सोमवार, 4 अगस्त 2014

अपहरण, गैंगरेप, जबरदस्ती धर्म परिवर्तन

Samarendra Singh : ताज्जुब है. चारों तरफ खामोशी है. जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो. कमाल की धर्मनिरपेक्षता है. गाजा में हुआ होता तो खबर बनती. सबका खून उबाल मारता. लेकिन मेरठ गाजा नहीं है. और जहां बलात्कार हुआ है वह मंदिर भी नहीं है. और जिसका बलात्कार हुआ और धर्म परिवर्तन कराया गया... वह मुसलमान नहीं है. इसलिए खबर नहीं है. कुछ साथी कह रहे हैं कि इस पर तीखी प्रतिक्रिया नहीं होनी चाहिए. यकीनन नहीं होनी चाहिए. लेकिन म्यांमार में और गाजा में और स्पेन में जो होता है उस पर यहां तीखी प्रतिक्रिया क्यों होती है?


इस्लाम को विक्टिम के तौर पर पेश क्यों किया जाता है? ऐसे मुल्क में जहां पहले से ही धार्मिक कट्टरता चरम पर हो, वहां दुनिया के दो मुल्कों के बीच की लड़ाई को धर्म विशेष से जोड़ कर पेश किया जाना और लहुलूहान जिस्म को प्रदर्शित करना कहां तक जायज है? और अगर वह सब जायज है तो मेरठ कांड पर तीखी प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी जानी चाहिए? सलमान रुश्दी ठीक कहता है... इस्लाम के दिल में कुछ खोट है. अब इस खोट को दिल से बाहर निकालने की जिम्मेदारी तो इस्लाम के रहनुमाओं को ही उठानी पड़ेगी, वरना टकराव तो होगा ही.

- एनडीटीवी समेत कई चैनलों-अखबारों में काम कर चुके पत्रकार समरेंद्र सिंह के फेसबुक वॉल से


पहले अपहरण कियाफिर गैंगरेप इसके बाद कराया धर्म परिवर्तन

आशीष मिश्रा [Edited By: दीपिका शर्मा ] | 

http://aajtak.intoday.in/story/after-gangrape-girl-conversion--1-774442.html

लखनऊ, 4 अगस्त 2014मेरठ के खरखौदा क्षेत्र के एक गांव से युवती का अपहरण कर उसके साथ पहले तो गैंगरेप किया फिर उसका जबरन धर्म परिवर्तन करा दिया गया. करीब दस दिनों बाद रविवार को मुजफ्फरनगर के एक शिक्षण संस्थान से छूटकर युवती ने गांव पहुंचकर सनसनीखेज खुलासा किया.

युवती (20) स्नातक की पढ़ाई कर गांव के ही एक शिक्षण संस्थान में हिंदी और अंग्रेजी पढ़ाती थी. छह महीने पूर्व उसने नौकरी छोड़ दी थी. युवती के पिता की ओर से दर्ज एफआईआर में बताया गया कि 23 जुलाई को शिक्षण संस्थान के शिक्षक और ग्राम प्रधान ने साथियों के साथ युवती का अपहरण कर लिया. हापुड़ स्थित एक शिक्षण संस्थान में ले जाकर उससे गैंगरेप किया और जबरदस्ती उसका धर्म परिवर्तन करा दिया. युवती को पीटा गया और जान से मारने की धमकी दी गई.

दूसरी ओर युवती ने पुलिस को बताया कि उसे हापुड़ के अलावा गढ़मुक्तेश्वर के गांव दौताई और फिर मुजफ्फरनगर तथा देवबंद में उसे बंधक बनाकर रखा गया. वहां उसे बेहोश रखने के लिए नशे का इंजेक्शन लगाया जाता था. युवती के अनुसार उस शिक्षण संस्थान में उसकी जैसी करीब 45-50 और भी युवतियां थीं. उनकी भी ऐसी हालत कर यहां बंधक बनाकर रखा गया है. सभी को एक-एक कर सऊदी अरब में बेचने की तैयारी है.

युवती ने बताया कि उस शिक्षण संस्थान का निर्माण चल रहा है. रविवार तडक़े वह मौका पाकर वहां से फरार हो गई और बस से भैसाली बस अड्डा पहुंचकर किसी राहगीर से मोबाइल फोन लेकर परिजनों को पूरा प्रकरण बताया.

परिजन पीडि़त युवती को लेकर रविवार सुबह 10 बजे थाना खरखौदा पहुंचे और थानाध्यक्ष को पूरी बात बताई. आरोपियों के नाम बताने के बावजूद थानाध्यक्ष ने दोपहर दो बजे तक कोई कार्रवाई नहीं की. इसके बाद बीजेपी तथा हिंदू संगठनों के कार्यकर्ता थाने पहुंचे और हंगामा किया. थाने का घेराव करते वक्त सीओ किठौर श्वेताभ पांडे से धक्कामुक्की भी हुई. पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज कर लिया गया है.
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मेरठ गैंगरेप और धर्म परिवर्तन कांड : 
2 और गिरफ्तार, हालात तनावपूर्ण, लेकिन नियंत्रण में
भाषा [Edited By: दिगपाल सिंह] | मेरठ, 6 अगस्त 2014

मेरठ में एक युवती के साथ कथित गैंग रेप और उसका जबरन धर्म परिवर्तन करने की घटना के सिलसिले में मंगलवार को दो और लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया. मामले में अब तक पांच लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है. जिले में हालात तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में हैं. घटना पर लोगों का गुस्सा सामने आने के बाद केंद्र ने उत्तर प्रदेश सरकार से जल्द से जल्द विस्तृत रिपोर्ट मांगी है, वहीं पीड़िता के परिवार ने सीबीआई जांच की मांग की है.
मेरठ के जिला मजिस्ट्रेट पंकज यादव ने बताया, ‘जिले में किसी भी खराब स्थिति से बचने के लिए पुलिस बल के साथ आरएएफ की एक कंपनी तैनात की गयी है. हालात तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में हैं.’ 20 साल की युवती को पहले कथित तौर पर अगवा करने और फिर उसके साथ गैंग रेप के मामले में तीन आरोपियों को सोमवार को गिरफ्तार किया गया था.

मंगलवार को लोकसभा में भी यह मामला उठा और मेरठ के सांसद राजेंद्र अग्रवाल ने सीबीआई जांच की मांग की. इसके बाद सदन में बीजेपी और सपा के सदस्यों के बीच कहासुनी हो गयी. सपा के सदस्य बीजेपी सांसदों के आरोपों का विरोध कर रहे थे. बीजेपी के गिरिराज सिंह समेत कुछ सदस्यों को उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग करते हुए सुना गया.

पीड़िता के भाई ने बताया कि निष्पक्ष जांच के लिए सीबीआई जांच होनी चाहिए और दोषियों को न्याय के कठघरे में लाया जाना चाहिए.
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गैंगरेप और धर्म परिवर्तन मामले में नया खुलासा

ब्यूरो बुधवार, 6 अगस्त 2014
अमर उजाला, मेरठ, मुजफ्फरनगर

मेरठ में युवती से गैंगरेप और धर्म परिवर्तन के मामले में मंगलवार को एक नया खुलासा सामने आया। पुलिस के मुताबिक आरोपी हाफिज और उसके साथी युवती को विदेश भेजना चाहते थे। युवती का पासपोर्ट बनवाने के लिए उन्होंने पुलिस ऑफिस में एक प्रार्थना पत्र भी लगाया था।

गैंगरेप और धर्म परिवर्तन कराने के बाद पीड़ित युवती को हाफिज देवबंद स्थित एक मदरसे में छोड़ आया था। आरोपी हाफिज का अगला प्लान युवती को विदेश भेजने का था। यह जानकारी युवती को भी हो चुकी थी। पुलिस सूत्रों की मानें तो आरोपी आठ लड़कियों को धर्म परिवर्तन कराकर विदेश भेज चुके हैं। भाजपा, हिंदू संगठन और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं को इसकी जानकारी लगी तो उनका गुस्सा और भड़क गया।

भाजपा नेताओं ने इसकी शिकायत डीआईजी से करते हुए आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की। डीआईजी के. सत्यानारायणा ने बताया कि ऐसी शिकायत उनके पास आई थी। पुलिस ऑफिस में आरोपियों का प्रार्थना पत्र तलाश किया, लेकिन कुछ नहीं मिला। मामले की जांच कर कार्रवाई करेंगे।

आरोपियों पर लगेगी रासुका
डीआईजी ने बताया कि हाफिज, ग्राम प्रधान नवाब और अन्य आरोपियों पर रासुका लगाई जाएगी। पुलिस की तीन टीमें हाफिज की तलाश में लगी हैं। हाफिज की गिरफ्तारी के बाद इस वारदात में कई और खुलासे हो सकते है।

नरेंद्र मोदी : भगवा वस्त्र...गले में रुद्राक्ष, मोदी ने की पशुपतिनाथ की पूजा



भगवा वस्त्र...गले में रुद्राक्ष, मोदी ने की पशुपतिनाथ की पूजा







प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को कहा कि वह यहां पशुपतिनाथ मंदिर में प्रार्थना कर स्वयं को धन्य महसूस कर रहे हैं। मोदी ने ट्वीट किया, ''पशुपतिनाथ मंदिर में सुबह प्रार्थना कर बेहद धन्य महसूस कर रहा हूं।''

प्रधानमंत्री ने मंदिर में प्रार्थना की और इसके परिसर में 400 बिस्तरों वाले धर्मशाला के निर्माण के लिए 25 करोड़ रुपये का अनुदान दिया और 2,500 किलोग्राम चंदन की लकड़ी भी अर्पित की। मोदी ने मंदिर में अपनी मौजूदगी की तस्वीर भी ट्विटर पर साझा की। प्रधानमंत्री मोदी की दो-दिवसीय नेपाल यात्रा का समापन सोमवार को हो रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल की अपनी पहली यात्रा के दूसरे और आखिरी दिन आज पांचवीं सदी के प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना की। भगवान शिव के मंदिर में मोदी करीब 45 मिनट तक रहे। मोदी ने पशुपतिनाथ मंदिर में श्रावण महीने के सोमवार के दिन दर्शन किए, जिसका धार्मिक तौर पर काफी महत्व है। उन्होंने पशुपतिनाथ मंदिर ट्रस्ट को 2500 किलोग्राम चंदन दान किया।
   
यह हिंदू मंदिर नेपाल की राजधानी काठमांडो के तीन किलोमीटर उत्तर पश्चिम में देवपाटन गांव में बागमती नदी के तट पर स्थित है। यह मंदिर भगवान शिव के पशुपति स्वरूप को समर्पित है। हर साल हजारों लोग इस मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं जिनमें से अधिकतर संख्या भारत के लोगों की होती है। मंदिर में भारतीय पुजारियों की काफी संख्या है। सदियों से यह परंपरा रही है कि मंदिर में चार पुजारी और एक मुख्य पुजारी दक्षिण भारत के ब्राह्मणों में से रखे जाते हैं।

किंवदंतियों के अनुसार मंदिर का निर्माण सोमदेव राजवंश के पशुप्रेक्ष ने तीसरी सदी ईसा पूर्व में कराया था लेकिन पहले ऐतिहासिक रिकार्ड 13वीं शताब्दी के हैं। पाशुपत सम्प्रदाय संभवत: इसकी स्थापना से जुड़ा है। पशुपति काठमांडो घाटी के प्राचीन शासकों के अधिष्ठाता देवता रहे हैं। 605 ईसवीं में अमशुवर्मन भगवान के चरण छूकर अपने को अनुग्रहीत मानते थे। बाद में मध्य युग तक मंदिर की कई नकलों का निर्माण कर लिया गया। ऐसे मंदिरों में भक्तपुर (1480), ललितपुर (1566) और बनारस (19वीं शताब्दी के प्रारंभ में) शामिल हैं। मूल मंदिर कई बार नष्ट हुआ। इसे वर्तमान स्वरूप नरेश भूपलेंद्र मल्ला ने 1697 में प्रदान किया।

स्थानीय किंवदंती विशेष तौर पर नेपालमहात्म्य और हिमवतखंड के अनुसार भगवान शिव एक बार वाराणसी के अन्य देवताओं को छोड़कर बागमती नदी के किनारे स्थित मगस्थली चले गए। भगवान शिव वहां पर चिंकारे का रूप धारण कर निद्रा में चले गए। जब देवों ने उन्हें खोजा और उन्हें वाराणसी वापस लाने का प्रयास किया, तो उन्होंने नदी के दूसरे किनारे पर छलांग लगा दी। इस दौरान उनका सींग चार टुकड़ों में टूट गया। इसके बाद भगवान पशुपति चतुर्मुख लिंग के रूप में प्रकट हुए।

मोदी के दर्शन करने के बाद एक पुजारी ने बताया कि मोदी की विशेष पूजा में 150 पुजारियों ने हिस्सा लिया जिसके दौरान मोदी ने रूद्राभिषेक और पंच अमत स्नान सम्पन्न किया। भगवा वस्त्र पहने मोदी मंदिर से रुद्राक्ष की माला पहने हुए निकले। प्रधानमंत्री ने आगंतुक पुस्तिका में लिखा मंदिर अद्वितीय है। भगवान शिव की नगरी काशी से लोकसभा के लिए पहली बार निर्वाचित हुए मोदी ने लिखा, पशुपतिनाथ और काशी विश्वनाथ (वाराणसी) एक ही हैं। मैं अत्यंत भावुक हूं और मैं प्रार्थना करता हूं कि पशुपतिनाथ का आशीर्वाद दोनों देशों को प्राप्त होता रहे, जो नेपाल और भारत एकसाथ जोड़ता भी है।

काठमांडू में स्कूल किए गए बंद

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की काठमांडू यात्रा के दौरान परिवहन प्रबंधन में हो रही दिक्कतों को देखते हुए यहां सोमवार को कई शिक्षण संस्थान बंद हैं। 'हिमालयन टाइम्स' में रविवार रात प्रकाशित खबरों के अनुसार, स्कूल मंगलवार को भी बंद रहेंगे। मोदी की दो-दिवसीय नेपाल यात्रा सोमवार को समाप्त हो रही है। यह पिछले 17 सालों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली द्विपक्षीय नेपाल यात्रा है। समाचार पत्र के अनुसार, काठमांडू जिला शिक्षा अधिकारी शंकर गौतम का कहना है कि स्कूल प्रशासन ने काठमांडू और ललितपुर के स्कूलों को बंद करने का फैसला परिवहन प्रबंधन की दिक्कतों को देखते हुए लिया। गौतम ने कहा कि सैंकड़ों बच्चों के माता-पिता भी स्कूल बंद करवाने के पक्ष में थे।

मोदी ने नेपाल के राष्ट्रपति से की चर्चा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को नेपाल के राष्ट्रपति राम बरन यादव के साथ द्विपक्षीय मुद्दों पर चर्चा की। मोदी ने राम बरन के साथ मुलाकात के दौरान दोनों देशों के संबंध को मजबूत करने के उपायों पर बातचीत की। प्रधानमंत्री सुशील कोइराला और भारत व नेपाल के वरिष्ठ अधिकारी भी इस 15 मिनट की मुलाकात के दौरान मौजूद थे। इस बैठक के बाद दोपहर का भोजन परोसा जाएगा, खाने की मेज पर गुजरात के व्यंजन भी मौजूद होंगे। सावन महीने के सोमवार की वजह से खाने की थाली में शाकाहारी व्यंजन ही रहेंगे। मोदी की दो-दिवसीय नेपाल यात्रा सोमवार को समाप्त हो रही है। मोदी ने राम बरन से मुलाकात से पहले पशुपतिनाथ मंदिर के दर्शन किए और परिसर के अंदर धर्मशाला निर्माण के लिए 25 करोड़ रुपये का अनुदान दिया।

नेपाली सोशल मीडिया पर छाए जीत बहादुर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संरक्षण में अरसे से रहने वाले जीत बहादुर सारू मागर की मुस्कराती तस्वीरें नेपाल की सोशल मीडिया पर छाई हुई हैं। मोदी के साथ नेपाल पहुंचे मागर को दोबारा अपने परिवार से मिलने का मौका मिला है। समाचार एजेंसी सिन्हुआ के अनुसार, फेसबुक और अन्य सोशल साइटों पर मागर की तस्वीरें छाई हुई हैं। मागर की तस्वीर में उसके चेहरे पर सालों बाद परिवार से मिलने की खुशी देखी जा सकती है और यह सब प्रधानमंत्री मोदी की वजह से संभव हो पाया। नेपाल के ग्रामीण परिवेश से आने वाले मागर 15 वर्षों से परिवार से अलग रहने के बाद उनसे मिलने में सफल रहे।

26 वर्षीय मागर एक दशक पहले अहमदाबाद में मोदी से मिले और तब से वह उन्हीं के संरक्षण में थे। मोदी दो-दिवसीय नेपाल यात्रा पर तीन अगस्त को काठमांडू पहुंचे। यह किसी भारतीय प्रधानमंत्री की 17 साल बाद पहली नेपाल यात्रा है। मागर मोदी के साथ विशेष विमान से काठमांडू पहुंचे। मागर के परिवार में उनकी मां, भाई, बहन, भाभी और दो चेचेरे भाई-बहन हैं और उन्हें कुछ दिन पहले ही भारतीय दूतावास काठमांडू लेकर आया था। सिन्हुआ के मुताबिक, मागर परिवार के दोबारा एक हो जाने की घटना का नेपाली समुदाय ने स्वागत किया है, क्योंकि यह भारत के नए प्रधानमंत्री के मानवीय पक्ष को दर्शाता है।

'मोदी ने मेरे बेटे को सही राह दिखाई'

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मेरे बेटे को जीवन की 'सही राह दिखाई', यह बात मोदी के संरक्षण में अरसे तक रहे जीत बहादुर सारु मागर की मां खगीसारा सारु मागर ने कही, जो 15 सालों बाद उससे मिलने पर बेहद खुश हैं। उनके परिवार को फिर से एक करने में मोदी ने अहम भूमिका निभाई है। खगिसारा रविवार को अपने बेटे जीत बहादुर से मिलीं। यह मुलाकात मोदी की दो-दिवसीय नेपाल यात्रा के पहले दिन हुई। 'हिमालयन टाइम्स' के अनुसार, मोदी ने नेपाल पहुंचने के बाद सबसे पहला काम जीत बहादुर को उनसे परिवार से मिलाने का किया।

खगिसारा कहती हैं कि मोदी ने उनके बेटे को नई जिंदगी दी है। उन्होंने मोदी से कहा, ''मैंने उसे जन्म दिया और बड़ा किया, लेकिन आपने उसे जीवन की सही राह दिखाई, इसलिए मैं चाहती हूं कि आप उसकी देखभाल करें और उसे आगे की राह दिखाएं।'' परिवार के दोबारा मिलने के दौरान मोदी ने जीत से उसकी इच्छा जाननी चाही। जीत ने कहा कि वह पहले अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहता है और फिर वही करेगा जो 'बड़े भईया' यानी मोदी चाहेंगे। जीत ने कहा कि वह एक सप्ताह तक नवलपरसी में अपने परिवार के साथ रहेगा और फिर अहमदाबाद वापस लौट जाएगा, जहां वह बीबीए की पढ़ाई कर रहा है।

मोदी से प्रभावित हुए नेपाल के राजनेता

नेपाल में बैठकों के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हावभाव में दिखी सरलता और प्रतिबद्धता ने दोनों दक्षिण एशियाई देशों के द्विपक्षीय संबंधों के नवीनीकरण की नई राह तैयार कर दी। नेपाल के नेताओं ने पार्टी से ऊपर उठकर उनके व्यवहार और बयान की प्रशंसा की। इधर, रविवार शाम मोदी ने नेपाल के राजनीतिज्ञों को संबोधित किया, जो नियमित रूप से भारत विरोधी बयान देते हैं और नेपाल-भारत मित्रता संधि, 1950 पर दोबारा चर्चा करने मांग करते हैं। मोदी ने भी इस संदर्भ में कुछ किए जाने का वादा किया है।

मोदी ने अपने नेपाली समकक्ष सुशील कोइराला के साथ भोजन के दौरान कहा, ''आपको 1950 की संधि में क्या बदलाव चाहिए? मैं आपसे एक मंच पर आने और एक नया प्रस्ताव पेश करने की मांग करता हूं। लेकिन मैं यह भी मांग करता हूं कि इस पर कोई राजनीति न हो, क्योंकि यह दोनों देश के लिए फायदेमंद नहीं होगा।'' नेपाल के कुछ नेता विशेषकर माओवादी, राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव को देखते हुए इस संधि को समाप्त करने की मांग कर रहे हैं, लेकिन इसको लेकर कोई ठोस समाधान वे पेश नहीं कर पाए हैं। पर्यवेक्षकों का कहना है कि हाल में संपन्न तीन दिवसीय भारत-नेपाल संयुक्त आयोग की बैठक में इसके विकल्प पर सहमति बनी है और अब पाला नेपाल के हाथ में है।


हालांकि, मोदी के बयान ने नेपाली नेताओं को प्रभावित किया है। नेपाली नेताओं ने अपनी अलग-अलग विचारधारा के बीच सहमति बनाई है, जो कि बेहद कठिन है। यूसीपीएन (माओवादी) अध्यक्ष पुष्प कमल दहल ऊर्फ प्रचंड भी रविवार को मोदी के संसद संबोधन के दौरान अपनी मेज थपथपाते नजर आए और उनकी तारीफ करते हुए कहा, ''मोदीजी ने खुले दिल से नेपाल में जारी शांति की प्रक्रिया का समर्थन किया है। शांति प्रक्रिया का हिस्सा होने के नाते हम इस बयान पर बेहद खुश हैं।''

नेपाली कांग्रेस के उपाध्यक्ष राम चंद्र पॉडेल ने कहा, ''मोदी ने जिस तरह खुद को पेश किया, जिस तरह उन्होंने द्विपक्षीय प्राथमिकता को रखा है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि अब साथ मिल कर काम करने का समय है।'' पूर्व प्रधानमंत्री व माओवादी विचारक बाबूराम भट्टरई ने मोदी के बयान को 'अच्छा संकेत' करार दिया। भट्टरई ने ट्वीट किया, ''प्रधानमंत्री मोदी ने नेपाली संसद को जादुई तरीके से संबोधित कर नेपाली जनता का दिलोदिमाग जीत लिया।''

नरेंद्र मोदी ने किया भगवान पशुपति का रुद्राभिषेक





मोदी ने किया भगवान पशुपति का रुद्राभिषेक

नवभारतटाइम्स.कॉम | Aug 4, 2014    काठमांडू

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी नेपाल यात्रा के दूसरे दिन विश्व प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर में विशेष पूजा की। पीएम मोदी सोमवार सुबह 9 बजे पशुपतिनाथ मंदिर पहुंचे और भगवान शिव के इस मंदिर में रुद्राभिषेक किया।यूनेस्को विश्व सांस्कृतिक विरासत स्थल की सूची में शामिल भगवान पशुपतिनाथ का मंदिर नेपाल में शिव का सबसे पवित्र मंदिर माना जाता है। पशुपतिनाथ मंदिर में पीएम मोदी की पूजा इस वजह से भी खास है, क्योंकि इससे पहले किसी राजनेता ने इस तरह की पूजा में हिस्सा नहीं लिया है।
मोदी ने पशुपतिनाथ मंदिर की जिस पूजा में हिस्सा लिया, उसमें सिर्फ नेपाल राजघराने के लोग ही शामिल होते हैं। इस पूजा के दौरान राजघराने के लोगों के अलावा सिर्फ पुजारी होते हैं। राजघराने की ओर से सहमति जताने के बाद मोदी पूजा में शामिल हुए।

नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर को भारत की ओर से 2501 किलोग्राम चंदन भेंट किया गया है। मंदिर में पूजा करने के बाद पीएम मोदी होटेल के लिए रवाना हो गए। पीएम का नेपाल के राष्ट्रपति रामबरन यादव से मुलाकात का कार्यक्रम है। इस मीटिंग के बाद मोदी नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री माधव कुमार और माओवादी नेता प्रचंड से भी मिलेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नेपाल के मधेसी नेताओं और कारोबारियों से भी मिलने का कार्यक्रम है। शाम करीब साढ़े पांच बजे मोदी दिल्ली के लिए रवाना होंगे।

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भारत अब अपनी एक पहचान बनाने की दिशा में बढ रहा है. भारत का स्वर्णिम युग 1500 साल पूर्व था. उसके बाद से विदेशी आक्रमण और विदेशी शाशन से देश ने अपनी पहचान ही खो दी थी. दूसरे देशों की भाषाओं और सभ्यताओं की नकल करते करते भारत का अस्तित्व ही जैसे समाप्त हो गया था. लोगों को अपनी संस्कृति और भाषा से लगाव बढना चाहिये, देशवासियों को देशवासी या किसी विदेशी के साथ ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिये जो देश की प्रतिष्ठा को ठेस दे. हम अवश्य ही एक महान भारत बनायेंगे.
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भारत का सौभाग्य है कि देश को मोदी जैसा पीएम मिला है जिसकी प्राथमिकता पड़ोसियों से संबंध सुधारने की है ।
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पशुपतिनाथ की दर पर मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल की अपनी पहली यात्रा के दूसरे और आखिरी दिन सोमवार को पांचवीं सदी के प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना की. भगवान शिव के मंदिर में मोदी करीब 45 मिनट तक रहे. मोदी ने पशुपतिनाथ मंदिर में श्रावण महीने के सोमवार के दिन दर्शन किए, जिसका धार्मिक तौर पर काफी महत्व है. उन्होंने पशुपतिनाथ मंदिर ट्रस्ट को 2501  किलोग्राम चंदन दान किया.

बाद में मध्य युग तक मंदिर की कई नकलों का निर्माण कर लिया गया. ऐसे मंदिरों में भक्तपुर (1480), ललितपुर (1566) और बनारस (19वीं शताब्दी के प्रारंभ में) शामिल हैं. मूल मंदिर कई बार नष्ट हुआ. इसे वर्तमान स्वरूप नरेश भूपलेंद्र मल्ला ने 1697 में प्रदान किया. स्थानीय किंवदंती विशेष तौर पर नेपालमहात्म्य और हिमवतखंड के अनुसार भगवान शिव एक बार वाराणसी के अन्य देवताओं को छोड़कर बागमती नदी के किनारे स्थित मगस्थली चले गए. भगवान शिव वहां पर चिंकारे का रूप धारण कर निद्रा में चले गए. जब देवों ने उन्हें खोजा और उन्हें वाराणसी वापस लाने का प्रयास किया, तो उन्होंने नदी के दूसरे किनारे पर छलांग लगा दी. इस दौरान उनका सींग चार टुकड़ों में टूट गया. इसके बाद भगवान पशुपति चतुर्मुख लिंग के रूप में प्रकट हुए.
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कोसी का कहर क्यों होता है ?



सरस्वती की लुप्तता का रहस्य कोसी में 
कोसी नदी के द्वारा अपना मार्ग बदल कर बिहार की तबाही करना आम बात हे। यही बात हमें विलुप्त सरस्वती महानदी के लुप्त होने के कारणों पर सोचनें की दिशा देती है। हमारे सामने एक तो कोसी का प्राकृतिक संकट सामने है कि पहाडो से बह कर आने वाली विशाल रेत की मात्रा जमते जमते बड़ा अवरोध बन कर नदी का मार्ग बदल देती हे। दूसरा सोच सुनामी की घटना का है कि आंतरिक प्लेटों की ऊंचाई नीचाई में बदलाव जमीन के ऊपर सब कुछ बदल सकता है। तीसारा सोच भूकम्पों का है जो दिशा और दशा बदलने में सक्षम है। कोसी तो मार्ग बदल कर फिरसे अपने रास्ते पर आ जाती हे। मगर सरस्वती अपना मार्ग बदलने पर अपने रास्ते पर नहीं आ सकी । अनुमान तो यही है कि शिवालिका पहाडि़यों से बह कर राजस्थान के रास्ते खंबात की खाडी में जाने वाली सरस्वती अब यमुना में ही मिल कर अपना अस्तित्व समाप्त कर चुकी हे। इलाहाबाद में सरस्वती की धारा का त्रिवेणीं में होने की मान्यता के पीछे भी यही तथ्य हे। हजारों हजारों वर्ष पूर्व कभी सरस्वती ने भी अपना तटबंध तोडा और बारास्ते यमुना वह गंगा में होते हुये बंगाल की खाडी पहुच गई। क्यों कि उसके रास्ते की रूकावट तब हटाई नहीं जा सकी जिस तरह की कोसी के रास्ते की रूकावटों को हटा दिया जाता हे।

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कोसी का कहर क्यों होता है ?

पटना

कोसी इलाके में बिहार-नेपाल की सीमा के पास बाढ़ के बढ़ते खतरे को देखते हुए बिहार सरकार ने राज्य के 9 जिलों में नदी और इसके किनारों के बीच रहने वाले लोगों को जबरन क्षेत्र खाली कराने के आदेश दिए हैं। कोसी की सहायक नदी भोटे कोसी को जाम करने वाले भूस्खलन के मलबे को आंशिक रूप से हटाने के लिए नेपाली सेना द्वारा कम क्षमता के दो विस्फोट कर 1 . 25 लाख क्यूसेक पानी छोड़ने के बाद यह कदम उठाया गया है। पानी छोड़ने से बिहार में नदी के जलस्तर में बढ़ोतरी हो गई है। नेपाल में कोसी तटबंध में दरार आने की वजह से बिहार में 2008 में भयानक बाढ़ आई थी। इसमें कम से कम 26 लोगों की मौत हुई थी और करीब 30 लाख लोग विस्थापित हुए थे।

आपदा प्रबंधन विभाग के विशेष सचिव अनिरुद्ध कुमार ने कहा, 'हमने आपदा प्रबंधन अधिनियम के प्रावधान लागू किए हैं ताकि कोसी के खतरे वाले इलाकों में रहने वाले लोगों को जबरन खाली कराया जा सके। अब तक हमने 16800 लोगों को बाहर निकाला है लेकिन 60 हजार से ज्यादा लोग अब भी नदी और इसके किनारों पर रह रहे हैं। कुमार ने कहा, हमारे नए आकलन के मुताबिक अगर नदी में बाढ़ आती है तो राज्य में कोसी के आसपास रह रहे 4 . 25 लाख लोग प्रभावित होंगे। हम उन सभी को हटाने का प्रयास कर रहे हैं।
सुपौल को राहत, बचाव और खाली कराने के अभियान का मुख्यालय बनाया गया है। राज्य सरकार ने लोगों के लिए 120 राहत शिविर और 17 शिविर पशुओं के लिए बनाए हैं। विस्थापित लोगों को ऊंचे स्थानों पर बने स्कूलों और कॉलेजों में आश्रय मुहैया कराया जा रहा है। सभी शिविरों में भोजन, साफ-सफाई और इलाज की सुविधाएं दी जा रही हैं।
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NOVEMBER 16, 2008
यह वाकया इसलिये याद आ गया दो महीने पहले बिहार में ही कोसी नदी ने जब अपनी धारा बदली तो सात जिलो के दो लाख लोगो को लील लिया। लेकिन किसी अखबार-पत्रिका या न्यूज चैनल की कवर या मुख्य स्टोरी यह तब तक नहीं बन पायी जब तक प्रधानमंत्री ने इसे राष्ट्रीय विपदा नही बताया।
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छह साल पहले 18 अगस्त 2008 को कोसी नदी में नेपाल की ओर से अचानक भरी मात्रा में पानी आने से कुसहा बांध टूट गया था। बाढ़ में करीब 247 गांव के करीब सात लाख लोग प्रभावित हुए थे। 217 लोगों को जान गंवानी पड़ी थी। इसके अलावे दो लाख 60 हजार पशु भी बाढ़ की चपेट में आए थे जिनमें से 5445 की मौत हो गई। क्षेत्र में 50769 लाख हेक्टेयर भूमि पर लगी फसल बर्बाद हो गई थी।

कोसी नदी की धारा में अब तक परिवर्तन नहीं
बिहार के बड़े हिस्से में बाढ़ की आशंका के बीच केंद्र ने कहा कि कोसी नदी की धारा में कोई बड़ा बदलाव अब तक नहीं देखा गया है। केंद्र सरकार ने स्थिति को लेकर सभी तकनीकी जानकारी राज्य सरकार और नेपाल के साथ साझा की है। नेपाल में भूस्खलन के बाद कोसी नदी पर कृत्रिम बांध बनने की स्थिति को लेकर बिहार के मुख्य सचिव ने ताजा जमीनी हालात के बारे में केंद्र सरकार के अधिकारियों को अवगत करा दिया है।

गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा, दिन में कोसी नदी की धारा में कोई अहम बदलाव नहीं हुआ। हालात पर लगातार नजर रखी जा रही है। केंद्रीय एजेंसियां तकनीकी जानकारी बिहार सरकार और नेपाल के साथ बांट रही है।
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कोसी को क्यों कोसते हो?
01 September, 2008  प्रेम शुक्ल

एशिया की दो नदियों को दुखदायिनी कहा जाता है. एक है चीन की ह्वांग-हो जिसे पीली नदी के नाम से जाना जाता है और दूसरी है बिहार की कोसी नदी. अगर चीन की ह्वांग-हो को 'चीन का शोक' कहा जाता है तो कोसी नदी 'बिहार का शोक' है. इन नदियों की शोकदायिनी क्षमता ही बिहार और चीन के बीच विकास का अंतर भी स्पष्ट करती हैं. ह्वांग-हो की बाढ़ पर चीन ने पूरा नियंत्रण स्थापित कर लिया है. अब वहां बाढ़ की विभीषिका नहीं झेलनी पड़ती जबकि कोसी साल-दर-साल डूब और विस्थापन का दायरा बढ़ाती जा रही है.

पिछले एक पखवाड़े में ही २०० से अधिक लोग मारे गये हैं और कोई २५ लाख लोगों के विस्थापित होने का अनुमान है. जैसा कि कोई भी राज्य सरकार अपनी अक्षमता छिपाने के लिए कर सकती है बिहार सरकार भी वैसा ही कर रही है. मरने और विस्थापित होनेवाले आंकड़े निश्चित रूप से इससे कहीं ज्यादा होंगे. वैसे भी यह विपदा असंभावित नहीं थी. अरसे से जल-वैज्ञानिक यह चेतावनी दे रहे थे कि कोसी बैराज की कमजोरी के चलते न केवल उत्तर बिहार बल्कि बंगाल और बांग्लादेश तक संकट में आ सकते हैं. कोसी को आप घूमती-फिरती नदी भी कह सकते हैं. पिछले २०० सालों में इसने अपने बहाव मार्ग में १२० किलोमीटर का परिवर्तन किया है. नदी के इस तरह पूरब से पश्चिम खिसकने के कारण कोई आठ हजार वर्गकिलोमीटर जमीन बालू के बोरे में बदल गयी है. नगरों और गांवों के उजड़ने-बसने का अंतहीन सिलसिला चलता ही रहता है. इस सनातन उठा-पटक के बीच जो जीव और संपत्ति हानि होती है उसका हिसाब किताब अलग है.

बिहार आज जिस तरह से बेहाल हुआ है उससे सरकारें चाहें जितनी लापरवाह और अचेत रही हों लेकिन पर्यावरणविद बहुत पहले से इस बात की चेतावनी दे रहे थे. मार्च १९६६ में अमेरिकन सोसायटी आफ सिविल इंजीनियरिंग द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार कोसी नदी के तट पर १९३८ से १९५७ के बीच में प्रति वर्ष लगभग १० करोड़ क्यूबिक मीटर तलछट जमा हो रहा था. केन्द्रीय जल एवं विद्युत शोध प्रतिष्ठान के वी सी गलगली और रूड़की विश्वविद्यालय के गोहेन और प्रकाश द्वारा बैराज निर्माण के बाद प्रस्तुत अध्ययन में भी आशंकाएं जताई गयी थी कि बैराज निर्माण के बाद भी तलछट जमा होने के कारण कोसी का किनारा उपर उठ रहा है. कोसी बैराज निर्माण के कुछ वर्षों बाद १९६८ में बाढ़ आयी थी. उस साल जल प्रवाह का नया रिकार्ड बना था २५,००० क्यमेक्स (क्यूबिक मीटर पर सेकेण्ड). उसके बाद डूब के लिए पर्याप्त जल प्रवाह नौ से सोलह हजार क्यूमेक्स पानी तो हर साल ही बना रहता है. एक अरसे से जल वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे थे कि कोसी पूर्व की ओर कभी भी खिसक सकती है. अनुमान भी वही था जो आज हकीकत बन गया है. जिस चीन की पीली नदी का जिक्र हम उपर कर आये हैं उसने भी १९३२ में अपना रास्ता बदल लिया था और उस प्रलय में पांच लाख से अधिक लोग मारे गये थे. कोसी नदी के विशेषज्ञ शिलिंग फेल्ड लंबे समय से चेतावनी दे रहे थे कि जब कोसी पूरब की ओर सरकेगी तो वह पीली नदी से कम नुकसान नहीं पहुंचाएगी.

वैज्ञानिकों की चेतावनी को कुछ पर्यावरणविद यह कहकर टाल रहे थे कि कोसी को अपनी मूल धारा की ओर लौटने देना चाहिए. कोसी की बाढ़ को रोकने का एकमेव उपाय था कि नेपाल में जहां कोसी परियोजना है वहीं पानी भंडारण के लिए ऊंचे बांध बनाये जाते. लेकिन पर्यावरणविदों का एक वर्ग लगातार यह तर्क देता रहा कि लोगों को बाढ़ का सम्मान करना चाहिए. ऐसा कहनेवालों का नजरिया यूरोप और चीन के हालात देखकर बने हैं जहां बाढ़ अंशकालिक नुकसान पहुंचाती है, जबकि आज जो उत्तर बिहार में हुआ है वह स्थाई क्षति है.

कोसी की समस्या को समझने के लिए उसकी भौगोलिक स्थिति को समझना जरूरी है. यह नदी गंगा में मिलने से पहले २६,८०० वर्गमील क्षेत्र को प्रभावित करती है जिसमें ११,४०० वर्गमील चीन, ११,९०० वर्गमील नेपाल और ३६०० वर्गमील भारत का इलाका शामिल है. उसके उत्तर में ब्रह्मपुत्र, पश्चिम में गंडकी, पूर्व में महानंदा और दक्षिण में गंगा है. कमला, बागमती और बूढ़ी गंडक जैसी नदियां कोसी में आकर मिलती हैं. गंडक और कोसी के चलते लगभग हर मानसून में बिहार में बाढ़ आती है. इसका नतीजा यह होता है कि सालभर में बाढ़ से जितनी मौतें होती हैं उसमें से २० प्रतिशत अकेले बिहार में होती है. नेपाल में कोसी कंचनजंगा के पश्चिमी हिस्से में बहती है. वहां इसमें सनकोसी, तमकोसी, दूधकोसी, इंद्रावती, लिखू, अरूण और तमोर नदियां आकर मिलती हैं. नेपाल के हरकपुर गांव में दूधकोसी आकर सनकोसी में मिलती है. त्रिवेणी में सनकोसी, अरूण और तंवर से मिल जाती है इसलिए इसे यहां सप्तकोसी कहा जाता है. ये नदियां चारों ओर से माउण्ट एवरेस्ट को घेरती हैं और इन सबको दुनिया के सबसे ऊंचे ग्लेशियरों से पानी मिलता है.

चतरा के पास कोसी नदी मैदान में उतरती है और ५८ किलोमीटर बाद भीमनगर पास बिहार में प्रवेश करती है. वहां से २६० किलोमीटर की यात्रा कर यह कुरसेला में गंगा में आकर समाहित हो जाती है. इसकी कुल यात्रा ७२९ किलोमीटर है. पूर्वी मिथिला में यह नदी सबसे १८० किलोमीटर लंबा और १५० किलोमीटर चौड़े कछार का निर्माण करती है जो दुनिया का सबसे बड़ा कछार त्रिशंकु है. कोसी बैराज में १० क्यूबिक यार्ड प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष रेत का जमाव होता है जो दुनिया में सर्वाधिक है. सबसे ज्यादा रेत अरूण नदी के कारण कोसी में पहुंचता है जो कि तिब्बत से निकलती है. यहां इस बात पर ध्यान देना जरूरी है कि चीन की महत्वाकांक्षी तिब्बत रेल परियोजना के कारण भारी मात्रा में अरूण नदी में रेत का प्रमाण बढ़ा है जिसके कारण रेत का जमाव और फैलाव बिहार में बढ़ा है. क्योंकि सप्तकोसी का पानी कोसी में आयेगा और कोसी की तलछट मैदानी इलाके में जमा होगा जिसका सबसे बड़ा हिस्सा भारत में है इसलिए कोसी के मार्ग में आगे भी बदलाव आता रहेगा और मानसून-दर-मानसून बिहार डूबने के लिए अभिशप्त ही बना रहेगा. अगर इससे निजात पाना है तो हमें कुछ स्थायी समाधान के बारे में दीर्घकालिक रणनीतिक के तहत उपाय करने होंगे.
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हिमालय से निकलने वाली कोसी नदी नेपाल से बिहार में प्रवेश करती है। इस नदी के साथ कई कहानियां जुड़ी हुई है. धार्मिक ग्रंथों के अनुसार कोसी का संबंध महर्षि विश्वामित्र से है। महाभारत में इसे `कोशिकी´ कहा गया है।  वहीं इस नदी को `सप्तकोसी´ भी कहा जाता है। हिमालय से निकलने वाली कोसी के साथ सात नदियों का संगम होता है, जिसे सन कोसी, तमा कोसी, दूध कोसी, इंद्रावती, लिखू, अरुण और तमार शामिल है। इन सभी के संगम से ही इसका नाम `सप्तकोसी´ पड़ा है। कोसी नदी दिशा बदलने में माहिर है। कोसी के मार्ग बदलने से कई नए इलाके प्रत्येक वर्ष इसकी चपेट में आ जाते हैं। बिहार के पूर्णिया, अरररिया, मधेपुरा, सहरसा, कटिहार जिलों में कोसी की ढेर सारी शाखाएं हैं। कोसी बिहार में महानंदा और गंगा में मिलती है। इन बड़ी नदियों में मिलने से विभिन्न क्षेत्रों में पानी का दबाव और भी बढ़ जाता है। बिहार और नेपाल में `कोसी बेल्ट´ शब्द काफी लोकिप्रय है। इसका अर्थ उन इलाकों से हैं, जहां कोसी का प्रवेश है। नेपाल में `कोसी बेल्ट´ में बिराटनगर आता है, वहीं बिहार में पूर्णिया और कटिहार जिला को कोसी बेल्ट कहते हैं।
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