रविवार, 23 फ़रवरी 2014

पगड़ी की इज्जत, मुझे बढ़ाना है - नरेंद्र मोदी






लुधियाना के जगराव में रैली के लिए पहुंचे भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने पगड़ी पहनाकर सम्मानित किया।

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चौकीदार बनकर पंजे से तिजोरी को बचाऊंगा: मोदी
आईबीएन-7 | Feb 23, 2014
लुधियाना। बीजेपी के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी आज पंजाब के लुधियाना में रैली की। रैली के दौरान मोदी कांग्रेस पर जमकर बरसे। कांग्रेस पर निशाना साधते हुए मोदी ने कहा कि कांग्रेस की पहचान बन गया है भष्टाचार। ये पार्टी सिर्फ एक आदमी की पार्टी रह गई है। खुद के प्रधानमंत्री बनने पर मोदी ने कहा कि मैं प्रधानमंत्री नहीं चौकीदार बनकर बैठूंगा और देश की तिजोरी पर पंजा नहीं पड़ने दूंगा।

मोदी ने कांग्रेस पर हमला बोलते हुए कहा कि कांग्रेस शिरोमणि अकाली दल और बीजेपी की दोस्ती से कांग्रेस परेशान है। यहां उसकी बांटों और राज करो की नीति फल रही है। मोदी ने कहा, कि पूरी एबीसीडी, कांग्रेस के भ्रष्टाचार की पहचान बन गई है। ए से आदर्श घोटाला, बी से बोफोर्स घोटाला, सी से कोयला घोटाला। कांग्रेस के प्रधानमंत्री रहे राजीव गांधी ने कहा था कि दिल्ली, से एक रुपया निकलता है तो गांव पहुंचते पहुंचते 15 पैसे हो जाता है। मैं पूछता हूं कि वो कौन सा पंजा था जो रुपये को घिसता था और रुपया 15 पैसे में बदल जाता था।

मोदी की इस रैली को 'फतह रैली' का नाम दिया गया है। मोदी मंच पर पंजाबी लुक में नजर आ गए। उन्होंने परंपरागत पंजाबी पगड़ी पहन रखी थी। अपने सरदार वाले लुक पर मोदी ने कहा, कि यह पगड़ी बादल साहब ने पहनाई है, इस पगड़ी की इज्जत बढ़ाना मेरा दायित्व बन गया है। पीएम मनमोहन सिंह का नाम लिए बिना उनपर निशाना साधते हुए मोदी ने कहा कि किसी और ने इस पगड़ी की इज्जत बढ़ाई हो या नहीं, मुझे बढ़ाना है।

मोदी ने कहा कि आर्थिक विकास में मदद के लिए कृषि, विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों को प्रोत्साहन दिए जाने की आवश्यकता है। भारत को आगे ले जाने के लिए हमें उद्योग की जरूरत है। हमें कृषि की जरूरत है ताकि कोई भूखा नहीं रहे। सेवा क्षेत्र को भी निवेश की जरूरत है। हमने इस क्षेत्र पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया है। जमीन बढ़ने नहीं जा रही और जोत छोटी होती जा रही है। हमें नई प्रौद्योगिकी और वैज्ञानिक अनुसंधान के जरिए कृषि उत्पादन बढ़ाना होगा।

नेता और जनता दोनों के मन में निस्वार्थ भाव से, देश का भाग्य बदल सकता है -प.पू. सरसंघचालक श्री मोहन जी भागवत





भोपाल, दिनांक 23 फरवरी 2014
प.पू. सरसंघचालक श्री मोहन जी भागवत द्वारा मॉडल स्कूल भोपाल में दिए उद्बोधन के अंश -
आज का समता व शारीरिक कार्यक्रम बहुत अच्छा हुआ | किन्तु यदि संतोष हो जाए तो उसका अर्थ होता है विकास पर विराम और अच्छा होने की कोई सीमा रेखा नहीं होती | किसी व्यक्ति, संस्था अथवा देश की सफलता के लिए भी यही द्रष्टि आवश्यक है | नेता के अनुसार चलने वाले अनुयाई भी आवश्यक हैं | रणभूमि में ताना जी मौलसिरे की मृत्यु के बाद यदि अनुयाईयों में शौर्य नहीं होता तो क्या कोंडाना का युद्ध जीता जा सकता था ? नेता और जनता दोनों के मन में निस्वार्थ भाव से बिना किसी भेदभाव के देश को उठाने का भाव हो तो ही देश का भाग्य बदल सकता है | संघ ने शाखा के माध्यम से घर घर, गाँव गाँव में शुद्ध चरित्र वाले, सबको साथ लेकर चलने वाले निस्वार्थ लोग खड़े करने का कार्य हाथ में लिया है | समाज का चरित्र बदले तो ही देश का भाग्य बदलेगा |
शारीरिक कार्यक्रम कोई शक्ति प्रदर्शन नहीं है, हिन्दू समाज को शक्ति संपन्न बनाने के लिए हैं | आवश्यक गुण संपदा इन्हीं कार्यक्रमों से प्राप्त होती है | राष्ट्र उन्नति हो, दुनिया सुखी हो इसके लिए हर घर, गाँव शहर में यह मनुष्य बनाने का कार्य सतत, निरंतर, प्रखर, उत्कट होना चाहिए | जैसे लोटा रोज मांजा जाता है, उसी प्रकार स्वयं को भी रोज मांजना | यह नहीं मानना चाहिए कि मैं कभी मैला नहीं हो सकता | यह सब कार्यक्रम केवल कार्य के लिए | यंत्रवत नहीं श्रद्धा व भावना के साथ | कृष्ण की पत्नियों में रुक्मिणी पटरानी थीं | सत्यभामा को इर्ष्या हुई | नारद जी ने सुझाव दिया कि कृष्ण का तुलादान करो | न केवल सत्यभामा बल्कि सातों रानियों के सारे अलंकरण भी कृष्ण का पलड़ा नहीं उठा पाए | अंत में रुक्मिणी ने जब तुलसीदल डाला तब कृष्ण का पलड़ा उठा | वजन भाव का होता है | नेता सरकार सब बदलकर देख लिया, किन्तु परिश्रम और प्रामाणिकता नहीं इसलिए फल नहीं | भाव को उत्कट बनायेंगे तो परिश्रम अधिक होगा तथा पूर्णता की मर्यादा को हाथ लगा सकेंगे |


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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मध्य क्षेत्र बैठक भोपाल
भोपाल. 20 फरवरी | समाज की दृष्टि में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवर्तन का संवाहक है | समाज की यह दृष्टि संघ की साधना एवं तपस्या के कारण बनी है | आवश्यकता इस बात की है कि तदनुरूप अपने आचरण एवं व्यवहार से हम निर्णायक बल प्राप्त करें | यह आव्हान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प.पू. सर संघचालक श्री मोहनराव भागवत ने एलएनसीटी परिसर में आयोजित संघ के मध्यक्षेत्र की तीन दिवसीय क्षेत्रीय बैठक में विविध क्षेत्र में कार्यरत स्वयंसेवकों से किया | इस अवसर पर क्षेत्र संघचालक श्री कृष्ण माहेश्वरी एवं क्षेत्र कार्यवाह श्री माधव विद्वांश भी उनके साथ मंचासीन थे | बैठक में 48 संगठनों के 410 स्वयंसेवक उपस्थित थे |
श्री भागवत ने कहा कि क्रान्ति के माध्यम से कुछ समय के लिए आंशिक उथल पुथल तो आ सकती है, किन्तु साथ ही उसके दुष्परिणाम भी सामने आते हैं | उन्होंने कहा कि देश को क्रान्ति की नहीं संक्रांति की आवश्यकता है जिसके लिए समाज को प्रवोधन करना होगा, जागरण करना होगा | देश के समक्ष उपस्थित चुनौतियों को स्पर्श करते हुए श्री भागवत ने कहा कि इस देश की पहचान हिन्दू पहचान है और यही राष्ट्रीय पहचान है | जो इस पहचान से दूर होगा, वह मतांतरण का शिकार होगा | हिन्दू समाज का एक ही रोग है, वह है “हम” का विस्मरण | इस समाज को एक सूत्र में पिरोना ही युग धर्म है और संघ यही कार्य कर रहा है |
श्री भागवत ने कहा कि आज देश को मजबूत नेतृत्व की आवश्यकता है परन्तु यह तभी संभव है, जब हम सब व्यक्तिगत आग्रह दुराग्रह को दूर रखते हुए समाज में एक सकारात्मक वातावरण निर्माण करें | तीन सत्रों में चली इस बैठक में स्वयंसेवकों ने अपनी जिज्ञासाएं भी रखीं जिनका समाधान सरसंघचालक जी ने किया | पूर्व सरसंघ चालक श्री सुदर्शन जी की स्मृति में 600 पृष्ठीय “सुदर्शन स्मृति” ग्रन्थ सहित दो पुस्तकों का लोकार्पण भी इस अवसर पर सरसंघचालक जी ने किया |

भारत की आजादी का अश्वमेध - रामबहादुर राय



अंग्रेजों के तीसरे मोर्चे को नाकाम किया था पटेल ने
- रामबहादुर राय

अंग्रेज भारत को आजाद करने से पहले एक कुटिल नीति पर चल रहे थे। उनकी योजना थी कि आजाद करने से पहले भारत को तीन हिस्से में बांट दें। हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और प्रिंसतान। रजवाड़े और रियासतों को वे प्रिंसतान बनाना चाहते थे।उस समय 565 ऐसे अलग-अलग देशभर में फैले रजवाड़े थे। उनका आकार विभि था। कोई तो यूरोप के देशों के बराबर थे। तो किसी का आकार पहाड़ी पर किसान की जो जोत होती है, उतना ही था। 1935 के भारत सरकार अधिनियम में इन रजवाड़ों को सीधे वायसराय के अधीन कर दिया गया था। उन राजे-महाराजों को ब्रिटिश सम्राज्य के प्रतिनिधि की उपाधि दी गई थी। उनके मामले को देखने के लिये वायसराय के अधीन एक राजनीतिक विभाग बनाया गया था। उन्हें संवैधानिक संरक्षण प्राप्त था। अनेक रियासतों की अपनी फौज थी, जिन्हें ब्रिटिश सेना ने प्रशिक्षित कर रखा था।

असंभव को संभव
ये रियासतें भारत को विखंडित करने के खतरों से भरी हुई थी। उन्हें अंग्रेजों का संरक्षण प्राप्त था। इस कारण आजाद भारत में पहले दिन से ही गृह युद्ध का खतरा मंडरा रहा था। उसे देख-समझ कर,परवाह न कर, सरदार पटेल ने जो काम कर दिखाया, उससे उन्हें भारत जहॉं "लौहपुरुष' मानता है, वहीं दुनिया में वे "भारत के बिस्मार्क' के रूप में जाने-माने जाते हैं। बिस्मार्क ने जर्मन राज्यों के एकीकरण के लिये जो किया, वह बड़ी उपलब्धि थी। लेकिन सरदार पटेेल ने रियासतों के भारत में विलीनीकरण के लिये जो किया वह असंभव सा काम था। उन्हें सबसे पहले लार्ड माउंटबेटन से जूझना पड़ा। वे जीते। विलय के लिए एक दस्तावेज बना। जिस पर राजाओं को दस्तखत करना था। 565 रियासतों में 40 ऐसे राज्य थे, जिनके साथ संधियॉं थी। दूसरों के साथ सनदें थी।
सरदार ने अंग्रेजों की चाल समझ ली। उसे विफल करने के लिये पंडित नेहरू और मौलाना आजाद को समझाया। महात्मा गॉंधी को तैयार किया। अपनी योजना में वी.पी.मेनन को प्रमुख भूमिका दी।
2 सितंबर 1946 को जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी। जिसमें सरदार पटेल गृहमंत्री और सूचना प्रसारण मंत्री बने, लेकिन रियासतों का राजनीतिक विभाग लार्ड माउंटबेटन संभाल रहे थे। चुनौतियां कम नहीं थीं, क्योंकि कुछ रियासतों के सीधे सम्पर्क में जिा थे। उन्हें उकसा रहे थे। वे साजिश भी रच रहे थे। उनको ब्रिटिश सरकार मदद भी कर रही थी। इस मकड़जाल को सरदार ने बड़ी आसानी से हटाया।

राजनैतिक अश्वमेध
अंग्रेज रियासतों के जरिए आजादी के समय" तीसरा मोर्चा' बनवाना चाहते थे। संसदीय राजनीति के गठबंधन दौर से फिर से वह कल्पना नए रूप में जन्म ले रही है । "तीसरे मोर्चे' की मानसिकता पुरानी है। उसे अनेक तरह के आडंबर दिए जाते हैं। जिस तरह रियासतों को निजी जायदाद चाहिए थी और कुछ अधिकार भी, उसी तरह आज के "तीसरे मोर्चे' को सत्ता और संपत्ति चाहिए। अंग्रेजों की "तीसरे मोर्चे' की कल्पना ने अब भारतीय राजनीति में जातिवाद, परिवारवाद और भ्रष्टाचार के तीन रोग का रूप ले लिया है। उसे ही दूर करने के लिए 15 दिसंबर को सरदार पटेल की पुण्यतिथि पर 565 स्थानों से एकता की दौड़ हुई। नरेन्द्र मोदी की इसमें प्रेरणा थी।
सरदार पटेल ने देश को किस तरह एक किया, यह जानने और समझने का यह सही वक्त है। क्योंकि तब जो खतरा था, वह इस समय भी मंडरा रहा है। सरदार पटेल रियासतों को मिलाने के लिए तब राजनीतिक अश्वमेध यज्ञ पर निकले थे। उन्होंने एक नीति अपनाई। जहॉं जरूरत पड़ी वहॉं समझाया। जहां बल प्रयोग जरूरी था, वहॉं बेहिचक वह अस्त्र चलाया। खुशामद नहीं की। दबाव बनाने का दिखावा नहीं किया। उनकी आवाज ही यह काम कर देती थी। उनके आदेश स्पष्ट होते थे। नेतृत्व का यही गुण आज दुर्लभ हो गया है।
उन्होंने उड़ीसा से शुरुआत की। वहां के छोटे राजाओं की सभा बुलाई। उन्हें समझाया। उनको आश्वस्त किया कि उनके अधिकार और गौरव सुरक्षित रहेंगे। परिणाम यह हुआ कि "मयूरभंज' के अलावा सभी रजवाड़े तैयार हो गए। उस समय उड़ीसा में ही 28 रियासतें थीं। उनका अगला कदम नागपुर में था। वहां 18 राजा थे। उन्हें सलामी रियासतें कहा जाता था। उनकी जब सभा हुई तो सरदार ने उन्हें सबसे पहले सलाम कहा। इतना ही काफी था। नागपुर के आसपास के सारे राजा समझदार निकले। वे बिना देर किए दस्तखत करने को तैयार हो गए।
हैदराबाद, जूनागढ़ और कश्मीर के अलावा सभी राज्यों के राजाओं ने 15 अगस्त 1947 से पहले भारत में मिलना स्वीकार कर लिया। जूनागढ़ में भी उनको बल प्रयोग करना पड़ा। उस राज्य के मुस्लिम नवाब को जिा ने फुसला लिया था। वहां सरदार को सेना भेजनी पड़ी। जूनागढ़ के तब दीवान शाहनवाज भुट्‌टो होते थे। उनके ही बेटे जुल्फिकार अली भुट्‌टो थे। जो बाद में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने। राजपूताने में जोधपुर ने थोड़ी समस्या पैदा की। उसे सरदार ने अपनी व्यवहार कुशलता से हल कर लिया। भोपाल के नवाब के जरिए जिा जोधपुर रियासत को पाकिस्तान में मिलाने के लिए षड़यंत्र कर रहे थे। उसे सरदार ने कैसे सुलझाया, यह एक रोचक इतिहास है। जोधपुर के नरेश बाद में सरदार पटेल के इतने भक्त हो गए कि वे उनके साथ राजाओं से बातचीत में भी रहने लगे।

कश्मीर समस्या भी नहीं होती
यह सिलसिला बढ़ता गया। सरदार जहॉं जाते वहॉं राजे-रजवाड़े बिछे हुए पाए जाते थे। सौराष्ट्र में 200 से ज्यादा तरह-तरह की रियासतें थीं। उनके नाम अलग थे। उनका दर्जा आकार-प्रकार से तय होता था। कुछ रजवाड़े कहलाते थे तो कुछ तालुकदार थे। वहॉं समस्या तुलना में ज्यादा थी। सरदार ने उन सबको संयुक्त सौराष्ट्र में मिलवाया। 15 जनवरी 1948 को उसका विधिवत गठन करवाया। उसमें वे उपस्थित रहे। इसी तरह कोल्हापुर राज्य को मुंबई प्रांत के साथ मिलवाया। तभी बड़ौदा रियासत ने स्वतंत्र बने रहने की चाल चली। सरदार ने उसे नाकाम किया। बड़ौदा नरेश को गद्‌दी से उतारा और उनके बेटे को राजा बनवा दिया। ऐसे अनेक संस्मरण बिखरे पड़ेे हैं, जिनमें सरदार पटेल के संकल्प और उनके व्यक्तित्व की करुणा झलकती है। उन्होंने रियासतों की सत्ता का विलय करवाया। साथ ही साथ राजाओं को देश प्रेम का पाठ भी पढ़ाया।
हैदराबाद देश की सबसे बड़ी रियासत थी। अंग्रेजों की उसे शह थी। जब अंग्रेजों ने टीपू सुल्तान को हरा दिया तो निजाम की सीमाओं का विस्तार हो गया। अंग्रेजों ने इसमें मदद की। आजादी के समय निजाम का गरूर कम नहीं हुआ था। उसके पास 50 हजार सैनिकों की फौज थी। निजाम की ताकत इस बात में भी थी कि उसे जिा और अंगे्रजों की मदद मिल रही थी। सरदार ने सब्र से काम लिया। जब देखा कि निजाम को सद्‌बुद्धि नहीं आ रही है तो जनरल राजेन्द्र सिंह के नेतृत्व में सेना भेजी। सेना की तीन टुकड़ियों ने तीन तरफ से प्रवेश किया। निजाम की सारी शेखी निकल गई। लेकिन सरदार पटले ने निजाम के साथ मानवीय व्यवहार किया। अगर जवाहर लाल नेहरू हस्तक्षेप न करते तो सरदार तभी कश्मीर के मसले को भी हल कर लेते।


कम्बोदिया में भी हैं शंकराचार्य




कौंडिन्य ने बसाया था कम्बोदिया को
कम्बोदिया में भी हैं शंकराचार्य
- पाथेयकण से
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भारत में आदि शंकराचार्य ने भारत के चारों कोनों में मठ स्थापित कर उनमें अपने प्रतिनिधि नियुक्त किये थे। उनके अतिरिक्त कांची मठ के पूज्य शंकराचार्य भी हिन्दू समाज के सर्वाधिक प्रतिष्ठित धर्माचार्यों में से हैं। भारत ही की तरह कम्बोदिया में भी शंकराचार्य हैं और उनका भी पूरे देश में वही सम्मान और प्रतिष्ठा है, जो भारत में पूज्य शंकराचार्यों का है।
गत दिनों कम्बोदिया और थाईलैण्ड की यात्रा पर गये वनवासी कल्याण आश्रम के प्रतिनिधिमण्डल में शामिल मेजर एस.एन.माथुर ने उक्त जानकारी दी। मेजर माथुर कल्याण आश्रम के विदेश विभाग के प्रभारी हैं। उन्होंने बताया कि कम्बोदिया में शंकराचार्य को "शंकराज' कहा जाता है और उनकी भारत-भूमि का दर्शन करने की बड़ी तीव्र इच्छा है। उनका शिष्य समुदाय भी हैजिसकी शिक्षा संस्कृत में हुई है। देश के सभी राज्याधिकारी उनका सम्मान करते हैं तथा उनसे परामर्श लेते हैं। कम्बोदिया में सैकड़ों मन्दिर हैं। विश्व का सबसे बड़ा मन्दिर अंगकोरवाट भी इसी देश में है। सभी मन्दिरों में प्रवेश द्वार के दोनों ओर शेषनाग की मूर्तियॉं हैं। शेषनाग की वहॉं विशेष पूजा की जाती है। प्रत्येक मन्दिर में गणेश जी की मूर्ति एवं शिवलिंग भी मिलते हैं।
इसी प्रकार थाईलैण्ड में राजगुरू हैं जो ब्राह्मण हैं। देश का राजा और प्रधानमंत्री भी पैर छू कर उन्हें आदर देते हैं। मेजर माथुर ने बताया कि राजगुरु के शिष्यों की शिक्षा भारत में "कांची-मठ' में हुई है। पिछले दिनों उनके तीन शिष्य कांची में दीक्षित हो थाईलैण्ड लौटे हैं। भारतीयों के प्रति उनमें इतना आदर है कि कल्याण-आश्रम के शिष्ट-मण्डल के चरण स्पर्श कर उन्होंने अगवानी की। दक्षिण-एशिया के सभी देशों में कुछ सौ वर्षों पहले तक हिन्दू नरेशों का ही शासन रहा है। अधिकांश शासक ब्राह्मण थे। आज भी ये देश अपने पुरखों और परम्पराओं को भूले नहीं हैं।
हंगरी पूर्वी यूरोप का एक देश है। पहले यह भी सोवियत संघ के प्रभाव में था। सोवियत संघ के विघटन के बाद इसे भी साम्यवादी तानाशाही से छुटकारा मिला। यहॉं की खुफिया पुलिस रूसी के.जी.बी. से भी अधिक बदनाम थी। मेजर माथुर ने बताया कि यहॉं के लोग अपने को राजपूत चौहानों का वंशज मानते हैं। कामरेडों के मकड़-जाल से निकलने के बाद वे अब "चर्च' से परेशान हैं। पादरियों को वे समस्याओं की जड़ मानते हैं।
इतिहास

कम्बोदिया जिसे आज कम्पूचिया के नाम से जाना जाता है, आज से दो हजार वर्ष पहले काफी विस्तृत भू-प्रदेश था। उस पूरे भू-प्रदेश पर नागवंशी शासन करते थे। जिस समय उज्जैन में प्रतापी सम्राट विक्रमादित्य का शासन था, दक्षिण के पल्लव राज्य से एक पराक्रमी ब्राह्मण युवक "कौण्डिन्य' विशान नौका पर सवार हो सागर पार करता हुआ नाग-राज्य जा पहुँचा। उसने वहॉं की रानी सोमा से विवाह कर एक नये और उत राजवंश की स्थापना की। कौण्डिन्य के साथ भारतीय हिन्दू संस्कृति भी कम्बोदिया पहुँच गई। यहॉं अनेक शिलालेख मिले हैं जिनमें संस्कृत में उक्त प्रसंग का वर्णन है। अंगकोरवाट में मिले एक शिलालेख में लिखा है-
कुलासीद्‌भुजगेन्द्रकन्या सोमेति सा वंशकरी पृथिव्याम्‌।
कौण्डिन्यनाम्ना द्विजपुंगवेन कार्य्यार्थपत्नीत्वमनायियापि।।
अर्थात्‌ कौण्डिन्य नाम के ब्राह्मणवीर ने नागकन्या सोमा से विवाह कर इस भूमि पर नये राजवंश की स्थापना की।
चीनी इतिहास में कौण्डिन्य के राजवंश के बारे में "फूनान साम्राज्य' के रूप में विस्तार से लिखा गया है। यह साम्राज्य छह सौ वर्षांे तक बना रहा। इस कालखण्ड में एक और कौण्डिन्य हुआ जो जयवर्मन नाम से सम्राट बना। जयवर्मन के समय इस साम्राज्य की सीमाएं सागर-तट से चीन तक विस्तृत हो गईं तथा यह एक वैभवशाली राज्य बन गया। आज के लाओस, वियेतनाम,थाईलैण्ड, मलयेशिया आदि सभी देश इस फूनान-साम्राज्य में शामिल थे। उस समय इसकी राजधानी का नाम व्याधपुर था।
कम्बु से कम्बोदिया-
छह सौ वर्ष के बाद फूनान में अराजकता उत्प हुई तो कम्बु नाम के भारतवंशी ने शासन की बागडोर अपने हाथ में ली। वह बहुत लोकप्रिय हुआ और इसीलिये उस देश का नाम कम्बुज हो गया। कालांतर में यह कम्बोदिया हो गया। कम्बु के वंशज भववर्मन और महेन्द्रवर्मन ने साम्राज्य को वैभव की नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। कहते हैं कि उस काल में कम्बुज के लोग चॉंदी के बर्तनों का प्रयोग करते थे। रामायण, महाभारत, पुराण व उपनिषद उस समय घर-घर पढ़े जाते थे। शिलालेखों के अनुसार महेन्द्रवर्मन के पुत्र ईशानवर्मन ने ईशानपुर को अपनी नई राजधानी बनाया। इसके अवशेष आज भी "कौमपोंगथाम' नगर के पास मिलते हैं।

नवीं शताब्दी में जयवर्मन द्वितीय ने खमेर साम्राज्य की स्थापना की। उसके पौत्र यशवर्मन ने यशोधरपुर नाम से नई राजधानी बनाई। अनेक मन्दिर और बौद्ध विहार उसके शासन में बनाये गये। युगाब्द 4215(सन्‌ 1113) में इसी वंश के प्रतापी सम्राट सूर्यवर्मन द्वितीय ने भगवान विष्णु का प्रसिद्ध मन्दिर अंगकोरवाट बनवाया। आज यह भी विश्व का सबसे बड़ा मन्दिर है। एक हजार फीट लम्बे और 750 फीट चौड़े इस भव्य मन्दिर में रामायण और महाभारत के प्रसंग उकेरे हुए हैं।
श्यामदेश (थाईलैण्ड)-

यह प्रदेश कई शताब्दियों तक कम्बुज-साम्राज्य के अन्तर्गत ही रहा। इसलिये यहॉं भी वैदिक-हिन्दू संस्कृति का व्यापक प्रभाव रहा। दक्षिण चीन के "विदेह' राज्य से कुबलई खान द्वारा निकाले गये भारतीय थाईलैण्ड में बस गये। छाओ-छक्री नाम के एक पराक्रमी युवक ने श्यामदेश में स्वतंत्र राज्य स्थापित किया। "इन्द्रादित्य' के नाम से वह थाईलैण्ड का राजा बना। यह चवालीसवें युगाब्द (तेरहवीं सदी) के अंत की घटना है। इसी के एक वंशज ने अपना नाम "रामाधिपति' रखा। अपनी राजधानी द्वारावती का नाम भी बदल कर उसने "अयोध्या कर दिया। हिन्दू धर्म ग्रन्थों के अध्ययन को उसने बढ़ावा दिया और "मनुस्मृति' के आधार पर राज्य के कानून बनवाये।
सन्‌ 1782 में वर्तमान राजवंश के पहले राजा "राम-प्रथम' के नाम से सिंहासन पर बैठे। सुरक्षा के दृष्टि से वे राजधानी को अयोध्या से "बंगकोक' ले आये। इस समय "राम-नवम' थाईलैण्ड के नरेश हैं। रामायण यहॉं राष्ट्रीय ग्रंथ की तरह मान्य है। थाई भाषा में जगज्जननी सीता को "सीदा' दशरथ को "तसरथ' रावण को "तसकंध' और लक्ष्मण को "लक' कहा जाता है। सुग्रीव' "सुक्रीव' और किष्किन्धा नगरी "खिदखि' हो गये। राम-कथा का स्वरूप वही है जो वाल्मीकि रामायण में है।