सोमवार, 7 अप्रैल 2014

खींची राजवंश : गागरोण दुर्ग




विश्व धरोहर बने राजस्थान के 6 किले
राजस्थान को मिली अंतर्राष्ट्रीय पहचान

कंबोडिया में यूनेस्को और वल्र्ड हैरिटेज काउंसिल की ओर से राजस्थान की इन छह हैरिटेज साइट्स को वल्र्ड हैरिटेज साइट्स में शामिल करने की घोषणा हो गई है। भारत से इस बार राजस्थान के एक साथ छह दुर्गों का चयन हुआ है, जो देश और राज्य दोनों के लिए बड़ी उपलब्धि है। हालांकि वल्र्ड हैरिटेज में शामिल होने से देश और राज्य को किसी भी तरह का फंड या राशि नहीं मिलती है, फिर भी इन धरोहरों की पहचान वैश्विक स्तर बढ़ जाती है। इससे पर्यटन उद्योग को काफी लाभ होता है। इन स्मारकों में जैसलमेर, चित्तौडग़ढ़, रणथंभौर और कुंभलगढ़ इन चार किलों का संरक्षण भारतीय पुरात्व
सर्वेक्षण करता है, जबकि बाकी दो आमेर और गागरोण किलों का संरक्षण राज्य सरकार करती है। ये किले 8वीं सदी से 19वीं सदी के बीच बने हैं, जो राजपूताना शैली को चित्रित करते हैं।गागरोण दुर्ग की सबसे बड़ी विशेषता है इसकी अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था। झालवाड़ा में बने इस दुर्ग के निर्माण में भौगोलिक
स्थितियों का पूरा ध्यान रखा गया है। इसकी बनावट पहाड़ी की बनावट के अनुरूप ही रखी गई है, जिसके कारण दूर से यह आसानी से दिखाई नहीं देता। बनावट की यही व्यवस्था इसकी विशेषता बनी हुई है। यह किला तीन तरफ से आहू और कालीसिंध नदियों से घिरा हुआ है।

Gagron Fort
The foundations of the fort was laid in the 7th century AD and was completed in the 14th century AD by king Bijaldev of the Pramara dynasty; it is surrounded by the rivers Ahu, Kali and Sindh on three sides, behind the fort are forests and the Mukundarrah Range of hills giving the fort a one of a kind location. It has been a witness to many battles and is reminiscent of the heroic Valor and martyrdom of Rajputs of the Khichi Chauhan Clan who stood valiantly against the Mandu ruler Hosheng Shah. It is situated 12 kilometres from the city of Jhalawar; right outside the fort lays the Dargah of Sufi saint Mittheshah, where a splendid fair is held every year during the month of Moharram. Inside the fort is a temple dedicated to the Hindu deities Shiva, Ganesha and Durga. Image credits William Warren
Rajasthan being the land of kings has numerous forts and palaces, but the aforementioned places are the ones which you might find the most mesmerising.


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इतिहास के पन्नों में गागरोन का किला
राजस्थान रा किला अर दुर्ग
जल दुर्ग - गागरोण
- नटवर त्रिपाठी
गागरोण दुर्ग दक्षिण पूर्वी-राजस्थान का सबसूं पुराणा अर विकट दुर्गां म्ह खास है। यो ख्यातनाम दुर्ग कोटा सूं 60 अर झालावाड़ सूं 4 किलोमीटर दूरो अरावली पर्वत माला की मजबूत चट्टान पै कालीसिंध अर आहू नदियां क्ह संगम पर बणायो तको है। अणी दुर्ग क्ह तीन आडिने ये दो भारी नदियों को पाणी बेवे है जणिसूं पुराणा शास्त्रा म्ह इने जल दुर्ग केता आया है। गागरोण को भव्य दुर्ग खींची चौहाणां को खास स्थान रह्यो हो जिणका जोद्धावां का शौर्य, पराक्रम अर वीरांगनावां का जौहर की रोमांचक गाथा जुड़ी तकी है।

गागरोण ऐतिहासिक व पौराणिक स्थान है जठे पाषाण युग की अर पुरातात्विक महत्व की गणी सारी वस्तुआं और पाषाणकालीन राछ-बीछ-उपकरण मिलिया है। ये सभ्यता का काल खण्डा पै खास रोशनी डाले है। इतिहासकारों को मानबो है क्ह प्रागैतिहासिक मानव फैली अस्या स्थानां न्ह आपणी विचरण स्थली बणावता हा। पौराणिक सभ्याता म्ह इंको सम्बन्ध भगवान कृष्ण का पुरोत गर्गाचार्य सूं माने है। ऋषि गर्गाचार्य को यो निवास स्थान हो अर इंको नाम ‘गर्गराटपुर’ जाणबा म्ह आवे है। राजस्थान रा इम्पिरियल गजेटियर म्ह इण बात की जाणकारी देखी जा सके है।

इतिहास की परम्परा म्ह गागरोण पै फैली डोड ‘परमार’ राजपूत राजा को अधिकार हो। परमार वंश का राजा इण दुर्ग न्ह बणवायो जो डोडगढ़ अर धूलर बाजतो हो। थोड़ा अरसां पछैं यो दुर्ग खींची चौहानां क्ह अधिकार म्ह आग्यो। ‘चौहान कुल कल्पद्रुम’ का अनुसार गागरोण का खींची राजवंश का संस्थापक देवनसिंह उर्फ धारू हो जो बीजलदेव नाम का वांका बहनोई डोड राजा न्ह मार..र धूलरगढ़ पै अधिकार कर लिदो और जदसूं ही यो गढ़ गागरोण कहलायो। आ घटना 12 सदी की बताई जावे है।

गागरोण का खींची वंश में एक सूं बढ़कर एक वीर अर परतापी राजा व्या। सन् 1303 म्ह सुलतान अलाउद्दीन खिलजी इण किला पै हमलो कीदो। वणी टेम जैतसिंह राज करता हा, वे अणी हमला को जबरदस्त विरोध कीदो।  जैतसिंह का शासनकाल म्ह खरासाण सूं सूफी संत हमीद्दीन चिश्ती गागरोण आया जिंकी छतरी आज भी दुर्ग पै मौजूद है। ये सूफी संत ‘मिट्ठे साहब’ का नाम सूं लोक म्ह पूज्या जावे है।  गागरोण का खींची राजवंश म्ह तीन पीढ़ियां पछै पीपाराव नाम का एक भक्तिपरायण शासक व्या। वे दिल्ली का सुलतान फिरोजशाह तुगलक का समकालीन हा। पीपाजी आपणां जीवन का उत्तरार्ध म्ह राज वैभव छोड़..र संत रामानन्द को शिष्यत्व स्वीकार कर लीदो। गागरोण किला क्ह एक आडिने संत पीपाजी की समाधि बणी तकी है अर वठै हर साल जबर मेलो भरे है।

गागरोण को सबसूं पराक्रमी और प्रभावशाली राजा भोज को बेटो अचलदास व्यो। वांका शासनकाल म्ह गागरोण म्ह पहलो साको व्यो। अचलदास मेवाड़ का मोकल को दामाद हो। वांकी पटराणी लाला मेवाड़ी राणा मोकल की बेटी अर राणा कुंभा की बेण ही। सन् 1423 म्ह मांडू का सुलतान अलपखां गौरी उर्फ होशंगशाह गागरोण पै जोरदार हमलो कीदो और चारों मेर सूं लम्बी चौड़ी फौज सूं घेर लीदो। जिण वजह सूं घोर संग्राम व्यो जिमें अचलदास वांका शूरवीरां का साथे वीरगति प्राप्त व्या।

13-27 सितम्बर 1423 म्हयो युद्ध एक पखवाड़ा तक लड़्यो ग्यो और ज्येष्ठ बेटा पाल्हणसी न्ह दुर्ग सूं पलायन क्ह  बास्ते प्रेरित कीदो। कवि गाडण शिवदास भी पाल्हणसी के साथे पलायन कीदो। गागरोण को यो युद्ध हाड़ोती, मेवाड़ अर मालवा म्ह चारों खूंट बड़ा मानसूं जाणियो जावे है अर इण युद्ध की बराबरी रणथम्बौर, जालौर और चित्तौड़ का प्रसिद्ध साकावां म्ह व्ही है।

गागरोण पै अधिकार कर लेबा के बाद होशंगशाह वांका बेटा गजनीखां न्ह सौंप दीदो जो इं दुर्ग को विस्तार अर निमार्ण कीदो और किला न्ह और मजबूत बणायो। होशंगाशाह की मौत पछे गजनीखां मांडू सुलतान बणियो पण वांको शासनकाल बहुत छोटो रह्यो। वांके बाद महमूद खलजी प्रथम मांडू को सुलतान व्यो। अठिने पाल्हणसी आपणी बपौति का किला न्ह पाछो लेबा क्ह वास्ते सैनिकां को जमावड़ो कर रह्यो हो। आपणा मामा कुंभा की सैन्य सहायता सूं दिलशाद न्ह परास्त कर किला पै अपाणों अधिकार कर लीदो। पालहणसी को गागरोण पै करीब सात बरस राज रह्यो। अणी दौरान पालहणसी भी किला न्ह गणो खरो सुरक्षित बणायो।

सन् 1444 म्ह गढ़ गागरोण पै खल्जी एक और आक्रमण कीदो और अठे दूसरो साको व्यो। गागरोण का इस विशद साका को वर्णन ‘महासिरे महमूदशाही’ म्ह देखबा न्ह मळे है। 29 हाथियां और लंबा-चौड़ा लाव-लश्कर सूं सज्जित सुलतान खलजी की फौज क्ह आगे सात दिन की लड़ाई म्ह पालहणसी की सेना का घुटना चट्टान का माफिक टिक ग्या पण आखिर भारी फौजां के हामे रजपूती जोधा ठेर नी सक्या और भारी संख्या म्ह मारा गया। सेनानायक धीरो भी मारियो ग्यो। पालहणसी ने रात का अंधारा म्ह गढ़ गागरोण सूं पलायन कराई दीदो। ताकि पाछो संगठित वेर..ह दुश्मणासूं किलो हथिया सके। पण आगे भी जंगल म्ह भटकता तका बर्बर भीलां का हाथां सूं आपणां सैनिकां के साथे पालहणसी मारियो ग्यो। धीरा अर पालहणसी क्ह मारिया ग्या बाद गढ़ पर बच्या रजपूत केसरियो बानो फेर..र लड़बा न्ह निकळ ग्या और वीरांगनावां जौहर को अनुष्ठान कीदो। विजयी सुलतान दुर्ग पै एक और कोट बणायो और इंको नाम ‘मुस्तफाबाद’ राखियो।

आगे चाल रह्...र गागरोण दुर्ग पै मेवाड़ का राणा सांगा न्ह आपणो आधिपत्य कीदो अर आपणा विश्वापसपात्र मेदिनीराय न्ह दुर्ग सौंप दीदो। महमूद खलजी द्वितीय की भी नजरां इण किला पर गढ़ी और सन! 1518-19 म्ह एक बार फेर खलजी सेना गढ़ गागरोण न्ह चारो मेर घेर लीदो पण सांगा की सेन्य सहायता की वजहसूं खलजी की सेना न्ह घेरो उठावणूं पड़यो। इंके बाद गुजरात को शासक बहादुरशाह को चित्तौड़ पै अभियान सूं फैली गागरोण पै अधिकार कर लीदो। जद् शेरशाह मालवा को शासक बणयो तो गागरोण न्ह आपणा अधिकार म्ह ले लीदो। बाद म्ह अकबर इण दुर्ग न्ह आपणा हाथ म्ह ले लीदो।

गागरोन का खींची वंशज रजपूतां न्ह एक बार फेर हिम्मत कीदी पण अकबर सूं लोहो लेबो लोहा का चणा चबाबो हो। सन् 1567 म्ह चित्तौड़ जाती टेम अकबर भी गागरोण दुर्ग पै आयो हो। अकबर यो दुर्ग बीकानेर का राजा कल्याणमल का बेटा पृथ्वीराज न्ह जागीर म्ह दीदो। आईने अकबरी में गागरोण को वर्णन सूबे की सरकार का रूप म्ह पढ़बा न्ह मळै है जिसूं गागरोण को खास महत्व हर कोई जाण सके है। वांका बाद जहांगीर इण किला न्ह बूंदी का राव रतनसिंह हाडा न्ह सौंप दीदो। शांहजहां का शासनकाल म्ह कोटा म्ह जद हाडाओं को राज स्थापित व्यो तो गागरोण को दुर्ग कोटा का राव मुकन्दसिंह न्ह इनायत व्यो। हाडा राजाओं को राज स्वतन्त्रता प्राप्ति तक रह्यो और वे ही इण किला की देख रेख और जीर्णाद्धार का काम करावता हा। मुकन्दसिंह नया महल-माळिया बणाया। राव दुर्जनसाल दुर्ग म्ह भगवान मधूसूदन को भव्य मन्दर बणायो। कोटा रियासत को सेनापति जालिमसिंह इण किला की पिण्डारियां अर मरहठा सूं रक्षा कीदी। सुरक्षा की दृष्टि सूं परकोटा बणाया। कोटा राज्य की सिक्का बणाबा की टकसाल ई किला म्ह बणाई। अणी किला म्ह राजनैतिक बन्दिया न्ह नजरबंद भी राख्या जाता हा।

तिहरे परकोटा सू सुरक्षित गागरोण दुर्ग राजस्थान म्ह बेजोड़ है। अठ की सघन हरियाली, पहाड़, दो-दो नदियां का संगम नैसर्गिक स्वर्ग है। तीन आडिली नदियां अर ऊंचा मगरा पै ऊंचा परकोटा सूं बणियो यो किलो सुरक्षा कवच को अजब गजब उदाहरण है। मेवाड़, मालवा अर हाड़ोती का हीमाड़ा पै ई किला की मौजूदगी सामरिक महत्व न्ह आछी तरहसूं जणावे है। विशाल प्राचीरां, पाणीसूं भरी रेबावाली खईयां एक अजब परिदृश्य पैदा करे है। गागरोण जस्यों किला कठे भी देखबा म्ह न्ह मळै है। इंका द्वारां म्ह सूरजपोल, भैरवपोल, गणेशपोल खास है। इंकी विशाल बुर्जओं का भी खास नामां म्ह रामबुर्ज, ध्वजबुर्ज आदि है। जौहर कुण्ड की विशालता बखाणबा लायक है। राजा अचलदास अर वांकी राणियां का महल, नक्कारखानों, बारूदखानों, टकसाल, मधुसूदन अर शीतलामाता को मन्दर, सूफी संत मिट्ठे साहब की दरगाह अर औरंगजेब को बणायो बुलन्द दरवाजो पुरातत्व का बेमिसाल नमूना है। बाकी और किला म्ह जो बात देखबा म्ह नी आई वा या कि गागरोण का किला में पत्थर की वर्षा करबा को एक यंत्र है जो आज भी देखियो जा सके है। किला का एक आडिने सिंध नदी का किनारा पै एक पहाड़ी है जिन्ह गिध कराई पहाड़ी केवे है। जनश्रुति का अनुसार जिन्हे मौत की सजा सुणाई जाती ही इं ऊंची पहाड़ी पर सूं सजायाफ्ता न्ह पटक देता हा।

गागरोण का राय तोता गणा मशहूर रह्या हा। एक जनश्रुति का अनुसार राणी पद्मणी का पास जो हीरामन तोतो हो वो अणी प्रजाति को ही हो। प्रसिद्ध इतिहासकार कर्नल टॉड जद इण किला न्ह देख्यो तोे वांकी आंख्या चुन्दियागी। वो अठा का नैसर्गिक सौन्दर्य न्ह देख..र मुग्ध वेगयो।




नटवर त्रिपाठी
सी-79,प्रताप नगर,
चित्तौड़गढ़
म़ो: 09460364940
ई-मेल:-natwar.tripathi@gmail.com
नटवर त्रिपाठी

(समाज,मीडिया और राष्ट्र के हालातों पर विशिष्ट समझ और राय रखते हैं। मूल रूप से चित्तौड़,राजस्थान के वासी हैं। राजस्थान सरकार में जीवनभर सूचना और जनसंपर्क विभाग में विभिन्न पदों पर सेवा की और आखिर में 1997 में उप-निदेशक पद से सेवानिवृति। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।

कुछ सालों से फीचर लेखन में व्यस्त। वेस्ट ज़ोन कल्चरल सेंटर,उदयपुर से 'मोर', 'थेवा कला', 'अग्नि नृत्य' आदि सांस्कृतिक अध्ययनों पर लघु शोधपरक