रविवार, 27 जुलाई 2014

पूर्व जन्मों की यादें



पुर्न जन्म की यादें
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ईश्वरीय करिश्मा, हत्यारे के घर ही लिया जन्म
चंडीगढ। समय से पहले मिली मौत के निशान दूसरे जन्म में मिले शरीर को दाग दे जाते हैं। पीजीआई के न्यूरोलॉजी विभाग की स्टडी कहती है कि अगर व्यक्ति अप्राकृतिक मौत का शिकार (हत्या, डूबना, स़डक हादसा या दुर्घटना) होता है तो आखिरी समय में वह जो भी कष्ट सहता है, वह बर्थ मार्क के रूप में अगले जन्म तक साथ नहीं छोडता।

स्टडी पिछले जन्मों के ऎसे कई राज खोलती है, जिसमें मौत के दो साल बाद व्यक्ति का पुर्न जन्म हुआ और उसे अपने पिछले जन्म के हर रिश्ते की याद थी। न्यूरोलॉजी विभाग पुर्न जन्म की थ्यौरी को सुलझाने के लिए 20 सालों से काम कर रहा है। एक मामूली सी चोट पर जोर-जोर से चिल्लाने वाले 5 साल के धु्रव (बदला नाम) को जब दिमागी रोग समझ बलटाना से पीजीआई इलाज को लाया गया तब पता चला कि धु्रव की यादों में मौजूदा नहीं पिछले जन्म का डर था। धु्रव की टांग में लगी चोट को जब मां दुपट्टे से बांधने लगी तो धु्रव ने मां को धक्का देकर कहा दूर हो जाओ तुम मेरा गला दबा दोगी।

धु्रव ने पिता को बताया कि उसका घर दूसरा है जहां उसके मम्मी-पापा, बहन, बीवी और बच्चे भी हैं। 6 साल की उम्र में धु्रव मां-बाप को सहारनपुर ले गया और वहां पिछले जन्म के मां, बाप और बीवी को पहचान लिया। पिछले जन्म के पिता ने धु्रव से पूछा फैवरेट चीज क्या थी तब धु्रव ने कहा वो ƒ़ाडी जो आपने कलाई पर बांध रखी है।

धु्रव की बात सुनकर पिता रो प़डे और कहने लगे कि मैंने बेटे की याद में ही ƒ़ाडी को कलाई पर बांध रखा है। बेटा रोशनलाल फौजी था और उसका किसी ने कार में ही खून कर दिया था। धु्रव ने पिता को बताया कि पिछले जन्म में जब एक केस की गवाही देने के लिए अदालत जा रहे थे तो रास्ते में एक आदमी और औरत ने लिफ्ट मांगी थी। औरत ने कहा कि वह गर्भवती है और चल नहीं सकती। औरत की हालत देख जब कार में लिफ्ट दे दी तो औरत ने आदमी के साथ मिलकर दुपट्टे के साथ मेरा गला दबा दिया था। न्यूरोलॉजिस्ट आज भी केस को फोलो कर रहे हैं और आज काफी साल बीत चुके हैं।

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तीसरे जन्म में दो पूर्व जन्मों की मुकम्मल याद
मनोरंजन Sep 23, 2010/ आर के भारद्वाज
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अब पुनर्जन्म को विश्व के सभी बुद्धिजीवी और विचारक मानने लगे हैं क्योंकि पुनर्जन्म की घटनाएं सब देशों धर्मों, जातियों और संप्रदायों में घट चुकी हैं। ये सारी घटनायें परामनोवैज्ञानिकों ने जांच परख कर सही पाई हैं और उनको लिपिबद्ध कर लिया गया है।

पुनर्जन्म कर्मों को भोगने के कारण होता है। जब तक कर्मों का क्षय या लय नहीं होता, जन्म मरण होता रहता है। जिस घटना का मैं वर्णन कर रहा हूं वह अनोखी इसलिये है कि इसमें एक सम्पन्न, सुखी, पढ़ी लिखी और विदुषी महिला को जीवन भर अपने दो पूर्व जन्मों की पूरी याद बनी रही जबकि बहुधा एक जन्म की याद रहती है और वह भी आठ दस साल की आयु तक ही।

यह घटना मध्प्रदेश के टीकमगढ़ जिले की है जहां 1948 में एक जिला शिक्षा अधिकारी के यहां एक लड़की ने जन्म लिया जिसका नाम स्वर्णलता मिश्र रखा गया। जब बच्ची साढ़े तीन साल की हुई तो उसने कहना शुरू कर दिया कि मेरा घर कटनी में है जहां मेरे माता पिता और चार भाई रहते हैं। तुम लोग मुझे वहां जाने दो।

उसने अपने पूर्व जन्म के पिता जो कटनी के एक प्रतिष्ठित जमीदार थे, और भाइयों के नाम, मकान का पता जो कटनी रेलवे स्टेशन के सामने है, की पूरी पहचान और भाइयों के नाम भी बताये। उसने अपना पहले का नाम विद्या पाठक बताया और कहा कि उसकी शादी मैहर में पांडेय परिवार में हुई थी जहां उसके दो बेटे और एक बेटी रहती हैं तथा उनके नाम भी बताये।

उसने यह भी बताया कि उसकी मृत्यु 31 वर्ष की आयु में हृदयाघात से हुई थी।

बेटी की परत-दर-परत पुनर्जन्म की स्मृतियों को सुनकर पिता चकित रह गये। उन्होंने निश्चय कर लिया कि वह इन सब की सत्यता की पुष्टि करेंगे। समय निकाल कर बच्ची के पिता कटनी जा पहुंचे और खोजबीन की तो आश्चर्य चकित रह गये। बेटी द्वारा बताई गई सारी बातें अक्षरशः सच निकली। ऐसा ही मेहर में भी हुआ जहां उसके पूर्व जन्म के ससुरालीजन रहते थे।

तब उन्हें स्वीकार करना पड़ा कि यह सचमुच ही पुनर्जन्म का मामला है। यह सोच कर कि इन सब बातों को लेकर अफवाहों का दौर चल पड़ेगा, इसलिये उन्होंने इस मामले को सख्ती से दबा दिया और परिजनों से इस संबंध में किसी भी प्रकार की चर्चा करने से मनाही कर दी।

जब बच्ची छतरपुर में जहां उसके पिता का तबादला हो गया था, पाठशाला पढ़ने के लिये जाने लगी तो वहां अपनी सहपठियों को अपनी पूर्व जन्म की बातें बतलाने लगी। यह बात धीरे-धीरे पूरे शहर में फैल गई तो लोग इस अद्भुत बालिका को बड़ी उत्सुकता से देखने आने लगे।

जब तत्कालीन मुख्यमंत्राी प॰ द्वारिका प्रसाद मिश्र छतरपुर आये तो उन्होंने भी यह बात सुनी और बच्ची के घर पहुंच गये। उन्होने स्वर्णलता से मुलाकात की और कई सवाल किये जिस से वह संतुष्ट हुए। तब मुख्यमंत्राी ने राजस्थान के परामनोवैज्ञानिक डा॰ एच॰ बनर्जी को परीक्षण हेतु भेजा।

जांच के बाद डा॰ बनर्जी ने बताया कि यह पुर्नजन्म की सत्य घटना है और इस का कारण दिमाग में अतिरिक्त याददाश्त है जो धीरे-धीरे विस्मृत हो जायेगी। जब कटनी में स्वर्णलता के पूर्व जन्म के रिश्तेदारों ने सुना तो इसको मनगढ़ंत माना लेकिन सही घटना को कब तक नकारते।

सच्चाई जानने के लिये बच्ची का एक भाई छतरपुर अपनी पहचान छिपा कर उसके घर जा पहुंचा। उसने बच्ची के पिता से कहा कि वह इलाहाबाद से आया है और स्वर्णलता से मिलना चाहता है। उसी समय बच्ची जो मन्दिर गई हुई थी, वापस घर आई और मेहमान को देखकर चैंक उठी और प्रसन्न हो कर बोली- अरे बाबू , तुम कब आये।

जब पिता ने कहा कि तुम इन्हें कैसे जानती हो, ये तो इलाहाबाद से आये हैं। स्वर्णलता ने कहा कि नहीं ये कटनी से आये हैं और मेरे बड़े भाई बाबू हैं। यह सुनकर बाबू ने जिसका नाम हरिहर प्रसाद था, बहिन के पांव छू लिये और सच को स्वीकार किया।

बच्ची ने भाई से समस्त परिवार वालों का हालचाल पूछा तथा कई ऐसी बातें भी पूछी जिन को केवल वह और हरि हर प्रसाद ही जानते थे। सब बातों को सुनकर उस को पूर्ण विश्वास हो गया कि स्वर्णलता उनके पूर्व जन्म की बहिन विद्या ही है।

कुछ समय बाद जब पिता उसको लेकर कटनी गये तो स्वर्णलता ने अपने आप अपना घर ढूंढ लिया जबकि उससे पहले वह वहां कभी नहीं गई थी। वहां उसने अपने पिता तथा पूर्व जन्म के अन्य तीनों भाइयों को पहचान लिया। वह जैसे इनको भी पूर्वजन्म में संबोधित करती थी, ठीक वैसे ही किया जिसे देखकर सब को पूर्ण विश्वास हो गया कि विद्या ने ही स्वर्णलता के रूप में पुनर्जन्म लिया है। उसने अपने भाइयों से मैहर का हालचाल भी पूछा जहां उसकी पूर्वजन्म की ससुराल थी। वहां का कुशल क्षेम जान कर वह बड़ी प्रसन्न हुई और मैहर जाने की जिद करने लगी। उस समय न ले जाकर बाद में पिता उसको मैहर ले गये। वहां भी उसने अपने पूर्व जन्म के पति को एक तीनों बेटे-बेटियों को पहचान लिया। उसने तीनों बच्चों को मां के समान प्यार किया। वे लोग भी उसको देखकर बहुत ही खुश हुए।

एक दिन जब स्वर्णलता 5 साल की थी तो वह असमिया भाषा में गाना गाने लगी और असमिया बोली बोलने लगी। पिता के पूछने पर उसने बताया कि उसका एक जन्म तो कटनी में हुआ था तथा एक जन्म आसाम के सिलहठ में हुआ। तब मेरा नाम कमलेश गोस्वामी था तथा मैं चार भाई बहनों में सबसे बड़ी थी।

उसने उस जन्म के मां बाप के नाम भी बताये और कहा कि तब उसकी मृत्यु 8 साल की आयु में कार दुर्घटना में हो गई थी जब वह शाला जा रही थी। बच्ची को आसाम की बोली, गीत एवं नृत्य आते थे जो गुजरते वक्त के साथ धुंधले होते चले गये लेकिन दूसरे जन्म की यादें रह गई थी और वह उस जन्म के स्वजनों से मिलने के लिये बेताब रहने लगी परन्तु वह क्षेत्रा देश के बंटवारे के साथ पूर्वी पाकिस्तान अब बंगला देश में चला गया जिस से उन लोगों से मिलना नहीं हो सका।

स्वर्णलता पढ़ने में बहुत होशियार थी। उसकी बुद्वि तीव्र थी। उसने एम. एस. सी वनस्पति शास्त्रा में किया और पर्यावरण एवं प्रदूषण में पी. एच. डी. कर के वनस्पति शास्त्रा की प्राध्यापिका हो गई। वह भाग्यवान भी थी। उसकी शादी एक उच्च अधिकारी से हो गई जो बाद में जिलाधीश हो गये। उसके दो बेटे हो गये और सुखी वैवाहिक जीवन मिला।

स्वर्णलता के केस की जांच वर्जीनिया विश्वविद्यालय यू. एस. ए. के परामनोचिकित्सा विभाग के संचालक प्रो॰ डा॰ इवान स्टीवेंसन ने की जिन्होंने विश्व में विभिन्न क्षेत्रों में पूर्वजन्म की लगभग 60 घटनाएं एकत्रा की हैं। उन्होंने स्वर्णलता के पहले जन्म के बारे में पूरी छानबीन की और सही पाया। इन घटनाओं से एक बात स्पष्ट होती है कि लड़की सदा लड़की पैदा होती है और लड़का लड़का ही जन्म लेता है।

स्वर्णलता तीनों जन्मों में लड़की पैदा हुई और उच्च ब्राहमण कुल में जन्मी। उसका पहला जन्म कटनी म. प्र. के प्रतिष्ठित पाठक परिवार में हुआ, दूसरा जन्म सिलहर आसम के प्रतिष्ठित गोस्वामी परिवार में हुआ और तीसरा वर्तमान जन्म टीकमगढ़ म. प्र. जिला के प्रतिष्ठित मिश्र परिवार में हुआ।

यह निश्चित नहीं है कि स्वर्णलता का आसाम वाले परिवार से जिस से मिलने को वह बड़ी बेताब रहती थी, संपर्क हुआ या नहीं। पूर्व जन्मों की यादें उन लोगों को रहती है जिन की मृत्यु किसी उत्तेजनात्मक आवेशग्रस्त मनःस्थिति में हुई है जैसे दुर्घटना, हत्या, आत्महत्या, प्रतिशोध, कातरता, मोहग्रस्तता आदि। ऐसे विक्षुब्ध घटनाक्रम प्राणी की चेतना पर गहरा प्रभाव डालते हैं और वे उद्वेग नये जन्म में भी स्मृति पटल पर उभरते रहते हैं।

अधिक प्यार या अधिक द्वेष जिन से रहा हो, वे लोग विशेष रूप से याद आते हैं। भय, आशंका, अभिरूचि, बुद्धिमता, कला कौशल आदि की भी पिछली छाप बनी रहती है। आकृति की बनावट और शरीर पर जहां तहां पाये जाने वाले विशेष चिन्ह भी अगले जन्म में उसी प्रकार पाये जाते हैं।

बच्चे को याद है पिछला जन्म



7 साल के बच्चे को याद है पिछला जन्म, पत्नी को पहचाना
अंकुर अवस्थी|Jul 16, 2014
http://www.bhaskar.com


(स्कूल में टीचर्स के साथ रजनीश।)

अलवर. कुंडलका गांव का सात साल का रजनीश अचानक अपने आपको सवाईमाधोपुर के शेरपुर गांव का केदार कुम्हार बताने लगा और कहने लगा कि वहां पर मेरी पत्नी है, बच्चे है तो सब आश्चर्यचकित हो गए।

रजनीश ने यह बात घर पर पिता और स्कूल में क्लास टीचर को बताई। बात बढ़ी तो गांव वालों ने शेरपुर में भी संपर्क किया। वहां से भी लोग आए, उन्होंने दावा किया कि बच्चा जो भी बात बता रहा है वह सच है। उसने अपनी पत्नी कैलाशी और अन्य लोगों को भी पहचान लिया और उनसे बातें की।

जिला मुख्यालय से करीब 30 किमी दूर भर्तृहरि के समीप कुंडलका निवासी रामकरण गुर्जर का बेटा रजनीश गुर्जर खुद को पिछले जन्म का केदार बताता है जो कि सवाईमाधोपुर के शेरपुर रहता था परिजनों का कहना है कि दो साल की उम्र से ही रजनीश पिछले जन्म की बातें बताई पर किसी को यकीन नहीं हुआ और टाल गए।

पिछले दिनों जब बालक ने अपने गांव जाने की जिद की तो परिजनों ने शेरपुर गांव से जानकारी हासिल की। बालक द्वारा बताए गए तथ्यों का पता लगाने के बाद रजनीश के पिता और परिवार के अन्य सदस्य उसे आठ जुलाई को शेरपुर-बिलचीपुर ले गए। जहां पर बालक ने जोगी महल और गणेश मंदिर को पहचाना और अपने पिछले जन्म के परिजनों की पहचान भी कर ली। इसके बाद से गांव में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया।
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{माता-पिता और भाइयों के साथ बैठा रजनीश (नीली शर्ट में)}
पत्नी कैलाशी और बेटी को पहचान गया रजनीश

पिछले जन्म में खुद को केदार बता रहे रजनीश से मिलने के लिए 12 जुलाई को शेरपुर से केदार की पत्नी कैलाशी और परिजन आए। रजनीश सभी को पहचान गया और उनसे बातचीत करने लगा। इसके बाद जाते समय रजनीश ने अपनी बेटी को गिफ्ट देने की जिद की।

रजनीश अगले माह शेरपुर में लगने वाले गणेश मेले में जाने की भी जिद कर रहा है। बालक की इन हरकतों से परिजन हैरान हैं और पूरे गांव के लिए यह बालक अनोखा बना हुआ है। गांव के सरकारी स्कूल में दूसरी कक्षा में पढ़ रहा रजनीश स्कूल में भी अपने पूर्वजन्म की बातें बताता रहता है।
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{भाई के साथ रजनीश (नीली शर्ट में)}
उम्र सात साल गंभीरता युवा जैसी

महज सात साल की उम्र में काफी गंभीर दिखाई देने वाला रजनीश हमउम्र बच्चों की तरह शरारतें नहीं करता। पिता रामकरण का कहना है कि कोई गलती होने पर रजनीश तुरंत माफी मांग लेता है और खुद ही अपनी गलती बता देता है।

इसकी पुष्टि करते हुए स्कूल की अध्यापिका निहारिका सैनी और उषा सैनी ने बताया कि स्कूल समय में रजनीश शरारतें कम ही करता हैं और एक बार समझाई बात को लंबे समय तक याद रखता है और अक्सर अपने पुनर्जन्म की बातें बताता रहता है। रजनीश की मां वीरवती ने बताया कि रजनीश अन्य तीनों भाई बहनों के मुकाबले गंभीर है।

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(स्कूल में रजनीश का हाथ पकड़कर कुछ समझाते हुए टीचर।)

रजनीश ने क्या बताया पूर्वजन्म के बारे में

रजनीश गुर्जर खुद को सवाई माधोपुर के शेरपुर-बिलचीपुर का निवासी केदार कुम्हार बताता है। बालक ने भास्कर से बातचीत में कहा कि शेरपुर में उसके पास दो गधे थे, जिससे किले पर मिट्टी ले जाने का काम करता था। इसके अलावा रजनीश ने पूर्वजन्म की अपनी पत्नी, संतानों के नाम, स्थानीय जोगी किले गणेश मंदिर की जानकारी दी। बालक के परिजनों का दावा है कि सभी तथ्य जांच में सही पाए गए।

'भारतीय दर्शन और धर्म के अनुसार पुनर्जन्म हो सकता है, लेकिन मेडिकल साइंस में दोबारा जन्म जैसे घटना को प्रमाणित करने के कोई ठोस तथ्य नहीं हैं। ऐसे में पुनर्जन्म को नकारना और स्वीकारना दोनों ही मुश्किल हैं।'

डॉ.जेएस शर्मा, कनिष्ठ विशेषज्ञ, मानसिक रोग विभाग, सामान्य चिकित्सालय

सावन और महादेव की महिमा




सावन, सोमवार, शिवलिंग और महादेव की अनंत महिमा

Sanjeev Kumar Dubey Tuesday, July 15, 2014
संजीव कुमार दुबे
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सावन का महीना और भगवान शंकर यानी भक्ति की ऐसी अविरल धारा जहां हर हर महादेव और बम बम भोल की गूंज से कष्टों का निवारण होता है, मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। यूं तो भगवान शंकर की पूजा के लिए सोमवार का दिन पुराणों में निर्धारित किया गया है। लेकिन पौराणिक मान्यताओं में भगवान शंकर की पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ दिन महाशिवरात्रि, उसके बाद सावन के महीने में आनेवाला प्रत्येक सोमवार, फिर हर महीने आनेवाली शिवरात्रि और सोमवार का महत्व है। लेकिन भगवान को सावन यानी श्रावण का महीना बेहद प्रिय है जिसमें वह अपने भक्तों पर अतिशय कृपा बरसाते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस महीने में खासकर सोमवार के दिन व्रत-उपवास और पूजा पाठ (रुद्राभिषेक,कवच पाठ,जाप इत्यादि) का विशेष लाभ होता है। सनातन धर्म में यह महीना बेहद पवित्र माना जाता है यही वजह है कि मांसाहार करने वाले लोग भी इस मास में मांस का परित्याग कर देते है।

सावन के महीने में सोमवार महत्वपूर्ण होता है। सोमवार का अंक 2 (पहला रविवार और दूसरा सोमवार) होता है जो चन्द्रमा का प्रतिनिधित्व करता है। चन्द्रमा मन का संकेतक है और वह भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान है। चंद्रमा मनसो जात: यानी चंद्रमा मन का मालिक है और उसके नियंत्रण और नियमण में उसका (चंद्रमा का) अहम योगदान है। यानी भगवान शंकर शिव के मस्तक पर चंद्रमा को नियंत्रित कर उक्त साधक या भक्त के मन को एकाग्रचित कर उसे अविद्या रुपी माया के मोहपाश से मुक्त कर देते हैं। भगवान शंकर की कृपा से भक्त त्रिगुणातीत (सत, रज और तम गुण) भाव को प्राप्त करता है और यही उसके जन्म-मरण से मुक्ति का आधार बनता है।

सावन के महीने में सबसे अधिक बारिश होती है जो शिव के गर्म शरीर को ठंडक प्रदान करती है। भगवान शंकर ने स्वयं सनतकुमारों को सावन महीने की महिमा बताई है कि मेरे तीनों नेत्रों में सूर्य दाहिने, बांये चन्द्र और अग्नि मध्य नेत्र है। जब सूर्य कर्क राशि में गोचर करता है, तब सावन महीने की शुरुआत होती है। सूर्य गर्म है जो उष्मा देता है जबकि चंद्रमा ठंडा है जो शीतलता प्रदान करता है। इसलिए सूर्य के कर्क राशि में आने से झमाझम बारिस होती है। जिससे  लोक कल्याण के लिए विष को पीने वाले भोले को ठंडक व सुकून मिलता है। इसलिए शिव का सावन से इतना गहरा लगाव है।

सावन और साधना के बीच चंचल और अति चलायमान मन की एकाग्रता एक अहम कड़ी है जिसके बिना परम तत्व की प्राप्ति असंभव है। साधक की साधना जब शुरू होती है तब मन एक विकराल बाधा बनकर खड़ा हो जाता है। उसे नियंत्रित करना सहज नहीं होता। लिहाजा मन को ही साधने में साधक को लंबा और धैर्य का सफर तय करना होता है। इसलिए कहा गया है कि मन ही मोक्ष और बंधन का कारण है। यानी मन से ही मुक्ति है और हम ही बंधन का कारण है। भगवान शंकर ने मस्तक में ही चंद्रमा को दृढ कर रखा है लिहाजा साधक की साधना निर्विघ्न संपन्न होती चली जाती है।

यजुर्वेद के एक मंत्र में मन को बड़ा ही प्रबल और चंचल कहा गया है। मन जड़ होते हुए भी सोते-जागते कभी भी चैन नहीं लेता। जितनी देर हम जागते रहते हैं, उतनी देर यह कुछ न कुछ सोचता हुआ भटकता रहता है। मन की इसी अस्थिर गति को थामने और दृढ करने के लिए भगवान शंकर हमें सावन जैसा मास प्रदान करते हैं। इसी सावन में साधना हर बाधाओं को पार कर आगे बढ़ती है। सावन,सोमवार और भगवान शंकर की अराधना सर्वथा कल्याणकारी है जिसमें भक्त मनोवांछित फर प्राप्त करते हैं।

शिव (शि-व) मंत्र में एक अंश उसे ऊर्जा देता है और दूसरा उसे संतुलित करता है। इसलिए जब हम ‘शिव’ कहते हैं, तो हम ऊर्जा को एक खास तरीके से, एक खास दिशा में निर्देशित करने की बात करते हैं। 'शिवम' में यह ऊर्जा अनंत स्वरुप का रुप धारण करती है। 'ऊं नम: शिवाय' का महामंत्र भगवान शंकर की उस उर्जा को नमन है जहां शक्ति अपने सर्वोच्च रूप में आध्यात्मिक किरणों से भक्तों के मन-मस्तिष्क को संचालित करती है। जीवन के भव-ताप से दूर कर भक्ति को प्रगाढ़ करते हुए सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण से मुक्त कर मानसिक और शारीरिक रूप में विकार रहित स्वरूप प्रदान करती है। यह स्वरूप निर्विकार होता है जो परमब्रह्म से साक्षात्कार का रास्ता तय कराता है।

'शिव' शब्द की उत्पत्ति वश कान्तौ धातु से हुई हैं। जिसका मतलब जिसको सब चाहें वही शिव। जीवन में सभी आनंद की इच्छा करते हैं यानी शिव का एक अर्थ आंनद भी है। 'शिव' का एक अर्थ - 'कल्याणकारी' भी है। शिव यानी जो सबको प्यारा।

भगवान शंकर यूं तो अराधना से प्रसन्न होते हैं लेकिन सावन मास में जलाभिषेक, रुद्राभिषेक का बड़ा महत्व है। वेद मंत्रों के साथ भगवान शंकर को जलधारा अर्पित करना साधक के आध्यात्मिक जीवन के लिए महाऔषधि के सामान है। पांच तत्व में जल तत्व बहुत महत्वपूर्ण है। पुराणों ने शिव के अभिषेक को बहुत पवित्र महत्व बताया गया है।

जल में भगवान विष्णु का वास है, जल का एक नाम 'नार' भी है। इसीलिए भगवान विष्णु को नारायण कहते हैं। जल से ही धरती का ताप दूर होता है। जो भक्त, श्रद्धालु भगवान शिव को जल चढ़ाते हैं उनके रोग-शोक, दुःख दरिद्र सभी नष्ट हो जाते हैं। भगवान शंकर को महादेव इसीलिए कहा जाता है क्योंकि वह देव, दानव, यक्ष, किन्नर, नाग, मनुष्य, सभी द्वारा पूजे जाते हैं।

सावन मास में शिव भक्ति का पुराणों में भी उल्लेख मिलता है। पौराणिक कथाओं में वर्णन आता है कि इसी मास में समुद्र मंथन किया गया था। समुद्र मथने के बाद जो विष निकला उसे भगवान शंकर ने कंठ में समाहित कर सृष्टि की रक्षा की लेकिन विषपान से महादेव का कंठ नीलवर्ण हो गया। इसीसे उनका नाम नीलकंठ महादेव पड़ा। विष के प्रभाव को कम करने के लिए सभी देवी-देवताओं ने उन्हें जल अर्पित किया। इसलिए शिवलिंग पर जल चढ़ाने का खास महत्व है। यही वजह है कि श्रावण मास में भोले को जल चढ़ाने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। शिवपुराण में उल्लेख है कि भगवान शिव स्वयं ही जल हैं। इसलिए जल से उनकी अभिषेक के रुप में अराधना का उत्तमोत्तम फल है जिसमें कोई संशय नहीं है।

संजीवनं समस्तस्य जगतः सलिलात्मकम्‌।
भव इत्युच्यते रूपं भवस्य परमात्मनः ॥

अर्थात्‌ जो जल समस्त जगत्‌ के प्राणियों में जीवन का संचार करता है वह जल स्वयं उस परमात्मा शिव का रूप है। इसीलिए जल का अपव्यय नहीं वरन्‌ उसका महत्व समझकर उसकी पूजा करना चाहिए। पुराणों में यह भी कहा गया है कि सावन के महीने में सोमवार के दिन शिवजी को एक बिल्व पत्र चढ़ाने से तीन जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है। इसलिए इन दिनों शिव की उपासना का बहुत महत्व है।   

प्रजा-पालक रामराज्य के मूल भूत सिद्धांत


 

प्रजा-पालक रामराज्य

 11/3/2012 













































भ्रष्टाचार, हिंसा, असुरक्षा से जूझ रहे भारत की प्रेरणा और प्रकाश स्तंभ है

प्रजा-पालक रामराज्य

दैहिक दैविक भौतिक तापा।

रामराज काहुहिं नहिं व्यापा।।

सब नर करंहि परस्पर प्रीति।

चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीति।।

(उत्तरकांड 20:1)

इस प्रकार मध्य युग में घोर अत्याचारी और निरंकुश विधर्मी/विदेशी शासकों की दासता में पिस रही भारत की जनता को संत कवि तुलसीदास ने रामराज्य और श्रीराम के जीवन का परिचय देकर प्रजा सुख के लिए सत्ता सुख का त्याग और आतताई शक्तियों के संगठित प्रतिकार का पाठ पढ़ाया। रामभक्ति की इस लहर में से छत्रपति शिवाजी और गुरु गोविंद सिंह जैसे राष्ट्रभक्त योद्धा उत्पन्न हुए। वास्तव में त्रेतायुग में अवतरित हुए श्रीराम द्वारा स्थापित रामराज्य की आदर्श व्यवस्था प्रत्येक युग में शासकों और प्रजा के लिए मार्गदर्शक रही है। 
युगानुकूल राज्यव्यवस्था
आज के संदर्भ में देखा जाए तो अपने देश की सरकार और प्रजा दोनों के लिए रामराज्य की अवधारणा प्रकाश स्तंभ का काम कर सकती है। भ्रष्ट और सत्ता केन्द्रित शासकों का अंत, आतंकियों/नक्सलियों जैसे राक्षसों का संहार और संपूर्ण समाज को निरंकुश शासन के विरुद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा देने की समयोचित क्षमता रामराज्य के सूत्रों में विद्यमान है। श्रीराम का अवतरण उस युग अथवा कालखंड में हुआ था जब मानवजाति हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई इत्यादि वर्गों में विभाजित नहीं थी। अत: रामराज्य की अत्यंत व्यावहारिक व्यवस्था किसी भी पंथ, भाषा, क्षेत्र और जन की प्रतिनिधि न होकर सम्पूर्ण मानवजाति के आदर्श का प्रतिनिधित्व है। वर्तमान भारत के संदर्भ में प्रखर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का स्थापित पर्याय है रामराज्य।
वोट बैंक की संकीर्ण राजनीति, चारों ओर भ्रष्टाचार का बोलबाला, घपले/घोटालों में व्यस्त मंत्री, विदेश प्रेरित आतंकवाद, मजहबी तुष्टीकरण, जाति आधारित राजनीति, सामाजिक वैमनस्य और सत्ता लोलुपता की पराकाष्ठा में देशभक्ति सेवा, समर्पण, त्याग, सौहार्द और निरंकुशता के विरुद्ध संघर्ष का संदेश है राम राज्य। एक दिन असत्य पर सत्य की विजय निश्चित है, अधर्म के घोर अंधकार को चीरकर प्रकाश का आविर्भाव होगा ही। सारे समाज जीवन को नष्ट करने वाली भ्रष्ट व्यवस्थाओं का भी अंत होगा, यही संदेश है श्रीराम, रामराज्य और दीपावली का।
ध्येय पथ पर अडिग श्रीराम
श्रीराम के जीवन और उनके द्वारा स्थापित राज्य व्यवस्था अर्थात रामराज्य से भारत की वर्तमान दिशा भ्रमित राजनीति को रचनात्मक दिशा मिल सकती है। राष्ट्रीय कर्तव्य की बलिवेदी पर राजसत्ता के समस्त सुखों को ठोकर मार देने का आदर्श वर्तमान सत्ता केन्द्रित राजनीति को समाप्त कर सकता है। आम समाज के विचार मंथन को शिरोधार्य करते हुए लोकशक्ति अर्थात जनता जनार्दन (जन ईश्वर) का सम्मान करने के मार्ग में उनके प्राणों से भी प्यारे भ्राता लक्ष्मण का त्याग भी कम नहीं रहा। श्रीराम को अपने राष्ट्रीय कर्तव्य से पत्नी, भाई, पुत्र किसी का भी मोह विमुख नहीं कर सका। इस तरह श्रीराम अपने ध्येय पथ से कभी विचलित नहीं हुए।
धर्म की स्थापना, दुष्टों के संहार और संत-महात्माओं की रक्षा को अपनी जीवन यात्रा का ध्येय मानकर श्रीराम ने किशोरावस्था में जिस कठोर वज्र संकल्प को धारण किया था, वह वर्तमान भारतीय समाज के उन युवकों के लिए प्रेरणा स्रोत हो सकता है जो प्रत्येक प्रकार के व्यसनों, प्रलोभनों और मृगमरीचिकाओं में फंसकर भारत राष्ट्र की महान संस्कृति से दूर हटते जा रहे हैं। आज की भौतिकवादी चकाचौंध में अपनी उज्ज्वल परंपराओं से कटते जा रहे भारतीय युवकों को यदि रामराज्य की मानवी संस्कृति की शिक्षा दी जाए तो निश्चित रूप से भारत के भविष्य को महान बनाया जा सकता है।
निरहंकारी राजा, निष्काम कर्मयोगी
चौदह वर्ष तक निरंतर संघर्षरत रहने वाले संन्यासी राम को जब राजा के रूप में राजसत्ता प्राप्त हुई तो उन्होंने अपनी प्रजा और देश विदेश से आए समस्त राजाओं-महाराजाओं के समक्ष रामराज्य के अद्वितीय आदर्शों को ही अपने शेष जीवन का एकमात्र उद्देश्य घोषित किया 'मेरा कुछ भी नहीं, जो कुछ भी है वह तो समाज रूपी परमेश्वर का है। मैं तो उसकी धाती की रक्षा एवं संवर्धन के लिए नियुक्त एक न्यासी मात्र हूं।' राज्याभिषेक के समय उनके मुखमंडल पर लेशमात्र भी अभिमान का कोई चिह्न न था। एक निरहंकारी राजा और एक निष्काम कर्मयोगी की तरह उन्होंने अपनी समस्त सफलताओं का श्रेय अपने साथियों एवं सहयोगियों में बांट दिया। श्रीराम ने कभी स्वयं को एकमात्र नेता के रूप में महिमा मंडित नहीं किया। यही उनका आदर्श नेतृत्व कौशल था।
अपने देश में इन दिनों प्रचलित व्यक्ति विशेष पर केन्द्रित दलगत राजनीति से छुटकारा पाने के लिए श्रीराम का आदर्श राजनीतिक व्यवहार का दिशा सूचक हो सकता है। आज की राज्यव्यवस्था और दलीय प्रणाली को यदि श्रीराम की समाज केन्द्रित राजनीति की ओर मोड़ा जाए तो राष्ट्रीय राजनीति में निस्वार्थ और समर्पण का प्रादुर्भाव आसानी से हो सकता है। यह तभी संभव होगा जब श्रीराम को जाति, पंथ और क्षेत्र की सीमाओं में न बांधकर एक राष्ट्रीय महापुरुष के रूप में समझा जाएगा। अन्यथा रामराज्य की विशालता और समन्वय की अवधारणा भी साम्प्रदायिकता के आरोपों का शिकार हो जाएगी। आज इसी संकीर्ण राजनीति का प्रचलन है।
प्रजा समर्पित रामराज्य
मनीषी साहित्यकार श्री जैनेन्द्र कुमार ने अपने एक लेख 'राजा राम' में श्रीराम की राजनीतिक मर्यादा का बड़ा सुंदर विवेचन किया है 'मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की आदर्श पुरुषोत्तमता परिवार की सीमा तक ही नहीं रहती। यह सार्वजनिक और राजनीतिक मर्यादा के उत्कर्ष को भी अंकित करती है। यही कारण था कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के परम नायक महात्मा गांधी ने भी स्वराज्य की परिभाषा देने के लिए रामराज्य को ही आधार बनाया।' अत: देश में व्याप्त जातिवाद, भाषावाद और क्षेत्रवाद को मिटाकर सभी भारतवासियों को यदि किसी एक सूत्र में बांधा जा सकता है तो वह है श्रीराम का आदर्श जीवन चरित्र।
संसदीय प्रजातंत्र एवं दूसरे प्रकार की राज्य व्यवस्थाओं को देश और समाज के हित में संचालित करने के लिए भी श्रीराम द्वारा स्थापित मर्यादाओं का अनुसरण करना ही होगा। श्रीराम के लिए राज्य सत्ता व्यक्तिगत तथा पारिवारिक भोग का साधन न होकर समाज सेवा के लिए की जाने वाली तपस्या थी। राजा और सत्ता सेवा के साधन थे, न कि अथाह धन बटोरने का अवसर। रामराज्य की अवधारणा के अंतर्गत राजपद (वर्तमान भाषा में मंत्रालय) प्रजा की ओर से राजा को सौंपी गई थाती है। इसलिए इस पद का उपयोग समाज के लाभ के लिए होना चाहिए न कि घोटालों ओर घपलों के माध्यम से अपनी तिजोरियां भरने के लिए। यही व्यक्तिनिष्ठ राजनीति भ्रष्टाचार को जन्म देती है जिसका आज सर्वत्र बोलबाला है।
सत्तालोलुपता विहीन राज्य व्यवस्था
भारत के राष्ट्रजीवन पर मंडराने वाले संकटों में सबसे बड़ा संकट उसी राजनीति का है जो शासक को उत्तरदायित्व और कर्तव्यनिष्ठा की भावना से दूर हटाकर मात्र अधिकारों के साथ जोड़ रही है। बहुमत आधारित लोकतंत्र की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि निर्वाचित नेता जनता का प्रतिनिधि न बनकर स्वामी बन जाता है। सभी प्रकार के अधिकारों का स्वामी शासक और कर्तव्यों के पालन का काम जनता का। इसी में से समाज का उत्पीड़न करके अपने पद को बचाने के लिए 'कुछ भी करो' जैसी मनोवृत्ति का जन्म होता है। वर्तमान लोकतंत्र की इससे बड़ी घातक विडम्बना और क्या होगी कि पूरी सरकार अथवा सरकार का मुखिया भ्रष्ट मंत्रियों को बचाने के काम को ही अपना कर्तव्य समझता है। रामराज्य एक आदर्श लोकतंत्र है।
श्रीराम द्वारा प्रदत्त राजनीतिक मर्यादा में सत्ता के दुरुपयोग की कहीं कोई संभावना नहीं। शासक के अधिकारों और कर्तव्य की परिभाषा को रामराज्य में स्थापित की गई शासकीय मर्यादाओं के प्रकाश में समझा जा सकता है। रामराज्य की राजनीतिक व्यवस्था में संघर्ष, स्वार्थ, अहंकार और सत्तालोलुपता के लिए कोई स्थान नहीं। श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और सीता के व्यवहार में सहयोग, सहजीवन, सहचिंतन और सर्वोदय जैसे मानवीय मूल्यों का ही वर्चस्व है। श्रीराम ने रामराज्य की व्यवस्था के सभी आदर्शों को अपने व्यवहार में उतारकर विश्व के समक्ष रखा। उन्होंने अवतारी पुरुष होते हुए भी मनुष्य के नाते व्यवहार किया और आदर्श राजा के नाते शासन के सूत्र संभाले।
भारतीयता की सशक्त अभिव्यक्ति
किशोरावस्था में ही महर्षि विश्वामित्र के साथ जंगलों में जाकर भारत के मानबिन्दुओं को देखना, समझना और उनकी रक्षा करते हुए भारत की ऋषि परंपरा के आगे नतमस्तक होना उनके जीवन की शुरुआत थी। यहीं पर उन्होंने भारत राष्ट्र की सांस्कृतिक अखंडता को राक्षसी शक्तियों से पूर्णतया सुरक्षित करने का महाव्रत लिया था। फिर अपनी सूर्यवंशी क्षत्रिय परंपरा का परिचय सारे संसार के राजाओं के समक्ष देकर सीता का वरण किया। भारत के धर्मगुरु संतों की योजनानुसार पिता के संकल्प की पूर्ति हेतु और अपने जीवनोपद्देश्य के लिए सत्ता सुख को भी त्याग दिया।
श्रीराम ने वनों में जाकर वनवासियों एवं पिछड़ी जातियों को संगठित करके उनका उद्धार करते हुए उनको क्षत्रिय के रूप में सैनिक बाना पहनाकर राष्ट्र रक्षा हेतु तैयार किया। पिछड़ी जाति के निषाद राज केवट को गले लगाकर भाई कहा। पक्षीराज जटायू का स्वयं अपने हाथों से संस्कार करके उसे पिता का सम्मान दिया। भील जाति की एक वृद्धा शबरी के चरण छूकर उसे माता कौशल्या कहकर पुकारा। इसी प्रकार पतिता कहलाई अहिल्या को पापमुक्त करके समाज में प्रतिष्ठा दिलाई। इस तरह भारतीय राष्ट्र जीवन के सभी मापदंडों और सिद्धांतों की अभिव्यक्ति है श्रीराम और उनका रामराज्य।
पिछड़े वर्गों का उद्धार
आज अपने देश के कई राजनीतिक दल और नेता कथित दलित वर्ग के नाम पर अपनी सत्ता केन्द्रित राजनीति चला रहे हैं। इनके थोक वोट प्राप्त करने के लिए कई पिछड़े वर्गों के प्रति घृणा भरी गई थी। पहले ऊंचे वर्गों के मन में पिछड़े वर्गों के प्रति घृणा भरी गई थी और अब इन पिछड़े लोगों के मन में ऊंचे वर्गों के प्रति घोर नफरत भरी जा रही है। पिछड़े बंधुओं को हिन्दुत्व की विशाल राष्ट्रीय धारा से तोड़कर वोट बैंक पक्का करने वाले कथित समाज सुधारकों, समाजवादियों और सत्ता के लोभी राजनीतिज्ञों को यह बात समझ में आनी चाहिए कि इन कमजोर वर्गों का उद्धार इन्हें श्रीराम की राष्ट्रीय धारा से तोड़कर नहीं, जोड़कर ही किया जा सकता है।
श्रीराम का समस्त जीवन कमजोर वर्गों के उत्थान हेतु समर्पित था। पिछड़े बंधुओं का उत्थान ही श्रीराम की विस्तृत कर्मभूमि थी। यही वर्ग श्रीराम की समस्त लीलाओं का आधार रहे हैं। इन पिछड़ी जातियों यथा-वंचितों, गरीबों, वनवासियों और गिरिवासियों के बिना रामराज्य की समग्रता और पहचान अधूरी है। यदि श्रीराम हमारे राष्ट्र जीवन की चेतना हैं तो यह राष्ट्र जीवन भी इस वर्ग के बंधुओं के बिना अधूरा है। श्रीराम के जीवनादर्श समाज के सभी वर्गों में समरसता भरने का सामर्थ्य रखते हैं। आज वनवासी क्षेत्रों में विदेशों से आए ईसाई पादरी सेवा के बहाने मतान्तरण कर रहे हैं। नागालैंड, मिजोरम की समस्याएं इसी का सीधा दुष्परिणाम है। इसका समाधान श्रीराम ने बताया है। उन्होंने चौदह वर्ष तक इन्हीं लोगों में रहकर अपनत्व का नाता जोड़ा। आज कल्याण आश्रम जैसी संस्थाएं इस काम को सफलतापूर्वक कर रही हैं।
श्रीराम का घोषित उद्देश्य
आज अपने देश में चीन और पाकिस्तान की योजनानुसार हिंसक नक्सलवाद और जिहादी आतंकवाद जैसी आसुरी शक्तियां सिर उठा रही हैं। चरम सीमा लांघ रहे इस देशद्रोह से राष्ट्र की अखंडता को चुनौती मिल रही है। वोट की राजनीति ने सत्ता पक्ष को इतना स्वार्थी और कमजोर बना दिया है कि इस प्रकार की आतताई शक्तियों को सख्ती से समाप्त करने का साहस किसी में नजर नहीं आता। श्रीराम के अवतार लेने से पूर्व इक्ष्वाकु वंश के राजाओं की राजधानी अर्थात वृहत्तर भारत के हृदय स्थल अयोध्या के आसपास के दुर्गम पहाड़ी वनक्षेत्रों में धर्म विरोधी राक्षसी शक्तियों का बोलबाला था। राजा, रंक, संत, स्त्रियां, देवस्थल, आश्रम इत्यादि कुछ भी सुरक्षित नहीं था।
राष्ट्र को इस प्रकार की अशांत एवं दुखित परिस्थितियों से निकालकर आदर्श राज्य की स्थापना का बीड़ा श्रीराम ने उठाया। प्रजा के सुख के लिए सुचारु राज्य व्यवस्था की स्थापना का अपना निर्धारित लक्ष्य प्राप्त करने के लिए श्रीराम ने सत्ता, राजमहल और अपने प्रिय निकटतम संबंधियों का भी सहर्ष त्याग किया। आज तो अपने देश में नेता सत्ता सुख, पारिवारिक सुख और सम्पत्ति सुख के लिए प्रजा सुख को ठुकराकर बड़े-बड़े घपले, घोटालों में व्यस्त हैं। ऐसी घोर विकट स्थिति में शांत राज्य व्यवस्था की कल्पना भी नहीं की जा सकती। आतंकियों और नक्सलियों जैसी विदेश प्रेरित आसुरी ताकतों का विनाश करना ही एकमेव रास्ता है।
आसुरी शक्तियों का विनाश
इस समझौतावादी राजनीति और अवसरवादिता के विपरीत श्रीराम ने गुरुकुल विद्यार्थी, वनवासी, संन्यासी और राजा के रूप में आसुरी शक्तियों के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई करने से परहेज नहीं किया। श्रीराम ने हिंसक आतंकवादियों-मारीच, खर-दूषण, ताड़का, त्रिशरा, सुबाहु और इनके पालक राजाओं- बाली, मेघनाद, कुंभकरण और रावण जैसे अपराजेय कहलाने वाले सेनापतियों का स्वयं अपने बाणों से संहार करके भारत राष्ट्र में आदर्श रामराज्य का मार्ग प्रशस्त किया। दूसरे देशों की सीमाओं, सम्पत्ति जन और संस्कृति पर खतरा बने ऐसे विदेशी तत्वों को समाप्त करना प्रत्येक राजा का राष्ट्रधर्म होता है।
भारत सहित पूरे विश्व के विनाश की व्यूहरचना करने वाले राक्षसों के महानायक और संचालक लंकाधिपति को उसके देश में जाकर समाप्त करने का महान कार्य श्रीराम ने किया। श्रीराम की इस प्रहारात्मक रणनीति से भारत के उन वर्तमान शासकों को सबक सीखना चाहिए जो सीमापार (पी.ओ.के.) में चलने वाले आतंकी प्रशिक्षण शिविरों और अपनी ही सीमाओं में पूर्वोत्तर में स्थापित राष्ट्रदोही अड्डों को समाप्त करने के लिए सैनिक कार्रवाई से घबरा रहे हैं। अपने समस्त जीवनकाल में श्रीराम ने जो भी निर्णय लिए वे सभी राष्ट्र और समाज की रक्षा और उत्थान के उद्देश्य से ही लिए। उनमें वोट बैंक की लालसा, तुष्टीकरण और वंशवादी राजनीति का कहीं कोई स्थान नहीं था। रामराज्य का यही सशक्त आधार था।
लोकहित और लोकमर्यादा
श्रीराम ने अपने आत्मसंयमी जीवन और अजेय सैनिक शौर्य द्वारा लंका से उठी अधर्म की आक्रामक लहरों को भी रोका। लंका विजय के पश्चात वहां राज नहीं किया, बल्कि लक्ष्मण को सम्बोधित करके सम्पूर्ण विश्व को भारतीय उज्ज्वल परंपराओं का संदेश दिया कि जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान होती है। अपना उद्देश्य पूरा करने के पश्चात विजयी सैनिकों को विजित प्रदेश में सैनिक मर्यादाओं का पालन करते हुए वापस अपनी मातृभूमि की ओर मोड़कर श्रीराम ने भारत के राष्ट्र जीवन की श्रेष्ठतम परंपराओं का प्रस्तुतिकरण किया। अयोध्या के सिंहासन पर बैठते समय राष्ट्रीय संस्कृति और धर्म का अंकुश स्वीकार किया। लोकहित और लोकमर्यादा पर आधारित राजसत्ता को समाज सेवा और देश रक्षा का साधन बनाकर रामराज्य की सर्वोत्तम आदर्श राज्य व्यवस्था का सूत्रपात किया।
रामराज्य जैसी उच्च कोटि, परंतु अत्यंत व्यावहारिक शासन पद्धति और श्रीराम के मर्यादायुक्त जीवन से न केवल भारतीय समाज और राष्ट्र को ही मार्गदर्शन मिला अपितु सारे संसार ने इस अलौकिक और अभूतपूर्व प्रकाश से अपने तमस को दूर किया। भारत को विश्वगुरु का सम्मान दिलाने में श्रीराम के मर्यादा युक्त जीवन का अद्भुत योगदान रहा। ये सभी मर्यादाएं और आदर्श श्रीराम के स्वयं के व्यक्तित्व से कहीं ऊपर भारतवर्ष की महान संस्कृति बन गए। आज के सत्तालोलुप व्यक्तिनिष्ठ राजनेताओं के लिए श्रीराम की मर्यादा पुरुषोत्तमता दिशा सूत्र बननी चाहिए।
श्रीराम की पुरुषोत्तमता
आज भी विश्व के अनेक देशों में श्रीराम और रामराज्य के मर्यादा पुरुषोत्तम चरित्र का जो प्रभाव दिखाई दे रहा है वह भारत राष्ट्र की मर्यादा पुरुषोत्तमता ही है। हमारे राष्ट्र की रामराज्य की कल्पना के विविध आयाम सृष्टि के सम्पूर्ण जीवन को मर्यादित करते रहे हैं। यह आदर्श और जीवन मूल्य राजा राम के पूर्व भी विद्यमान थे। सृष्टि के आदि में भी थे और अंत तक रहेंगे। भारत के अवतारी पुरुषों, महर्षियों और आध्यात्मिक राष्ट्र नेताओं ने समय समय पर इसकी व्याख्या की, इनको समयोचित बल प्रदान किया और समाज जीवन में समाहित कर दिया। श्रीराम अपने इस राष्ट्रीय और मानवीय कर्तव्य की पूर्ति करने के पश्चात अंत में स्वयं अपने हाथों से श्रेष्ठ नेतृत्व को राज्य व्यवस्था सौंपकर सत्ता से हट गए। अवतारी होते हुए भी श्रीराम ने एक मनुष्य के रूप में अपना अवतारी उद्देश्य पूरा किया।
रामराज्य की श्रेष्ठ राज्य व्यवस्था और श्रीराम का सम्पूर्ण जीवन भारतीय संस्कृति और राष्ट्रजीवन का पर्याय है। उनके आदर्शों के माध्यम से समस्त विश्व ने भारत को जाना है और उनके इन्हीं सर्वोत्तम एवं कल्याणकारक सत्कार्यों से विश्व फिर भारत को जानेगा। स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविंद और मा.स.गोलवलकर (श्री गुरुजी) ने अपनी दिव्य दृष्टि से 21वीं सदी में भारतमाता के जिस ज्योतिर्मय स्वरूप को विश्वगुरु के सिंहासन पर शोभायमान देखा है, उसका आधार रामराज्य की पुरुषोत्तमता ही होगी।