शनिवार, 25 जनवरी 2014

आप की अराजकता, आप का धोखा - कल्पेश याग्निक




दैनिक भास्कर, कोटा से
Published on 25 Jan-2014


असंभव के विरुद्ध - कल्पेश याग्निक

आप की अराजकता, आप का धोखा; बहुत अच्छी शुरुआत
अनुशासन, अभ्यास, अनुभूति और अनुभव आधारित अलख

इस बार यह कॉलम हममें से उन लोगों को विचलित कर सकता है जिनमें एक उम्मीद जगी है।
'आप' के अनेक हंस अब बगुले सिद्ध हो रहे हैं। बहुत अच्छा हो रहा है। कि बहुत काल्दी ऐसा हो रहा है।
आप स्वयं अपने 'अराजक' होने पर गर्व कर रहे हैं। आपने आम आदमियों में एक बहुत बड़ा तूफान पैदा कर दिया था। फिर उस तूफान से मर्यादा के सारे किनारे तोड़ दिए।
'तूफान से तबाही ही तो आएगी' - ऐसा कह सकते हैं आप। राष्ट्र के पास सुनने के अलावा कोई चारा भी नहीं है। बेचारा।
यही भूल कर रहे हैं आप। राष्ट्र भला है। बेचारा नहीं।
आपने सबसे पहले, सफलता मिलते ही, एक नई भाषा गढ़ ली। आपने कहा - ''मैं कौन हूं? मेरी 'औकात' ही क्या है? यह मेरी सफलता नहीं। यह मेरे साथियों की सफलता नहीं। यह तो आम आदमी की सफलता है।''
फिर हर बात में दोहराना आरंभ कर दिया। 'मैं मुख्यमंत्री कैसे बनूंगा, क्यों बनूंगा। कभी भी नहीं बनूंगा। बनना चाहता ही नहीं। क्योंकि मेरी 'औकात' ही क्या है?' आम आदमी दंग रह गया। जो ६७ साल में नहीं हुआ - अब हो रहा है। हर बात में उसे पूछा जा रहा है। उसे यही पता था कि 'औकात' तो उसकी नहीं है। यहां तो पूछने वाला - राष्ट्रीय समाचार पटल पर अभूतपूर्व तरह से विचरण कर रहा नेतृत्व - अपने आप को ही कह रहा था कि वह तुच्छ है। कुछ है ही नहीं। जो कुछ है- वह आम आदमी ही है।
फिर अद्भुत 'त्याग' की गाथा सामने आई। सभी सत्ता देना चाहते हैं। ''हम सरकार बनाना नहीं चाहते, विपक्ष में बैठकर सेवा करना चाहते हैं।'' फिर दबाव बढ़ा। तो कहा- भाजपा, कांग्रेस दोनों बराबर की भ्रष्ट, अवसरवादी, सांप्रदायिक पार्टियां हैं। इनमें से किसी का भी समर्थन लेकर सरकार बनाने का प्रश्न ही नहीं। फिर कहा : 'कांग्रेस व्यर्थ, जबरदस्ती हमें समर्थन दे रही है। हमें फंसाना चाहती है!' - यही पहला धोखा।
फिर रहन-सहन, सुरक्षा, तामझाम, लाव-लश्कर पर जो कुछ कहा था, सब से पलटे। 'क्या करें, औकात ही नहीं है।' - यह दूसरा धोखा।
फिर ऐसे-ऐसे निर्णय - जो व्यापक जनहित यानी बड़े स्तर पर आम आदमी के भविष्य के लिए भयावह सिद्ध होंगे। आर्थिक अराजकता लिए हुए। राज-सहायता के पुरातन युग में ढकेलने वाले। कारोबार विरोधी। उपभोक्ता विरोधी। - यह तीसरा धोखा।
फिर सामने आया मंत्रियों का 'मैं आम आदमी हूं' के नाम पर चौंकाने वाला रूप। 'मुझे चाहिए पूर्ण स्वराज' वाली बात निश्चित ही समूचे आकार-प्रकार में लागू करने लगे आप के मंत्री। 'मुझे' पर विशेष जोर देकर। ले आए स्वराज। कानून मंत्री ने अपने आम आदमियों की रक्षा के लिए न जाने कौन-कौन सा रूप नहीं गढ़ा। वे पुलिस बन बैठे। वे ही हितैषी। वे ही रक्षक। वे ही कानून। वे ही जज।
महिलाओं की गरिमा के लिए उद्वेलित समूचे राष्ट्र को एक कानून मंत्री के दंभ और अहं के समक्ष तुच्छ बना देने का प्रयास शुरू हो गया। - यह चौथा धोखा।
किन्तु कौन कहे? कह तो कई रहे थे। सुने कौन? कांग्रेस - भाजपा सब को भ्रष्ट करार दिया था। इसलिए कोई भी कुछ कहेगा - तो वह 'आम आदमी' का विरोधी करार दिया जाएगा।
किन्तु आप के ही कुछ नामी लोगों ने कहना शुरू कर दिया। जब बात बढऩे लगी तो मीडिया में पहली बार आपके विरुद्ध कुछ आने लगा। तब जाकर आपने सोचा - अब अनदेखी नहीं कर सकते। कुछ करना पड़ेगा। क्योंकि आपका आधार मीडिया ही तो है। परंपरागत पार्टियों से चिढ़ है। परंपरागत मीडिया किन्तु अत्यधिक प्रिय है। फिर सोशलमीडिया तो है ही।
आम आदमी को ताकत मीडिया से ही तो मिलेगी। इसलिए मीडिया के लिए कुछ करना अनिवार्य। - पांचवा धोखा।
फिर राष्ट्रीय नाटक। विराट प्रहसन। 'मैंने तो पहले ही कहा था कि हम सिखाएंगे कांग्रेस-भाजपा और सभी परंपरागत पार्टियों को...।' सचमुच। बहुत सिखाया। संविधान की गरिमा ताक में। नियम कूड़ेदान में। मर्यादा को मसल कर रख डाला। आम आदमी त्रस्त होता रहा। उसके आवागमन के रास्ते, साधन, सुविधाएं। सब रुक गए। वह घबरा गया।
किन्तु, आप 'अराजक' कहलाने की प्रसिद्धि के लिए धरने-प्रदर्शन पर डटे रहे। आप सड़क पर लेट गए। रजाई सभी समस्याओं रूपी थपेड़ों का ढाल बना दी गई।जिम्मेदारी को वैगन आर के कोने में धकेल दिया गया।
क्यों?
क्योंकि आप को दिल्ली पुलिस अपने नियंत्रण में चाहिए। क्योंकि आपके मंत्रियों के साथ 'दुव्र्यवहार' हुआ। क्योंकि आपकी मनमर्जी नहीं चली।
आप तो कह रहे थे ना कि 'मेरी 'औकात' क्या है?' तो क्या वह पाखंड था? हैसियत दिखा देना चाहते थे? आपका अहं। आपका मान। आपकी मर्जी। आपकी ताकत। आपके मातहत।
सबकुछ आपका? तो हमारा क्या? हमारी भावनाओं का क्या? हमारी उम्मीदों का क्या? हमारे मन में जगाई गई इच्छाओं का क्या? कि भ्रष्टाचार मिटाने आ गया एक आम आदमी। कि झाड़ू फेर देगा सारी राजनीतिक बुराइयों पर एक आम आदमी।
आम आदमी ऐसे नहीं होते। आम आदमी, आम औरत को अपमानित नहीं करते। विदेशी महिलाओं को तो यूं भी नहीं।
आम आदमी केंद्रीय गृहमंत्री और राज्यसभा में विपक्ष के नेता व सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ वकील के 'मुंह पर थूकने' की कायराना, अमानवीय और संस्कारहीन बात नहीं करते।
आम आदमी केरल से निकलकर समूचे देश में मरीजों की सेवा में सर्वस्व लगाकर खामोश जीवन और निर्धन स्थितियों में अंतिम दम तक अस्पताल में ही जुटे रहने वाली महिलाओं को 'काली-पीली' कहने की कलुषित हरकत नहीं करते। न ही आम आदमी मुहर्रम और ब्रह्मा-विष्णु-महेश पर किसी भी तरह की कविताएं, किसी भी स्थिति-देशकाल और वातावरण में लिखते हैं।
और आम आदमी न तो धर्म के नाम पर वोट मांगते हैं, न ही वोट ले लेने के बाद रातोरात $खास तरह की अराजकता फैलाते हैं।
सबसे बड़ी बात - आम आदमी धोखा नहीं देते। 'हिट-एंड-रन' की आदत हो - तो भी नहीं।
आम आदमी तो अपने परिवार, समूह और मित्र मंडली में कोई भी कुछ बुरा या $गलत कर दे - तो अपने रिश्तों की परवाह किए बग़ैर - उसे ठीक करने में लग जाते हैं। जिम्मेदारी का अहसास कराते हैं। सबकुछ खो देते हैं - किन्तु कर्तव्य से डिगते नहीं। इसीलिए तो आम आदमी है। बाकी सारे आप के गुण तो 'खास' के हैं। आपने डर अलग पैदा कर दिया है। एक वातावरण।
आप जैसे अति महत्वाकांक्षी, जो रातोरात बगैर किसी संघर्ष के मुख्यमंत्री-प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं, कुछ धैर्य रखकर अपनी अराजकता के बारे में सोचेंगे - यह असंभव है। किन्तु सोचना ही होगा। चूंकि आपने आम आदमी की जिम्मेदारी ली है - तो जवाबदेह भी होना होगा। रिस्पॉन्सिबल एंड रिस्पॉन्सिव।
अच्छा हुआ आपने यह रूप दिखा दिया। जल्दी। इससे भले-भोले भारतीय नागरिकों को सबकुछ पता चल गया। कुछ और नहीं तो सच्चाई सामने आ गई।
सच ही सबसे बड़ा राष्ट्रीय हित है।
(लेखक दैनिक भास्कर समूह के नेशनल एडिटर हैं।)
इस कॉलम पर आपके विचार ९२००००११७४ पर एसएमएस करें।
हंस श्वेतो बक: श्वेतो को भेदो बकंहसयो:।

नीरक्षीर विवेके तु हंस ; हंसो बको बक: ।।

(यूं तो हंस और बगुले दोनों का रंग धवल - सफेद - होता है किन्तु पानी मिले दूध में से केवल दूध पीने की परीक्षा में हंस ही सफल हो सकता है। अर्थात् दिखने-कहने से नहीं, योग्यता से अंतर पता चलता है। - शास्त्रों से।

- कल्पेश याग्निक

असंभव के विरुद्ध 

यह 'आप' है या अनाड़ी पार्टी : वेदप्रताप वैदिक


Published on 25 Jan-2014
दैनिक भास्कर, कोटा से

मोहभंग
यह 'आप' है या अनाड़ी पार्टी
वेदप्रताप वैदिक

यह आम आदमी की नहीं दिल्ली के खाए-अघाए मध्य वर्ग की पार्टी है जो मीडिया को अपना गुरु मानता है


पिछले हफ्ते मैंने लिखा था कि आम आदमी पार्टी का ज्वार कहीं भाटा में नहीं बदल जाए! तब तक अफ्रीकी महिलाओं का मामला और धरना आदि के विवाद शुरू नहीं हुए थे, लेकिन अब क्या हुआ? एक ही हफ्ते में आम आदमी पार्टी की दुनिया बदल गई। जो पार्टी लोकसभा के चुनाव में दिल्ली की सातों सीटें जीतने और देश भर में 300 उम्मीदवार लड़ाने का इरादा कर रही थी, उसके बारे में देश भर में हो रहे जनमत-सर्वेक्षण अब क्या कह रहे हैं? विभिन्न सर्वेक्षणों की राय है कि अब यदि पूरे भारत में उसे आठ-दस सीटें भी मिल जाएं तो गनीमत है। मुंबई के वित्तशास्त्र के पंडित कह रहे हैं कि उनके दिल में आम आदमी पार्टी के उदय ने जो धड़कन बढ़ा दी थी, वह अब शांत होती दिखाई पड़ रही है। इतना ही नहीं, पिछले हफ्ते तक आम आदमी पार्टी को लेकर जैसी खबरें आ रही थीं, अब क्यों नहीं आ रही हैं? आम आदमी पार्टी की सदस्य-संख्या रोज लाखों में बढ़ रही थी। अब क्या हो गया? अब तक तो उसे करोड़ों तक पहुंच जाना चाहिए था? 'आप' की सदस्यता लेने के लिए किसी भी योग्यता की जरूरत नहीं थी, आप कंप्यूटर का खटका दबाइए और सदस्य बन जाइए। जैसे खटका दबाते ही लाखों सदस्य बन गए वैसे ही अब जरा सा खटका होते ही लाखों सदस्य खिसक लिए। 'आप' के खेत में अचानक उग आए जनसमर्थन के वटवृक्ष इस वक्त कहां अंतर्धान हो गए? इसके नेता कुछ बोल क्यों नहीं रहे? वे हतप्रभ क्यों हैं? देश का जो मोहभंग अगले तीन-चार माह में शुरू होना था, वह अभी से शुरू हो गया है। इसका कारण क्या है?

इसका कारण, जो लोग देख सकते हैं, उन्हें पहले से दिख रहा था। आम आदमी पार्टी कोई पार्टी ही नहीं है। भारत-जैसे विशाल देश में क्या कोई पार्टी साल-छह महीने में खड़ी की जा सकती है? जिसे तख्ता-पलट या खूनी क्रांति कहते हैं, वह भी अचानक नहीं होती। उसके लिए बरसों की तैयारी लगती है। क्या लेनिन ने 1917 की क्रांति की शुरुआत या तैयारी 1915 में की थी? माओ त्से तुंग ने 1948 में जो सत्ता-पलट किया, उसके लिए क्या उन्होंने तीस साल का लंबा युद्ध नहीं लड़ा था? महात्मा गांधी ने भारत में पूरे 32 साल लगाए, तब जाकर सिर्फ राजनीतिक आजादी मिल पाई। 'आप' पार्टी ने हथेली में सरसों उगाने की कोशिश की। भ्रष्टाचार के विरुद्ध फैली उत्कट जन-भावना को लोकपाल के नाम पर भुनाने के बाद सत्ता की भूख जागी और कुछ नौसिखिये लोगों ने आनन-फानन में एक पार्टी खड़ी कर दी। उसको नाम दे दिया - आम आदमी पार्टी! कहां है, आम आदमी, उसमें? भारत के भूखे-प्यासे, दलित-वंचित, गरीब-ग्रामीण लोग ही आम आदमी हैं। ऐसे लगभग 100 करोड़ लोगों की इस पार्टी में कौन-सी जगह है? दिल्ली के पढ़े-लिखे, खाए-धाए, तेज-तर्रार मध्यमवर्ग में यह पार्टी लोकप्रिय हो गई, लेकिन यह-वही मध्यमवर्ग है, जिसके टीवी चैनल और अखबार ही गुरु होते हैं। जिधर उनका इशारा होता है, यह प्रबुद्ध वर्ग उधर ही दौड़ पड़ता है। इशारा मिला और प्रबुद्ध वर्ग मजमा सुना करके चल दिया।

खिड़की मोहल्ले में अफ्रीकी महिलाओं के साथ हुए दुव्र्यवहार और पुलिस के दुरुपयोग ने इन प्रचार माध्यमों के कान खड़े कर दिए और रेल-भवन के धरने ने तो उनके कानों में गर्म तेल उड़ेल दिया। नतीजा क्या हुआ? धरने में पहले जनता को न आने के लिए कहा गया और जब मामला फीका पड़ता दिखा तो मजबूरी में आने का आह्वान करना पड़ा। पहले ही उम्मीद से कम लोग आए और फिर समय गुजरने के साथ भीड़ घटती गई। इस धरने का वही हाल हुआ, जो मुंबई में किए गए अन्ना के आखिरी अनशन का हुआ था। मीडिया ने भी कोड़े बरसाने शुरू कर दिए। जिससे जितना गहरा प्यार होता है, उससे उतनी ही घनघोर घृणा होती है। मीडिया ने 'आप' के लिए बहुत मोहब्बत दिखाई थी। इस नई-नवेली पार्टी को ताजा हवा के झोंके की तरह लिया था। अब उसने उसे हवा में उड़ाना शुरू कर दिया।

अखबारों और चैनलों में 'आप' और उसके नेता छाए जरूर रहे। देश की राजधानी में कोई अराजकता मचाए तो उसे प्रचार तो मिलना ही है। 'आप' के नेताओं के लिए यही परम उपलब्धि थी, लेकिन मीडिया ने उन्हें उल्टा टांग दिया। मीडिया क मार पडऩे लगी तो 'आप' के नेता भाग निकलने की गली ढूंढऩे लगे। दिल्ली के उपराज्यपाल ने एक संकरा रास्ता क्या खोला, 'आप' ने अपनी टोपी संभाली और भाग निकली। चार पुलिसवालों को मुअत्तल करें तो उस विधि मंत्री को भी मुअत्तल क्यों न किया जाए, जो पुलिसवालों को गैर-कानूनी काम के लिए मजबूर कर रहा था। वकील के तौर पर तो अदालत की फटकार वह पहले ही खा चुका था, अब उसके कारनामों की वजह से अफ्रीकी देशों में भारत की बदनामी हो रही है। एक जिम्मेदार लोकतांत्रिक पार्टी की तरह अपने मंत्री से इस्तीफा मांगने की बजाय 'आप' सीनाजोरी पर उतारू हो गई। उसने अपने आंदोलनकारी रूप को भुनाने की कोशिश की। अपने आपको अराजकतावादी बताने लगे। जब मौका था तब आपने अपना यह अराजकतावादी रूप क्यों नहीं जाहिर किया। आज भी यदि 'आप' सत्तारूढ़ नहीं होती तो उसके इस रूप पर सारा देश लट्टू हो जाता, क्योंकि आज देश की सभी पार्टियां सिर्फ चुनाव-मशीनें बन गई हैं। वे न तो जनता को जगाती हैं और न ही जन-मुद्दों पर सड़क पर संघर्ष करती नजर आती हैं। चुनावों को देखते हुए राष्ट्रीय अधिवेशनों में भी सिर्फ संघर्ष की बात हो रही है, संघर्ष कहां है?

'आप' ने एक नई और जबर्दस्त राह पकड़ी थी। जन-आंदोलन की और वीआईपी संस्कृति के खिलाफ संघर्ष की, लेकिन उसने अपने आचरण से सिद्ध किया कि उसे न तो आंदोलन करना आता है और न ही सरकार चलाना। सिर्फ गांधी टोपी लगाने से कोई आंदोलनकारी नहीं बन जाता। मान लिया कि 'खिड़की' गांव में वेश्यावृत्ति होती है। तो फिर महात्मा गांधी क्या करते? वही करते, जो शराब की दुकानों पर वे करते थे। वहां पुलिस नहीं ले जाते, उन महिलाओं को गाली नहीं देते, उनके साथ झूमा-झटकी नहीं करते। वे उनसे हाथ जोड़कर कहते, मेरी बहनों, तुम्हें यह काम शोभा नहीं देता, लेकिन अब 'आप' ने नैतिक आंदोलन और पुलिस के डंडे, दोनों को गड्मड् कर दिया है। उसने अपने आपको दोनों शक्तियों से वंचित कर लिया है। सेंत-मेंत में कमाई हुई इज्जत उसी प्रकार से सेंत-मेंत में ही लुट गई।

ज्यादा अच्छा होता कि इस मुद्दे पर 'आप' डटी रहती और मामला तूल पकडऩे पर इस्तीफा दे देती। अगर ऐसा होता तो वह लोकसभा चुनावों तक जनता को कम से कम मुंह दिखाने लायक तो रहती। अब वह किस मुंह से जनता के सामने जाएगी? अब तो हाल यह है कि वह जितने दिन कुर्सी से चिपकी रहेगी, हर दिन उसका दामन भारी होता चला जाएगा। अनाड़ी हाथों में चले जाने पर सोना भी पीतल के भाव बिकने लगता है।

लेखक - भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं

'सपा-बसपा-काग्रेस, सबका मालिक एक' - नरेंद्र मोदी



भीड़ देखकर गद गद मोदी : यूपी ने कर लिया है विकास का रुख
Thu, 23 Jan 2014

लखनऊ। गोरखपुर में विजय शंखनाद रैली में उमड़ी भीड़ से गदगद भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि यह संकेत है कि जनता ने कांग्रेस की विदाई तय कर ली है, कांग्रेस मुक्त भारत का संकल्प ले लिया है। सपा पर हमला बोलते हुए कहा कि नेता जी (मुलायम सिंह यादव) की हैसियत नहीं है कि वह उत्तर प्रदेश को गुजरात बना सकें। मोदी ने गुजरात मॉडल की जमकर तारीफ करते हुए पूर्वाचल के युवाओं को सपने दिखाए।

महानगर के मानबेला मैदान में कुल 46 मिनट के संबोधन में उन्होंने कहा कि भीड़ देख कर लग रहा है कि उत्तर प्रदेश ने हर क्षेत्र में एक दूसरे से आगे निकलने की स्पर्धा ठान ली है। यहां की हर रैली पिछली रैली का रिकार्ड तोड़ देती है। आज जनता की आवाज बनारस की गलियों में भी गूंज रही है। चुनाव बहुत देखे हैं, लेकिन यह ऐसा चुनाव है, जिसका फैसला देश के कोटि-कोटि जनों ने कर दिया है। कांग्रेस मुक्त भारत हो कर रहेगा नजारा साफ कह रहा है। वहीं सपा प्रमुख को जवाब देते हुए मोदी ने कहा कि मुलायम की हैसियत नहीं है कि वह यूपी को गुजरात बना सकें मोदी ने कहा कि बाप-बेटे मेरा पीछा नहीं छोड़ रहे। नेता जी ने कहा कि मोदी में हिम्मत नहीं कि वो यूपी को गुजरात नहीं बना सकते। गुजरात का मतलब है 24 घटे 365 दिन गांव - गांव बिजली। गली-गली में बिजली। यूपी को गुजरात बनाने के लिए 56 इंच का सीना लगता है। गुजरात बनाने का मतलब होता है लगातार 10 साल तक कृषि क्षेत्र में अव्वल। 3-4 फीसद पर लुढ़क जाना नहीं । गुजरात शाति, सदभाव लेकर आगे बढ़ रहा है। विकास का मंत्र लेकर आगे बढ़ रहा है। आप नहीं कर सकते हो नेताजी। आप को इतना समर्थन मिला है, क्या किया है आपने लोगों के लिए। न सुरक्षा, न रोजगार न सम्मान दे पा रहे हो। इतने बड़े प्रदेश को बर्बाद करके रख दिया है। मोदी ने स्थानीय सामाजिक समीकरणों को साधने और सरदार पटेल के नाम पर ध्रुवीकरण की कोशिश भी दिखाई दी। उन्होंने कहा, मुझे उत्तर प्रदेश के नौजवानों का विशेष अभिनंदन करना है। 15 दिसंबर को सरदार पटेल की पुण्यतिथि थी और उस दिन पूरे देश में श्रद्धाजलि देने के लिए देश भर में एकता दौड़ का आयोजित कराई गई। यूपी के हर कोने में लाखों नौजवान एक साथ सरदार पटेल के लिए दौड़े और यह विश्व रिकॉर्ड बन गया। काग्रेस पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि 60 सालों के बावजूद देश बुरी हालत में है, गरीब को गरीब बनाए रखने में ही काग्रेस की राजनीतिक सफलता है. मोदी ने कहा कि लोकसभा चुनाव का ट्रेलर दिसंबर में दिख चुका है. बीएसपी पर परोक्ष रूप से प्रहार करते हुए उन्होंने कहा कि कुछ लोग समझते हैं कि गरीब, दलित, आदिवासी और हाशिए के लोग उनकी जेब में हैं और वे उनका वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करते हैं। कांग्रेस की मानसिकता की दलित विरोधी है।

कृषि विकास दर बढ़ाने के लिए त्रिस्तरीय खेती पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि एक तिहाई खेती, एक तिहाई पशुपालन और मेड़ों पर पेड़ लगाने की जरूरत है।

'सपा-बसपा-काग्रेस, सबका मालिक एक'

मोदी ने प्रदेश की पार्टियों पर वार करते हुए कहा कि सबका मालिक एक होता है. स माने सपा, ब माने बसपा, क माने काग्रेस, और तीनों का मालिक, सबको पता है कौन है मालिक। ये सबका मालिक एक। इन्होंने विकास को किनारे कर वोटबैंक पर ध्यान दिया।

पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा कि सपा पर हमला बोलते हुए कहा कि समाज को बांटने का काम सपा कर रही है। योगी आदित्यनाथ ने कहा कि उमड़ी भीड़ सेकुलरिज्म के नाम पर तमाचा है।