बुधवार, 2 जुलाई 2014

भगवा संस्कृति ही, भारत का परम् सत्य है - अरविन्द सिसोदिया




लेख
शासन में ”स्वराष्ट्रबोध“ ही महत्वपूर्ण
भगवा संस्कृति ही, भारत का परम् सत्य है
- अरविन्द सिसोदिया [ कोटा , राजस्थान ]


भाजपा की स्वराष्ट्रबोध की विचारधारा, जिसका अर्थ यह देश मेरा है, इस देश के निवासी मेरे हैं, के भाव को कांग्रेस एवं तथाकथित सेक्युलर मण्डली, भगवा आतकंवाद कह कर चीखती चिल्लाती रही, इनके द्वारा इस देश की मूल भगवा संस्कृति को इस तरह अपमानित किया गया जैसे भगवा कोई अपराध हो, अनैतिकता हो। किन्तु पूरे देश ने भाजपा को ही लोकसभा 2014 में शासन के लिये पूर्ण बहूमत से चुन लिया ! पूर्ण बहूमत के साथ ही बहुत सम्मानजन संख्या राजग गठबंधन को दी, 1984 के बाद पहलीबार किसी दल को लोकसभा में पूर्ण बहूमत मिला। कांग्रेस की भारी पराजय का मूल कारण इसके नेतृत्व का बाहरी संस्कृति और विदेश का निवासी होने से, भारत की मूल संस्कृति, सभ्यता और समाज को नहीं समझपाना था। भारत के स्वंय के स्वहितों की उपेक्षा अर्थात ”स्वराष्ट्रबोध“ की उपेक्षा ने कांग्रेस को तथाकथित सेक्युलर मण्डली सहित धो डाला ।

 जो - जो दल इसे भगवा ब्रिगेड , साम्प्रदायिक पार्टी या अन्य तरह के आरोप मढ़ते थे, सभी हांसिये पर प्रभावहीन एवं प्रभुत्वहीन हो गयें । जैसे कांग्रेस को मात्र 44 उनके साथी मुलायमसिंह को 5, करूणा निधि को शून्य, शरद पंवार को 4, मायावती को शून्य, लालूप्रसाद यादव को 4, अजीत सिंह को शून्य  और फारूख अब्दुल्ला को शून्य। इतना ही नहीं साम्यवादी दलों की भी बुरी दुर्गत हो गई, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को मात्र 1 सीट मिली तो माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को मात्र 9 सीटें ही हांसिल हुईं। पश्चिम बंगाल में भाजपा को 2 व साम्यवादियों को 2 सीटें बराबर हैं। मगर वोट प्रतिशत में अब भाजपा वहां 16 प्रतिशत से अधिक होकर चुनौती देने में सक्षम होने जा रही है।
नरेन्द्र मोदी और भाजपा को लम्बे समय से अपमानित कर रहे तथा अपने आप को नरेन्द्र मोदी के समकक्ष मान रहे नितिश कुमार का सबसे बुरा हाल हुआ, वे मात्र दो सीटों पर जा टिके, मुख्यमंत्री पद से भी त्यागपत्र देना पड़ा। कांग्रेस और भाजपा का विकल्प बनने का सपना देख रही आप पार्टी पूरी तरह साफ हो गई। उसकी 4 सीटें पंजाब में मात्र नाम से आप पार्टी की है असलियत में ये लोग बाबा रामरहीम के आर्शीवाद से जीते हुये उनके ही लोग हैं। सामान्यतः भाजपा का बहुत ज्यादा विरोध नहीं करने वाली तथा कभी एनडीए का हिस्सा रहीं ममता बनर्जी, नवीन पटनायक और जयललिता अपने - अपने प्रांतों में बच गये।

भाजपा और एनडीए की सीटों का नक्शा सम्पूर्ण भारत को भगवा किये हुये है और भगवा हो भी क्यों नहीं, इस देश का हजारों वर्षों से भगवा ध्वज नेतृत्व करता रहा है, इस देश का संत समाज भगवा वस्त्र पहन कर हजारों - हजारों वर्षों से देश का आध्यात्मिक और समाज सुधार कार्यों का नेतृत्व प्रदान करता हैं। इस देश की संस्कृति सभ्यता और स्वाभिमान का नेतृत्व भी भगवा रंग ही करता आ रहा है।  इस देश की राष्ट्ररक्षा के लिये केसरिया बाना पहन कर यु़द्ध भूमि में अपने प्राणो उत्सर्ग करने की परम्परा भी भगवा है। तो सामाजिक एकत्व और आपसी मिलन का पवित्र त्यौहार होली भी टेसू के फूलों के भगवा रंग से ही हजारों वर्षों से मनाया जाता रहा है। यह संस्कृति तो भगवा है कांग्रेस और उसकी मण्डली के लोग इसे गलत तरीके से पेश कर , अंग्रेजों की फूट डालो राज करों की नीति  को अपना कर, इसे भगवा आतंकवाद कह रहे थे। उन्हे देश के जनमत ने जबाव दे दिया कि ”स्वराष्ट्रबोध“  ही सर्वोपरी है। उसी में राष्ट्रहित और जनहित का समावेश है। जो सरकार सीमा उल्लंघन पर चुप रहे, सैनिकों के सिर काटे जानें पर शत्रु राष्ट्र का पक्ष ले, भयानक मंहगाई को रोके नहीं, भष्टाचार के नवीनतम रिकार्ड बना डाले , देश के बहूसख्यक और मूल निवासियों को नारकीय जीवन देने के कानून गढे़, वह कैसे कह सकती है कि उसमें देश का तत्वबोध है। इसी की जनता के द्वारा सजा कांग्रेस को मिली ।

 चुनाव परिणामों से तो स्पष्ट है कि देशवासियों ने विचारधारा के आधार पर ही भाजपा को वोट दिये हैं। भाजपा का मुख्य फोकस ही इस देश का अपना स्वत्व ही था। देशहित पर स्वतंत्र भारत में पहली बली जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष के रूप् में डाॅ0 श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने कश्मीर को बचाते हुये दी। रोम - रोम से जिसमें भारत है वह भाजपा ही है। कांग्रेस लम्बे समय से इस देश के स्वत्व के साथ छल-कपट कर रही है, उसने भारत को भारत बनने ही नहीं दिया। वह भारत को राज करो की वस्तु मात्र के रूप में देखती रही। स्वतंत्रता का मतलब उसने बहुत ही संर्कीणता से लिया कि पहले अंग्रेज राज करते थे अब कांग्रेस को उनके स्थान पर राज करना है। इसी संर्कीणता के चलते वे धीरे - धीरे प्रांतों से उखड़ गये और अब देश से भी उखड़ चुके हंै। उनके पास मात्र 44 सीटें हैं जो उन्हे नेता प्रतिपक्ष का पद भी नहीं दिला पा रही है। कुल मिला कर कांग्रेस लोकसभा में 10 प्रतिशत से कम रह गई है। इसका मूल कारण विदेशी नेतृत्व के कारण वह स्वत्व भाव से जुड़ नहीं पाई, जितनी थी उससे भी पिछड़ गई। उसे देश हित और जनहित दोनों ही गौड़ नजर आये और विदेशी हितों के पक्ष में ही वह काम करती रही।

कोई भी राजनैतिक दल या विचारधारा देश को भोगने के लिये शासन पर नहीं बिठाई जाती, बल्कि वह देश के निमार्ण ओर संसाधनों के विकास के लिये ही सत्ता में लाई जाती है। जो भी देशहित की नजर अंदाजी करेगा, वह अन्ततः सत्ता से जनशक्ति के द्वारा च्युत कर दिया जायेगा। यही लोकतंत्र है। ऐशा आपातकाल के बाद इन्दिरा गांधी सरकार के साथ हुआ, येशा ही जनता पार्टी की सरकार के साथ भी हुआ और यही मनमोहनसिंह की यूपीए 2 की सरकार के साथ हुआ।

देशहित और जनहित को कभी भी विचारधारा की बेडियों में नहीं जकड़ा जा सकता। अपराध और अनैतिकता को विचारधारा के आधार पर कभी भी स्विकार नहीं किया जा सकता , शासन का मतलब न्याय और नैतिकता की रक्षा करना ही होता है। मगर हमारे यहां पर कांग्रेस शासन रहे हों या अन्य गैर भाजपा शासन रहे हों सभी में देशहित, मूल देशवासी हिन्दूओं के न्याय, शत्रुदेश के आतंकवाद से मुकाबला , सीमाओं की रक्षा जैसे गंभीर मुद्दे हमेशा हांसिये पर डाले, चिन्ता यही रही कि देश में हिन्दू - मुस्लिम फूट बनी रहे। मुस्लिमों महज वोट बैंक बना रहे, देश पर कांग्रेसी राज करते रहें , इस हेतु हिन्दूओं के हितों पर भी अन्याय को काबिज रखा गया। हिन्दू को अपमानित करने के लिये उनके आस्था केन्द्रों पर हमले नजर अंदाज कियेे गये। भारतीय मीडिया में विदेशी निवेश नीति इस तरह की बनाई गई उससे देशहित गायब हो जाये। यूरोप, अमरीका और चीन के व्यापारिक हित पूरे होते रहें, भले ही देश लुट जाये। डाॅलर मंहगा होकर भले ही देश और देश के एक - एक नागरिक को चैपट करता रहे, मगर हम चुप रहेंगे की नीति ने कांग्रेस का भी और देश का भी बंटाधार कर दिया। मंहगे डाॅलर ने खूब लूटा, कांग्रेस हाई कमान और मनमोहनसिंह इस तरह चुप रहे मानों उनका देश भारत न हो कर अमरीका हो।

भारत में शासन की नैतिकता का मार्गदर्शन करने के लिये विश्व में मौजूदा साहित्य से हजार गुणा अधिक अपना भारतीय साहित्य मौजूद है। मगर हम अपनों की बातों को तो भगवा एवं साम्प्रदायिक कह कर नकार देते हैं। दुर्भावनाग्रस्त अंग्रेज हमारे वारे में जो लिख गये, उसे आज तक ढ़ोये जा रहे हैं। शासन में राजा से पहली अपेक्षा न्याय की होती है। युद्धकाल में राष्ट्ररक्षा के लिये सर्चोच्च संघर्ष की होती है। कांग्रेस के रूप में या समाजवाद के रूप में या साम्यवाद के रूप में अथवा हालिया नया सगूफा नेहरूमाडल के रूप में, जनता और देश के लिये ये अपने आपको सही साबित नहीं सके। क्यों कि इन सब में विदेशियत छिपी हुई है। न्याय और सीमाओं की रक्षा हमेशा खतरे में पढ़ी ही दिखीं हैं। क्यों कि इनमें देश प्रेम नहीं था। स्व का भाव नहीं था, अपनापन नहीं था।

स्व का भाव जनहित का प्रेरक बनता है, कांग्रेस शासन जहां कुशासन का पर्याय बना वहीं गुजरात में नरेन्द्र मोदी का शासन बार - बार जनहित के कारण स्विकार किया गया, मध्यप्रदेश में शिवराजसिंह चैहान का शासन, छतीसगढ में रमनसिंह का शासन स्विकार किया और इन प्रांतों ने जनता की सेवा का इतिहास भी रचा है। क्यों कि इनके पास स्व भाव था स्वदेशी माॅडल था । पश्चिम बंगाल में तीन दसक विदेशी माॅडल साम्यवादी शासन रहा मगर वहां की गरीबी, जीवनस्तर,समस्यायें और विकास शून्यता के हालात और बिगड़ गये। क्यों कि वहां साम्यवादी शासन भय और हिंसा के बल पर लाया जाता था, साम्यवादी प्रभाव के दो प्रांत बंगाल और केरल में राजनैतिक हिंसा का अतिवाद आज भी किसी दुस्वप्न की तरह मौजूद है। अवसर मिलते ही पश्चिम बंगाल की जनता ने मुक्ति को चुना किया आज साम्यवाद वहां शून्य जैसी स्थिती में पहुंच गया।

देशहित और जनहित की बातों की प्रथमिकता हर समय आवश्यक है। देश को आपस में लड़ा कर कितने दिन राज कर सकते हो ? आखिर एक दिन सोचने पर सभी मजबूर होते ही है। विदेशी हमलावरों को पहले भी अन्ततः परास्त होना ही पड़ा है। आज मुस्लिम के सामने भी प्रश्न है कि उसे वोट बैंक बनने से क्या मिला ? अलग - आलग चलने से क्या मिला ? कश्मीर में 370 से क्या हांसिल हुआ ? जम्मू और कश्मीर के आकाओं को यह जानना चाहिये वहां की 6 सीटों में से 3 सीटें उस पार्टी ने जीती है जो धारा 370 हटाना चाहती है। बांगलादेशी घुसपैठ अन्ततः किसको सबसे ज्यादा नुकसान पहुचा रही है ? भारत को ! असाम जो पीडि़त है वहां भाजपा को 14 में से 7 सीटें मिली हैं।  राममंदिर हिन्दुओं का है, पूरा देश ही हिन्दुओं का है। मगर कांग्रेस के नृतत्व में इसे उलछाया गया वहां 80 में से 73 सीटें भाजपा गठबंधन के पास आईं हैं। कौन यहां आक्रमणकारी की तरह आया सब जानते है! बहुत हो गया झूठ के आधार पर धोखाधड़ी का खेल और 60 साल से ज्यादा गुजर गये अब !! अब झूठों की पराजय का युग आ गया है। जनता ने उन्हे परास्त कर दिया है।

इस चुनाव में अल्पसंख्यकवाद के आधार पर जीत तय करने का मिथक टूट चुका है। इस चुनाव में जाती के आधार पर जीत तय करने का मिथक टूट चुका है। इस चुनाव में क्षैत्रवाद का मिथक भी टूट गया । सम्पन्नता और विपन्नता का आधार भी नहीं रहा। पूरा देश देशहित के लिये उठ खड़ा हुआ। देश की नई पौध ने एक नई इबारत लिखी कि अब शासक को ”स्वराष्ट्रबोध“  के साथ खडा होना ही होगा। इस संदर्भ में अपना रिर्पोकार्ड देना ही होगा। समाज में फूट डालो राज करो नहीं चलेगा। आगे भी शासन को जनहित और राष्ट्रहित के र्मोचे पर पूरी ताकत से काम करना ही होगा। शासन में ”स्वराष्ट्रबोध“ होना ही चाहिये ।
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हमारा भविष्य अपने हाथो मे है - परम पूज्य मोहन जी भागवत



माननीय सरसंघचालक जी का कहना है कि सच्ची स्वतंत्रता तब जब स्वधर्म और स्वदेश से जुड़ें !
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मनुष्य सच्चे अर्थो मे स्वतंत्र तब होता है जब वह स्वधर्म और स्वदेश को देखता-ः परम पूजनीय सरसंघचालक मोहन जी भागवत
आदिवासी तीरकबान के साथ प्रसंन्न मुद्रा मे परम पूजनीय  सरसंघचालक मोहन जी भागवत

झाबुआ। बाहर से जितना और जैसा प्रायश होता है उतना ही काम होता है लेकिन भवन मे ऐसा नही होता जैसे पानी की प्रवृती ही ऐसी है की उष्णता मिलते ही वह भाप बन कर उड जाता है एक जगह नही ठहरता है। इसी प्रकार अन्दर की उर्जा से जो काम होते है और जहां होते है वह अपना भवन उक्त बात परम पूज्य सर संघचालक मोहन जी भागवत ने वनवासी अंचल झाबुआ जिले मे दत्ताजी उननगावंकर द्वारा निर्मति संघ कार्यालय जागृती के लोकर्पण पर उपस्थित कार्यकर्ता और गणमान्य नगारीको को संबोधित करते हुए कही।

इस अवसर पर दत्ताजी उननगावकर ट्रस्ट के अध्यक्ष रामगोपाल जी वर्मा ने ट्रस्ट के बारे मे विस्तार से जानकारी देते हुए बताया की इस निर्माण कार्य मे जिले के सभी स्वयंसेवको ने दिन रात अथक प्रयश किया और समाज ने भी बडे उत्साह के साथ सहयोग दिया।

 कार्यक्रम को संबोधित करते हुए क्षैत्र संघचालक माननीय अशोक जी सोहनी ने कहा की पहले पुराना कार्यालय छोट था अब बडा कार्यालय बन चुका है यानि की काम भी अब ज्यादा बडा हो चुका है।

संघचालक मोहनजी भागवत ने कहा की कार्यकर्ताओ को पता है कि कौन सा काम करना है कैसे करना है उन्हे पता है उसमे नई बात जोडने की कोई आवश्यकता ही नही है। भाषण करेगे या मार्गदर्शन करेगे यह अच्छा नही लगता है यह शब्दो का फर्क है शब्द परम्परा से चलते है अर्थ जानकर चलते है ऐसा नही है। इस लिए शब्दो का भी ध्यान रखना चाहिए। पूरम पूज्य ने कहा की नया भवन बना है भवन यानी होना लेकिन कुछ भवन ऐसे भी बनते है जहां कुछ होता नही है लेकिन अपने भवन ऐसे नही है। उन्होने कहा की बहार से प्रयश होता है उसमे जितना और जैसा प्रयाश होता है उतना ही काम होता है लेकिन भवन मे ऐसा नी होता जैसे पानी की प्रवृति होती है उसे उष्णता मिलते ही वह भाप बन कर उड जाता है। अंदर की उर्जा से जो काम होते है जो काम बनते है वह अपना भवन। क्षैत्र मे समस्या है उसका निराकरण कौन करेगा बहार से आकार कोई करने वाला है क्या कर नही सकता। कुछ लोग जिनके मन मे करूणा है वे प्रयाश भी करते है लेकिन समस्या का निराकरण नही हो सकता समस्या का निराकरण तब ही हो सकता जब जिसकी समस्या है वह खुद उसका निराकरण करे। यह तब होता है जब व्यक्ति के मन मे यह इच्छा हो की वह समस्या का समधान खुद करेगे वह इस प्रकार की समस्या मे नही जियेगा ऐसी इच्छा जब व्यक्ति के मन मे होती है तो फिर बहार का कोई व्यक्ति मदद करे या ना करे भगवान उसकी मदद जरूर करता है क्योकि प्रत्यके मनुष्य के अंदर भगवान है ऐसा मानने वाले हम लोग है। यह परम्परा हमारे देश की है दुनिया मे और कही ऐसा नही है। अंदर से जब व्यक्ति सोचता है तो भगवान भी आर्शिवाद देता है। व्यक्ति जब एक कदम चलता है तो भगवान दस कदम चलता है। समाज का वास्तविक मे भला तब ही होगा जब समाज खुद सोचेगा की अपना भला होना चाहिए इसके लिए कोई बहार से आयेगा उसके आर्शीवाद से काम होगा ऐसा नही है। हमारा भविष्य अपने हाथो मे है। और भगवान ने मनुष्य को इसी लिए बनाया है हमारे साधु महात्म कहते कि ईश्वर भी खेल खेलता है अपने एक अंश को मनुष्य बना कर भेजा है और कहता है जा मैने तुझे सब दिया अब तू नर से नारायण बन जा।

       परम पूज्य ने कहा की पहले यहां छोटा सा भवन था अब बडा भवन बन गया तो काम भी बडे पैमाने पर करना ही चाहिए। कार्यालय बन गया यानि कार्य का लय नही हो जाय बल्कि कार्य  मे लय आ जानी चाहिए । समाज  की विभिन्न आशाओ की पूर्ति का केन्द्र यह भवन बनना चाहिए इस भवन मे आने मात्र से मनुष्य को एक भरोसा मिलता है। इस भवन मे आने मात्र से मनुष्य अपने भाग्य को बनाने के लिए पुरूषार्थ की प्रवृति को अपना लेता है। ओर किसी दुसरे का मुहॅ ताकने मे विश्वास नही रखता ऐसा काम राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ कर रहा है। उन्होने दत्ताजी उननगांवकर के बारे मे बताते हुए कहा की वे जिनके नाम से यह ट्रस्ट है वे भी संघ के ही प्रचारक थे। हमेशा सबकी चिंता करना अपने लिए कुछ नही इस लिए उन्हे अंतिम दिनो मे यह काम दिया गया की जो सबकुछ छोड कर आये आये है प्रचारक उनकी चिंता कौन करेगे तो उसके लिए दत्ताजी को प्रचारक प्रमुख का बनया गया ताकी वे सबकी चिंता कर सके। जिस प्रकार से भवन बनाने मे सभी का सहयोग मिला वैसे ही इस भवन से काम हो उसमे सभी का सहयोग मिलना चाहिए मात्र भवन बनाने से काम नही पूर्ण हो जाता बल्कि वास्वत मे भवन बनाने के बाद काम प्रारभ होता है और तब तक करते रहना है जब तक कार्य पूर्ण नही हो जाता।

चलती रही आजादी की लडाई
झाबुआ जिले मे समस्या के मामले मे भी आगे है भारत की परम्परा मे झाबुआ जिले को गौरव प्राप्त है यहां पर आजादी की लडाई हमेशा चलती रही है कभी थमी नही। कभी तात्य टोपे का संचार हुआ तो कभी राजस्थान मध्यप्रदेश ओर गुजारत के अंचल मे इन सब लोगो का  संचार हुआ स्वधर्म ओर स्वदेश की ज्योति जागती रखने के लिए। और इसे जाग्रत रखने की आवश्यकता हमेशा रहती है। लेकिन मनुष्य सच्चे अर्थो मे स्वतंत्र  तब होता है जब वह स्वधर्म और स्वदेश को देखता है। तब उसकी सारी समस्याओ का निराकरण भी होता है दुसरा कोई आकर समस्या सुलझाय तो वह जो समधान देता है उसी मे हमको चलना होता है और वह हमको अच्छा लगेगा नही। मनुष्य मात्र की सच्ची स्वतंत्रा स्वधर्म मे ही है। धर्म का कोई नाम नही होता धर्म एक ऐसी वस्तु है जब सब पर लागे होती है। मिट्टी के एक कण से लेकर दुनियां मे अगर सबसे बडा आदमी है तो उस पर भी। बिना धर्म के कुछ नही हो सकता और हम जो धर्म मानते है वह सारी दुनियां कै जिसे कभी हम प्रेम तो कभी करूणा तो कभी किसी और नाम से जानते है ओर इसे एक नाम देने की आवश्यता पडती है ओर वह है हिन्दु धर्म ओर हम हिन्दु धर्म को मानते है। और हम हिन्दु धर्म के अनुयायी है ।

हिन्दु धर्म वैश्वीक कैसे बना तो उसका कारण स्वदेश है यह भारत भूमी ऐसी है जो सबकुछ देती है और इतना देती है कि हमे उसे बाटना पडता है। और इसी कारण हम ने चाहा की भाषा  अलग है पूजा अलग है लेकिन हमे इस भूमि  से इतना मिल रहा की हम सब मिल कर रहे एक दुसरे की पूजा को बदलने का प्रयाश मत करो सब मिल जुल कर रहो ओर विश्व का भला करो। उपभोग करना तो व्यक्ति तब चहाता है जब कम हो लेकिन जब व्यक्ति को भरपूर से ज्यादा मिलता है तो वह दुसरो की मदद करने की सोचता है। हमरा यह स्वभाव इस भूमि ने बनाया इस देश ने बनाया इस लिए देश की रक्षा ही धर्म की रक्षा है और जब हमे यह सब सोच कर संगठित होगे सामर्थवान होगे तो किसी भी समस्या हमारे समाने नही ठिक पायेगी।

 पूरम पूज्य सरसंघचालक जी की मुख्य द्वारा पर अगवानी प्रांत प्रचारक परगाजी अभ्यंकर, क्षैत्र संघचालक आशोक  जी सोहनी, जिला, विभाग संघचालक  जवहारजी जैन, जिला संघचालक मुकुट जी चैहान ने की आदिवासी नृतक दल की प्रस्तुती के साथ मंच तक लाया गया जहां पर आदिवासी परम्परा के अनुसार आदिवासी प्रतिक चिन्होे से जिला कार्यवाह रूस्माल चरपोटा ने स्वागत किया।

आदिवासी नृत्य दल की प्रस्तुती पर हुए अभिभूत
अलिराजपुर जिले से आये आदिवासी नृत्य दल की आकर्षक प्रस्तुतीयो देख कर परमपूज्य संघचालक जी काफी अभीभूत हुए एंव उनके साथ फोटो भी खिचवाया। 

हिंदुओं एकता सभी समस्याओं का समाधान : परम पूज्य डा. मोहन भागवत जी




हिंदुओं की एकता सभी समस्याओं का समाधान : सरसंघचालक परम पूज्य डा. मोहन भागवत जी

ककाडकुई (भरूच). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डा. मोहन भागवत ने कहा है कि हिंदुओं को संगठित करने का कार्य यदि इसी गति से चलता रहा तो वर्ष 2025 तक भारतीय समाज और भी संगठित हो जायेगा.
उन्होंने कहा, “भारत में हिंदुओं की एकता, देश की सभी आंतरिक और बाह्य समस्याओं का समाधान है. दुनिया के जिस किसी भी देश की धरती पर हिंदू गये, उन्होंने शांति व सौहार्द का प्रचार किया. दूसरी ओर, जिन्होंने भारत माता से अलग रहने का निर्णय लिया, वे आज कष्टमय जीवन जी रहे हैं. पाकिस्तान, तिब्बत, म्यांमार, श्री लंका, नेपाल और बंगलादेश की स्थिति से हम सभी अवगत हैं. इन देशों के लोगों की बेहतरी के लिये उनको भारत के निकट आने की आवश्यकता है.”
सरसंघचालक ने उक्त विचार 29 जून को भरूच जिले में नेत्रांग तालुका के ककाडकुई ग्राम में विद्या भारती के नवनिर्मित छात्रवास भवन के उद्घाटन से पूर्व कुछ लोगों से बातचीत के दौरान व्यक्त किये. भरूच और सूरत से सरसंघचालक से मिलने आए इन लोगों ने उनसे समान नागरिक संहिता, संविधान के अनुच्छेद 370 और पूर्वोत्तर की वर्तमान समस्याओं पर बातचीत की.
वनवासी परिवारों के लगभग 300 छात्रों को संबोधित करते हुए डा. भागवत ने वनवासी बंधुओं की दक्षता की सराहना की और कहा, “जब हम आज की शिक्षा पर दृष्टि डालते हैं, तो स्थिति बहुत सुखद दिखाई नहीं देती. वे विज्ञान एवं प्रगति पढ़ाते हैं, लेकिन भारतीय मूल्य व राष्ट्रवाद के बारे में शिक्षा नहीं देते. यही वह रिक्त स्थान है जिसे विद्याभारती को भरना है.”
पूर्वोत्तर में विद्याभारती के विद्यालय स्थापित करने पर जोर देते हुए डा. भागवत ने कहा, “पांच वर्ष पूर्व हमने नगालैण्ड में विद्याभारती का विद्यालय प्रारम्भ किया था. वहां आज, बच्चे हिंदी में बोलते हैं और हमें प्रसन्नता है कि हम राष्ट्रवाद की भावना फैलाने में सफल रहे. कल, वे भयमुक्त होकर देश की हर इंच भूमि की रक्षा करेंगे. हमारी दृष्टि केवल इन्हीं क्षेत्रों तक सीमित नहीं है. यह हमारा देश है और यहां जो कुछ हो रहा है, उसके प्रति हमें संवेदनशील रहना होगा.”
स्त्रोत : vskbharat.com

प्रोफेशनल तरीके से मारा गया सुनंदा को - सुब्रह्मण्यम स्वामी



स्वामी बोले - प्रोफेशनल तरीके से मारा गया सुनंदा को,
स्वास्थ्य मंत्री ने तलब की रिपोर्ट
aajtak-in [Edited By : अमरेश सौरभ।  नई दिल्ली, 2 जुलाई 2014

पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर की मौत का मामला धीरे-धीरे और सुलगता नजर आ रहा है. एक ओर खुद शश िथरूर ने इस मामले पर कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया है. दूसरी ओर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने पोस्टमार्टम को लेकर एम्स से रिपोर्ट मांगी है.

इस बीच, इस मामले में बीजेपी नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कहा है कि उन्हें नई जानकारियों को लेकर कोई आश्चर्य नहीं हुआ. स्वामी ने कहा, श्सुनंदा की बड़े ही प्रोफेशनल तरीके से हत्या की गई. इस मामले की विस्तार से जांच होनी चाहिए.श्

सुनंदा पुष्कर की मौत की मिस्ट्री पर शशि थरूर ने यह कहकर कोई टिप्पणी करने से इनकर कर दिया कि पुलिस इस मामले की जांच कर रही है. एम्स के फॉरेंसिक विभाग के हेड डॉ. सुधीर गुप्ता का आरोप है कि उन पर पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट को बदलने का दबाव था.
डॉ. हर्षवर्धन ने स्वीकार किया कि उन्हें सुधीर गुप्ता की चिट्ठी मिली है. स्वास्थ्य मंत्री ने इस बाबत एम्स से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है, ताकि आरोप की सच्चाई पता चल सके. सुधीर गुप्ता ने इस मसले पर पीएम का भी चिट्ठी लिखी है.
गौरतलब है कि डॉ. सुधीर गुप्ता ने सुनंदा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट को लेकर सीवीसी और स्वास्थ्य मंत्रालय को शकिायत भेजी है. डॉक्टर गुप्ता का आरोप है कि सुनंदा की मौत को सामान्य बताए जाने का दबाव बनाया गया था. उन्हें वह पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट नहीं सौंपने दी गई, जिसमें उनकी मौत की वास्तविक स्थिति थी.

गौरतलब है कि सुनंदा पुष्कर का शव 14 जनवरी, 2013 को चाणक्यपुरी स्थित होटल लीला पैलेस के कमरा नंबर 345 से बरामद हुआ था. पाकिस्तानी महिला पत्रकार मेहर तरार के शशि थरूर से कथित संबंधों को लेकर दंपत्ति के बीच ट्विटर विवाद सामने आया था. शशि थरूर और सुनंदा पुष्कर की यह तीसरी शादी थी. सुनंदा का एक 21 साल का बेटा शिव मेनन है. यह बेटा उनकी दूसरी शादी से है.

शशि थरूर और सुनंदा पुष्कर
केंद्रीय मंत्री शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई है. आशंका जताई जा रही है कि सुनंदा ने खुदकुशी की है. सुनंदा की मौत की खबर ऐसे समय आई जब शशि थरूर के पाकिस्तानी पत्रकार मेहर तरार के कथित अफेयर की चर्चा गर्म थी.

4 साल भी नहीं रहा शशि-सुनंदा का साथ
शशि थरूर और सुनंदा पुष्कर की शादी 22 अगस्त 2010 को केरल में पारंपरिक मलयाली रीति-रिवाज से हुआ था. शशि थरूर की यह तीसरी शादी थी. सुनंदा की भी इससे पहले दो शादियां हो चुकी थीं.

शशि की पहली पत्नी का नाम तिलोत्तमा मुखर्जी था. इसके बाद थरूर ने कनाडा की क्रिस्टा जाइल्स से शादी की थी. हाल में पाकिस्तानी पत्रकार मेहर तरार से शशि थरूर के कथित अफेयर की चर्चा गर्म थी.

मूल रूप से कश्मीर के सोपोर जिले की रहने वाली सुनंदा पुष्कर के पिता सेना में अफसर रह चुके हैं. कश्मीर यूनिवर्सिटी से ग्रैजुएट सुनंदा की पहली शादी कश्मीरी पंडित संजय रैना से शादी हुई थी.

रैना के साथ सुनंदा की शादी सफल नहीं हो सकी थी और 90 के दशक में वह अपने दोस्त सुजीत मेनन के साथ दुबई गई थीं. बाद में दोनों ने शादी कर ली थ

मेहर तरार पाकिस्तान के लाहौर में रहती हैं. वह स्वतंत्र पत्रकार हैं. डेली टाइम्स में भी काम कर चुकी हैं.मेहर तरार ने माना है कि वह थरूर से दो बार मिल चुकी हैं. थरूर से उनकी पहली मुलाकात भारत में हुई और दूसरी बार वे दुबई में मिले थे.
सुनंदा 2005 से टीकॉम इंवेस्टमेंट कंपनी में बतौर सेल्स मैनेजर काम कर रही थीं. वह दुबई की हाई प्रोफाइल पार्टीज में भी नजर आती थी. वह दुबई में ब्यूटीशियन के तौर पर भी जानी जाती थी.

शशि थरूर और सुनंदा पुष्कर पहली बार 2008 में दिल्ली में इंपीरियल में अवार्ड समारोह में मिले थे. एक साल तक चली दोस्ती में ये दोनों केवल तीन बार मिले. थरूर ने सबसे पहले सुनंदा को अपने सरकारी बंगले में प्रपोज किया था. इसके बाद 2010 में कसौली में थरूर ने सुनंदा के सामने शादी का प्रस्ताव रखा.

शादी के बाद सुनंदा पहली बार उस वक्त विवादों में आईं जब आईपीएल विवाद में शशि थरूर ने सुनंदा के बैंक खाते में 50 लाख रुपये ट्रांसफर किए थे.

शुक्रवार को दक्षिणी दिल्ली के होटल श्लीलाश् के कमरा नंबर 345 में सुनंदा का शव मिला.शशि थरूर के निजी सचिव ने पत्रकारों से बातचीत में सुनंदा के मौत की खबर बताई.बताया जा रहा है कि सुनंदा और शशि थरूर दोनों ही होटल लीला में ठहरे थे.

नंदा ने शशि थरूर के साथ गुरुवार सुबह को ही होटल में चेक-इन किया था. घर में कोई काम चल रहा था इसलिए सुनंदा होटल में आ गई थीं.पुलिस ने होटल लॉबी की सीसीटीवी फुटेज कब्जे में ले लिया है. शशि थरूर से भी पूछताछ की जा रही है. सूत्रों से मिल रही जानकारी के मुताबिक, कमरा नंबर 345 के साथ कमरा नंबर 342 भी बुक करवाया गया था. हालांकि होटल स्टाफ की ओर से कोई पुख्ता जानकारी इस बारे में नहीं मिल पाई है.

सुनंदा पुष्‍कर : 'पोस्‍टमार्टम रिपोर्ट बदलने का था दबाव'


हमारा पहले ही दिन से शक हे कि सुनंदा की हत्या हुई है । सुनंदा को भी हत्या का डर था इसी से वह घर से होटल आई थी । इस पूरे प्रकरण में सोनिया गांधी सहित तमाम जाँचें होनी चाहिए । शशि थरूर को तुरंत गिरिफ्तार किया जाना चाहिए !  इसे ईसाई होने का फायदा मिला था , आशंका यह हे कि  ईसाई सोनिया गांधी के इशारे  पर ये बचे हैं ।
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सुनंदा पुष्‍कर की मौत मामले में बड़ा खुलासा: 'पोस्‍टमार्टम रिपोर्ट बदलने का था दबाव'
aajtak.in [Edited By: महुआ बोस] | नई दिल्‍ली, 01 जुलाई 2014

पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर की पत्‍नी सुनंदा पुष्‍कर की मौत के मामले में बड़ा खुलासा हुआ है. एम्‍स के फॉरेंसिक विभाग के हेड का आरोप है कि उन पर पोस्‍टमॉर्टम रिपोर्ट को बदलने का दबाव था.
डॉ. सुधीर गुप्‍ता ने इसकी शिकायत सीवीसी से की है. यही नहीं शिकायत स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय को भी भेजी गई है. डॉक्‍टर गुप्‍ता का आरोप है कि सुनंदा की मौत को सामान्‍य बताए जाने का दबाव बनाया गया था. उन्‍हें वह पोस्‍टमॉर्टम रिपोर्ट नहीं सौंपने दी गई, जिसमें उनकी मौत की वास्‍तविक स्थिति थी.

आपको बता दें कि सुनंदा पुष्‍कर का शव 14 जनवरी 2014 को चाणक्यपुरी स्थित होटल लीला पैलेस के कमरा नंबर 345 से बरामद हुआ था. पाकिस्तानी महिला पत्रकार मेहर तरार के शशि थरूर से कथित संबंधों को लेकर दंपत्ति के बीच ट्विटर विवाद सामने आया था. शशि थरूर और सुनंदा पुष्‍कर की यह तीसरी शादी थी. सुनंदा का एक 21 साल का बेटा शिव मेनन है. यह उनकी दूसरी शादी से था.
हमेशा किसी न किसी विवाद या किसी अन्य वजह को लेकर सुर्खियों में रहने वाले इस जोड़े के बारे में बताया जाता है कि किसी कथित प्रेम संबंध को लेकर उनकी कहासुनी हुई थी, जिसका पता उस समय चला था जब थरूर ने दावा किया था कि उनका ट्विटर एकाउंट हैक कर लिया गया है.

सुनंदा की मौत के बाद पाकिस्‍तानी पत्रकार मेहर तरार ने अपना पक्ष रखते हुए पुष्कर के इन आरोपों से इनकार किया था कि वह थरूर के पीछे पड़ी हैं या उनके साथ उनका कोई संबंध है.

कौन थीं सुनंदा पुष्‍कर
सुनंदा पुष्कर का जन्म एक जनवरी 1962 को हुआ था. वे मूलत: कश्मीर के सोपोर की रहने वाली थीं. उनके पिता पीएन दास भारतीय सेना में वरिष्ठ अधिकारी थे. सुनंदा ने श्रीनगर के गवर्नमेंट कॉलेज फॉर वीमेन से स्नातक की पढ़ाई की थी. सुनंदा पुष्कर का नाम सबसे पहले अप्रैल 2010 में इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) की कोच्चि टीम की ख़रीद से जुड़े एक विवाद में सामने आया था. इस टीम की ख़रीद में शशि थरूर की भूमिका को लेकर सवाल उठाए गए थे. मामला इतना बढ़ा कि थरूर को केंद्रीय मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा, लेकिन कुछ समय बाद उन्हें मंत्रिमंडल में दोबारा शामिल किया गया.