शनिवार, 5 जुलाई 2014

पत्रकार मेहर तरार - शशि थरूर के चक्कर में सुनंदा की मौत ? SCसर्वोच्च अदालत में पहुंचा मामला



मेहर के चक्कर में सुनंदा की मौत ? SC पहुंचा मामला
अमर उजाला, नई दिल्ली !

'सीबीआई या एनआईए करें जांच'

सुप्रीम कोर्ट से शुक्रवार को कांग्रेस सांसद व पूर्व कानून मंत्री शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर की होटल के कमरे में हुई रहस्यमयी मौत के मामले की जांच की मांग की गई है।

अदालत से किसी स्वतंत्र एजेंसी सीबीआई या एनआईए को जांच करने का निर्देश जारी करने और कोर्ट की ओर से निगरानी करने की मांग की गई है।

सर्वोच्च अदालत में इस मसले पर वकील राजारमन की ओर से याचिका तब दायर की गई। जबकि इस मामले में एम्स के चिकित्सक सुधीर गुप्ता के एक बयान के बाद नया विवाद खड़ा हो गया। जो सुनंदा की लाश के पोस्टमार्टम करने वाली टीम का नेतृत्व कर रहे थे।

मेहर के चक्कर में सुनंदा की मौत की आशंका

हाल ही में सुधीर गुप्ता ने कहा कि जिस समय उन्होंने रिपोर्ट तैयार की वह दबाव में थे और उनपर रिपोर्ट बदलने का दबाव डाला गया। उनके अनुसार 52वर्षीय सुनंदा को दक्षिणी दिल्ली के एक पांच सितारा होटल में 17 जनवरीकी रात को मृत पाया गया था। जबकि इससे ठीक एक दिन पहले उनकी ट्विटर पर पाकिस्तानी पत्रकार मेहर तरार से नोकझोंक हुई थी। जिसकी वजह कथित तौर पर उनके पति थरूर से पाकिस्तानी पत्रकार का प्रेम-प्रसंग था।

सर्वोच्च अदालत से वकील ने रहस्यमयी मौत के मामले की जांच सीबीआई या एनआईए को सौंपने की मांग करते हुए कहा है कि इस मौत की वजह काफी संगीन हो सकती है, क्योंकि पाकिस्तानी पत्रकार कथित तौर पर आईएसआई एजेंट है और ऐसे में उससे तकरार से ठीक एक दिन बाद सुनंदा की रहस्यमयी तरीके से मौत हो गई। साथ ही वकील ने कोर्ट को ऐसे मामलों में आवाज उठाने वालों को सुरक्षा दिए जाने की मांग भी की है।

तथाकथित बुद्धिजीवी : किसके हितों को , किन हाथों में !



अरविन्द सिसोदिया - ईराक़ में बर्बरता की इन्तः हो रही है , मासूम बच्चों तक की हत्याएं हो रहीं हैं , महिलाओं का क्या हाल  होगा ? मगर भारत के तथाकथित सेक्यूलर बुद्धिजीवी मौन हैं ! भारत में जरा जरा सी बात पर मिडिया में सर उठानेवालों का यह मौन यह सावित  करता है कि विदेशी मॉल खाने के कारण इनका वास्तविक जमीर तो मर चूका ये मात्र भाड़े के , विदेशी एजेंट हैं ! 

आवरण कथा : पाञ्चजन्य  - प्रशांत बाजपेईकिसके हितों को साध रहे हैं , किन हाथों में खेल रहे हैं !

तारीख: 28 Jun 2014


ऐसे बुद्घिजीवियों की कतार पर्याप्त लंबी है, जो पाकिस्तान जाकर पाकिस्तान के प्रवक्ता बन जाते हैं और भारत की कश्मीर नीति से लेकर परमाणु नीति तक का विरोध करते हैं। चीनी घुसपैठ पर मौन रहते हैं और अपने वक्तव्यों से चीन की छवि को उदार बनाने का प्रयास करते हैं।

23 मई 2014 को जब भारत में नई सरकार के शपथ ग्रहण की तैयारियाँ चल रही थीं, और जनचर्चाओं से लेकर सोशल मीडिया तथा बाजार तक देश के उत्साह का प्रमाण दे रहे थे, तब पाकिस्तान के प्रसिद्घ समाचारपत्र डॉन में लेखिका अरुंधती रॉय का बयान छपा '़.़ उन्हंे (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) ऐसे व्यक्ति के रूप में चुना गया है, जो रक्तपात देखकर पलक भी नही झपकाता। न केवल मुस्लिम रक्तपात, बल्कि किसी भी प्रकार का रक्तपात।' अरुंधती के बयान का अगला हिस्सा माओवादी अतिवादियों के प्रचार साहित्य की सनातन विषय वस्तु है, कि अब औद्योगिक जगत के इशारे पर जंगलों में नरसंहार होगा और किस प्रकार से भारत के इस 'ढांचे' को लोकतंत्र कहना लोकतंत्र का अपमान होगा। अरुंधती के इस बयान की भारत में प्राय: चर्चा नहीं हुई। होती भी तो आम जनता को इससे कोई सरोकार न होता, परंतु अंतर्राष्ट्रीय जगत में ऐसे लोगों को पढ़ने-सुनने-प्रस्तुत करने वाले पर्याप्त लोग हैं।

पश्चिमी मीडिया में भी इन जैसे लोगों को ''भारत के उदार/सेकुलर/वामपंथी'' पक्ष के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। पश्चिमी मीडिया का एक वर्ग प्रसन्न होता है, जब भारत के प्रति उसके पूर्वाग्रहों को यहीं के 'नेटिव्स' अपनी लेखनी के माध्यम से दुहराते हैं। भारत में वामपंथ संसद और विधानसभाओं से तेजी से विलुप्त हो रहा है, पर साहित्य, मीडिया और अकादमियों में आज भी भरा-पूरा है, और निरंतर अपने विषदंतों का उपयोग कर रहा है।

एक बार लेनिन ने लेखकों को नारा दिया था 'गैर पार्टी लेखन मुर्दाबाद!' एक दूसरे मौके पर लेनिन ने कम्युनिस्ट पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था कि अपने विरोधियों पर जो चाहे वो नाम चिपका दो, फिर हम उनसे निपट लेंगे। इन नारों और वक्तव्यों की मूल भावना को भारत के वामपंथी लेखकों, बुद्घिजीवियों और झोला-छाप कॉकटेल पार्टियों की शोभा बढ़ाने वाले तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपने व्यवहार और चरित्र में गहराई से उतार रखा है। भारत में पिछली सदी के पूर्वार्ध के बाद से ही अलग-अलग चोलों में अलग-अलग आधारों (प्लेटफार्म) पर भारत द्वेषी वामपंथी लेखक और विचारक पनपते आ रहे हैं।

आधुनिक जीवन शैली के सभी मधुर फलों का स्वाद चखने वाले ये बुद्घिजीवी जंगलों में रहकर राज्य और राष्ट्र के विरुद्घ लड़ रहे आतंकी तत्वों के बारे में रोमांस से भरे लेख लिखते हैं, और 'कॉमरेड्स' के साथ चलने के गौरव का बखान करते हैं। पाकिस्तान प्रेरित कश्मीर के जिहादी आतंकवाद और दिहाड़ी पर पत्थरबाजी करके घाटी के जीवन को अस्त-व्यस्त करने वालों में उन्हंे मानवता और क्रांति के स्वर सुनाई देते हैं। वे प्राय: किसी व्यक्ति विशेष या दल विशेष पर टिप्पणी करने या प्रहार करने से बचते हैं, परंतु 'हिन्दुत्ववादी दक्षिणपंथियों' को दानव बनाकर प्रस्तुत करने और कोसने में कोई कसर नहीं छोड़ते।'उद्योगपतियों-पूंजीवादियों' का एजेंट है, इसलिए उसकी बातांे-तथ्यों-तकार्ें को सुनने की आवश्यकता ही नहीं है। पिछले एक वर्ष के चुनावी परिदृश्य के मद्देनजर भाजपा और मोदी विरोधी राजनैतिक दलों और बुद्घिजीवियों ने इस तरकीब का बेहद इस्तेमाल किया है और मुंह की खाई है।

चुनाव के पहले तक इन लोगों का एक बड़ा वर्ग इस स्वप्नलोक में रहा कि जाति और अल्पसंख्यकवाद में बंटी भारत की राजनीति में राष्ट्रवादी राजनीति करने वाला नरेंद्र मोदी जैसा व्यक्ति सत्ता तक नहीं पहुँच सकता। चुनाव परिणाम के पहले तक उनके द्वारा दिए गए बयानों को देखने से ये बात स्पष्ट हो जाती है कि ये लोग जमीनी सच्चाई से किस प्रकार कटे हुए थे। अमर्त्य सेन मोदी की शक्तिशाली छवि को छलावा बता रहे थे। स्वामिनाथन अय्यर (18 अगस्त 2013) ने घोषणा कर रखी थी कि मोदी कभी प्रधानमंत्री नहीं बन सकते। तो कुछ को डर सता रहा था कि मोदी सत्ता में आए तो 'लालच और हिंसा' भारत का विनाश कर देगी।

16 मई को जब चुनाव परिणाम आने प्रारंभ हुए तो इनमें से कई 'विद्वान टीवी स्टूडियोज की चुनावी चर्चाओं में हिस्सा लेने आए हुए थे और उनकी उतरी हुई शक्लें देखने लायक थीं। कुछ ने तो तत्काल पाला बदल लिया। विनोद मेहता, जो कहते थे कि मोदी भारत के लिए अस्वीकार्य हैं। मोदी, जो भारत के पंथनिरपेक्ष ताने-बाने को तार-तार करने के लिए प्रतिबद्घ हैं, वो मोदी कभी सत्ता के शिखर पर नहीं पहुँच सकते। वही विनोद मेहता 16 मई 2014 की सुबह टीवी चैनल पर हंस-हंस कर कह रहे थे ''कि अच्छे दिन आ गए हैं।''

वामपंथी वैचारिकता की कुछ चारित्रिक विशेषताएं हैं जो वामपंथियों के चरित्र, आचार-व्यवहार और प्रवृत्तियों में झलकती रहती हैं, चाहे वे किसी भी क्षेत्र में काम करते हों। बीमारी बन चुकी ये आदतें इस प्रकार हैं -
(1) लोगों में हर स्तर पर भेद और वैमनस्य को प्रोत्साहन देना।
(2) इसके लिए हर प्रकार की हिंसा और फिरकापरस्ती को प्रोत्साहन देना।
(3) अपने देश की मूल संस्कृति को सारे संकटों की जड़ बताना। शासकों को साम्राज्यवादी, प्रशासन को रक्तपिपासु और उद्योगपतियों-उद्यमियों को खलनायक बताना।
(4) ज्ञान-विज्ञान, इतिहास, और सामयिक घटनाओं को तोड़-मरोड़कर वामपंथी दृष्टिकोण से प्रस्तुत करना। (5) हर वो काम करना जिससे 'बुर्जुआ' सरकार कमजोर हो। इसके लिए विदेशी षड्यंत्रों को भी देखकर मौन रहना, संभव हो तो उनकी सहायत् ाा करना।
(6) अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए देश की सरकारी, सांस्कृतिक, कला संबंधी या मजहबी संस्थाओं में पैठ बनाना
(7) उपरोक्त लक्ष्य की प्राप्ति के लिए छल-प्रपंच-झूठ का बेहिचक प्रयोग करना।

अल जजीरा चैनल को दिए अपने साक्षात्कार में अरुंधती रॉय ने कहा 'नब्बे के दशक में भारत में दो दरवाजों के ताले खुले। एक रामजन्मभूमि का और दूसरा भारतीय अर्थव्यवस्था का। इन तालों के खुलने से आजाद हुई दो ताकतों हिंदुत्व और उद्योग जगत ने आपस में हाथ मिला लिए।'अपनी इन 'षड्यंत्र सिद्घांत' वाली परिभाषाओं के माध्यम से भारत का विकृत चित्रण करने वाली अरुंधती रॉय आगे बताती हैं, कि किस प्रकार भारत का उद्योग जगत 'हिंदुवादियों' से हाथ मिलाकर 'असली भारत' का क्रूर शोषण कर रहा है। अरुंधती रॉय की बौद्घिक फंतासियों में नक्सली आतंकवादी मुक्ति संघर्ष के नायक हैं, और कश्मीर के जिहादी महान क्रांतिकारी हैं। इसलिए आश्चर्य नहीं कि अरुंधती रॉय मार्का वामपंथी बुद्घिजीवी और स्वयं अरुंधती रॉय पाकिस्तान में खासे लोकप्रिय हैं। भारत की पाक नीति पर भी इस वर्ग की नीति पाकिस्तान को पाक साफ बताते हुए भारत की नीयत पर उँगली उठाने की रही है। एक और विशेषता- वामपंथी बुद्घिजीवी भारत में कट्टरपंथी इस्लाम को जितना समर्थन देते आए हैं, उतना उन्हांेने संभवत: दुनिया में कहीं और नहीं किया। भारत का विभाजन कर पाकिस्तान के निर्माण का अनुमोदन कर चुके वामपंथी आज उस इतिहास को झुठला कर भारत विभाजन का दोष विपिनचंद्र पाल, बंकिम चंद्र, तिलक, सावरकर, गाँधी और संघ पर मढ़ते हैं।

भारतीय मार्क्सवादियों में हिंदू विरोध की भावना इतनी कूट-कूट कर भरी हुई है, कि शीतयुद्घ की समाप्ति के बाद जब रूस निस्तेज हो गया तो उन्होंने अमरीकी वामपंथियों और मिशनरियों का दामन थाम लिया। कभी बात-बात पर अमरीकी को कोसने वाले वामपंथी बुद्घिजीवी आज अनेक अमरीकी और यूरोपीय संस्थाओं के मंचों पर जाकर भारत और हिंदुत्व को कोसने का काम नियमित रूप से कर रहे हैं। आर्थिक उदारीकरण के बाद पश्चिमी, ईसाई मिशनरी और अरब की इस्लामिक संस्थाओं का प्रभाव भारत में बढ़ा। उन्होंने जब भारत में किराए के बुद्घिजीवियों को खोजना प्रारंभ किया, तो विदेशी चंदे और विदेश यात्राओं के भूखे तथाकथित बुद्घिजीवियों ने स्वयं को उपलब्ध करवा दिया।

आज इन संस्थाओं पर दृष्टिपात करने का समय आ गया है। फंड फॉर ग्लोबल ह्यूमन राइट्स, काउंसिल फॉर फारेन रिलेशंस, ह्यूमन राइट्स वॉच, डी.एफ़आई़डी़, पैक्स क्रिस्टी, एमनेस्टी इंटरनेशनल, यू़यू़एच़आई़पी़, फें्रड्स ऑफ वीमेन्स, वर्ल्ड बैंकिंग आदि संस्थाएं क्या हैं? उनका उद्देश्य, योजना और कार्य इतिहास क्या है? उनके धन स्रोत क्या हैं? उनका धन किन व्यक्तियों, संस्थाओं और कायार्ें पर खर्च हो रहा है? कुछ चुनिंदा किस्म के भारतीयों को दिए जा रहे 'पीस अवार्ड और फेलोशिप' के पीछे का उद्देश्य क्या है? हाल ही में मैगसायसाय पुरस्कार विजेताओं की राजनैतिक सक्रियता, उनके विदेशी संबंध, उनको प्राप्त हुआ विदेशी धन, राष्ट्रीय विषयों पर उनका अराष्ट्रीय दृष्टिकोण आदि गंभीर सवाल खड़े करता है। प्रश्न उठता है, कि एक उपन्यास लिखकर अरुंधती रॉय हर विषय की विशेषज्ञ कैसे बन गई, और उन्हंे विदेशी मीडिया में बार-बार भारत विशेषज्ञ मानकर क्यों आमंत्रित किया जाने लगा? हर्ष मंदर, तीस्ता सीतलवाड़, जॉन दयाल, शबनम हाशमी, प्रफुल्ल बिदवई कुछ ही वषोंर् में कैसे इन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दिखाई देने लगे।

अंतरराष्ट्रीय मंचों व मीडिया में ये लोग भारत को 'वंचित-वनवासी विरोधी' शोषक समाज के रूप में चित्रित करते हैं। बदले में ईनाम पाते हैं। 2001 में तीस्ता सीतलवाड़ को कैथोलिक चर्च द्वारा 'पैक्स क्रिस्टी इंटरनेशनल पीस प्राइज़' दिया गया। उन्हें 'हिंदुत्व का जानकार' बताते हुए उनके द्वारा 'भारत-पाक संबंधों को सुधारने' के लिए किए गए प्रयासों को सराहा गया। अरुंधती रॉय को अमरीकी लेन्नान फाउंडेशन ने पुरस्कृत करते हुए कहा है, कि वे बड़ी बहादुरी के साथ भारत के जुल्मी शासन से लड़ रही हैं।

ये सारी बातें अत्यंत गंभीर हैं, और इन पर ध्यान देने की आवश्यकता है। हमें देखना होगा कि भारत के विशेषज्ञ बनकर घूमने वाले तथाकथित बुद्घिजीवी दुनिया के सामने भारत को किस रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। भारत मंे किनके हितों को साध रहे हैं, और किनके हाथों में खेल रहे हैं। अंत में अरुंधती रॉय को उद्धृत करना समीचीन होगा - 'राष्ट्रीय झंडा कपड़े का टुकड़ा मात्र है, जो दिमाग को संकीर्ण बनाता है और मुदार्ें को लपेटने के काम आता है।' 


विदेशों से सहायता प्राप्त एन जी ओ - डॉलर से बंधे सरोकार


अरविन्द सिसोदिया -  विदेशों से सहायता प्राप्त एन जी ओ की भारत में भरतमाता के प्रति क्या भूमिका है, इस पर देशवासियों को गहराई से विचार करना चाहिये। चाहे वह अरविन्द केजरीवाल हो, मनीष सीसौदिया हो, मेधा पाटकर हो, तीस्ता सीतलवाड हो, अरूधंती राय हो या प्रशांत भूषण हों। 


आवरण कथा - पाञ्चजन्य पत्रिका 

विकास रोकना और 

सरकारों को अस्थिर करना मुख्य मकसद, 

डॉलर से बंधे सरोकार

तारीख: 28 Jun 2014
नई दिल्ली। स्वयंसेवी संगठन (एनजीओ) पर आई खुफिया ब्यूरो की रिपोर्ट के बाद विदेशी फंड पर चलने वाली एनजीओ ने लॉबिंग शुरू कर दी है। उनकी तरफ से एक सुर में कहा जाने लगा है कि मोदी सरकार का मकसद एनजीओ पर लगाम लगाना है। इसके लिए गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए 9 सितंबर 2006 में एनजीओ को लेकर दिए गए नरेंद्र मोदी के भाषणों का उल्लेख किया जा रहा है, जिसमें उन्होंने एनजीओ संचालकों को 'नोबल पिपुल' और 'फाइव स्टार एक्टिविस्ट' कहा था और यह भी जोड़ा था कि देश में आज एक एनजीओ इंडस्ट्री खड़ी हो गई है, जिनकी इमेज बिल्डिंग के लिए बड़ी-बड़ी पीआर एजेंसियों की सहायता ली जा रही है।
विदेशी पैसे पर चलने वाली एनजीओ इंडस्ट्रीज भले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमलावर हो, लेकिन एक दूसरा सच यह भी है कि आईबी ने इनकी जांच पूर्व सत्ताधारी यूपीए सरकार के कहने पर की थी, जो खुद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की अध्यक्षता में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् बनाकर देश की सारी योजनाओं को एनजीओ के हवाले करने में शामिल रही हैं। आईबी की रिपोर्ट को छोड़ भी दें तो हम पाते हैं कि पिछले 10 सालों में विदेशी पैसे पर चलने वाली एनजीओ की पूरी कार्यप्रणाली देश की विकास परियोजनाओं में रोड़ा अटकाने वाली रही है। मानवाधिकार, पर्यावरण सुरक्षा, धार्मिक स्वतंत्रता, असमानता आदि के नाम पर देश की बड़ी-बड़ी परियोजनाओं को रोका गया है, चाहे वह गुजरात में नर्मदा नदी पर बनने वाली सरदार सरोवर परियोजना हो या फिर तमिलनाडु में परमाणु ऊर्जा संयंत्र वाली कुडनाकुलम परियोजना। आईबी ने अपनी रिपोर्ट में 7 बुनियादी संरचना से जुड़ी परियोजनाओं का उदाहरण दिया है, जो सिर्फ एनजीओ की अगुवाई में हुए विरोध प्रदर्शन के कारण रुकी हुई हैं।

इनकी पूरी गतिविधियों को तथ्यात्मक दृष्टिकोण से देखने पर प्रमाणित हो जाता है कि कुछ बड़े एनजीओ समाज सेवा में कम, विदेशी एजेंट की भूमिका में ज्यादा सक्रिय हैं। विदेशी एजेंट होने का आलम यह रहा कि विदेशी सहायता नियमन कानून (एफसीआरए) का उल्लंघन कर बिना पंजीकरण वाली कबीर एनजीओ को अमरीका की फोर्ड फाउडेशन कंपनी ने लाखों डॉलर का चंदा दे दिया। बाद में इसी कबीर के सर्वेसर्वा अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ने पहली एनजीओ कार्यकर्ताओं वाली सरकार देश की राजधानी दिल्ली में बनाकर यह दर्शा दिया कि अमरीका व यूरोप न केवल देश की विकास परियोजनाओं को रोकने में सफल हो रहे हैं, बल्कि इन एनजीओ इंडस्ट्रीज के बल पर भारत के अंदर सरकार निर्माण तक की क्षमता हासिल कर चुके हैं।

यहां हम कुछ ऐसे ही एनजीओ और एनजीओकर्म्िायों पर प्रकाश डाल रहे हैं, जो हाथी के दांत के सदृश दिखते तो समाज सेवा करते हुए हैं, लेकिन जिनकी वजह से विकास की परियोजनाएं या तो ठप पड़ी रहीं या फिर उनकी लागत और समय की बर्बादी हुई या फिर इन्होंने उस परियोजना का समर्थन करने वाली चुनी हुई सरकार को ही अस्थिर करने का अभियान छेड़ दिया है। आरटीआई के दायरे में नहीं आना, जवाबदेही तय नहीं होना और वित्तीय अनियमितता के कारण इन एनजीओ के असली मकसद से जनता अनजान रहती है। आईबी की इस रिपोर्ट को एनजीओ पर प्रतिबंध लगाने के दुष्प्रचार से इतर यदि हम सकारात्मक रूप से लें तो यह सरकार को एक मौका उपलब्ध कराती है कि वह एनजीओ को जवाबदेह व पारदर्शी बनाए एवं उन्हें सूचना कानून के दायरे में लाए ताकि अच्छे और नेक नीयत से काम करने वाले एनजीओ को और बेहतर तरीके से काम करने का अवसर उपलब्ध हो सके।

ग्रीनपीस का दावा, विदेशी धन के कारण ही हम सत्ता को चुनौती देने में सक्षम होते हैं।
आईबी ने जिस ग्रीनपीस एनजीओ को देश के विकास का अवरोधक बताया है, वह एक इंटरनेशनल एनजीओ है और पर्यावरण की दिशा में काम करता है। आईबी ने अपनी रिपोर्ट में सरकार को सलाह दी है कि ग्रीनपीस को विदेशी फंड लेने की दी गई इजाजत वापस ले ली जाए। ग्रीनपीस को मिलने वाले विदेशी चंदे को प्राथमिक सूची में डाला जाए ताकि पैसे का कोई भी लेन देन बिना इजाजत के संभव न हो सके। इस रिपोर्ट में कोयला खदान,ऊर्जा परियोजना, परमाणु ऊर्जा प्लांट के खिलाफ अभियान चलाने वाले 12 विदेशियों के नाम भी हैं, जो ग्रीनपीस सहित कुछ अन्य एनजीओ से सीधे जुड़े हुए हैं। आईबी की रिपोर्ट कहती है कि ग्रीनपीस ने देशभर में परमाणु प्लांट विरोधी माहौल तैयार किया। इतना ही नहीं, कोयला खनन को रोकने और कोल आधारित पावर प्लांट को रोकने का भी इसने जबरदस्त प्रयास किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रीनपीस का अगला निशाना इंडिया के आईटी सेक्टर को रोकना है और इसे वह ई-कचरा के निस्तारण के नाम पर करने जा रही है।
दूसरी तरफ ग्रीनपीस इंडिया के कार्यकारी निदेशक समित आइच ने एक अंग्रेजी अखबार से बातचीत में आईबी के दावे को गलत बताया है और कहा है कि यह ग्रीनपीस इंडिया पर सुनियोजित हमला है। विदेशी फंडिंग पर नियमों के उल्लंघन मामले पर उनका कहना है कि रक्षा, खुदरा और मीडिया समेत सभी क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश लाना और एनजीओ को विदेशों से मिलने वाली वित्तीय सहायता को संदेह की दृष्टि से देखना ठीक नहीं है। एनजीओ के लिए विदेशी फंडिंग दिक्कत बन जाती है, क्योंकि वे सत्ता को चुनौती देते हैं।
वैसे एक उदाहरण से ग्रीनपीस की विकास विरोधी गतिविधियों को समझा जा सकता है। हाल ही में मध्यप्रदेश के सिंगरौली में बड़ी संख्या में वनवासियों ने पर्यावरण को लेकर महान एल्युमिनियम परियोजना का विरोध कर रहे ग्रीनपीस के कार्यालय के समक्ष प्रदर्शन कर अपना विरोध जताया था। प्रदर्शन में शामिल होने आए अमीलिया, नगवा, करकुआ एवं विधेर गांव के वनवासियों के हाथ में तख्तियां थीं, जिन पर 'ग्रीनपीस वापस जाओ, वापस जाओ,' 'ग्रीन पीस कहां से लाते हो पैसा, विकास में बनते हो बाधा' आदि नारे लिखे हुए थे। प्रदर्शनकारी वनवासियों का कहना था कि ग्रीनपीस महान परियोजना का विरोध कर हमें विकास से महरूम कर रही है। इनके कारण यदि इस परियोजना से जुड़ी कंपनी हिंडाल्को बंद हो गई तो वनवासियों के समक्ष रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जायेगा।

ग्रीनपीस हिंडाल्को की जिस महान एल्युमिनियम परियोजना का विरोध कर रही है, उसकी लागत करीब 9,200 करोड़ रुपये है। इस एल्युमिनियम स्मेल्टिंग संयंत्र की सालाना क्षमता 350 किलो टन होगी। साथ ही 900 मेगावाट की कैप्टिव ऊर्जा इकाई भी लगाई जानी है। प्रस्तावित 900 मेगावाट की कैप्टिव ऊर्जा इकाई के लिए कोयले की आपूर्ति महान कोल ब्लाक से की जाएगी। इस ब्लाक का आबंटन हिंडाल्को और एस्सार पावर लिमिटेड के संयुक्त उद्यम महान कोल लिमिटेड को किया गया है।

वर्ल्ड बैंक से फंडिंग और सर्वोच्च न्यायालय की अवहेलना, यही है मेधा पाटकर की कहानी सरदार सरोवर नर्मदा नदी पर बना 800 मीटर ऊँचा बांध है। नर्मदा बचाओ आंदोलन चलाकर मेधा पाटकर ने इस परियोजना का लगातार विरोध किया, जिसकी वजह से यह परियोजना छ: साल तक लटकी रही। 1988 में योजना आयोग ने सरदार सरोवर परियोजना का बजट 6406़04 करोड़ रुपए निर्धारित किया था, लेकिन मेधा पाटकर के विरोध के कारण इस परियोजना की लागत बढते-बढ़ते वर्ष 2008 तक 39, 240़45 करोड़ रुपए हो गई। मेधा पाटकर ने इस परियोजना को वनवासियों के लिए नुकसानदायक बताया था, लेकिन आज इस परियोजना के कारण ही दाहोद जिले में नर्मदा नदी से वनवासी फल व सब्जियों की खेती कर रहे हैं। मेधा ने पुनर्वास का मुद्दा उठाकर गुजरात से लेकर दिल्ली तक धरना-प्रदर्शन करते हुए इस परियोजना को ठप कर दिया था, लेकिन आज यह परियोजना पूरा होने को है और कोई भी व्यक्ति बेघर नहीं हुआ है। बल्कि गुजरात सरकार के पुनर्वास कार्यक्रम को पूरी दुनिया ने सराहा है।

बार-बार अदालत के जरिए मेधा पाटकर परियोजना को लटकाती रहीं, लेकिन अक्तूबर 2000 में सर्वोच्च न्यायालय न् ो सरदार सरोवर बांध परियोजना को रोकने से मना कर दिया। इसके बाद मेधा पाटकर, उनके वकील प्रशांत भूषण एवं वामपंथी लेखिका अरुंधती राय ने देश की सवार्ेच्च अदालत पर ही हमला बोल दिया। इन तीनों ने फरवरी 2001 में फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रदर्शन किया। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे अदालत की अवमानना माना और तीनों को दोषी ठहराते हुए क्षमा मांगने को कहा। अरुंधती राय ने अदालत से माफी मांगने से इंकार कर दिया और मीडिया के जरिए सर्वोच्च न्यायालय पर हमला बोल दिया। इसके बाद मार्च 2002 में सर्वोच्च न्यायालय ने अरुंधती को एक दिन के लिए जेल की सजा सुना दी।
सरदार सरोवर परियोजना का उद्देश्य गुजरात के सूखाग्रस्त इलाकों में पानी पहुंचाना और मध्य प्रदेश के लिए बिजली पैदा करना है। हाल ही में मोदी सरकार ने नर्मदा बांध की ऊंचाई 17 मीटर बढ़ाने की अनुमति प्रदान कर दी, जिसे पिछली यूपीए सरकार वषोंर् से रोके पड़ी थी। कंक्रीट से बने बांध की करीब 122 मीटर ऊंचाई तक का निर्माण काम पूरा हो चुका है। इस पर करीब 17 मीटर ऊंचे दरवाजे लगाकर इसकी ऊंचाई को 138 मीटर किया जाना है। गेट लगाने से इस बांध के पानी की संग्रहण क्षमता 9 मिलियन घन फीट बढ़ेगी। साथ ही, 6़8 लाख हेक्टेयर की अतिरिक्त सिंचाई क्षमता सृजित होगी तथा 40 प्रतिशत अधिक बिजली का उत्पादन होगा। इस निर्णय से गुजरात के साथ-साथ मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र व राजस्थान को सिंचाई व पीने का पानी मिलेगा, वहीं मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र व गुजरात को 1450 मेगावाट बिजली भी मिलेगी।

गुजरात सरकार के मुताबिक, बांध की ऊंचाई नहीं बढ़ने और इस पर गेट नहीं लगने से सालाना 3 हजार 788 करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है। लेकिन इससे मेधा पाटकर को क्या, उन्होंने सरकार के इस फैसले का फिर से विरोध करने की घोषणा कर दी है।

आखिर सवाल उठता है कि मेधा पाटकर 80 के दशक से ही सरदार सरोवर बांध का विरोध क्यों कर रही हैं। इसके पीछे की सच्चाई यह है कि ऊर्जा की बड़ी जरूरत को पूरा करने वाली इस पूरी परियोजना को रोकने में अमरीका और वर्ल्ड बैंक की जबरदस्त भूमिका है। इंटरनेशनल एन्वायरन्मेंट कम्युनिटी ने 1987 व 1989 में मेधा पाटकर की दो अमरीकी यात्राओं को फंड किया था। एन्वायरन्मेंट डिफेंस फंड के लोरी उडाल ने मेधा पाटकर और वर्ल्ड बैंक अधिकारियों के बीच बैठक का आयोजन किया था। उडाल ने ही भारत के गुजरात में निर्मित होने वाले इस बांध को रोकने के लिए उत्तरी अमरीका, यूरोप, जापान और आस्ट्रेलिया में नर्मदा एक्शन कमेटी का निर्माण व विस्तार किया था, जिसका कुल मकसद पर्यावरण व पुनर्वास के नाम पर इस पूरी परियोजना को बंद कराने का था ताकि भारत ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर न बन सके।
परमाणु ऊर्जा विरोधी पी. उदयकुमार
तमिलनाडु के तिरुनेवेली जिले में स्थित कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र रूस के सहयोग से लगना है। आर्थिक संकट में फंसा अमरीका इस संयंत्र का ठेका चाहता था, लेकिन बाजी रूस के हाथ लग गई। जिसके बाद अमरीकी चंदे से कुछ एनजीओ व बुद्घिजीवियों को इसके विरोध में खड़ा किया गया, जिसमें सबसे बड़ा नाम पी़. उदयकुमार का है। पी. उदयकुमार देश के एनजीओ के सबसे बड़े ब्रांड बने अरविंद केजरीवाल की आप पार्टी से कन्याकुमारी से लोकसभा चुनाव लड़ चुके हैं। पी. उदयकुमार ने विदेशी सहयोग से सड़क से लेकर अदालत तक इस परियोजना को रोकने की जबरदस्त कोशिश की, लेकिन आखिर में 6 मई 2013 को देश की सबसे बड़ी अदालत सर्वोच्च न्यायालय ने इन अमरीकी एजेंटों को निराश कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने कुडनकुलम परमाणु प्लांट को यह कहते हुए मंजूरी दे दी कि प्लांट लोगों के कल्याण और विकास के लिए है। सर्वोच्च न्यायालय ने दलील दी है कि देश और लोगों के विकास को देखते हुए इस प्लांट पर रोक नहीं लगाई जा सकती है। वर्तमान और भविष्य में देश में परमाणु प्लांट की जरूरत है। इसलिए कुडनकुलम प्लांट को बंद नहीं किया जा सकता है।

इस परियोजना को रोकने में अमरीकी दिलचस्पी का खुलासा खुद पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने किया था। पूर्व प्रधानमंत्री ने साइंस पत्रिका को दिए अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि, परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम इन एनजीओ के चलते समस्या में पड़ गया है। इन एनजीओ में से अधिकांश अमरीका के हैं। वे बिजली आपूर्ति बढ़ाने की हमारे देश की जरूरत को नहीं समझते।

 जिन पर उठती रही उंगलियां
व्यक्ति संस्थाएं

- अरविंद केजरीवाल ल्ल ग्रीनपीस
- सी. उदय कुमार ल्ल एक्शन एड
- तीस्ता सीतलवाड़ ल्ल कबीर
- स्वामी अग्निवेश ल्ल सबरंग ट्रस्ट
- अरुणा रोड्रिग्ज ल्ल सिटीजन मनीष सिसौदिया फॅार जस्टिस
- सुमन सहाय एण्ड पीस

आंदोलन से प्रभावित योजनाएं/कार्य
- न्यूक्लियर पावर प्लांट्स
- यूरेनियम खनन
- कोयले से चलने वाले ऊर्जा संयंत्र (सीएफपीपीएस)
- मेगा इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट्स (पॉस्को व वेदान्ता)
- नर्मदा सागर बांध
- अरुणाचल प्रदेश में लघुविद्युत परियोजनाएं

भगवान विष्णु के दस अवतार



हिन्दू धर्म ग्रंथों में लिखे एक-एक लाइन का वैज्ञानिक आधार है.... बशर्ते उसे समझने की अक्ल होनी चाहिए.....!


पुराणोँ को ध्यान से पढ़ने के पश्चात मालूम चलता है कि इसमेँ अधिकांश बातें वैज्ञानिक और प्राकृतिक है .. जिसे कहीं मानवीकरण के द्वारा तो कहीं रूप-अलंकार के द्वारा बताया गया है।

उदाहरण के तौर पर... भगवान विष्णु के सभी अवतारों को हम आधुनिक क्रमिक विकास से संबंधित कर सकते हैं ...!

विष्णु अवतार के ये विभिन्न अवतार हमें धरती पर प्रभुत्व वाले जीवोँ की जानकारी देते हैं ..... जो धरती पर विभिन्न कालों में राज किया करते थे ।

1. प्रथम अवतार ......"मत्स्य"........एक जीव है जो केवल पानी में रहते हैं.. और, वैष्णव के अनुसार धरती पर जीव की उत्पत्ति समुद्र के झाग या मिनरल से हुई थी ।

2. दूसरा अवतार....... "कुर्मा"...... एक जीव है ... जो पानी और भूमि ( उभयचर ) दोनों जगहों में रह सकता है... तथा, इसी प्रकार के जीवोँ से धरती पर अन्य जीवोँ की भी उत्पत्ति मानी जाती है ।

3. तीसरा अवतार... "वाराह"....एक जीव है.. जो केवल जमीन पर रहते हैं ( स्विमिंग करने की क्षमता के साथ )
वाराह का मतलब .....कुछ लोग सूकर अवतार समझ लेते हैँ..... जो कि पूर्णतया गलत है.....!
वाराह का मतलब ....... वैसा कोई भी सामान जो जल्दी फैल जाता हो या फैलने के गुण रखने वाला जानवर या सामान.....!
इसीलिए , वाराह शब्द का प्रयोग ब्रह्माण्ड में भी होता है ।
परन्तु, यहाँ अवतारों में वाराह..... "डायनासोर" जैसे जीव को कहा गया है ।

4. चौथा अवतार....... नरसिम्हा...... आधा शेर और आधे मानव...... एक अवस्था होमो शेपियनंस और जानवरों के बीच की है ..... जिसे आप आदिमानव भी कह सकते हो...!

5. पांचवें अवतार....... "वामन"....... छोटे कद के साथ..... होमो सेपियंश .

6. छठा अवतार....... परशुराम...... किसी न किसी रूप में कठिन मानव ( कुल्हाड़ी के साथ राम ) ..... आप इन्हें शिकारी मानव भी कह सकते हो...!

7. सातवां अवतार ...... श्री राम........ सही सभ्य मानव ( एक धनुष और महान प्रथाओं के साथ राम )

8. आठवां अवतार...... भगवान श्रीकृष्ण..... अलौकिक बुद्धिमता (मूल अभिव्यक्ति) वाले .... ये धरती के प्रखर बुद्धिमता और राज-सत्ता एवं सामाजिक चेतना का प्रतिनिधित्व करते हैं..!

9. नौवां अवतार .... बलराम...... व्यावसायिक कौशल के साथ मानव ( हल के साथ बलराम ,कृषि और व्यवसाय को दर्शाते हैं )

नौवां अवतार दक्षिण भारत के विष्णु अवतार मेँ बलराम को कहा जाता है जो कृषक या व्यापारी वर्ग के रक्षक और उनके देवता माने जाते हैँ ।

जबकि उत्तर भारत के विष्णु अवतार मेँ नौवां अवतार बुध का आता है.... और, ये भी बलराम की तरह व्यापारी वर्ग के देवता हैँ .....और. व्यापारियोँ के रक्षक हैं।
इनके नाम से एक ग्रह का नाम भी बुध है ।

हालाँकि.... कुछ लोग विष्णु के नौवें अवतार को "गौतम बुद्ध" का नाम बताते हैँ या समझ जाते है .... जो कि सही प्रतीत नहीं होता है

क्योंकि ... धरती पर शिकार युग के समाप्ति के पश्चात् व्यापार की ही महत्ता बढ़ी है... और, इसी व्यापार ने हमारे भारत को सोने की चिड़िया बनाया ...!

साथ ही.... अगर गौतम बुद्ध ही विष्णु के नौवें अवतार होते तो..... बौद्ध एक संप्रदाय नहीं होता बल्कि, वो सनातन धर्म ही कहलाता ....!

10. दसवीं अवतार...... कल्कि (the mighty worrior)..... apocalyptic ( जो इस महायुग का अंत होगा ! )

इस तरह हम देखते हैं .... आज के हजारों-लाखों साल पहले ही.... हमारे ऋषि-मुनियों ने .... इस पृथ्वी के क्रमिक विकास को अवतारों के माध्यम से समझाने का प्रयास किया था....!

परन्तु, दुर्भाग्य से कालांतर में .... हम हिन्दू अपने गौरवशाली अतीत को भुला बैठे ....

इसीलिए, जागो हिन्दुओं ... और , पहचानो अपने आपको....

जय महाकाल...!!!
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विष्णु के दस अवतार

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। 
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानमं सृजाम्यहम्।।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। 
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।। 
(श्रीमद्भाग्वद् गीता 4/7-8)

हिन्दूओं का विशवास है कि सृष्टि में सभी प्राणी पूर्वनिश्चित धर्मानुसार अपने अपने कार्य करते  रहते हैं और जब कभी धर्म की हानि की होती है तो सृष्टिकर्ता धर्म की पुनः स्थापना करने के लिये धरती पर अवतार लेते हैं। मुख्यतः आज तक सृष्टि पालक भगवान विष्णु नौ बार धरती पर अवतरित हो चुके हैं और दसवीं बार अभी हों गे। सभी अवतारों की कथायें पुराणों में विस्तार पूर्वक संकलित हैं। उन का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार हैः –
मत्स्य अवतार – एक बार राजा सत्यव्रत कृतमाला नदी के तट पर तर्पण कर रहे थे तो एक छोटी मछली उन की अंजली में आकर विनती करने लगी कि वह उसे बचा लें। राजा सत्यव्रत ने एक पात्र में जल भर कर उस मछली को सुरक्षित कर दिया किन्तु शीघ्र ही वह मछली पात्र से भी बड़ी हो गयी। राजा ने मछली को क्रमशः तालाब, नदी और अंत में सागर के अन्दर रखा पर हर बार वह पहले से भी बड़े शरीर में परिवर्तित होती गयी। अंत में मछली रूपी विष्णु ने राजा सत्यव्रत को एक महाभयानक बाढ़ के आने से समस्त सृष्टि पर जीवन नष्ट हो जाने की चेतावनी दी।  तदन्तर राजा सत्यव्रत ने एक बड़ी नाव बनवायी और उस में सभी धान्य, प्राणियों के मूल बीज भर दिये और सप्तऋषियों के साथ नाव में सवार हो गये। मछली ने नाव को खींच कर पर्वत शिखर के पास सुरक्षित पहँचा दिया। इस प्रकार मूल बीजों और सप्तऋषियों के ज्ञान से महाप्रलय के पश्चात सृष्टि पर पुनः जीवन का प्रत्यारोपन हो गया। इस कथा का विशलेशन हज़रत नोहा की आर्क के साथ किया जा सकता है जो बाईबल में संकलित है। यह कथा डी एन ऐ सुरक्षित रखने की वैज्ञानिक क्षमता की ओर संकेत भी करती है जिस की सहायता से सृष्टि के विनाश के बाद पुनः उत्पत्ति करी जा सके।

कुर्मा अवतार – महाप्रलय के कारण पृथ्वी की सम्पदा जलाशाय़ी हो गयी थी। अतः भगवान विष्णु ने कछुऐ का अवतार ले कर सागर मंथन के समय पृथ्वी की जलाशाय़ी सम्पदा को निकलवाया था। वैज्ञानिक भी कहते हैं कि आईस ऐज के बाद सृष्टि का पुनरर्निमाण हुआ था। पौराणिक सागर मंथन की कथानुसार सुमेरु पर्वत को सागर मंथन के लिये इस्तेमाल किया गया था। माऊंट ऐवरेस्ट का ही भारतीय नाम सुमेरू पर्वत है तथा नेपाल में उसे सागर मत्था कहा जाता है। जलमग्न पृथ्वी से सर्व प्रथम सब से ऊँची चोटी ही बाहर प्रगट हुयी होगी। यह तो वैज्ञानिक तथ्य है कि सभी जीव जन्तु और पदार्थ सागर से ही निकले हैं। अतः उसी घटना के साथ इस कथा का विशलेशन करना चाहिये।

वराह अवतार – भगवान विष्णु ने दैत्य हिरणाक्ष का वध करने के लिये वराह रूप धारण किया था तथा उस के चुंगल से धरती को छुड़वाया था। पौराणिक चित्रों में वराह भगवान धरती को अपने दाँतों के ऊपर संतुलित कर के सागर से बाहर निकाल कर ला रहे होते हैं। वराह को पूर्णतया वराह (जंगली सूअर) के अतिरिक्त कई अन्य चित्रों में अर्ध-मानव तथा अर्ध-वराह के रूप में भी दर्शाया जाता है। वराह अवतार के मानव शरीर पर वराह का सिर और चार हाथ हैं जो कि भगवान विष्णु की तरह शंख, चक्र, गदा और पद्म लिये हुये दैत्य हिरणाक्ष से युद्ध कर रहे हैं। विचारनीय वैज्ञानिक तथ्य यह है कि सभी प्राचीन चित्रों में धरती गोलाकार ही दर्शायी जाती है जो प्रमाण है कि आदि काल से ही हिन्दूओं को धरती के गोलाकार होने का पता था। इस अवतार की कथा का सम्बन्ध महाप्रलय के पश्चात सागर के जलस्तर से पृथ्वी का पुनः प्रगट होना भी है।

नर-सिहं अवतार – भगवान विष्णु ने नर-सिंह (मानव शरीर पर शेर का सिर) के रूप में अवतरित  हो कर दैत्यराज हिरण्यकशिपु का वध किया था जिस के अहंकार और क्रूरता ने सृष्टि का समस्त विधान तहस नहस कर दिया था। नर-सिंह एक स्तम्भ से प्रगट हुये थे जिस पर हिरण्यकशिपु ने गदा से प्रहार कर के भगवान विष्णु की सर्व-व्यापिक्ता और शक्ति को चुनौती दी थी। यह अवतार इस धारणा का प्रतिपादन करता है कि ईश्वरीय शक्ति के लिये विश्व में कुछ भी करना असम्भव नहीं भले ही वैज्ञानिक तर्क से ऐसा असम्भव लगे।
वामन अवतार – वामन अवतार के रूप नें भगवान विष्णु मे दैत्यराज बलि से तीन पग पृथ्वी दान में मांगी थी।  राजा बलि ने दैत्यगुरू शुक्राचार्य के विरोध के बावजूद जब वामन को तीन पग पृथ्वी देना स्वीकार कर लिया तो वामन ने अपना आकार बढ़ा लिया और दो पगों में आकाश और पाताल को माप लिया। जब तीसरा पग रखने के लिये कोई स्थान ही नहीं बचा तो प्रतिज्ञा पालक बलि ने अपना शीश तीसरा पग रखने के लिये समर्पित कर दिया। विष्णु ने तीसरे पग से बलि को सुतल-लोक में धंसा दिया परन्तु उस की दान वीरता से प्रसन्न हो कर राजा बलि को अमर-पद भी प्रदान कर दिया। आज भी बलि सुतुल-लोक के स्वामी हैं। दक्षिण भारत में इस कथा को पोंगल त्योहार के साथ जोडा जाता है।

परशुराम अवतार – परशुराम का विवरण रामायण तथा महाभारत दोनो महाकाव्यों में आता है। वह ऋषि जमदग्नि के पुत्र थे और उन्हों ने भगवान शिव की उपासना कर के एक दिव्य परशु (कुलहाड़ा) वरदान में प्राप्त किया था। एक बार राजा कृतवीर्य अर्जुन सहस्त्रबाहु अपनी सैना का साथ जमदग्नि के आश्रम में आये तो ऋषि ने उन का आदर सत्कार किया। ऋषि ने सभी पदार्थ कामधेनु दिव्य गाय की कृपा से जुटाये थे। इस से आश्चर्य चकित हो कर कृतवीर्य ने अपने सैनिकों को ज़बरदस्ती ऋषि की गाय को ले जाने का आदेश दे दिया। अंततः परशुराम ने कृतवीर्य तथा उस की समस्त सैना का अपने परशु से संहार किया। तदन्तर कृतवीर्य के पुत्रों ने ऋषि जमदग्नि का वध कर दिया तो परशुराम ने कृतवीर्य और समस्त क्षत्रिय जाति का विनाश कर दिया और पूरी पृथ्वी उन से छीन कर ऋषि कश्यप को दान कर दी। सम्भवतः बाद में कश्यप ऋषि के नाम से ही उन के आश्रम के समीप का सागर कश्यप सागर (केस्पीयन सी) के नाम से आज तक जाना जाता है। पूरा कथानांक  प्रचीन इतिहास अपने में छुपाये हुये है। परशुराम अवतार राजाओं के अत्याचार तथा निरंकुश्ता के विरुध शोषित वर्ग का प्रथम शक्ति पलट अन्दोलन था। परशुराम अवतार ने शासकों को अधिकारों के दुरुप्योग के विरुध चेताया और आज के संदर्भ में भी इसी प्रकार के अवतार की पुनः ज़रूरत है।

राम अवतार - परशुराम अवतार राजसत्ता के दुरुप्योग के विरुध शोषित वर्ग का आन्दोलन था तो भगवान विष्णु ने ऐक आदर्श राजा तथा आदर्श मानव की मर्यादा स्थापित करने के लिये राम अवतार लिया। राम का चरित्र हिन्दू संस्कृति में एक आदर्श मानव, भाई, पति, पुत्र के अतिरिक्त राजा के व्यवहार का भी कीर्तिमान है। अंग्रेजी साहित्य के लेखक टोमस मूर ने पन्द्रवीं शताब्दी में आदर्श राज्य के तौर पर एक यूटोपिया राज्य की केवल कल्पना ही करी थी किन्तु राम राज्य टोमस मूर के काल्पनिक राज्य से कहीं अधिक वास्तविक आदर्श राज्य स्थापित हो चुका था। राम का इतिहास समेटे रामायण विश्व साहित्य का प्रथम महाकाव्य है।
कृष्ण अवतार – कृष्ण अवतार का समय आज से लगभग 5100 वर्ष या ईसा से 3102 वर्ष पूर्व का माना जाता है। कृष्ण ने महाभारत युद्ध में एक निर्णायक भूमिका निभाय़ी और उन के दुआरा गीता का ज्ञान अर्जुन को दिया जो कि संसार का सब से सक्ष्म दार्शनिक वार्तालाप है। कृष्ण के इतिहास का वर्णन महाभारत के अतिरिक्त कई पुराणों तथा हिन्दू साहित्य की पुस्तकों में भी है। उन के बारे में कई सच्ची तथा काल्पनिक कथायें भी लिखी गयी हैं। कृष्ण दार्शनिक होने के साथ साथ एक राजनीतिज्ञ्, कुशल रथवान, योद्धा, तथा संगीतिज्ञ् भी थे। उन को 64 कलाओं का ज्ञाता कहा जाता है और सोलह कला सम्पूर्ण अवतार कहा जाता है। कृष्ण को आज के संदर्भ में पूर्णत्या दि कम्पलीट मैन कहा जा सकता है।

बुद्ध अवतार – विष्णु ने सिद्धार्थ गौतम बुद्ध के रूप में जन-साधारण को पशु बलि के विरुध अहिंसा का संदेश देने के लिये अवतार लिया। भारतीय शिल्प कला में सब से अधिक मूर्तियां भगवान बुद्ध की ही हैं। आम तौर पर बौध मत के अनुयायी गौतम बुद्ध के अतिरिक्त बुद्ध के और भी बोधिसत्व अवतारों को मानते हैं।
कलकी अवतार –विष्णु पुराण में सैंकड़ों वर्ष पूर्व ही भविष्यवाणी की गयी है कि कलियुग के अन्त में कलकी महा-अवतार होगा जो इस युग के अन्धकारमय और निराशा जनक वातावरण का अन्त करे गा। कलकी शब्द सदैव तथा समय का पर्यायवाची है। कलकी अवतार की भविष्यवाणी के कई अन्य स्त्रोत्र भी हैं।

 अवतार-वाद
 हिन्दू् धर्म में हर कोई अपने आप में ईश्वरीय छवि का आभास कर सकता है तथा ईश्वर से बराबरी भी कर सकता है। इतने पर भी संतोष ना हो तो अपने आप को ही ईश्वर घोषित कर के अपने भक्तों का जमावड़ा भी इकठ्ठा कर सकता है। हिन्दू् धर्म में ईश्वर से सम्पर्क करने के लिये किसी दलाल, प्रतिनिधि या ईश्वर के किसी बेटे-बेटी की मार्फत से नहीं जाना पड़ता। ईश्वरीय-अपमान (ब्लासफेमी) का तो प्रश्न ही नहीं उठता क्यों कि हिन्दू धर्म में पूर्ण स्वतन्त्रता है।

हिन्दू् धर्म में हर कोई अपने विचारों से अवतार-वाद की व्याख्या कर सकता है। कोई किसी को अवतार माने या ना माने इस से किसी को भी कोई अन्तर नहीं पड़ता। सभी हिन्दू धर्म के मत की छत्र छाया तले समा जाते हैं। हिन्दू धर्माचार्यों ने  अवतार वाद की कई व्याख्यायें प्रस्तुत की हैं। उन में समानतायें, विषमतायें तथा विरोधाभास भी है।

सृष्टि की जन्म प्रक्रिया - एक मत के अनुसार भगवान विष्णु के दस अवतार सृष्टि की जन्म प्रक्रिया को दर्शाते हैं। इस मतानुसार जल से सभी जीवों की उत्पति हुई अतः भगवान विष्णु सर्व प्रथम जल के अन्दर मत्स्य रूप में प्रगट हुये। फिर कुर्मा बने। इस के पश्चात वराह, जो कि जल तथा पृथ्वी दोनो का जीव है। नरसिंह, आधा पशु – आधा मानव, पशु योनि से मानव योनि में परिवर्तन का जीव है। वामन अवतार बौना शरीर है तो परशुराम एक बलिष्ठ ब्रह्मचारी का स्वरूप है जो राम अवतार से गृहस्थ जीवन में स्थानांतरित हो जाता है। कृष्ण अवतार एक वानप्रस्थ योगी, और बुद्ध परियावरण का रक्षक हैं। परियावरण के मानवी हनन की दशा सृष्टि को विनाश की ओर धकेल देगी। अतः विनाश निवारण के लिये कलकी अवतार की भविष्यवाणी पौराणिक साहित्य में पहले से ही करी गयी है।

मानव जीवन के विभन्न पड़ाव - एक अन्य मतानुसार दस अवतार मानव जीवन के विभन्न पड़ावों को दर्शाते हैं। मत्स्य अवतार शुक्राणु है, कुर्मा भ्रूण, वराह गर्भ स्थति में बच्चे का वातावरण, तथा नर-सिंह नवजात शिशु है। आरम्भ में मानव भी पशु जैसा ही होता है। वामन बचपन की अवस्था है, परशुराम ब्रह्मचारी, राम युवा गृहस्थी, कृष्ण वानप्रस्थ योगी तथा बुद्ध वृद्धावस्था का प्रतीक है। कलकी मृत्यु पश्चात पुनर्जन्म की अवस्था है।
राजशक्ति के दैविक सिद्धान्त - कुछ विचारकों के मतानुसार राजशक्ति के दैविक सिद्धान्त को बल देने के लिये कुछ राजाओं ने अपने कृत्यों के आश्रचर्य चकित करने वाले वृतान्त लिखवाये और कुछ ने अपनी वंशावली को दैविक अवतारी चरित्रों के साथ जोड़ लिया ताकि वह प्रजा उन के दैविक अधिकारों को मानती रहे। अवतारों की कथाओं से एक और तथ्य भी उजागर होता है कि खलनायक भी भक्ति तथा साधना के मार्ग से दैविक शक्तियां प्राप्त कर सकते थे। किन्तु जब भी वह दैविक शक्ति का दुर्पयोग करते थे तो भगवान उन का दुर्पयोग रोकने के लिये अवतार ले कर शक्ति तथा खलनायक का विनाश भी करते थे।

भूगोलिक घटनायें - एक प्राचीन यव (जावा) कथानुसार एक समय केवल आत्मायें ही यव दूइप पर निवास करती थीं। जावा निवासी विशवास करते हैं कि उन की सृष्टि स्थानांतरण से आरम्भ हुयी थी। वराह अवतार कथा में दैत्य हिरण्याक्ष धरती को चुरा कर समुद्र में छुप गया था तथा वराह भगवान धरती को अपने दाँतों के ऊपर समतुलित कर के सागर से बाहर निकाल कर लाये थे। कथा और यथार्थ में कितनी समानता और विषमता होती है इस का अंदाज़ा इस बात मे लगा सकते हैं कि जावा से ले कर आस्ट्रेलिया तक सागर के नीचे पठारी दूइप जल से उभरते और पुनः जलग्रस्त भी होते रहते हैं। आस्ट्रेलिया नाम आन्ध्रालय (आस्त्रालय) से परिवर्तित जान पडता है। यव दूइप पर ही संसार के सब से प्राचीन मानव अस्थि अवशेष मिले थे। पौराणिक कथाओं में भी कई बार दैत्यों ने देवों को स्वर्ग से निष्कासित किया था। इस प्रकार के कई रहस्य पौराणिक कथाओं में छिपे पड़े हैं।

मानना, ना मानना - निजि निर्णय
अवतारवाद का मानना या ना मानना प्रत्येक हिन्दू का निजि निर्णय है। कथाओं का सम्बन्ध किसी भूगौलिक, ऐतिहासिक घटना, अथवा किसी आदर्श के व्याखीकरण हेतु भी हो सकता है। हिन्दू धर्म किसी को भी किसी विशेष मत के प्रति बाध्य नहीं करता। जितने हिन्दू ईश्वर को साकार तथा अवतारवादी मानते हैं उतने ही हिन्दू ईश्वर को निराकार भी मानते हैं। कई हिन्दू अवतारवाद में आस्था नहीं रखते और अवतारी चरित्रों को महापुरुष ही मानते हैं। इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि अवतारी कथाओं में मानवता का इतिहास छुपा है।
कारण कुछ भी हो, निश्चित ही अवतारों की कथाओं में बहुत कुछ तथ्य छिपे हैं। अवश्य ही प्राचीन हिन्दू संस्कृति अति विकसित थी तथा पौराणिक कथायें इस का प्रमाण हैं। पौराणिक कथाओं का लेखान अतिश्योक्ति पूर्ण है अतः साहित्यक भाषा तथा यथार्थ का अन्तर विचारनीय अवश्य है। साधारण मानवी कृत्यों को महामानवी बनाना और ईश्वरीय शक्तियों को जनहित में मानवी रूप में प्रस्तुत करना हिन्दू धर्म की विशेषता रही है।
साभार : चाँद शर्मा, http://hindumahasagar.wordpress.com