बुधवार, 3 सितंबर 2014

हिन्दू हैं हम, सच है तो सिर चढ़कर बोलेगा !





हिन्दुत्व - हिन्दू हैं हम सच है तो सिर चढ़कर बोलेगा
तारीख: 30 Aug 2014

ये सामान्य भाव से कही गयी बात नहीं है। ये दुष्टों की आंखों में आंखें डाल कर कहा गया जवाब है। आज नहीं तो कल सम्पूर्ण विश्व उन हत्यारी विचारधाराओं से यह प्रश्न पूछेगा कि मानवीय मूल्यों और सहिष्णुता के नाम पर शांति के मजहब का खजाना खाली क्यों है? इस बात को पूछे-कहे बिना विश्व शांति संभव भी नहीं है। हिन्दुस्थान में रहने वाला 'हिन्दू' है। और इस सत्य को मानने में अपने पुरखों-परम्पराओं से साम्य रखने वाले देशवासियों को कोई आपत्ति नहीं है।

प्रस्तुत है पाञ्चजन्य का विशेष आयोजन
= तुफैल चतुर्वेदी
कुछ दिन से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक माननीय भागवत जी के बयान हिंदुस्तान के सभी नागरिक हिन्दू हैं पर वामपंथी, मुस्लिम चरमपंथी, कांग्रेसी ता-ता-थैया कर रहे हैं। भागवत जी के बयान के दूरगामी निहितार्थ हैं अत: इस पर इस प्रकार की प्रतिक्रिया अपेक्षित ही थी। इस परिप्रेक्ष्य में स्वयं को हिन्दू मानने से इंकार करने के कारणों पर विचार करना समीचीन होगा। आइये हिन्दू की परिभाषा क्या है इस विवाद में पड़े बिना हिन्दू धर्म को उसके ऐतिहासिक व्यवहार के सन्दर्भ में देखा-परखा जाये। पिछले 2000 वषोंर् के इतिहास पर संक्षिप्त दृष्टिपात करना पर्याप्त होगा। हिंदुस्तान ने 2000 वषोंर् के इतिहास में कभी किसी भी देश पर सैन्य आक्रमण नहीं किया। कभी किसी धर्म के पूजा स्थल नहीं तोड़े। कभी अपने से भिन्न मत-विश्वासियों की हत्यायें नहीं कीं। कभी मनुष्यों का व्यापार नहीं किया। आज जो संस्कृति केवल भारत और नेपाल में प्रमुख रूप से बची है, इसी को हिन्दू संस्कृति कहा, समझा जाता है। मगर इसके चिन्ह आज भी संसार के इस भाग को केंद्र मान लिया जाये तो सुदूर पूर्व के देशों थाईलैंड, कम्बोडिया से होते हुए उस क्षेत्र में भूमि की अंतिम सीमा समुद्र तक, पश्चिम में एक ओर पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, इराक से होते हुए धुर अरब देशों तक तो दूसरी ओर अजरबेजान, कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान आदि में प्रखर रूप से मिलते हैं। भारतीय मन्दिरों के खण्डहर, यज्ञशालाएं, खंडित मूर्तियां आज भी इन सारे देशों में मिलती हैं। अरब में इस्लाम के प्रवर्तक मोहम्मद साहब के चाचा ने अंतिम समय तक इस्लाम स्वीकार नहीं किया। वह इस्लाम की दृष्टि में काफिर और जहन्नुम जाने योग्य माने गए। उनके प्रति इस्लामी व्यवहार इतना कठोर रहा कि उनके मूल नाम की जगह इस्लामी ग्रंथों में उन्हें अबू जहल यानी जाहिल मूर्ख कहा, पुकारा, लिखा गया़ उनके तथा उनसे पहले के भक्त शायरों के अरबी भाषा में लिखे भगवान शिव के कसीदे इस्लाम के सारे ध्वंसक प्रयासों के बाद भी उपलब्ध हैं। अत: तथ्य यह हाथ आते हैं कि हिन्दू अर्थात वह लोग जो किसी पर भी बलात् कुछ भी थोपने, हिंसा करने के विरोधी हैं। जिनका सामान्य जीवन शांतिपूर्ण है और जो सैद्घांतिक रूप से शांतिपूर्ण सहजीवन में विश्वास करते हैं। दूसरी ओर सेमेटिक विश्वासी और कम्युनिस्ट हैं जो मानते हैं कि सत्य केवल उनके पास है और सारे संसार को मार-पीट कर, बहला-फुसला कर, बहला-बहका कर अपनी जड़ समझ के रास्ते पर लाना उनका दायित्व है।
इस कार्य के लिए सबसे नए प्रयासों में से एक सीरिया, इराक में आई एस आई एस के जघन्य हत्या-कांड हैं। इस संगठन को इस्लाम के शुरुआती क्रियाकलापों, भारत में इस्लाम फैलाने आये मुस्लिम आक्रमणकारियों के बाद सबसे खतरनाक कहा जा रहा है। अपने से भिन्न सोच रखने वाले लोगों के सर काटना कोई नई क्रिया नहीं है। ऐसा इस्लाम के जिहादी आतंक फैलाने और मतान्तरण के लिए हमेशा से करते रहे हैं। अन्य इस्लामी आक्रमणकारियों की तरह बाबर ने भी भारतीय लोगों के सर काट कर उनके मीनार बनाये थे। इसी हत्यारे ने इस्लाम के सबसे प्रबल वैचारिक उपकरण मदरसों की भारत में शुरुआत की थी।

सभ्य समाज में फांसी पाये अभियुक्त को फांसी देने वाले जल्लाद के लिए शराब का कोटा होता है। न्याय-प्रणाली के विभिन्न चरणों से गुजरने के बाद ही, अंतिम रूप से जघन्य पापी पाये जाने के बाद ही फांसी दी जाती है़ ऐसे व्यक्ति को भी फांसी देने के पहले जल्लाद का नशे में होना जरूरी होता है। ये कार्य कितना कठिन है इसे इस तरह समझें कि भारत को 125 करोड़ की जनसंख्या में केवल 2 लोग जल्लाद हैं।  विभिन्न प्रदेशों में फांसी देने के लिए उन्हीं को जाना पड़ता है। जिसके इस्तेमाल से व्यक्ति की अंतरात्मा इस हद तक जड़ हो जाती है कि हत्यारा मरते हुए व्यक्ति की आंखों में आंखें डाल कर उसकी आधी कटी गर्दन पर ठोकरें मार सकता है? उसकी बुझती हुई आंखों की मोबाइल पर वीडियो बना सकता है? वहशियों की तरह उसकी गर्दन काटकर मृतक के सीने, पेट पर रख सकता है? वह कौन लोग हैं जो इस भयानक हत्या-कांड के समय अल्लाहो-अकबर के नारे लगा सकते हैं? अल्लाह महान है इस उद्घोष को इस तरह से करने वाला मानस कैसा होता है?
इस्लामिक स्टेट मिलिशिया का प्रारम्भ सीरिया के गृह-युद्घ के दौरान हुआ ये विद्रोह सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद के खिलाफ स्थानीय सुन्नी कबीलों के लोगों ने भड़काया था। इन कबीलों के लोगों की ट्रेनिंग के लिए अमरीका की खुफिया एजेंसी सी आई ए के लोगों ने तुर्की और जर्डन में प्रशिक्षण शिविर चलाये। इन्हें हथियार और पैसा दिया। बशर अल असद को अमरीकी आवश्यकता के अनुरूप मीडिया में दैत्य बताया, दर्शाया गया। सीरिया की सेना में शिया-सुन्नी के आधार पर विभाजन और विद्रोह कराया। सऊदी अरब, कतर, कुवैत, सयुंक्त अरब अमीरात ने अपने खजाने सुन्नी जिहादियों के लिए खोल दिए़ सीरिया में प्रत्येक संस्थान को नष्ट करने, हो जाने दिया और इन सब सामूहिक कुकमोंर् का परिणाम आई एस आई एस की शक्ल में सभ्य समाज के सामने है।

अमरीका की करतूतों से ऐसा पहले भी कई बार हुआ है़ इस संघर्ष में अमरीका जिस ईरान की सहायता कर रहा है और सहायता ले रहा है वह दशकों से अमरीका का प्रबल शत्रु रहा है। इस क्षेत्र में अमरीका के सबसे अच्छे मित्र देश इस्रायइल का घोषित शत्रु है। ईरान के राष्ट्रपति, धार्मिक नेता इस्रायइल को संसार के मानचित्र से मिटा देने की खुली घोषणा करते रहे हैं। अफगानिस्तान, ईरान, इराक इत्यादि देशों में इतना सब कुछ करने, झेलने और न केवल मुंह की खाने बल्कि सभ्य समाज के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन गए आतंकवाद की जड़ों को खाद पानी देने का काम आखिर अमरीका ने किस समझ और विश्वास के तहत किया?

अमरीका और पश्चिम का नेतृत्व शुरू से ही गलत रहा। अमरीका तथा इस क्षेत्र के बड़े खिलाड़ी पश्चिमी देशों में प्रजातंत्र की प्रणाली है। ये प्रणाली मानव इतिहास में प्रत्येक मनुष्य को सबसे पहले बराबरी का अधिकार देने वाली प्रणाली है। जबकि इस्लाम अपनी उम्मत यानी मुस्लिम समाज के विशेषाधिकार और अन्य विश्वासियों को नीचे दर्जे का मानने वाली व्यवस्था है। वह अन्य विश्वासियों से जजिया वसूल करती है। न केवल मध्य युग में बल्कि अभी कुछ वर्ष पहले अफगानिस्तान में तालिबानी शासन के दौरान वहां रह रहे हिन्दुओं, सिखों से जजिया वसूला गया। परिणामत: वो लोग भाग कर भारत में शरण लेने के लिए बाध्य हुए़ स्त्रियों को केवल मुस्लिम बच्चे पैदा करने की मशीन मानने वाले समाज के साथ स्त्री अधिकारों का सम्मान करने वाले समाज की, एक स्वतंत्र न्याय-प्रणाली में विश्वास करने वाले सभ्य समाज की पट ही कैसे सकती है?

अमरीका और पश्चिमी विश्व ने अच्छे उग्रवादियों और बुरे उग्रवादियों में विभाजन रेखा यह मानकर खींची कि वह लोग सभ्य हो जायेंगे। उग्रवादियों में अच्छे बुरे का विभाजन कैंसर में अच्छे-बुरे का चुनाव है। कैंसर अच्छा नहीं होता, हो ही नहीं सकता। ये संघर्ष अफगानिस्तान, पाकिस्तान, ईरान, इराक, सीरिया या विश्व के किसी अन्य भूभाग का स्थानीय संघर्ष नहीं है। ये मध्य-युगीन बर्बर जीवन मूल्यों को प्रत्येक मनुष्य के बराबर होने को मानने वाले सभ्य समाज पर स्थापित करने का संघर्ष है, इसको वैचारिक स्तर पर परास्त करना इसकी सैनिक पराजय के बराबर ही नहीं बल्कि अधिक आवश्यक है़ सीरिया में कोई भी शासन आये, बिन लादेन मार डाला जाये या जीवित रहे, इराक में शिया अथवा सुन्नी कैसा भी शासन आये मगर जब तक इस सोच में बदलाव नहीं आएगा विश्व में शांति नहीं आने वाली। आखिर इन जिहादियों की कोख कहां है? इन्हें पैदा कौन कर रहा है? अच्छे-खासे पढ़े-लिखे लोग क्यों भयानक नृशंस हत्यारे बन गए? इन बातों पर गहन विचार-विमर्श, मंथन और फिर उससे निपटने की रणनीति बनाना आवश्यक है। अन्यथा दिन प्रति दिन नए अफगानिस्तान, पाकिस्तान, इराक, सीरिया़.़ बन रहे हैं, बनते रहेंगे। जब तक ऐसी कोई भी विचार-धारा, चिंतन-प्रणाली जो मनुष्य के बराबरी के सिद्घांत की जगह मनमाने विचार, उद्दंडता और उत्पात में विश्वास करती है कुचली, बदली नहीं जाएगी शांति कैसे आएगी? ये संघर्ष स्थानीय संघर्ष नहीं है बल्कि ये मानवता का संघर्ष है, सभ्यता का संघर्ष है। सभ्य समाज इन मूल्यों के असफल होने का खतरा मोल नहीं ले सकता। दूसरी ओर केवल जंगल के बीहड़ कानून हैं। विश्व के स्वयंभू नेता देश अमरीका के नेतृत्व ने आखिरकार वह निर्णय ले ही लिया जिसकी बहुत समय से प्रतीक्षा थी। महामहिम बराक ओबामा ने इस्लामिक स्टेट को कैंसर से भी खतरनाक कहा है और अमरीकी सेना ने आई. एस. आई. एस. के जिहादियों के ठिकानों को ध्वस्त करना शुरू कर दिया है। सभ्य समाज विशेषरूप से ईसाई समाज ने ये विचार करने और समझने में बहुत देर कर दी है। ये हमेशा का जाना-पहचाना इस्लाम का आतंक फैलाने का तरीका है। सदियों से इस्लामी हत्यारे विश्व भर में ऐसे जघन्य हत्या-कांड करते रहे हैं़ उनका उद्देश्य आतंक नहीं होता अपितु आतंक फैला कर अपनी जीवन-शैली का वर्चस्व स्थापित करना अर्थात इस्लाम में लोगों को मतान्तरित करना होता है।

अत: भागवत जी के बयान पर वामपंथी, मुस्लिम चरमपंथी, कांग्रेसी तिलमिलाहट और ता-ता-थैया को सरलता से समझा जा सकता है़ उनके मिर्चें केवल इस कारण लग रही हैं कि उन्हें मालूम है यदि बहस बढ़ी तो ये प्रश्न आएगा ही आएगा कि हिन्दू सभ्यता के सदैव से जाने-परखे शांतिप्रिय लोग हत्यारों के समूह क्यों बन गए। यदि बहस नहीं बढ़ी तो उनके कुढब विश्वासों, उनकी उत्पाती जीवन शैली, उनके बर्बर जीवन-सिद्घांतों को त्यागने का दबाव बनेगा। ये सामान्य भाव से कही गयी बात नहीं है। ये दुष्टों की आंखों में आंखें डाल कर पूछा गया, छिपा हुआ वह प्रश्न है जो आज नहीं तो कल सम्पूर्ण विश्व इस हत्यारी विचारधारा से पूछेगा, कहेगा। इस बात को पूछे-कहे बिना विश्व शांति संभव भी नहीं है।

मानवता को गले लगाने वाला हेै हिन्दू धर्म - परम पूज्य सरसंघचालक भागवतजी




हिन्दुत्व -
मानवता को गले लगाने वाला हेै हिन्दू धर्म - परम पूज्य सरसंघचालक श्री मोहनजी  भागवत
तारीख: 30 Aug 2014
— सरदार रविरंजन, वरिष्ठ पत्रकार - पाञ्चजन्य ब्यूरो


पिछले दिनों मुंबई में विश्व हिन्दू परिषद के स्वर्णजयंती समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत का एक बयान 'हिन्दुत्व राष्ट्र की पहचान है,उसकी यह अन्तर्भूति शक्ति है कि वह और भी पंथ-संप्रदायों को हजम कर सकता है। जो जरा हाजमा बिगड़ जाने के कारण थोड़ा शैथिल्य हो गया, जिसके परिणाम आज हम भुगत रहे हैं,उसको दूर करना है'। श्री भागवत के इस बयान के आते ही सेकुलरों की समाचार चैनलों पर जमात लगनी प्रारम्भ हो गई। ऐसा लगा मानो कोई संकट आ गया हो।
हिन्दुस्थान और हिन्दू की नई-नई परिभाषाएं गढ़ी जाने लगीं। यहां तक कि हिन्दुस्तान टाइम्स समाचार पत्र ने श्री मोहनराव भागवत के बयान पर एक सर्वे किया। और जनता से जानना चाहा कि कितने लोग सहमत हैं कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है। जनता ने सच को उद्घोषित करते हुए 60.92 प्रतिशत लोगों ने स्वीकार किया कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है और 38.26 प्रतिशत लोग इस मत से सहमत नजर नहीं आए। ऑन लाइन सर्वे में सिर चढ़कर बोलते सच को देखकर यह सर्वे समाचारपत्र में प्रकाशित ही नहीं किया गया। जब इसके विषय में एक बजरंग दल कार्यकर्ता ने हिन्दुस्तान टाइम्स के कार्यालय में फोन करके इस समाचार के न छपने पर जानना चाहा तो वहां के किसी कर्मचारी द्वारा बताया गया कि यह सर्वे 'स्पैम' (सैम्पल खराब) हो गया है। लेकिन इस सर्वे में आए रुझान से एक बात जरूर स्पष्ट हो गई कि देश की जनता का मत किस ओर है।
विश्व हिन्दू परिषद के स्वर्णजयंती समारोह में श्री भागवत ने जो भी कहा वह भारत की भूमि पर हजारों वर्षों तक पल्लवित-पुष्पित होते रहे आदर्श और विचारधन के सातत्य की अभिव्यक्ति ही थी। देश को जानना चाहिए कि हिन्दू राष्ट्र शब्द का प्रयोग या हिन्दू राष्ट्र का सिद्धांत रा.स्व.संघ की कोई नई खोज नहीं है। संघ संस्थापक डॉ.केशवराव बलिराम हेडगेवार ने ठीक वही विचार प्रकट किए,जो स्वामी विवेकानंद,महर्षि अरविंद,तिलक और वीर सावरकर आदि विभूतियों ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद कि नाते प्रकट किए। आज जिस प्रकार से श्री भागवत के बयान पर सेकुलर रुदन कर रहे हैं उन्हें बताना चाहिए कि इस देश में रहने वाला बहुसंख्यक जिसकी संख्या नब्बे करोड़ से भी ज्यादा की है वह कौन है? अगर उन्हें हिन्दू न कहें तो उन्हें क्या कहें? इस देश की पहचान गीता,महाभारत हैं या कुरान?
आज के सन्दर्भ सच को सच मानने से इंकार करने वाले लोगों और हिन्दू संस्कृति पर उपजते संकट का आकलन डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने बहुत पहले ही कर लिया था और इसलिए उन्होंने ही घोषित किया था 'यह हिन्दू राष्ट्र है'।
देश के हिन्दू जनमानस को समझना चाहिए कि असल में भारतीय राष्ट्रीयत्व हिन्दू राष्ट्रीयत्व ही है। इसके बारे में किसी के मन में कोई भी संदेह नहीं होना चाहिए। जो लोग इसके विरोध में तर्क देते हैं वे बताएं कि कौन सा समाज है जो इस भूमि को अपनी माता मानता है ? देवता के स्वरूप में मातृभूमि के प्रति उत्कट भावना रखता है?'त्वं हि दुर्गादश प्रहरण धारिणी' कहकर उसका ध्यान करता है? किस समाज के राष्ट्र पुरुष एक ही हैं? आपका राष्ट्र पुरुष कौन है-महाराणा प्रताप या अकबर? यह प्रश्न पूछे जाते ही तत्काल राणा प्रताप का चयन कौन सा समाज करता है? ऐसे अनेकों प्रश्नों का बस एक ही उत्तर निकलकर आता है कि ऐसा समाज हिन्दू समाज ही है। पं.दीनदयाल उपाध्याय: विचार दर्शन में पं. जी ने एक लेख के माध्यम से लिखा 'कि 1947 में हम स्वतंत्र हुए। अंग्रेज भारत छोड़कर चले गए। राष्ट्र निर्माण के प्रयासों में सबसे बड़ी बाधा हम उन्हें ही मानते थे। वह बाधा दूर हो गई। लेकिन इसके बाद हमारे सामने प्रश्न उपस्थित हुए कि स्वतंत्रता का आशय क्या है? हम यहां किस प्रकार का जीवन खड़ा करना चाहते हैं? राष्ट्र के नाते भारत के जीवन आदर्श क्या हैं? संविधान का निर्माण करते समय विदेशांे में उद्घोषित सिद्धांतों का जोड़तोड़ करने में ही हमने संतोष कर लिया। इसीलिए आजतक हम इस मूल प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाए हैं कि आखिर हम किस प्रकार का जीवन यहां खड़ा करना चाहते हैं।'
जो लोग ऐसे बयानों से देश और मत-पंथों को खतरा बताते हैं उन्हें श्री दत्तोपंत ठंेगड़ी को पढ़ना चाहिए।'हिन्दू राष्ट्र की संकल्पना' शीर्षक वाली पुस्तिका में उनके भाषण को प्रस्तुत किया गया है। वे कहते हैं 'हिन्दू राष्ट्र की हमारी संकल्पना यह है कि हिन्दू संपूर्ण मानवता को गले लगाने वाला,पूरे विश्व का विचार करने वाला एवं विश्वधर्म का अनुयायी है। और प्रश्न करते हंै ंकि इस प्रकार संपूर्ण विश्व की दृष्टि से विचार करने पर हिन्दू राष्ट्र का स्थान क्या रहेगा?'
हिन्दू संस्कृति पर मनगढंत तथ्यों को रखते सेकुलरों को यह लगता है कि हिन्दू समाज अपना राष्ट्रीयत्व सिद्ध करे लेकिन हिन्दू समाज को इसकी कतई आवश्यकता नहीं है। उसका राष्ट्रीयत्व हजारों वर्षों से स्वयंसिद्ध है। इस देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि जिस देश का राष्ट्र स्वरूप हिन्दू है,यह तत्व वस्तुत: सर्वमान्य होना चाहिए। ल्ल

हिन्दू राष्ट्र, हिन्दू दर्शन, इसी कारण सबको स्थान
भारत का एक सनातन विशिष्ट जीवन दर्शन है जिसका आधार आध्यात्मिकता है। यह दर्शन एकात्म और सर्वांगीण है। इसी दर्शन की अभिव्यक्ति 'एकम् सद् विप्र:बहुधा वदंन्ति' में हुुई है। इसलिए यहूदी और पारसी भारत में आकर अपने-अपने उपासना मार्ग का अवलंबन सम्मानपूर्वक कर सके। इसी दर्शन के कारण भारत के संविधान में सभी मतावलंबियों को अपने-अपने मत के अनुसार उपासना करने का स्वातंत्र्य सहज मिला है। भारत का यह दर्शन हिंदू जीवन दर्शन कहलाता है। डॉ. राधाकृष्णन की 'हिंदू व्यू ऑफ लाइफ' पुस्तक प्रसिद्ध है। इस जीवन दर्शन को अपने जीवन में उतारने वाला प्रत्येक व्यक्ति हिंदू है, फिर चाहे उसका मजहब या उपासना मार्ग चाहे जो हो। यह हिंदुत्व, हिंदूवाद (ँ्रल्लि४्र२े) नहीं है, यह हिंदू होना (ँ्रल्लि४ल्ली२२) है। इसलिए यह किसी मजहब या उपासना मार्ग के विरोध में नहीं है। यह हिंदुत्व भारत के समाज का व्यवच्छेदक लक्षण है,भारत के समाज की पहचान है, अस्मिता है। इसलिए भारत हिंदू राष्ट्र है। समाज ही राष्ट्र कहलाता है। राज्य व्यवस्था राष्ट्र द्वारा अपनी सुविधा के लिए बनाई गई व्यवस्था है। भारत की राज्य व्यवस्था किसी एक मजहब या उपासना मार्ग के अनुसार नहीं चलेगी। वह पंथ निरपेक्ष तरीके से कार्य करेगी। यह निर्णय इस राष्ट्र ने लिया है (ऐसा निर्णय पाकिस्तान ने नहीं लिया है) और यह निर्णय भी इसी कारण लिया जा सका क्योंकि यह राष्ट्र हिंदू राष्ट्र है। ल्ल मनमोहन वैद्य
पाञ्चजन्य ने हिन्दू राष्ट्र के विषय पर अलग-अलग मतों और संप्रदायों के लोगों से बात की जिनके मत यहां प्रस्तुत हैं-

हम शुरू से ही इस विषय पर सहमत हैं। हिन्दुस्थान को हिन्दू संस्कृति से कैसे अलग किया जा सकता है। आज पाश्चात्य देशों में जिस समुदाय की जनसंख्या 40 प्रतिशत से अधिक हो जाती है उसे उस समुदाय से संबोधित किया जाने लगता है। फिर ऐसे में इस देश में रहने वाले हिन्दु़ओं की संख्या तो 80 प्रतिशत है तो इसे क्यों हिन्दू राष्ट्र नहीं कहा जा सकता ?
आर.एल.फ्रंासिस, अध्यक्ष, पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेन्ट
यह तो सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत के हृदय की विशालता है। देश में जितने भी पंथ उद्गमित हुए वह हिन्दू कहने में कोई भी संकोच नहीं करते। जिस संदर्भ में बात की जा रही है,उसको समझना जरूरी है।
— रिखब चन्द्र जैन, प्रदेश अध्यक्ष,इन्द्रप्रस्थ विहिप
मैं श्री भागवत के बयान से पूरे तरीके से सहमत हूं। मेरे पुरखे हिन्दुस्थानी हैं,हमारी तहजीब हिन्दू और हिन्दी है। भारत के मुसलमानों को इस बात पर गर्व होना चाहिए। इस देश की पहचान हिन्दुत्व ही है। हम पहले हिन्दू और फिर हिन्दुस्थानी हैं। अगर हम अपनी संस्कृति पर नाज करेंगे तभी असली मुसलमान कहलाएंगे।
— मो.अफजाल, राष्ट्रीय संयोजक,मुस्लिम राष्ट्रीय मंच
हिन्दू इस देश की जीवन पद्धति है। इस देश में रहने वाले लोग हिन्दू हैं। इसमें कोई विवाद ही नहीं है क्योंकि यह राष्ट्र हिन्दू राष्ट्र है। इसकी पहचान गीता,महाभारत गुरुग्रन्थ साहिब जैसे धर्म ग्रन्थों से होती है न कि कुरान से। देश का दुर्भाग्य है कि लोग सच से आंखें चुराते हैं।