शुक्रवार, 23 मई 2014

लोकतंत्र का गंगा स्नान




अपनी बात
लोकतंत्र का गंगा स्नान
तारीख  17 May 2014
http://www.panchjanya.com
बनारस के घाट पर गंगा की एक डुबकी भारतीय लोकतंत्र को इतना पावनए ऐसा सशक्त कर देगी किसने सोचा था! इस चुनाव के नतीजे सिर्फ नतीजे नहीं हैं। तीसरे मोर्चे का बंधा बंडलए वंचितों को महज वोट बैंक मानने वाले मंसूबों का ढेर और कुनबापरस्ती की उखड़ी हुई सांसें बता रही हैं कि देश में लोकतांत्रिक परिवर्तन का ऐसा तूफान गुजरा है जिसमें जाति और मजहब की राजनीति पर टिकी सत्ता के तमाम किले ढह गए।

देश की नब्ज पर हाथ रखना, लोगों की चिंताओं को समझना और सामने रखना मीडिया का धर्म है। यही धर्म निभाते हुए पाञ्चजन्य ने देशव्यापी रायशुमारी पर आधारित अनूठा सर्वेक्षण किया था और वह मुद्दे सामने रखे थे जो देशभर के लोगों की चिंताओं में सबसे ऊपर थे। देश की राजनीति बदल रही है। समाज एकजुट हो रहा है, जनता विकास चाहती है। जनता को भरमाने, कुनबे की डुग्गी बजाने से काम नहीं चलेगा यह बात विमर्श के तौर पर सबके सामने थी। परंतु सेकुलर लबादा ओढ़े राजनीति करने वाली जमात भ्रष्टाचार ढंकने, राजनीतिक शत्रुओं का उत्पीड़न करने और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के पासे फेंकने में ही लगी रही। परिणाम! जनता ने उन सभी को बुहारकर लोकतंत्र के घूरे पर रख दिया जिनके लिए देश की चिंता गौण, और क्षुद्र हित अहम थे।

वंशपूजा को लोकतंत्र का पर्याय बना देने वाले भूल गए कि समय का चक्र पूरा होने पर चीजें उलट जाती हैं। इतिहास पलटिए। अप्रैल 1955 में 13 सीटों पर जनसंघ की जमानत जब्त हो गई थी, मई 2014 में 21 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में कांग्रेस का बही खाता ही जब्त हो गया है। मनमोहन सिंह का moun उलटकर नमो हो गया? जनता परिवर्तन पर झूम रही है।

जनसंघ अथवा बाकी राजनैतिक दलों के संघर्ष को याद करते हुए यह बात उल्लेखनीय है कि कांग्रेस राज का तख्ता पलट तो पहले भी हुआ लेकिन कभी भी कोई ऐसी सरकार नहीं बनी जिसके अगुआ या फिर घटक कांग्रेस से ही छिटककर खड़े हुए ना हों।
देश की सबसे पुरानी पार्टी को, पुराने-नाकारा सामान की तरह सिर्फ ह्यकुछह्ण राज्यों में समेट देने वाली यह केसरिया सुनामी इस मामले में खास है कि नई सरकार और इसके घटक कांग्रेसी गुणसूत्र से मुक्त हैं।
वैसे, कांग्रेस मुक्त भारत का मतलब पार्टी को समेट देना नहीं बल्कि उस सोच को खत्म करना होना चाहिए जो ह्यउपनामह्ण की चमक में लोकतांत्रिक परंपराओं को ही गिरवी रख देती है।
तीन दशक बाद किसी एक दल को पूर्ण बहुमत का गौरव लौटाने वाली जनता का स्वागत किया तो किया ही जाना चाहिए। भारतीय जनता पार्टी को कश्मीर से कन्याकुमारी तक राष्ट्रीय व्याप देने वाली यह परिघटना सिर्फ वंशवाद पर फौरी राजनैतिक जीत नहीं ही बल्कि भारतीयता के उस मूल विचार की जीत है जहां ईमानदारी, मेहनत और समर्पण जीवन के मूल्य हैं और राष्ट्र सर्वोपरि माना जाता है।
बहरहाल, राजनीतिक शत्रुओं को चुन-चुनकर निशाना बनाती, भ्रष्टाचार में डूबी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने परिवर्तन को टालने के लिए अपने अंतिम दिनों तक हरसंभव कोशिश की मगर जैसे कि कहा जाता है, ह्यआप बगीचे का हर फूल नोंच सकते है मगर वसंत को आने से नहीं रोक सकते।ह्ण
सो, वसंत आ गया है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का भरा-पूरा कुनबा लिए पूर्ण बहुमत के साथ भाजपा का पूर्ण बहुमत शुभ-शगुन है। भारत के, यहां के लोगों के, इस पूरे लोकतंत्र के अच्छे दिन आ गए हैं नई सरकार से यह उम्मीद की जानी चाहिए।

नरेंद्र मोदी से सीखने लायक पांच बातें





ये हैं नरेंद्र मोदी से सीखने लायक पांच बातें, 
विरोधी भी करते हैं इसकी तारीफ

1-आलोचनाओं से नहीं घबराएं
मोदी की कामयाबी के सफर में आलोचनाओं को झेलने का उनका गुण काफी मददगार रहा है। विपक्षियों के अलावा खुद भाजपा के भीतर भी कई बार उनकी आलोचना हुई, मगर इससे घबराए बिना वह अपना काम करते रहे। पिछले साल सितंबर में जब उन्‍हें भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री पद का उम्‍मीदवार बनाया गया तो उनकी नाकामी की बात कहने वाले लोगों की कमी नहीं थी। कई लोगों ने कहा था कि वह मुसलमानों के लिए अभिशाप की तरह हैं तो वहीं कई ने यह भी कहा कि उनकी वजह से भाजपा को सहयोगी दल नहीं मिलेंगे और पार्टी मुसीबतों में घिर जाएगी।
एक्‍सपर्ट्स और चुनावी विश्‍लेषकों ने भी मोदी की वजह से भाजपा को नुकसान पहुंचने की बात कही थी। मोदी को जब भाजपा के चुनावी अभियान का प्रमुख बनाया गया था तो कई विश्‍लेषकों ने कहा था कि भाजपा इस चुनाव में महज 160 सीटों पर सिमट जाएगी। लेकिन मोदी ने इन सब बातों से खुद को दूर रखा और सारा ध्‍यान मकसद पर केंद्रित रखा। इसी का नतीजा था कि कमान संभालने के तुरंत बाद उन्‍होंने पार्टी के लिए 272+ का मिशन बनाया। शुरुआत में इसका भी माखौल उड़ाया गया और कहा गया कि भाजपा को इतनी सीटें नहीं मिल पाएंगी।

2-तीर विरोधियों के, निशाना मोदी का
मोदी ने इस चुनाव के दौरान यह भी दिखा दिया कि किस तरह आप अपने विरोधियों द्वारा चलाए गए शब्‍दों के तीर का इस्‍तेमाल अपने फायदे के लिए कर सकते हैं। इस पूरे चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने अपने विरोधियों के मुंह से निकले शब्‍दों, मुहावरों और कैचलाइंस का इस्‍तेमाल अपने मन मुताबिक किया। इसकी एक बानगी प्रियंका गांधी का नीच राजनीति वाला बयान है। प्रियंका ने जब मोदी को नीच राजनीति करने का दोषी ठहराया तो मोदी ने झट से उसे अपनी जाति से जोड़ दिया। जब राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि मोदी अपने करीबियों को टॉफी बांटते हैं तो मोदी ने उन ट्रॉफियों का जिक्र करना शुरू कर दिया, जो उन्‍हें उनके शानदार काम के लिए मिली थीं। इसके अलावा जब केजरीवाल ने गुजरात की आलोचना करनी शुरू की तो मोदी ने AK-49 जुमले का इस्‍तेमाल कर जवाबी हमला किया।
मोदी ने इस चुनाव प्रचार के दौरान शब्‍दों का भी खूब बढ़ि‍या तरीके से इस्‍तेमाल किया। कांग्रेस के घोटालों के लिए उन्‍होंने तो बाकायदा एबीसीडी गढ़ डाली। यानी ए फॉर आदर्श, बी फॉर बोफोर्स, सी फॉर कोल और डी फॉर दामाद।

3-ना उम्र की सीमा हो
63 साल की उम्र में मोदी ने जिस तरह बिना थके, बिना रुके धुंआधार प्रचार किया, उसके जरिए उन्‍होंने दिखा दिया कि जज्‍बे के सामने उम्र बाधक नहीं बन सकती। मोदी ने देशभर में करीब छह हजार रैलियों और सभाओं को संबोधित किया और तीन लाख किलोमीटर का सफर तय किया। इस तरह प्रचार के मामले में विरोधी पार्टियों के कई युवा नेता उनके सामने ढेर हो गए।

4-नई उम्‍मीद की आस
मोदी की एक खासियत यह रही कि उन्‍होंने हर तबके की बात की और उनके भीतर आशा का संचार किया। नौकरियों की बात कह जहां उन्‍होंने युवाओं के भीतर आशा जगाई वहीं मिडिल क्‍लास को महंगाई से राहत देने और 'अच्‍छे दिन आने वाले हैं' के जरिए प्रभावित किया। वाराणसी में उन्‍होंने गंगा को साफ करने की वकालत की तो फैजाबाद में हिंदुत्‍व के झंडाबरदारों को भी निराश नहीं किया। इन सबके बीच वह गुजरात को नहीं भूले और वडोदरा में गुजराती अस्मिता की बात करते दिखे।

5-जो बीत गई सो बात गई
पीछे छूट गई बातों पर अफसोस करने से कुछ हासिल नहीं होता और जिंदगी का मकसद हमेशा आगे बढ़ना होना चाहिए। मोदी ने शायद इसी फलसफे का पालन किया। कम से कम सार्वजनिक तौर पर तो उन्‍होंने अपने अतीत की बात से परहेज ही किया। इस बात के दो उदाहरण साफ तौर पर दिखाई दिए। पहला, जब-जब विरोधियों ने गुजरात दंगों के मामले पर उन्‍हें घेरने की कोशिश की, मोदी कमोबेश चुपचाप ही रहे। जब भी उन्‍होंने सफाई देने की कोशिश की, सीधे-सीधे कुछ नहीं कहा और शब्‍दजाल का इस्‍तेमाल किया।
दूसरा, कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह के लगातार हमलों के बावजूद मोदी ने अपनी शादीशुदा जिंदगी के बारे में कुछ भी बोलने से परहेज किया। जब वक्‍त आया तो वडोदरा से नामांकन भरने के दौरान उन्‍होंने आधिकारिक तौर पर जशोदाबेन को अपनी पत्‍नी के तौर पर स्‍वीकार किया।