्जन कुमार पर सुल्तानपुरी थाने में दर्ज मुकदमा चलता रहेगा। उन्हें अब अदालत में ट्रायल के दौरान गवाह और सुबूत पेश कर अपने को निर्दोष साबित करना होगा।

न्यायमूर्ति एके पटनायक की अध्यक्षता वाली पीठ ने सज्जन कुमार के साथ ही दूसरे अभियुक्तों वेद प्रकाश और ब्रह्मनंद गुप्ता की याचिकाएं भी खारिज कर दी हैं। इन दोनों ने भी निचली अदालत के आरोप तय करने के आदेश के सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने वरिष्ठ कांग्रेस नेता की आरोप निरस्त करने की मांग खारिज करते हुए कहा था कि अगर अदालत को पहली निगाह में लगता है कि अभियुक्त ने अपराध किया है तो अदालत उस पर आरोप तय कर सकती है।

हालांकि हाई कोर्ट ने सज्जन कुमार व अन्य के खिलाफ अपराध की साजिश रचने के अतिरिक्त आरोप तय करने से इन्कार कर दिया था। हाई कोर्ट का कहना था कि अभियुक्तों के आपस में मंत्रणा करने के कोई सुबूत नहीं दिखते। सज्जन कुमार के खिलाफ सुल्तानपुरी का यह मामला 84 दंगों की जांच कर रहे नानावती आयोग की रिपोर्ट आने के बाद दर्ज हुआ था।

सज्जन कुमार की अर्जी पर फैसला सुरक्षित
पूर्वी दिल्ली : सुल्तानपुरी सिख दंगा मामले में नौ गवाहों के नाम को हटाने को लेकर सज्जन कुमार की ओर से दाखिल अर्जी पर अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। जिला जज जेआर आर्यन की अदालत इस अर्जी पर 11 दिसंबर को फैसला सुनाएगी। इस मामले में सज्जन कुमार व तीन अन्य आरोपी है।

इसके पहले सीबीआइ ने कहा था कि आरोप पत्र छह लोगों की हत्या से संबंधित है लेकिन इसे केवल सुरजीत सिंह की हत्या तक सीमित रखा गया है क्योंकि अन्य मृतकों के मामले में सुनवाई हो चुकी है। सज्जन कुमार और तीन अन्य आरोपियों ने गवाहों को हटाने की मांग करते हुए कहा कि वे अप्रसांगिक हैं। कुमार के वकील ने कहा था कि सीबीआइ ने तीन अलग- अलग प्राथमिकी और अभियोजन के नौ गवाहों को मिलाकर एक ही आरोप पत्र दायर कर दिया, जो सुरजीत सिंह की हत्या से संबंधित नहीं हैं। जिससे इन्हें हटाया जाना चाहिए। सीबीआइ ने कुमार की अर्जी विरोध करते हुए कहा कि एजेंसी को निर्णय करना है कि कौन गवाह प्रासंगिक है और कौन अप्रासंगिक। कुमार की याचिका का दंगा पीड़ितों के अधिवक्ता एचएस फुल्का ने भी विरोध किया। उन्होंने कहा कि नौ गवाह काफी महत्वपूर्ण हैं और इन्हें हटाए जाने से न्याय प्रभावित होगा।
* 2010 में सुल्तानपुरी थाने में दर्ज मामले में लूटपाट और सुरजीत नामक व्यक्ति की हत्या का आरोप लगाया गया है। मामले की सुनवाई कर रही कड़कड़डूमा अदालत ने सज्जन कुमार व अन्य अभियुक्तों पर आरोप तय किए हैं।

भारतीय संविधान की धारा 370 क्या है ?




धारा 370 की वजह से कश्मीर में RTI लागु नहीं है ।
धारा 370 की वजह से कश्मीर में RTE लागू नहीं है ।
धारा 370 की वजह से कश्मीर में CAG लागू नहीं होता ।

धारा 370 की वजह से कश्मीर में भारत का कोई भी कानून लागु नहीं होता ।
धारा 370 की वजह से कश्मीर में महिलाओं  पर शरियत कानून लागु है ।
धारा 370 की वजह से कश्मीर में पंचायत के अधिकार नहीं ।
धारा 370 की वजह से कश्मीर में चपरासी को 2500 ही मिलते है ।
धारा 370 की वजह से कश्मीर में अल्पसंख्यको को 16 % आरक्षण नहीं मिलता ।
धारा 370 की वजह से कश्मीर में बाहर के लोग जमीन नहीं खरीद सकते है ।
धारा 370 की वजह से ही पाकिस्तानियो को भी भारतीय नागरीकता मिल जाता है । इसके लिए पाकिस्तानियो को केवल किसी कश्मीरी लड़की से शादी करनी होती है ।

अच्छी शुरुवात है कम से कम 370 हटाने की दिशा में एक कदम आगे की ओर मोदी जी को धन्यवाद जो उन्होनें धारा 370 का मुद्दा उठाया ।

 
क्या है भारतीय संविधान की धारा 370?
03 Dec 2013

भारतीय संविधान की धारा 370 आजकल सुर्खियों में है.
दरअसल भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने जम्मू की रैली में कांग्रेस पर जोरदार हमला बोलते हुए धारा 370 के मुद्दे पर छिड़ी बहस को एक बार फिर हवा दे दी.
मोदी ने कहा कि धारा 370 पर सही चर्चा नहीं हो रही है. देश की सुरक्षा के साथ समझौता किया जा रहा है.
मोदी ने कहा हमें इस पर विचार करना चाहिए कि धारा 370 की जरूरत है या नहीं. इस पर संसद में बहस होनी चाहिए.
मोदी के इस बयान की जमकर आलोचना हो रही है. पीडीपी, माकपा, जम्मू कश्मीर अवामी मुताहिदा महाज और कट्टरपंथी हुर्रियत कांफ्रेंस ने इस बयान की आलोचना की है. इन दलों ने मोदी के बयान को खारिज करते हुए यहां तक कह दिया है कि मोदी को संविधान की जानकारी नहीं है.
मालूम हो कि भारतीय संविधान की धारा 370 भारतीय राजनीति में शुरू से ही बहुत विवादित रही है.
भाजपा और कई राष्ट्रवादी दल इसे जम्मू और कश्मीर में व्याप्त अलगाववाद के लिये जिम्मेदार भी मानते हैं और समय-समय पर इसे समाप्त करने की मांग करते रहे हैं.

क्या है धारा 370?
भारतीय संविधान की धारा 370 जम्मू और कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा प्रदान करता है.
धारा 370 के प्रावधानों के अनुसार, संसद को जम्मू और कश्मीर के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार है लेकिन किसी अन्य विषय से संबंधित कानून को लागू करवाने के लिए केंद्र को राज्य सरकार का अनुमोदन चाहिए.
इसी विशेष दर्जे के कारण जम्मू और कश्मीर राज्य पर संविधान की धारा 356 लागू नहीं होती.
इस कारण राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बर्खास्त करने का अधिकार नहीं है.
1976 का शहरी भूमि कानून जम्मू और कश्मीर पर लागू नहीं होता. इसके तहत भारतीय नागरिक को विशेष अधिकार प्राप्त राज्यों के अलावा भारत में कहीं भी भूमि खरीदने का अधिकार है. यानी भारत के दूसरे राज्यों के लोग जम्मू और कश्मीर में जमीन नहीं खरीद सकते हैं.
भारतीय संविधान की धारा 360 जिसमें देश में वित्तीय आपातकाल लगाने का प्रावधान है, वह भी जम्मू और कश्मीर पर लागू नहीं होती. मोदी का यह बयान भाजपा की सोची समझी रणनीति का एक हिस्सा हो सकता है क्योंकि पार्टी शुरू से ही राममंदिर निर्माण, धारा 370 और समान नागरिक संहिता को अपने घोषणा-पत्र में शामिल करती रही है.