शनिवार, 11 जनवरी 2014

रियल पब्लिक हीरो ..जनता के असली जननायक



जनता के असली जननायक


रियल पब्लिक हीरो ...
7 अक्टूबर 2001 से लगातार जनता के द्वारा निर्वाचित होता आ रहा मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी । जिसे तीन विधानसभा चुनावों में पूर्ण बहूमत से जनता ने मुख्यमंत्री बनाया ।
यही तो है असली आम आदमी की पशंद !!


रियल पब्लिक हीरो ... ...
शिवराज सिंह चौहान .......लगातार 5 बार लोकसभा चुनाव जीते और चार बार विधायक चुने गये शिवराज सिंह को तीसरी वार लगातार मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।






रियल पब्लिक हीरो ...
रमन सिंह..... 1990 और 1993 में मध्यप्रदेश विधानसभा के सदस्य रहे। उसके बाद सन्1999 में वे लोकसभा के सदस्य चुने गये। 1999 और 2003 में उन्होंने भारत सरकार में राज्य मंत्री का भी पद संभाला। 2003 में हुये विधानसभा के चुनावों में उन्होंने सफलता पाई और 7 दिसंबर 2003 छत्तीसगढ़ राज्य के मुख्यमंत्री बने , 2008 और 2013 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने फिर से सफलता पायी और राज्य के तीसरी वार मुख्यमंत्री बने।


रियल पब्लिक हीरो ...
वसुंधरा राजे ..... लगातार 5 बार लोकसभा सांसद और चार बार विधानसभा सदस्य , लगातार तीसरी बार , केन्द्रीय मंत्रीमण्डल में राज्य मंत्री तथा दूसरी बार राजस्थान  की मुख्यमंत्री !

एक और स्वामी विवेकानन्द चाहिए - डा. सतीशचन्द्र मित्तल



एक और स्वामी विवेकानन्द चाहिए
साप्ताहिक पांचजन्य के ताजा अंक से  / तारीख: 11 Jan 2014
न मैकालेवादी,न मार्क्सवादी, न छद्म सेकुलरवादी, हम हैं भारतवासी
-डा. सतीश चन्द्र मित्तल-
स्वतंत्रता मिलने वाले के बाद  भारतीयों की स्वाभाविक आकांक्षा रही कि ब्रिटिश साम्राज्य की समाप्ती के साथ भारत की सोच तथा प्रशासनिक ढांचे में आमूल-चूल परिवर्तन होंगे, लेकिन देश में राजनीतिक सत्ता हस्तांतरण के अलावा कोई भी क्रांतिकारी परिवर्तन  नहीं हुआ। पिछले 67 वर्षों से शिक्षा, भाषा, सामाजिक व आर्थिक संरचना, संस्कृति, धर्म तथा अध्यात्म के क्षेत्रों में एक पत्नोन्मुख भटकाव की स्थिति बनी हुई है। प्रश्न है आखिर भारतीयों की मूल सोच क्या है?
शिक्षा पर कुठाराघात
सामान्यत: भारत जीवन की रीढ़-शिक्षा व्यवस्था अनेकों विदेशी आक्रमण व  घुसपैठ होने पर भी मनु से महात्मा गांधी तक सबल, सुदृढ़ तथा अक्षुण्ण रही। पठान और मुगल शासकों ने भी इसमें व्यवधान न डाला। परन्तु 1835 ई. में धूर्त मैकाले तथा बगुले विलियम बैटिंक ने अपनी गुप्त शिक्षा टिप्पणी तथा प्रस्ताव से भारतीयों के लिए अंग्रेजी शिक्षा माध्यम तथा यूरोपीय साहित्य, दर्शन तथा इतिहास का अध्ययन अनिवार्य कर डाला। उल्लेखनीय है कि पराधीनता के युग में भी 10 हजार भारतीयों ने हस्ताक्षर कर इसके विरुद्ध एक ज्ञापन देकर भयंकर रोष प्रकट किया (एच.शार्प, सलैक्शन फार जुकेशनल रिकार्डस, भाग एक, पृ. 124)। मैकाले ने प्रचलित संस्कृत भाषा को बेहूदा व इसके लिए छात्रवृत्ति को रिश्वत बतलाया। अंग्रेजी भाषा को नौकरी से जोड़ दिया, देश में ईसाईकरण की प्रक्रिया तेजी से प्रारंभ हुई। भारतीयों में आत्मविस्मृति, हीनता व स्वाभिमान शून्यता के भाव जगाने के योजनापूर्वक प्रयत्न हुए। परिणामस्वरूप भारत में  अंग्रेजी पढ़े लिखे एक वर्ग का निर्माण हुआ जो अंग्रेजी को राष्ट्रभक्ति का घोतक तथा ब्रिटिश राज्य को वरदान समझने लगा। राष्ट्रीय आंदोलन के वर्षों में भारत के राष्ट्रीय नेता सतत इसका विरोध करते रहे। महात्मा गांधी ने अपने लेखों में मैकाले की शिक्षा नीति की कटु आलोचना की। (देखें, मैकाले ड्रिम्स, यंग इंडिया, 19 मार्च 1928, पृ. 103)
परन्तु किसी भी राष्ट्रभक्त को स्वप्न में भी यह कल्पना न थी कि मैकाले के मरने के 155 वर्ष बाद भी भारत में मैकालेवाद का नव जन्म होगा। पाश्चात्य रगों में रचे-पचे तत्कालीन राजनीतिज्ञों ने इसे बनाए रखने के भरपूर प्रयत्न किए। परिणाम सामने है कि दो प्रतिशत अंग्रेजी जानने वालों ने 98 प्रतिशत भारतीय जनता की उपेक्षा की। भारतीय नागरिक ठगा सा रह गया। क्या कोई भारतीय ऐसा स्वार्थी भी होगा जो अपनी अज्ञानतावश संस्कृत को मृतभाषा कहेगा या भारत के 46 प्रतिशत लोगों की हिन्दी भाषा को देश निकाला देना चाहेगा। भारत में ही हिन्दी दिवस मनाने को विवश होगा। यह तब है जबकि नासा में वैज्ञानिकों को संस्कृत से अवगत कराया जा रहा हो। जर्मनी में संस्कृत विश्वविद्यालय खोला जा रहा है। विश्व के 280 विश्वविद्यालयों में संस्कृत पढ़ाई जाती है। अमरीका जैसे देश हिन्दी जानने के लिए उतावले हो रहे हैं, लेकिन भारत के कुछ गिने चुने अंग्रेज भक्त शिक्षाविद यह कह रहे हैं कि अंग्रेजी बिना जीवन चौपट हो जाएगा। उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले में मैकाले के जन्मदिवस (25 नवम्बर) पर इंगलिश देवी का मंदिर प्रतिष्ठित किया गया। वस्तुत: विश्व में भारतीय संसद एकमात्र देश की सर्वोच्च संस्था है जो विदेशी भाषा में अपना कार्य चलाती है। भाषाओं के इस मकड़जाल ने भारत की एकता और अखण्डता को बुरी तरह प्रभावित किया।
भारती जनभावना को प्रकट करते हुए महात्मा गांधी ने लिखा, विदेशी माध्यम ने मस्तिष्क को थका दिया है। हमारे बालकों के मन में अनावश्यक तनाव बढ़ गया है। इन्हें रटने वाला व नकलची बना दिया है। उन्हें मौलिक कार्य तथा विचार के लिए आयोग्य बना दिया है।
ढहा मार्क्सवाद
गत 75 वर्षों (1917-1991) में रूस, चीन, पूर्वर्ी यूरोप व अन्य साम्यवादी देशों में 10 करोड़ लोगों के भयंकर तथा कल्पनातीत नरसंहार से मार्क्सवाद विनष्ट हो गया (देखें, स्तेफानी कुर्त्व, द ब्लेक बुक आफ कम्युनिज्म : क्राइम, टेरर एण्ड रिप्रेशन, कैम्ब्रिज 1999 पृ. 4) यह सर्वविदित है विश्व में मार्क्सवाद व्यवहारिक दृष्टि से अतीत का संदर्भ बन गया है। अनेक विश्वविद्यालयों में ह्यपोस्ट-कम्युनिजम ह्ण पर अनेक शोध कार्य हो रहे हैं। पर भारत के कुछ गिनती के बुद्धिजीवी अभी भी इसकी शल्य चिकित्सा कर इसे पुन: जीवित करने का असफल प्रयास कर रहे हैं।
1920 में विदेशी भूमि ताशकन्द में जन्मी कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया मुख्यत: भारत के कट्टरपंथी मुसलमानों की देन है। यह सदैव रूस  और चीन को अपना मायका मानती रही है। इसकी भारतीय जीवन दर्शन तथा जीवन मूल्यों के प्रति कभी आस्था नहीं रही। उल्लेखनीय है मार्क्स के परम मित्र एंजेल्स ने परिवार व्यवस्था की कटु आलोचना की थी। परिवार में पति को पूंजीपति तथा पत्नी की स्थिति सर्वहारा की बतलाई है। एक विवाह व्यवस्था को नारी की खुली या छिपी हुई घरेलू दासता पर आधारित बतलाया है। वे वर्गभेद, तथा हिंसा के मार्ग के समर्थक है। भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन में इनकी भूमि सर्वदा राष्ट्र विरोधी, उपेक्षा तथा आलोचना की रही। महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए सभी जन आन्दोलनों को असफल करने का इनका भरपूर प्रयास रहा। असहयोग आंदोलन को ह्यक्रांतिकारी शक्तियों के साथ विश्वासघातह्ण तथा 1942 के आन्दोलन में इन्होंने ब्रिटिश एजेन्ट की भूमिका निभाई। महायुद्ध में भारतीय श्रमिकों को अंग्रेजों का साथ  देते हुए नारा दिया ह्यरात दिन तुम करो काम, हड़ताल का न लो अब नाम ह्ण। पाकिस्तान के निर्माण में वे मोहम्मद अली जिन्ना से भी अधिक उत्सुक रहे। गांधी, सुभाष तथा उनकी आजाद हिन्द फौज  को गालियां देने में सबसे आगे रहे। आर्थिक सहायता के लिए ये सोवियत रूस की ओर सदैव ताकते रहे।
भारत के राष्ट्रीय नेताओं ने भारत की धरती पर कभी इसकी जड़ें जमने न दी। महात्मा गांधी ने भौतिकवादी दृष्टिकोण की बजाय अध्यात्मपरक भारतीय दृष्टिकोण का प्रतिपादन किया, धर्म रहित राजनीति को मौत का फंदा बतलाया जो आत्मा को समाप्त करता है। सुभाषचंद्र बोस ने असली समाजवाद, कार्ल मार्क्स के ग्रंथों की बजाय भारत को विचारों तथा संस्कृति से घिरा बताया। डा. बी.आर. अंबेडकर ने भारतीय वामपंथियों को अपना जानी दुश्मन बनाया। डा. राम मनोहर लोहिया ने भारतीय राजनीति को यहां की संस्कृति से जोड़ने को कहा। श्री दीनदयाल उपाध्याय ने धर्म को राष्ट्र का प्राण तथा संस्कृति को उसकी आत्मा बतलाया। उन्होंने भारत के लिए न समाजवाद, न पूंजीवाद बल्कि एक तीसरे विकल्प एमात्मा मानववाद का संदेश दिया।
भारत में मार्क्सवाद की सर्वाधिक आलोचना कुछ कम्युनिस्ट नेताओं द्वारा ही हुई।  एस.एस. बाटलीवाला नामक प्रसिद्ध वामपंथी नेता को आश्चर्य है कि आखिर क्यों वामपंथियों ने राष्ट्रद्रोहिता तथा ब्रिटिश सरकार की चाटुकारिता के लिए बाध्य किया।
 छद्म सेकुलरवाद
अंग्रेजी शब्द सेकुलरिज्म भारत के संविधान में पहली बार 3 जनवरी 1977 को कांग्रेस प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी तथा कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया की मिली भगत से आया जब समूचे देश में आपातकाल था तथा देश के सभी नेता   एवं प्रमुख विचारक जेल में बंद थे, मात्र दस मिनट में संविधान में संशोधन कर पारित हो गया। वस्तुत: उपरोक्त विचार ब्रिटिश मानसिकता की उपज तथा यूरोप से आयातित किया गया है। इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग इंग्लैण्ड के जार्ज जैकब होलीयाक (1817-1906) में ने  तत्कालीन ब्रिटिश सरकार की पांथिक नीति के विरोध में किया तथा उस नीति से अपने को अलग घोषित किया। (विस्तार के लिए देखें, जैकब की पुस्तक ह्यद ओरीजन एण्ड नेचर आफ सेकुलरिज्मह्ण(लन्दन 1896 पृ. 581)
इससे पूर्व, भारतीय संविधान सभा में भी सेकुलर राज्य की मामूली चर्चा हुई थी। परन्तु इसे अस्वीकार कर दिया गया था। कांग्रेस के श्री लोकनाथ मिश्र ने इसे फिसलनकारी व इसे भारत की प्राचीन संस्कृति के दमन का तरीका बताया था।
भारत के संदर्भ में भारतीय जीवन दर्शन तथा परंपरा में पहले से धर्म का व्यापक  कार्य अर्थात कर्तव्य माना है। उसका अर्थ किसी भी अर्थ में धर्मोपासक के रूप में नहीं लिया गया। विश्व में एकमात्र हिन्दू धर्म है जो विश्व के प्रत्येक व्यक्ति को पूरी धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है (मा.गो. वैध, हिन्दुत्व पुराना सन्दर्भ, नए अनुबंध (नागपुर, 1979, पृ. 23) भारत सदैव धार्मिक उदारता की स्थली रहा है। भारत के  सभी राजाओं ने धर्मोपासना पद्धति के आधार पर भेदभाव नहीं किया। भारत में धर्म का प्रयोग राज्य विस्तार के लिए नहीं हुआ। भारत के पूर्व सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री गजेन्द्र गड़कर ने भारतीय परंपराओं एवं दर्शन का वर्णन करते हुए भारत की धार्मिक उदारता व सब पंथों के समाजरूप की बात की है (देखे, द कांस्टीट्यूशन आफ इंडिया, ईटस फिलोसोफिक्ल पोस्ट्रलेट्स) राजनीतिकों ने सेक्युलरिज्म के अर्थ भी अपने अपने हितों को ध्यान में रखकर गढ़े है। पर निश्चय ही इसका अर्थ धर्मनिरपेक्ष असंवैधानिक है जिसका दुरुपयोग अनेक राजनीतिज्ञ करते हैं।
ह्यस्वह्ण का ज्ञान
विचारणीय गंभीर विषय है कि भारतीय संकट की इस बेला में जब भारत आतंकवाद, नक्सलवाद, माओवाद से आतंकित है। देश की आंतरिक तथा बाहरी सीमाएं असुरक्षित है। देश महंगाई, घोटालों,  कालेधन तथा भ्रष्टाचार से व्याप्त है। विघटनकारी, अलगाववादी तथा देश को जोड़ने वाली कडि़यां कमजोर हो गई है। भारतीयों की दिशा क्या हो?
संभवत: हम ऋषियों-मनीषियों, गुरुओं तथा विद्वानों द्वारा दिए गये मार्गदर्शन को ओझल कर रहे हैं। आत्मविस्मृति से ग्रसित और संगठित सांस्कृतिक शक्ति का स्मरण नहीं कर रहे हैं। स्वामी विवेकानन्द ने पराधीन भारत के काल में भी हिन्दुत्व (भारतीयता) को राष्ट्रीय पहचान के रूप में प्रतिष्ठित किया था। उन्होंने संदेश दिया था कि गौरव से कहो, मैं हिन्दू (भारतीय) हूं। भारत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि तथा अनुभूति के आधार पर, भारतीयों को आत्मविस्मृति समाप्त कर, जागरूक हो, अपने बलबूते पर खड़े होने का आह्वान किया था। उन्होंने गौरवपूर्ण भावना से ओतप्रोत संस्कृत को सब भाषाओं की जननी तथा पंथनिरपेक्षता को हिन्दू धर्म का स्वाभाविक अंग बताया था। उन्होंने भारत की गरीबी, छुआछुत की समस्या, महिलाओं की दशा तथा जाति प्रथा की जटिलता पर समाधान प्रस्तुत किए थे, उन्हें पश्चिम के अंधानुकरण के विरुद्ध कड़ी चेतावनी देते हुए कहा था, क्या भारत कभी यूरोप बन सकता है। स्वयं ही उसका उत्तर दिया भारत सदा भारत रहना चाहिए। उन्होंने  देश की नवयुवकों को आगे बढ़कर राष्ट्रहित के कार्य करने को कहा था। राष्ट्र की उन्नति के लिए व्यक्ति निर्माण तथा राष्ट्र निर्माण में समन्वय सहयोग की बात की थी। उन्होंने भारतीयों को धर्म, संस्कृति, अध्यात्म के मार्ग से न केवल भारत, बल्कि विश्व कल्याण की बात रखी। उनको प्रत्येक भारतवासी के लिए घोषित किया था।
गर्व से कहा मैं भारतवासी हंू। प्रत्येक भारतवासी मेरा भाई है। भारतवासी मेरा प्राण है। भारत के देवी-देवता मेरे ईश्वर और वृद्धावस्था की काशी है। भारत की मिट्टी मेरा स्वर्ग है। भारत के कल्याण में ही मेरा कल्याण है (विवेकानन्द साहित्य भाग तीन पृ. 228)उपरोक्त युगदृष्टा स्वामी विवेकानन्द के भावों तथा विचारों से भारतीयों की दिशा स्पष्ट है। सच्चाई यह है कि हम न मैकालेवादी, न मार्क्सवादी, न छद्म सेकुलरवादी हैं हम हैं भारतवासी। भारतीय होना हमारा अतीत था, यह हमारा वर्तमान है और यही हमारा भविष्य होगा। 

स्वतंत्रता संग्राम के पितामह ”साइक्लॉनिक हिन्दू संत स्वामी विवेकानन्दजी “


12 जनवरी स्वामी विवेकानन्दजी की जयन्ति पर विषेश
स्वतंत्रता संग्राम के पितामह 
”साइक्लॉनिक हिन्दू संत स्वामी विवेकानन्दजी “
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अरविन्द सिसोदिया
स्वामी रामकृष्ण परमहंस के शिष्य, स्वामी विवेकानन्दजी के स्मरण मात्र से भारतवासी स्वाभिमान से भर उठते हैं और भारत की युवा शक्ति के वे पिछले 125 वर्षों से आईकाॅन हैं। स्वामीजी भारतमाता के वह सपूत थे जिन्हे स्वंय ईश्वर ने ही भारत के उद्दार के लिये,  उत्थान के लिये और पराधीनता से मुक्ति के स्वाभिमान जागरण हेतु भेजा था। उनमें अत्यंत विलक्षण प्रतिभा थी। वे परोक्ष रूप से भगवान शिव के अवतार माने जाते रहे हैं।
     उन्होने अमरीका के शिकागो शहर में 1893 में आयोजित उस विश्व धर्म संसद को अच्ंाभित कर दिया जो मात्र ईसाई श्रैष्ठता पर मुहर लगवानें के लिये आयोजित की गई थी। आयोजक स्वामीजी के बौद्धिक क्षमता से चकित थे उनके सम्बोधन प्रभाव और उसके धाराप्रवाह माधुर्य पर मोहित थे, वे उन्हे सबसे अंतिम वक्ताओं अर्थात प्रमुख वक्ता के रूप में बुलवाते थे ताकि धर्म संसद में आये श्रोता उन्हे सुनने के लोभ में रूके रहें । पूरा अमरीका उन पर मोहित था और तत्कालीन अमरीकन प्रेस उन के गुणगान में कसीदे पढ़ रहा था। वहाँ के लोगों को उन्होने भारतीय तत्वज्ञान की अद्भुत ज्योति प्रदान की। उनकी वक्तृत्व-शैली तथा ज्ञान को देखते हुए वहाँ के मीडिया ने उन्हें साइक्लॉनिक हिन्दू  ( तूफानी हिन्दू ) का नाम दिया था ।
नोबल पुरूस्कार धारी गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने एक बार कहा था “ यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो स्वामी विवेकानन्दजी को पढि़ये। उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पायेंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं।” रोमां रोलां ने उनके बारे में कहा था ” उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असम्भव है वे जहाँ भी गये, सर्वप्रथम ही रहे। वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी।“
          स्वामीजी स्वतंत्रता के भाव को भारतवासियों में भरते हुये तत्कालीन भारतवासियों से प्रश्न किया था कि ” ऐ भारत ! क्या दूसरों की ही हां में हां मिला कर, दूसरों की ही नकल कर, परमुखापेक्षी होकर इस दासों की सी दुर्बलता, इस घृणित जघन्य निष्ठुरता से ही तुम बडे-बडे अधिकार प्राप्त करोगे ? क्या इसी लज्जास्पद कापुरुषता से तुम वीरभोग्या स्वाधीनता प्राप्त करोगे?

         वे इस प्रश्न का उत्तर भी यूं देते थे ” ऐ भारत ! तुम मत भूलना कि तुम्हारे उपास्थ सर्वत्यागी उमानाथ शंकर हैं, मत भूलना कि तुम्हारी स्त्रियों का आदर्श सीता,सावित्री,दमयन्ती है। मत भूलना कि तुम्हारा जीवन इन्द्रिय सुख के लिए, अपने व्यक्तिगत सुख के लिए नहीं है। मत भूलना कि तुम जन्म से ही माता ( भारत माता ) के लिए बलिदान स्वरूप रखे गए हो, मत भूलना की तुम्हारा समाज उस विराट महामाया की छाया मात्र है, तुम मत भूलना कि नीच,अज्ञानी,दरिद्र,मेहतर तुम्हारा रक्त और तुम्हारे भाई हैं। ऐ वीर, साहस का साथ लो ! गर्व से बोलो कि मैं भारतवासी हूं और प्रत्येक भारतवासी, मेरा भाई है। बोलो कि अज्ञानी भारतवासी, दरिद्र भारतवासी, ब्राह्मण भारतवासी, चांडाल भारतवासी, सब मेरे भाई हैं। “
         वे अपने आव्हान को इस प्रकार गति प्रदान करते थे कि ” तुम भी कटिमात्र वस्त्रावृत्त होकर गर्व से पुकार कर कहो कि भारतवासी मेरा भाई है, भारतवासी मेरे प्राण हैं, भारत के देव-देवियाँ मेरे ईश्वर हैं। भारत का समाज मेरी शिशुसज्जा, मेरे यौवन का उपवन और मेरे वृद्धावस्था की वाराणसी है। भाई, बोलो कि भारत की मिट्टी मेरा स्वर्ग है, भारत के कल्याण में मेरा कल्याण है, और दिन-रात कहते रहो कि हे गौरीनाथ, हे जगदम्बे, मुझे मनुष्यत्व दो ! मां मेरी दुर्बलता और कापुरुषता दूर कर दो, मुझे मनुष्य बनाओ! “


        वे मात्र हिन्दू सन्त ही नहीं थे बल्कि हिन्दुत्व के पुर्न उत्थानकर्ता भी थे। एक महान देशभक्त, विचारक, उद्बोधक , मानवतावादी और प्रखर प्रवक्ता भी थे। उन्होने सामाजिक समरसता का एकीकरण करते हुये आव्हान किया था कि ” नया भारत निकल पड़े मोची की दुकान से, भड़भूँजे के भाड़ से, कल-कारखानों से, हाट - बाजार से , निकल पडे झाडि़यों, जंगलों, पहाड़ों, पर्वतों से। और उनकी यह स्वतंत्रता तथा स्वाभिमान से भरपूर अव्हान ही था जिसने भारत को स्वतंत्र होनें की उर्जा प्रदान की । इसीलिये उन्हे स्वतंत्रता संग्राम का पितामह भी कहा जाता है। “

उनका विश्वास था कि पवित्र भारतवर्ष धर्म एवं दर्शन की पुण्यभूमि है। यहीं बड़े-बड़े महात्माओं व ऋषियों का जन्म हुआ, यही संन्यास एवं त्याग की भूमि है तथा केवल यहीं आदिकाल से लेकर आज तक मनुष्य के लिये जीवन के सर्वोच्च आदर्श एवं मुक्ति के द्वार का अनुसंधान हुआ है। उनके कथन- ” उठो, जागो, स्वयं जागकर औरों को जगाओ। अपने नर-जन्म को सफल करो और तब तक नहीं रुको, जब तक कि लक्ष्य प्राप्त न हो जाये। “
स्वामी विवेकानन्दजी आडम्बरों और रूढि़यों के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने धर्म को मनुष्य की सेवा के केन्द्र में रखकर ही आध्यात्मिक चिंतन किया था। उनका कहना था कि  हिन्दू धर्म मानवता को पूरी तरह समर्पित है इसीलिये यह अनादिकाल से अनन्त तक मानव के साथ रहेगा । 
स्वामी विवेकानंदजी के ओजस्वी और सारगर्भित व्याख्यानों की प्रसिद्धि विश्व भर में है। उन्होंने कहा था कि ” मुझे बहुत से युवा संन्यासी चाहिये जो भारत के ग्रामों में फैलकर देशवासियों की सेवा में खप जायें। “
जीवन के अन्तिम दिन ४ जुलाई १९०२ को प्रतिदिन की भांती उन्होंने शुक्ल यजुर्वेद की व्याख्या की और इसी दौरान कहा था -” एक और विवेकानन्द चाहिये, यह समझने के लिये कि इस विवेकानन्द ने अब तक क्या किया है।“ लगता है कि उन्हे भारत के भविष्य का भान था और एक प्रकार से यह उनकी गूढ़ भविष्यवाणी थी। यही कारण है कि 1925 में नागपुर में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की स्थापना डाॅ. केशवबलीराम हेडगेवार ने की और इस संगठन ने अपने विचार संचयन में लगभग शतप्रतिशत स्वामी विवेकानन्दजी के विचारों को ग्रहण किया और उसी मार्ग से देशसेवा में रत है।
संघ ने भारतमाता और भगवाध्वज को अपना अधिष्ठान बना कर प्रचारक रूपी आधुनिक संत परम्परा का अविष्कार किया और भारतीय संस्कृति के उत्थानरूपी अभियुद्य के लिये समर्पित युवकों को प्रेरित किया, स्वामीजी के विचारों की तेजस्विता और ओजस्विता से भरपूर स्वंयसेवकों का निर्माण कर उन्हे गांव - गांव तक फैला कर स्वामीजी के स्वप्न को साकार करने में निरंतर प्रयासरत है।
पिछले दिनों संघ के वर्तमान सरसंघचालक परमपूज्य मोहन भागवत जी ने अयोध्या में अपने सम्बोधन में कहा भी था कि संघ स्वामी विवेकानन्दजी के बताये मार्ग पर चलता हैं। स्वामीजी और संघ में अटूट नाता है । जब स्वामीजी की 100वीं जयन्ति आई थी तक संघ के प्रयासों से ही कन्याकुमारी में स्वामीजी का भव्य स्मारक बनवाया गया । इस कार्य को सम्पन्न करने के लिये संघ का पूरा तंत्र जुटा था और भव्य निर्माण का कार्य हाथ में लिया तथा संघ के ही वरिष्ठ प्रचारक एकनाथ रानाडे जी की देखरेख में यह कार्य सम्पन्न हुआ था।
स्वामीजी की 150वीं जयन्ति को भी भव्य स्वरूप में मनाये जाने तथा उसे समाजोपयोगी बनाने का मार्गदशन संघ ने ही किया।  संघ का मुख्य लक्ष्य जन - जन में स्वामी जी के विचारों को पुनः अधिष्ठाति करना रहा । स्वामी जी को केन्द्रित करके हजारों की संख्या में मध्यम और बडे कार्यक्रम इस 150 वें वर्ष के दौरान वर्षपर्यन्त श्रृंखलाबद्ध सम्पन्न हुये हैंे । विभिन्न भाषाओं में स्वामीजी का साहित्य और विचारों को घर - घर पहुंचाया गया, भव्य शोभयात्रायें, नाट्य आयोजन, विचार मंथन कार्यशालायें, भारत जागो दौड़ सहित विविध प्रकार के कार्यक्रमों के द्वारा स्वामीजी के विचारों का जनजागरण किया गया । जिसने साक्षात स्वामी विवेकानन्द के दिग्दर्शन समाज को करवाये । सच यही है कि संघ स्वामीजी के स्वप्न के युवाओं की निर्माण भूमि है जहां प्रचारक के रूप में लाखों युवकों को स्वामीजी के विचारों से सिंचित कर स्वामी विवेकानन्दजी की नव श्रृंखला तैयार कर रहा है।
- अरविन्द सिसोदिया, साहित्य प्रमुख ,
स्वामी विवेकानन्द सार्द्ध शति समारोह समिति,कोटा महानागर
राधाकृष्ण मंदिर रोड़,
डडवाडा, कोटा जं2
पिनकोड 324002 राजस्थान।
09509559131 / 09414180151





http://ahwanmag.com/Critique-of-Aam-Admi-party
अरविन्द केजरीवाल राजीव गांधी फाउण्डेशन राष्ट्रीय सलाहकार परिषद
अरविन्द केजरीवाल-कम्युनिस्ट एक्टिविस्ट (सोनिया गांधी कि सलाहकार अरुणा रॉय कि टीम का मेंबर (2005-06) केजरीवाल का लेफ्ट ..... 21-05-2005 राजीव गांधी फाउन्डेशन नई दिल्ली की ओर से आयोजित सर्वेक्षण में देश के सभी राज्यों में गुजरात को श्रेष्ठ राज्य का ..... उन्होंने इसकी अन्तिम किश्त 2010 में दी गयी बतलायी और यह भी बतलाया कि 2011 में भी फाउण्डेशन ने एन.जी.ओ.

एक बहुत ही महत्वपूर्ण पोस्ट मुझे पढ़ने को मिली है , मुझे लगा कि यह आपको भी प्रस्तुत किया जाये 
Saturday, December 28, 2013
http://gauravharidwar.blogspot.in/2013/12/blog-post_2858.html
कैसे और क्‍यों बनाया अमेरिका ने अरविंद केजरीवाल को
कैसे और क्‍यों बनाया अमेरिका ने अरविंद केजरीवाल को, पढि़ए पूरी कहानी!

by -Sundeep Dev
28 December 2013 संदीप देव, नई दिल्‍ली।

 कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली एनजीओ गिरोह ‘राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी)’ ने घोर सांप्रदायिक ‘सांप्रदायिक और लक्ष्य केंद्रित हिंसा निवारण अधिनियम’ का ड्राफ्ट तैयार किया है। एनएसी की एक प्रमुख सदस्य अरुणा राय के साथ मिलकर अरविंद केजरीवाल ने सरकारी नौकरी में रहते हुए एनजीओ की कार्यप्रणाली समझी और फिर ‘परिवर्तन’ नामक एनजीओ से जुड़ गए। अरविंद लंबे अरसे तक राजस्व विभाग से छुटटी लेकर भी सरकारी तनख्वाह ले रहे थे और एनजीओ से भी वेतन उठा रहे थे, जो ‘श्रीमान ईमानदार’ को कानूनन भ्रष्‍टाचारी की श्रेणी में रखता है। वर्ष 2006 में ‘परिवर्तन’ में काम करने के दौरान ही उन्हें अमेरिकी ‘फोर्ड फाउंडेशन’ व ‘रॉकफेलर ब्रदर्स फंड’ ने 'उभरते नेतृत्व' के लिए ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ पुरस्कार दिया, जबकि उस वक्त तक अरविंद ने ऐसा कोई काम नहीं किया था, जिसे उभरते हुए नेतृत्व का प्रतीक माना जा सके। इसके बाद अरविंद अपने पुराने सहयोगी मनीष सिसोदिया के एनजीओ ‘कबीर’ से जुड़ गए, जिसका गठन इन दोनों ने मिलकर वर्ष 2005 में किया था।

अरविंद को समझने से पहले ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ को समझ लीजिए!
अमेरिकी नीतियों को पूरी दुनिया में लागू कराने के लिए अमेरिकी खुफिया ब्यूरो ‘सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (सीआईए)’ अमेरिका की मशहूर कार निर्माता कंपनी ‘फोर्ड’ द्वारा संचालित ‘फोर्ड फाउंडेशन’ एवं कई अन्य फंडिंग एजेंसी के साथ मिलकर काम करती रही है। 1953 में फिलिपिंस की पूरी राजनीति व चुनाव को सीआईए ने अपने कब्जे में ले लिया था। भारतीय अरविंद केजरीवाल की ही तरह सीआईए ने उस वक्त फिलिपिंस में ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ को खड़ा किया था और उन्हें फिलिपिंस का राष्ट्रपति बनवा दिया था। अरविंद केजरीवाल की ही तरह ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ का भी पूर्व का कोई राजनैतिक इतिहास नहीं था। ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ के जरिए फिलिपिंस की राजनीति को पूरी तरह से अपने कब्जे में करने के लिए अमेरिका ने उस जमाने में प्रचार के जरिए उनका राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय ‘छवि निर्माण’ से लेकर उन्हें ‘नॉसियोनालिस्टा पार्टी’ का उम्मीदवार बनाने और चुनाव जिताने के लिए करीब 5 मिलियन डॉलर खर्च किया था। तत्कालीन सीआईए प्रमुख एलन डॉउल्स की निगरानी में इस पूरी योजना को उस समय के सीआईए अधिकारी ‘एडवर्ड लैंडस्ले’ ने अंजाम दिया था। इसकी पुष्टि 1972 में एडवर्ड लैंडस्ले द्वारा दिए गए एक साक्षात्कार में हुई।

ठीक अरविंद केजरीवाल की ही तरह रेमॉन मेग्सेसाय की ईमानदार छवि को गढ़ा गया और ‘डर्टी ट्रिक्स’ के जरिए विरोधी नेता और फिलिपिंस के तत्कालीन राष्ट्रपति ‘क्वायरिनो’ की छवि धूमिल की गई। यह प्रचारित किया गया कि क्वायरिनो भाषण देने से पहले अपना आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए ड्रग का उपयोग करते हैं। रेमॉन मेग्सेसाय की ‘गढ़ी गई ईमानदार छवि’ और क्वायरिनो की ‘कुप्रचारित पतित छवि’ ने रेमॉन मेग्सेसाय को दो तिहाई बहुमत से जीत दिला दी और अमेरिका अपने मकसद में कामयाब रहा था। भारत में इस समय अरविंद केजरीवाल बनाम अन्य राजनीतिज्ञों की बीच अंतर दर्शाने के लिए छवि गढ़ने का जो प्रचारित खेल चल रहा है वह अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए द्वारा अपनाए गए तरीके और प्रचार से बहुत कुछ मेल खाता है।

उन्हीं ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ के नाम पर एशिया में अमेरिकी नीतियों के पक्ष में माहौल बनाने वालों, वॉलेंटियर तैयार करने वालों, अपने देश की नीतियों को अमेरिकी हित में प्रभावित करने वालों, भ्रष्‍टाचार के नाम पर देश की चुनी हुई सरकारों को अस्थिर करने वालों को ‘फोर्ड फाउंडेशन’ व ‘रॉकफेलर ब्रदर्स फंड’ मिलकर अप्रैल 1957 से ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ अवार्ड प्रदान कर रही है। ‘आम आदमी पार्टी’ के संयोजक अरविंद केजरीवाल और उनके साथी व ‘आम आदमी पार्टी’ के विधायक मनीष सिसोदिया को भी वही ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ पुरस्कार मिला है और सीआईए के लिए फंडिंग करने वाली उसी ‘फोर्ड फाउंडेशन’ के फंड से उनका एनजीओ ‘कबीर’ और ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ मूवमेंट खड़ा हुआ है।

भारत में राजनैतिक अस्थिरता के लिए एनजीओ और मीडिया में विदेशी फंडिंग!
‘फोर्ड फाउंडेशन’ के एक अधिकारी स्टीवन सॉलनिक के मुताबिक ‘‘कबीर को फोर्ड फाउंडेशन की ओर से वर्ष 2005 में 1 लाख 72 हजार डॉलर एवं वर्ष 2008 में 1 लाख 97 हजार अमेरिकी डॉलर का फंड दिया गया।’’ यही नहीं, ‘कबीर’ को ‘डच दूतावास’ से भी मोटी रकम फंड के रूप में मिली। अमेरिका के साथ मिलकर नीदरलैंड भी अपने दूतावासों के जरिए दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में अमेरिकी-यूरोपीय हस्तक्षेप बढ़ाने के लिए वहां की गैर सरकारी संस्थाओं यानी एनजीओ को जबरदस्त फंडिंग करती है।

अंग्रेजी अखबार ‘पॉयनियर’ में प्रकाशित एक खबर के मुताबिक डच यानी नीदरलैंड दूतावास अपनी ही एक एनजीओ ‘हिवोस’ के जरिए नरेंद्र मोदी की गुजरात सरकार को अस्थिर करने में लगे विभिन्‍न भारतीय एनजीओ को अप्रैल 2008 से 2012 के बीच लगभग 13 लाख यूरो, मतलब करीब सवा नौ करोड़ रुपए की फंडिंग कर चुकी है। इसमें एक अरविंद केजरीवाल का एनजीओ भी शामिल है। ‘हिवोस’ को फोर्ड फाउंडेशन भी फंडिंग करती है।

डच एनजीओ ‘हिवोस’ दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में केवल उन्हीं एनजीओ को फंडिंग करती है,जो अपने देश व वहां के राज्यों में अमेरिका व यूरोप के हित में राजनैतिक अस्थिरता पैदा करने की क्षमता को साबित करते हैं। इसके लिए मीडिया हाउस को भी जबरदस्त फंडिंग की जाती है। एशियाई देशों की मीडिया को फंडिंग करने के लिए अमेरिका व यूरोपीय देशों ने ‘पनोस’ नामक संस्था का गठन कर रखा है। दक्षिण एशिया में इस समय ‘पनोस’ के करीब आधा दर्जन कार्यालय काम कर रहे हैं। 'पनोस' में भी फोर्ड फाउंडेशन का पैसा आता है। माना जा रहा है कि अरविंद केजरीवाल के मीडिया उभार के पीछे इसी ‘पनोस' के जरिए 'फोर्ड फाउंडेशन' की फंडिंग काम कर रही है। ‘सीएनएन-आईबीएन’ व ‘आईबीएन-7’ चैनल के प्रधान संपादक राजदीप सरदेसाई ‘पॉपुलेशन काउंसिल’ नामक संस्था के सदस्य हैं, जिसकी फंडिंग अमेरिका की वही ‘रॉकफेलर ब्रदर्स’ करती है जो ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ पुरस्कार के लिए ‘फोर्ड फाउंडेशन’ के साथ मिलकर फंडिंग करती है।

माना जा रहा है कि ‘पनोस’ और ‘रॉकफेलर ब्रदर्स फंड’ की फंडिंग का ही यह कमाल है कि राजदीप सरदेसाई का अंग्रेजी चैनल ‘सीएनएन-आईबीएन’ व हिंदी चैनल ‘आईबीएन-7’ न केवल अरविंद केजरीवाल को ‘गढ़ने’ में सबसे आगे रहे हैं, बल्कि 21 दिसंबर 2013 को ‘इंडियन ऑफ द ईयर’ का पुरस्कार भी उसे प्रदान किया है। ‘इंडियन ऑफ द ईयर’ के पुरस्कार की प्रयोजक कंपनी ‘जीएमआर’ भ्रष्‍टाचार में में घिरी है।

‘जीएमआर’ के स्वामित्व वाली ‘डायल’ कंपनी ने देश की राजधानी दिल्ली में इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा विकसित करने के लिए यूपीए सरकार से महज 100 रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से जमीन हासिल किया है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ‘सीएजी’ ने 17 अगस्त 2012 को संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा था कि जीएमआर को सस्ते दर पर दी गई जमीन के कारण सरकारी खजाने को 1 लाख 63 हजार करोड़ रुपए का चूना लगा है। इतना ही नहीं, रिश्वत देकर अवैध तरीके से ठेका हासिल करने के कारण ही मालदीव सरकार ने अपने देश में निर्मित हो रहे माले हवाई अड्डा का ठेका जीएमआर से छीन लिया था। सिंगापुर की अदालत ने जीएमआर कंपनी को भ्रष्‍टाचार में शामिल होने का दोषी करार दिया था। तात्पर्य यह है कि अमेरिकी-यूरोपीय फंड, भारतीय मीडिया और यहां यूपीए सरकार के साथ घोटाले में साझीदार कारपोरेट कंपनियों ने मिलकर अरविंद केजरीवाल को ‘गढ़ा’ है, जिसका मकसद आगे पढ़ने पर आपको पता चलेगा।

‘जनलोकपाल आंदोलन’ से ‘आम आदमी पार्टी’ तक का शातिर सफर!
आरोप है कि विदेशी पुरस्कार और फंडिंग हासिल करने के बाद अमेरिकी हित में अरविंद केजरीवाल व मनीष सिसोदिया ने इस देश को अस्थिर करने के लिए ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ का नारा देते हुए वर्ष 2011 में ‘जनलोकपाल आंदोलन’ की रूप रेखा खिंची। इसके लिए सबसे पहले बाबा रामदेव का उपयोग किया गया, लेकिन रामदेव इन सभी की मंशाओं को थोड़ा-थोड़ा समझ गए थे। स्वामी रामदेव के मना करने पर उनके मंच का उपयोग करते हुए महाराष्ट्र के सीधे-साधे, लेकिन भ्रष्‍टाचार के विरुद्ध कई मुहीम में सफलता हासिल करने वाले अन्ना हजारे को अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली से उत्तर भारत में ‘लॉंच’ कर दिया। अन्ना हजारे को अरिवंद केजरीवाल की मंशा समझने में काफी वक्त लगा, लेकिन तब तक जनलोकपाल आंदोलन के बहाने अरविंद ‘कांग्रेस पार्टी व विदेशी फंडेड मीडिया’ के जरिए देश में प्रमुख चेहरा बन चुके थे। जनलोकपाल आंदोलन के दौरान जो मीडिया अन्ना-अन्ना की गाथा गा रही थी, ‘आम आदमी पार्टी’ के गठन के बाद वही मीडिया अन्ना को असफल साबित करने और अरविंद केजरीवाल के महिमा मंडन में जुट गई।

विदेशी फंडिंग तो अंदरूनी जानकारी है, लेकिन उस दौर से लेकर आज तक अरविंद केजरीवाल को प्रमोट करने वाली हर मीडिया संस्थान और पत्रकारों के चेहरे को गौर से देखिए। इनमें से अधिकांश वो हैं, जो कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के द्वारा अंजाम दिए गए 1 लाख 76 हजार करोड़ के 2जी स्पेक्ट्रम, 1 लाख 86 हजार करोड़ के कोल ब्लॉक आवंटन, 70 हजार करोड़ के कॉमनवेल्थ गेम्स और 'कैश फॉर वोट' घोटाले में समान रूप से भागीदार हैं।

आगे बढ़ते हैं...! अन्ना जब अरविंद और मनीष सिसोदिया के पीछे की विदेशी फंडिंग और उनकी छुपी हुई मंशा से परिचित हुए तो वह अलग हो गए, लेकिन इसी अन्ना के कंधे पर पैर रखकर अरविंद अपनी ‘आम आदमी पार्टी’ खड़ा करने में सफल रहे। जनलोकपाल आंदोलन के पीछे ‘फोर्ड फाउंडेशन’ के फंड को लेकर जब सवाल उठने लगा तो अरविंद-मनीष के आग्रह व न्यूयॉर्क स्थित अपने मुख्यालय के आदेश पर फोर्ड फाउंडेशन ने अपनी वेबसाइट से ‘कबीर’ व उसकी फंडिंग का पूरा ब्यौरा ही हटा दिया। लेकिन उससे पहले अन्ना आंदोलन के दौरान 31 अगस्त 2011 में ही फोर्ड के प्रतिनिधि स्टीवेन सॉलनिक ने ‘बिजनस स्टैंडर’ अखबार में एक साक्षात्कार दिया था, जिसमें यह कबूल किया था कि फोर्ड फाउंडेशन ने ‘कबीर’ को दो बार में 3 लाख 69 हजार डॉलर की फंडिंग की है। स्टीवेन सॉलनिक के इस साक्षात्कार के कारण यह मामला पूरी तरह से दबने से बच गया और अरविंद का चेहरा कम संख्या में ही सही, लेकिन लोगों के सामने आ गया।

सूचना के मुताबिक अमेरिका की एक अन्य संस्था ‘आवाज’ की ओर से भी अरविंद केजरीवाल को जनलोकपाल आंदोलन के लिए फंड उपलब्ध कराया गया था और इसी ‘आवाज’ ने दिल्ली विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए भी अरविंद केजरीवाल की ‘आम आदमी पार्टी’ को फंड उपलब्ध कराया। सीरिया, इजिप्ट, लीबिया आदि देश में सरकार को अस्थिर करने के लिए अमेरिका की इसी ‘आवाज’ संस्था ने वहां के एनजीओ, ट्रस्ट व बुद्धिजीवियों को जमकर फंडिंग की थी। इससे इस विवाद को बल मिलता है कि अमेरिका के हित में हर देश की पॉलिसी को प्रभावित करने के लिए अमेरिकी संस्था जिस ‘फंडिंग का खेल’ खेल खेलती आई हैं, भारत में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और ‘आम आदमी पार्टी’ उसी की देन हैं।

सुप्रीम कोर्ट के वकील एम.एल.शर्मा ने अरविंद केजरीवाल व मनीष सिसोदिया के एनजीओ व उनकी ‘आम आदमी पार्टी’ में चुनावी चंदे के रूप में आए विदेशी फंडिंग की पूरी जांच के लिए दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल कर रखी है। अदालत ने इसकी जांच का निर्देश दे रखा है, लेकिन केंद्रीय गृहमंत्रालय इसकी जांच कराने के प्रति उदासीनता बरत रही है, जो केंद्र सरकार को संदेह के दायरे में खड़ा करता है। वकील एम.एल.शर्मा कहते हैं कि ‘फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट-2010’ के मुताबिक विदेशी धन पाने के लिए भारत सरकार की अनुमति लेना आवश्यक है। यही नहीं, उस राशि को खर्च करने के लिए निर्धारित मानकों का पालन करना भी जरूरी है। कोई भी विदेशी देश चुनावी चंदे या फंड के जरिए भारत की संप्रभुता व राजनैतिक गतिविधियों को प्रभावित नहीं कर सके, इसलिए यह कानूनी प्रावधान किया गया था, लेकिन अरविंद केजरीवाल व उनकी टीम ने इसका पूरी तरह से उल्लंघन किया है। बाबा रामदेव के खिलाफ एक ही दिन में 80 से अधिक मुकदमे दर्ज करने वाली कांग्रेस सरकार की उदासीनता दर्शाती है कि अरविंद केजरीवाल को वह अपने राजनैतिक फायदे के लिए प्रोत्साहित कर रही है।

अमेरिकी ‘कल्चरल कोल्ड वार’ के हथियार हैं अरविंद केजरीवाल!
फंडिंग के जरिए पूरी दुनिया में राजनैतिक अस्थिरता पैदा करने की अमेरिका व उसकी खुफिया एजेंसी ‘सीआईए’ की नीति को ‘कल्चरल कोल्ड वार’ का नाम दिया गया है। इसमें किसी देश की राजनीति, संस्कृति व उसके लोकतंत्र को अपने वित्त व पुरस्कार पोषित समूह, एनजीओ, ट्रस्ट, सरकार में बैठे जनप्रतिनिधि, मीडिया और वामपंथी बुद्धिजीवियों के जरिए पूरी तरह से प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है। अरविंद केजरीवाल ने ‘सेक्यूलरिज्म’ के नाम पर इसकी पहली झलक अन्ना के मंच से ‘भारत माता’ की तस्वीर को हटाकर दे दिया था। चूंकि इस देश में भारत माता के अपमान को ‘सेक्यूलरिज्म का फैशनेबल बुर्का’ समझा जाता है, इसलिए वामपंथी बुद्धिजीवी व मीडिया बिरादरी इसे अरविंद केजरीवाल की धर्मनिरपेक्षता साबित करने में सफल रही।
एक बार जो धर्मनिरपेक्षता का गंदा खेल शुरू हुआ तो फिर चल निकला और ‘आम आदमी पार्टी’ के नेता प्रशांत भूषण ने तत्काल कश्मीर में जनमत संग्रह कराने का सुझाव दे दिया। प्रशांत भूषण यहीं नहीं रुके, उन्होंने संसद हमले के मुख्य दोषी अफजल गुरु की फांसी का विरोध करते हुए यह तक कह दिया कि इससे भारत का असली चेहरा उजागर हो गया है। जैसे वह खुद भारत नहीं, बल्कि किसी दूसरे देश के नागरिक हों?

प्रशांत भूषण लगातार भारत विरोधी बयान देते चले गए और मीडिया व वामपंथी बुद्धिजीवी उनकी आम आदमी पार्टी को ‘क्रांतिकारी सेक्यूलर दल’ के रूप में प्रचारित करने लगी। प्रशांत भूषण को हौसला मिला और उन्होंने केंद्र सरकार से कश्मीर में लागू एएफएसपीए कानून को हटाने की मांग करते हुए कह दिया कि सेना ने कश्मीरियों को इस कानून के जरिए दबा रखा है। इसके उलट हमारी सेना यह कह चुकी है कि यदि इस कानून को हटाया जाता है तो अलगाववादी कश्मीर में हावी हो जाएंगे।

अमेरिका का हित इसमें है कि कश्मीर अस्थिर रहे या पूरी तरह से पाकिस्तान के पाले में चला जाए ताकि अमेरिका यहां अपना सैन्य व निगरानी केंद्र स्थापित कर सके। यहां से दक्षिण-पश्चिम व दक्षिण-पूर्वी एशिया व चीन पर नजर रखने में उसे आसानी होगी। आम आदमी पार्टी के नेता प्रशांत भूषण अपनी झूठी मानवाधिकारवादी छवि व वकालत के जरिए इसकी कोशिश पहले से ही करते रहे हैं और अब जब उनकी ‘अपनी राजनैतिक पार्टी’ हो गई है तो वह इसे राजनैतिक रूप से अंजाम देने में जुटे हैं। यह एक तरह से ‘लिटमस टेस्ट’ था, जिसके जरिए आम आदमी पार्टी ‘ईमानदारी’ और ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ का ‘कॉकटेल’ तैयार कर रही थी।

8 दिसंबर 2013 को दिल्ली की 70 सदस्यीय विधानसभा चुनाव में 28 सीटें जीतने के बाद अपनी सरकार बनाने के लिए अरविंद केजरीवाल व उनकी पार्टी द्वारा आम जनता को अधिकार देने के नाम पर जनमत संग्रह का जो नाटक खेला गया, वह काफी हद तक इस ‘कॉकटेल’ का ही परीक्षण है। सवाल उठने लगा है कि यदि देश में आम आदमी पार्टी की सरकार बन जाए और वह कश्मीर में जनमत संग्रह कराते हुए उसे पाकिस्तान के पक्ष में बता दे तो फिर क्या होगा?

आखिर जनमत संग्रह के नाम पर उनके ‘एसएमएस कैंपेन’ की पारदर्शिता ही कितनी है? अन्ना हजारे भी एसएमएस कार्ड के नाम पर अरविंद केजरीवाल व उनकी पार्टी द्वारा की गई धोखाधड़ी का मामला उठा चुके हैं। दिल्ली के पटियाला हाउस अदालत में अन्ना व अरविंद को पक्षकार बनाते हुए एसएमएस कार्ड के नाम पर 100 करोड़ के घोटाले का एक मुकदमा दर्ज है। इस पर अन्ना ने कहा, ‘‘मैं इससे दुखी हूं, क्योंकि मेरे नाम पर अरविंद के द्वारा किए गए इस कार्य का कुछ भी पता नहीं है और मुझे अदालत में घसीट दिया गया है, जो मेरे लिए बेहद शर्म की बात है।’’

प्रशांत भूषण, अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और उनके ‘पंजीकृत आम आदमी’ ने जब देखा कि ‘भारत माता’ के अपमान व कश्मीर को भारत से अलग करने जैसे वक्तव्य पर ‘मीडिया-बुद्धिजीवी समर्थन का खेल’ शुरू हो चुका है तो उन्होंने अपनी ईमानदारी की चासनी में कांग्रेस के छद्म सेक्यूलरवाद को मिला लिया। उनके बयान देखिए, प्रशांत भूषण ने कहा, ‘इस देश में हिंदू आतंकवाद चरम पर है’, तो प्रशांत के सुर में सुर मिलाते हुए अरविंद ने कहा कि ‘बाटला हाउस एनकाउंटर फर्जी था और उसमें मारे गए मुस्लिम युवा निर्दोष थे।’ इससे दो कदम आगे बढ़ते हुए अरविंद केजरीवाल उत्तरप्रदेश के बरेली में दंगा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार हो चुके तौकीर रजा और जामा मस्जिद के मौलाना इमाम बुखारी से मिलकर समर्थन देने की मांग की।

याद रखिए, यही इमाम बुखरी हैं, जो खुले आम दिल्ली पुलिस को चुनौती देते हुए कह चुके हैं कि ‘हां, मैं पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का एजेंट हूं, यदि हिम्मत है तो मुझे गिरफ्तार करके दिखाओ।’ उन पर कई आपराधिक मामले दर्ज हैं, अदालत ने उन्हें भगोड़ा घोषित कर रखा है लेकिन दिल्ली पुलिस की इतनी हिम्मत नहीं है कि वह जामा मस्जिद जाकर उन्हें गिरफ्तार कर सके। वहीं तौकीर रजा का पुराना सांप्रदायिक इतिहास है। वह समय-समय पर कांग्रेस और मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी के पक्ष में मुसलमानों के लिए फतवा जारी करते रहे हैं। इतना ही नहीं, वह मशहूर बंग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन की हत्या करने वालों को ईनाम देने जैसा घोर अमानवीय फतवा भी जारी कर चुके हैं।

नरेंद्र मोदी के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए फेंका गया ‘आखिरी पत्ता’ हैं अरविंद!
दरअसल विदेश में अमेरिका, सउदी अरब व पाकिस्तान और भारत में कांग्रेस व क्षेत्रीय पाटियों की पूरी कोशिश नरेंद्र मोदी के बढ़ते प्रभाव को रोकने की है। मोदी न अमेरिका के हित में हैं, न सउदी अरब व पाकिस्तान के हित में और न ही कांग्रेस पार्टी व धर्मनिरेपक्षता का ढोंग करने वाली क्षेत्रीय पार्टियों के हित में। मोदी के आते ही अमेरिका की एशिया केंद्रित पूरी विदेश, आर्थिक व रक्षा नीति तो प्रभावित होगी ही, देश के अंदर लूट मचाने में दशकों से जुटी हुई पार्टियों व नेताओं के लिए भी जेल यात्रा का माहौल बन जाएगा। इसलिए उसी भ्रष्‍टाचार को रोकने के नाम पर जनता का भावनात्मक दोहन करते हुए ईमानदारी की स्वनिर्मित धरातल पर ‘आम आदमी पार्टी’ का निर्माण कराया गया है।

दिल्ली में भ्रष्‍टाचार और कुशासन में फंसी कांग्रेस की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की 15 वर्षीय सत्ता के विरोध में उत्पन्न लहर को भाजपा के पास सीधे जाने से रोककर और फिर उसी कांग्रेस पार्टी के सहयोग से ‘आम आदमी पार्टी’ की सरकार बनाने का ड्रामा रचकर अरविंद केजरीवाल ने भाजपा को रोकने की अपनी क्षमता को दर्शा दिया है। अरविंद केजरीवाल द्वारा सरकार बनाने की हामी भरते ही केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा, ‘‘भाजपा के पास 32 सीटें थी, लेकिन वो बहुमत के लिए 4 सीटों का जुगाड़ नहीं कर पाई। हमारे पास केवल 8 सीटें थीं, लेकिन हमने 28 सीटों का जुगाड़ कर लिया और सरकार भी बना ली।’’

कपिल सिब्बल का यह बयान भाजपा को रोकने के लिए अरविंद केजरीवाल और उनकी ‘आम आदमी पार्टी’ को खड़ा करने में कांग्रेस की छुपी हुई भूमिका को उजागर कर देता है। वैसे भी अरविंद केजरीवाल और शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित एनजीओ के लिए साथ काम कर चुके हैं। तभी तो दिसंबर-2011 में अन्ना आंदोलन को समाप्त कराने की जिम्मेवारी यूपीए सरकार ने संदीप दीक्षित को सौंपी थी। ‘फोर्ड फाउंडेशन’ ने अरविंद व मनीष सिसोदिया के एनजीओ को 3 लाख 69 हजार डॉलर तो संदीप दीक्षित के एनजीओ को 6 लाख 50 हजार डॉलर का फंड उपलब्ध कराया है। शुरू-शुरू में अरविंद केजरीवाल को कुछ मीडिया हाउस ने शीला-संदीप का ‘ब्रेन चाइल्ड’ बताया भी था, लेकिन यूपीए सरकार का इशारा पाते ही इस पूरे मामले पर खामोशी अख्तियार कर ली गई।

‘आम आदमी पार्टी’ व उसके नेता अरविंद केजरीवाल की पूरी मंशा को इस पार्टी के संस्थापक सदस्य व प्रशांत भूषण के पिता शांति भूषण ने ‘मेल टुडे’ अखबार में लिखे अपने एक लेख में जाहिर भी कर दिया था, लेकिन बाद में प्रशांत-अरविंद के दबाव के कारण उन्होंने अपने ही लेख से पल्ला झाड़ लिया और ‘मेल टुडे’ अखबार के खिलाफ मुकदमा कर दिया। ‘मेल टुडे’ से जुड़े सूत्र बताते हैं कि यूपीए सरकार के एक मंत्री के फोन पर ‘टुडे ग्रुप’ ने भी इसे झूठ कहने में समय नहीं लगाया, लेकिन तब तक इस लेख के जरिए नरेंद्र मोदी को रोकने लिए ‘कांग्रेस-केजरी’ गठबंधन की समूची साजिश का पर्दाफाश हो गया। यह अलग बात है कि कम प्रसार संख्या और अंग्रेजी में होने के कारण ‘मेल टुडे’ के लेख से बड़ी संख्या में देश की जनता अवगत नहीं हो सकी, इसलिए उस लेख के प्रमुख हिस्से को मैं यहां जस का तस रख रहा हूं, जिसमें नरेंद्र मोदी को रोकने के लिए गठित ‘आम आदमी पार्टी’ की असलियत का पूरा ब्यौरा है।

शांति भूषण ने इंडिया टुडे समूह के अंग्रेजी अखबार ‘मेल टुडे’ में लिखा था, ‘‘अरविंद केजरीवाल ने बड़ी ही चतुराई से भ्रष्‍टाचार के मुद्दे पर भाजपा को भी निशाने पर ले लिया और उसे कांग्रेस के समान बता डाला। वहीं खुद वह सेक्यूलरिज्म के नाम पर मुस्लिम नेताओं से मिले ताकि उन मुसलमानों को अपने पक्ष में कर सकें जो बीजेपी का विरोध तो करते हैं, लेकिन कांग्रेस से उकता गए हैं। केजरीवाल और आम आदमी पार्टी उस अन्ना हजारे के आंदोलन की देन हैं जो कांग्रेस के करप्शन और मनमोहन सरकार की कारगुजारियों के खिलाफ शुरू हुआ था। लेकिन बाद में अरविंद केजरीवाल की मदद से इस पूरे आंदोलन ने अपना रुख मोड़कर बीजेपी की तरफ कर दिया, जिससे जनता कंफ्यूज हो गई और आंदोलन की धार कुंद पड़ गई।’’

‘‘आंदोलन के फ्लॉप होने के बाद भी केजरीवाल ने हार नहीं मानी। जिस राजनीति का वह कड़ा विरोध करते रहे थे, उन्होंने उसी राजनीति में आने का फैसला लिया। अन्ना इससे सहमत नहीं हुए । अन्ना की असहमति केजरीवाल की महत्वाकांक्षाओं की राह में रोड़ा बन गई थी। इसलिए केजरीवाल ने अन्ना को दरकिनार करते हुए ‘आम आदमी पार्टी’ के नाम से पार्टी बना ली और इसे दोनों बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों के खिलाफ खड़ा कर दिया। केजरीवाल ने जानबूझ कर शरारतपूर्ण ढंग से नितिन गडकरी के भ्रष्‍टाचार की बात उठाई और उन्हें कांग्रेस के भ्रष्‍ट नेताओं की कतार में खड़ा कर दिया ताकि खुद को ईमानदार व सेक्यूलर दिखा सकें। एक खास वर्ग को तुष्ट करने के लिए बीजेपी का नाम खराब किया गया। वर्ना बीजेपी तो सत्ता के आसपास भी नहीं थी, ऐसे में उसके भ्रष्‍टाचार का सवाल कहां पैदा होता है?’’

‘‘बीजेपी ‘आम आदमी पार्टी’ को नजरअंदाज करती रही और इसका केजरीवाल ने खूब फायदा उठाया। भले ही बाहर से वह कांग्रेस के खिलाफ थे, लेकिन अंदर से चुपचाप भाजपा के खिलाफ जुटे हुए थे। केजरीवाल ने लोगों की भावनाओं का इस्तेमाल करते हुए इसका पूरा फायदा दिल्ली की चुनाव में उठाया और भ्रष्‍टाचार का आरोप बड़ी ही चालाकी से कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा पर भी मढ़ दिया। ऐसा उन्होंने अल्पसंख्यक वोट बटोरने के लिए किया।’’

‘‘दिल्ली की कामयाबी के बाद अब अरविंद केजरीवाल राष्ट्रीय राजनीति में आने जा रहे हैं। वह सिर्फ भ्रष्‍टाचार की बात कर रहे हैं, लेकिन गवर्नेंस का मतलब सिर्फ भ्रष्‍टाचार का खात्मा करना ही नहीं होता। कांग्रेस की कारगुजारियों की वजह से भ्रष्‍टाचार के अलावा भी कई सारी समस्याएं उठ खड़ी हुई हैं। खराब अर्थव्यवस्था, बढ़ती कीमतें, पड़ोसी देशों से रिश्ते और अंदरूनी लॉ एंड ऑर्डर समेत कई चुनौतियां हैं। इन सभी चुनौतियों को बिना वक्त गंवाए निबटाना होगा।’’

‘‘मनमोहन सरकार की नाकामी देश के लिए मुश्किल बन गई है। नरेंद्र मोदी इसलिए लोगों की आवाज बन रहे हैं, क्योंकि उन्होंने इन समस्याओं से जूझने और देश का सम्मान वापस लाने का विश्वास लोगों में जगाया है। मगर केजरीवाल गवर्नेंस के व्यापक अर्थ से अनभिज्ञ हैं। केजरीवाल की प्राथमिकता देश की राजनीति को अस्थिर करना और नरेंद्र मोदी को सत्ता में आने से रोकना है। ऐसा इसलिए, क्योंकि अगर मोदी एक बार सत्ता में आ गए तो केजरीवाल की दुकान हमेशा के लिए बंद हो जाएगी।’’
Posted by Kumar Gaurav at