शनिवार, 12 जुलाई 2014

प्रथम गुरु हमेशा ही माता होती है




प्रथम गुरु हमेशा ही माता होती है !
कुछ परिस्थितों में पालनहार भी प्रथम गुरु होता है !!

माता-पिता हमारे सर्वप्रथम गुरु हैं

विष्णु महाराज 


शास्त्र कहते हैं कि गुरु वह है, जो हमें अंधेरे से उजाले की ओर ले जाए। जो हमें रोशनी प्रदान करे। तो सबसे पहले ऐसा कौन करता है? सबसे पहले यह रोशनी हमें माँ दिखाती है। उसके बाद पिता। वही हमारे प्रथम गुरु हैं। इसीलिए शास्त्रों में यह भी लिखा है कि माता-पिता का यथायोग्य सम्मान करना चाहिए। जरा सोचो कि अगर हमें हमारे माता-पिता द्वारा कुछ भी सिखाया न जाता तो हमारी क्या स्थिति होती। क्या हम ढंग से चल पाते, बात कर पाते, लिख पाते, व्यवसाय कर पाते! यहाँ तक कि हम अपने जीवन और इस शरीर की रक्षा कैसे करना है, यह भी नहीं जान पाते। मान-अपमान, प्यार और अहंकार जैसी मूल वृत्तियों को पहचानना भी हमें वही सिखाते हैं।

लेकिन जब हम यौवन और सार्मथ्य प्राप्त कर लेते हैं, तब अपने उन्हीं माता-पिता को हम तिरस्कार की निगाहों से देखते हैं। कई महानुभाव तो यह भी सोचते हैं कि अब हमें इनकी क्या आवश्यकता है। बूढ़े माता-पिता यदि किसी कारणवश अस्वस्थ हो जाएं तो वे हमें बोझ लगने लगते हैं। तब हमें यह बात याद भी नहीं रहती कि बचपन में हमारे बीमार होने पर कैसे वे रात-रात जाग कर माथे पर पट्टी करते थे।

आजकल बहुत सारे गुरु और सद्गुरु हो गए हैं। उन्होंने माता-पिता की गुरुता की ओर से हमारा ध्यान हटा दिया है। हम माता-पिता के ही चरणों में बैठे रहेंगे तो उनकी कीर्ति कैसे फैलेगी। इसलिए वे परमात्मा से मिलाने और जीवन का सच्चा ज्ञान दिलाने वाले सद्गुरु का महत्व बता कर असल में अपने महत्व की ओर ध्यान खींचने की कोशिश करते हैं।

यहाँ पर यह मत समझो कि हमें जीवित रखना हमारे माता-पिता का अपना स्वार्थ था, उनकी मजबूरी थी। नहीं, यह उनका प्रेम था हमारे प्रति। जैसे उनके माता पिता ने उन्हें प्रेम किया था, वैसे ही वे हम पर प्रेम उडे़लते हैं। तो यह दूसरे गुरुओं के लिए भी एक सीख है, उदाहरण है। जो सच्चा गुरु है वह भी अपने शिष्य को संतान के ही समान प्यार करता है, उसे जीवन की रोशनी दिखाने के लिए उसी तरह रात-दिन सिरहाने बैठा रह सकता है। लेकिन इधर हमने भी पाश्चात्य संस्कृति की हवा खा ली है और गुरुओं ने भी। इसलिए आजकल जगह-जगह पर अनेक प्रकार के गुरुओं-सद्गुरुओं के आश्रम खुल गए हैं और दूसरी ओर वृद्धाश्रमों की भरमार हो गई है।

एक कहानी है जो हम सब ने सुन रखी होगी- श्रवण कुमार की। वे अपने बूढ़े माता-पिता (जो अंधे थे, चलने में सक्षम नहीं थे) को उठा कर तीर्थ यात्रा पर ले गए थे, उनकी इच्छानुसार। मार्ग में एक जगह जब माता-पिता ने जल पीने की इच्छा व्यक्त की तो वह जल भरने के लिए गए, जहाँ पर दशरथ महाराज के तीर से उसकी मृत्यु हो गई। श्रवण कुमार के पिता के श्राप की वजह से दशरथ को भी पुत्र का वियोग सहना पड़ा और उसी के विरह में तड़पते हुए वे भगवत धाम को गए।

भगवान प्रसन्न होते हैं आपसे, अगर आप अपने माता-पिता की बात मानें, उनकी सेवा करें। भगवान को सबका पिता कहा गया है। लेकिन अगर आप जागतिक माता-पिता को प्रसन्न नहीं कर पाएंगे तो आध्यात्मिक पिता अर्थात भगवान को कैसे प्रसन्न कर पाएंगे? यदि आप माता-पिता को आप प्रसन्न नहीं कर पाते तो कोई गुरु-सद्गुरु आपको सन्मार्ग पर नहीं ले जा सकता। अगर वे प्रसन्न नहीं हैं तो भगवान भी प्रसन्न नहीं होंगे।

धर्मराज युधिष्ठिर ने महाभारत के युद्ध से पहले विपक्ष में खड़े अपने सभी सम्माननीय जनों को प्रणाम कर उनसे आशीर्वाद लिया था। भगवान राम ने भी वनवास पर जाने से पहले माता कैकयी, माता सुमित्रा, माता कौशल्या से आशीर्वाद लिया था। लेकिन माता-पिता का आशीर्वाद तभी फलता है, जब उसे पूर्ण श्रद्धा से लिया जाए। ढोंग से कुछ नहीं होगा, बात बिगड़ेगी ही। स्मरण रखिए पुत्र कुपुत्र हो सकता है, किन्तु माता-पिता कुमाता-कुपिता नहीं हो सकते।


कौन सिखाए संस्कारों का सबक? 


पालक और शिक्षक की साझा जिम्मेदारी
गायत्री शर्मा
स्कूल शिक्षा का वो मंदिर होता है, जिसमें बच्चा संस्कार, शिष्टाचार व नैतिकता का पाठ पढ़ता है। शिक्षा के इस दरबार में विद्यार्थियों को किताबी शिक्षा के साथ-साथ एक जिम्मेदार नागरिक बनने के गुर भी सिखाए जाते हैं। वर्तमान दौर में शिक्षा के व्यापक प्रचार-प्रसार व आवश्यकता को देखते हुए हर माता-पिता अपने बच्चों को अच्छे से अच्छे स्कूल में तालीम दिलाने का ख्वाब सँजोते हैं।

अपने इस ख्वाब को पूरा करते हुए दिनभर जीतोड़ मेहनत करके वो पाई-पाई बचाकर अपने बच्चों के स्कूल की फीस जुटाते हैं। बच्चे को अच्छे स्कूल में दाखिला दिलवाने के बाद अपने कर्त्तव्यों से इतिश्री करते हुए पालकगण बच्चों को संस्कारवान, जिम्मेदार व सभ्य नागरिक बनाने की सारी जिम्मेदारियाँ शिक्षकों पर थोप देते हैं।

यह सत्य है कि बच्चे की प्रथम पाठशाला उसका परिवार होता है। बच्चा जो कुछ भी सीखता है, वो अपने परिवार, परिवेश व संगति से सीखता है। बच्चों को सुधारने या बिगाड़ने में उसके माता-पिता का भी उतना ही हाथ होता है, जितना कि उसके शिक्षकों व सहपाठियों का।

  बच्चों को संस्कारवान बनाने की सबसे बड़ी व महत्वपूर्ण जिम्मेदारी माता-पिता की है। निश्चित तौर पर पर कुछ हद तक यह जिम्मेदारी शिक्षकों की भी है परंतु विडंबना यह है कि वर्तमान में बच्चों को स्कूल व परिवार दोनों ही जगह संस्कार नहीं मिल पा रहे हैं।    

ऐसा इसलिए क्योंकि बच्चा स्कूल में तो केवल 5 से 6 घंटे बिताता है परंतु अपना शेष समय अपने घर पर बिताता है। ऐसे में माता-पिता व शिक्षक दोनों की बराबरी की जिम्मेदारी होती है कि वे अपने बच्चों को संस्कार व शिष्टाचार का सबक सिखाएँ। अकेले शिक्षकों या स्कूल प्रशासन पर सारी जिम्मेदारियाँ मढ़ना कहाँ तक उचित है?

'बच्चों को संस्कार देने की जिम्मेदारी किसकी है?' इस विषय पर हमने कई ऐसे राजनीतिज्ञों से चर्चा की, जो शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े रहे हैं। इस विषय पर उनके मत इस प्रकार हैं -

अर्चना चिटनीस (स्कूली एवं उच्च शिक्षामंत्री) :- बच्चों को संस्कारवान बनाने की सबसे बड़ी व महत्वपूर्ण जिम्मेदारी माता-पिता की है। निश्चित तौर पर कुछ हद तक यह जिम्मेदारी शिक्षकों की भी है परंतु विडंबना यह है कि वर्तमान में बच्चों को स्कूल व परिवार दोनों ही जगह संस्कार नहीं मिल पा रहे हैं।

'चाइल्ड डेवलपमेंट' यह एक ऐसा नाजुक सॉफ्टवेयर है, जो हमारी लाइफ स्टाइल से संचालित होता है। हमारे बच्चे बहुत सारी चीजें औपचारिक व अनौपचारिक तौर पर हमारी लाइफ स्टाइल से ही सीखते हैं।

कल तक संयुक्त परिवारों का प्रचलन था, जिनमें माँ-बाप के द्वारा बच्चों को दिए गए संस्कारों में कमी होने पर घर के बड़े-बुजुर्ग उस कमी को पूरा कर देते थे। उस वक्त छोटी-छोटी बातों के माध्यम से बच्चों को संस्कारों का पाठ पढ़ाया जाता था। यदि हम भारतीय त्योहारों की ही बात करें तो ये त्योहार भी बच्चों को संस्कारों का पाठ पढ़ाने के साथ-साथ उन्हें रिश्तों के प्रति जिम्मेदार बनाते हैं।

यदि हम गौर करें तो हमारे तौर-तरीके व जीवनशैली का बहुत गहरा प्रभाव बच्चों पर पड़ता है। रही बात संस्कारों का सबक सिखाने की जिम्मेदारी थोपने की, तो मेरे अनुसार बच्चों को संस्कार देने की साझा जिम्मेदारी माता-पिता व शिक्षक दोनों की है।

  यदि शिक्षक और पालक एक-दूसरे पर आरोप मढ़ते रहे तो हम कभी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाएँगे और बच्चे संस्कारवान के बजाय संस्कारहीन बनते जाएँगे। अब वक्त आ गया है जब दोनों वर्गों को अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन करना चाहिए।  

तुकोजीराव पवार (भूतपूर्व उच्च शिक्षामंत्री) :- बच्चों को संस्कार देने की सबसे पहली व महत्वपूर्ण जिम्मेदारी उनके माता-पिता व परिजनों की होती है क्योंकि पैदा होने के बाद बच्चा सबसे ज्यादा इन्हीं के संपर्क में रहता है। स्कूल तो वो बड़ा होने के बाद जाता है।

हालाँकि जब बच्चा स्कूल जाता है तब उसके प्रति शिक्षकों की भी जिम्मेदारियाँ होती हैं। निष्कर्ष के तौर पर कहें तो माता-पिता व शिक्षक दोनों को ही अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए बच्चे का भविष्य सँवारकर उसे संस्कारवान बनाना चाहिए।

पारस जैन (भूतपूर्व स्कूली शिक्षामंत्री) :- बच्चों को संस्कारवान बनाने में उसके परिवार का सबसे बड़ा हाथ होता है। वो संस्कार ही हैं, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित होते हैं। परिवार से संस्कारों का सबक सीखने के बाद विद्यालय की बारी आती है, जहाँ बच्चों को किताबी शिक्षा के साथ-साथ नैतिक शिक्षा का भी पाठ पढ़ाया जाता है। मेरा मानना है कि स्कूल में बच्चों को संस्कारों के साथ-साथ राष्ट्रवाद का भी पाठ पढ़ाना चाहिए, जिससे कि बच्चा एक संस्कारवान संतान व जिम्मेदार नागरिक बने।

इस चर्चा का सार केवल यही है कि यदि शिक्षक और पालक इसी प्रकार एक-दूसरे पर आरोप मढ़ते रहे तो हम कभी किसी ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाएँगे और बच्चे संस्कारवान के बजाय संस्कारहीन बनते जाएँगे।

अब वक्त आ गया है जब इन दोनों वर्गों को अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए ईमानदारी से अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन करना चाहिए तथा बच्चों के रूप में भावी नागरिकों की एक ऐसी पौध तैयार करना चाहिए, जो समाज व देश को उत्कर्ष व उन्नति के शिखर पर ले जाए।

भगवान दत्तात्रेय और चौबीस गुरु

| | भगवान दत्तात्रेय और चौबीस गुरुओं | |



त्रिशक्तियों का समन्वय हैं भगवान दत्तात्रेय

दत्तात्रेय को शिव का अवतार माना जाता है, लेकिन वैष्णवजन उन्हें विष्णु के अंशावतार के रूप में मानते हैं। उनके शिष्यों में भगवान परशुराम का भी नाम लिया जाता है। तीन धर्म (वैष्णव, शैव और शाक्त) के संगम स्थल के रूप में त्रिपुरा में उन्होंने लोगों को शिक्षा-दीक्षा दी। तंत्र से जुड़े होने के कारण दत्तात्रेय को नाथ परंपरा और संप्रदाय का अग्रज माना जाता है। इस नाथ संप्रदाय की भविष्य में अनेक शाखाएं निर्मित हुईं। भगवान दत्तात्रेय नवनाथ संप्रदाय से संबोधित किया गया है। भगवान दत्तात्रेय की जयंती मार्गशीर्ष माह में मनाई जाती है। दत्तात्रेय में ईश्वर और गुरु दोनों रूप समाहित हैं इसीलिए, उन्हें परब्रह्ममूर्ति सद्गुरु और श्रीगुरुदेवदत्त भी कहा जाता है। उन्हें गुरु वंश का प्रथम गुरु, साधक, योगी और वैज्ञानिक माना जाता है। हिंदू धर्म के त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश की प्रचलित विचारधारा के विलय के लिए ही भगवान दत्तात्रेय ने जन्म लिया था, इसीलिए उन्हें त्रिदेव का स्वरूप भी कहा जाता है। दत्तात्रेय को शैवपंथी शिव का अवतार और वैष्णवपंथी विष्णु का अंशावतार मानते हैं। भगवान दत्तात्रेय से वेद और तंत्र मार्ग का विलय कर एक ही संप्रदाय निर्मित किया था।शिक्षा और दीक्षा- भगवान दत्तात्रेय ने जीवन में कई लोगों से शिक्षा ली। दत्तात्रेय ने अन्य पशुओं के जीवन और उनके कार्यकलापों से भी शिक्षा ग्रहण की। दत्तात्रेयजी कहते हैं कि जिससे जितना-जितना गुण मिला है उनको उन गुणों को प्रदाता मानकर उन्हें अपना गुरु माना है। इस प्रकार मेरे 24 गुरु हैं। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चंद्रमा, सूर्य, कपोत, अजगर, सिंधु, पतंग, भ्रमर, मधुमक्खी, गज, मृग, मीन, पिंगला, कुररपक्षी, बालक, कुमारी, सर्प, शरकृत, मकड़ी और भृंगी। पुराणों अनुसार इनके तीन मुख, छह हाथ वाला त्रिदेवमयस्वरूप है। चित्र में इनके पीछे एक गाय तथा इनके आगे चार कुत्ते दिखाई देते हैं। औदुंबर वृक्ष के समीप इनका निवास बताया गया है। विभिन्न मठ, आश्रम और मंदिरों में इनके इसी प्रकार के चित्र का दर्शन होता है। भगवान दत्तात्रेय के चित्र से उनका अद्भुत संतुलनकारी व्यक्तित्व प्रकट होता है।
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दत्तात्रेय जी के 24 गुरू
दत्तात्रेय जी ने अपने 24 गुरूओं की कथा सुनाई और कहा कि मेरी दृष्टि जहाँ भी गई, मैंने वहीं से शिक्षा ग्रहण की| 
दत्तात्रेय जी का प्रथम गुरू पृथ्वी है| पृथ्वी से मैंने उपकार और सहनशीलता ग्रहण की| पृथ्वी में यदि कोई एक दाना डाले तो वह अनंत में परिवर्तित हो जाता है| यही पृथ्वी का उपकार है| पृथ्वी के ऊपर कोई कुछ भी फेंके (कूड़ा, कचरा इत्यादि) फिर भी पृथ्वी सबको धारण करती है| यह पृथ्वी की सहनशीलता है| व्यक्ति को उपकारी एवं सहनशील होना चाहिए। पृथ्वी का एक नाम क्षमा भी है| क्षमाशील व्यक्ति प्रभु को बहुत प्रिय है|
दत्तात्रेय जी के द्वितीय गुरू वायु है| वायु का अपना कोई गन्ध नहीं है| उसको जैसा संसर्ग मिले, वह वही गुण ग्रहण कर लेती है| वायु यदि उपवन में चले तो खुशबू ग्रहण देती है और यदि नाली के पास हो तो बदबू देती है| जैसे कि अच्छे लोगों के मिलने से सुगन्ध आती है| जीवन में संग का असर अवश्य पड़ता है| अतः साधक को नित्य सत्संग में रहना चाहिए।
तृतीय गुरू आकाश है| आकाश सर्वव्यापक है| कोई भी जगह आकाश के बिना अर्थात् खाली नहीं है| इसी प्रकार आत्मा भी सर्वव्यापक हैं| चतुर्थ गुरू जल है| जल का कोई आकार नहीं होता| यह 0'c होता है| इसका तापमान बदलने से वाष्प, बर्फ इत्यादि का रूप बन जाता है| इसी प्रकार भक्तों की भक्ति की शीतलता से निराकार परमात्मा भी आकार ग्रहण कर लेता है|
पंचम गुरू अग्नि है| जिस प्रकार से अग्नि को किसी भी चीज का संसर्ग हो तो वह सबको भस्म कर देती है, उसी प्रकार से ज्ञान की अग्नि भी जीवन के सभी कर्म-समूह को भस्म कर देती है| षष्ठम गुरू चन्द्रमा है| चन्द्रमा सबको शीतलता देता है| चन्द्रमा की कलाएँ शुक्ल-पक्ष और कृष्ण-पक्ष के अनुसार घटती-बढ़ती रहती हैं, लेकिन इस घटने-बढ़ने का चन्द्रमा पर कोई प्रभाव नहीं होता| उसी प्रकार आत्मा भी विभिन्न शरीर धारण करती है लेकिन उन शरीरों की अवस्थायें परिवर्तित होने से आत्मा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता| सप्तम गुरू सूर्य है| सूर्य की प्रखर किरणें समुद्र पर पड़ती हैं, वही किरणें समुद्र का खारा पानी ग्रहण करती हैं और उस खारे पानी को मेघ बना कर अर्थात् मीठा जल बना कर पृथ्वी पर बरसाती हैं| इससे शिक्षा मिलती है कि कटुवचन सुनकर भी मीठे वचन ही बोलने चाहिए|
अष्टम गुरू कबूतर है| कबूतर ने मोह के कारण अपने बच्चे और कबूतरी के पीछे-पीछे बहेलिया के जाल में फँसकर, अपने प्राण त्याग दिए| इसी प्रकार मनुष्य भी अपने परिवार और बच्चों के मोह में फँसकर जीवन व्यर्थ गँवा देता है| भगवान का भजन नहीं करता| मोह सर्वनाशक होता है।
नवम गुरू अजगर है| मनुष्य को अजगर के समान जो भी रूखा-सूखा मिले, उसे प्रारब्ध-वश मानकर स्वीकार करें| उदासीन रहे और निरंतर प्रभु का भजन करे| मनुष्य के अन्दर अजगर की तरह मनोबल, इन्द्रियबल और देहबल तीनों ही होते हैं| अतः सन्यासी को अजगर की तरह ही रहना चाहिए|
अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम। दास 'मलुका' कह गये सबके दाता राम।।
अजगर से संतोष की शिक्षा मिलती है| यदि जीवन में संतोष रूपी धन आ गया (जब आवै संतोष धन, सब धन धूरि समान) तो सब धन बेकार है| प्रभु ने हमें जो भी दिया है वह हमारी योग्यता से नहीं बल्कि अपनी कृपा से दिया है| चाहे वह मणिमाला ही क्यों न हो| मनुष्य की तृष्णा कभी भी नहीं मिटती, उसका पेट कभी नहीं भरता| मनुष्य दूसरे के सुख को देखकर दुःखी होता है, अपने दुःख से दुःखी नहीं होता, यही सबसे बड़ी दरिद्रता है| 
दसवाँ गुरू सिन्धु (समुद्र) है| साधक को समुद्र की भाँति अथाह, अपार, असीम होना चाहिए और सदैव गम्भीर व प्रसन्न रहना चाहिए जैसे कि समुद्र में इतनी नदियों का जल आता है, परंतु समुद्र सबको प्रसन्नता व गम्भीरता से ग्रहण करता है| न तो किसी की उपेक्षा ही करता है और न ही किसी की इच्छा(कामना) ही करता है| हमें भी जो मिलता है, ईश्वर कृपा मानकर, प्रेम से स्वीकार करना चाहिए| मनुष्य के अन्दर शांति आनी चाहिए परंतु अहंकार नहीं होना चाहिए कि मेरे पास इतना कुछ है (बड़ा योगी हूँ, साधक, भक्त इत्यादि हूँ)| ग्यारहवाँ गुरू पतिंगा है| जिस प्रकार से पतंगा अग्नि के रूप पर आसक्त होकर भस्म हो जाता है, उसी प्रकार मनुष्य भी रूप की आसक्ति में फँस कर जीवन नष्ट कर देता है| रूपासक्ति भक्ति में बाधक है| सुन्दर संसार नहीं, संसार के अधिष्ठाता सुन्दर हैं| ऐसी एक कथा आती है कि ब्रह्मा जी जब सृष्टि रचने लगे तब ब्रह्मा जी के मन में आया कि सुन्दरता के बिना सृष्टि में आकर्षण भी नहीं होता| इसीलिये ब्रह्मा जी ने भी, सृष्टि रचने के लिये, भगवान से सुन्दरता माँगी थी| भगवान ने कहा कि "एक तिनका समुद्र में डाल देना| उस तिनके को समुद्र से निकालने पर उसके ऊपर जितने बिन्दु हों, उसी सिन्धु के बिन्दु की सुन्दरता से सृष्टि की रचना करना|" सुन्दरता कभी समाप्त नहीं होगी। अब सोचें कि जब सुन्दरता के सिन्धु के बिन्दु में इतना सामर्थ्य है तो फिर सिन्धु में कितना होगा? शिक्षा:-- अन्दर से तो हम सब एक हैं| शारीरिक सुन्दरता तो मात्र बाहर का पेकिंग है| वह packing किसी का golden है तो किसी का iron है| साधक को ठाकुर के सुन्दर-सुन्दर रूपों का चिंतन करके निहाल होना चाहिए और उसी में मिल जाना चाहिए| बारहवाँ गुरू मधुमक्खी है| मधुमक्खियाँ कई जगह के फूलों से रस लेकर मधु (शहद) एकत्रित करती हैं| मनुष्य को चाहिए कि जहाँ कहीं से अच्छी शिक्षा मिलती हो, ले लेना चाहिए| तेरहवाँ गुरू हाथी है| जिस प्रकार से हाथी नकली हथिनी के चंगुल के कारण पकड़ा जाता है, उसी प्रकार मनुष्य भी कामाशक्ति के कारण बन्धन में फँस जाता है| अतः मनुष्य को कामाशक्ति का त्याग करना चाहिए| चौदहवाँ गुरू मधुहा (शहद निकालने वाला) है| मधुमक्खियों ने शहद एकत्रित किया, किंतु शहद निकालने वाला संग्रहीत शहद को निकाल कर ले जाता है| इससे यह शिक्षा मिलती है कि संग्रह करने वाले उपयोग से वंचित रह जाते हैं| उपयोग दूसरा व्यक्ति करता है| अतः केवल संग्रह ही नहीं, अपितु संग्रह की गई वस्तुओं का सदुपयोग करना चाहिए|
पन्द्रहवाँ गुरू हिरण है| हिरण संगीत के लोभ में पड़कर पकड़ा जाता है क्योंकि वह कान का कच्चा होता है| मनुष्य को भी विकार पैदा करने वाला या संसार की तरफ खींचने वाला संगीत नहीं सुनना चाहिए| सोलहवाँ गुरू मछली(मीन) है| मछुआरे मछली पकड़ने के लिये डेढ़ा में धागा बाँध कर, उस धागे में एक काँटा और उस काँटे में आटे की गोली का लालच देकर मछली पकड़ते हैं| इसी प्रकार से साधक को विषयों की आसक्ति का काँटा अर्थात् लोभ खींचता रहता है जिससे कि उसकी साधना भंग हो जाती है| सत्रहवाँ गुरू वेश्या पिंगला:--एक पिंगला नाम की वेश्या थी। उसे हमेशा अपने ग्राहक की अपेक्षा, आशा, चिंता लगी रहती थी | एक दिन पिंगला पुरूष की प्रतीक्षा में बैठी थी| सन्ध्या हो गई, कोई नहीं आया| उसने विचार किया कि जैसी प्रतीक्षा जो मैंने संसार के लिये की , वैसी प्रतीक्षा जो मैंने प्रभु के लिये की होती तो मेरा कल्याण हो जाता| तब से उसने संसार की आशा को त्याग दिया| 
शिक्षा:--इसी प्रकार से मनुष्य की आशा, कामना ही उसके दुःख का कारण है| "आशा ही परमम् दुःखम्" आशा ही व्यक्ति को कमजोर बनाती है, आशा से व्यक्ति का आत्मबल चला जाता है| आशा के कारण ही व्यक्ति अपमान भी सहन करता है| आशा को त्यागने से ही जगत तमाशा लगने लगता है और व्यक्ति सामर्थ्यवान बन जाता है| उसका आत्म-विश्वास जग जाता है|
एक कवि ने लिखा है कि:-- आशा ही जीवन मरण निराशा अरू। आशा ही जगत की विचित्र परिभाषा है।। आशावश कोटिन्ह यज्ञ जप तप करत है नर। आशा ही मनुष्य की समस्त अभिलाषा है।। आशावश कोटिन्ह अपमान सहकर भी नर। बोलता बिहँसि के सुधामयी भाषा है।। आशावश जेते नर जग के तमाशा बने। तजि जिन्ह आशा तिन्ह जग ही तमाशा है।।
अठारहवाँ गुरू कुररपक्षी:---कुररपक्षी अपनी चोंच में माँस का टुकड़ा लेकर उड़ रहा था, तभी उसके पीछे कुररपक्षी से बलवान बड़ा पक्षी उसके पीछे लग गया और चोंच मार-मार कर उसको वेदना देने लगा| जब उस कुररपक्षी ने उस माँस के टुकड़े को फेंक दिया, तभी कुररपक्षी को सुख मिला| अन्य पक्षी मांस के टुकड़े की तरफ लग गये। कुररपक्षी उनके आक्रमण से मुक्त हुआ। इससे शिक्षा मिलती है कि संग्रह ही दुःख का कारण है, जो व्यक्ति शरीर या मन किसी से भी किसी प्रकार का संग्रह नहीं करता, उसे ही अनंत सुखस्वरूप परमात्मा की प्राप्ति होती है|
उन्नीसवाँ गुरू बालक:--बालक इतना सरल होता है कि उसे मान-अपमान किसी की चिंता नहीं होती| अपनी मौज में रहता है| इससे शिक्षा मिलती है कि निर्दोष नन्हें बालक की तरह, सरल, मान-अपमान से परे ही व्यक्ति ब्रह्मरूप हो सकता है और सुखी रह सकता है|
बीसवाँ गुरू कुमारी:--कुमारी से शिक्षा मिली कि साधना एकांत में होती है, चिंतन भी एकांत में होता है, यदि समूह में चर्चा हो तो वह सत-चर्चा| वही सच्चर्चा का आधार लेकर सत् परमात्मा से जुड़ जाये तो वह सत्संग है| सत् परमात्मा का ही नाम है|
एक कुमारी कन्या के वरण के लिये कुछ लोग आए थे| घर में कुमारी अकेली थी| उसने सभी का आदर-सत्कार किया| भोजन की व्यवस्था के लिये कुमारी ने घर के अन्दर धान कूटना शुरू किया जिससे कि उसके हाथ की चूड़ियाँ आवाज करने लगीं| कुमारी ने एक चूड़ी को छोड़कर बाकी सभी चूड़ियों को धीरे-धीरे हाथ से निकाल दिया और धान कूटकर, भोजन के द्वारा सभी का सत्कार किया| साधक को साधना एकांत में ही करना चाहिए| इक्कीसवाँ गुरू बाण बनाने वाला:--इससे सीखा कि आसन और श्वास को जीतकर वैराग्य और अभ्यास के द्वारा अपने मन को वश में करके, बहुत सावधानी के साथ, मन को एक लक्ष्य में लगा देना चाहिए| किसी भी कार्य को मनोयोग से करना चाहिए| एक बाण बनाने वाला अपने कार्य में इतना मग्न था कि उसके सामने से राजा की सवारी जा रही थी, किंतु उसे मालूम नहीं पड़ा कि कौन जा रहा है? 
बाईसवाँ गुरू सर्प:----सर्प से सीखा कि भजन अकेले ही करना चाहिए| मण्डली नहीं बनानी चाहिए| सन्यासी ने जब सब कुछ छोड़ दिया तो उसे आश्रम या मठ के प्रति आसक्ति नहीं होनी चाहिए| गृहस्थी को भगवत्-साधन एवं भजन के द्वारा घर को ही तपस्थली बनाना चाहिए। 
शिक्षा:--मनुष्य को अपने घर को नहीं छोड़ना चाहिए| घर को ही भगवान से जोड़ना चाहिए| मनुष्य यदि अपने भाई-बहिन को छोड़ेगा तो किसी और को भाई-बहिन बना लेगा| फिर कहेगा कि ये मेरे गुरू-भाई हैं, ये मेरी गुरू-बहन हैं| अतः घर में रह कर ही भगवान से जुड़ना चाहिए, घर को छोड़कर नहीं| तेईसवाँ गुरू मकड़ी:-- मकड़ी अपने मुँह के द्वारा जाला फैलाती है, उसमें विहार करती है और बाद में उसे अपने में ले लेती है| उसी प्रकार परमेश्वर भी इस जगत को अपने में से उत्पन्न करते हैं, उसमें जीव रूप से विहार करते हैं और फिर अपने में लीन कर लेते हैं| वे ही सबके अधिष्ठाता हैं, आश्रय हैं| चौबीसवाँ गुरू भृंगी (बिलनी) कीड़ा:--भृंगी कीड़ा अन्य कीड़े को ले जाकर और दीवार पर रखकर अपने रहने की जगह को बन्द कर देता है, लेकिन वह कीड़ा भय से उसी भृंगी कीड़े का चिंतन करते-करते, अपने प्रथम शरीर का त्याग किए बिना ही, उसी शरीर में तद्रूप हो जाता है| अतः जब उसी शरीर से चिंतन किए रूप की प्राप्ति हो जाती है, तब दूसरे शरीर का तो कहना ही क्या है? इसलिये मनुष्य को भी किसी दूसरी वस्तु का चिंतन न करके, केवल परमात्मा का ही चिंतन करना चाहिए| परमात्मा के चिंतन से साधक परमात्मा-रूप हो सकता है|
दत्तात्रेय जी ने कहा कि हे राजन्! अकेले गुरू से ही यथेष्ट और सुदृढ़ बोध नहीं होता, अपनी बुद्धि से भी बहुत कुछ सोचने-समझने की आवश्यकता है| भगवान के चरणों में निष्ठा होनी चाहिए| भगवान श्रीकृष्ण ने उद्धव से कहा कि इस प्रकार दत्तात्रेय जी ने राजा यदु को ज्ञान प्रदान किया| यदु महाराज ने उनकी पूजा की| दत्तात्रेय जी राजा यदु से अनुमति लेकर चले गये और राजा यदु का उद्धार हो गया| उनकी आसक्ति समाप्त हो गई और वे समदर्शी हो गये| इसी प्रकार हे प्यारे उद्धव! तुम्हें भी सभी आसक्तियों का त्याग करके समदर्शी हो जाना चाहिए|

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राजा यदु एक जंगल में भगवान दत्तात्रेय (Avadhoot) को देखा और उसे "स्वामी जी को संबोधित एक बार, तुम वास्तव में काफी सक्षम, ऊर्जावान और बुद्धिमान हैं. आप कर रहे हैं इस तरह के रूप में, क्यों आप सभी इच्छाओं से मुक्त, जंगल में रहते हैं? भले ही आप परिजनों और न ही एक भी परिवार, कैसे आप इतना आनंदित और आत्म - संतुष्ट हो सकता है न तो है? " Avadhoot (सभी सांसारिक इच्छाओं को हिलाकर रख दिया है जो एक) "मेरे आनंद और संतोष आत्म बोध का फल हैं. मैं 24 गुरुओं के माध्यम से, पूरी सृष्टि से आवश्यक ज्ञान अर्जित किया है. मैं तुम्हारे लिए ही विस्तृत होगा जवाब दिया," .

श्री दत्तात्रेय प्रकृति 20-4 शिक्षकों था "कई मेरे preceptors हैं," वह स्वतंत्र रूप से ज्ञान प्राप्त करने, मैं दुनिया में घूमते हैं जिस से मेरी गहरी भावना द्वारा चयनित राजा यदु, ", .... पृथ्वी, हवा / हवा, आकाश, बताया शिकार की आग, सूरज, कबूतर, अजगर, समुद्र, कीट, हाथी, चींटी, मछली, पिंगला वेश्या, तीर निर्माता, शिशु / चंचल लड़के, चाँद, मधुप, हिरण, पक्षी, युवती, सांप, मकड़ी, कमला और पानी मेरी चौबीस preceptors हैं.

1. पृथ्वी: सभी जीव, कर्म (कार्रवाई) की अपनी पिछली दुकान के अनुसार विभिन्न भौतिक रूपों मान और पृथ्वी पर रहते हैं. लोग हल, खुदाई और पृथ्वी चलना. इस पर उन्होंने प्रकाश आग. फिर भी, पृथ्वी भी एक बाल की चौड़ाई से अपने पाठ्यक्रम से भटकना नहीं पड़ता. दूसरी ओर, यह पूरी होती है और सभी प्राणियों मकान. यह देखकर, मैं बुद्धिमान एक किसी भी परिस्थिति में धैर्य, प्रेम और धर्म के अपने व्रत से भटकना नहीं करना चाहिए और एक जीवित प्राणियों के कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित करना चाहिए कि सीखा. अपने पहाड़ों और नदियों के साथ साथ पृथ्वी मेरी पहली गुरु है.

2. एयर: मैं हवा शुद्ध और अपने आप में बिना गंध है कि मनाया. और यह किसी भी भेदभाव या वरीयता के बिना मिठाई और दुर्गंधयुक्त दोनों बातों पर चल रही है. यह क्षण भर थोड़ी देर में, अपने आसपास की गंध पर लेने के लिए लगता है लेकिन यह अपनी प्राचीन गुणवत्ता का पता चलता है. इस से मैं एक आध्यात्मिक आकांक्षी खुशी और गम की तरह जीवन के द्वंद्व से और इन्द्रियों की वस्तुओं से अप्रभावित, दुनिया में जीना चाहिए कि सीखा. वह अपने दिल की भावना और अपने भाषण व्यर्थ वस्तुओं से प्रदूषण मुक्त रखना चाहिए. मैं यह देख कर यह सब सीखा है, हवा मेरी दूसरी गुरु है.

3. आकाश: आत्मा सर्वव्यापी है जो आकाश की तरह भी है. मैं कभी कभी आकाश (या स्थान) घना घटाटोप, या धूल या धुएं से भर जाता है कि देखा है. सूर्योदय के समय और रात के दौरान, यह स्पष्ट तौर पर अलग अलग रंग पर ले जाता है. लेकिन वास्तव में, यह कभी अपने बेरंग स्वयं को बरकरार रखे हुए है, और यह छुआ या कुछ से दाग नहीं है. इस से मैं एक सच्चा ऋषि अपने ही शारीरिक प्रक्रियाओं सहित समय में अभूतपूर्व ब्रह्मांड में कुछ भी, से अछूता या अप्रभावित आकाश या अंतरिक्ष, जैसे कभी शुद्ध रहना चाहिए कि सीखा. उनके भीतर की जा रही बातें और भी अंतरिक्ष की तरह की घटनाओं के लिए भावनात्मक प्रतिक्रिया से पूरी तरह से मुक्त है. इस प्रकार मैं अपने तीसरे गुरु के रूप में आकाश या अंतरिक्ष स्वीकार किए जाते हैं.
4. आग: मेरी चौथी शिक्षक आग का तत्व है. कभी कभी, यह आग की लपटों प्रज्वलन के रूप में प्रकट होता है, कभी कभी राख द्वारा कवर अंगारे, सुलगनेवाला के रूप में. लेकिन यह हमेशा अव्यक्त गर्मी के रूप में सभी वस्तुओं में मौजूद है. आग के देवता चाहे उसके नैतिक मूल्य और अपने पापों नीचे जलने से हर किसी की पेशकश को स्वीकार करता है, और यह अभी भी आग देवता के रूप में कभी शुद्ध देवत्व रहता है, वह इस तरह के भक्तों के पापों से बेदाग है. तो भी, उत्तम प्राप्ति का एक ऋषि, हर किसी के भोजन स्वीकार अपने पापों को जला और दाता आशीर्वाद चाहिए. आग यह जलता है, यह इस तरह के स्पष्ट रूपों मानता है कि ईंधन के साथ जुड़ा हुआ है जब अपनी खुद की कोई विशिष्ट रूप है, हालांकि. तो भी, सच स्वयं, अपने आप में हालांकि निराकार, देवताओं, मनुष्यों, पशुओं और इसे संबंधित शारीरिक संरचनाओं के साथ जुड़ा हुआ है जब पेड़ के रूपों में प्रकट होता है. ब्रह्मांड में सभी रूपों का स्रोत, उनके अंत के रूप में भी, कभी भी रहस्यमय बनी हुई है. सभी चीजों को केवल उनके मूल और उनके अंत के बीच में प्रकट होते हैं. उनके स्रोत और अंत, अनन्त अपरिवर्तनीय, अव्यक्त और सर्वव्यापी है जो सच स्व, है. आग का तत्व की प्रकृति ऐसी है. प्रकट आग में एक ही राख में यह खपत विभिन्न चीजों को बदल देती है. तो भी, आत्म बोध का ज्ञान भ्रम के रूप में चीजों के प्रकट रूपों और गुणों को खारिज कर दिया और खुद ही उनके एक मूल सार का एहसास है. इस प्रकार आग के तत्व अपने चौथे गुरु है.

5. सूर्य: मेरी पांचवें गुरु सूर्य है. हम अपने दैनिक जीवन में देखने के सूरज से एक है, हालांकि अलग बर्तन में पानी से परिलक्षित होता है, यह के रूप में कई प्रकट होता है. इसी तरह, एक वास्तविक स्व उनकी शारीरिक संरचना से परिलक्षित जब प्राणियों की कई स्वयं के रूप में प्रकट होता है. सूर्य हमारे सपने को प्रकृति में कई रूपों illuminates के रूप में, ऋषि भी अपने भक्तों को सब बातों की सही प्रकृति illuminates.

6. कबूतर: मैं भी एक कबूतर से ज्ञान अर्जित किया है. कबूतरों की एक जोड़ी के एक पेड़ पर एक साथ रहते थे एक बार. वे अपने युवा नस्ल और गहरा लगाव और प्यार से उन्हें ला रहे थे. एक दिन, एक शिकारी एक जाल में युवा fledglings के पकड़ा. अपने युवा लोगों के लिए भोजन के साथ जंगल से लौट आए, जो एक प्रकार का गुबरैला, उनकी दुर्दशा को देखा और उन्हें छोड़ करने में असमर्थ है, वह अपने भाग्य को साझा करने के लिए जाल में जोर से उछले. कुछ ही समय बाद, पुरुष कबूतर आए और, अपनी जान से जुदाई सहन करने में असमर्थ है, यह भी जाल में कूद गए और अपने अंत से मुलाकात की. इस पर दर्शाते, मैं भी, आदमी एक बुद्धिमान इंसान के अधिकार की कुंडलियों में पकड़ लिया और अपने ही आध्यात्मिक विनाश के बारे में लाता है के रूप में पैदा होने के बाद, कैसे एहसास हुआ. शरीर भावना के साथ जुड़ा हुआ है, जब मूल रूप से स्वतंत्र है जो स्वयं,,, इसके साथ की पहचान हो जाता है, और इस तरह जन्म, मृत्यु और दुख का अंतहीन चक्र में पकड़ा जाता है. इस प्रकार कबूतर मेरे छठे गुरु थे.

7. अजगर: अजगर अपने शिकार के लिए briskly बाहर ले जाने के लिए तैयार नहीं एक आलसी है. यह अपने मझधार में निहित है और यह सामने आता है जो भी प्राणी निगल, अपनी भूख को खुश करने के लिए यह पर्याप्त होगा. इस से मैं ज्ञान की खोज में आदमी के सुख के पीछे भाग रहा से बचना चाहिए कि सीखा है, और वह संतोष के साथ सहज हो जाता है जो कुछ भी स्वीकार करते हैं. अजगर की तरह, वह सोने और जागने से हिला चाहिए और स्वयं पर लगातार ध्यान की एक राज्य में पालन करना. इस प्रकार अजगर ज्ञान की मेरी सातवीं शिक्षक था.

8. सागर: सागर की अद्भुत प्रकृति पर विचार कर, मैं बहुत ज्ञान अर्जित किया है. बह निकला नदियों की कोई भी संख्या यह शामिल हो सकते हैं, अभी तक समुद्र अपने स्तर को बनाए रखता है. सभी नदियां सूख जब न ही अपने स्तर, गर्मियों में एक बाल की चौड़ाई से भी गिरावट है. तो भी, जिंदगी की खुशियों के ज्ञान के ऋषि उल्लसित नहीं है, न ही उसके दु: ख उसे दबाना है. समुद्र तट पर अपनी सीमा को पार कर कभी नहीं बस के रूप में, बुद्धिमान एक जुनून के पुल के नीचे नैतिकता के उच्चतम मानकों transgresses कभी नहीं. समुद्र की तरह, वह अजेय है और कुछ से परेशान नहीं किया जा सकता. अथाह समुद्र की तरह, अपने वास्तविक स्वरूप और उसके ज्ञान की गहराई आसानी से किसी के द्वारा comprehended नहीं किया जा सकता. इस प्रकार मुझे सिखाया है जो समुद्र,, मेरे आठवें गुरु है.

9. कीट: मैं अक्सर कीट (या, और अधिक ठीक, एक टिड्डा) उस में कूद और नीचे जला पाने के लिए अग्नि परीक्षा है कि मनाया. तो भी, कल्पनातीत आदमी होश में भ्रामक सुखों से मोहित हो जाता है और इस प्रकार जन्म और मृत्यु के निरंतर चक्र में पकड़ा जाता है. दूसरी ओर, वह ज्ञान की आग की एक झलक भी फैल जाती है जब बुद्धिमान एक,,, एक तरफ सब कुछ छोड़ देता है उस में आती है और एक सीमित स्वयं होने का भ्रम नीचे जलता है. इस प्रकार कीट मेरे नौवें गुरु थे.

10. हाथी: हाथी मेरे दसवें गुरु थे. मनुष्य जंगल में गाय हाथी एक भरवां बढ़ा. एक दोस्त के लिए जंगली हाथी गलतियों यह, यह दृष्टिकोण और फिर कुशलता चालाक मनुष्य द्वारा बेड़ियों में बंधे. तो भी, unregenerate आदमी विपरीत सेक्स के द्वारा परीक्षा है और मोह की बेड़ी से बाध्य हो जाता है. मुक्ति के बाद चाहने वालों को वासना से मुक्त होना सीखना चाहिए. हाथी इस तरह मेरे शिक्षकों में से एक था.

11. चींटी: यह न तो खाता है और न ही किसी अन्य प्राणी को दान में दूर देता है जो खाद्य सामग्री के बहुत सारे चींटी भंडार. परिणाम में, अन्य अधिक शक्तिशाली जीव लूट चींटियों के लिए कोशिश कर रहे हैं. तो भी, केवल भौतिक चीज़ों के खजाने से तैयार करती है जो आदमी डकैती और हत्या का शिकार हो जाता है. लेकिन चींटी भी, हमें सिखाने के लिए कुछ सकारात्मक है. यह एक अथक कार्यकर्ता है और अपने खजाने इकट्ठा करने के लिए अपने प्रयासों में बाधाओं और असफलताओं के किसी भी नंबर से हतोत्साहित नहीं है. तो भी, ज्ञान के बाद एक साधक आत्म बोध के लिए अपने प्रयासों में अथक होना चाहिए. इस महान सत्य छोटी चींटी ने मुझे सिखाया और मेरे ग्यारहवें गुरु बन गया है.

12. मछली: एक ही बार कोण हुक से पकड़ा मछली लालच से निगल चारा और है. इस से, मैं उस आदमी को स्वादिष्ट भोजन के लिए उसकी लालसा से अपने विनाश को पूरा करती है कि कैसे एहसास हुआ. तालू पर विजय प्राप्त किया जाता है, और सब पर विजय प्राप्त की है. इसके अलावा, मछली में एक सकारात्मक विशेषता है. यह पानी यानी, अपने घर कभी नहीं छोड़ता. तो भी, आदमी अपने सच स्वयं की दृष्टि खो कभी नहीं करना चाहिए, लेकिन कभी अपने उस में किया जा रहा है चाहिए. इस प्रकार मछली मेरे बारहवें गुरु बन गया.

13. पिंगला: मेरी भावना जागृत की है कि तेरहवीं गुरु पिंगला नाम की एक वेश्या है. एक दिन, वह बेसब्री से वह कथन से उसे भुगतान करना होगा इस उम्मीद में कि एक विशेष रूप से ग्राहक की प्रतीक्षा है. वह इंतजार कर रहे थे और रात में देर तक इंतजार किया. वह लौटकर नहीं आया तो वह निराश है और इस तरह परिलक्षित पिछले पर था:! "काश मैं कितना बेवकूफ शाश्वत आनंद की प्रकृति का है, जो भीतर परमात्मा आत्मा की उपेक्षा, मैं मूर्खता मेरी प्रेरणा मिलती है, जो एक विषयी (भोगवादी) की प्रतीक्षा वासना और लालच. इसके बाद, मैं स्वयं पर अपने आप को व्यय करेगा, उसके साथ एकजुट है और अनन्त आनन्द जीतने के लिए. ऐसे पश्चाताप के माध्यम से, वह धन्य प्राप्त कर ली. इसके अलावा, इसके स्पष्ट मुराद को दर्शाती है, मैं भी एक आध्यात्मिक आकांक्षी वैसे ही आकर्षण अस्वीकार करना चाहिए एहसास हुआ कि . कम आध्यात्मिक साधना की (साधना) द्वारा उत्पादों मात्र हैं जो शक्तियां, की मैं दूसरे के हाथ से चीजों को सुरक्षित करने के लिए प्रलोभन दुख के बीज होते हैं कि सीखा है, इनमें से जो त्याग अनन्त आनन्द को साकार करने का एकमात्र साधन है.

14. तीर निर्माता: एक बार जब मैं पूरी तरह से ढलाई एक तेज तीर में समाहित कर लिया गया है जो एक तीर निर्माता मनाया. उन्होंने कहा कि वह द्वारा पारित कर दिया है कि एक शाही तमाशा नोटिस भी नहीं किया था और सब की तो अनजान बढ़ी. इस दृष्टि स्वयं की ऐसी एकल दिमाग, सभी को अवशोषित चिंतन अनायास दुनिया की तुच्छ हितों के लिए सभी प्रलोभन समाप्त सच करने के लिए मुझे जगाया. यह साधना में सफलता का एकमात्र रहस्य है. इस प्रकार तीर निर्माता मेरे चौदहवें गुरु है.
15. चंचल लड़का: छोटे लड़के और लड़कियों के सम्मान और न ही अनादर न तो पता है. वे नर्स किसी के खिलाफ कोई दुर्भावना या एक पूर्वाग्रह नहीं है. वे अपने ही क्या है पता नहीं है, या जो दूसरों के अंतर्गत आता है. उनकी खुशी अपने खुद, उनकी जन्मजात रचनात्मकता से स्प्रिंग्स और वे किसी भी बाहरी वस्तुओं या परिस्थितियों के खुश होने की जरूरत नहीं है. मैं सही ज्ञान के ऋषि भी ऐसी है कि एहसास हुआ. एक चंचल लड़के को इस तरह अपने पन्द्रहवें गुरु हो हुआ.

16. चंद्रमा: प्रकृति में सब बातों का, चाँद अद्वितीय है. यह उज्ज्वल और अंधेरे पखवाड़े के दौरान मोम और पतन होता है. वास्तव में, चंद्र दुनिया कभी एक ही रहता है. इस में, यह आदमी का आत्म की तरह है. एक आदमी शैशव, बचपन, जवानी, परिपक्वता और बुढ़ापे के चरणों के माध्यम से पारित करने के लिए प्रकट होता है, उसका असली स्वयं अपरिवर्तित बनी हुई है. स्वयं को शरीर के लिए केवल संबंधित है और नहीं सभी परिवर्तन. फिर, चाँद ही सूरज के प्रकाश को दर्शाता है, लेकिन अपनी खुद की कोई ऐसी है. तो भी, आदमी की आत्मा या मन ही असली स्वयं के बारे में जागरूकता की रोशनी का प्रतिबिंब है. इस सच्चाई सिखाया है, चाँद मेरे सोलहवीं गुरु बन गया.

17. शहद की मक्खी: शहद की मक्खी फूल को फूल से भटक और, कम से कम में उन्हें चोट पहुंचाए बिना, शहद खींचता है. तो भी, एक आध्यात्मिक साधक जो अपने आध्यात्मिक अभ्यास के लिए आवश्यक है ही नहीं, सभी पवित्र ग्रंथों का अध्ययन, लेकिन उसके दिल में बनाए रखने चाहिए. इस तरह मैं अपने सत्रहवाँ गुरु, मधुप से आत्मसात शिक्षण है.

18. हिरण: यह संगीत का बहुत शौकीन हैं हिरणों और कहा कि शिकारियों यह उन्हें शिकार करने से पहले उन्हें लुभाने के लिए रोजगार कहा जाता है. इस से, मुझे लगता है कि वह अंतत: वह पहले हासिल की है आध्यात्मिक जो भी प्रगति खो देता है जब तक जुनून और कामुक इच्छाओं को जल्द ही, केवल धर्मनिरपेक्ष संगीत के लिए एक कमजोरी है जो एक आध्यात्मिक आकांक्षी नीचे दलदल होगा सीखा. मुझे इस सच्चाई को पढ़ाया जाता है कि हिरण मेरे अठारहवें गुरु है.

19. शिकार के पक्षी: शिकार के एक पक्षी मेरे उन्नीसवीं गुरु है. एक दिन, मैं एक मरे हुए चूहे में इस तरह दूर ले जाने को देखा. कौवे और चील की तरह कई अन्य पक्षियों अब उसके सिर पर लात मार रहा है और फिर शिकार को बंद करने के लिए अपने प्रयास में अपने पक्ष पर चोंच, यह हमला किया. गरीब पक्षी इस प्रकार बहुत सताया गया था. अंत में, यह बुद्धिमानी से अपने शिकार गिरावट और अन्य सभी पक्षियों के बाद यह ले जाया करते हैं. इस प्रकार इतना परेशानी से खुद को मुक्त, यह राहत में sighed. इस से, मुझे पता चला है कि सांसारिक सुखों भी जल्द ही उसी के लिए चला जो अपने साथी प्राणियों के साथ संघर्ष में आ जाएगा के बाद चलता है, और बहुत संघर्ष और विरोध का सामना करना पड़ता है जो एक आदमी. वह सांसारिक बातों के लिए अपनी लालसा को जीत के लिए सीखता है, वह खुद को बहुत दुख दे सकते. मैं इस दुनिया में शांति के लिए एक ही रास्ता है कि एहसास हुआ.

20. युवती: एक बार, मैं एक परिवार को अपने बेटे के लिए शादी में उसका हाथ मांग, एक युवती के घर का दौरा मनाया. उस समय उसकी मां घर से दूर था. युवती तो खुद को नाश्ते के साथ मेहमानों के मनोरंजन के लिए किया था. वह एक बार में एक पैर के साथ खाद्यान्न तेज़ शुरू कर दिया. उसके हाथ में चूड़ियाँ एक दूसरे, तेज़ ध्वनि के खिलाफ दस्तक दे शुरू कर दिया. वह मेहमानों आवाज सुन और परेशानी का उसे इतना कारण होने के लिए दुखी हो सकता है कि डर लग रहा था. एक हिंदू युवती के रूप में, वह किसी भी समय उसके हाथ पर सभी चूड़ियों को दूर करने की उम्मीद नहीं है. तो वह एक हाथ पर दो रखा और सब आराम हटा दिया. फिर भी, वे एक दूसरे के खिलाफ दस्तक दे रहे थे और शोर कर रहे थे. इसलिए वह इस समय हर ओर केवल एक चूड़ी रखा और वह चुप में उसका काम खत्म कर सकता है. इस पर दर्शाते, मैं आध्यात्मिक चाहने वालों की संख्या में एक साथ रहते हैं, जब अवांछित गपशप का एक बहुत ensues महसूस किया कि और कोई साधना एक ईमानदार प्रयास से चलाया जा सकता है. केवल एकांत में, एक आध्यात्मिक आकांक्षी अपने काम ले सकते हैं. इस सच्चाई को जानने के बाद, मैं अब से एकांत का सहारा लिया. इस प्रकार, एक युवती मेरे बीसवीं गुरु हो हुआ.

21. नाग: मैं एक नागिन अपने लिए एक आवास बनाता है कि कभी नहीं मनाया. सफेद चींटियों को खुद के लिए एक वल्मीक उठाया है, जब नागिन अंततः यह निवास के लिए आते हैं. एक वैरागी साधु ऐसी बात करता कोई है, जबकि इसी प्रकार, सांसारिक लोगों को खुद के लिए घरों में बढ़ोतरी के लिए कई कठिनाइयों को सहन किया है. सांसारिक पुरुषों मठों बढ़ा और साधु उन में रहती है, या, वह पुराने जीर्ण - शीर्ण मंदिरों में छोड़ देता है, या छायादार पेड़ के नीचे. नागिन moults अपने पुराने त्वचा, बंद छोड़ने. तो भी अपने जीवन के अंत में योगी जानबूझ कर और अपने ही सच्चे आत्म से भरा जागरूकता में उसके शरीर छोड़ देता है और मौत की घटना से भयभीत नहीं है. वह अपने पहना बाहर कपड़े करता है और नए सरगनाओं के रूप में दूसरी ओर, के रूप में वह खुशी से अपने पुराने शरीर से दूर डाले. इस प्रकार मेरे बीस प्रथम गुरु ने मुझे सिखाया है.

22. मकड़ी: मकड़ी मेरे बीस दूसरी गुरु है. यह एक तरल पदार्थ के रूप में धागे से अपने वेब weaves. कुछ समय के बाद, यह अपने आप में वेब ऊपर इकट्ठा. सर्वोच्च खुद की सारी सृष्टि बाहर परियोजनाओं और कुछ समय के बाद, विघटन के समय में ही इसे वापस ले लेती है. जीवात्मा भी भीतर ही इंद्रियों और मन भालू और, एक इंसान या अन्य किसी भी जीवित प्राणी के रूप में अपने जन्म के समय, यह इंद्रियों, कार्रवाई के अंगों और पूरे शरीर के रूप में उन्हें बाहर परियोजनाओं. इसकी अव्यक्त प्रवृत्तियों के अनुसार, इस प्रकार का जन्म प्राणी, अपने जीवन के लिए आवश्यक सभी साधनों और वस्तुओं को इकट्ठा. अपने जीवन की अवधि के अंत में, आत्मा फिर मौत के घंटे में होश, मन और अधिग्रहण की प्रवृत्ति निकाल लेता है. इस प्रकार मैं मकड़ी से सीखा है.

23. कमला: कमला भी ज्ञान की मेरी शिक्षकों में से एक है. ततैया एक सुरक्षित कोने में अपनी कमला किया जाता है और अपने घोंसले में इसे बंद कर देता है और इसके बारे में गुलजार पर चला जाता है. युवा कमला तो यह गुलजार ततैया की तुलना में और कुछ भी नहीं सोच सकता है, लगातार गूंज से भयभीत है. अपनी मां के इस तरह के unintermittent चिंतन के माध्यम से, कमला भी, जल्द ही एक ततैया में बढ़ता है! एक तरह फैशन में, एक सच्चा शिष्य तो मन मोह लिया है और वह उसके अलावा अन्य किसी भी एक के बारे में सोच नहीं सकते हैं कि अपने ही गुरु की आध्यात्मिक श्रेष्ठता से ज्यादा awed. एक महान आध्यात्मिक गुरु खुद में इस तरह के चिंतन के माध्यम से, वह जल्द ही फूल. कमला इस प्रकार मेरे 23 गुरु है.

24. जल: जल मेरे बीस चौथे गुरु है. यह हर प्राणी की प्यास quenches असंख्य पेड़ों और सभी प्राणियों को बनाए. यह इस प्रकार सभी जीवित प्राणियों में कार्य करता है, यह अपने आप पर गर्व नहीं है. दूसरी ओर, यह विनम्रतापूर्वक स्थानों के lowliest चाहता है. बाबा भी इसी तरह स्वास्थ्य, शांति और उसके लिए सैरगाह है कि हर प्राणी को खुशी प्रदान करना चाहिए. अभी तक वह कभी भगवान के निर्माण की humblest के रूप में रहना चाहिए.
ऐसी विनम्रता और भक्ति के साथ, मैं अपने शिक्षक के रूप में भगवान के निर्माण के पूरे हेय दृष्टि से देखा ज्ञान एकत्र हुए और, रोगी प्रयास के माध्यम से मैं आध्यात्मिक ज्ञान के अपने लक्ष्य का एहसास हुआ.

गुरु पूर्णिमा : 10 महान गुरु - नीना शर्मा

विश्व गुरु स्वामी विवेकानंद जी 

स्वामी विवेकानंद जी के गुरु स्वामी रामकृष्ण परम हंस 

12/07/ 2014

गुरू-पूर्णिमा- नीना शर्मा

https://www.facebook.com/neena.sharma

प्राचीनकाल में जब विद्यार्थी गुरु के आश्रम में निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करता था तो इसी दिन श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर अपने गुरु का पूजन करके उन्हें अपनी शक्ति सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देकर कृतकृत्य होता था। देवताओं के गुरु थे बृहस्पति और असुरों के गुरु थे शुक्राचार्य। भारतीय इतिहास में एक से बढ़कर एक महान गुरु-शिक्षक रहे हैं। ऐसे गुरु हुए हैं जिनके आशीर्वाद और शिक्षा के कारण इस देश को महान युग नायक मिले।
कण्व, भारद्वाज, वेदव्यास, अत्रि से लेकर गुरुनानक और गुरु गोविंदसिंहजी तक लाखों गुरुओं की लिस्ट है। हमें मालूम है कि वल्लभाचार्य, गोविंदाचार्य, कबीर, सांईं बाबा, गजानन महाराज, तुकाराम, ज्ञानेश्वर आदि सभी अपने काल के महान गुरु थे और ओशो भी। आइए जानते हैं दस महान गुरुओं का संक्षिप्त परिचय...
गुरु पूर्णिमा : 10 महान गुरु
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1. गुरु वशिष्ठ
राजा दशरथ के कुलगुरु ऋषि वशिष्ठ को कौन नहीं जानता। ये दशरथ के चारों पुत्रों के गुरु थे। वशिष्ठ के कहने पर दशरथ ने अपने चारों पुत्रों को ऋषि विश्वामित्र के साथ आश्रम में राक्षसों का वध करने के लिए भेज दिया था। कामधेनु गाय के लिए वशिष्ठ और विश्वामित्र में युद्ध भी हुआ था। वशिष्ठ ने राजसत्ता पर अंकुश का विचार दिया तो उन्हीं के कुल के मैत्रावरुण वशिष्ठ ने सरस्वती नदी के किनारे सौ सूक्त एक साथ रचकर नया इतिहास बनाया। सप्त‍ ऋषियों में गुरु वशिष्ठ की गणना की जाती है।

2. विश्वामित्र ऋषि होने के पूर्व विश्वामित्र राजा थे और ऋषि वशिष्ठ से कामधेनु गाय को हड़पने के लिए उन्होंने युद्ध किया था, लेकिन वे हार गए। इस हार ने ही उन्हें घोर तपस्या के लिए प्रेरित किया। विश्वामित्र की तपस्या और मेनका द्वारा उनकी तपस्या भंग करने की कथा जगत प्रसिद्ध है। विश्वामित्र ने अपनी तपस्या के बल पर त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया था, लेकिन स्वर्ग में उन्हें जगह नहीं मिली तो विश्वामित्र ने एक नए स्वर्ग की रचना कर डाली थी। इस तरह ऋषि विश्वामित्र के असंख्य किस्से हैं।
...जब विश्वामित्र ने पाया ब्रह्मर्षि-पद
भगवान राम को परम योद्धा बनाने का श्रेय विश्वामित्र ऋषि को जाता है। एक क्षत्रिय राजा से ऋषि बने विश्वामित्र भृगु ऋषि के वंशज थे। भगवान राम के पास जितने भी दिव्यास्त्र थे, वे सब विश्वामित्र ऋषि के दिए हुए थे। विश्वामित्र को अपने जमाने का सबसे बड़ा आयुध आविष्कारक माना जाता है। उन्होंने ब्रह्मा के समकक्ष एक और सृष्टि की रचना कर डाली थी।
माना जाता है कि हरिद्वार में आज जहां शांतिकुंज हैं उसी स्थान पर विश्वामित्र ने घोर तपस्या करके इंद्र से रुष्ट होकर एक अलग ही स्वर्ग लोक की रचना कर दी थी। विश्वामित्र ने इस देश को ऋचा बनाने की विद्या दी और गायत्री मंत्र की रचना की, जो भारत के हृदय में और जिह्ना पर हजारों सालों से आज तक अनवरत निवास कर रहा है।

3. परशुराम जब एक बार गणेशजी ने परशुराम को शिव दर्शन से रोक लिया तो रुष्ट परशुराम ने उन पर परशु प्रहार कर दिया जिससे गणेशजी का एक दाँत नष्ट हो गया और वे एकदंत कहलाए। जनक, दशरथ आदि राजाओं का उन्होंने समुचित सम्मान किया। सीता स्वयंवर में श्रीराम का अभिनंदन किया। कौरव-सभा में कृष्ण का समर्थन किया। असत्य वाचन करने के दंडस्वरूप कर्ण को सारी विद्या विस्मृत हो जाने का श्राप दिया था। उन्होंने भीष्म, द्रोण व कर्ण को शस्त्रविद्या प्रदान की थी। इस तरह परशुराम के अनेक किस्से हैं।

4. शौनक ---शौनक ने 10 हजार विद्यार्थियों के गुरुकुल को चलाकर कुलपति का विलक्षण सम्मान हासिल किया और किसी भी ऋषि ने ऐसा सम्मान पहली बार हासिल किया। वैदिक आचार्य और ऋषि जो शुनक ऋषि के पुत्र थे। फिर से बताएं तो वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भारद्वाज, अत्रि, वामदेव और शौनक- ये हैं वे सात ऋषि जिन्होंने इस देश को इतना कुछ दे डाला कि कृतज्ञ देश ने इन्हें आकाश के तारामंडल में बिठाकर एक ऐसा अमरत्व दे दिया कि सप्तर्षि शब्द सुनते ही हमारी कल्पना आकाश के तारामंडलों पर टिक जाती है।
इसके अलावा मान्यता है कि अगस्त्य, कश्यप, अष्टावक्र, याज्ञवल्क्य, कात्यायन, ऐतरेय, कपिल, जेमिनी, गौतम आदि सभी ऋषि उक्त सात ऋषियों के कुल के होने के कारण इन्हें भी वही दर्जा प्राप्त है।

5. द्रोणाचार्य----द्वापर युग में कौरवों और पांडवों के गुरु रहे द्रोणाचार्य भी श्रेष्ठ शिक्षकों की श्रेणी में काफी सम्मान से गिने जाते हैं। द्रोणाचार्य अपने युग के श्रेष्ठतम शिक्षक थे। द्रोणाचार्य भारद्वाज मुनि के पुत्र थे। ये संसार के श्रेष्ठ धनुर्धर थे। माना जाता है कि द्रोण का जन्म उत्तरांचल की राजधानी देहरादून में बताया जाता है, जिसे हम देहराद्रोण (मिट्टी का सकोरा) भी कहते थे। द्रोणाचार्य का विवाह कृपाचार्य की बहन कृपि से हुआ जिनसे उन्हें अश्वत्थामा नामक पुत्र मिला। गुरु द्रोण ने पांडु पुत्रों और कौरवों को धनुर्धर की शिक्षा दी। द्रोण के हजारों शिष्य थे जिनमें अर्जुन को उन्होंने विश्व का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर होने का वरदान दिया। इस वरदान की रक्षा करने के लिए ही द्रोण ने जब देखा कि अर्जुन से भी श्रेष्ठ एकलव्य श्रेष्ठ धनुर्धर है तो उन्होंने एकलव्य से उसका अंगूठा मांग लिया।
महाभारत युद्ध में द्रोण कौरवों की ओर से लड़े थे। द्रोणाचार्य और उनके पुत्र अश्वथामा जब पांडवों की सेना पर भारी पड़ने लगे तब एक छल से धृष्टद्युम्न ने उनका सिर काट दिया। द्रोण एक महान गुरु थे। इतिहास में उनका नाम अजर-अमर रहेगा।

6. महर्षि सांदीपनि ----भगवान कृष्ण, बलराम और सुदामा के गुरु थे महर्षि सांदीपनि। इनका आश्रम आज भी मध्यप्रदेश के उज्जैन में है। सांदीपनि के गुरुकुल में कई महान राजाओं के पुत्र पढ़ते थे। श्रीकृष्णजी की आयु उस समय 18 वर्ष की थी और वे उज्जयिनी के सांदीपनि ऋषि के आश्रम में रहकर उनसे शिक्षा प्राप्त कर चुके थे।-सांदीपनि ने भगवान श्रीकृष्ण को 64 कलाओं की शिक्षा दी थी। भगवान विष्णु के पूर्ण अवतार श्रीकृष्ण ने सर्वज्ञानी होने के बाद भी सांदीपनि ऋषि से शिक्षा ग्रहण की और ये साबित किया कि कोई इंसान कितना भी प्रतिभाशाली या गुणी क्यों न हो, उसे जीवन में फिर भी एक गुरु की आवश्यकता होती ही है।

7. चाणक्य ---आचार्य विष्णु गुप्त यानी चाणक्य यानी चणक। चाणक्य को कौन नहीं जानता कलिकाल के सबसे श्रेष्ठ गुरु जिन्होंने भारत को एकसूत्र में बांध दिया था। दुनिया के सबसे पहले राजनीतिक षड्‍यंत्र के रचयिता आचार्य चाणक्य ने चंद्रगुप्त मौर्य जैसे साधारण भारतीय युवक को सिकंदर और धनानंद जैसे महान सम्राटों के सामने खड़ाकर कूटनीतिक युद्ध कराए। -चंद्रगुप्त मौर्य को अखंड भारत का सम्राट बनाया। पहली बार छोटे-छोटे जनपदों और राज्यों में बंटे भारत को एकसूत्र में बांधने का कार्य आचार्य चाणक्य ने किया था। वे मूलत: अर्थशास्त्र के शिक्षक थे लेकिन उनकी असाधारण राजनीतिक समझ के कारण वे बहुत बड़े रणनीतिकार माने गए।

8. आद्य शंकराचार्य --- स्वामी शंकराचार्य ने भारत की बिखरी हुई संत परंपरा को एकजुट कर दसनामी संप्रदाय का गठन किया और भारत के चारों कोने में 4 मठों की स्थापना की। उन्होंने ही हिंदुओं के चार धामों का पुन: निर्माण कराया और सभी तीर्थों को पुनर्जीवित किया। शंकराचार्य हिंदुओं के महान गुरु हैं। उनके हजारों शिष्य थे और उन्होंने देश-विदेश में भ्रमण करके हिंदू धर्म और संस्कृति का प्रचार प्रसार किया।

9. स्वामी समर्थ रामदास ------आस्वामी समर्थ रामदास छत्रपति शिवाजी के गुरु थे। उन्होंने ही देशभर में अखाड़ों का निर्माण किया था। महाराष्ट्र में उन्होंने रामभक्ति के साथ हनुमान भक्ति का भी प्रचार किया। हनुमान मंदिरों के साथ उन्होंने अखाड़े बनाकर महाराष्ट्र के सैनिकीकरण की नींव रखी, जो राज्य स्थापना में बदली। संत तुकाराम ने स्वयं की मृत्युपूर्व शिवाजी को कहा कि अब उनका भरोसा नहीं अतः आप समर्थ में मन लगाएँ। तुकाराम की मृत्यु बाद शिवाजी ने समर्थ का शिष्यत्व ग्रहण किया।

10. रामकृष्ण परमहंस ---स्वामी विवेकानंद के गुरु आचार्य रामकृष्ण परमहंस भक्तों की श्रेणी में श्रेष्ठ माने गए हैं। मां काली के भक्त श्री परमहंस प्रेममार्गी भक्ति के समर्थक थे। ऐसा माना जाता है कि समाधि की अवस्था में वे मां काली से साक्षात वार्तालाप किया करते थे। उन्हीं की शिक्षा और ज्ञान से स्वामी विवेकानंद ने दुनिया में हिंदू धर्म की पताका फहराई।आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। गुरू पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरंभ में आती है। इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-संत एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, ऐसे ही गुरुचरण में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।
यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी है। वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और उन्होंने चारों वेदों की भी रचना की थी। इस कारण उनका एक नाम वेद व्यास भी है। उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है। भक्तिकाल के संत घीसादास का भी जन्म इसी दिन हुआ था वे कबीरदास के शिष्य थे।
शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का का अर्थ किया गया है- उसका निरोधक। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है। अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को 'गुरु' कहा जाता है। गुरु तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक में कहा गया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी। बल्कि सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है।
भारत भर में गुरू पूर्णिमा का पर्व बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है। प्राचीन काल में जब विद्यार्थी गुरु के आश्रम में निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करता था तो इसी दिन श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर अपने गुरु का पूजन करके उन्हें अपनी शक्ति सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देकर कृतकृत्य होता था। आज भी इसका महत्व कम नहीं हुआ है। पारंपरिक रूप से शिक्षा देने वाले विद्यालयों में, संगीत और कला के विद्यार्थियों में आज भी यह दिन गुरू को सम्मानित करने का होता है। मंदिरों में पूजा होती है, पवित्र नदियों में स्नान होते हैं, जगह जगह भंडारे होते हैं और मेले लगते हैं।

गुरु पूर्णिमा का महत्व------ व्यास जयन्ती ही गुरुपूर्णिमा है। गुरु को गोविंद से भी ऊंचा कहा गया है। गुरुपरंपरा को ग्रहण लगाया तो सद्गुरु का लेबिल लगाकर धर्मभीरुता की आड़ में धंधा चलाने वाले ‘‘कालिनेमियों ने। शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का का अर्थ किया गया है- उसका निरोधक। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है। अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को ‘गुरु’ कहा जाता है। गुरु तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक में कहा गया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी। सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है। ‘व्यास’ का शाब्दिक संपादक, वेदों का व्यास यानी विभाजन भी संपादन की श्रेणी में आता है। कथावाचक शब्द भी व्यास का पर्याय है। कथावाचन भी देश-काल-परिस्थिति के अनुरूप पौराणिक कथाओं का विश्लेषण भी संपादन है। भगवान वेदव्यास ने वेदों का संकलन किया, 18पुराणों और उपपुराणों की रचना की। ऋषियों के बिखरे अनुभवों को समाजभोग्य बना कर व्यवस्थित किया। पंचम वेद ‘महाभारत’ की रचना इसी पूर्णिमा के दिन पूर्ण की और विश्व के सुप्रसिद्ध आर्ष ग्रंथ ब्रह्मसूत्र का लेखन इसी दिन आरंभ किया। तब देवताओं ने वेदव्यासजी का पूजन किया। तभी से व्यासपूर्णिमा मनायी जा रही है। ‘‘तमसो मा ज्योतिगर्मय’’ अंधकार की बजाय प्रकाश की ओर ले जाना ही गुरुत्व है। आगम-निगम-पुराण का निरंतर संपादन ही व्यास रूपी सद्गुरु शिष्य को परमपिता परमात्मा से साक्षात्कार का माध्यम है। जिससे मिलती है सारूप्य मुक्ति। तभी कहा गया- ‘‘सा विद्या या विमुक्तये।’’

आज विश्वस्तर पर जितनी भी समस्याएं दिखाई दे रही हैं, उनका मूल कारण है गुरु-शिष्य परंपरा का टूटना। श्रद्धावाॅल्लभते ज्ञानम्। आज गुरु-शिष्य में भक्ति का अभाव गुरु का धर्म ‘‘शिष्य को लूटना, येन केन प्रकारेण धनार्जन है’’ क्योंकि धर्मभीरुता का लाभ उठाते हुए धनतृष्णा कालनेमि गुरुओं को गुरुता से पतित करता है। यही कारण है कि विद्या का लक्ष्य ‘मोक्ष’ न होकर धनार्जन है। ऐसे में श्रद्धा का अभाव स्वाभाविक है। अन्ततः अनाचार, अत्याचार, व्यभिचार, भ्रष्टाचारादि कदाचार बढ़ा। व्यासत्व यानी गुरुत्व अर्थात् संपादकत्व का उत्थान परमावश्यक है।