शनिवार, 20 दिसंबर 2014

Vande Mataram: Language of every Bhartiya's heart-Param Poojniya SarSanghchalak Shri Mohan Bhagwat ji






Param Poojniya SarSanghchalak Shri Mohan Bhagwat ji releasing the book "Samagra Vande Matram". The book is a detailed account of Bankim Chandra Chatterjee's works.         

"We should definitely read this book. We keep the Bhagwad Gita at home. Similarly this tome should also be kept at home and read daily," said Bhagwat ji. He added that Vande Mataram is not merely two words rather a mantra which remained on the lips of our freedom fighters till their end. "Vande Mataram is a term that denotes the language of every Bhartiya's heart. And this is why everyone understands it," he said.

Bankim Chandra's descendant Shantanu Chattopadhyay was honoured on the occasion.


चित्तौड़गढ़ दुर्ग को बचाने की मांग




                                   चित्तौड़गढ़ दुर्ग को बचाने की मांग

तारीख: 20 Dec 2014
हिन्दू जागरण मंच के एक प्रतिनिधिमंडल ने गत दिनों जयपुर में राजस्थान के विधि मंत्री राजेन्द्र सिंह राठौड़, खनन मंत्री राजकुमार रिणवा और धरोहर संरक्षण संस्थान के अध्यक्ष औंकारसिंह लखावत से मिलकर विश्व संरक्षित धरोहर चित्तौड़गढ़ दुर्ग को बचाने की मांग की है।
मंच के प्रदेश उपाध्यक्ष प्रतापभानु सिंह शेखावत ने बताया कि दुर्ग के चारों ओर अबाध गति से खनन हो रहा है। खनन में भारी मशीनरी और बेहताशा विस्फोटक के उपयोग से हो रहे कम्पन से दुर्ग की दीवारों में जगह-जगह दरारें आ गई हैं। उन्होंने कहा कि सरकार की ओर से यदि तत्काल खनन नहीं रोका गया तो ऐतिहासिक दुर्ग कुछ वषोंर् में पूरी तरह से ढह सकता है। चित्तौड़गढ़ दुर्ग करीब एक हजार वर्ष पुराना है। इसी दुर्ग में कई शौर्य एवं पराक्रम की गाथाएं लिखी गई हैं। यह मेवाड़ के महानायक जैसे-महाराणा हमीर, महाराणा सांगा, महाराणा प्रताप, पन्ना धाई, मीरा बाई इत्यादि की कर्मभूमि रहा है।

भारत की जमीन है पाकिस्तान - संघ प्रमुख परमपूज्य मोहनजी भागवत




     भारत की जमीन है पाकिस्तान- आरएसएस प्रमुख परमपूज्य मोहन जी भागवत

aajtak.in [Edited By: रंजीत सिंह] | कोलकाता, 20 दिसम्बर 2014
http://aajtak.intoday.in/story/rss-top-boss-adds-fuel-to-the-conversion-fire-mohan-bhagwat
धर्मांतरण पर संघ की ओर से अब तक का सबसे बड़ा बयान आया है. आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने घर वापसी को सही ठहराया. उन्होंने पाकिस्तान को भारत की जमीन बताया और कहा कि पाकिस्तान परमानेंट नहीं है. केंद्र द्वारा प्रस्तावित धर्मांतरण विरोधी बिल की वकालत करते हुए भागवत ने विपक्षी दलों से कहा कि अगर वे धर्म परिवर्तन पसंद नहीं करते तो संसद में कानून बनाने में सहयोग करें. उन्होंने कहा कि अगर कोई हिंदू नहीं बनना चाहता तो इसी तरह हिंदुओं का भी धर्म परिवर्तन नहीं किया जाना चाहिए.

भागवत ने यहां एक हिंदू सम्मेलन में कहा, 'हम हिंदू समाज बनाने का प्रयास कर रहे हैं. जो लोग भटक गए हैं वे खुद से नहीं गए. उन्हें लालच दिया गया और उन्हें जबरन ले जाया गया. जब चोर पकड़ा जा रहा है और मेरी संपत्ति बरामद हो गई है, जब मैं अपनी संपत्ति वापस ले रहा हूं तो इसमें नया क्या है?' उन्होंने कहा, 'अगर आप इसे पसंद नहीं करते तो इसके खिलाफ कानून बनाइए. आप इसे नहीं लाना चाहते. अगर आप हिंदू नहीं बनना चाहते तो आपको भी हिंदुओं का धर्म नहीं बदलना चाहिए. हमारा रुख दृढ़ है.'

भागवत ने कहा, 'डरने की जरूरत नहीं है. हम अपने देश में हैं. हम घुसपैठिया नहीं हैं. यह हमारा देश है, हमारा हिंदू राष्ट्र. कोई हिंदू अपनी जमीन नहीं छोड़ेगा. पहले जो हम खो चुके हैं उसे हम वापस लाने का प्रयास करेंगे. हिंदुओं के उत्थान से किसी को भी डरने की जरूरत नहीं है. जो लोग हिंदुओं के उत्थान के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं वे स्वार्थी हैं और उनके निहित स्वार्थ हैं.

आरएसएस प्रमुख ने ने कहा कि हिंदू समाज किसी को दबाने में विश्वास नहीं करता है. भागवत ने कहा, 'बांग्लादेश या पाकिस्तान की तरफ से किए जा रहे अपराधों को हिंदू बर्दाश्त करते रहे हैं. हमारे भगवान कहते हैं कि सौ अपराधों के बाद हिंदुओं के खिलाफ अपराध को बर्दाश्त मत करो.' उन्होंने कहा कि बंटवारे से पहले पाकिस्तान भी भारत का हिस्सा था और वहां हिंदुओं की ज्यादा उपस्थिति नहीं है इसलिए पाकिस्तान शांति से नहीं रह सकता.

भागवत ने कहा, 'जब तक हिंदू यहां भारत में हैं, तब तक वह देश है. अगर वहां हिंदू नहीं होते तो यहां रहने वाला हर आदमी कष्ट में होता.' उन्होंने कहा कि अपनी संपति और गरिमा बचाने के लिए हिंदू काफी मजबूत हैं. उन्होंने कहा, 'पूरी दुनिया की बेहतरी के लिए मजबूत हिंदू समाज की जरूरत है.'

(भाषा से इनपुट)
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परमपूजनीय सरसंघचालक श्री मोहन भागवत जी ने आज कोलकाता में विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा आयोजित सम्मेलन में कहा कि दुनिया को बचाने के लिए सम्पूर्ण हिन्दू समाज फिर से अमृतसंजीवनी लेकर खड़ा हो इसकी आवश्यकता है |


उन्होंने कहा कि जब-जब हिन्दू समाज की उन्नति हुई तब सब प्रकार के संकट से ग्रस्त दुनिया को सुख का रास्ता मिला है | पाकिस्तान भी कभी भारत भूमि थी लेकिन आप देखिये वहां हिन्दू को खड़ा होने लायक नहीं रखा | अब पाक सुख में है या दुःख में ?

आज हिन्दू समाज जाग रहा है | सज्जनों को हर्षित करने वाली और दुर्जनों को भयकंपित करने वाली बात अब प्रत्यक्ष हो रही है | हम अपने देश में है, हमे किसी प्रकार का भय करने की आवश्यकता नहीं है | हम कही दूसरी जगह से यहाँ पर घुस कर नहीं आये, घुसपैठ करके नहीं आये | हम बाहर से यहाँ बसने के लिए भी नहीं आये | हम यहीं पर जन्मे, इसी मिटटी में पले, इसी देश के उत्थान में लगे पूर्वजो के वंशज है | यह हमारा देश है | यह हमारा हिन्दू राष्ट्र है | हिन्दू भागेगा नहीं | हिन्दू अपनी भूमि, अपनी जगह छोड़ेगा नहीं | जो कुछ पहले की हमारी निद्रा के कारण गया है, उसको वापस लाने का पुरुषार्थ अब हम करेंगे |

उन्होंने कहा कि सपूर्ण दुनिया की भलाई के लिए हिन्दू जाग रहा है | उसके जागने से किसी को डरना नहीं चाहिए | डरेंगे वहीं जो स्वार्थी होंगे, दुष्ट होंगे और इसलिए हिन्दू समाज के जागरण के विरुद्ध में उठने वाली आवाजें केवल उन्ही लोगो की होती है जिनके स्वार्थ को खतरा होता है या जिनकी दुष्टता पर प्रतिबन्ध आता है | आज दुनिया को बचाने के लिए सम्पूर्ण हिन्दू समाज फिर से अमृतसंजीवनी लेकर खड़ा हो इसकी आवश्यकता है, और इसलिए उस हिन्दू समाज को हम सब लोग मिलकर खड़ा कर रहे है |

जो भूले भटके बिछड़ गये उनको वापस लायेंगे | हमारे से ही गये है | खुद नहीं गये | लोभ, लालच, जबरदस्ती से लूट लिए गये | अब हमसे जो लूट लिए गये, तो चोर पकड़ा गया, उसके पास मेरा माल है | दुनिया जानती है वो मेरा माल है तो मै उसको वापस लेता हूँ इसमें क्या बुराई है? पसंद नहीं तो कानून बनाओ | संसद ने कानून बनाने के लिए कहा है | कानून बनाने के लिए तैयार नहीं तो क्या करेंगे ? हमको किसी को बदलना नहीं है | हिन्दू किसी को बदलना है इसमें विश्वास नहीं करता | हिन्दू कहता है परिवर्तन अन्दर से होता है | लेकिन हिन्दू को परिवर्तन नहीं करना है तो हिन्दू का भी परिवर्तन नहीं करना चहिये | इस पर हिन्दू आज अड़ा है | खड़ा होगा और अड़ेगा | दुनिया में दुष्ट भी है और उसमे दुश्मनी करने वाले लोग है | तो ऐसे दुश्मनों से अपने आप को और अपनी प्रजा को मै बचा सकता हूँ, इतना लड़ना मै जानता हूँ | हिन्दू भी इतना लड़ना जानता है, और हिन्दू इतना ही लड़ता है, इससे ज्यादा नहीं लड़ता |

हिन्दू के प्रति किसी प्रकार की शंका करने का कोई कारण नहीं | हम हिन्दू है, हम हिन्दू रहेंगे और हिन्दू के जो काल सुसंगत शास्वत तत्व है, जो सारी दुनिया पर लागू होते है, जिनके आधार पर चलने से दुनिया का कल्याण होगा, उन तत्वों को अपने आचरण से हम सारी दुनिया को देने वाला हिन्दुस्थान खड़ा करना चाह रहे है | और उसको हम खड़ा करके रहेंगे | आज के सम्मलेन का अंतिम संकल्प यहीं है | हिन्दुस्थान में परम वैभव संपन्न हिन्दू राष्ट्र और सुखी सुन्दर मानवता संपन्न दुनिया बनाने वाला विश्व गुरु हिन्दुस्थान, इसको खड़ा करने के लिए हमने संकल्प लिया है 'प्रारंभिक संकल्प' | हमे उसके आचरण पर पक्का रहना है | देखिएगा ज्यादा समय नहीं लगेगा |

उन्होंने कहा यहाँ बैठे हुए जवानों की जवानी पार होने के पहले जो परिवर्तन आप जीवन में चाहते हो, उस परिवर्तन को होता हुआ आप अपनी आँखों से देखोगे | एक शर्त है, आज जो संकल्प आपने लिए उनपर आपको हर कीमत पर पक्का रहना पड़ेगा | और इसलिए इन संकल्पों का स्मरण नित्य मन में रखिये और अपना आचरण उस स्मरण के अनुसार कीजिये और निर्भय होकर, आश्वस्त होकर अंतिम विजय की निश्चिंती मन में लेकर हम सब लोग चलना प्रारंभ करे इतना आह्वान करता हूँ |

पंडित मदनमोहन मालवीय - अनिता शर्मा


                                    पंडित मदनमोहन मालवीय  - अनिता शर्मा 

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अनेक महापुरुषों एवं विभूतियों ने भारतवर्ष को अपने श्रेष्ठ कार्यों एवं सद्व्यवहार से गौरवान्वित किया है।
युगपुरुष मदन मोहन मालवीय उन्ही में से एक महापुरूष, अपनी विद्वता, शालीनता, और विनम्रता की असाधारण छवी के कारण जन-जन के नायक थे। अंग्रेज जज तक उनकी तीव्र बुद्धि पर आश्चर्य प्रकट करते थे। अपने जीवन-काल में पत्रकारिता, वकालत, समाज-सुधार, मातृ-भाषा तथा भारतमाता की सेवा में अपना जीवन अर्पण करने वाले महामना, मदन मोहन मालवीय जी इस युग के आदर्श पुरुष थे। उनकी परिकल्पना ऐसे विद्यार्थियों को शिक्षित करके देश सेवा के लिए तैयार करने की थी, जो देश का मस्तक गौरव से ऊचा कर सकें।

ऐसी महान विभूती पंडित महामना मदनमोहन मालवीय का जन्म भारत के उत्तरप्रदेश के इलाहाबाद शहर में २५ दिसम्बर सन १८६१ को एक साधारण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम ब्रजनाथ और माता का नाम भूनादेवी था। चूँकि ये लोग मालवा के मूल निवासी थे, अतः मालवीय कहलाए। राष्ट्रीय नेताओं में अग्रणी मालवीय जी को शिक्षक वर्ग भी श्रद्धा और आदर से आज भी याद करते हैं।
मालवीय जी ने सन् 1893 में कानून की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। ‘‘वकालत के क्षेत्र में मालवीयजी की सबसे बड़ी सफलता चौरीचौरा कांड के अभियुक्तों को फाँसी से बचा लेने की थी। । चौरी-चौरा कांड के 170 भारतीयों को फाँसी की सजा सुनाई गई थी, किंतु मालवीय जी के बुद्धि-कौशल ने अपनी योग्यता और तर्क के बल पर 151 लोगों को फाँसी से छुड़ा लिया था। देश में ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व में इस अद्भुत केस की ख्याती फैल गई।
राष्ट्र की सेवा के साथ ही साथ नवयुवकों के चरित्र-निर्माण के लिए और भारतीय संस्कृति की जीवंतता को बनाए रखने के लिए मालवीयजी ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की।’’मालवीय जी का विश्वास था कि राष्ट्र की उन्नति तभी संभव है, जब वहाँ के निवासी सुशिक्षित हों। बिना शिक्षा के मनुष्य पशुवत् माना जाता है। मालवीय जी नगर-नगर की गलियों तथा गाँवों में शिक्षा का प्रचार-प्रसार में जुटे थे। वे जानते थे की व्यक्ति अपने अधिकारों को तभी भली भाँति समझ सकता है, जब वह शिक्षित हो। संसार के जो राष्ट्र आज उन्नति के शिखर पर हैं, वे शिक्षा के कारण ही हैं।

ऐसा कहा जाता है कि, पं. मदनमोहन मालवीय जी ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना का संकल्प जब कुंभ मेले में त्रिवेणी संगम पर भारत भर से आयी जनता के बीच दोहराया तभी वहीं एक वृद्धा ने मालवीय जी को इस कार्य के लिए सर्वप्रथम एक पैसा चंदे के रूप में दिया था।
विश्वविद्यालय के निर्माण के समय पं. मदन मोहन मालवीय जी के जीवन में एक खास घटना हुई, जब दान के लिये मालवीय जी हैदराबाद के निजाम के पास गये तो, निजाम ने मदद करने से साफ इंकार कर दिया। मगर मालवीय जी इतनी जल्दी हार मानने वाले इंसान तो थे नही। वो उचित क्षणं का इंतजार कर रहे थे।
इत्तफाक से उसी समय एक सेठ का निधन हो गया। शव-यात्रा में घर वाले पैसों की वर्षा करते हुए चल रहे थे। तभी मालवीय जी को एक उपाय सुझा और वो भी शव-यात्रा में शामिल हो गये तथा पैसा बटोरने लगे। महामना को ऐसा करते देख सभी को आश्चर्य हुआ, तभी एक व्यक्ति ने पूछ ही लिया कि “आप ये क्या कर रहे हैं!” ऐसा सुनते ही मालवीय जी ने कहा “भाई क्या करु ? तुम्हारे निजाम ने कुछ भी देने से इनकार कर दिया और जब खाली हाँथ बनारस लौटूँगा तो लोगों के पूछने पर कि हैदराबाद से क्या लाये तो क्या कहूँगा कि खाली हाँथ लौट आया? भाई, निजाम का दान न सही, शव-विमान का ही सही।“
ये बात जब निजाम को पता चली वो बहुत शर्मिदा हुआ और महामना से माफी माँगते हुए विश्वविद्यालय के लिये काफी अनुदान दिया। ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि मालवीय जी के मृदव्यवहार एवं दृणइच्छा शक्ती का ही परिणाम है, काशी हिंदू विश्वविद्यालय। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय भारतीय स्वाधीनता संग्राम में भी अपनी भूमिका निभा चुका है। विश्व में अपनी श्रेष्ठ पहचान लिये काशी हिन्दु विश्वविद्यालय भारत का गौरव है। श्री सुंदरलाल, पं. मदनमोहन मालवीय, डॉ. एस. राधाकृष्णन् (भूतपूर्व राष्ट्रपति), डॉ. अमरनाथ झा, आचार्य नरेंद्रदेव, डॉ. रामस्वामी अय्यर, डॉ. त्रिगुण सेन (भूतपूर्व केंद्रीय शिक्षामंत्री) जैसे विद्वान यहाँ के कुलपति रह चुके हैं।

मालवीय जी संस्कृत, हिंदी तथा अंग्रेजी तीनों ही भाषाओं के ज्ञाता थे। महामना जी का जीवन विद्यार्थियों के लिए एक महान प्रेरणा स्रोत है। जनसाधारण में वे अपने सरल स्वभाव के कारण प्रिय थे, कोई भी उनके साथ बात कर सकता था। मानों वे उनके पिता, बन्धु अथवा मित्र हों।

मित्रों, महामना जी के जीवन की एक घटना आपको बताना चाहेंगे-
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के कुछ ही समय की बात है, यदा-कदा अध्यापक उद्दंड छात्रों को उनकी गलतियों के लिए आर्थिक दंड दे दिया करते थे, मगर छात्र उस दंड को माफ कराने मालवीय जी के पास पहुंच जाते और महामना उसे माफ भी कर देते थे। यह बात शिक्षकों को अच्छी नहीं लगी और वह मालवीय जी के पास जाकर बोले, ‘महामना, आप उद्दंड छात्रों का आर्थिक दंड माफ कर उनका मनोबल बढ़ा रहे हैं। इससे उनमें अनुशासनहीनता बढ़ती है। इससे बुराई को बढ़ावा मिलता है। आप अनुशासन बनाए रखने के लिए उनके दंड माफ न करें।’

मालवीय जी ने शिक्षकों की बातें ध्यान से सुनीं फिर बोले, ‘मित्रो, जब मैं प्रथम वर्ष का छात्र था तो एक दिन गंदे कपड़े पहनने के कारण मुझ पर छह पैसे का अर्थ दंड लगाया गया था। आप सोचिए, उन दिनों मुझ जैसे छात्रों के पास दो पैसे साबुन के लिए नहीं होते थे तो दंड देने के लिए छह पैसे कहां से लाता। इस दंड की पूर्ति किस प्रकार की, यह याद करते हुए मेरे हाथ स्वत: छात्रों के प्रार्थना पत्र पर क्षमा लिख देते हैं।’ शिक्षक निरुत्तर हो गए।

गाँधी जी मालवीय जी को नवरत्न कहते थे और अपने को उनका पुजारी। महामना जी, को छात्रों के साथ तो लगाव था ही। इसके अलावा विश्वविद्यालय से भी बहुत लगाव था। एक बार की बात है कि, महामना जी, छात्रावास का निरीक्षण कर रहे थे तभी उन्होने देखा कि एक छात्र ने दिवार के कोने में कुछ लिख रखा था।
मालवीय जी ने उसे समझाया-“ मेरे दिल में तुम्हारे प्रति जितनी ममता और लगाव है, उतना ही लगाव विश्वविद्यालय की प्रत्येक ईंट से है। मैं आशा करता हुँ कि भविष्य में तुम ऐसी गलती फिर न करोगे।“
तद्पश्चात महामना जी ने जेब से रूमाल निकालकर दिवार को साफ कर दिया। विश्वविद्यालय के प्रति मालवीय जी के दृष्टीकोण को जानकर छात्र लज्जा से झुक गया।

मित्रों, कितनी शालीनता से महामना जी ने उस छात्र को बिना सजा दिये उसके मन में सभी के प्रति आदर का भाव जगा दिया। यकीनन दोस्तों, यदि आज हम महामना मालवीय जी के आचरण को जीवन में आपना लें तो स्वयं के साथ समाज को भी सभ्य और सुन्दर बना सकते हैं। महामना पंडित मदनमोहन मालवीय जी का विद्यार्थियों को दिये उपदेश के साथ कलम को विराम देते हैं।

सत्येन ब्रह्मचर्येण व्यायामेनाथ विद्यया।
देशभक्त्याऽत्यागेन सम्मानर्ह: सदाभव।।

अथार्त सत्य, ब्रह्मचर्य, व्यायाम, विद्या, देशभक्ति, आत्मत्याग द्वारा अपने समाज में सम्मान के योग्य बनो।

जयहिन्द