बुधवार, 14 जनवरी 2015

हिन्दूकुश पर्वतमाला की सचाई



हिन्दूकुश पर्वतमाला की सचाई जानिए

पुनः संशोधित: गुरुवार, 27 नवंबर 2014
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हिन्दूकुश उत्तरी पाकिस्तान से मध्य अफगानिस्तान तक विस्तृत एक 800 किमी लंबी वाली पर्वत श्रृंखला है। यह पर्वतमाला हिमालय क्षेत्र के अंतर्गत आती है। दरअसल, हिन्दूकुश पर्वतमाला पामीर पर्वतों से जाकर जुड़ते हैं और हिमालय की एक उपशाखा माने जाते हैं। पामीर का पठार, तिब्बत का पठार और भारत में मालवा का पठार धरती पर रहने लायक सबसे ऊंचे पठार माने जाते हैं। प्रारंभिक मनुष्य इसी पठार पर रहते थे।
हिन्दूकुश पर्वतमाला के बीचोबीच सबसे ऊंचा पहाड़ पाकिस्तान के खैबर-पख्तूनख्वा प्रां‍त के चित्राल जिले में स्थित है जिसे वर्तमान में तिरिच मीर पर्वत कहते हैं। हिन्दूकुश का दूसरा सबसे ऊंचा पहाड़ नोशक पर्वत और तीसरा इस्तोर-ओ-नल है।

उत्तरी पाकिस्तान में हिन्दूकुश पर्वतमाला और काराकोरम पर्वतमाला के बीच स्थित एक हिन्दू राज पर्वत श्रृंखला है। इस पर्वत श्रृंखला में कई ऋषि-मुनियों के आश्रम बने हुए थे, जहां भारत और हिन्दूकुश के उस पार से आने वाले जिज्ञासुओं, छात्रों आदि के लिए शिक्षा, दीक्षा और ध्यान की व्यवस्था थी। आज इस हिन्दू राज पर्वतमाला के प्रमुख पहाड़ों के नाम बदल दिए गए हैं, जैसे एक कोयो जुम नामक बहुत लंबा पहाड़ है। दूसरा बूनी जुम और तीसरा गमुबार जुम हैं। उल्लेखनीय है कि काराकोरम एक विशाल पर्वत श्रृंखला है जिसका विस्तार पाकिस्तान, भारत और चीन के क्रमश: गिलगित-बाल्तिस्तान, लद्दाख और शिन्जियांग क्षेत्रों तक है। काराकोरम, पूर्वोत्तर में तिब्बती पठार के किनारे और उत्तर में पामीर पर्वतों से घिरा है।

हिन्दूकुश पर्वतमाला में ऐसे बहुत से दर्रे हैं जिसके उस पार कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान, चीन, रशिया, मंगोलिया, रशिया आदि जगह जा सकते हैं। यह हिमालय के उस पार से भारत में आने का आसान रास्ता है, जबकि तिब्बत के रास्ते सिक्किम होते हुए भारत आना थोड़ा कठिन है।

प्राचीन लोगों ने अपने कुछ प्रमुख मार्ग निर्मित किए थे जिसमें से एक है सिल्क रूट। सिल्क रूट के एक छोर से दूसरे छोर पर जाने वालों के लिए हिन्दूकुश पर्वतमाला के विशेष क्षेत्रों में बने ऋषि- मुनियों के आश्रम जहां लोगों के लिए विश्राम स्थल थे वहीं यह दुनियाभर की जानकारी प्राप्त करने का क्षेत्र भी था। रोम के वेनिस, इसराइल के येरुशलम से तुर्की के इस्तांबुल तक और वहां से लेकर चीन के च्वानजो शहर तक यह रूट था। बीच में भारतीय क्षेत्र के शहर काबुल, पेशावर, श्रीनगर व्यापार के प्रमुख केंद्रों में से एक था। काबुल का पहले नाम कुम्भा था, जो वहां की एक नदी के नाम पर रखा गया था। यह क्षेत्र भारत के 16 जनपदों में से एक कंबोज के अंतर्गत आता था। पारास्य देश के तेहरान से एक रास्ता भारत की ओर तथा दूसरा रास्ता कैस्पियन सागर और तुर्कमेनिस्तान की ओर जाता है। पहले अफगानिस्तान भारत का ही हिस्सा हुआ करता था।

रोम से जियान तक : यह रोड तकरीबन 2000 साल पहले एशिया और यूरोप के बीच बिजनेस और कल्‍चरल एक्‍सचेंज का माध्‍यम था। यह मार्ग चीन के जियान शहर को रोम से जोड़ता था। दरअसल पुराने समय में चीन, भारत और पश्चिमी देशों के बीच रेशम का व्यापार हुआ करता था। जियान से रोम या रोम से जियान लोग दो रास्तों से जाते थे। इसमें एक रास्ता तो हिन्दूकुश के दर्रों से सीधे चीन जाने वाला रास्ता था तो दूसरा रास्ता भारत में होकर सिक्किम के नाथुला दर्रे से होकर चीन जाता था। हिन्दूकुश पर्वतमाला से लेकर नाथुला दर्रे तक बहुत सारे मठ मिल जाएंगे। तिब्बत और अफगानिस्तान उस दौर में धर्म का गढ़ बन गया था। हिन्दूकुश में दर्रों की भरमार है। यहां पहाड़ियों के बीच से कई सुगम और दुर्गम रास्ते हैं। इसलिए यह क्षे‍त्र पश्‍चिमी लोगों के लिए द्वार बन गया। हिन्दूकुश पर्वत 800 से ज्यादा किलोमीटर तक तो लंबाई में फैला है और 200 किलोमीटर से भी अधिक इसकी चौड़ाई है।

और भी कई उप मार्ग थे : उस समय रेशम मार्ग वर्तमान के अफगानिस्तान, उज्बेकिस्तान, ईरान और मिस्र के अलेक्जेंडर नगर तक पहुंचता था और इसका एक दूसरा रास्ता पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान के काबुल से होकर फारस की खाड़ी तक पहुंचता था, जो दक्षिण की दिशा में वर्तमान में कराची तक पहुंच जाता था और फिर समुद्री मार्ग से फारस की खाड़ी और रोम तक पहुंच जाता था।

लानझोउ यूनिवर्सिटी ऑफ फिनांस एंड इकोनॉमिक्स में शोधकर्ता गाओ कियान के अनुसार प्राचीन व्यापार मार्ग पर काबुल के बाद दुनहुआंग व्यवसाय का केंद्र था। प्राचीन रेशम मार्ग पर साहसिक यात्रा पर निकले लोग फारस की रोटी, भारत की मिठाइयां और अरब की नान खाते थे। इसके अलावा डोनर कबाब भी प्रसिद्ध था।

पुरातत्वीय खोज से पता चला है कि रेशम मार्ग ईसा पूर्व पहली शताब्दी के चीन के हान राजवंश के समय शुरू हुआ था। चीन ने इस मार्ग के माध्यम से पूरे विश्‍व में रेशम का व्यापार किया था। इस मार्ग से व्यापारियों के साथ ही फौजें भी गुजरने लगीं, फिर धार्मिक समूह भी। और इस तरह इस व्यापारिक मार्ग की गतिविधि के कारण ही मार्ग में पड़ने वाले सभी प्रमुख नगरों और राज्यों के सामाजिक जीवन में भी कई परिवर्तन आए। खैर, अब बात करते हैं हिन्दूकुश पर्वतमाला की।


हिन्दूकुश पर्वतमाला की सचाई जानिए
पुनः संशोधित: गुरुवार, 27 नवंबर 2014
पारियात्र पर्वत : हिन्दूकुश पर्वत का पहले नाम पारियात्र पर्वत था। कुछ विद्वान इसे परिजात पर्वत भी कहते हैं। इसका दूसरा नाम हिन्दू केश भी था। केश का अर्थ अंतिम सिरा।

हिन्दू केश : इसे हिन्दू केश इसलिए कहते थे कि यहां भारत की सीमा का अंत होता है। केश का अर्थ होता है अंत। जैसे हमारे शरीर में केश (बाल) अंतिम सिरे के समान होते हैं। यहां तक भारत में रहने वाले हिन्दुओं का क्षेत्र था अर्थात हिन्दुओं के क्षेत्र की सीमा का अग्रभाग।

राम के कुश : यहां भगवान राम के एक बड़े बेटे कुश ने तपस्या ‍की थी। तपस्या के बाद उन्होंने यहां पर अमृत दीक्षा ग्रहण की थी। कुश यहां के आसपास के संपूर्ण क्षेत्र पर अपना अधिकार रखते थे। इस पर्वतमाला के आसपास रहने वाली कई जातियों के नाम कुश के ऊपर ही हैं।

लव और कुश राम तथा सीता के जुड़वां पुत्र थे। उनका जन्म माता सीता के अयोध्या से निर्वासन के पश्चात वाल्मीकि आश्रम में हुआ था और यहीं पर दोनों बालकों का लालन-पालन हुआ। अत: दक्षिण कोसल प्रदेश में कुश और उत्तर कोसल में लव का अभिषेक किया गया था।
पश्चिमोत्तर भारत में विदेशियों का आक्रमण मौर्योत्तर काल में सर्वाधिक हुआ। सबसे पहले इस क्षेत्र पर यूनानियों ने आक्रमण किया। फिर सिकंदर ने जब इसे अपने कब्जे में ले लिया तो इसका नाम यूनानी भाषा में 'कौकासोश इन्दिकौश' यानी 'भारतीय पर्वत' बुलाया जाने लगा। बाद में इनका नाम 'हिन्दूकुश', 'हिन्दू कुह' और 'कुह-ए-हिन्दू' पड़ा। 'कुह' या 'कोह' का मतलब फारसी में 'पहाड़' होता है।

विदेशी आक्रमणकारियों की इस शृंखला में सबसे पहले 'बैक्ट्रिन ग्रीक' शासकों का नाम आता है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में इन्हें 'यवन' के नाम से जाना जाता है। इतिहास के इस काल की जानकारी बौद्ध ग्रंथों में मिलेगी। हिन्दुकुश पर्वत एवं 'ऑक्सस' के मध्य में स्थित 'बैक्ट्रिया' अत्यन्त ही उपजाऊ प्रदेश था। इसके उपजाऊपन के कारण ही 'स्ट्रैबो' ने इसे 'अरियाना गौरव' कहा। बैक्ट्रिया में यूनानी बस्तियों का प्रारम्भ 'एकेमेनिड काल' (लगभग 5 वीं शताब्दी ई.पू.) में हुआ।

सिकन्दर की मृत्यु के पश्चात् बैक्ट्रिया पर सेल्युकस का अधिपत्य रहा। सेल्यूकस वंश के 'आन्तियोकस तृतीय' ने 'यूथीडेमस' को बैक्ट्रिया का राजा मान लिया और 206 ईपू में भारत के विरूद्ध एक अभियान का नेतृत्व किया। यह अभियान हिन्दुकुश पर्वत को पार कर काबुल घाटी के एक शासक सुभगसेन के खिलाफ किया गया था। सुभगसेन को पॉलिबियस ने 'भारतीयों का राजा' कहा। सम्भवतः सुभगसेन द्वारा सांकेतिक समर्पण के बाद एण्ट्योकस ढेर सारे हाथी एवं हरजाने की बड़ी धनराशि लेकर वापिस चला गया।

इसके बाद डेमेट्रियस और मीनेंडर (मिलिंद) नामक यवन शासकों ने इस पर्वत माला से आकर हमले किए। इस के बाद पार्थियन (पहलव), शक (सीथियन), कुषाण और हूण ने अफगानिस्तान (आर्यना) पर हमले किए। फिर अरब और तुर्की के खलिफाओं ने हमले किए। सिकन्दर के बाद डेमेट्रियस पहला यूनानी शासक था, जिसकी सेना भारतीय सीमा में प्रवेश कर सकी थी। उसने एक बड़ी सेना के साथ लगभग 183 ई.पू. में हिन्दुकुश पर्वत को पार कर सिंध और पंजाब पर अधिकार कर लिया। तब योग के महान ऋषि पातांजली काबुल क्षेत्र में रहते थे। वे वही के निवासी थे। उन्होंने अपनी पुस्तक  महाभाष्यण 'गार्गी संहिता' एवं मालविकाग्निमित्रम् में इसका जिक्र किया है।
हिन्दू क्षेत्र पर्वत : इसे हिन्दू क्षे‍त्र नहीं कहते थे। यहां से गुजरने वाले लोग इसे हिन्दू क्षेत्र कहते थे इसलिए इस पर्वतमाला का नाम हिन्दू क्षेत्र पड़ गया। काराकोरम और हिन्दूकुश के बीच हिन्दू राज पर्वतमाला है, जहां हिन्दू ऋषियों के आश्रम और राजाओं के सैन्य शिविर थे। यहां गुरु लोग बाहर से आने वाले लोगों को ज्ञान देते थे। ईसा से 700 वर्ष पूर्व ही अफगानिस्तान (आर्याना) क्षेत्र में राजनीतिक, व्यापारिक और धार्मिक गतिविधियां तेजी से बढ़ने लगी थीं। बौद्धकाल में यहां का बामियान नगर बौद्ध धर्म की राजधानी था।

बहुत से तुर्की, चीनी और अरब के लोग जो यहां आते-जाते थे वे क्षेत्र शब्द नहीं बोल पाते थे। क्षेत्र को छेत्र कहते थे। क+श+त्र उक्त तीन शब्द से मिलकर बना क्षे‍त्र इसलिए कुछ लोग हिन्दू कशेत्र भी कहते थे। इस तरह यह क्षे‍त्र शब्द बोलने वाले लोगों के कारण बिगड़ता गया। क्ष और त्र बोलना आम लोगों के लिए थोड़ा कठिन था इसलिए इसमें से त्र भी हटा दिया गया और रह गया हिन्दू केश।
मध्य काल :... सन् 1333 ईस्वीं में इब्नबतूता के अनुसार हिन्दुकुश का मतलब 'मारने वाला' था। इसका मतलब था कि यहां से गुजरने वाले लोगों में से अधिकतर ठंड और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के कारण मर जाते थे। लेकिन इब्नबतूता की इस बात का कुछ लोगों ने गलत अर्थ भी निकाला? उनके अनुसार उत्तरी भारतीय उपमहाद्वीप पर अरबों-तुर्कों के कब्जे के बाद हिन्दूओं को गुलाम बनाकर इन पर्वतों से ले जाया जाता था और उनमें से बहुत से हिन्दू यहां बर्फ में मर जाया करते थे। इस तरह की बातें करने वालों ने खुदकुशी से इस शब्द का अर्थ लिया। यहां हिन्दू खुदकुशी कर लेते थे इसलिए पहले हिन्दूकुशी और फिर हिन्दूकुश हो गया।

कहते हैं कि मुगलकाल में अफगानिस्तान को हिन्दूविहीन बनाने के लिए जो कत्लेआम का दौर चला उस दौर में आक्रांताओं ने इस पर्वतमाला को हिन्दुओं की कत्लगाह बना दिया था। यहां भारत के अन्य हिस्सों से लाखों की तादाद में गुलामों को लाकर छोड़ दिया जाता था या उन्हें अरब की गुलाम मंडियों में बेच दिया जाता था।

माना जाता है कि अरब, बगदाद, समरकंद आदि स्थानों में काफिरों की मंडियां लगा करती थीं, जो हिन्दुओं से भरी रहती थीं और वहां स्त्री-पुरुषों को बेचा जाता था। उनसे सभी तरह के अमानवीय काम करवाए जाते थे। उनके जीवन का कोई अस्तित्व नहीं होता था। यातनाओं से केवल वही थोड़ा बच सकते थे, जो इस्लाम में परिवर्तित हो जाते थे। फिर उनको भी शेष हिन्दुओं पर मुस्लिम तरीके के अत्याचार करने का अधिकार प्राप्त हो जाता था। लेकिन इस बात में कितनी सचाई है यह कोई नहीं जानता।

माना जाता है कि तैमूरलंग जब एक लाख गुलामों को भारत से समरकंद ले जा रहा था तो एक ही रात में अधिकतर लोग ‘हिन्दू-कोह’ पर्वत की बर्फीली चोटियों पर सर्दी से मर गए थे। इस घटना के बाद उस पर्वत का नाम ‘हिन्दूकुश’ (हिन्दुओं को मारने वाला) पड़ गया था। लेकिन हिन्दूकुश नाम तो सिकंदर के पहले से ही प्रसिद्ध है? फिर हिन्दुओं के मरने से यह नाम कैसे पड़ा, यह समझ से परे है।

हिन्दू साम्राज्य 'विजयनगर'



                                    हिन्दू साम्राज्य 'विजयनगर' को जानिए

                                                         अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'
                                               पुनः संशोधित: बुधवार, 14 जनवरी 2015

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विजयनगर साम्राज्य (लगभग 1350 ई. से 1565 ई.) की स्थापना राजा हरिहर ने की थी। 'विजयनगर' का अर्थ होता है 'जीत का शहर'। मध्ययुग के इस शक्तिशाली हिन्दू साम्राज्य की स्थापना के बाद से ही इस पर लगातार आक्रमण हुए लेकिन इस साम्राज्य के राजाओं से इसका कड़ा जवाब दिया। यह साम्राज्य कभी दूसरों के अधीन नहीं रहा। इसकी राजधानी को कई बार मिट्टी में मिला दिया गया लेकिन यह फिर खड़ा कर दिया गया। हम्पी के मंदिरों और महलों के खंडहरों के देखकर जाना जा सकता है कि यह कितना भव्य रहा होगा। इसे यूनेस्को ने विश्‍व धरोहर में शामिल किया है।
विजयनगर साम्राज्य की स्थापना राजा हरिहर प्रथम ने 1336 में की थी। विजयनगर साम्राज्य की स्थापना में हरिहर प्रथम को दो ब्राह्मण आचार्यों- माधव विद्याराय और उसके ख्यातिप्राप्त भाई वेदों के भाष्यकार 'सायण' से भी मदद मिली थी। हरिहर प्रथम को 'दो समुद्रों का अधिपति' कहा जाता था।

अनेगुंडी के स्थान पर इस साम्राज्य का प्रसिद्ध नगर विजयनगर बनाया गया था, जो राज्य की राजधानी थी। बादामी, उदयगिरि एवं गूटी में बेहद शक्तिशाली दुर्ग बनाए गए थे। हरिहर ने होयसल राज्य को अपने राज्य में मिलाकर कदम्ब एवं मदुरा पर विजय प्राप्त की थी। दक्षिण भारत की कृष्णा नदी की सहायक तुंगभद्रा नदी इस साम्राज्य की प्रमुख नदी थी। हरिहर के बाद बुक्का सम्राट बना। उसने तमिलनाडु का राज्य विजयनगर साम्राज्य में मिला लिया। कृष्णा नदी को विजयनगर तथा मुस्लिम बहमनी की सीमा मान ली गई। इस साम्राज्य में बौद्ध, जैन और हिन्दू खुद को मुस्लिम आक्रमणों से सुरक्षित मानते थे।

इस साम्राज्य की स्थापना का उद्देश्य दक्षिण भारतीयों के विरुद्ध होने वाले राजनीतिक तथा सांस्कृतिक आंदोलन के परिणामस्वरूप संगम पुत्र हरिहर एवं बुक्का द्वारा तुंगभद्रा नदी के उत्तरी तट पर स्थित अनेगुंडी दुर्ग के सम्मुख की गई। विजयनगर दुनिया के सबसे भव्य शहरों में से एक था।

इतिहासकारों के अनुसार विजयनगर साम्राज्य की स्थापना 5 भाइयों वाले परिवार के 2 सदस्यों हरिहर और बुक्का ने की थी। वे वारंगल के ककातीयों के सामंत थे और बाद में आधुनिक कर्नाटक में काम्पिली राज्य में मंत्री बने थे। जब एक मुसलमान विद्रोही को शरण देने पर मुहम्मद तुगलक ने काम्पिली को रौंद डाला, तो इन दोनों भाइयों को भी बंदी बना लिया गया था। इन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया और तुगलक ने इन्हें वहीं विद्रोहियों को दबाने के लिए विमुक्त कर दिया। तब मदुराई के एक मुसलमान गवर्नर ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया था और मैसूर के होइसल और वारगंल के शासक भी स्वतंत्र होने की कोशिश कर रहे थे। कुछ समय बाद ही हरिहर और बुक्का ने अपने नए स्वामी और धर्म को छोड़ दिया। उनके गुरु विद्यारण के प्रयत्न से उनकी शुद्धि हुई और उन्होंने विजयनगर में अपनी राजधानी स्थापित की।

1356 में बुक्का प्रथम ने सिंहासन संभाला। हरिहर द्वितीय ने 1377 ईस्वी में सिंहासन संभाला इसके बाद विरुपाक्ष प्रथम 1404 में गद्दी पर बैठे। इसी सन् में बुक्का द्वितीय ने सिंहासन संभाला। इसके बाद 1406 ईस्वी में देवराय प्रथम ने राज्य का कार्यभार संभाला। इसके बाद देवराय द्वितीय को 1422 ईस्वी में सिंहासन सौंपा गया। देवराय द्वितीय के बाद विजयराय द्वितीय ने 1446 में राज्य का कार्यभार संभाला, फिर 1447 में मल्लिकार्जुन और इसके बाद विरुपाक्ष द्वितीय ने 1465 से 1485 तक शासन किया। अंत में प्रौढ़ राय 1485 ने शासन किया।

तीन वंश : इसके बाद इस साम्राज्य में 3 वंशों का शासन चला- शाल्व वंश, तुलुव वंश और अरविंदु वंश।

शाल्व वंश : शाल्व वंश के राजा नरसिंह देवराय ने 1485 में सिंहासन संभाला, फिर 1491 में थिम्म भूपाल और फिर 1491 में ही नरसिंह राय द्वितीय ने संभालकर 1505 तक राज किया।

तुलुव वंश : इसके बाद तुलुव वंश के राजा नरस नायक ने 1491 से 1503 तक राज किया। फिर क्रमश: वीरनरसिंह राय (1503-1509), कृष्ण देवराय (1509-1529), अच्युत देवराय (1529-1542) और सदाशिव राय (1542-1570) ने शासन किया।

* कृष्ण देवराय के समय में विजयनगर सैनिक दृष्टि से दक्षिण भारत का बहुत ही शक्तिशाली राज्य हो गया था। बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘तुजुक-ए-बाबरी’ में कृष्ण देवराय को भारत का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक बताया है। कृष्ण देवराय के दरबार में तेलुगु साहित्य के 8 सर्वश्रेष्ठ कवि रहते थे, जिन्हें 'अष्ट दिग्गज' कहा जाता था। कृष्ण देवराय को 'आंध्र भोज’ की उपाधि प्राप्त थी। राजा कृष्ण देवराय के दरबार का सबसे प्रमुख और बुद्धिमान दरबारी था तेनालीराम। असल में इसका नाम रामलिंगम था। तेनाली गांव का होने के कारण इसे तेनालीराम कहा जाता था।

अरविदु वंश : तुलव के बाद अरविदु वंश के राजाओं ने राज किया। इनमें क्रमश: अलिय राम राय (1542-1565), तिरुमल देव राय (1565-1572), श्रीरंग प्रथम (1572-1586), वेंकट द्वितीय (1586-1614), श्रीरंग द्वितीय (1614-1614), रामदेव अरविदु (1617-1632), वेंकट तृतीय (1632-1642), श्रीरंग तृतीय (1642-1646) ने राज किया।

15 जनवरी को मकर संक्रांति अगले सौ साल तक



                                      15  जनवरी को मकर संक्रांति अगले सौ साल तक

14 जनवरी को मकर संक्रांति अब अगले सौ साल तक नहीं होगी। पूरे सौ साल यह पर्व 15 जनवरी को मनाया जाएगा। सूर्य की गति में प्रति सौर वर्ष कुछ मिनट की वृद्धि से सदी का यह परिवर्तन इस साल से होने जा रहा है। इस लिहाज से यह मकर संक्रांति दुर्लभ है।

बता दें कि सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश पर हर साल मकर संक्रांति होती है। इस 14 जनवरी को सूर्य शाम 7 बजकर 20 मिनट पर मकर में प्रवेश कर रहे हैं, चूंकि तब तक सूर्य अस्त हो जाएंगे, ऐसे में सारे ज्योतिष इस साल यह पर्व 14 के बजाय 15 जनवरी को मनाने पर सहमत हुए हैं। ज्योतिषाचार्य और खगोलविद डॉ. बीके शर्मा कहते हैं कि ऐसा इसलिए क्योंकि मकर संक्रांति सूर्य से जुड़ा पर्व है और संक्रांतिकाल में उस शाम को जब सूर्य अस्त होंगे तो उस दिन इस पर्व का औचित्य ही नहीं रहेगा इसलिए इसे अगले दिन सूर्य उदयकाल से माने जाने का विधान शास्त्रों में भी है।

काशी के सर्वमान्य महावीर पंचांग के संपादक रामेश्वर नाथ ओझा के अनुसार, विकला खगोलीय काल गणना की सूक्ष्म इकाई बढ़ रही है। इसके कारण अयनांश में वृद्धि हो रही, इसलिए इस खगोलीय गणना के अनुसार, अब आने वाले वर्षों में मकर संक्रांति का पर्व 15 जनवरी को ही होगा। ओझा के मुताबिक, अयनांश सूर्य की गति की खगोलीय स्थिति है। इसमें वृद्धि के कारण सूर्य की संक्रांति में अंतर आएगा। पंचांग में दो सौ साल पहले मकर संक्रांति 12 जनवरी को हुआ करती थी।

डॉ. शर्मा बताते हैं कि सौर ग्रह में सूर्य, चंद्र और पृथ्वी की गति होती है। सूर्य भी कुछ अंश गतिशील होता रहता है। यह गति इतनी कम है कि उसे 24 घंटे आगे जाने में पूरी एक सदी लग जाएगी। पिछले साल तक सूर्य का धनु से मकर में प्रवेश 14 जनवरी को अस्त होने के काफी पहले हो जाया करता था लेकिन इस साल यह अस्त होने के बाद हो रहा है।

बन रहा पांच बार 15 का संयोग
21 वीं सदी के 15 वें वर्ष की 15 तारीख को 15 वें नक्षत्र स्वाति और 15 मुहूर्त तिथि होगी। ज्योतिषी पंडित रामनरेश मिश्र के अनुसार, 15 का मूलांक 6 है और 6 अंक का स्वामी शुक्र है जो सुंदरता, प्राकृतिक सौंदर्य और चकाचौंध का परिचायक है इसलिए यह वर्ष उन्नति का रहेगा।

खरमास खत्म, शुरू होंगे शुभ कार्य
सूर्य के धनु में बैठे होने के कारण 16 दिसंबर से खरमास चल रहा है। 15 जनवरी को सूर्य के उत्तरायण होते ही खरमास खत्म हो जाएगा। आचार्य मुकेश मिश्रा ने बताया कि इसी के साथ महीने भर से निषिद्ध शादी समारोह और अन्य शुभ कार्य शुरू हो जाएंगे।

मकर संक्रांति के स्नान-दान का पुण्यकाल 15 को
सूर्य 14 जनवरी को मकर राशि में सूर्य अस्त होने के बाद प्रवेश करेंगे, इसलिए सभी विद्वान इस बात पर एकमत है कि� स्नान, दान का पुण्यकाल 15 जनवरी की सुबह शुरू होगा। तिथि समाधान के ग्रंथ निर्णय सिंधु के मुताबिक, गंगा में पुण्य की डुबकी लगाने का फल बृहस्पतिवार को ही मिलेगा। काशी समेत पूर्वांचल में प्रचलित महावीर पंचांग और गणेश आपा पंचांग में 14 जनवरी की रात क्रमश: 1:20 और 12:34 पर मकर संक्रांति लग रही है। पश्चिमी यूपी के मारतंड पंचांग में संक्रांति शाम को 7:27 पर और ब्रजभूमि पंचांग में 7:26 पर लग रही है। ऐसे में काशी के ज्योतिषियों ने 15 जनवरी को ही पुण्य की डुबकी लगाने की घोषणा की है।