गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

सांप्रदायिक हिंसा बिल :आप दोषी हो, ना हो जेल जाओ..!


सांप्रदायिक हिंसा बिल :आप दोषी हो, ना हो  जेल जाओ..!
विनोद बंसल

अभी हाल ही में यूपीए अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद द्वारा एक विधेयक का मसौदा तैयार किया गया है। इसका नाम सांप्रदायिक एव लक्षित हिंसा रोकथाम (न्याय एवं क्षतिपूर्ति) विधेयक 2011 ['Prevention of Communal and Targeted Violence (Access to Justice and Reparations) Bill,2011'] है। ऐसा लगता है कि इस प्रस्तावित विधेयक को अल्पसंख्यकों का वोट बैंक मजबूत करने का लक्ष्य लेकर, हिन्दू समाज, हिन्दू संगठनों और हिन्दू नेताओं को कुचलने के लिए तैयार किया गया है। साम्प्रदायिक हिंसा रोकने की आड़ में लाए जा रहे इस विधेयक के माध्यम से न सिर्फ़ साम्प्रदायिक हिंसा करने वालों को संरक्षण मिलेगा बल्कि हिंसा
के शिकार रहे हिन्दू समाज तथा इसके विरोध में आवाज उठानेवाले हिन्दू संगठनों का दमन करना आसान होगा। इसके अतिरिक्त यह विधेयक संविधान की मूल भावना के विपरीत राज्य सरकारों के कार्यों में हस्तक्षेप कर देश के संघीय ढांचे को भी ध्वस्त करेगा। ऐसा प्रतीत होता है कि इसके लागू होने पर भारतीय समाज में परस्पर अविश्वास और विद्वेष की खाई इतनी बड़ी और गहरी हो जायेगी जिसको पाटना किसी के लिए भी सम्भव नहीं होगा।

मजे की बात यह है कि एक समानान्तर व असंवैधानिक सरकार की तरह काम कर रही राष्ट्रीय सलाहकार परिषद बिना किसी जवाब देही के सलाह की आड़ में केन्द्र सरकार को आदेश देती है और सरकार दासत्व भाव से उनको लागू करने के लिए हमेशा तत्पर रहती है। जिस ड्राफ्ट कमेटी ने इस विधेयक को बनाया है, उसका चरित्र ही इस विधेयक के इरादे को स्पष्ट कर देता है। जब इसके सदस्यों और सलाहकारों में हर्ष मंडेर, अनु आगा, तीस्ता सीतलवाड़, फराह नकवी जैसे हिन्दू विद्वेषी तथा सैयद शहाबुद्दीन, जॉन दयाल, शबनम हाशमी और नियाज फारुखी जैसे घोर साम्प्रदायिक शक्तियों के हस्तक हों तो विधेयक के इरादे क्या होंगे, आसानी से कल्पना की जा सकती है। आखिर ऐसे लोगों द्वारा बनाया गया दस्तावेज उनके चिन्तन के विपरीत कैसे हो सकता है।
जिस समुदाय की रक्षा के बहाने से इस विधेयक को लाया गया है इसको इस विधेयक में 'समूह' का नाम दिया गया है। इस 'समूह' में कथित धार्मिक व भाषाई अल्पसंख्यकों के अतिरिक्त दलित व वनवासी वर्ग को भी सम्मिलित किया गया है। अलग-अलग भाषा बोलने वालों के बीच सामान्य विवाद भी भाषाई अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक विवाद का रूप धारण कर सकते हैं। इस प्रकार के विवाद
[ जारी है ]


किस प्रकार के सामाजिक वैमनस्य को जन्म देंगे, इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है। विधेयक अनुसूचित जातियों व जनजातियों को हिन्दू समाज से अलग कर समाज को भी बांटने का कार्य करेगा। कुछ वर्गों में पारस्परिक असंतोष के बावजूद उन सबका यह विश्वास है कि उनकी समस्याओं का समाधान हिन्दू समाज के अंगभूत बने रहने पर ही हो सकता है।
यह विधेयक मानता है कि बहुसंख्यक समाज हिंसा करता है और अल्पसंख्यक समाज उसका शिकार होता है जबकि भारत का इतिहास कुछ और ही बताता है। हिन्दू ने कभी भी गैर हिन्दुओं को सताया नहीं, उनको संरक्षण ही दिया है। उसने कभी हिंसा नहीं की, वह हमेशा हिंसा का शिकार हुआ है। क्या यह सरकार हिन्दू समाज को अपनी रक्षा का अधिकार भी नहीं देना चाहती ? क्या हिन्दू की नियति सेक्युलर बिरादरी के संरक्षण में चलने वाली साम्प्रदायिक हिंसा से कुचले जाने की ही है ? किसी भी महिला के शील पर आक्रमण होना, किसी भी सभ्य समाज में उचित नहीं माना जाता। यह विधेयक एक गैर हिन्दू महिला के साथ किए गए दुर्व्यवहार को तो अपराध मानता है; परन्तु हिन्दू महिला के साथ किए गए बलात्कार को अपराध नहीं मानता जबकि साम्प्रदायिक दंगों में हिन्दू महिला का शील ही विधर्मियों के निशाने पर रहता है।

इस विधेयक में प्रावधान है कि 'समूह' के व्यापार में बाधा डालने पर भी यह कानून लागू होगा। इसका अर्थ है कि अगर कोई अल्पसंख्यक बहुसंख्यक समाज के किसी व्यक्ति का मकान खरीदना चाहता है और वह मना कर देता है तो इस अधिनियम के अन्तर्गत वह हिन्दू अपराधी घोषित हो जायेगा। इसी प्रकार अल्पसंख्यकों के विरुद्ध घृणा का प्रचार भी अपराध माना गया है। यदि किसी
बहुसंख्यक की किसी बात से किसी अल्पसंख्यक को मानसिक कष्ट हुआ है तो वह भी अपराध माना जायेगा। अल्पसंख्यक वर्ग के किसी व्यक्ति के अपराधिक कृत्य का शाब्दिक विरोध भी इस विधेयक के अन्तर्गत अपराध माना जायेगा। यानि अब अफजल गुरु को फांसी की मांग करना, बांग्लादेशी घुसपैठियों के निष्कासन की मांग करना, धर्मान्तरण पर रोक लगाने की मांग करना भी अपराध बन जायेगा।
दुनिया के सभी प्रबुध्द नागरिक जानते हैं कि हिन्दू धर्म, हिन्दू, देवी-देवताओं व हिन्दू संगठनों के विरुध्द कौन विषवमन करता है। माननीय न्यायपालिका ने भी साम्प्रदायिक हिंसा की सेक्युलरिस्टों द्वारा चर्चित सभी घटनाओं के मूल में इस प्रकार के हिन्दू विरोधी साहित्यों व भाषणों को ही पाया है। गुजरात की बहुचर्चित घटना गोधरा में 59 रामभक्तों को जिन्दा जलाने की प्रतिक्रिया के कारण हुई, यह तथ्य अब कई आयोगों के द्वारा स्थापित किया जा चुका है। अपराध करने वालों को संरक्षण देना और प्रतिक्रिया करने वाले समाज को दण्डित करना किसी भी प्रकार से उचित नहीं माना जा सकता। किसी निर्मम तानाशाह के इतिहास में भी अपराधियों को इतना बेशर्म संरक्षण कहीं नहीं दिया गया होगा।

भारतीय संविधान की मूल भावना के अनुसार किसी आरोपी को तब तक निरपराध माना जायेगा जब तक वह दोषी सिद्ध न हो जाये; परन्तु, इस विधेयक में आरोपी तब तक दोषी माना जायेगा जब तक वह अपने आपको निर्दोष सिद्ध न कर दे। इसका मतलब होगा कि किसी भी गैर हिन्दू के लिए अब किसी हिन्दू को जेल भेजना आसान हो जाएगा। वह केवल आरोप लगाएगा और पुलिस अधिकारी आरोपी हिन्दू को जेल में डाल देगा। इस विधेयक के प्रावधान पुलिस अधिकारी को इतना कस देते हैं कि वह उसे जेल में रखने का पूरा प्रयास करेगा ही क्योंकि उसे अपनी प्रगति रिपोर्ट शिकायतकर्ता को निरंतर भेजनी होगी। यदि किसी संगठन के कार्यकर्ता पर साम्प्रदायिक घृणा का कोई आरोप है तो उस संगठन के मुखिया पर भी शिकंजा कसा जा सकता है। इसी प्रकार यदि कोई प्रशासनिक अधिकारी हिंसा रोकने में असफल है तो राज्य का मुखिया भी जिम्मेदार माना जायेगा।
यही नहीं किसी सैन्य बल, अर्ध्दसैनिक बल या पुलिस के कर्मचारी को तथाकथित हिंसा रोकने में असफल पाए जाने पर उसके मुखिया पर भी शिकंजा कसा जा सकता है।

भारतीय संविधान के अनुसार कानून व्यवस्था राज्य सरकार का विषय है। केन्द्र सरकार केवल सलाह दे सकती है। इससे भारत का संघीय ढांचा सुरक्षित रहता है; परन्तु इस विधेयक के पारित होने के बाद अब इस विधेयक की परिभाषित 'साम्प्रदायिक हिंसा' राज्य के भीतर आंतरिक उपद्रव के रूप में देखी जायेगी और केन्द्र सरकार को किसी भी विरोधी दल द्वारा शासित राज्य में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप का अधिकार मिल जायेगा। इसलिए यह विधेयक भारत के संघीय ढांचे को भी ध्वस्त कर देगा। विधेयक अगर पास हो जाता है तो हिन्दुओं का भारत में जीना दूभर हो जायेगा। देश द्रोही और हिन्दू द्रोही तत्व खुलकर भारत और हिन्दू समाज को समाप्त करने का षडयन्त्र करते रहेंगे; परन्तु हिन्दू संगठन इनको रोकना तो दूर इनके विरुध्द आवाज भी नहीं उठा पायेंगे। हिन्दू जब अपने आप को कहीं से भी संरक्षित नहीं पायेगा तो धर्मान्तरण का कुचक्र तेजी से प्रारम्भ हो
जायेगा। इससे भी भयंकर स्थिति तब होगी जब सेना, पुलिस व प्रशासन इन अपराधियों को रोकने की जगह इनको संरक्षण देंगे और इनके हाथ की कठपुतली बन देशभक्त हिन्दू संगठनों के विरुध्द कार्यवाही करने के लिए मजबूर हो जायेंगे।

इस विधेयक के कुछ ही तथ्यों का विश्लेषण करने पर ही इसका भयावह चित्र सामने आ जाता है। इसके बाद आपातकाल में लिए गए मनमानीपूर्ण निर्णय भी फीके पड़ जायेंगे। हिन्दू का हिन्दू के रूप में रहना मुश्किल हो जायेगा। देश के प्रधान मंत्री श्री मनमोहन सिंह ने पहले ही कहा था कि देश के
संसाधनों पर मुसलमानों का पहला अधिकार है। यह विधेयक उनके इस कथन का ही एक नया संस्करण लगता है। किसी राजनीतिक विरोधी को भी इसकी आड़ में कुचलकर असीमित काल के लिए किसी भी जेल में डाला जा सकता है।

इस खतरनाक कानून पर अपनी गहरी चिन्ता व्यक्त करते हुए विश्व हिन्दू परिषद
की केन्द्रीय प्रबन्ध समिति की अभी हाल ही में सम्पन्न प्रयाग बैठक में भी एक प्रस्ताव पारित किया गया है। इस प्रस्ताव में कहा गया है कि विहिप इस विधेयक को रोलट एक्ट से भी अधिक खतरनाक मानती है। और सरकार को चेतावनी देती है कि वह अल्पसंख्यकों के वोट बैंक को मजबूत करने के लक्ष्य को पूरा करने के लिए हिन्दू समाज और हिन्दू संगठनों को कुचलने के अपने कुत्सित और अपवित्र इरादे को छोड़ दे। यदि वे इस विधेयक को लेकर आगे बढ़ते हैं तो हिन्दू समाज एक प्रबल देशव्यापी आन्दोलन करेगा। विहिप ने देश के राजनीतिज्ञों, प्रबुध्द वर्ग व हिन्दू समाज तथा पूज्य संतों से अपील भी की है कि वे केन्द्र सरकार के इस पैशाचिक विधेयक को रोकने के लिए सशक्त प्रतिकार करें।
आइये हम सभी राष्ट्र भक्त मिल कर इस काले कानून के खिलाफ़ अपनी आवाज बुलन्द करते हुए भारत के प्रधान मंत्री व राष्ट्रपति को लिखें तथा एक व्यापक जन जागरण के द्वारा अपनी बात को जन-जन तक पहुंचाएं। कहीं ऐसा न हो कि कोई हमें कहे कि अब पछताये क्या होत है जब चिडिया चुग गई खेत?

पता : 329, संत नगर, पूर्वी कैलाश, नई दिल्ली - 110065
Email : vinodbansal01@gmail.com
----------------------------------------------
सांप्रदायिक हिंसा बिल आज संसद में!
नवभारत टाइम्स | Dec 17, 2013, विशेष संवाददाता, नई दिल्ली

प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में सोमवार को हुई कैबिनेट कमिटी की मीटिंग में सांप्रदायिक हिंसा रोकने के विधेयक को मंजूरी दी गई। इसे मंगलवार को लोकसभा में पेश किया जा सकता है। बीजेपी नेता नरेंद्र मोदी के जोरदार विरोध के बाद सरकार ने बिल के कुछ प्रावधानों में बदलावों को स्वीकार कर लिया है। अब इसे कम्युनिटी न्यूट्रल यानी समुदायों के प्रति तटस्थ बनाया गया है। पहले प्रस्ताव था कि प्रभावित इलाके में बहुसंख्यक समुदाय को ही हिंसा का जिम्मेदार माना जाएगा। हिंसा से निपटने में विधायिका की भूमिका को भी कम कर दिया गया है। हिंसा की स्थिति में केंद्र के सीधे दखल के प्रस्ताव को नरम बना दिया गया है। अब राज्य चाहे तो हालात से निपटने के लिए सेना आदि की मांग केंद्र से कर सकेगा।

प्रस्तावित विधेयक में ये कहा गया था

- प्रिवेंशन ऑफ कम्यूनल वॉयलेंस (एक्सेस टु जस्टिस ऐंड रिप्रेजेंटेशंस) बिल 2013 का मकसद केंद्र, राज्य और उनके अधिकारियों को सांप्रदायिक हिंसा को ट्रांसपेरेंसी के साथ रोकने के लिए जिम्मेदार बनाना है। इस कानून के तहत केंद्र और राज्य सरकारों को जिम्मेदारी दी गई है कि वे शेड्यूल्ड कास्ट, शेड्यूल्ड ट्राइब्स, धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को निशाना बनाकर की गई हिंसा को रोकने, नियंत्रित करने के लिए अपने अधिकारों का इस्तेमाल करें।

- कोई भी व्यक्ति जो अकेले, किसी संस्था का हिस्सा बनकर या किसी संस्था के प्रभाव में किसी खास धार्मिक या भाषाई पहचान वाले 'ग्रुप' के खिलाफ गैरकानूनी ढंग से हिंसा, धमकी या यौन उत्पीड़न में शामिल होता है तो वह संगठित सांप्रदायिक हिंसा का आरोपी होगा। बिल में ग्रुप की जो परिभाषा दी गई है, उसका मतलब धार्मिक या भाषाई तौर पर अल्पसंख्यकों से है। इस कानून के जरिए हेट प्रोपेगैंडा, कम्युनल वॉयलेंस के लिए फंडिंग, उत्पीड़न और पब्लिक सर्वेंट्स द्वारा ड्यूटी को न निभाना भी अपराध की श्रेणी में लाया गया है।

- ब्यूरोक्रेट्स और पब्लिक सर्वेंट्स के दंगों से निपटने के दौरान चूक के प्रति उन्हें जवाबदेह बनाया गया है। दंगों को कंट्रोल करने या रोकने में नाकाम रहने पर एफआईआर दर्ज की जा सकती है। अधिकारियों द्वारा एक खास धार्मिक या भाषाई पहचान वाले ग्रुप के खिलाफ जानबूझकर पीड़ा पहुंचाए जाने की स्थिति में जुर्माने का प्रावधान भी है। जूनियरों, सहयोगियों द्वारा दंगों को रोकने में नाकामी की स्थिति में या फोर्सेज को ठीक ढंग से सुपरवाइज न करने की स्थिति में सीनियर अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की गई है।

- संगठित सांप्रदायिक हिंसा के लिए उम्रकैद, जबकि नफरत भरा प्रचार फैलाने के लिए 3 साल तक की सजा या जुर्माना या दोनों का प्रावधान है। ड्यूटी ठीक से न निभाने के लिए 2 से 5 साल तक की कैद और आदेश के उल्लंघन की दशा में 10 साल तक की सजा तय की गई है। मृत शख्स के करीबियों को 7 लाख रुपये का मुआवजा का प्रवधान।

इसलिए हो रहा था विरोध
- इस बिल के प्रावधानों को लेकर बीजेपी के पीएम कैंडिडेट नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कुछ राज्यों के मुख्यमंत्रियों को चिट्ठी लिख चुके हैं। यूपीए को समर्थन देने वाली पार्टियां एसपी और बीएसपी भी इससे राज्यों के अधिकार में दखल पड़ने का अंदेशा जता चुकी हैं। तृणमूल कांग्रेस, तमिलनाडु की एआईएडीएमके और ओडिशा की बीजेडी ने भी इस तरह की शंका जताई थी।

- बीजेपी ने बिल के ओरिजिनिल ड्रॉफ्ट पर सवाल उठाते हुए कहा था कि यह बिल बहुसंख्यक समाज के खिलाफ है और राज्यों की शक्तियों में दखल देने वाला है। पार्टी के मुताबिक, केंद्र उन मुद्दों पर कानून बना रहा है जो राज्य के अधिकारों की जद में आता है। सांप्रदायिक हिंसा को कानून-व्यवस्था का मामला माना जाता है, जो राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आता है।

- मोदी का कहना था कि यह बिल धार्मिक और भाषाई आधार पर समाज को बांटने वाला है क्योंकि इससे धार्मिक और भाषाई पहचान हमारे समाज में मजबूत हो चलेगी और आसानी से हिंसा के साधारण घटना को भी सांप्रदायिक रंग दिया जा सकेगा। यह कानून धार्मिक और भाषाई पहचान वाले नागरिकों के लिए आपराधिक कानूनों को अलग-अलग ढंग से अप्लाई करने का मौका दे सकता है।

- बिल के ब्रीच ऑफ कमांड रिस्पॉन्सिबिलिटी के प्रावधान के मुताबिक, एक पब्लिक सर्वेंट को उसके मातहतों की नाकामी के लिए सजा का प्रावधान है। बीजेपी का कहना था कि इसकी वजह से सीनियर अधिकारी आपराधिक उत्तरदायित्व के डर से दखल देने से दूरी बनाए रखेंगे और जूनियरों को फील्ड में अपनी हालत पर छोड़ देंगे। साथ ही अधिकारियों को राजनीतिक तौर पर निशाना बनाए जाने की कोशिशों को बल मिलेगा।

- दंगों के पीड़ित अल्पसंख्यक समूह धार्मिक, भाषायी और सांस्कृतिक किसी भी प्रकार के हो सकते हैं। इसके तहत अनुसूचित जाति-जनजाति समूहों की रक्षा के उपाय भी हैं। देखा जाए तो सैद्धांतिक रूप में जहां हिंदू अल्पसंख्यक होंगे, वहां उन्हें इस कानून का लाभ मिलेगा, लेकिन उन इलाकों में जहां अन्य समुदाय और इनका अंतर ज्यादा नहीं है, किस तरह से कार्रवाई होगी, यह स्पष्ट नहीं है।

- एक से अधिक अल्पसंख्यक 'समूहों' के बीच टकराव की स्थिति में क्या होगा, इस बारे में बिल कोई साफ तौर पर नजरिया पेश नहीं करता। बीजेपी इस बिल को लेकर प्रमुख तौर पर दलील दे रही है कि इस बिल से ऐसा इंप्रेशन पड़ेगा कि सांप्रदायिक हिंसा केवल बहुसंख्यक वर्ग ही करता है।

- बिल की धारा-6 में साफ किया गया है कि इसके अंतर्गत एससी, एसटी के खिलाफ हुआ अपराध उन अपराधों के अलावा है जो अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के अधीन आते हैं। बिल के विरोधियों का कहना है कि क्या एक ही अपराध के लिए दो बार सजा दी जा सकती है?

- कुछ आलोचकों का कहना है कि धारा 7 के मुताबिक, दंगों के हालत में अगर बहुसंख्यक समुदाय से जुड़ी महिला के साथ अगर रेप होता है तो यह इस बिल के तहत अपराध की श्रेणी में नहीं आएगा क्योंकि बहुसंख्यक महिला 'ग्रुप' की डेफिनिशन में नहीं आएगी।

श्रीमती वसुन्धरा राजे : मुख्यमंत्री, राजस्थान


श्रीमती वसुन्धरा राजे, माननीया मुख्यमंत्री, राजस्थान

 राजनीति और समाज सेवा के माध्यम से आमजन के हितों के लिए समर्पित एवं प्रतिबद्ध श्रीमती वसुन्धरा राजे का जन्म 8 मार्च, 1953 को मुम्बई में हुआ। तत्कालीन ग्वालियर रियासत की राजमाता विजया राजे सिन्धिया तथा महाराजा जीवाजीराव की पांच सन्तानों में से आप चौथी हैं। आपने अपनी स्कूली शिक्षा प्रजेन्टेशन कान्वेंट, कोडईकनाल में पूरी की। तत्पश्चात सोफिया कॉलेज, मुम्बई विश्वविद्यालय, मुम्बई (महाराष्ट्र) से अर्थशास्त्र तथा राजनीति विज्ञान में स्नातक (ऑनर्स) उपाधि प्राप्त की। आपका विवाह 17 नवम्बर, 1972 को धौलपुर के पूर्व महाराजा हेमन्त सिंह के साथ हुआ। तभी से श्रीमती राजे का राजस्थान से संबंध है जो समय के साथ और व्यापक एवं प्रगाढ़ होता जा रहा है। आपके एक पुत्र दुष्यंत सिंह जी है , जो कि झालावाड़ से लोकसभा संसद हैं ।
श्रीमती राजे को अपनी माता विजया राजे सिन्धिया से समाज सेवा तथा राजनीतिक चेतना के संस्कार मिले। आप बाल्यावस्था से ही जन कल्याणकारी कार्यों में सक्रिय योगदान देती रही हैं। जनसेवा और राजनीति के माहौल में पली-बढ़ी श्रीमती राजे में परमार्थ सेवा के गुण स्वतः ही विकसित होते गए।

श्रीमती वसुन्धरा राजे के सार्वजनिक जीवन का आरम्भ 1984 में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य के रूप में हुआ। आप 1985-87 तथा 1987-89 तक प्रदेश भाजपा युवा मोर्चा की उपाध्यक्ष रहीं। आप 1985 से 1989 तक धौलपुर विधानसभा क्षेत्र से राज्य विधानसभा की सदस्य रहीं। 1987 से 1989 तक आप भारतीय जनता पार्टी की प्रदेश इकाई की उपाध्यक्ष रहने के पश्चात् 1989 में पहली बार झालावाड़ से लोकसभा के लिए निर्वाचित हुई। तब से लगातार पांच बार 1991, 1996, 1998, 1999 में उसी निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा के लिए निर्वाचित होती रहीं। आपने संसदीय दल की संयुत सचिव का पदभार संभाला। श्रीमती वसुन्धरा राजे 1989 से सितम्बर 2002 तक भाजपा की राष्ट्रीय एवं प्रदेश कार्य समिति की सदस्य रहीं।

श्रीमती वसुन्धरा राजे की कार्य कुशलता एवं दक्षता के परिणाम स्वरूप 1998-99 में केन्द्र सरकार में श्री अटल बिहारी वाजपेयी मंत्रिमण्डल में उन्हें राज्यमंत्री का दायित्व सौंपा गया जिसका उन्होंने कुशलतापूर्वक निर्वहन किया। 13 अक्टूबर, 1999 को श्रीमती राजे को केन्द्रीय मंत्रिमंडल में फिर राज्य मंत्री के रूप में सम्मिलित किया गया और उन्हें स्वतंत्र प्रभार के रूप में लघु उद्योग, कार्मिक तथा प्रशिक्षण पेन्शन एवं पेन्शनर्स कल्याण, कार्मिक तथा सार्वजनिक शिकायत व पेन्शन मंत्रालय, परमाणु ऊर्जा विभाग तथा अंतरिक्ष विभाग आदि का दायित्व सौंपा गया।

श्रीमती वसुन्धरा राजे 12 सितम्बर, 2002 से 7 दिसम्बर, 2003 तक राजस्थान भाजपा की प्रदेशाध्यक्ष रहीं। इस दौरान श्रीमती राजे ने परिवर्तन यात्रा के माध्यम से पूरे प्रदेश की सघन यात्रा की और विकास बाधाओं और जनसमस्याओं को निकटता से देखा-समझा। आप 12वीं राजस्थान विधानसभा के लिए झालावाड़ के झालरापाटन क्षेत्र से निर्वाचित हुईं।

श्रीमती वसुन्धरा राजे को 8 दिसम्बर, 2003 से 10 दिसम्बर, 2008 तक राजस्थान की प्रथम महिला मुख्यमंत्री के बतौर कार्य करने का गौरव मिला। इस दौरान आपने राजस्थान के समग्र विकास तथा विकास से वंचित लोगों के उत्थान के कार्यों को सर्वाधिक महत्त्व दिया। उनके इस कार्यकाल के दौरान अक्षय कलेवा, मिड-डे-मील योजना, पन्नाधाय, भामाशाह योजना एवं हाडी रानी बटालियन तथा महिला सशक्तीकरण जैसे कार्य उल्लेखनीय हैं। आप 13वीं राजस्थान विधान सभा के लिए झालावाड़ के झालरापाटन क्षेत्र से पुनः निर्वाचित हुईं। आप 2 जनवरी, 2009 से 25 फरवरी, 2010 तक राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहीं।

श्रीमती राजे ने 8 फरवरी, 2013 को दूसरी बार राजस्थान भाजपा की प्रदेशाध्यक्ष का कार्यभार संभाला। आपने सुराज संकल्प यात्रा के माध्यम से पूरे प्रदेश में लगभग 14 हजार किलोमीटर की यात्रा कर जनता से सीधा संवाद स्थापित किया तथा उनकी कठिनाइयों और समस्याओं के बारे में जानकारी हासिल की। आप 14वीं राजस्थान विधानसभा के लिए झालावाड़ के झालरापाटन क्षेत्र से फिर निर्वाचित हुई हैं।

श्रीमती राजे की अध्ययन-मनन, संगीत, घुड़सवारी तथा बागवानी में विशेष अभिरुचि है। आपने अब तक जनहित के उद्देश्य से इंग्लैण्ड, जापान, चीन, बांग्लादेश, मिस्र, मोरको, श्रीलंका, दक्षिण कोरिया आदि देशों की यात्राएं की हैं। श्रीमती राजे को वर्ष 2007 में यूएनओ द्वारा महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए किये गये उल्लेखनीय कार्यों एवं प्रयासों के लिए “विमन टूगेदर अवार्ड” प्रदान किया गया।

श्रीमती वसुन्धरा राजे--9 दिसम्बर, 2013 को सर्व सम्मति से भारतीय जनता पार्टी विधायक दल की नेता निर्वाचित हुईं। आपने 13 दिसम्बर, 2013 को मुख्यमंत्री के रूप में राज्य शासन की दूसरी बार बागडोर संभाली है। श्रीमती राजे की परिकल्पना है कि राजस्थान समग्र रूप से विकसित एवं आधुनिक प्रदेश बने तथा देश में विकास की दृष्टि से प्रथम पंक्ति में अपना स्थान बनाए। आपका लक्ष्य राजस्थान का नव निर्माण कर हर चेहरे पर मुस्कान लाना है। निःशक्त, निर्बल एवं निर्धन वर्गों को संबल प्रदान करना आपकी प्राथमिकता है।


मुख्यमंत्री जी से संपर्क करें
निवास
13, सिविल लाईन्स,
जयपुर-302006
राजस्थान, भारत

फोन
: +91(141)2224400

: +91(141)2229900
फैक्स
: +91(141)2224400

: +91(141)2229900

कार्यालय
मुख्यमंत्री खण्ड, शासन सचिवालय,
जयपुर-302005
राजस्थान, भारत

फोन
: +91(141)2227656

: +91(141)2227716
फैक्स
: +91(141)2227687
ई-मेल : cmrajasthan@nic.in


 

Smt. Vasundhara Raje, Hon'ble Chief Minister, Rajasthan


Smt. Vasundhara Raje,  Hon'ble Chief Minister, Rajasthan

 Smt. Vasundhara Raje, who is committed and dedicated to welfare of the general public through politics and social service, was born on March 8, 1953 at Mumbai. She is 4th amongst five children of the then Rajmata of Gwalior State Smt. Vijaya Raje Scindia and Maharaja Jeevaji Rao. She completed her school education at Presentation Convent, Kodaikanal. After that she graduated in Economics and Political Science (Honours) from Sofia College, Mumbai University, Mumbai (Maharashtra). She got married to the former Maharaja of Dholpur State Sh. Hemant Singh on November 17, 1972. Then on, Smt. Raje association with Rajasthan started which got intensed and stronger with passage of time. She has a son.

Smt. Raje got the samskar of social service and political activism from her mother Smt. Vijaya Raje Scindia. She started participating actively in public welfare services from her childhood. She adopted the culture of service to the mankind in the atmosphere of political and public service she was brought up in.

Smt. Raje started her public life with her being nominated as  member in the national executive of Bhartiya Janata Party in 1984. She held the post of vice-president of the state Bhartiya Janata Yuva Morcha in 1985-87 and 1987-89.  She represented Dholpur constituency in the State Assembly between 1985 and 1989. After remaining vice president of the state unit of Bhartiya Janata Party, in 1989 she was elected to the Lok Sabha from Jhalawar constituency. Then on, she continued to represent the same constituency in the Lok Sabha for five times consequently in 1991, 1996, 1998 and 1999.  She held the position of joint secretary of parliamentary board. Between 1989 and September 2002 Smt. Vasundhara Raje remained the member of state and national executives of Bhartiya Janata Party.

As a result of her dedication and efficiency to work Smt. Vasundhara Raje was given the responsibility of the Minister of State in the Union Council of Ministers led by Shri Atal Bihari Vajpayee in 1998-99, which she accomplished proficiently.  On October 13, 1999 Smt. Raje was inducted again in the Union Council of Ministers as a Minister of State and she was given responsibility of the Small Industries, Personnel & Training, Pension & Pensioners Welfare, Personnel & Public Grievances  ministries, Atomic Energy Department and Space Department.

Smt. Vasundhara Raje was appointed as the state president of Bhartiya Janata Party from September 12, 2002 to December 7, 2003. During this period she carried out intensive rallies in the entire state during her Parivartan Yatra to understand problems of general public and obstacles in the path of development.

She was elected to the 12th Rajasthan Assembly from Jhalrapatan constituency of Jhalawar. Smt. Vasundhara Raje has the honour of being the first woman Chief Minister of Rajasthan from December 8, 2003 to December 10, 2008. During her tenure she gave utmost priority to comprehensive development and empowerment of the deprived sections of Rajasthan. Programmes like Akshaya Kaleva, Mid-Day Meal Scheme, Panna Dhay, Bhamashah Scheme, Hadi Rani Batalion and other woman empowerment schemes were initiated during her rule. She was re-elected to 13th Rajasthan Assembly from Jhalrapatan constituency of Jhalawar. She remained the Leader of Opposition in Rajasthan Assembly between January 2, 2009 and February 25, 2010.

Smt. Raje was entrusted with the state presidentship of Rajasthan Bharatiya Janata Party for the second time on February 8, 2013. She took a 14,000 kilometer long yatra to travel the state and establish a direct dialogue with the general public about their grievances and problems during her Suraaj Samkalp Yatra. She has been elected again to 14th Rajasthan Assembly from Jhalrapatan constituency of Jhalwar.

Smt. Raje has special interest in reading, music, horse-riding and gardening. With a motive of public welfare she has visited England, Japan, China, Bangladesh, Greece, Morocco, Srilanka, South Korea and other countries. Smt. Raje was honoured with Women Together Award by the United Nations Organisation in year 2007 for her exemplary contribution towards woman empowerment.

On December 9, 2013, Smt. Raje has been unanimously elected as the leader of newly-elected legislators of Bharatiya Janata Party.  She has now taken over the reins of the state government for the second time on December 13, 2013. Smt. Raje has envisioned for Rajasthan to be a comperhensively developed and modern state which stands in the frontline in regard to development. She has targeted to bring happiness on the face of every citizen of the state. Empowerment of the specially-abled, deprived and poor sections of the society is her first priority.