गुरुवार, 13 मार्च 2014

नेताजी की रहस्यमय मौत : क्यों ऊँगली उठती हे रूस कि तरफ ?


जब  भी बात सुभाष चन्द्र बोस की चलती हे , तब ही यह बात आती है कि हबाई हादसा हुआ ही नहीं और फिर बात रूस की तरफ बड़ कर समाप्त होती है । ज्यादातर मौकों पर ऐशा ही क्यों होता है ?

यह समाचार I B N से है !



नेताजी की रहस्यमय मौत पर एक और सनसनीखेज खुलासा
वार्ता | Jan 29, 2013
http://khabar.ibnlive.in.com/news/90711/1

कोलकाता। नेताजी सुभाषचंद्र बोस की रहस्यम मृत्यु पर एक और सनसनीखेज खुलासा करते हुए रूस में रामकृष्ण मिशन के प्रमुख मंहत ने कहा है कि नेताजी की मौत विमान दुर्घटना में नहीं बल्कि रूस की एक जेल में हुई थी।

रूस में पिछले दो दशक से रामकृष्ण मिशन के अध्यक्ष रहे ज्योतिरानंद ने अपनी हाल की असम यात्रा के दौरान एक टेलीविजन साक्षात्कार में यह बात कही। उन्होंने कहा कि भारत सरकार का यह दावा गलत है कि नेताजी 18 अगस्त 1945 को ताईवान में ताईहोकू हवाई अड्डे पर विमान दुर्घटना में मारे गए थे।

उन्होंने कहा कि सच्चाई यह है कि उन्हे रूसियों ने पकड़ लिया था और ओमस्क की जेल मे कैद कर दिया था जहां काफी समय बाद उन्होंने अंतिम सांस ली थी। ओमस्क रूस के साइबेरिया क्षेत्र का एक छोटा शहर है। उन्होंने कहा कि इस बात की पूरी संभावना है कि नेताजी ने इसी जेल मे अपनी अंतिम सांस ली होगी।

मास्को में रामकृष्ण मिशन की सचिव लिलियाना मालकोवा ने ज्योतिरानंद के इस सनसनीखेज खुलासे को सही बताया है। मंहत ने कुछ दस्तावेजों और रूस में भारत की तत्कालीन राजदूत विजय लक्ष्मी पंडित के बयान का हवाला देते हुए बताया कि जब पंडित को नेताजी के ओमस्क जेल में होने की खबर लगी तो वह उनसे मिलने वहां गई थीं लेकिन रूसी अधिकारियों ने उन्हें नेताजी से नहीं मिलने दिया।

ज्योतिरानंद ने कहा कि पंडित जब जेल से बाहर निकल ही रहीं थीं कि उन्होंने हूबहू नेताजी से मिलते जुलते शक्ल वाले एक कैदी को वहां देखा। वह कैदी काफी थकाहारा दिखाई पड़ रहा था। ऐसा लगता था कि उसे जेल में काफी यातना दी गई है जिससे उसका मानसिक संतुलन बिगड़ गया है।

मंहत ज्योतिरानंद के मुताबिक पंडित यह सबदेख कर बहुत व्यथित हुई थीं और फौरन नई दिल्ली पहुंच कर उन्होंने इस बात की जानकारी कांग्रेस के तत्कालीन बड़े नेताओं को दी थी। लेकिन इस पर कोई कार्रवाही नहीं की गयी।

इस बीच नेताजी पर शोध कर रहे एक शेाधर्कता अनुज धर ने सोमवार को कोलकाता में विदेश मंत्रालय के 12 जनवरी 1996 के एक ऐसे गोपनीय दस्तावेज का हवाला दिया जिसमें मंत्रालय की ओर से रूस की मीडिया में लगातार आ रही उन खबरों पर गहरी चिंता जताई गई थी जिनमें कहा गया था कि नेताजी की मौत 1945 के बाद रूस की एक जेल में हुई थी। इस दस्तावेज पर मंत्रालय के तत्कालीन संयुक्त सचिव आर एल नारायणन के हस्ताक्षर है और साथ ही इसमें एक पूर्व विदेश सचिव की टिप्पणी भी संलग्न है।

रहस्यमय विमान हादसे, जो बस अनसुलझी गुत्थी : ABP News



रहस्यमय विमान हादसे, जो बस अनसुलझी गुत्थी बनकर रह गए!
ABP News वेब डेस्क, गुरुवार, १३ मार्च २०१४

नई दिल्ली: फ्लाइट के दौरान अचानक लापता हो गए मलेशियाई एयरलाइन के विमान एमएच 370 का फिलहाल कहीं कोई सुराग नहीं है. विमानों के अचानक लापता हो जाने की ये कोई पहली घटना नहीं है. ऐसी  जब विमान राडार पर कोई संकेत छोड़े बिना अचानक कहीं लापता हो गया और जिसका कहीं कोई सुराग नहीं मिला. पेश हैं ऐसे 6  जो फ्लाइट के दौरान हुए और जिनके बारे में अब तक कहीं कोई जानकारी नहीं है.



एयर फ्रांस फ्लाइट 447
 2009 में रियो डि जेनेरियो से पेरिस जा रही एक एयरबस ए330 अटलांटिक महासागर में गायब हो गई. इस दुर्घटना में सभी 228 यात्री और चालक दल के सदस्यों की मौत हो गई. इस दुर्घटना में मारे गए लोगों के शवों और मलबे की खोज और बचाव कार्य दलों को वहां पहुंचने में पूरे 5 दिन लग गए थे. हादसे की वजह 3 वर्ष बाद सामने आई कि बर्फ के टुकड़ों के कारण ऑटोपायलट अलग हो गया था. इस दुर्घटना के 74 यात्रियों के शवों को अबतक निकाला नहीं जा सका है.



एमिलिया ईयरहार्ट का हादसा
 विमानन इतिहास की ये सबसे ज्यादा चर्चित घटना है जिसमें एक बहुत ही अनुभवी पायलट एमेलिया ईयरहार्ट अपने दो इंजनों वाले मोनोप्लेन समेत फ्लाइट के दौरान गायब हो गई थीं. यह दुर्घटना 1937 में प्रशांत महासागर में हुई थी. एमीलिय अपने विमान से दुनिया का चक्कर लगाने की कोशिश कर रही थीं. करोड़ों डॉलर की खोज के बाद भी अब तक न तो उनके विमान का कहीं कोई मलबा मिला और न एमीलिया का ही कुछ पता चला.  1939 में ईयरहार्ट को आधिकारिक तौर पर मृत घोषित कर दिया गया था.



फ्लाइंग टाइगर लाइन फ्लाइट 739
 1962 में गुआम से इस नाम की एक अमेरिकी सैन्य उड़ान भरी गई थी और विमान पर 90 से ज्यादा सैनिक सवार थे. ये लोग फिलीपींस जा रहे थे लेकिन ये फ्लाइट कभी ‍फिलीपींस नहीं पहच सकी. पूरे का पूरा विमान कहीं लापता हो गया. लापता होने से पहले पायलटों ने किसी खतरे या अस्वाभाविक गड़बड़ी की कोई सूचना नहीं दी. अमेरिकी सेना के 1300 लोगों ने इस विमान के मलबे की खोज की लेकिन अब तक न तो विमान के मलबे का कहीं कोई सुराग मिला और न ही विमान पर सवार सैनिकों की कोई जानकारी मिल सकी है. इस मामले में एक लाइबेरियन टैंकर शिप के चालक दल के सदस्यों का दावा है कि उड़ान के समय उन्होंने आसमान में 'बहुत ज्यादा चमकीली रोशनी' देखी थी लेकिन अमेरिकन सिविल एयरोनॉटिक्स बोर्ड का मानना है कि वो इस दुर्घटना के संभावित कारणों का पता लगाने में सफल नहीं रहा.



ब्रिटिश साउथ अमेरिकन एयरवेज
एंडीज पर्वतमाला पर गायब 1947 की इस उड़ान का कोई चिन्ह पाने के लिए 50 वर्ष से अधिक का समय लगा. इस उड़ान पर 11 लोग सवार थे. अर्जेंटीना के दो रॉक क्लाइम्बर्स ने 1998 में एंडीज पर विमान के इंजन का मलबा खोजा था और इसके बाद सैन्य अभियान में लोगों के शव भी पाए गए थे. कुछ लोगों का कहना है कि जब विमान माउंट तुपानगेटो से टकराया तब एक बर्फीला तूफान आ गया था जि‍समें विमान का मलबा और लोगों की लाशें दब गई थीं.



बरमूडा ट्रैंगिल
इस तथाकथित ''शैतानी त्रिकोण'' के विशाल समुद्र के उपर फैले आसमान में भी कई विमान फ्लाइट के दौरान लापता हुए हैं. ये त्रिकोण- फ्लोरिडा, प्यूरिटो रिको और बरमूडा-के बीच समुद्र में मौजूद है, बरमूडा ट्रैंगिल दुनियाभर में विमानों के रहस्यमय शिकारी के रूप में बदनाम है. दो ब्रिटिश साउथ अमेरिकन एयरवेज के पैसेंजर जेट्‍स बरमूडा ट्रैंगिल में 1948 और 1949 में गायब हो गए थे. इन विमानों में 51 से ज्यादा लोग सवार थे और इनके बारे में कहीं कोई पता नहीं चला. इसी तरह 1945 में 5 अमेरिकी बमवर्षक विमानों इस इलाके में एक प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रहे थे लेकिन इनका भी कभी कोई पता नहीं चल सका. इन लोगों की खोज के लिए एक विमान में 13 सदस्यीय दल भेजा गया था लेकिन इस विमान का भी कोई पता नहीं चल सका था.



उरुग्वे एयर फोर्स फ्लाइट 571
1972 में चिला के सैंटियागो से एक विमान ने उड़ान भरी. इसमें 45 लोग सवार थे. खराब मौसम के कारण ये विमान हादसे का शिकार हो गया. इस हादसे में 12 लोगों की मौत हो गई थी. 72 दिनों तक अधिकारियों को जानकारी ही नहीं थी कि हादसे के शिकार कुछ यात्री अब भी जिंदा हैं. इस बीच विमान के मलबे में शरण लिए 8 लोगों की बर्फीले तूफान के कारण मौत हो गई. शेष 16 लोगों को जीवित रहने के लिए अपने मृत साथियों का मांस खाना पड़ा. विमान हादसे के दो महीने बाद इन लोगों के बारे में अधिकारियों को पता चला तब कहीं जाकर इन लोगों को बचाया जा सका.

'आप' की वेबसाइट पर कश्मीर का हिस्सा पाकिस्तान में!



'आप' की वेबसाइट पर कश्मीर का हिस्सा पाकिस्तान में!
नवभारतटाइम्स.कॉम | Mar 11, 2014

नई दिल्ली
आम आदमी पार्टी (आप) एक और विवाद में फंसती दिख रही है। 'आप' के डोनेशन वाले पेज पर भारत का विवादित नक्शा दिखाया गया था, लेकिन सोशल मीडिया पर चर्चा और हमारी साइट पर स्टोरी आने के बाद इसे हटा लिया गया है। इसमें पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) को भारत में नहीं दिखाया गया था। ट्विटर पर लोग इस विवादित नक्शे को शेयर करके 'आप' की खिंचाई कर रहे हैं, लेकिन पार्टी की ओर से इस मामले अभी कोई बयान जारी नहीं हुआ है।

यह स्टोरी लगाए जाने के बाद 'आप' की साइट पर से विवादित नक्शे को हटा लिया गया है। हमने नक्शे का स्क्रीनशॉट इसे हटाए जाने से पहले ही ले लिया था। नीचे लगे इमेज में www.aaptrends.com यूआरएल भी साफ दिख रहा है।
इस विवादित नक्शे के नीचे @AAP2014 ट्विटर हैंडल की ओर से यह सफाई दी गई थी, 'यह भारत का वास्तविक नक्शा नहीं है। हरे रंग में दिखाए गए हिस्से भारत के उस भाग को दिखाते हैं, जहां से पार्टी को ज्यादातर डोनेशन मिल रहे हैं। आप लोग प्रॉपेगैंडा में इतने अंधे हो गए हैं कि की-बोर्ड को छूने से पहले दिमाग कहीं और रख देते हैं।' यह पुष्टि नहीं हो पाई है कि इस मुद्दे पर पार्टी का यह ऑफिशल रुख है या किसी समर्थक की सफाई।

आम आदमी पार्टी के मिलने वाले डोनेशन की सूचना www.aaptrends.com पर उपलब्ध होती है। इस साइट पर डोनेशन का देशों के हिसाब ट्रेड देखने के लिए By Country बटन पर क्लिक करते ही पूरी दुनिया का नक्शा उभर आता था। यह नक्शा अब हटा लिया गया है, लेकिन इसी में भारत के हिस्से पर क्लिक करते ही वह विवादित नक्शा उभर आ रहा था, जो इस खबर के साथ लगाई गई है। इस पेज का लिंक आम आदमी पार्टी की ऑफिशल साइट http://www.aamaadmiparty.org/ पर भी है।

अरविन्द केजरीवाल और उनके टींम की मंशा शुरू से ही शंकास्पद थी , आज आजतक और केजरीवाल का सच पकड़ा गया है जो कई दिनों पहेले से शोसल मिडिया पर चल रहा था और ये आप वाले इसे झुटा कह रहे थे , उसी तरह केजरीवाल देश विरोधी काम कर रहे है ये भी शोसल मिडिया पर चल रहा है , केजरीवाल देश के लिए सही नहीं है ये जाने के बाद भी जो आदमी आप को समर्थन देता है तो आप जान सकते है की वोह कैसा आदमी होगा

भारतीय नववर्ष चैत्र शुक्ला एकम् आ रहा 31 मार्च को





भारतीय नववर्ष चैत्र शुक्ला एकम् आ रहा 31 मार्च को
इसदिन से प्रारम्भ होगा विक्रम संवत 2071 !!
आओ स्वागत में जुट जायें। मेरा अपना नववर्ष !
आपका अपना नववर्ष !!घर घर भगवा पतायें लगायें।
रंगोली सजायें। दीपक जलायें। उत्सव आनंद मनायें।
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स्वागतम् विक्रम संवत्
बिखरी रंग—बिरंगी छटाएँ और आतिशी नजारे
चैती एकम री निकली सवारी

उदयपुर। विक्रम संवत् के स्वांगत में सुबह से शुरू हुए कार्यक्रमों के तहत स्कूली बच्चों  ने शहर के विभिन्न  चौराहों पर राहगीरों, नागरिकों को तिलक लगाकर नीम की कोंपल, काली मिर्च और मिश्री का प्रसाद खिलाकर शुभकामनाएं दीं वहीं चैत्र नवरात्रि स्था पना पर शहर के दैवी मंदिरों में सुबह से श्रद्धालुओं की भीड़ रही। आते-जाते हर राहगीर को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वोयंसेवकों ने भी मां सरस्वती के छोटे-छोटे चित्र भेंटकर शुभकामनाएं दीं वहीं स्कूली बच्चों  के आग्रह को कोई नकार नहीं पाया।
शाम को पाला गणेशजी से चैती एकम की सवारी निकाली गई जो दूधतलाई पहुंची जहां आतिशबाजी के साथ संवत् 2069 का भव्यभ स्वागत किया गया। नगर परिषद की ओर से दूधतलाई झील पर आकर्षक रोशनी की गई। यहां का नजारा देखते ही बनता था।
मुख्य अतिथि विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष शांतिलाल चपलोत, पूर्व सांसद महावीर भगोरा, अखिल भारतीय नववर्ष समारोह समिति के अध्यक्ष श्यामलाल कुमावत, सचिव डॉ. प्रदीप कुमावत सहित नगर परिषद के कई पार्षद, अधिकारी मौजूद थे।
वन्दन—अभिनन्दन : नगर के विभिन्न चौराहों को प्रात:कालीन वेला में 11 पण्डितों द्वारा प्रथम सूर्य को अर्घ्य प्रदान किया गया तथा  प्रात:काल सभी चौराहों पर मंगल शहनाई वादन से चौराहों को गुंजायमान किया गया।
सुबह 9 बजे से 11 बजे तक आलोक के छात्र—छात्राएँ, अध्यापक, अध्यापिकाएँ व अन्य कर्मचारी विभिन्न चौराहों व प्रमुख मार्गों पर खड़े रहकर नागरिकों को मिश्री, काली मिर्च, नीम की कोंपले खिलाकर व तिलकर नववर्ष की शुभकामनाएँ दी। साथ ही नव वर्ष के उपलक्ष्य में प्रात: आलोक संस्थान के छात्रों द्वारा तैयार 25 हजार नववर्ष शुभकामना कार्ड विभिन्न चौराहों पर बाँटे गए।
स्वागत  व भव्य आतिशबाजी : शाम 6.30 बजे ‘चैती एकम् री सवारी’ निकाली गयी जो दूधतलाई पहुँची। मेले में विभिन्न स्टॉल लगाये गए। बच्चों के मनोरंजन के लिए विशेष प्रकार की तैयारियाँ की गई। मेले का मुख्य आकर्षण अशफाक मोहम्मद द्वारा भव्य आतिशबाजी का रहा।
नगर परिषद् सभापति रजनी डांगी ने नगरवासियों को नववर्ष- की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि कई वर्षों बाद ऐसा अवसर आया है कि उदयपुर शहर की झीलों में पर्याप्त पानी है जो नगरवासियों को उल्लासित करता है। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष शांतिलाल चपलोत ने उदयपुरवासियों सहित सभी को नववर्ष की शुभकामनाएं दी। नववर्ष समारोह समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्यामलाल कुमावत ने कहा कि नव संवत्सर को भी हम त्यो्हार की तरह मनाएं। दूसरों त्यौहारों की तरह इसे भी त्यौहार के रूप में मनाने की आवश्य कता है।
उन्होंने कहा कि हमारे संस्कृति के सारे आधार पंचांग पर आधारित हैं और यह एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। और आज गांवों में तो लोग इसी परम्परा को कायम करे हुये है। आज देश के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमन्त्री सभी भारतीय नववर्ष चैत्र शुक्ला प्रतिपदा के दिन नागरिकों को शुभकामनाएँ देते हैं।

नीलिमा सुखाडिय़ा ने कहा कि आज नववर्ष समारोह समिति के साथ नगर परिषद बधाई के पात्र हैं जिन्होंने आज नवसंवत्सर को त्यौहार के रूप में मनाने के लिये उदयपुरवासियों सहित पूरे भारतवासियों को प्रेरित किया। साथ ही नववर्ष की शुभकामनाएं दी। कार्यक्रम का संचालन पारस सिंघवी, पायल कुमावत ने किया।
पतंजलि योग समिति एंव भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में नव संवत्सर पर समिति सदस्यों ने प्रात: 9 से 11 बजे तक देहलीगेट स्थित नगरवासियों के तिलक लगाकर नीम मिश्री देकर शुभकामनायें दी।
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भारत का सर्वमान्य संवत विक्रम संवत है, जिसका प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है। ब्रह्म पुराण के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही सृष्टि का प्रारंभ हुआ था और इसी दिन भारत वर्ष में काल गणना प्रारंभ हुई थी। कहा है कि :-

चैत्र मासे जगद्ब्रह्म समग्रे प्रथमेऽनि
शुक्ल पक्षे समग्रे तु सदा सूर्योदये सति। - ब्रह्म पुराण
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 गुड़ी पड़वा : सृष्टि का जन्मदिवस !
नवसृजन के उत्सव का पर्व


फाल्गुन के जाने के बाद उल्लासित रूप से चैत्र मास का आगमन होता है। चहुंओर प्रेम का रंग बिखरा होता है। प्रकृति अपने पूरे शबाब पर होती है। दिन हल्की तपिश के साथ अपने सुनहरे रूप में आता है तो रातें छोटी होने के साथ ठंडक का अहसास कराती हैं। मन भी बावरा होकर दुनिया के सौंदर्य में खो जाने को बेताब हो उठता है।

यह अवसर है नवसृजन के नवउत्साह का, जगत को प्रकृति के प्रेमपाश में बांधने का। पौराणिक मान्यताओं को समझने व धार्मिक उद्देश्यों को जानने का। यही है नवसंवत्सर, भारतीय संस्कृति का देदीप्यमान उत्सव। चैत्र नवरात्रि का आगमन, परम ब्रह्म द्वारा सृजित सृष्टि का जन्मदिवस, गुड़ी पड़वा का विशेष अवसर।

भारतीय संस्कृति में गुड़ी पड़वा को चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को विक्रम संवत के नए साल के रूप में मनाया जाता है। इस तिथि से पौराणिक व ऐतिहासिक दोनों प्रकार की ही मान्यताएं जुड़ी हुई हैं।

ब्रह्म पुराण के अनुसार चैत्र प्रतिपदा से ही ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी। इसी तरह के उल्लेख अथर्ववेद और शतपथ ब्राह्मण में भी मिलते हैं। इसी दिन चैत्र नवरात्रि भी प्रारंभ होती हैं।

लोक मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान राम का और फिर युधिष्ठिर का राज्यारोहण किया गया था। इतिहास बताता है कि इस दिन मालवा के नरेश विक्रमादित्य ने शकों को पराजित कर विक्रम संवत का प्रवर्तन किया।

नववर्ष की शुरुआत का महत्व :-

नववर्ष को भारत के प्रांतों में अलग-अलग तिथियों के अनुसार मनाया जाता है। ये सभी महत्वपूर्ण तिथियां मार्च और अप्रैल के महीनों में आती हैं। इस नववर्ष को प्रत्येक प्रांतों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। फिर भी पूरा देश चैत्र माह में ही नववर्ष मनाता है और इसे नवसंवत्सर के रूप में जाना जाता है।

गुड़ी पड़वा, होला मोहल्ला, युगादि, विशु, वैशाखी, कश्मीरी, नवरेह, चेटीचंड, उगाड़ी, चित्रेय तिरुविजा आदि सभी की तिथि इस नवसंवत्सर के आसपास आती हैं। इसी दिन से सतयुग की शुरुआत मानी जाती है।

इसी दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था। इसी दिन से रात्रि की अपेक्षा दिन बड़ा होने लगता है।
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इतिहास के झरोखे में नवसंवत्सर
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा

- पूजा मिश्रा
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा


भारत का सर्वमान्य संवत विक्रम संवत है, जिसका प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है। ब्रह्म पुराण के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही सृष्टि का प्रारंभ हुआ था और इसी दिन भारत वर्ष में काल गणना प्रारंभ हुई थी। कहा है कि :-

चैत्र मासे जगद्ब्रह्म समग्रे प्रथमेऽनि
शुक्ल पक्षे समग्रे तु सदा सूर्योदये सति। - ब्रह्म पुराण

चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा वसंत ऋतु में आती है। वसंत ऋतु में वृक्ष, लता फूलों से लदकर आह्लादित होते हैं जिसे मधुमास भी कहते हैं। इतना ही यह वसंत ऋतु समस्त चराचर को प्रेमाविष्ट करके समूची धरती को विभिन्न प्रकार के फूलों से अलंकृत कर जन मानस में नववर्ष की उल्लास, उमंग तथा मादकाता का संचार करती है।

इस नव संवत्सर का इतिहास बताता है कि इसका आरंभकर्ता शकरि महाराज विक्रमादित्य थे। कहा जाता है कि देश की अक्षुण्ण भारतीय संस्कृति और शांति को भंग करने के लिए उत्तर पश्चिम और उत्तर से विदेशी शासकों एवं जातियों ने इस देश पर आक्रमण किए और अनेक भूखंडों पर अपना अधिकार कर लिया और अत्याचार किए जिनमें एक क्रूर जाति के शक तथा हूण थे।

ये लोग पारस कुश से सिंध आए थे। सिंध से सौराष्ट्र, गुजरात एवं महाराष्ट्र में फैल गए और दक्षिण गुजरात से इन लोगों ने उज्जयिनी पर आक्रमण किया। शकों ने समूची उज्जयिनी को पूरी तरह विध्वंस कर दिया और इस तरह इनका साम्राज्य शक विदिशा और मथुरा तक फैल गया। इनके कू्र अत्याचारों से जनता में त्राहि-त्राहि मच गई तो मालवा के प्रमुख नायक विक्रमादित्य के नेतृत्व में देश की जनता और राजशक्तियां उठ खड़ी हुईं और इन विदेशियों को खदेड़ कर बाहर कर दिया।

इस पराक्रमी वीर महावीर का जन्म अवन्ति देश की प्राचीन नगर उज्जयिनी में हुआ था जिनके पिता महेन्द्रादित्य गणनायक थे और माता मलयवती थीं। इस दंपत्ति ने पुत्र प्राप्ति के लिए भगवान भूतेश्वर से अनेक प्रार्थनाएं एवं व्रत उपवास किए। सारे देश शक के उन्मूलन और आतंक मुक्ति के लिए विक्रमादित्य को अनेक बार उलझना पड़ा जिसकी भयंकर लड़ाई सिंध नदी के आस-पास करूर नामक स्थान पर हुई जिसमें शकों ने अपनी पराजय स्वीकार की।


इस तरह महाराज विक्रमादित्य ने शकों को पराजित कर एक नए युग का सूत्रपात किया जिसे विक्रमी शक संवत्सर कहा जाता है।

राजा विक्रमादित्य की वीरता तथा युद्ध कौशल पर अनेक प्रशस्ति पत्र तथा शिलालेख लिखे गए जिसमें यह लिखा गया कि ईसा पूर्व 57 में शकों पर भीषण आक्रमण कर विजय प्राप्त की।

इतना ही नहीं शकों को उनके गढ़ अरब में भी करारी मात दी और अरब विजय के उपलक्ष्य में मक्का में महाकाल भगवान शिव का मंदिर बनवाया।

नवसंवत्सर का हर्षोल्लास

* आंध्रप्रदेश में युगदि या उगादि तिथि कहकर इस सत्य की उद्घोषणा की जाती है। वीर विक्रमादित्य की विजय गाथा का वर्णन अरबी कवि जरहाम किनतोई ने अपनी पुस्तक 'शायर उल ओकुल' में किया है।

उन्होंने लिखा है वे लोग धन्य हैं जिन्होंने सम्राट विक्रमादित्य के समय जन्म लिया। सम्राट पृथ्वीराज के शासन काल तक विक्रमादित्य के अनुसार शासन व्यवस्था संचालित रही जो बाद में मुगल काल के दौरान हिजरी सन् का प्रारंभ हुआ। किंतु यह सर्वमान्य नहीं हो सका, क्योंकि ज्योतिषियों के अनुसार सूर्य सिद्धांत का मान गणित और त्योहारों की परिकल्पना सूर्य ग्रहण, चंद्र ग्रहण का गणित इसी शक संवत्सर से ही होता है। जिसमें एक दिन का भी अंतर नहीं होता।

* सिंधु प्रांत में इसे नव संवत्सर को 'चेटी चंडो' चैत्र का चंद्र नाम से पुकारा जाता है जिसे सिंधी हर्षोल्लास से मनाते हैं।

* कश्मीर में यह पर्व 'नौरोज' के नाम से मनाया जाता है जिसका उल्लेख पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि वर्ष प्रतिपदा 'नौरोज' यानी 'नवयूरोज' अर्थात्‌ नया शुभ प्रभात जिसमें लड़के-लड़कियां नए वस्त्र पहनकर बड़े धूमधाम से मनाते हैं।

* हिंदू संस्कृति के अनुसार नव संवत्सर पर कलश स्थापना कर नौ दिन का व्रत रखकर मां दुर्गा की पूजा प्रारंभ कर नवमीं के दिन हवन कर मां भगवती से सुख-शांति तथा कल्याण की प्रार्थना की जाती है। जिसमें सभी लोग सात्विक भोजन व्रत उपवास, फलाहार कर नए भगवा झंडे तोरण द्वार पर बांधकर हर्षोल्लास से मनाते हैं।

* इस तरह भारतीय संस्कृति और जीवन का विक्रमी संवत्सर से गहरा संबंध है लोग इन्हीं दिनों तामसी भोजन, मांस मदिरा का त्याग भी कर देते हैं।