रविवार, 27 अप्रैल 2014

दामाद जी की दौलत, दुनियाभर में चर्चा


दामाद जी की दौलत, दुनियाभर में चर्चा

अमरीकी पत्रिका वॉल स्ट्रीट जर्नल ने संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा पर देश में सोलहवीं लोकसभा के लिए जारी चुनावों के बीच शिकंजा कसते हुए असंख्य भूमि विवादों पर बड़े खुलासे किए हैं।
वॉॅल स्ट्रीट जर्नल ने कई महीनों के गहन अध्ययन, विश्लेषण, अपनी रपटों के निष्कर्षों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर राबर्ट वाड्रा को दुनियाभर के मीडिया के सम्मुख कटघरे में ला खड़ा किया है।
इस संबंध में प्रकाशित रपट की शुरुआत ही इस वाक्य से हुई है कि दसवीं पास 44 वर्ष के वाड्रा अचानक 325 करोड़ से भी अधिक की सम्पत्ति के मालिक कैसे हो गए, जबकि 5 वर्ष पूर्व वाड्रा ने मात्र एक लाख रुपए के निवेश से यह व्यवसाय शुरू किया था। रपट ने राजस्थान में महेश नागर नामक व्यक्ति को वाड्रा के लिए और बाद में राहुल गांधी के लिए जमीनी सौदे करवाने की बात कही गई है। वाड्रा द्वारा किए गए जमीनों के ऐसे राजसी सौदे भारत में ही नहीं विदेशों में भी चर्चित हैं। कहीं से भी ऐसा प्रतीत नहीं हुआ कि गांधी परिवार का यह दामाद, जो मात्र कृत्रिम सस्ते गहनों का व्यवसाय करता था, रियल एस्टेट की दुनिया का चर्चित बादशाह बन जाएगा। पत्रिका में ब्योरेवार जानकारी दी गई है कि 2004 से पूर्व वाड्रा का व्यवसाय बहुत ही सामान्य एवं अज्ञात था, वे सस्ते गहनों का व्यापार करते थे। 2007 में रियल एस्टेट के धंधे में कदम रखते हुए मां मौरीन वाड्रा के साथ स्काई लाइट हास्पिटेलिटी प्रा. लि. कंपनी शुरू करने के साथ नार्थ इंडिया आईटी पार्क्स प्रा. लि., रियलअर्थ एस्टेट्स प्रा. लि. और स्काई लाइट रियलिटी प्रा. लि. इत्यादि रियलिटी व्यवसायों की श्रृंखला खड़ी कर हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस सरकारों की मिलीभगत से जमीनों का व्यापक कारोबार शुरू कर दिया।

भारत में अति विशिष्ट व्यक्ति की सुविधाएं भोगने वाले राबर्ट वाड्रा को वर्ष 2004 में संप्रग-1 सरकार के गठन के बाद 26 सितम्बर 2005 को सरकार ने विशेष फरमान जारी कर एयरपोर्ट पर व्यक्तिगत जांच से विशेष छूट दे दी थी। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सहित पूर्व राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री, एस.पी.जी. सुरक्षा प्राप्त विशिष्ट लोगों को यह सुविधा मिलती है। वाड्रा के साथ इस विशेष बर्ताव के लिए उनकी एसपीजी सुरक्षा प्राप्त पत्नी प्रियंका वाड्रा का तर्क दिया जाता है।

राबर्ट वाड्रा की रुचियों, उनके कारनामों और महत्वाकांक्षाओं की खबरें बराबर मीडिया में आती रही हैं। जमीनों के अंधाधुंध सौदों पर खूब छपता रहा है। अक्तूबर 2012 में भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई लड़ने वाले अरविन्द केजरीवाल ने भी राजनीति में आने से पूर्व वाड्रा के जमीन घोटालों पर बड़े खुलासे किए हालांकि अब वे ठंडे पड़ गए हैं और भ्रष्टाचार से बड़ा उन्हें साम्प्रदायिकता का रोग दिखाई देने लगा है। अलग-अलग राज्यों में अपने रसूख के बल पर वाड्रा ने संबंधित राज्यों के पूरे के पूरे भू-अधिग्रहण और नियमन कानून ही बदलवा डाले थे, भू उपयोग को बदलवाकर किसानों को धोखा देकर अपनी जमीनों की कीमतें बढ़वा दीं और ज्यादा विवाद होने पर जांच करने वाले आईएएस अधिकारी अशोक खेमका को निलंबित करवाने के साथ ही प्रधानमंत्री कार्यालय से भी स्वयं को क्लीन चिट दिलवा दी। हजारों एकड़ जमीन के मालिक वाड्रा ने जब देखा कि सूचना अधिकार अधिनियम के तहत लोग उनकी पड़ताल करने लगे तो वर्ष 2012 के बाद के सौदों के कोई दस्तावेज सार्वजनिक नहीं दिखाई देते। जिस हरियाणा में 27 एकड़ कृषि भूमि ही खरीदी जा सकती थी, वहां 46 एकड़ जमीन सारे नियमों को ताक पर रखकर वाड्रा की कंपनी ने ले ली। जिस राजस्थान में कानून के तहत रेगिस्तानी और अर्द्ध रेगिस्तानी क्षेत्रों में 125 से 175 एकड़ तक ही भूमि खरीद की सीमा निर्धारित थी वहां वाड्रा की कंपनियों ने 321 एकड़ तक भूमि खरीद ली। बीकानेर में कांग्रेस की गहलोत सरकार ने सौर ऊर्जा केन्द्र वहीं बनाना सुनिश्चित किया जहां वाड्रा ने जमीन खरीदी थी।

डीएलएफ से 65 करोड़ के व्याज मुक्त ऋण और कार्पोरेशन बैंक के 7.94 करोड़ के ओवरड्राफ्ट का रहस्य अब भी रहस्यमय ही है और 2009 में उत्तर प्रदेश के सल्तानपुर लोकसभा से चुनाव लड़ने के दबाव का दावा करने वाले वाड्रा जो कुछ कर रहे हैं उनसे बेशक सोनिया और राहुल आंख मूंदे रखने का ढकोसला कर रहे हों, लेकिन दादी की पोशाक और प्रतिछाया का स्मरण दिलाने वाली प्रियंका वाड्रा भी क्या अनभिज्ञ हैं, देश की जनता वास्तविकता जान चुकी है और कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने भी शायद इसी सत्य का आभास पाकर प्रियंका को पिछले कई वर्षों से इसी कारण से रायबरेली और अमेठी तक सिमटा रखा है। ल्ल
मुझे पीड़ा हुई है
देश ने मेरी मां को बहू स्वीकारा है, इसके बावजूद उनके मूल पर सवाल उठाए जा रहे हैं। आप टीवी देखें तो पाएंगे- उस पर मेरे परिवार को लेकर भद्दी बातें कही जा रही हैं। मेरे पति के बारे में बहुत सी बातें कही जा रही हैं। मुझे इससे पीड़ा होती है। उस व्यक्ति को भी पीड़ा होती है जिसके बारे में सच नहीं बोला जा रहा है। रोजाना मैं अपने बच्चों से कहती हूं कि सच छिपाया जा रहा है। इस चुनाव में जैसी राजनीति हो रही है उससे मुझे दुख है। यदि पति पर हमला जारी रहा तो मजबूती से लड़ाई लड़ूंगी, दादी इंदिरा से ऐसी स्थिति का सामना करना सीखा है। इसका मजबूती से कैसे सामना करना चाहिए, मुझे पता है। -प्रियंका वाड्रा

30 अप्रैल को होगी सुनवाई
दिल्ली उच्च न्यायालय ने राबर्ट वाड्रा के जमीन विवादों पर एक जनहित याचिका को स्वीकार कर लिया है। इस याचिका में मांग की गई है कि न्यायालय की निगरानी में राबर्ट वाड्रा की भागीदारी वाली विभिन्न कम्पनियों द्वारा अलग-अलग समय पर किए गए जमीन सौदों की सीबीआई जांच की जाए। याचिका में विशेष रूप से वाड्रा की कंपनियों द्वारा हरियाणा के गुड़गांव क्षेत्र में क्रय की गई कृषि भूमि के भूमि उपयोग बदलाव के लिए प्रस्तुत किए गए लाइसेंस की जांच की मांग करने के साथ सरकारी खजाने को हुए नुकसान की जांच की भी मांग की गई है। मुख्य न्यायाधीश जी. रोहिणी की अगुआई वाली पीठ 30 अप्रैल को इस मामले की सुनवाई करेगी।

वाड्रा की संपत्ति का राज क्या है?
यह एक गंभीर खुलासा है। नरेन्द्र मोदी पर कीचड़ उछालने वाले राहुल गांधी और सोनिया गांधी को इस बात का उत्तर देना चाहिए कि 6 महीने या सालभर में कुछ लाख रुपयों का निवेश करने वाले वाड्रा 300 करोड़ रुपए से भी अधिक की संपत्ति के मालिक कैसे बन गए।
-रविशंकर प्रसाद, वरिष्ठ भाजपा नेता

अब कैसे जगी प्रियंका की संवेदना
वाड्रा जब भारत को बनानां  रिपब्लिक और यहां के लोगों को  मैंगो पीपुल  कह रहे थे, तब प्रियंका की संवेदनाएं कहां थीं? अब सही बातें बोले जाने पर बुरा लग रहा है।
-निर्मला सीतारमण, भाजपा प्रवक्ता
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जब हमारा क्षेत्र सौर ऊर्जा केन्द्र के तहत आ गया तो हमने पाया कि वाड्रा ने किसानों से सारी भूमि बहुत सस्ते दामों पर खरीद ली। क्षेत्र में सौर ऊर्जा कंपनी के आने से भूमि की कीमत में जोरदार उछाल आया। वाड्रा की स्काई लाइट हास्पिटेलिटी ने 2010 में खरीदी गई जमीन जनवरी 2012 में बेच दी जिसमें 94 एकड़ भूमि का अधिकांश हिस्सा भी शामिल था। कोलायत भूमि कार्यालय के रिकार्ड के अनुसार, इस जमीन की बिक्री कीमत खरीद मूल्य की तुलना में दस गुना अधिक थी। वाड्रा ने राजस्थान में खरीदी गई कुल भूमि का करीब एक तिहाई हिस्सा यानी 700 एकड़ भूमि 27 लाख डालर में बेच दिया जो राजस्थान में उनके द्वारा खरीदी गई कुल भूमि की कीमत का लगभग तीन गुना था। इस बिक्री के बाद भी वाड्रा की कंपनियों के पास 1200 एकड़ भूमि बची थी जिसकी कीमत 40 लाख डालर से अधिक थी। -अर्जुन राम मेघवाल, भाजपा सांसद

याद करें वाड्रा पर केजरीवाल की पत्रकार वार्ता

इन दिनों प्रियंका जी बहुत ज्यादा गुस्से मेन हैँ , उनकी पति ने बड़ी मुसकिल से तो कमाई की है और दूसरे दल उसे भष्टाचार बतानें मेँ  लगे हैँ ! प्रियंका गुस्सा करें या तूफां खडा करेँ , बड़ा सवाल है कि डीएलएफ़  ने उन्हें ही फायदा क्यों पहुचाया ? डीएलएफ़ का यह तरीका राजनैतिक रिश्बत के अतिरिक्त क्या है ! आश्चर्य यह है कि डीएलएफ़  पर अभी तक कार्यवाही क्यों नहीं हुई ! आज केजरीवाल भले ही चुप हो मगर ये आरोप उनके द्वारा भी  लगाये गये हैं ! 

याद करें वाड्रा पर केजरीवाल की पत्रकार वार्ता

वाड्रा पर केजरीवाल के आरोप : किसने क्या कहा
शनिवार, 6 अक्तूबर, 2012
http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/10/121006_robert_vadra_arvind_kejriwal_ms.shtml

जनलोकपाल के आंदोलन के रास्ते  राजनीति में कूदे अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण के सोनिया गाँधी के दामाद राबर्ट वाड्रा पर सैकड़ों करोड़ रुपए की रिश्वत लेने के क्लिक करें आरोपों ने राजनीतिक बयानबाज़ी तेज़ कर दी है.

अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण और उनके पिता शांति भूषण ने शुक्रवार को दिल्ली में हुई एक पत्रकारवार्ता में कुछ दस्तावेज़ पेश करते हुए आरोप लगाया कि उत्तर भारत के एक बड़े रियल एस्टेट डेवलपर डीएलएफ़ समूह ने गलत तरीकों से रॉबर्ट वाड्रा को 300 करोड़ रुपयों की संपत्तियाँ कौड़ियों के दामों में दे दीं.

इसके बाद कांग्रेस ने पूरा ज़ोर लगाकर इन आरोपों को ख़ारिज किया है. एक नज़र इस पूरे विवाद में अब तक कौन क्या कह चुका है-

अरविंद केजरीवाल
पूरी बात यह है कि डीएलएफ़ वाले वाड्रा को 300 करोड़ रुपए देना चाहते थे. डीएलएफ़ ने वो 300 करोड़ रुपए छह कंपनियों में कुछ लेन-देन कर के दे दिया. सभी लाभ पाने वाली कंपनियों में रॉबर्ट वाड्रा और उनकी माँ निदेशक हैं. एक समय तक इन कंपनियों में प्रियंका गाँधी भी निदेशक थीं लेकिन उन्होंने बाद में इन कंपनियों से हाथ झाड़ लिया.

प्रशांत भूषण, वकील
डीएलएफ़ इनको पैसा दे-देकर अपनी ही सैकड़ों करोड़ की संपत्तियां कौड़ियों में दे रहा है. रॉबर्ट वाड्रा की कंपनियों में इनकी मूल पूँजी केवल 50 लाख रुपए लगी है. सवाल यह है कि कोई कंपनी किसी एक आदमी को इस तरह के लाभ क्यों दे रही है? डीएलएफ़ ने रॉबर्ट वाड्रा को बिना ब्याज के इतना क़र्ज़ क्यों दिया और इतनी संपत्तियां वाड्रा को अपने ही पैसे से कौड़ियों के दाम पर क्यों दीं? हरियाणा सरकार ने वजीराबाद में डीएलएफ़ को किसानों से अधिगृहीत कर के ज़मीन डीएलएफ़ को सौंप दी है. इस ज़मीन को सार्वजनिक इस्तेमाल के लिए अधिगृहीत किया गया था.


रॉबर्ट वाड्रा पर लगे इस तरह के आरोपों के बाद कांग्रेस ने पूरा दम लगाकर उनका बचाव किया है


प्रशांत भूषण और अरविंद केजरीवाल के आरोपों ने राजनीतिक माहौल को काफ़ी गर्म कर दिया


सलमान ख़ुर्शीद, क़ानून मंत्री- भारत सरकार
ये लोग एक पैदाइश से ही मरी हुई पार्टी के घोषणा पत्र के लिए दिवालिया विचार वाले लोग हैं. इसी तरह से वे अपनी पार्टी का इस तरह का घोषणा पत्र तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं. जाँच की माँग करने के लिए उन्हें पुख़्ता चीज़ों के साथ सामने आना पड़ेगा. किसी भी व्यक्ति का संदेह क़ानून के नियमों का आधार नहीं बन सकता. अब वो वक़्त आ गया है जब इन लोगों को बता दिया जाए कि उन्हें कहाँ ये सब बंद कर देना चाहिए.

डीएलएफ़ ग्रुप
डीएलएफ़ ग्रुप का रॉबर्ट वाड्रा के साथ व्यावसायिक संबंध उनके निजी उद्यमी के रूप में हैं और ये पूरी तरह से पारदर्शी रूप में है. डीएलएफ़ की मंशा उनके नाम या उनसे जुड़ाव का किसी भी तरह इस्तेमाल करने की नहीं है और व्यावसायिक संबंध उच्च मानकों के और पूरी तरह पारदर्शी रखे गए हैं.

रवि शंकर प्रसाद, भाजपा नेता
काफ़ी अहम सवाल उठे हैं. ये लाभ पहुँचाने का सीधा सा मामला दिखता है. इस बात की भी संभावना दिखती है कि राज्य सरकारों ने डीएलएफ़ को फ़ायदा पहुँचाया हो.

मनीष तिवारी- कांग्रेस प्रवक्ता
कांग्रेस नेतृत्त्व को 1970-1980 के दशक में बदनाम करने की जिन ताक़तों ने कोशिश की वे नए अवतार में फिर से सामने आ गई हैं. अरविंद केजरीवाल का संवाददाता सम्मेलन न सिर्फ़ एक राजनीतिक षड्यंत्र है बल्कि बेहद घटिया राजनीतिक छल है.

भूपिंदर सिंह हूडा- मुख्यमंत्री, हरियाणा
हमने किसी के साथ कोई पक्षपात नहीं किया है. हमने किसी को भी एक इंच ज़मीन तक आवंटित नहीं की है. हमने पारदर्शी तरीक़े से अंतरराष्ट्रीय बोली के ज़रिए ज़मीन उस व्यक्ति को दी जसने सबसे बड़ी बोली लगाई थी.

अंबिका सोनी, सूचना एवं प्रसारण मंत्री
केजरीवाल ने एक राजनीतिक दल बनाया है और वह दिल्ली से चुनाव लड़ना चाहते हैं. अपनी छवि सुधारने के लिए वह बिना किसी सबूत के आरोप लगा रहे हैं और आप (मीडिया) इस तरह के आरोपों को दिखाकर उनकी मदद कर रहे हैं. सार्वजनिक जीवन में हमें बेहद सावधान होना पड़ता है. हम बिना किसी सबूत के आरोप नहीं लगा सकते. अगर आरोप लगा रही आपकी उंगली सामने वाले की ओर है तो ध्यान रखिए कि बाक़ी तीन आपके ख़ुद की ओर इशारा कर रही हैं.

राजीव शुक्ला, संसदीय कार्य राज्य मंत्री
इस तरह का कोई सबूत नहीं है जिससे पता चले कि डीएलएफ़ को कोई फ़ायदा पहुँचाया गया. इसमें परस्पर लाभ की कोई बात नहीं है.

राशिद अल्वी, कांग्रेस प्रवक्ता
ये सिर्फ़ इत्तेफ़ाक की बात नहीं है कि केजरीवाल की ओर से ये आधारहीन आरोप तभी लगाए गए हैं जब कांग्रेस ने भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी का पर्दाफ़ाश कर दिया है.

पीके त्रिपाठी, मुख्य सचिव- दिल्ली सरकार
दिल्ली सरकार निजी संगठनों को ज़मीन आवंटन नहीं करती. ये आरोप कि दिल्ली सरकार ने डीएलएफ़ को ज़मीन आवंटित की तथ्यात्मक रूप से ग़लत है. ये आरोप दिल्ली सरकार