शनिवार, 26 जुलाई 2014

हरियाली तीज : श्रृंगार का उत्सव



हरियाली तीज : श्रृंगार का उत्सव
हरियाली तीज मुख्यत: स्त्रियों का त्योहार है। इस समय जब प्रकृति चारों तरफ हरियाली की चादर सी बिछा देती है तो प्रकृति की इस छटा को देखकर मन पुलकित होकर नाच उठता है। जगह-जगह झूले पड़ते हैं। स्त्रियों के समूह गीत गा-गाकर झूला झूलते हैं। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को श्रावणी तीज कहते हैं। इसे हरितालिका तीज भी कहते हैं। जनमानस में यह हरियाली तीज के नाम से जानी जाती है

रीति रिवाज़
स्त्रियाँ अपने हाथों पर त्योहार विशेष को ध्यान में रखते हुए भिन्न-भिन्न प्रकार की मेहंदी लगाती हैं। मेहंदी रचे हाथों से जब वह झूले की रस्सी पकड़ कर झूला झूलती हैं तो यह दृश्य बड़ा ही मनोहारी लगता हैं मानो सुहागिन आकाश को छूने चली हैं। इस दिन सुहागिन स्त्रियाँ सुहागी पकड़कर सास के पांव छूकर उन्हें देती हैं। यदि सास न हो तो स्वयं से बड़ों को अर्थात जेठानी या किसी वृद्धा को देती हैं। इस दिन कहीं-कहीं स्त्रियाँ पैरों में आलता भी लगाती हैं जो सुहाग का चिह्न माना जाता है। हरियाली तीज के दिन अनेक स्थानों पर मेले लगते हैं और माता पार्वती की सवारी बड़े धूमधाम से निकाली जाती है। वास्तव में देखा जाए तो हरियाली तीज कोई धार्मिक त्योहार नहीं वरन महिलाओं के लिए एकत्र होने का एक उत्सव है। नवविवाहित लड़कियों के लिए विवाह के पश्चात पड़ने वाले पहले सावन के त्योहार का विशेष महत्त्व होता है।
पौराणिक महत्त्व

    श्रावण शुक्ल तृतीया (तीज) के दिन भगवती पार्वती सौ वर्षों की तपस्या साधना के बाद भगवान शिव से मिली थीं।
    माँ पार्वती का इस दिन पूजन - आह्वान विवाहित स्त्री - पुरुष के जीवन में हर्ष प्रदान करता है।
    समस्त उत्तर भारत में तीज पर्व बड़े उत्साह और धूमधाम से मनाया जाता है।
    इसे श्रावणी तीज, हरियाली तीज तथा कजली तीज भी कहते हैं।
    बुन्देलखंड के जालौन, झाँसी, दनिया, महोबा, ओरछा आदि क्षेत्रों में इसे हरियाली तीज के नाम से व्रतोत्सव के रूप में मनाते हैं।
    पूर्वी उत्तर प्रदेश, बनारस, मिर्ज़ापुर, देवलि, गोरखपुर, जौनपुर, सुल्तानपुर आदि ज़िलों में इसे कजली तीज के रूप में मनाने की परम्परा है। लोकगायन की एक प्रसिद्ध शैली भी इसी नाम से प्रसिद्ध हो गई है, जिसे 'कजली' कहते हैं।

**** राजस्थान के लोगों के लिए त्योहार ही जीवन का सार है।
    तीज के आगमन के हर्ष में मोर हर्षित हो नृत्य करने लगते हैं।
    स्त्रियाँ उद्यानों में लगे रस्सी के झूले में झूलकर प्रसन्नचित् होती हैं तथा सुरीले गीतों से वातावरण गूँज उठता है। तीज सावन (जुलाई–अगस्त) के महीने में शुक्लपक्ष के तीसरे दिन मनाई जाती है।

तीज उत्सव की परम्परा
तीज भारत के अनेक भागों में मनाई जाती है, परन्तु राजस्थान की राजधानी जयपुर में इसका विशेष महत्त्व है। तीज का आगमन भीषण ग्रीष्म ऋतु के बाद पुनर्जीवन व पुनर्शक्ति के रूप में होता है। यदि इस दिन वर्षा हो, तो यह और भी स्मरणीय हो उठती है। लोग तीज जुलूस में ठंडी बौछार की कामना करते हैं। ग्रीष्म ऋतु के समाप्त होने पर काले - कजरारे मेघों को आकाश में घुमड़ता देखकर पावस के प्रारम्भ में पपीहे की पुकार और वर्षा की फुहार से आभ्यंतर आनन्दित हो उठता है। ऐसे में भारतीय लोक जीवन कजली या हरियाली तीज का पर्वोत्सव मनाता है। आसमान में घुमड़ती काली घटाओं के कारण ही इस त्योहार या पर्व को 'कजली' या 'कज्जली तीज' तथा पूरी प्रकृति में हरियाली के कारण 'तीज' के नाम से जाना जाता है।
इस त्योहार पर लड़कियों को ससुराल से पीहर बुला लिया जाता है। विवाह के पश्चात पहला सावन आने पर लड़की को ससुराल में नहीं छोड़ा जाता है। नवविवाहिता लड़की की ससुराल से इस त्योहार पर सिंजारा भेजा जाता है। हरियाली तीज से एक दिन पहले सिंजारा मनाया जाता है। इस दिन नवविवाहिता लड़की की ससुराल से वस्त्र, आभूषण, शृंगार का सामान, मेहंदी और मिठाई भेजी जाती है। इस दिन मेहंदी लगाने का विशेष महत्त्व है।
****साज– श्रृंगार और आनन्द का उत्सव
    तीज पूर्ण रूप से स्त्रियों का उत्सव है।
    स्त्रियाँ आकर्षक परिधानों से सुसज्जित हो भगवती पार्वती की उपासना करती हैं।
    राजस्थान में जिन कन्याओं की सगाई हो गई होती है, उन्हें अपने भविष्य के सास - ससुर से एक दिन पहले ही भेंट मिलती है।
    इस भेंट को स्थानीय भाषा में "शिंझार" (शृंगार) कहते हैं।
    शिंझार में अनेक वस्तुएँ होती हैं। जैसे - मेंहदी, लाख की चूड़ियाँ, लहरिया नामक विशेष वेश–भूषा, जिसे बाँधकर रंगा जाता है तथा एक मिष्टान जिसे "घेवर" कहते हैं।

तीज उत्सव की विशेष रस्म–बया
    इसमें अनेक भेंट वस्तुएँ होती हैं, जिसमें वस्त्र व मिष्ठान होते हैं। इसे माँ अपनी विवाहित पुत्री को भेजती है। पूजा के बाद 'बया' को सास को सुपुर्द कर दिया जाता है।
    पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी यदि कन्या ससुराल में है, तो मायके से तथा यदि मायके में है, तो ससुराल से मिष्ठान, कपड़े आदि भेजने की परम्परा है। इसे स्थानीय भाषा में 'तीज' की भेंट कहा जाता है।
    राजस्थान हो या पूर्वी उत्तर प्रदेश प्रायः नवविवाहिता युवतियों को सावन में ससुराल से मायके बुला लेने की परम्परा है।
    सभी विवाहिताएँ इस दिन विशेष रूप से शृंगार करती हैं।
    सायंकाल बन ठनकर सरोवर के किनारे उत्सव मनाती हैं और उद्यानों में झूला झूलते हुए कजली के गीत गाती हैं।

मेंहदी रचाने का उत्सव
इस अवसर पर नवयुवतियाँ हाथों में मेंहदी रचाती हैं। तीज के गीत हाथों में मेंहदी लगाते हुए गाये जाते हैं। समूचा वातावरण शृंगार से अभिभूत हो उठता है। इस त्योहार की सबसे बड़ी विशेषता है, महिलाओं का हाथों पर विभिन्न प्रकार से बेलबूटे बनाकर मेंहदी रचाना। पैरों में आलता लगाना, महिलाओं के सुहाग की निशानी है। राजस्थान में हाथों व पाँवों में भी विवाहिताएँ मेंहदी रचाती हैं। जिसे "मेंहदी - माँडना" कहते हैं। इस दिन राजस्थानी बालाएँ दूर देश गए अपने पति के तीज पर आने की कामना करती हैं। जो कि उनके लोकगीतों में भी मुखरित होता है। तीज पर तीन बातें त्यागने का विधान है -

    पति से छल–कपट
    झूठ एवं दुर्व्यवहार करना
    परनिन्दा

मल्हार और झूलों का उत्सव
तीज के दिन का विशेष कार्य होता है, खुले स्थान पर बड़े–बड़े वृक्षों की शाखाओं पर झूला बाँधना। झूला स्त्रियों के लिए बहुत ही मनभावन अनुभव है। मल्हार गाते हुए मेंहदी रचे हुए हाथों से रस्सी पकड़े झूलना एक अनूठा अनुभव ही तो है। सावन में तीज पर झूले न लगें, तो सावन क्या? तीज के कुछ दिन पूर्व से ही पेड़ों की डालियों पर, घर की छत की कड़ों या बरामदे में कड़ों में झूले पड़ जाते हैं और नारियाँ, सखी - सहेलियों के संग सज - संवरकर लोकगीत, कजरी आदि गाते हुए झूला झूलती हैं। पूरा वातावरण ही उनके गीतों के मधुर लयबद्ध सुरों से रसमय, गीतमय और संगीतमय हो उठता है।
**** जयपुर का तीज माता उत्सव और जुलूस
    जयपुर के राजाओं के समय में पार्वती जी की प्रतिमा, जिसे 'तीज माता' कहते हैं, को एक जुलूस उत्सव में दो दिन तक ले जाया जाता था।
    उत्सव से कुछ पूर्व प्रतिमा में दोबारा से रंगकारी की जाती है तथा त्योहार वाले दिन इसे नवपरिधानों से सजाया जाता है।
    पारम्परिक आभूषणों से सुसज्जित राजपरिवार की स्त्रियाँ मूर्ति की पूजा, जनाना कमरे में करती हैं।
    इसके पश्चात प्रतिमा को जुलूस में सम्मिलित होने के लिए प्रांगण में ले जाया जाता है।
    हज़ारों दर्शक बड़ी अधीरता से भगवती की एक झलक पाने के लिए लालायित हो उठते हैं।
    लोगों की अच्छी ख़ासी भीड़ होती है। मार्ग के दोनों ओर, छतों पर हज़ारों ग्रामीण अपने पारम्परिक रंग–बिरंगे परिधानों में एकत्रित होते हैं।
    पुरोहित द्वारा बताए गए शुभ मुहूर्त में, जुलूस का नेतृत्व निशान का हाथी (इसमें एक विशेष ध्वजा बाँधी जाती है) करता है। सुसज्जित हाथी, बैलगाड़ियाँ व रथ इस जुलूस को अत्यन्त ही मनोहारी बना देते हैं।
    यह जुलूस फिर त्रिपोलिया द्वार से प्रस्थान करता है और तभी लम्बी प्रतीक्षा के बाद तीज प्रतिमा दृष्टिगोचर होती है। भीड़ आगे बढ़ प्रतिमा की एक झलक के रूप में आशीर्वाद पाना चाहती है।
    जैसे ही जुलूस आँखों से ओझल होता है, भीड़ तितर–बितर होना आरम्भ हो जाती है। लोग घर लौटकर अगले त्योहार की तैयारी में लग जाते हैं।
    तीज, नृत्य व संगीत का उल्लास भरा पर्व है। सभी प्रसन्न हो, अन्त में स्वादिष्ट भोजन का आनन्द लेते हैं।
    प्रकृति एवं मानव हृदय की भव्य भावना की अभिव्यक्ति तीज पर्व (कजली तीज, हरियाली तीज व श्रावणी तीज) में निहित है।
    इस त्योहार के आस–पास खेतों में ख़रीफ़ की बुवाई भी शुरू हो जाती है। अतः लोकगीतों में उस त्योहार को सुखद, सुरम्य और सुहावने रूप में गाया–मनाया जाता है।

रामराज्य : आदर्श राज्य व्यवस्था


रामराज्य का वर्णन

चौपाई :
* दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥1॥

भावार्थ:-'रामराज्य' में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसी को नहीं व्यापते। सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं और वेदों में बताई हुई नीति (मर्यादा) में तत्पर रहकर अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं॥1॥

* चारिउ चरन धर्म जग माहीं। पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं॥
राम भगति रत नर अरु नारी। सकल परम गति के अधिकारी॥2॥

भावार्थ:-धर्म अपने चारों चरणों (सत्य, शौच, दया और दान) से जगत्‌ में परिपूर्ण हो रहा है, स्वप्न में भी कहीं पाप नहीं है। पुरुष और स्त्री सभी रामभक्ति के परायण हैं और सभी परम गति (मोक्ष) के अधिकारी हैं॥2॥

* अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा॥
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना॥3॥

भावार्थ:-छोटी अवस्था में मृत्यु नहीं होती, न किसी को कोई पीड़ा होती है। सभी के शरीर सुंदर और निरोग हैं। न कोई दरिद्र है, न दुःखी है और न दीन ही है। न कोई मूर्ख है और न शुभ लक्षणों से हीन ही है॥3॥

*सब निर्दंभ धर्मरत पुनी। नर अरु नारि चतुर सब गुनी॥
सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी॥4॥

भावार्थ:-सभी दम्भरहित हैं, धर्मपरायण हैं और पुण्यात्मा हैं। पुरुष और स्त्री सभी चतुर और गुणवान्‌ हैं। सभी गुणों का आदर करने वाले और पण्डित हैं तथा सभी ज्ञानी हैं। सभी कृतज्ञ (दूसरे के किए हुए उपकार को मानने वाले) हैं, कपट-चतुराई (धूर्तता) किसी में नहीं है॥4॥

दोहा :
* राम राज नभगेस सुनु सचराचर जग माहिं।
काल कर्म सुभाव गुन कृत दुख काहुहि नाहिं॥21॥

भावार्थ:-(काकभुशुण्डिजी कहते हैं-) हे पक्षीराज गुरुड़जी! सुनिए। श्री राम के राज्य में जड़, चेतन सारे जगत्‌ में काल, कर्म स्वभाव और गुणों से उत्पन्न हुए दुःख किसी को भी नहीं होते (अर्थात्‌ इनके बंधन में कोई नहीं है)॥21॥

चौपाई :
* भूमि सप्त सागर मेखला। एक भूप रघुपति कोसला॥
भुअन अनेक रोम प्रति जासू। यह प्रभुता कछु बहुत न तासू॥1॥
भावार्थ:-अयोध्या में श्री रघुनाथजी सात समुद्रों की मेखला (करधनी) वाली पृथ्वी के एक मात्र राजा हैं। जिनके एक-एक रोम में अनेकों ब्रह्मांड हैं, उनके लिए सात द्वीपों की यह प्रभुता कुछ अधिक नहीं है॥1॥

*सो महिमा समुझत प्रभु केरी। यह बरनत हीनता घनेरी॥
सोउ महिमा खगेस जिन्ह जानी॥ फिरि एहिं चरित तिन्हहुँ रति मानी॥2॥
भावार्थ:-बल्कि प्रभु की उस महिमा को समझ लेने पर तो यह कहने में (कि वे सात समुद्रों से घिरी हुई सप्त द्वीपमयी पृथ्वी के एकच्छत्र सम्राट हैं) उनकी बड़ी हीनता होती है, परंतु हे गरुड़जी! जिन्होंने वह महिमा जान भी ली है, वे भी फिर इस लीला में बड़ा प्रेम मानते हैं॥2॥

* सोउ जाने कर फल यह लीला। कहहिं महा मुनिबर दमसीला॥
राम राज कर सुख संपदा। बरनि न सकइ फनीस सारदा॥3॥
भावार्थ:-क्योंकि उस महिमा को भी जानने का फल यह लीला (इस लीला का अनुभव) ही है, इन्द्रियों का दमन करने वाले श्रेष्ठ महामुनि ऐसा कहते हैं। रामराज्य की सुख सम्पत्ति का वर्णन शेषजी और सरस्वतीजी भी नहीं कर सकते॥3॥

* सब उदार सब पर उपकारी। बिप्र चरन सेवक नर नारी॥
एकनारि ब्रत रत सब झारी। ते मन बच क्रम पति हितकारी॥4॥
भावार्थ:-सभी नर-नारी उदार हैं, सभी परोपकारी हैं और ब्राह्मणों के चरणों के सेवक हैं। सभी पुरुष मात्र एक पत्नीव्रती हैं। इसी प्रकार स्त्रियाँ भी मन, वचन और कर्म से पति का हित करने वाली हैं॥4॥

दोहा :
* दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज।
जीतहु मनहि सुनिअ अस रामचंद्र कें राज॥22॥
भावार्थ:-श्री रामचंद्रजी के राज्य में दण्ड केवल संन्यासियों के हाथों में है और भेद नाचने वालों के नृत्य समाज में है और 'जीतो' शब्द केवल मन के जीतने के लिए ही सुनाई पड़ता है (अर्थात्‌ राजनीति में शत्रुओं को जीतने तथा चोर-डाकुओं आदि को दमन करने के लिए साम, दान, दण्ड और भेद- ये चार उपाय किए जाते हैं। रामराज्य में कोई शत्रु है ही नहीं, इसलिए 'जीतो' शब्द केवल मन के जीतने के लिए कहा जाता है। कोई अपराध करता ही नहीं, इसलिए दण्ड किसी को नहीं होता, दण्ड शब्द केवल संन्यासियों के हाथ में रहने वाले दण्ड के लिए ही रह गया है तथा सभी अनुकूल होने के कारण भेदनीति की आवश्यकता ही नहीं रह गई। भेद, शब्द केवल सुर-ताल के भेद के लिए ही कामों में आता है।)॥22॥

चौपाई :
* फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहिं एक सँग गज पंचानन॥
खग मृग सहज बयरु बिसराई। सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई॥1॥
भावार्थ:-वनों में वृक्ष सदा फूलते और फलते हैं। हाथी और सिंह (वैर भूलकर) एक साथ रहते हैं। पक्षी और पशु सभी ने स्वाभाविक वैर भुलाकर आपस में प्रेम बढ़ा लिया है॥1॥

* कूजहिं खग मृग नाना बृंदा। अभय चरहिं बन करहिं अनंदा॥
सीतल सुरभि पवन बह मंदा। गुंजत अलि लै चलि मकरंदा॥2॥
भावार्थ:-पक्षी कूजते (मीठी बोली बोलते) हैं, भाँति-भाँति के पशुओं के समूह वन में निर्भय विचरते और आनंद करते हैं। शीतल, मन्द, सुगंधित पवन चलता रहता है। भौंरे पुष्पों का रस लेकर चलते हुए गुंजार करते जाते हैं॥2॥

* लता बिटप मागें मधु चवहीं। मनभावतो धेनु पय स्रवहीं॥
ससि संपन्न सदा रह धरनी। त्रेताँ भइ कृतजुग कै करनी॥3॥
भावार्थ:-बेलें और वृक्ष माँगने से ही मधु (मकरन्द) टपका देते हैं। गायें मनचाहा दूध देती हैं। धरती सदा खेती से भरी रहती है। त्रेता में सत्ययुग की करनी (स्थिति) हो गई॥3॥

* प्रगटीं गिरिन्ह बिबिधि मनि खानी। जगदातमा भूप जग जानी॥
सरिता सकल बहहिं बर बारी। सीतल अमल स्वाद सुखकारी॥4॥
भावार्थ:-समस्त जगत्‌ के आत्मा भगवान्‌ को जगत्‌ का राजा जानकर पर्वतों ने अनेक प्रकार की मणियों की खानें प्रकट कर दीं। सब नदियाँ श्रेष्ठ, शीतल, निर्मल और सुखप्रद स्वादिष्ट जल बहाने लगीं॥।4॥

* सागर निज मरजादाँ रहहीं। डारहिं रत्न तटन्हि नर लहहीं॥
सरसिज संकुल सकल तड़ागा। अति प्रसन्न दस दिसा बिभागा॥5॥
भावार्थ:-समुद्र अपनी मर्यादा में रहते हैं। वे लहरों द्वारा किनारों पर रत्न डाल देते हैं, जिन्हें मनुष्य पा जाते हैं। सब तालाब कमलों से परिपूर्ण हैं। दसों दिशाओं के विभाग (अर्थात्‌ सभी प्रदेश) अत्यंत प्रसन्न हैं॥5॥

दोहा :
*बिधु महि पूर मयूखन्हि रबि तप जेतनेहि काज।
मागें बारिद देहिं जल रामचंद्र कें राज॥23॥
भावार्थ:-श्री रामचंद्रजी के राज्य में चंद्रमा अपनी (अमृतमयी) किरणों से पृथ्वी को पूर्ण कर देते हैं। सूर्य उतना ही तपते हैं, जितने की आवश्यकता होती है और मेघ माँगने से (जब जहाँ जितना चाहिए उतना ही) जल देते हैं॥23॥

चौपाई :
* कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे। दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे॥
श्रुति पथ पालक धर्म धुरंधर। गुनातीत अरु भोग पुरंदर॥1॥
भावार्थ:-प्रभु श्री रामजी ने करोड़ों अश्वमेध यज्ञ किए और ब्राह्मणों को अनेकों दान दिए। श्री रामचंद्रजी वेदमार्ग के पालने वाले, धर्म की धुरी को धारण करने वाले, (प्रकृतिजन्य सत्व, रज और तम) तीनों गुणों से अतीत और भोगों (ऐश्वर्य) में इन्द्र के समान हैं॥1॥

* पति अनुकूल सदा रह सीता। सोभा खानि सुसील बिनीता॥
जानति कृपासिंधु प्रभुताई॥ सेवति चरन कमल मन लाई॥2॥
भावार्थ:-शोभा की खान, सुशील और विनम्र सीताजी सदा पति के अनुकूल रहती हैं। वे कृपासागर श्री रामजी की प्रभुता (महिमा) को जानती हैं और मन लगाकर उनके चरणकमलों की सेवा करती हैं॥2॥
* जद्यपि गृहँ सेवक सेवकिनी। बिपुल सदा सेवा बिधि गुनी॥
निज कर गृह परिचरजा करई। रामचंद्र आयसु अनुसरई॥3॥
भावार्थ:-यद्यपि घर में बहुत से (अपार) दास और दासियाँ हैं और वे सभी सेवा की विधि में कुशल हैं, तथापि (स्वामी की सेवा का महत्व जानने वाली) श्री सीताजी घर की सब सेवा अपने ही हाथों से करती हैं और श्री रामचंद्रजी की आज्ञा का अनुसरण करती हैं॥3॥
* जेहि बिधि कृपासिंधु सुख मानइ। सोइ कर श्री सेवा बिधि जानइ॥
कौसल्यादि सासु गृह माहीं। सेवइ सबन्हि मान मद नाहीं॥4॥
भावार्थ:-कृपासागर श्री रामचंद्रजी जिस प्रकार से सुख मानते हैं, श्री जी वही करती हैं, क्योंकि वे सेवा की विधि को जानने वाली हैं। घर में कौसल्या आदि सभी सासुओं की सीताजी सेवा करती हैं, उन्हें किसी बात का अभिमान और मद नहीं है॥4॥
* उमा रमा ब्रह्मादि बंदिता। जगदंबा संततमनिंदिता॥5॥
भावार्थ:-(शिवजी कहते हैं-) हे उमा जगज्जननी रमा (सीताजी) ब्रह्मा आदि देवताओं से वंदित और सदा अनिंदित (सर्वगुण संपन्न) हैं॥5॥
दोहा :
* जासु कृपा कटाच्छु सुर चाहत चितव न सोइ।
राम पदारबिंद रति करति सुभावहि खोइ॥24॥
भावार्थ:-देवता जिनका कृपाकटाक्ष चाहते हैं, परंतु वे उनकी ओर देखती भी नहीं, वे ही लक्ष्मीजी (जानकीजी) अपने (महामहिम) स्वभाव को छोड़कर श्री रामचंद्रजी के चरणारविन्द में प्रीति करती हैं॥24॥
चौपाई :
* सेवहिं सानकूल सब भाई। राम चरन रति अति अधिकाई॥
प्रभु मुख कमल बिलोकत रहहीं। कबहुँ कृपाल हमहि कछु कहहीं॥1॥
भावार्थ:-सब भाई अनुकूल रहकर उनकी सेवा करते हैं। श्री रामजी के चरणों में उनकी अत्यंत अधिक प्रीति है। वे सदा प्रभु का मुखारविन्द ही देखते रहते हैं कि कृपालु श्री रामजी कभी हमें कुछ सेवा करने को कहें॥1॥
* राम करहिं भ्रातन्ह पर प्रीती। नाना भाँति सिखावहिं नीती॥
हरषित रहहिं नगर के लोगा। करहिं सकल सुर दुर्लभ भोगा॥2॥
भावार्थ:-श्री रामचंद्रजी भी भाइयों पर प्रेम करते हैं और उन्हें नाना प्रकार की नीतियाँ सिखलाते हैं। नगर के लोग हर्षित रहते हैं और सब प्रकार के देवदुर्लभ (देवताओं को भी कठिनता से प्राप्त होने योग्य) भोग भोगते हैं॥2॥
* अहनिसि बिधिहि मनावत रहहीं। श्री रघुबीर चरन रति चहहीं॥
दुइ सुत सुंदर सीताँ जाए। लव कुस बेद पुरानन्ह गाए॥3॥
भावार्थ:-वे दिन-रात ब्रह्माजी को मनाते रहते हैं और (उनसे) श्री रघुवीर के चरणों में प्रीति चाहते हैं। सीताजी के लव और कुश ये दो पुत्र उत्पन्न हुए, जिनका वेद-पुराणों ने वर्णन किया है॥3॥
* दोउ बिजई बिनई गुन मंदिर। हरि प्रतिबिंब मनहुँ अति सुंदर॥
दुइ दुइ सुत सब भ्रातन्ह केरे। भए रूप गुन सील घनेरे॥4॥
भावार्थ:-वे दोनों ही विजयी (विख्यात योद्धा), नम्र और गुणों के धाम हैं और अत्यंत सुंदर हैं, मानो श्री हरि के प्रतिबिम्ब ही हों। दो-दो पुत्र सभी भाइयों के हुए, जो बड़े ही सुंदर, गुणवान्‌ और सुशील थे॥4॥
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आदर्श लोकतंत्र भी था रामराज्य
April - 18 - 2013 निरंकार सिंह


सदियों से आदर्श राज्य व्यवस्था के लिए रामराज्य का उदाहरण दिया जाता रहा है। महात्मा गांधी ने भी जिस राम राज्य की कल्पना की थी उसमें आदर्श लोकतंत्र के सभी गुण मौजूद हैं। हालांकि लोकतंत्र की आधुनिक परिभाषा के अनुसार राम राज्य को लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता है। वह मर्यादित राजतंत्र था। लेकिन वह एक ऐसा राजतंत्र था जिसमें श्रेष्ठ लोकतंत्र और कुलीन तंत्र की सभी विशेषताओं को सम्मिलित कर लिया गया था। राम राज्य में राजा राम राज्य के कानून एवं समाज की मर्यादाओं का पालन करते हैं। राज्य द्वारा बनाये गये कानून और विधान केवल जनता के लिए नहीं हैं, राजा के लिए भी हैं। राम का आचरण इसका प्रमाण माना गया है। राम के अनुसार राजा का आचरण जिस प्रकार का होता है, प्रजा का आचरण भी उसी प्रकार का होता है। इसलिए अपनी प्रजा को कोई बात कहने से पहले वे स्वयं उस पर आचरण करते थे। वाल्मीकि ने अपनी रामायण में राम राज्य में जनता की खुशहाली पर प्रकाश डाला है। उस समय पुरवासी और जनपदवासी अत्यन्त खुशहाल थे। डाकुओं और चोरों का तो राज्य में कहीं कोई ठिकाना ही नहीं था। सभी अपने अपने कार्य से संतुष्ट थे। रामराज्य में प्रजा छल प्रपंच से दूर रहती थी और लोग धर्म परायण थे। हर व्यक्ति की बात सुनी जाती थी।
शुक्र नीति के अनुसार राजा ही काल का कारण होता है। सत् और असत् गुणों का प्रवर्तक राजा ही होता है। राजा ही प्रजा को धर्म में प्रतिष्ठित करता है। राम राज्य इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। वास्तव में नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ के परम रहस्य को राम ही जानते थे। लोकतंत्रात्मक शासन में शासन की सम्पूर्ण गतिविधि जनसमूह की इच्छा का अनुसरण करने वाली होनी चाहिए। उसमें अपने या भाई-भतीजों के स्वार्थवश शासन कभी जनसामान्य की इच्छा को नहीं ठुकरा सकता। धर्मनियंत्रित राजतंत्र में भी लोकतंत्र के ये गुण बहुत उत्कृष्ट रूप में व्यक्त होते हैं। राम ने अपनी प्रतिज्ञा में इन्हीं भावों को व्यक्त किया था। स्नेह, दया, सुख यहां तक कि अपनी हृदयेश्वरी जनक नन्दिनी को भी त्यागना पड़ा तो उन्हें संकोच नहीं हुआ। आदर्श लोकतंत्र के सभी गुण राम राज्य व्यवस्था में दिखाई देते हैं। राम राज्य में समाज के कमजोर से भी कमजोर व्यक्ति की सुनवाई होती है।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार राजतंत्र होते हुए भी रघुवंशियों के राज्य काल में लोकतंत्र अक्षुण्ण था। इसलिए महाराज दशरथ को भी राम को युवराज बनाने के लिए जन स्वीकृति लेनी पड़ी थी। उस समय भी मंत्री वही होते थे जो पौरों एवं जनपदों के विश्वासपात्र होते थे। राजा की सभा में सभी जातियों के मुख्य लोग सभासद होते थे। राम जाति, धर्म, देश, श्रेणी धर्म तथा कुल धर्मों को जानते एवं उसका पालन करते थे। भारतीय नीति एवं राजधर्म में राजा का आचरण ही आदर्श राज्य का आधार होता है। राजा चाहे व्यक्ति हो या दल वह अपने व्यवहार से समाज का उन्नायक होता है। अतएव राम ने अपने आचरण द्वारा प्रजा तथा समाज को आदर्श रूप में ढाला था। राम का वैयक्तिक जीवन भी समाज के लिए ही था। तभी तो वे लोकाराधन के लिए वैयक्तिक स्नेह, दया, सुख तथा जानकी तक को त्यागने को तैयार थे। राम राज्य में कर के रूप में उचित धन लिया जाता था। यज्ञ-याज्ञों में धन दान दिया जाता था। तुलसी के अनुसार ‘श्रुतिपालक धर्मधुरन्धर’ राम ने विधान नहीं बनाया, किन्तु आदर्श आचरण उपस्थित किया। तुलसी के राम ने राजधर्म का सर्वस्व यही कहा था कि प्रजा के विभिन्न वर्गों का उनकी स्थिति, क्षमता और संस्कार के अनुसार पालन-पोषण करना राजा का कर्तव्य है, परन्तु विवेक के साथ। मुख द्वारा भक्षित अन्न रस रूप से हस्त, पाद, नेत्र, श्रोत, हृदय, मन, बुद्धि आदि सबको प्रभावित करता है परन्तु सबकी योग्यता तथा आवश्यकता एक सी नहीं है। ‘हाथी को मन भर चींटी को कण भर’ की कहावत प्रसिद्ध ही है।
धर्म नियंत्रित विवेकी राजा ही विभिन्न परिस्थितियों, व्यक्तियों एवं श्रेणियों के साथ गुणोचित कुशलता के साथ व्यवहार कर सकता है। भारतीय राजा उतना शासक नहीं होता था जितना प्रजा के हित का परामर्शदाता। श्री राम प्रजा को आत्मीयता की दृष्टि से उपदेश करते हैं राजा के रुआब में नहीं। ऐसा राजा ही प्रजा के हृदय सिंहासन का अधीश्वर होता है। इसलिए राम राज्य में भौतिक आदि ताप किसी को नहीं व्यापते थे। उच्च धर्मनिष्ठा एवं ब्रह्मïनिष्ठा का ही परिणाम था कि किसी की अकाल मृत्यु नहीं होती थी। सभी नीरोग होते थे। कोई दु:खी, दरिद्र नहीं होता था। कोई मूर्ख एवं दुर्लक्षण वाला भी नहीं होता था। वाल्मीकि रामायण के अनुसार राम का मंत्रिमंडल था, जिसमें विनय, शील, कार्यकुशल, जितेन्द्रिय,अस्त्र-शस्त्र कुशल, पराक्रमी मंत्री थे।
हमारे देश के संवैधानिक ढांचे के अन्तर्गत ही राम राज्य शासन व्यवस्था अपनायी जा सकती है। उ.प्र. के योजनाकार जगदीश पाण्डेय ने एक ऐसी कार्य योजना तैयार की है जिसमें रामराज्य जैसे प्रशासन के ढांचे की पूरी रूपरेखा है। देश की सामाजिक,आर्थिक एवं राजनैतिक परिस्थितियों को देखते हुए यह ऐसा विकल्प है जिसे लागू करके आत्मनिर्भर भारत का निर्माण किया जा सकता है। पिछले 65 वर्षों में भारतीय शासन-प्रशासन का विकास, जनविरोधी, निहित स्वार्थों से कुंठित, अदूरदर्शी एवं राजनैतिक परिस्थितियों में हुआ है। राम राज्य व्यवस्था ही इस देश को संकट से बचा सकती है।
एक पार्टी राम की भावना लहर में चढ़कर सत्ता में आयी थी। पर उसके शासन में भी राम राज्य से वांछित प्रेरणा नहीं ली गई। राम राज्य के लिए शासन से जुड़े लोगों को स्वार्थ त्यागना होगा। पिछली सरकारों की कमजोरियों से उबरना होगा। राम राज्य व्यवस्था की कार्य योजना लागू करनी होगी। इसके अंतर्गत सार्वजनिक धन के कुल व्यय एवं लोक ऊर्जा के शत-प्रतिशत सदुपयोग की योजना तैयार की गयी है। राज्य स्तर पर कार्यकारिणी और सलाहकार मंडल की 25 समितियों के सहयोग से राज्यपाल और प्रशासनिक विभागों के सचिवों पर नियमानुसार दबाव बनाकर शासन-प्रशासन की समस्या के निदान पर जोर दिया गया है। शासन पर वोट के अंकुश से जनहित के लिए दबाव बनाया गया है। नौकरशाहों पर जन पर्यवेक्षण की व्यवस्था को लागू कर उन्हें नियंत्रित करने और नियम कानून, आचार संहिता का दंड चलाकर ‘नेता नौकरशाह गठबंधन’ को ध्वस्त करने की योजना बनायी गयी है।
हमारे पास प्राकृतिक सम्पदा और मानवीय शक्ति की कमी नहीं है। लेकिन नेतृत्व भी व्यवस्था परिवर्तन से भयभीत है और वह इस नयी व्यवस्था को लागू नहीं करना चाहता है। आवश्यकता है हम अपनी ताकत को जानें और इस नयी कार्ययोजना के अनुसार काम में जुट जायें।
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राम राज्य का विचार सपने में बना हुआ है: राष्ट्रपति
Tuesday, 4 February, 2014

नई दिल्ली : राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने आज कहा कि ‘रामराज्य’ का विचार इस देश के सपने और आकांक्षाओं में बना हुआ है। तेल मंत्री वीरप्पा मोईली के महाकाव्य ‘श्री रामायण अन्वेषणम’ का हिंदी संस्करण जारी करते हुए मुखर्जी ने कहा कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का रामराज्य कोई सामाजिक विचार नहीं बल्कि एक शासन कौशल का एक मॉडल है।
उन्होंने कहा, जब गांधीजी रामराज्य का सपना देखते थे तब यह कोई सामाजिक विचार नहीं था बल्कि यह शासन कौशल का एक मॉडल है। हम उसे वास्तविकता में लागू नहीं कर पाए है लेकिन यह अब भी हमारे सपनों में बना हुआ है, यह हमारी कल्पनाओं में बना हुआ है जिसकी हम आकांक्षा पालते हैं। मोईली के दो खंड के इस महाकाव्य का कन्नड़ से हिंदी में अनुवाद प्रधान गुरूदत्ता ने किया है जिसे राष्ट्रपति को सौंपा गया।
मुखर्जी ने कहा कि कुछ नेताओं ने ही अपने विचार को कलमबद्ध किया है और मोईली उनमें से एक हैं जिन्होंने सरकारी दायित्व निभाते हुए अपने विचारों को कविता के रूप में पिरोया। (एजेंसी)