बुधवार, 6 अगस्त 2014

राजस्थान भाजपा प्रदेश कार्यकारिणी घोषित, 39 जिलाध्यक्ष भी बने



राजस्थान भाजपा प्रदेश कार्यकारिणी घोषित, 39 जिलाध्यक्ष भी बने
Wed, 06 Aug 2014

जयपुर। भाजपा ने अपनी प्रदेश कार्यकारिणी घोषित कर दी। प्रदेशाध्यक्ष अशोक परनामी ने बुधवार को इसे जारी किया। प्रदेश कार्यकारिणी में युवाओं व महिलाओं को तरजीह दी गई है। कार्यकारिणी में 5 सांसदों व सात विधायकों को भी शामिल किया गया है। इनमें चित्तौड़गढ़ सांसद सी.पी. जोशी को युवा मोर्चा का प्रदेशाध्यक्ष बनाया गया है। कुछ वर्तमान जिलाध्यक्षों को भी इस टीम में शामिल किया गया है। उधर, जिलाध्यक्षों की कार्यकारिणी में पांच विधायकों को शामिल किया गया है। इस टीम में भी ज्यादातर जगहों पर युवाओं को ही प्राथमिकता दी गई है। हालांकि इसमें किसी महिला कार्यकर्ता को जगह नहीं मिली है।

ये बने प्रदेश पदाधिकारी : -

प्रदेश उपाध्यक्ष - रामकिशोर मीणा, संतोष अहलावत, चुन्नीलाल गरासिया, अनीता भदेल, नंदकिशोर सोलंकी, भजनलाल शर्मा, मोहनलाल गुप्ता, महेन्द्र बोहरा।

महामंत्री - नारायण पंचारिया, हरिओम सिंह राठौड़, बाबूलाल वर्मा, कुलदीप धनकड़।

मंत्री- अशोक लाहोटी, मुकेश दाधीच, सुरेश यादव, बीरमदेव सिंह, कैलाश मेघवाल, जगमोहन बघेल, दीया कुमारी, सरोज प्रजापत।

प्रवक्ता - कैलाश भट्ट, अल्का सिंह गुर्जर, राज्यवर्द्धन सिंह राठौड़, प्रियंका चौधरी।

मीडिया प्रभारी - नवदीप सिंह।

प्रदेश कार्यालय प्रभारी- मुकेश पारीक, सोहन लाल ताम्बी।

इन्हें बनाया प्रदेशाध्यक्ष

युवा मोर्चा- सी.पी.जोशी

अनुसूचित जनजाति मोर्चा- हेमराज मीणा

महिला मोर्चा- विनीता सेठ

अनुसूचित जाति- गोरधन वर्मा

अल्पसंख्यक मोर्चा- अमीन पठान
(इन्हें लगातार तीसरी बार अल्पसंख्यक मोर्चे का प्रदेशाध्यक्ष बनाया गया है)

किसान मोर्चा- कैलाश चौधरी

39 जिलाध्यक्ष बनाए-
जयपुर शहर - संजय जैन,
जयपुर देहात - डीडी कुमावत,
सीकर - झावर सिंह खर्रा (विधायक),
झुंझुनूं - राजीव सिंह,
दौसा - घनश्याम शर्मा,
अलवर - इंद्रजीत सिंह,
भरतपुर - भानू प्रताप सिंह,
करौली - प्रहलाद सिंहल,
सवाई माधोपुर -मानसिंह गुर्जर (विधायक),
धौलपुर - बहादुर सिंह त्यागी,
कोटा शहर - हेमंत विजयवर्गीय,
कोटा देहात - जयवीर सिंह राठौड़ सांगोद वाले,
बूंदी - शौकीन राठौड़,
बारां - नरेश सिकरवाल,
झालावाड़ - नरेन्द्र नागर (विधायक),
उदयपुर शहर - दिनेश भट्ट,
उदयपुर देहात - तख्तसिंह शेखावत,
राजसमंद - भंवरलाल शर्मा,
बांसवाड़ा - मनोहर पटेल,
डूंगरपुर -हरीश पाटीदार,
चित्तौड़गढ़ - रतनलाल गाड़री,
प्रतापगढ़ - धनराज शर्मा,
अजमेर शहर - अरविंद यादव,
अजमेर देहात -भगवती प्रसाद सारस्वत,
टोंक - सत्यनारायण चौधरी,
भीलवाड़ा - शिवजीराम मीणा,
नागौर - रामचंद्र ऊता,
जोधपुर शहर - देवेन्द्र जोशी,
जोधपुर देहात - पब्बाराम विश्नोई (विधायक),
पाली - मदन राठौड़ (विधायक),
जालौर - अमीचंद जैन,
सिरोही - लूम्बाराम चौधरी,
बाड़मेर -जालम सिंह,
जैसलमेर - स्वरूप सिंह राठौड़,
बीकानेर शहर - विजय आचार्य,
बीकानेर देहात - रामगोपाल सुथार,
श्रीगंगानगर -अशोक नागपाल,
हनुमानगढ़ -प्रदीप बेनीवाल,
चूरू -गौरीशंकर गुप्ता। -

*दीया कुमारी का बढ़ा कद
सवाईमाधोपुर से विधायक दीया कुमारी का कद पार्टी में बढ़ गया है। उन्हें हाल ही राज्य सरकार ने बेटी बचाओ अभियान का ब्रांड एम्बेसेडर बनाया था और अब उन्हें प्रदेश कार्यकारिणी में मंत्री बनाया गया है। उनके अलावा किशनपोल से विधायक मोहनलाल गुप्ता को उपाध्यक्ष, जयपुर ग्रामीण से सांसद राज्यवर्द्धन सिंह राठौड़ को प्रवक्ता, अशोक लाहोटी, मुकेश दाधीच को मंत्री और नवदीप सिंह को मीडिया प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई है।

*जैन और कुमावत को जयपुर की कमान
जयपुर शहर और जयपुर देहात जिलाध्यक्ष के पदों पर क्रमश: संजय जैन और दीनदयाल कुमावत को नियुक्त किया गया है। जैन पार्टी में शहर महामंत्री के पद पर कार्यरत थे और पूर्व में पार्षद भी रह चुके हैं। दूसरी ओर कुमावत युवा मोर्चा के वर्तमान में प्रदेशाध्यक्ष थे और पूर्व में राजस्थान विवि में छात्रनेता रहे हैं।

दो हजार साल पुराना शिवलिंग खुदाई में निकला



खुदाई में निकला दो हजार साल पुराना शिवलिंग

IANS [Edited By: अभिजीत श्रीवास्तव] |
महासमुंद, 6 अगस्त 2014
http://aajtak.intoday.in

छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में पुरातत्व विभाग को खुदाई के दौरान द्वादश ज्योतिर्लिगों वाले पौरुष पत्थर से बना शिवलिंग मिला है. माना जा रहा है कि यह दो हजार वर्ष पुराना है. सिरपुर में मिले इस शिवलिंग को काशी विश्वनाथ जैसा शिवलिंग बताया जा रहा हैं. छत्तीसगढ़ के पुरातत्व सलाहकार अरुण कुमार शर्मा का दावा है कि यह दो हजार साल पुराना है और राज्य में मिला अब तक का सबसे प्राचीन व विशाल शिवलिंग है.
पुरातत्वविदों का कहना है कि वाराणसी के काशी विश्वनाथ और उज्जैन के महाकालेश्वर शिवलिंग जैसा है सिरपुर में मिला यह शिवलिंग. यह बेहद चिकना है. खुदाई के दौरान पहली शताब्दी में सरभपुरिया राजाओं के द्वारा बनाए गए मंदिर के प्रमाण भी मिले. इस शिवलिंग में विष्णु सूत्र (जनेऊ) और असंख्य शिव धारियां हैं.

सूबे के सिरपुर में साइट नंबर 15 की खुदाई के दौरान मिले मंदिर के अवशेषों के बीच 4 फीट लंबा 2.5 फीट की गोलाई वाला यह शिवलिंग निकला है. बारहवीं शताब्दी में आए भूकंप और बाद में चित्रोत्पला महानदी की बाढ़ में पूरा मंदिर परिसर ढह गया था. मंदिर के खंभे नदी के किनारे चले गए. सिरपुर में कई सालों से चल रही खुदाई में सैकड़ों शिवलिंग मिले हैं. इनमें से गंधेश्वर की तरह यह शिवलिंग भी साबूत निकला है.

भूकंप और बाढ़ से गंधेश्वर मंदिर भी पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया था. पर यहां मौजूद सफेद पत्थर से बना शिवलिंग सुरक्षित बच गया. सिरपुर में मिले गंधेश्वर शिवलिंग की विशेषता उससे निकलने वाली तुलसी के पौधे जैसी सुगंध है. इसलिए इसे गंधेश्वर शिवलिंग कहा जा रहा है.

पुरातत्व सलाहकार अरुण कुमार शर्मा ने बताया कि ब्रिटिश पुरातत्ववेत्ता बैडलर ने 1862 में लिखे संस्मरण में एक विशाल शिवमंदिर का जिक्र किया है. लक्ष्मण मंदिर परिसर के दक्षिण में स्थित एक टीले के नीचे राज्य के संभवत: सबसे बड़े और प्राचीन शिव मंदिर की खुदाई होना बाकी है. जो भविष्य में यहां से प्राप्त हो सकती हैं.

पुरातत्व के जानकारों के अनुसार भूकंप और बाढ़ ने सिरपुर शहर को 12वीं सदी में जबर्दस्त नुकसान पहुंचाया था. कालांतर में नदी की रेत और मिट्टी की परतें शहर को दबाती चलीं गईं. टीलों को कई मीटर खोदकर शहर की संरचना को निकाला गया. खुदाई में मिले सिक्कों, प्रतिमाओं, ताम्रपत्र, बर्तन, शिलालेखों के आधार पर उस काल की गणना होती गई.

साइट पर खुदाई की गहराई जैसे-जैसे बढ़ती है, प्राचीन काल के और सबूत मिलते जाते हैं. जमीन में जिस गहराई पर शिवलिंग मिला, उसके आधार पर इसे दो हजार साल पुराना माना गया है. बहरहाल यहां मिल रहे शिवलिंग पुरातत्व के जानकारों के लिए अब शोध का विषय बनता जा रहा है.


गीता पढ़ाना संवैधानिक : भारतीय विचार केन्द्रम्



गीता पढ़ाना संवैधानिक  : भारतीय विचार केन्द्रम् 


तिरुवनंतपुरम। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश ए. आर दवे द्वारा स्कूलों में गीता पढ़ाए जाने की बात का समर्थन करते हुए आरएसएस के एक प्रमुख विचारक ने बुधवार को कहा कि गीता सिर्फ धार्मिक ग्रंथ नहीं है, यह एक उत्कृष्ट आध्यात्मिक और दार्शनिक कृति भी है। इसके साथ ही उन्होंने गीता को 'राष्ट्रीय पुस्तक' घोषित करने की भी अपील की।

प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू ने न्यायाधीश दवे के विचारों पर आपत्ति जताई थी। इस मुद्दे पर सांस्कृतिक मंच भारतीय विचार केंद्रम के निदेशक पी परमेश्वरम ने कहा कि गीता ने कई शताब्दियों से भारत पर गहरा प्रभाव डाला है।

उन्होंने कहा कि जिन्होंने एक बार भी भगवद् गीता पढ़ी होगी, वे समझेंगे कि यह एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है। किसी भी अन्य किताब का इतना व्यापक प्रसार नहीं है। गीता की तरह कोई भी अन्य किताब इतनी बड़ी संख्या में व्याख्याओं के साथ प्रकाशित नहीं हुई है।

परमेश्वरम ने एक बयान में कहा कि इसका प्रभाव समय और स्थान से परे है। यह किसी भी प्रखर मस्तिष्क के लिए ज्ञान का खजाना है और इसका प्रभाव शाश्वत है। महात्मा गांधी जैसी शख्सियत ने गीता को अपनी मां बताया था। उन्होंने कहा था कि उन्हें जब भी उलझन या दुख महसूस होता है, वे गीता की शरण लेते हैं। गांधी ने हमारी स्वतंत्रता के संघर्ष को निर्णयात्मक ढंग से प्रभावित किया था।

परमेश्वरम ने कहा कि उच्चतम मानवीय मूल्य सिखाने वाली गीता हमेशा से विश्वभर में तेज गति से गिरते मूल्यों का एक हल रही है। गीता को 'भारत की राष्ट्रीय पुस्तक' घोषित करने की अपील करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान की मूल प्रति, जिस पर संविधान सभा के सभी सदस्यों के हस्ताक्षर हैं, उसमें 'गीतोपदेश' की तस्वीर थी।

उन्होंने पूछा कि जिस किताब को संविधान से सहमति मिली हो, उसे पढ़ाया जाना असंवैधानिक कैसे हो सकता है? न्यायाधीश एआर दवे ने शनिवार को कहा था कि भारतीयों को अपनी प्राचीन परंपराओं की ओर लौटना चाहिए और महाभारत एवं भगवद गीता जैसे ग्रंथों की जानकारी अपने बच्चों को छोटी उम्र से ही देनी चाहिए।

रक्षा बंधन पर रक्षा सूत्र : संघ का महाभियान

रक्षाबंधन : संघ के महाभियान का एक चरणरूप


August 06, 2014
http://vskbharat.com
(लेखक डा. कृष्ण गोपाल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह-सरकार्यवाह हैं)


रक्षा बंधन के पर्व का महत्व भारतीय जनमानस में प्राचीन काल से गहरा बना हुआ है. यह बात सच है कि पुरातन भारतीय परंपरा के अनुसार समाज का शिक्षक वर्ग होता था, वह रक्षा सूत्र के सहारे इस देश की ज्ञान परंपरा की रक्षा का संकल्प शेष समाज से कराता था. सांस्कृतिक और धार्मिक पुरोहित वर्ग भी रक्षा सूत्र के माध्यम से समाज से रक्षा का संकल्प कराता था. हम यही पाते हैं कि किसी भी अनुष्ठान के बाद रक्षा सूत्र के माध्यम से उपस्थित सभी जनों को रक्षा का संकल्प कराया जाता है. राजव्यवस्था के अन्दर राजपुरोहित राजा को रक्षा सूत्र बाँध कर धर्म और सत्य की रक्षा के साथ साथ संपूर्ण प्रजा की रक्षा का संकल्प कराता था. कुल मिलाकर भाव यही है कि शक्ति सम्पन्न वर्ग अपनी शक्ति सामर्थ्य को  ध्यान में रखकर समाज के श्रेष्ठ मूल्यों का एवं समाज की रक्षा का संकल्प लेता है. संघ के संस्थापक  परम पूज्य डॉक्टर साहब हिन्दू समाज में सामरस्य स्थापित करना चाहते थे तो स्वाभाविकरूप से उनको इस पर्व का महत्व भी स्मरण में आया और समस्त हिन्दू समाज मिलकर समस्त हिन्दू समाज की रक्षा का संकल्प ले, इस सुन्दर स्वरूप के साथ यह कार्यक्रम (उत्सव) संघ में स्थापित हो गया.

वैसे तो हिन्दू समाज के परिवारों में बहिनों द्वारा भाइयों  को रक्षा सूत्र बांधना, यह इस पर्व का स्थायी स्वरूप था. संघ के उत्सवों के कारण इसका अर्थ विस्तार हुआ. सीमित अर्थों में न होकर व्यापक अर्थों में समाज का प्रत्येक वर्ग, प्रत्येक वर्ग की रक्षा का संकल्प लेने लगा. समाज का एक भी अंग अपने आपको अलग-थलग या असुरक्षित अनुभव न करने पाये – यह भाव जाग्रत करना संघ का उद्देश्य है.

महाविकट लंबे पराधीनता काल के दौरान समाज का प्रत्येक वर्ग ही संकट में था. सभी को अपने अस्तित्व की सुरक्षा एवं प्राण रक्षा की चिंता थी. इस कारण समज के छोटे-छोटे वर्गों ने अपने चारों ओर बड़ी दीवारें बना लीं. समाज का प्रत्येक वर्ग अपने को अलग रखने में ही सुरक्षा का अनुभव कर रहा था. इसका लाभ तो हुआ, किंतु भिन्न-भिन्न वर्गों में दूरियां बढ़तीं गईं. हिन्दू समाज में ही किन्हीं भी कारणों से आया दूरी का भाव बढ़ता चला गया. कहीं-कहीं लोग एक दूसरे को स्पर्श करने से भी भयभीत थे. कुछ लोग, कुछ लोगों की परछाईं से भी डरने लगे. जातियों के भेद गहरे हो गये. भाषा और प्रांत की विविधताओं में कहीं-कहीं सामञ्जस्य के स्थान पर विद्वेष का रूप प्रकट होने लगा. यह विखण्डन का काल था. ऐसा लगता था कि हिन्दू समाज अनगिनत टुकड़ों में बंट जायेगा. सामञ्जस्य एवं समरसता के सूत्र और कम होते गये. विदेशी शक्तियों ने बजाय इसके कि इसको कम किया जाये, आग में घी डालने का काम किया. विरोधों का सहारा लेकर खाई को चौड़ा किया. विविधता में विद्वेष पैदा करने में वे लोग सिद्धहस्त थे.


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने हिन्दू समाज की इस दुर्दशा का दृश्य देखा तो न केवल इसकी पीड़ा का अनुभव किया वरन् इसके स्थायी निवारण का संकल्प लिया. रक्षा बंधन के पर्व को सनातन काल से सामरस्य का पर्व माना गया है. यह आपसी विश्वास का पर्व है. इस पर्व पर जो-जो सक्षम थे, वे अन्य को विश्वास दिलाते थे कि वे निर्भय रहें. किसी भी संकट में सक्षम उनके साथ खड़े रहेंगे. संघ ने इसी  विश्वास को हजारों स्वयंसेवकों के माध्यम से समाज में पुनर्स्थापित करने का श्रेयस्कर कार्य किया. रक्षा बंधन के पर्व पर स्वयंसेवक परम पवित्र भगवा ध्वज को रक्षा सूत्र बांधकर उस संकल्प का स्मरण करते हैं, जिसमें कहा गया है कि धर्मो रक्षति रक्षित: अर्थात् हम सब मिलकर धर्म की रक्षा करें. समाज में मूल्यों का रक्षण करें. अपनी श्रेष्ठ परंपराओं का रक्षण करें. यही धर्म का व्यावहारिक पक्ष है. तभी तो धर्म सम्पूर्ण समाज की रक्षा करने में सक्षम हो सकेगा. धर्म बाहरी तत्व नहीं है. हम सबमें छिपी या मुखर उदात्त भावनाओं का नाम है. हमारा जो व्यवहार लोकमंगलकारी है, वही धर्म है. ध्वज को रक्षा सूत्र बांधने का हेतु भी यही है कि समाज के लिये हितकर उदात्त परंपरा का रक्षण करेंगे. स्वयंसेवक भी एकदूसरे को स्नेह-सूत्र बांधते हैं. जाति, धर्म, भाषा, धनसंपत्ति, शिक्षा या सामाजिक ऊंचनीच का भेद अर्थहीन है. रक्षाबंधन का सूत्र इन सारी विविधताओं और भेदों के ऊपर एक अभेद की सृष्टि करता है. इन विविधताओं के बावजूद एक सामरस्य का स्थापन करता है. इस नन्हें से सूत्र से क्षणभर में स्वयंसेवक परस्पर आत्मीय भाव से बंध जाते हैं. परम्परा का भेद और कुरीतियों का कलुष कट जाता है. प्रेम और एक दूसरे के प्रति समर्पण का भाव गहराई तक सृजित होता है.

कार्यक्रम के उपरांत स्वयंसेवक अपने समाज की उन बस्तियों में चले जाते हैं जो सदियों से वंचित एवं उपेक्षित हैं. वंचितों एवं उपेक्षितों के बीच बैठकर उनको भी रक्षा सूत्र बांधते और बंधवाते हुए हम उस संकल्प को दोहराते हैं जिसमें भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- समानम् सर्व भूतेषु. यह अभूतपूर्व कार्यक्रम है जब लाखों स्वयंसेवक इस देश की हजारों बस्तियों में निवास करने वाले लाखों वंचित परिवारों में बैठकर रक्षा बंधन के भाव को प्रकट करते हैं. विगत वर्षों के ऐसे कार्यक्रमों के कारण हिंदू समाज के अंदर एक्य एवं सामरस्य भाव-संचार का गुणात्मक परिवर्तन दिखाई दे रहा है. इसके पीछे संघ के इस कार्यक्रम की महती भूमिका है. भाव यही है कि सम्पूर्ण समाज, सम्पूर्ण समाज की रक्षा का व्रत ले. लोग श्रेष्ठ जीवन मूल्यों की रक्षा का व्रत लें. सशक्त, समरस एवं संस्कार संपन्न समाज ही किसी देश की शक्ति का आधार हो सकता है. इसी प्रयत्न में संघ लगा है. रक्षा बंधन का यह पर्व इस महाअभियान के चरणरूप में है.


देश को बाहर से कम अंदर से ज्यादा खतरा : परमपूज्य भागवत जी


देश को बाहर से कम अंदर से ज्यादा खतरा :  परमपूज्य   मोहन जी भागवत

04 August 2014   भोपाल,04 / अगस्त/2014 (ITNN) |

भारत को अमीर देश और भारतीयों को गरीब बताते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन जी 
भागवत ने कहा कि राष्ट्र की आर्थिक नीतियों में सुधार करना होगा। बढ़ते पूंजीवाद को देश के लिए घातक बताते हुए भागवत ने कहा कि स्वावलंबन और स्वाभिमान की बुनियाद पर देश से गरीबी समाप्त हो सकती है।

भागवत जी ने राजनीतिक दलों से समाज में गरीबी मिटाने के लिए पहल करने की अपील भी की। भोपाल में आयोजित चिंतन बैठक के आखिरी दिन आरएसएस के सर संघचालक मोहन जी भागवत ने कहा कि देश को बाहर से कम, अंदर से ज्यादा खतरा है। इससे निपटने के लिए एकता की जरूरत है। भागवत जी ने समाज से छुआछूत को मिटाने व राष्ट्रीयता को मजबूत करने के लिए स्वयंसेवकों को एकजुट होने का आदेश दिया।

भागवतजी  ने कहा कि हिंदू व हिंदुस्तान को मजबूत करने के लिए जात-पात और ऊंच-नीच की विचारधारा से ऊपर उठकर काम करना होगा। उन्होंने कहा कि निजी स्वार्थ और रिश्वतखोरी आज की सबसे बड़ी समस्या है। विकास के लिए सिर्फ सरकारों के भरोसे बैठना ठीक नहीं है। जरूरत इसकी है कि लोग खुद अपने विकास के बारे में सोचें। समाज को संगठित करना देश के लिए बेहद आवश्यक है। ऐसा संघ ने समझा है, इसलिए संघ कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण देता है। इसके लिए शाखाओं, कार्यक्रमों एवं शिविरों द्वारा लोगों को प्रशिक्षण देना संघ की पद्धति है।

चिंतन शिविर में समापन समारोह को संबोधित करते हुए आरएसएस के अखिल भारतीय बौद्धिक प्रमुख वी भागैया ने कहा कि आज हमारे देश में जो शिक्षा दी जा रही है उसमें ज्ञान व तकनीकी तो सम्मिलित है लेकिन नैतिक पक्ष पर ध्यान नहीं दिया जा रहा।

नरेंद्र मोदी व भारतीय जनता पार्टी नेतृत्व की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार का नाम लिए बिना भागवत ने कहा कि देश में नए नेतृत्व से लोगों को बेहतरी की उम्मीद है। केंद्र सरकार से सामंजस्य बनाकर संघ अपना काम करता रहेगा। उन्होंने कहा कि हिंदुत्व व भारतीयता की हमारी पहचान पूरी दुनिया में मजबूत होनी चाहिए, इसके लिए यही सुनहरा सुअवसर है।

समाज क्या होता है, संस्कार क्या होते हैं, हमें किसके साथ किस प्रकार का बर्ताव करना चाहिए। ये सारी बातें शिक्षा पद्धति में सम्मिलित की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं है कि हमारे देश से संस्कार लुप्त हो गए हैं। आज भी माताएं अपने बच्चों को संस्कार सिखाती हैं और भारत इसीलिए जिंदा भी है

कांग्रेस में कार्यकर्ताओं के साथ,आवारा कुत्तों से भी बुरा बर्ताव : जगमीत सिंह बराड़





कांग्रेस में आम कार्यकर्ताओं के साथ होता है आवारा कुत्तों से भी बुरा बर्तावः जगमीत सिंह बराड़
Aajtak.in [Edited By: अभिजीत श्रीवास्तव] | नई दिल्ली, 6 अगस्त 2014

कांग्रेस कार्यसमिति के पूर्व सदस्य जगमीत सिंह बराड़ कुछ दिन पहले सोनिया और राहुल पर दिये बयान से विवादों में आ गए थे. अब उन्होंने कांग्रेस के भीतर आम कार्यकर्ताओं के साथ हो रहे व्यवहार पर कुछ ऐसा कहा है जिससे वो फिर विवादों में घिर गए हैं. बराड़ ने इस बार सोनिया, राहुल को हमेशा घेरे रखने वाली मंडली पर निशाना साधा है. उन्होंने कहा है कि कांग्रेस के ये बड़े लीडर आम कार्यकर्ताओं के साथ आवारा कुत्तों से भी बदतर व्यवहार करते हैं.
पंजाब के पूर्व सांसद बराड़ ने कहा, ‘साल दर साल, ये कुछ बड़े व्यक्ति हैं जो आम कार्यकर्ताओं से आवारा कुत्तों से भी बुरा व्यवहार करते आ रहे हैं.’ उन्होंने कहा, ‘इन्होंने आम कार्यकर्ताओं और कांग्रेस लीडरशिप के बीच एक बड़ी दीवार खड़ी कर रखी है. ये वो नेता हैं जिन्हें हर वक्त टॉम फोर्ड और कनाली सूट पहने पूंजीपतियों के साथ देखा जा सकता है.’

सोनिया, राहुल पर बराड़ का विवादित बयान
बराड़ ने पहले भी लोकसभा चुनावों में हार का ठीकरा सोनिया गांधी और राहुल गांधी के सिर फोड़ते हुए कहा था कि ये अगर दो साल की छुट्टी ले लेते हैं तो ‘कोई नुकसान’ नहीं है. बराड़ का कहना था कि कांग्रेस के सबसे खराब हार के बाद सभी महासचिवों को इस्तीफा दे देना चाहिए और पार्टी की कमान नये नेताओं को सौंप देनी चाहिए.

उन्होंने कहा था, ‘यह एक सामूहिक जिम्मेदारी है. मैं नहीं कह रहा हूं कि केवल सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर जिम्मेदारी डाल दी जाए. हर किसी को जिम्मेदारी लेनी होगी. वे भी जिम्मेदार हैं. मैं जो कह रहा हूं कि अगर कोई व्यक्ति इतने वर्षों तक पार्टी अध्यक्ष रहा है तो उसे दो वर्षों की छुट्टी लेने में कोई नुकसान नहीं है. कांग्रेस अध्यक्ष ने अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान दिया है. लेकिन अगर वह दो वर्षों के लिए पद छोड़ती हैं तो वह बाद में ज्यादा स्वीकार्य होंगी.’

लंबे समय से नाराज चल रहे बराड़ ऐसे पहले कांग्रेसी नेता हैं जिन्होंने गांधी परिवार से कम समय के लिए ही सही लेकिन पद छोड़ने की मांग की है.