शनिवार, 8 फ़रवरी 2014

दुनिया बदलने के लिए 5 साल ही काफी होते हैं: नरेंद्र मोदी



दुनिया बदलने के लिए 5 साल ही काफी होते हैं: नरेंद्र मोदी
नवभारतटाइम्स.कॉम | Feb 8, 2014  इंफाल

बीजेपी के पीएम कैंडिडेट नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस पर हमला बोलते हुए उन पर नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों को विकास से महरूम रखने का आरोप लगाया। मोदी ने मनमोहन पर वार करते हुए कहा कि भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री 23 साल से यहां से चुनकर संसद में जाते हैं, लेकिन इतने साल में उन्होंने इस क्षेत्र के लिए क्या किया? उन्होंने कहा, 'हमारे प्रधानमंत्री इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं, लेकिन उन्होंने इस क्षेत्र के विकास के लिए क्या किया।' प्रधानमंत्री पर चुटकी लेते हुए उन्होंने कहा, 'दुनिया बदलने के लिए 5 साल ही काफी होते हैं, लेकिन यहां तो 23 साल में भी कोई बदलाव नहीं आया।'

मोदी ने नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों को देश के विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि जब नॉर्थ-ईस्ट का भला होगा, तभी हिंदुस्तान का भी भला होगा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस की सरकारों की नीतियों के अभाव के कारण हर्बल मेडिसीन को बढ़ावा नहीं दिया जा सका और इससे नॉर्थ ईस्ट के राज्य काफी तरक्की करने से महरूम रह गए, क्योंकि यहां औषधियों का खजाना है। उन्होंने कहा, 'कांग्रेस ने नॉर्थ-ईस्ट में करप्शन के सारे रेकॉर्ड तोड़ दिए हैं। जब हम सत्ता में आएंगे, एक-एक पैसे का हिसाब मांगेंगे।'

2014 के चुनाव में बीजेपी की जीत की तरफ इशारा करते हुए ​उन्होंने कहा कि अब ज्यादा दिन बाकी नहीं है। अब मुसीबतों के लिए ज्यादा से ज्यादा 100 दिन और सहन करने होंगे। देश के लिए अच्छे दिन आने वाले हैं। लोकसभा चुनाव में बीजेपी को इस क्षेत्र से सपोर्ट करने की मांग करते हुए मोदी ने कहा, 'आपने कांग्रेस को 60 साल दिए, हमें 60 महीने देकर देखिए।'

इस क्षेत्र के राज्यों की तारीफ करते हुए मोदी ने कहा कि पहले नॉर्थ ईस्ट के राज्यों को 'सेवन सिस्टर्स' कहा जाता था, लेकिन सिक्किम को मिला कर यह 8 राज्य हैं और इनमें भारत को बदलने का सामर्थ्य है। इसिलए इन्हें 'अष्ठलक्ष्मी' कहा जाना चाहिए।

मोदी यहां भी गुजरात के विकास की तारीफ करने से नहीं चूके और उन्होंने कहा कि नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों में कोयले के बड़े भंडार हैं, लेकिन गुजरात की तरह उनका विकास के लिए पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं हो पाया। साथ ही उन्होंने गुजरात और इस क्षेत्र के बीच संबंध होने की भी बात कही। मोदी ने कहा, 'भगवान कृष्ण की शादी नॉर्थ-ईस्ट में हुई थी और वह रहते थे गुजरात में। इस नाते हमारा नॉर्थ-ईस्ट से खास रिश्ता है।'

मोदी ने कहा कि मणिपुर देश का पावर हाउस हो सकता है और प्राकृतिक रूप से यह इसके लिए योग्य है। उन्होंने कहा कि बीजेपी अगर सत्ता में आई तो सिल्चर-इम्फाल रोड और दीमापुर-इम्फाल रोड बनाई जाएगी। इसके अलावा गुजरात को मणिपुर से हाइवे से जोड़ा जाएगा।

दिल्ली में अरुणाचल के छात्र नीदो तानियाम की पीट-पीट कर हत्या किए जाने के मामले में भी मोदी ने सरकार को आड़े हाथों लिया और कहा कि दिल्ली में सरकार की लापरवाही के कारण ही नीदो की मौत हुई। उन्होंने इसे राष्ट्रीय शर्म करार दिया मोदी ने कहा कि वह दिल्ली में नॉर्थ-ईस्ट के नौजवानों से मिले और उनके दर्द को सुना। उन्होंने कहा, 'मैंने उन्हें आश्वासन दिया कि पूरा देश आपके साथ है।'

उधर नरेंद्र मोदी के मणिपुर पहुंचने से कुछ समय पहले उग्रवादियों ने अर्द्धसैनिक बल के गश्ती दल पर घात लगाकर हमला किया, जिससे 4 सुरक्षाकर्मी घायल हो गए।

सत्यनारायण नडेला -माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ चुने गए !



अनुशासन, अभ्यास, अनुभूति और अनुभव आधारित अलख
 - कल्पेश याग्निक
(लेखक दैनिक भास्कर समूह के नेशनल एडिटर हैं।)

'जी, नहीं; न तो मैं आपको चुन रहा हूं, न उसे। मैं तो अपने आप को ही चुन रहा हूं।'
-प्रसिद्ध अमेरिकी पुस्तक 'द सिलेक्शन' से।
क्या देखा जाता है किसी को सर्वोच्च पद देते समय ?
क्यों सत्य नारायण नडेला - सत्या -माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ चुने गए? हर युवा भारतीय, हर महत्वाकांक्षी प्रोफेशनल, हर बिजनेस लीडर इस हफ्ते यही बात कर रहा है।
निश्चित ही यह एक ऐसा प्रश्न है जिसके वास्तविक उ?ार से करोड़ों लोगों को लाभ होगा। उन्हें पता चलेगा कारण। लाखों को प्रेरणा मिलेगी। ताकि वे भी अपने-आप से यह पूछ सकें कि क्या उनके भीतर भी 'वो' है? डू आय हैव इट इन मी?
सत्या से अधिक लोग इसलिए स्वयं को जोड़ कर देख सकेंगे - चूंकि वे संभवत: पहले ऐसे भारतीय हैं जो गैऱ-आईआईटी, गैऱ-आईआईएम होने के बावजूद विश्व की सबसे बड़ी, सर्वाधिक प्रतिष्ठित सॉफ्टवेयर कंपनी के सर्वोच्च पद पर पहुंचे हैं। यही नहीं, जिस मणिपाल इंजीनियरिंग कॉलेज से उन्होंने साधारण इंजीनियरिंंग की - वो आज जिस रूप में है - भारी-भरकम मणिपाल यूनिवर्सिटी - वैसा बिल्कुल नहीं था। हम गैऱ-दक्षिण भारतीय तो उसे 'किसी अजीब सुदूर जगह बसे' प्राइवेट कॉलेज की तरह देखते थे। मुझे बखूबी याद है, जिन दिनों मैं बार-बार फेल होने के बाद कॉलेज में बमुश्किल पास होते हुए छात्रसंघ चुनाव लड़ता था - उन दिनों एक भयावह रैगिंग हादसे में कलुषित होने के कारण मणिपाल कॉलेज चर्चा में आया था। मैंं उदाहरण देता था कि मणिपाल जैसा हमारे यहां नहीं होने दिया जाएगा।
यानी, इस तरह के कॉलेज से पढ़े, क्रिकेट खेलते बढ़े, स्कूल से ही प्रेम प्रसंग में पड़े, कविताएं सुनकर गढ़े - एक साधारण से लगने वाले व्यक्ति की असाधारण सफलता से हर कोई जुड़ सकता है। सीख सकता है। उनके कुछ तरीके अपना सकता है। बजाए कि बाकी से जो शीर्ष संस्थानों से पढ़कर शीर्ष स्थानों पर पहुंचे हैं। पहुंचना ही चाहिए।
एक और बात। अति सफलता की एक समस्या है। मूलभूत समस्या। या तो नितांत निर्धन, अभावग्रस्त, एकदम कमजोर ही संसार की बड़ी उपल?िध पा सकता है। या फिर पूर्णत: समर्थ, सक्षम और समृद्ध। पहले के पास खोने को कुछ नहीं। दूसरे को खोने से कुछ नहीं! इसलिए, दोनों 'अदर एक्स्ट्रीम' होकर शीर्ष पर पहुंचते हैं।
ऐसे में अधिकांश संसार दोनों श्रेणियों में ही नहीं होता। बीच का होता है। सत्या ऐसे ही मध्यम थे। इसलिए माध्यम बन रहे हैं। प्रेरणा के।
क्यों चुना गया उन्हें? कोई आसानी से नहीं बता सकता। सारे विश्लेषण आ रहे हैं उन्हें लेकर। कि कैसे वे माइक्रोसॉफ्ट के 'एंटरप्राइज़' बिजनेस को कुशल नेतृत्व दे चुके थे। कैसे वो एकदम आधुनिक 'क्लाउड' पद्धति पर काम कर रहे थे। कै से वो बिल गेट्स के हर सपने को निकट से देख कर, उतार-चढ़ाव में डटे रहते थे। कैसे गेट्स के बाद पॉल बॉल्मर के नेतृत्व में उन्होंने एक बदलते दौर में नई पारी खेली। इसलिए। इतने कारणों से। शांत रहते हैं। हाईप्रोफाइल नहीं हैं। हमेशा कुछ नया करते हैं- किंतु प्रचार से परे रहकर वगैरह।
किंतु ऐसा तो करोड़ों प्रोफेशनल्स करते हैं। उनका सत्य, नारायण नहीं हो पाता।
तो क्या है? इसे यदि केवल 'सत्या क्यों सर्वोच्च चुने गए' के स्थान पर 'कोई भी व्यक्ति-विशेष सर्वोच्च पद पर क्यों चुना जाता है', ऐसे देखें, तो भी अच्छा उ?ार मिल सकता है।
सबसे बड़ी जिम्मेदारी देने वाले चाहे जितना, जो कुछ कहें - सोचते एक जैसा ही हैं। वे आपको, उसे, इसे या किसी को नहीं चुनते। वे वास्तव में स्वयं को ही चुनते हैं। यानी, वे अपने जैसे गुण वालों को ढंूढते हैं। जो उनके श?द, शैली और सपनों को समझे, और लागू कर सके। बड़ा गुण है यह।
सीधे अर्थों में दो 'सी' तय करते हैं सर्वोच्च पद पर चयन :
1. कम्पीटेंस यानी आपकी निजी योग्यता
2. कम्फर्ट यानी नियुक्त करने वाला आपके साथ आसानी से काम कर सके।
कहने के लिए पहली शर्त पहले क्रम पर रखी गई है। जो सही भी है। कि न्तु व्यावहारिक रूप से दूसरी शर्त, पहली है। प्रमुख है। इसके बिना आपकी योग्यता महत्वपूर्ण तो सर्वाधिक है किन्तु उस व्यक्ति के कतई काम की नहीं जो आपको नियुक्त कर रहा है।
इससे पहले का सर्वाधिक चर्चित और लम्बी-चौड़ी चन प्रक्रिया से गुजरा एक अन्य $खास मामला ले लीजिए। पौने चार लाख करोड़ के टाटा समूह के नेतृत्व का प्रसिद्ध किस्सा। रतन टाटा ने उत्तराधिकारी चुनने के लिए जो समिति बनाई थी उसने पेप्सी, वोडाफोन, सिटी ग्रुप जैसी कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के विदेशी और भारतीय मूल दोनों तरह के प्रोफेशनल्स जांचे थे। टाटा के टेकओवर किए कोरस और जेगुआर के बड़े नाम यूं हीं सामने रखे थे। किंतु चुना कि से? साइरस मिस्त्री को। योग्य सौ फीसदी। किंतु टाटा के साथ सहज हजार फीसदी। टाटा समूह के गैऱ-टाटा सर्वाधिक शेयर होल्डर पल्लोनजी के पुत्र। भारतीय। टाटा की भाषा, शैली, सपने समझने वाले। यही तो चाहिए। कम्फर्ट।
बिल गेट्स को सत्या से यही सहजता है। इसलिए चुना। देखिए, सिद्ध भी एक घंटे के भीतर हो गया। सत्या ने कहा- मैं चाहता हूं आप मुझे समय दें। गाइड करें। बाकायदा सलाहकार बनकर। आपके सानिध्य की, विचारों की, मार्गदर्शन की जरूरत है। गेट्स राजी भी हो गए। खुशी-खुशी। उनके सपने जो पूरे हो सकेंगे।
माइक्रोसॉफ्ट संसार की अनूठी कंपनी है। गेट्स ने बनाई ही ऐसी है। किन्तु 54 साल की कम उम्र में ही सक्रिय पद से हट कर, संन्यास लेकर अपने करीबी पॉल बॉल्मर को सौंपकर उन्होंने कभी चैन की सांस नहीं ली। वे दुनिया की चैरिटी में लगे हुए हैं - अपनी खरबों डॉलर की संप?िा $गरीबों के लिए लगा चुके हैं - किंतु माइक्रोसॉफ्ट को एपल/गूगल से पिछड़ते नहीं देख पा रहे। गेट्स के हटने के बाद माइक्रोसॉफ्ट की पूंजी, आय-फायदा सबकुछ दो गुना बढ़ चुका है - किन्तु कंपनी की वैल्यू 17 गुना गिर चुकी है।
सत्या के बारे में 5 करोड़ लोगों ने गूगल पर सर्च किया - कि वे कौन हैं? बस, गेट्स यही चुनौती सत्या के लिए बता सकते हैं। 5 करोड़ न सही, कुछ तो 'बिंग' से सर्च करते सत्या के बारे में! 'बिंग' क्या है? यही तो गेट्स का दु:ख है। माइक्रोसॉफ्ट के सर्च इंजन को कोई जानता ही नहीं। गेट्स आंखें बंद करके जीने वालों में नहीं है। सर्च में न सही, मोबाइल प्लेटफॉर्म में ही सही। कहीं तो माइक्रोसॉफ्ट फिर से सर्वोच्च बने। इसीलिए चुना सत्या को।
जो सर्वोच्च के लिए चुनते हैं - वे चाहते हैं कि निम्न विशेषताएं होनी आवश्यक हैं किन्तु कम्पीटेंस और कम्फर्ट के बाद :
ईमानदार हो
अनंत संघर्ष-अथक परिश्रम करने वाला हो
गांभीर्य हो-गहराई हो
लोगों के बीच रहे, जुड़ा रहे
स्वयं कुछ कर गुजरना चाहता हो
और भी कई, विषय-विशेष बातें हो सकती हैं जो देखी जाएंगी किन्तु यह सामान्य तौर पर देखी जाने वाली बातें हैं।
कोई भी, कि न्तु कम्फर्ट सबसे पहले और सबसे अधिक देखेगा।
जब सोनिया गांधी ने तय किया कि वे प्रधानमंत्री नहीं बनेंगी तो उन्होंने योग्यता तो कई में देखी - प्रणब मुखर्जी, डॉ. मनमोहन सिंह से कि न्तु 'कम्फर्ट' में पिछड़ गए। कोई भी हो। चाहे पसंद-नापसंद न जताता हो। चुप ही रहता हो। डॉ. मनमोहन सिंह को जब योजना आयोग के उपाध्यक्ष पद के लिए दस-दस साल मुख्यमंत्री रहे नेताओं के नाम दिए गए - तो उन्होंने ठुकरा दिए। मोंटेक सिंह अहलूवालिया को चुना। कम्फर्ट।
हाल ही में मैरी बारा जबर्दस्त चर्चा में आईं। जब जनरल मोटर्स (जीएम) ने उन्हें सीईओ बनाया तो वो अमेरिकी इतिहास की पहली महिला बन गईं जो किसी ऑटो कंपनी की प्रमुख बनीं। 33 वर्षों से थीं वे जीएम के साथ। जैसे सत्या 22 वर्षों से माइक्रोसॉफ्ट के साथ। यह भी बाकी लोगों को सहजता देता है। महत्वपूर्ण है। एकदम क, ख, ग, घ से शुरू न करना पड़े। लिंक्डइन ने जब जैफ वाइनर को सर्वोच्च बनाया तो 'कुछ कर गुजरने' की इच्छा देखी। जैसा कि नरेंद्र मोदी अमित शाह में देखते हैं। कुछ कर गुजरने की इच्छा - $खासकर मोदी के लिए - और सहजता तो है ही। क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड भी जब सचिन तेंडुलकर से असहज होता है तो नैसर्गिक सर्वोच्च होते हुए भी उन्हें अलग कर देता है - जबकि महेन्द्र सिंह धोनी को विपरीत परिस्थितियों में भी जोड़कर रखता है। श्रीनिवासन का कम्फर्ट!
हम सब पर सर्वोच्च पहुंचें, असंभव है। किन्तु पहुंचना ही होगा। सर्वोच्च पद कोई लक्ष्य नहीं है। न सर्वोच्च होना लक्ष्य है। किसी के दु:ख में शामिल होकर, यदि हमारी योग्यता उसके दु:ख को एक पल के लिए भी कम कर सके - तो हमें उस पल सर्वोच्च होने का गौरव मिल सकेगा। हम सभी का सत्य तब नारायण हो जाएगा।
सत्यमेव जयते।
(लेखक दैनिक भास्कर समूह के नेशनल एडिटर हैं।)
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मोदी की सुनामी से कांग्रेस की जहरीली राजनीति तहस-नहस होगी - अंकुर शर्मा





मोदी नाम का सुनामी ही कांग्रेस की जहरीली राजनीति को तहस-नहस करेगा
अंकुर शर्मा
Posted by : Ankur Sharma  Friday, 7 February , 2014,
http://hindi.oneindia.in

चुनाव प्रक्रिया के साथ यह समस्या है कि वह सत्ता के लिए पागलपन के हद तक जाने वाले लालच को प्रकट कर देता है और इसके बाद नेता मुर्ख और नादान दिखने लगते हैं। ऐसा ही हुआ कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी के साथ गुलबर्गा में जहाँ वह एक ईएसआई सुविधा का उद्घाटन करने पहुंची थीं। एक आम सभी को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा कि बीजेपी के प्रधानमन्त्री उम्मीदवार नरेंद्र मोदी जहर का बीज बोकर और हिंसा को भड़काकर विभाजक राजनीति कर रहे हैं।

घबरा गयी है कांग्रेस
 सोनिया गांधी की कांग्रेस सरकार चुनाव के दौड़ में बुरी तरीके से जूझ रही है। यह सरकार हर एक मापदंड पर लड़खड़ाती हुई दिख रही है। प्रधानमन्त्री के कार्यकाल में जो भी घोटाले हुए हैं, इसने पार्टी को ऐसी संदिग्ध अवस्था में ला खड़ा किया है कि यूपीए के लिए अपनी तीसरी अवधि के लिए सहारा मांगने में मुश्किल आ रही है जिसका नेतृत्व राहुल गांधी करेंगे।

राहुल गांधी का कमजोर नेतृत्व!
राहुल गांधी कांग्रेस के उप सचिव हैं जिनके ऊपर इस बार पार्टी ने पूरा दारोमदार डाला है और पार्टी को यह उम्मीद है कि आने वाले लोक सभा चुनाव में वह उन्हें जीत की ओर ले जायेंगे। दिसंबर २०१३ में पार्टी के करीबन 4 असेंबली इलेक्शन में निराशाजनक हार का सामना करना पड़ा था। राहुल गांधी ने उन 4 राज्यों में जम कर प्रचार किया था। पर अफसोस कि उनका उपनाम गांधी भी उनको वोट दिलाने में सफल नहीं हुआ।

कांग्रेस का लोगों का मोहभंग
उप चुनाव परिणाम के बाद जब कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा तब से पार्टी का नसीब क्षीण होता हुआ दिख रहा है। सोनिया और राहुल गांधी की समझ में यह बात आ गयी है कि गांधी उपनाम का मतलब लोग भ्रष्टाचार और चापलूसी की तरह लेने लगे हैं। लोग परेशान हो रहे हैं और उनको चाहिए दूसरा विकल्प। और घाव पर नमक लगाने के लिए बीजेपी के प्रधानमन्त्री उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के समर्थक दिन प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं। देश मांग रहा है कांग्रेस से हिसाब इसका कारण है देश कि समस्याओं के प्रति उनका ईमानदार रवैया और उनका समाधान ढूंढने की मंशा। उन्होंने कांग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार में लिप्त होने की पोल खोली है और बताया है कि साठ साल देश पर राज करने के बाद उन्होंने देश को ऐसी क्षति पहुंचाई है जिसे सुधारना काफी कठिन है। कांग्रेस पार्टी ने हमेशा ही चापलूसी और पक्षपात को बढ़ावा दिया है। नरेंद्र मोदी ने जब भी लोगों से बात की है उन्होंने यह पक्का किया है कि वह भारत को लेकर अपनी दृष्टि को लोगों के सामने साफ कहें।

मोदी की सरल औऱ मोहक भाषा
नरेंद्र मोदी की इस योजना से जिससे एक तरफ तो कांग्रेस के कारनामों का पर्दाफाश होता है और दूसरी तरफ वह उन सारी समास्यों का समाधान देते हैं, जिससे उनके सुनने वाले इस बात से चकित हो जाते हैं। उनकी सरल भाषा कि वह कैसे इस देश और लोगों की मदद करना चाहते हैं लोगों से जल्द ही इनका एक संपर्क बना देती है। नरेंद्र मोदी की इन कोशिशों से कि वह भारत को कांग्रेस की सरकार से छुटकारा दिलाएं, राहुल और सोनिया दोनों ही परेशान हैं। शायद इसलिए ही लोक सभा चुनाव से पहले वह निजी छींटाकशी कर रहे हैं ताकि नरेंद्र मोदी रुकेंगे और उनकी जान में जान आएगी।

कांग्रेस हमेशा ही दोहरी राजनीति में विश्वास करती आयी है
जहाँ तक धर्मनिरपेक्षता की बात है सच्चाई यह है कि कांग्रेस हमेशा ही दोहरी राजनीति में विश्वास करती आयी है। कांग्रेस जब सरकार में रही है तब जाति और धर्म के नाम पर कई दंगे हुए हैं जिसमें निर्दोष लोगों की जाने गयी हैं। वह कांग्रेस है जिसने जहर के बीज बोये हैं और इससे समय समय पर अप्रत्याशित लाभ पाया है। हाल ही में राहुल गांधी का एक निजी टीवी चैनल को दिया गया साक्षात्कार काफी चर्चा में रहा और इससे 1984 दंगों का मुद्दा वापस उठा है जिसमें कई निर्दोष सिख समुदाय के लोगों की जानें गयीं।

1984 दंगे के मामले में कांग्रेस की चालाकी
नामी कांग्रेस नेताओं को उस भीड़ की अगुआई करते देखा गया जिसने निर्दोष सिखों की जान ली। यह काफी दुखदायी है कि उस हादसे के तीस साल बाद तक पीड़ित लोगों के परिवार को न्याय की आस है क्योंकि आज तक इस मामले में कोई अपराध सिद्धि नहीं हुई। ऐसा इसलिए क्योंकि कांग्रेस सरकार ने इस मुद्दे पर कोई रूचि नहीं दिखायी और कहा कि 1984 दंगे के मामले में उन्होंने निष्पक्ष जांच की मांग की थी। ऐसे कई उदाहरण हैं जहां कांग्रेस ने ऐसे दंगों के लिए सहायक परिस्थितियां बनायी हैं और ऐसे तुष्टिकरण में शामिल हुई है जिससे उनकी "विभाजित करो, राज करो" की नीति सामने आयी है।

गुजरात बना रोल मॉडल
दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी के गुजरात में पिछले दशक से शान्ति बरकरार है। इसका कारण यह है की नरेंद्र मोदी अपने आप को गुजरात का मुख्यमंत्री मानते हैं न कि किसी विशिष्ट समुदाय का। वह गुजरात के विकास के लिए सोचते हैं जिससे सारे समुदाय का भला अपने आप ही हो जाता है। उन्होंने तुष्टीकरण के ऊपर सशक्तीकरण को चुना है। वह कड़ी मेहनत को पक्षपात के ऊपर और चापलूसी के ऊपर श्रेष्ठता को मानते हैं।

मोदी बने लोगों को आदर्श
उनके राज्य को चलाने के तरीके ने आईटी के दिग्गज, व्यवसाय के देश विदेश के सम्राट को सोचने पर मजबूर कर दिया है। उन्होंने कई बार नरेंद्र मोदी और उनके सरकार चलाने के तरीके को सराहा है और ऐसा माना है कि देश में निश्चित ही तरक्की होगी अगर ऐसा इंसान प्रधानमन्त्री बनता है। मोदी की विकाशशील कार्यसूची से भारत की तकदीर बदल जायेगी और वह विदेशों के टक्कर में आ जायेगा। नरेंद्र मोदी के प्रधानमन्त्री बनने और इस तरक्की से दूसरे देश के लोग भी विकास के लिये भारत का उदाहरण देंगे।

मोदी ने हमेशा आगे बढ़ने की बात कही
दुःख की बात यह है कि संकीर्ण विचारों वाला गांधी राजवंश इसको बर्दाश्त नहीं कर सकता। वह भूल जाते हैं कि जहाँ भी नरेंद्र मोदी बोलते हैं वह यह ज़रूर कहते हैं कि गरीबी हिंदुस्तान का सबसे बड़ा दुश्मन है। एक दूसरे से लड़ने के बजाय हमें साथ मिलकर गरीबी को दूर करना चाहिए जो कांग्रेस सरकार ने इस देश को उपहार स्वरुप दिया है। सितंबर 2013 में पार्टी ने नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बताया क्योंकि दिन प्रतिदिन इसकी ज़ोरदार मांग हो रही थी।

भारत के लोग न्याय, शांति, विकास, इज़ज़त और सुनहरा कल चाहते हैं
इसका कारण यह है कि भारत के लोग न्याय, शांति, विकास, इज़ज़त और सुनहरा कल चाहते हैं। अभी के समय में नरेंद्र मोदी के अलावा ऐसा कोई नेता नहीं है जिसमें यह दृष्टिदिखती है कि लोगों की मंशा पूरी हो जाए। सिर्फ एक ही नेता है नरेंद्र मोदी जिसे देश की धड़कन का अंदाजा है और जिसके पास भारत में बदलाव लाने और उसे अलौकिक शक्ति दिलाने के कई उपाय भी हैं।

भारत को आगे बढ़ना है...
नरेंद्र मोदी दिल से भारत की एकता में भी विश्वास रखते हैं। उनको पता है कि आपस में लड़ाई से अस्थिरता आएगी और अपनी ही जनशक्ति कम होगी। अगर भारत को आगे बढ़ना है और व्यापक तौर पर अपनी शाख बनानी है तो सांप्रदायिक एकता और शान्ति सबसे ज्यादा ज़रूरी है। उनके हर भाषण में यह साफ झलकता है कि वह जातियों के भाईचारे में विश्वास करते हैं। उनके किसी भी भाषण से छुपी हुई धमकी नहीं दिखती। उन्होंने देश के गरीब लोगों के साथ वीआईपी की तरह व्यवहार करने की इच्छा ज़ाहिर की है।

अल्पसंख्यक बुरी स्थिति में
और यह सब जानते हैं कि हमारे देश में अल्पसंख्यक बुरी स्थिति में हैं और गरीबी की मार से जूझ रहे हैं। नरेंद्र मोदी गरीबों को गरीबी से निकलना चाहते हैं और उनकी हालत सुधार कर वह उन्हें गौरवान्वित महसूस करवाना चाहते हैं। उनके हर भाषण में यह मुद्दा साफ दिखता है।

गरीबों का शोषण
वह नेता जो गरीबी हटाने और देश में विकास लाने की बात करता है, कांग्रेस के लिए अभिशाप बन चुका है जो सत्ता में गरीबों का शोषण कर आयी और उनकी गरीबी का मज़ाक उड़ाती रही। नरेंद्र मोदी खुद उस गरीबी से गुज़र चुके हैं अनुभव से जानते हैं। इसलिए वह गरीबी को दूर करना चाहते हैं और भारत को इस शैतान से छुटकारा दिलाना चाहते हैं। यह तभी हो पायेगा जब भारत कांग्रेस के चंगुल से मुक्त हो पायेगी।

बौखला गयी है कांग्रेस
कांग्रेस चुप्पी साध कर अपना पतन नहीं देख सकती। इसलिए नरेंद्र मोदी के खिलाफ निजी टिपण्णी लाज़मी है। नरेंद्र मोदी की ज्ञान की बातें सोनिया गांधी के लिए ज़हर के बीज की तरह हैं। सोनिया के आस पास वही लोग रहते हैं जो उनकी तारीफ करते हैं और वही कहते हैं जो वह सुनना चाहती हैं। जब आम आदमी ने ही नरेंद्र मोदी में अगला प्रधानमन्त्री होने की क्षमता देख ली है तो वह कैसी भी टिपण्णी हो, कुछ ख़ास असर नहीं डाल सकती। दूसरी तरफ आने वाले लोक सभा चुनाव में कांग्रेस और भी बुरी तरीके से हारेगी। मोदी नाम का सुनामी अब शुरू हो चुका है और वह रास्ते की कठिनाई को जड़ से उखाड़ता हुआ चलेगा।

वैज्ञानिक शोध पर खर्च : भारत बहुत पीछे



देशको जानबूझ कर पीछे कर  रही है कोंग्रेस …
भारत सरकार विदेशी गुलामी में अपने देश की वैज्ञानिकता को उन्नत नही कर रही है । ईसाई देशों को फायदा पहुचानें कि मानसिकता वाली कोंग्रेस हमारे देश के लिए बोझ बन गई है ! इस समय भारत को एक देशभक्त राजनैतिक दल की सरकार चाहिए जो भारतीय जनता पार्टी ही दे सकती है ।
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वैज्ञानिक शोध पर खर्च के मामले में भारत बहुत पीछे
Fri, 07 Feb 2014
http://www.jagran.com/news
वाशिंगटन। वैश्विक रूप से वैज्ञानिक शोध एवं विकास के क्षेत्र में खर्च को लेकर भारत बहुत पीछे है। इस क्षेत्र में अमेरिका सबसे आगे है। हालांकि इस क्षेत्र में खर्च में वृद्धि को लेकर चीन सबसे आगे है। अमेरिका की एक आधिकारिक रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है।
2011 में विश्व भर में शोध एवं विकास पर करीब 1435 अरब डॉलर (89 लाख करोड़ रुपये) खर्च हुए। विश्व में इस क्षेत्र में हुए कुल खर्च के बारे में यह नवीनतम जानकारी है। इसके मुताबिक 2007 में भारत ने इस पर केवल 24 अरब डॉलर (करीब एक लाख करोड़ रुपये) की राशि खर्च की थी। 2001 में विश्व में इस क्षेत्र में करीब 753 अरब डॉलर (करीब 47 लाख करोड़ रुपये) की राशि खर्च हुई थी।
नेशनल साइंस बोर्ड द्वारा गुरुवार को जारी रिपोर्ट के मुताबिक एक दशक में वैज्ञानिक शोध एवं विकास के लिए हुए खर्च में करीब 6.7 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई। अमेरिका ने 2010 में शोध एवं विकास पर 407 अरब डॉलर (करीब 25 लाख करोड़ रुपये) की राशि खर्च की थी। जबकि 2011 में उसने इस पर 424 अरब डॉलर (करीब 26 लाख करोड़ रुपये) खर्च किए।
2011 में शोध एवं विकास पर हुए वैश्विक खर्च के मामले में अमेरिका चोटी पर रहा और इस खर्च में उसका हिस्सा 30 प्रतिशत से कुछ कम था। जबकि 2001 में इस क्षेत्र में हुए वैश्विक खर्च में अमेरिका का हिस्सा 37 प्रतिशत था। वहीं 2001-2011 की अवधि में चीन में शोध एवं विकास पर होने वाले खर्च में वृद्धि हुई है। चीन ने 2011 में इस क्षेत्र में 208 अरब डॉलर (करीब 13 लाख करोड़ रुपये) खर्च कर विश्व में दूसरा स्थान पाया। 2001-2011 के दौरान चीन ने शोध एवं विकास पर खर्च में प्रति वर्ष औसतन 20.7 प्रतिशत की दर से वृद्धि की है।
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वर्ष 2030 तक विश्व की महाशक्ति बनेगा भारत: रिपोर्ट
Tue, 11 Dec 2012
http://www.jagran.com/news
वाशिंगटन। वर्ष 2030 तक भारत विश्व में उभरती हुई आर्थिक महाशक्तिओं में शामिल हो जाएगा। अमेरिकी खुफिया विभाग की ओर से जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2030 तक आर्थिक तौर पर भारत अन्य राष्ट्रों के मुकाबले काफी आगे निकल जाएगा। वहीं आने वाले समय में चीन की शक्ति कहीं न कहीं धूमिल हो जाएगी।
नेशनल इंटेलिजेंस काउंसिल (एनआईसी) ने वैश्विक रुझानों और 2030 के दुनिया की कल्पना कर एक रिपोर्ट तैयार की है। इस रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि आने वाले समय में भारत विश्व की महाशक्ति में शामिल हो जाएगा।
गौरतलब है कि आज चीन उस कगार पर खड़ा है। लेकिन कल भारत आर्थिक, रक्षा व अन्य कई मुद्दों पर चीन को पछाड़ देगा। चीन की आर्थिक वृद्धि आज 8 से 10 प्रतिशत है। 2030 तक  यह केवल बीते कल की बात हो जाएगी। हालांकि आने वाले समय में दोनों राष्ट्रों के लिए अपनी अर्थ व्यवस्था को संभाले रखना काफी मुश्किल काम होगा। जिस कदर दोनों राष्ट्रों में जन संख्या बढ़ती जा रही है, ऐसे में दोनों राष्ट्रों के लिए विकास दर को बरकरार रखना कठिन कार्य है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2016 तक चीन में कामगार लोगों की संख्या सबसे अधिक होगी लेकिन वहीं वर्ष 2030 तक चीन की आबादी 994 मिलियन से घटकर 961 मिलियन हो जाएगी। दूसरी ओर भारत में कामगार लोगों की संख्या वर्ष 2015 से 2050 तक बढ़ेगी। ऐसे में देखा जा रहा है कि दोनों की समयसीमा में काफी अंतर है।