शनिवार, 2 अगस्त 2014

नेहरूवादी और वामपंथी इतिहासकारों ने ब़डा नुकसान पहुंचाया - सम्मानीय भागवतजी




भोपाल। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघ चालक सम्मानीय मोहन जी भागवत ने नेहरूवादी और वामपंथी इतिहासकारों पर भारत के इतिहास को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया है और प्राचीन ऋषि परंपरा को जीवित रखने पर जोर दिया है। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में चल रहे संघ के अखिल भारतीय चिंतन शिविर में हिस्सा लेने आए भागवत ने शुक्रवार को "हिंदू राष्ट्र की अवधारणा" विषय पर विचार प्रकट करते हुए कहा कि नेहरूवादी और वामपंथी इतिहासकारों ने इस देश के इतिहास व समाजशास्त्र को ब़डा नुकसान पहुंचाया है। इन्हीं लोगों ने समाज तक सही सूचनाएं नहीं पहुंचने दी।

�यहां तक कि संघ से संबंधित 109 फाइलों का कोई पता नहीं है। उन्हें आशंका है कि या तो इन फाइलों को नष्ट कर दिया गया है या गायब। भागवत ने कहा कि यह अवधारणा 1947 से नहीं शुरू हुई, बल्कि सदियों पुरानी है, जिसे ऋषियों-मुनियों और सुधारकों ने जीवित रखा तथा मजबूती प्रदान की। भागवत ने पश्चिम की "नेशन" की अवधारणा की चर्चा करते हुए कहा कि वहां यह अवधारणा राज्य, आर्थिक, धार्मिक, जनजातियों और इसी तरह के मसलों से निकलकर आती है, वहीं भारत में राष्ट्र की अवधारणा हमारी सांस्कृतिक पहचान से बनी है। यह आपस में लोगों को जो़डती है, न कि दूर करती है।

�भागवत ने आगे कहा कि संघ के संस्थापक डा. हेगडेवार ने लोगों के बीच मौलिक दर्शन पहुंचाया। उन्होंने कुछ नया नहीं किया था, बल्कि ऋषि परंपरा को जीवित रखा है। यही काम विवेकानंद व अरविंदो और बुद्ध से लेकर कबीर तथा शंकरदेव ने किया है। स्ंाघ का चार दिवसीय अखिल भारतीय चिंतन शिविर भोपाल के ठेंगडी भवन में चल रहा है, इसमें संघ के ब़डे पदाधिकारियों से लेकर प्रचारक हिस्सा ले रहे हैं। इस शिविर में समान नागरिकता, धारा 370 और राममंदिर जैसे मसलों पर चर्चा की संभावना है। 

पहली कक्षा से गीता अनिवार्य करता : जस्टिस ए आर दवे



तानाशाह होता तो पहली कक्षा से गीता अनिवार्य करता : जस्टिस एआर दवे
भारतीयों को अपनी प्राचीन परंपरा और पुस्तकों की ओर लौटना चाहिए :जस्टिस एआर दवे
Saturday,Aug 02,2014
अहमदाबाद। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश एआर दवे ने शनिवार को कहा कि महाभारत और भगवद गीता से हम जीवन जीने का तरीका सीखते हैं। यदि वे भारत के तानाशाह होते तो बच्चों को पहली कक्षा से ही इन्हें लागू करते। उन्होंने कहा कि भारतीयों को अपनी प्राचीन परंपरा और पुस्तकों की ओर लौटना चाहिए। महाभारत और भगवद्गीता जैसे मूल ग्रंथों से बच्चों को कम उम्र में अवगत कराना चाहिए।
न्यायमूर्ति दवे 'समकालीन मुद्दों एवं वैश्वीकरण के युग में मानवाधिकारों की चुनौतियां' विषय पर आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय विचार गोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा, 'गुरु-शिष्य परंपरा जैसी हमारी प्राचीन प्रथा खत्म हो चुकी है। यदि वह रहती तो देश में इस तरह की समस्याएं [हिंसा और आतंकवाद] नहीं रहतीं। अब हम कई देशों में आतंकवाद देख रहे हैं।
अधिकांश देश लोकतांत्रिक हैं. यदि किसी लोकतांत्रिक देश में हर व्यक्ति अच्छा हो तो वे निश्चित रूप से किसी ऐसे व्यक्ति को चुनेंगे जो अच्छा होगा। वह चुना गया व्यक्ति कभी भी किसी को नुकसान पहुंचाने के बारे में नहीं सोचेगा। इस तरह एक-एक कर हर आदमी में सभी अच्छे गुणों को भर के हर जगह हम हिंसा को रोक सकते हैं। इस मकसद के लिए हमें एक बार फिर अपनी पुरातन चीजों की ओर लौटना होगा।
इस कार्यक्रम का आयोजन गुजरात ला सोसाइटी की ओर से किया गया था। न्यायमूर्ति दवे ने यह भी प्रस्ताव किया कि छात्रों को पहली कक्षा से ही भगवद गीता और महाभारत पढ़ाई जाए। उन्होंने कहा ' कुछ लोग जो बहुत धर्मनिरपेक्ष हैं. तथाकथित धर्मनिरपेक्ष इससे सहमत नहीं होंगे..। यदि मैं भारत का तानाशाह होता तो मैंने पहली क्लास से गीता और महाभारत की पढ़ाई लागू कर दिया होता। इससे आप जीवन कैसे जिएं यह सीखने का रास्ता पाते। मुझे खेद है यदि कोई कहता है कि मैं धर्म निरपेक्ष हूं या नहीं हूं.. कहीं कोई चीज अच्छी है तो उसे हमें कहीं से भी लेनी चाहिए।
बांबे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मोहित शाह ने कहा कि वैश्वीकरण का मूल अर्थ सबका विकास होना चाहिए। 'दुनिया एक गांव' की अवधारणा का अर्थ यह नहीं है कि सभी लोग सिर्फ दुनिया के बारे में सोचें बल्कि यह सबके विकास के विस्तार के रूप में हो। यदि हम वैश्वीकरण के फायदों को साझा नहीं करते तो इससे गंभीर चुनौतियां उभर कर सामने आएंगी। गीता के बारे में दवे से पहले हाईकोर्ट के एक जज भी ऐसे ही विचार व्यक्त कर चुके हैं और वह भी एक फैसला सुनाते समय। अगस्त 2007 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश एसएन श्रीवास्तव ने वाराणसी के एक पुजारी के संपत्ति संबंधी विवाद का निपटारा करते हुए गीता को राष्ट्रीय धर्म शास्त्र के रूप में मान्यता देने के साथ ही इस ग्रंथ को अन्य धार्मिक समूहों को पढ़ाए जाने की जरूरत पर बल दिया था। उनकी इस टिप्पणी से हलचल मच गई थी। तत्कालीन केंद्रीय कानून मंत्री को संसद में यह स्पष्टीकरण देना पड़ा था कि न्यायाधीश की इस टिप्पणी का कोई महत्व नहीं है और उसकी अनदेखी की जाए।

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बहुत सही बात कही उन्होने. आखिर हमे अपने देश मे ही रहना है और अपनी संस्क्रति के साथ रहने मे क्या बुराई है. हमारी सभ्यता वसुधैव कुटुम्बकम, सर्व धर्म समभाव सिखाती है नाकि दूसरे दाह्र्मो का अपमान और निरादर. पश्चिमी सभ्यता के चलते ही गुरु शिष्य, माता पिता, संयुक्त परिवार, अतिथि आदि कितने ही रिश्ते खत्म होते जा रहे है. अपनापन खोता जा रहा है. इन सब के बारे मे हमारे धर्म ग्रंथो मे बहुत कुछ लिखा और समझाया गया है बस जरूरत है उसे अपनाने की. और इसके लिये हम सब कोही सुरुआत करनी होगी.

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अहमदाबाद (एसएनएन): सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस एआर दवे ने कहा है कि अगर वो तानाशाह होते तो देश में पहली कक्षा से ही महाभारत और भगवद्गीता को पढ़ाना अनिवार्य कर देते. उन्होंने कहा कि भारत को अपनी प्राचीन परंपराओं की ओर लौटना चाहिए और महाभारत एवं भगवद्गीता जैसे शास्त्रों को बचपन से पढ़ाया जाना चाहिए.

जस्टिस दवे ने 'वैश्वीकरण के दौर में समसामायिक मुद्दे तथा मानवाधिकारों की चुनौतियों' विषय पर एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए ये बातें कहीं. उन्होंने कहा कि 'अगर गुरु शिष्य जैसी हमारी प्राचीन परंपराएं रही होतीं तो हमारे देश में ये सब समस्याएं (हिंसा एवं आतंकवाद) नहीं होता.'

उन्होंने कहा कि 'हम अपने देश में आतंकवाद देख रहे हैं. अधिकतर देश लोकतांत्रिक हैं. अगर लोकतांत्रिक देश में सभी अच्छे लोग होंगे तो वे स्वाभाविक रूप से ऐसे व्यक्ति को चुनेंगे जो अच्छे होंगे. ऐसा व्यक्ति किसी अन्य को नुकसान पहुंचाने के बारे में कभी नहीं सोचेगा.'

जस्टिस दवे ने कहा कि 'लिहाजा प्रत्येक मनुष्य में से अच्छी चीजें सामने लाने से हम हर जगह हिंसा को रोक सकते हैं और इस मकसद के लिए हमें अपनी चीजों को वापस लाना होगा.' इस सम्मेलन का आयोजन गुजरात लॉ सोसाइटी ने किया था.

जज ने यह सुझाव भी दिया कि भगवद्गीता और महाभारत को पहली कक्षा से ही छात्रों को पढ़ाना शुरू कर देना चाहिए. उन्होंने कहा, 'जो बहुत धर्मनिरपेक्ष होगा...तथाकथित धर्मनिरपेक्ष तैयार नहीं होंगे..अगर मैं भारत का तानाशाह रहा होता, तो मैंने पहली ही कक्षा से गीता और महाभारत को शुरू करवा दिया होता. इसी तरह से आप जीवन जीने का तरीका सीख सकते हैं. मुझे खेद है कि अगर मुझे कोई कहे कि मैं धर्मनिरपेक्ष हूं या धर्मनिरपेक्ष नहीं हूं लेकिन अगर कुछ अच्छा है तो हमें उसे कहीं से भी ले लेना चाहिए.'

स्वामी विवेकानंद और भारतीय नवोत्थान – श्री मोहन राव जी भागवत



स्वामी विवेकानंद और भारतीय नवोत्थान विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी 


मेरा जीवन मेरे सुख के लिए नहीं, दरिद्र नारायण की सेवा व भारत को विश्वगुरू बनाने के लिए, यही विवेकानन्द का सन्देश – श्री मोहन राव जी भागवत 

भोपाल, दिनांक २४ मार्च २०१३ // माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्व विद्यालय भोपाल द्वारा स्थानीय समन्वय भवन में स्वामी विवेकानंद और भारतीय नवोत्थान विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघ चालक श्री मोहन राव जी भागवत के उद्वोधन से हुआ | कार्यक्रम के प्रारम्भ में कांची काम कोटि पीठ के शंकराचार्य श्री जयंत सरस्वती जी ने आशीर्वाद देते हुए कहा कि विवेक पूर्वक देश और समाज के लिए कार्य करने से ही आनंद प्राप्त होता है | यह कार्य भी प्रथक प्रथक करने के स्थान पर मिलकर करना अधिक फलदाई है | क्योंकि कलियुग मैं संगठन ही शक्ति है | उन्होंने जोर देकर कहा कि “संघे शक्ति कलौयुगे” |
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघ चालक श्री मोहन राव जी भागवत ने अपने उद्वोधन के प्रारम्भ रोमा रोला द्वारा विवेकानंद पर की गई टिप्पणी से किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि कागज़ पर लिखे विवेकानंद के विचार जब इतनी स्फूर्ति देते हैं, तो उनकी तेजस्विता का उन लोगों को कैसा अनुभव हुआ होगा, जिन्होंने उन्हें प्रत्यक्ष सुनने का सौभाग्य पाया था | विवेकानंद के विचार केवल मात्र उनके द्वारा पढ़े गए या सुने गए विचार नहीं थे, वरन स्वतः अनुभव किये गए विचार थे, इसीलिए उनका इतना दीर्घजीवी प्रभाव रहा | 
एक बार अपने गुरू अर्थात अशिक्षित किन्तु सिद्ध साधक श्री रामकृष्ण परमहंस द्वरा सत्य का साक्षात्कार करा दिए जाने के बाद उन्होंने पूर्ण समर्पण कर दिया और उसी प्रेरणा के आधार पर जीवन जिया | वह सत्य अर्थात वही सनातन, मानवीय, भारतीय, हिंदुत्व या विवेकानन्द जीवन द्रष्टि | यह वही आधारशिला थी जिसने भीषण झंझावातों में भी इस राष्ट्र को खडा रखा | विवेकानंद जी के विचारों के महत्वपूर्ण विन्दु थे, कण कण में भगवान | विश्वरूप परमेश्वर | चारों ओर जो जन है वही जनार्दन है | अहंकार रहित होकर उसकी सेवा करो | वह साक्षात शिव ही मेरे उद्धार के लिए जीव रूप में आया है, जिसकी कृतज्ञ भाव से मुझे सेवा करनी है |
सनातन जीवन द्रष्टि में मनुष्य पाप का उत्पाद नहीं, अमृतस्य पुत्रः कहा गया है | अतः स्वयं को छोटा मत समझो, कोई एक विचार पकड़ो और उस विचार के प्रति पूर्ण समर्पित हो जाओ, तुम उस को पा जाओगे | दुर्बल न रहो शक्ति का साक्षात्कार करो | शक्ति का आत्यंतिक स्वरुप है प्रेम | यहाँ तक कि भयंकरता से भी प्रेम | काली रूप की पूजा वही तो है | जिससे सब डरते हैं, उसमें भी उसको देखो | 
स्वामीजी का शिकागो भाषण इसलिए जगत प्रसिद्ध हुआ, क्योंकि वह स्वाभाविक आत्मीयता से दिया गया था | उन्होंने कहा कि मैं उस देश का सन्देश वाहक हूँ जिसने ईश्वर तक पहुँचने के सभी मार्गों को एक माना | जिसकी मान्यता है कि संघर्ष मत करो, एक दूसरे को बदलने की कोशिश मत करो | इस सभा के प्रारम्भ में हुआ घंटानाद जगत में व्याप्त कल्मष का मृत्युनाद सिद्ध हो | उनके द्वारा कहे गए इन शव्दों के पीछे उनकी गहन तपस्या थी | अतः उसका प्रभाव हुआ |
भारतीय संस्कृति का यह विवरण भले ही उन्होंने अमरीका में दिया हो किन्तु वस्तुतः यह सन्देश भारत के लिए था | भारत उस समय आत्म अवसाद में था | गुलामी के कारण उत्पन्न हुई हीन ग्रंथि का शिकार था | विवेकानंद के इन शव्दों ने उसमें आत्म विश्वास जगाने का कार्य किया | वापस भारत लौट कर स्वामीजी ने घूम घूम कर देशवासियों को बताया कि विश्व गड्ढे में गिर रहा है और उसे केवल भारतीय दर्शन ही बचा सकता है | पश्चिम का विज्ञान व भारतीय आध्यात्म का सम्मिश्रण अर्थात भौतिक संसाधनों का उपयोग करते हुए वैदिक दर्शन द्वारा अमरत्व की प्राप्ति | उन्होंने कहा कि हे भारत पश्चिमी चकाचोंध में भूलो मत कि तुम्हारा जीवन परोपकार के लिए है | यहाँ की महिलाओं का आदर्श सीता, सावित्री, दमयंती है | आत्मीयता का विस्तार ही सच्चा जीवन है | हे उमानाथ, हे गौरीनाथ, माँ मुझे मनुष्य बना दो | दरिद्र भारत वासी, पिछड़े भारत वासी मेरे वन्धु हैं | मेरे बचपन का झूला, यौवन की फुलवारी, बुढापे का सहारा यह भारत ही है |
दुनिया का अधूरापन आज जग जाहिर है | इसका विवेकानंद को पुर्वानुमान था अतः उन्होंने स्वावलम्बन का आग्रह किया तथा अनुकरण न करने की बात की | उन्होंने कहाकि पश्चिम से विज्ञान लो, संगठन कौशल, अनुशासन लो | किन्तु उन्होंने परानुशरण का कडा विरोध किया और कहा कि दूसरों का अनुशरण करोगे तो जग सिरमौर कैसे बनोगे ? स्पर्धा बंद करो, देशहित में मिलकर काम करो | देश को बड़ा बनाने के लिए भारतमाता व उसकी संतानों को ही अगले पचास वर्ष तक अपना प्रथम आराध्य मानो | तुम तब तक ही हिन्दू हो, जब तक इस शव्द के उच्चारण से तुम्हारी रगों में बिजली दौड़ती है, माँ की किसी संतान के छोटे से दुःख को दूर करने के लिए भी तुम सम्पूर्ण शक्ति लगाते हो | उन्होंने उस आदर्श विद्यालय की कल्पना की जहां भारत के तरुण नौकरी करने के लिए नही, वरन सेवा व समर्पण की शिक्षा लें और उन तेजस्वी तरुणों के श्रम से भारत का भाग्य सूर्य उदय हो |
यह जीवन बनाने का तेजस्वी विचार ग्रहण कर उसे जीवन में उतारें तभी इन विचारों की सार्थकता है | विचार सत्य होता है, किन्तु उसके पैर नहीं होते | धर्म सत्य है किन्तु आचार से बढ़ता है | धर्मो रक्षति रक्षितः | विवेकानंद ने भारत को युग धर्म बताया, उसे हमें आचरण में लाना होगा | इस देश के उत्थान के लिए विवेकानंद ने जीवन लगाया | उनके गुरू ने उन्हें समाधि का अनुभव तो कराया, किन्तु फिर कहा, अब बस, आगे और नहीं | तुम्हें तो बट वृक्ष बनना है, समाज को दिशा देना है, उसके सामने आत्मोन्नति गौण है | गुरू ने कहा अब दरवाजा बंद, उस पर ताला जड़ दिया है और उसकी चाबी मेरे पास है, अब काम करो, माँ जब उचित समझेंगी तुम्हे चाबी दे देंगी |
इसके बाद विवेकानंद ने भारत के एक एक व्यक्ति को जगाने में स्वयं के शरीर को इतना जर्जर कर लिया कि ३९ वर्ष की अल्प आयु में ही संसार छोड़ गए | उनके कुछ पत्रों में उस शारीरिक पीड़ा की झलक मिलती है | असह्य शरीरिक कष्ट सहकर भी वे निरंतर काम करते रहे | उन्होंने कहा था कि मैं निश्चय से देख रहा हूँ कि भारत की तरुनाई सत्य की अनुभूति कर भारत को विश्वगुरू बनाने की कल्पना साकार करेगी | भारतमाता पुनः भव्य दिव्य सिंहासन पर आरूढ़ हो समस्त विश्व को कल्याण का आशीर्वाद देगी |
स्वावलंबन व आत्म गौरव के साक्षात्कार द्वारा हमें सम्पूर्ण विश्व का कल्याण करना है | पैदल चलकर अथवा नौकाओं के माध्यम से विश्व के सुदूर क्षेत्रों में जाजाकर आयुर्वेद, गणित व विज्ञान का दान हमारे पूर्वजों ने विश्व को दिया, आज फिर वही पराक्रम दिखाने का समय आ गया है | मेरा जीवन मेरे सुख के लिए नहीं, मेरी शक्ति सामर्थ्य का उपयोग दरिद्र नारायण की सेवा के लिए, भारत को विश्वगुरू बनाने के लिए करूंगा, यह संकल्प लेकर जाए | ऐसा जीवन ही न केवल स्वयं के लिए, न केवल भारत के लिए वरन सम्पूर्ण विश्व के लिए जीवन दाई होगा | आपके सबके अंतस में यह भाव जगे यहीं मंगल कामना |

मंच पर माखनलाल विश्व विद्यालय के कुलपति श्री वृजकिशोर कुठियाला भी उपस्थित थे | सभा का संचालन श्री जगदीश उपासने ने तथा आभार प्रदर्शन डा. चंदर सोनाने ने किया | कार्यक्रम में चार मुख्य मंत्री सर्व श्री सुन्दरलाल पटवा, कैलाश जोशी, उमाश्री भारती, बाबूलाल गौर सहित अनेक सामाजिक, राजनैतिक व गणमान्य नागरिकों के अतिरिक्त बड़ी संख्यामें पत्रकारिता विश्व विद्यालय के विद्यार्थी उपस्थित थे | कार्यक्रम के अंत में वन्देमातरम का गान हुआ |

अब सेल्फ अटेस्ट ही काफी होगा - केंद्र सरकार




केंद्र सरकार का आदेश, अब सेल्फ अटेस्ट ही काफी होगाAajtak.in [Edited By: रंजीत सिंह] | नई दिल्ली, 2 अगस्त 2014 |

केंद्र की मोदी सरकार ने सुशासन का नया मंत्र दिया है. सरकार ने सर्टिफिकेट अटेस्ट करवाने और हलफनामे का झंझट खत्म कर दिया है. केंद्र सरकार ने आदेश जारी किया है कि अब किसी राजपत्रित अधिकारी द्वारा प्रमाणित किए जाने के बजाय सर्टिफिकेट का स्‍व प्रमाणित (सेल्फ अटेस्टेड) होना ही काफी होगा.
सरकार ने केंद्रीय मंत्रालयों और राज्य सरकारों को इस बारे में निर्देश जारी कर दिए हैं. सरकार की दलील है कि एफिडेविट बनवाने में पैसा और वक्त बर्बाद होता है. इस प्रक्रिया में अधिकारी का कीमती वक्त भी जाया होता है.

अब नियुक्ति के अंतिम चरण में सेल्फ अटेस्ट के साथ ओरिजनल डॉक्यूमेंट ही पेश करना होगा. हालांकि, गलत अटेस्‍टेशन पर आईपीसी के प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जाएगी.

पीएमओ की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि नरेंद्र मोदी की यह पहल लोगों की सुविधा को ध्‍यान रखते हुए लिया गया है. इससे आम जनता को ही फायदा होगा.

कांग्रेस से दो साल की छुट्टी लें सोनिया-राहुल : जगमीत बरार





इतना तो तय है कि अब श्रीमति सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष का पद नहीं छोडने वाली हैं। वे जानती हैं कि उन्होने नरसिंहराव की सरकार के समय किस मुस्किल से सीताराम केसरी को धक्के मार कर निकाला और कब्जा किया था। अब कब्जा गया तो वे कभी कांग्रेस को फिर प्राप्त नहीं कर पायेंगीं । इसलिये अगला अध्यक्ष राहुल गांधी तो बन सकते हें मगर कोई ओर नहीं । यूं भी कांग्रेस का मतलब नेहरूजी के वंशज ही माना जाता हे। स्वंय में कांग्रेस कुछ भी नहीं हे।----------------


कांग्रेस से दो साल की छुट्टी लें सोनिया-राहुलः पूर्व सांसद

आईबीएन-7 | Aug 02, 2014

नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव में शर्मनाक हार के बाद कांग्रेस में बवाल थमने का नाम नहीं ले रहा। ताजा विवाद पूर्व कांग्रेस कार्यसमिति सदस्य और पंजाब के नेता जगमीत बरार के बयान से खड़ा हुआ है। उन्होंने साफ कहा कि सोनिया गांधी और उनके बेटे राहुल गांधी को 2 साल के लिए छुट्टी ले लेनी चाहिए और इससे कोई नुकसान नहीं होगा। साथ ही पूर्व सांसद बरार ने ये भी कहा कि सभी महासचिवों को भी इस्तीफा दे देना चाहिए और पार्टी चलाने की जिम्मेदारी नए नेतृत्व को सौंप देनी चाहिए। जगमीत बरार पहले नेता हैं जिन्होंने गांधी परिवार से नेतृत्व छोड़ने की मांग की है।

बरार की इस मांग पर कांग्रेस की ओर से भी प्रतिक्रियाएं आई हैं। पार्टी नेता राशिद अल्वी ने कहा कि इस तरह के बयान दुर्भाग्यपूर्ण हैं। किसी भी आदमी को कोई बात कहनी है तो पार्टी के फोरम पर कहनी चाहिए। सोनिया गांधी पार्टी की निर्विवाद लीडर हैं। बगैर उनके कांग्रेस मजबूत नहीं हो सकती। जो नेता इस तरह के बयान दे रहे हैं उनको अपनी मर्यादा का ख्याल रखना चाहिए।

कांग्रेस नेता राजबब्बर ने कहा कि बरार ने कहा है कि सबको जिम्मेदारी लेनी चाहिए इसमें दो राय नहीं है लेकिन जहां तक नेतृत्व का सवाल है तो सोनिया और राहुल की आज सबसे ज्यादा जरूरत है। हमारी सरकार में जो मंत्री थे, उनके एरोगेंस ने कांग्रेस को जनता की नजरों में छोटा कर दिया था। ऐसे मंत्रियों के नाम समय आने पर बताऊंगा।

वहीं पूर्व मंत्री मनीष तिवारी ने कहा कि ये बात सही है कि लोकसभा चुनाव में हमारा प्रदर्शन उम्मीद के अनुरूप नहीं रहा लेकिन ये समय है सबके साथ आने का, न कि एक-दूसरे पर दोषारोपण करने का। पूरे देश में जिस तरह सांप्रदायिकता का माहौल बन रहा है उसे देखते हुए सबसे धर्मनिरपेक्ष पार्टी कांग्रेस को एक होने की जरूरत है।

नरेंद्र मोदी की अमेरिका से दो टूक , पहली जिम्मेदारी देश के गरीबों की



नरेंद्र मोदी ने अमेरिका से दो टूक कहा, पहली जिम्मेदारी देश के गरीब

टाइम्स न्यूज नेटवर्क | Aug 2, 2014
नई दिल्ली |

विश्व व्यापार बातचीत में विफलता के लिए अमेरिका द्वारा भारत को दोषी ठहराने के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को अमेरिका को साफ-साफ कहा कि उनकी सरकार की पहली जिम्मेदारी देश के गरीब लोगों के प्रति बनती है। प्रधानमंत्री मोदी ने डब्ल्यूटीओ के तहत व्यापार सुविधा समझौता (टीएफए) को लेकर भारत और अमेरिका के मतभेदों के मद्देनजर भारत के दौरे पर आए अमेरिका के विदेश मंत्री जॉन केरी से यह बात कही।
जॉन केरी से मुलाकात के दौरान मोदी से बड़े ही साफ शब्दों में कहा, 'मैं भारत के छोटे किसानों के लिए ज्यादा चिंतित हूं, हालांकि मैं मानता हूं कि यह व्यापार समझौता भारत के लिए अच्छा है।'

साथ ही प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा कि अमीर देशों को विकासशील देशों में गरीबी की समस्या और इससे निपटने की उनकी जिम्मेदारी को समझना चाहिए। मोदी ने भारत यात्रा पर आए अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी और वाणिज्य मंत्री पेनी प्रिट्जकर को अपनी इस राय से अवगत कराया। अमेरिका के दोनों मंत्री शुक्रवार सुबह मोदी से मिले थे।

इस मुलाकात के बाद जारी प्रधानमंत्री कार्यालय के बयान में कहा गया है, 'प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चर्चाओं में अमीर देशों को विकासशील देशों में गरीबी की समस्या और इससे निपटने की सरकारों की जिम्मेदारी को समझना चाहिए।'

मोदी से मुलाकात के दौरान अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी ने कहा कि इससे भारत के खिलाफ संदेश गया है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार को आसान बनाने पर भारत बाकी दुनिया के साथ नहीं है।

आपको बता दें कि कृषि उत्पादों के स्टोरेज और सब्सिडी पर कस्टम कानूनों को उदार बनाने से जुड़े इस समझौते पर साइन करने से भारत ने यह कहकर इनकार कर दिया है कि इससे देश के फूड सिक्यॉरिटी कानून पर असर पड़ेगा।
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WTO पर भारत के रुख के पीछे '56 इंच का सीना'

निस्तुला हेब्बर, नई दिल्ली
वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूटीओ) में ट्रेड समझौते के मामले में भारत के सख्त रवैये ने पश्चिमी देशों, खासतौर पर अमेरिका को हैरान कर दिया है। भारत का यह रुख ब्रिक्स बैंक का हेडक्वॉर्टर चीन में बनाए जाने के ऐलान के तुरंत बाद सामने आया है। विश्लेषकों का कहना है कि इस रुख में घरेलू और विदेश नीति के मोर्चे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नजरिये का अक्स है।

सरकार से जुड़े सूत्रों ने बताया कि डब्ल्यूटीओ में कॉमर्स मिनिस्टर निर्मला सीतारमण के सख्त रवैये के पीछे प्रधानमंत्री का ही हाथ था। हालांकि, मोदी ने ब्रिक्स बैंक के हेडक्वॉर्टर पर कोई बवाल नहीं खड़ा किया, क्योंकि वह इस पहल के दायरे को व्यापक बनाना चाहते हैं।

एक आला सरकारी अफसर ने बताया, 'ब्रिक्स बैंक के हेडक्वॉर्टर पर बातचीत के बीच जब बाकी देश इस बात को लेकर दुविधा में थे कि इसे शंघाई में होना चाहिए या नहीं, तो प्रधानमंत्री मोदी ने मामले में हस्तक्षेप करते हुए कहा कि चीन की इस मांग को स्वीकार कर लेना चाहिए। मोदी ने कहा कि इसी तरह से बाकी दुनिया को यह मेसेज दिया जा सकेगा कि यह एक गंभीर पहल है।'

वर्ल्ड बैंक-आईएमएफ के विकल्प के तौर पर नए ब्रिक्स बैंक से भारत को न केवल फायदा होगा, बल्कि इससे पश्चिमी देशों को मोदी की कूटनीतिक क्षमताओं के बारे में भी मेसेज जाएगा। ब्राजील में हुई ब्रिक्स शिखर वार्ता में दक्षिण अफ्रीका प्रतिनिधिमंडल इस बात को सुनकर हैरान था कि कॉमर्स मिनिस्टर सीतारमण को जेनेवा में होने वाली डब्ल्यूटीओ की जनरल काउंसिल की बैठक से पहले सिडनी में जी-20 मीटिंग में शिरकत करने को कहा गया था।

सिडनी में सीतारमण ने साफ कर दिया कि भारत की चिंताओं को खारिज नहीं किया जा सकता। उन्होंने जी-20 बैठक में ट्रेड समझौते से जुड़ी भारत की समस्याओं और ऐग्रिकल्चर प्रॉडक्ट्स की वैल्यूएशन के मसले जोरशोर से उठाए। इसके बाद उन्होंने प्रधानमंत्री को घटनाक्रम की जानकारी दी।

सरकार के एक सूत्र ने बताया, 'अगले दिन (बीते रविवार) पीएम ने सभी संबंधित सचिवों को बुलाकर जेनेवा में गुरुवार और शुक्रवार को होने वाली डब्ल्यूटीओ बैठक में भारत की पोजिशन के बारे में जानकारी दी। सोमवार को उन्होंने कैबिनेट की बैठक बुलाई और इसमें भाग लेने के लिए सीतारमण भी दिल्ली पहुंचीं।'

कुछ लोग इसकी तुलना अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान 1998 में हुए परमाणु परीक्षण से कर रहे हैं। हालांकि, मोदी सरकार के इस रुख की वजह कुछ घरेलू मजबूरियां भी हो सकती है। चुनाव प्रचार में मोदी ने किसानों से वादा किया था कि उनकी सरकार 50 फीसदी प्रॉफिट मार्जिन सुनिश्चित करेगी। डब्ल्यूटीओ में भारत के सख्त रवैये की एक वजह यह भी हो सकती है।

प्रधानमंत्री का इरादा जो भी रहा हो, लेकिन इसे आक्रामक फॉरेन और ट्रेड पॉलिसी के तौर पर देखा जा रहा है। इससे कम से कम इतना तो सुनिश्चित हो गया है कि सितंबर में पीएम के अमेरिकी दौरे पर बारीक नजर होगी।
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मोदी ने कहा,विकासशील देशों की समस्या समझे विकसित देश

By PrabhatKhabar Online Desk | Publish Date: Aug 2 2014 

नयी दिल्ली:विश्व व्यापार वार्ताओं में विफलता के लिए अमेरिका द्वारा भारत पर दोषारोपण किये जाने के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को कहा कि अमीर देशों को विकासशील देशों में गरीबी की समस्या और इससे निपटने की उनकी जिम्मेदारी को समझना चाहिए.

मोदी ने भारत आये अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी तथा वाणिज्य मंत्री पेनी प्रिट्जकर को इस बात से अवगत कराया. अमेरिका के दोनों मंत्री शुक्रवार सुबह मोदी से मिले थे. मुलाकात व्यापार सुगमता समझौते (टीएफए) पर हस्ताक्षर को लेकर डब्ल्यूटीओ के मुख्यालय जिनेवा में वार्ता के गुरुवार रात विफल होने के तुरंत बाद हुई है. जिनेवा में भारत ने कड़ा रख अपनाया. टीएफए पर समझौता निर्धारित समयसीमा में नहीं हो पाया. डब्ल्यूटीओ के बाली मंत्रीस्तरीय सम्मेलन ने इसके लिए 31 जुलाई 2014 तक का समय रखा था. भारत टीएफए के विरुद्ध नहीं है.

भारत का कहना था कि खाद्य सुरक्षा संबंधी मुद्दे का स्थायी समाधान निकाले जाने तक वह इस पर हस्ताक्षर नहीं करेगा. विदेश मंत्रलय के प्रवक्ता सैयद अकबरुद्दीन से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की भारत की आवश्यकता को रेखांकित किया. कहा कि देश के हालात को देखते हुए ‘काफी बड़ी संख्या में’ लोगों को खाद्य सुरक्षा उपलब्ध कराने की आवश्यकता है.

मुङो लगता है कि प्रधानमंत्री ने आधिकारिक रूप से कहा है कि विकासशील देशों की विकास की चुनौतियों को सभी देशों को समझना चाहिए. हमारी दिशा हमारी वर्तमान परिस्थिति से तय होती है. हमारी परिस्थिति ऐसी है जिसमें बड़ी संख्या में लोगों को खाद्य सुरक्षा उपलब्ध कराने की जरूरत है. प्रधानमंत्री ने वही बात रखी है.

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प्रतिक्रिया 

भारत सरकार का यह कदम वाकई सराहनीय है और स्पष्ट करता है कि भारत किसी भी दवाब के आगे अब झुकने को तैयार नही है. जहाँ तक विश्व कम्युनिटि की बात है तो उनमे भारत को अनदेखा करने की हिम्मत नही है क्योंकि भारत अपनी अपार जनसंख्या के दम पर एक बहुत विशाल उपभोग्ता राष्ट्र के रूप मे उभरा है और यदि विश्व के देश भारत से किनारा करते भी है तो फिर इससे भारत मे कृषि, उद्योग-धंधो, रोजगार इत्यादि को बल मिलेगा. वैसे भी भारत से दूरी बनाकर कोई भी विकसित राष्ट्र अपने आर्थिक हित नही गँवाना चाहेगा इसलिये भारत सरकार को अपनी क्षमताओं पर भरोषा रखना चाहिये और किसी भी अंतर्राष्ट्रीय दवाब के आगे न झुकने की नीति पर चलना चाहिये जो अब तक की सरकारों (केवल इंदिरा जी व अटल बिहारी वाजपेयी को छोड़कर) ने हिम्मत नही दिखाई है.