बुधवार, 21 जनवरी 2015

आधी दौलत पर सिर्फ 1 फीसदी लोगों का कब्जा : शैम शैम




दुनिया की आधी दौलत पर सिर्फ 1 फीसदी लोगों का कब्जा : शैम शैम
ईटी हिंदी| Jan 19, 2015
पैरिस
http://navbharattimes.indiatimes.com/business/business-news/richest-1-to-own-more-than-rest-of-the-world-by-2016-oxfam/articleshow/45939507.cms
गरीबी का मुद्दा एक ऐसा मुद्दा रहा है जो छोटे-छोटे मंचों से विश्वस्तरीय मंचों पर भी उठता रहा है, लेकिन यह विडंबना ही है कि जितनी दौलत दुनिया के 99 प्रतिशत लोगों के पास है, उतना धन अकेले एक प्रतिशत लोगों के पास है। समाज कल्याण के लिए काम करने वाली संस्था ऑक्सफैम चैरिटी की रिपोर्ट के अनुसार, 2016 तक यह आंकड़ा भी पार कर जाएगा और 1 प्रतिशत के लोगों के पास उस धन से भी अधिक धन हो जाएगा जो दुनिया के 99 प्रतिशत लोगों के पास है।

ऑक्सफैम के ऐग्जिक्युटिव डायरेक्टर विन्नी बयनिमा ने बताया, दुनिया भर में असमानता का स्तर काफी बढ़ता जा रहा है और इसे ग्लोबल अजेंडा में शामिल होने के बावजूद गरीब और अमीर के बीच की खाई बढ़ती जा रही है। दुनिया भर में गरीब-अमीर के बीच की खाई काफी चौड़ी होती जा रही है।

2009 में पूरी दुनिया में एक प्रतिशत धनी लोगों के पास 44 प्रतिशत धन था जो 2014 में बढ़कर 48 प्रतिशत हो गया। ब्रिटेन की चैरिटी संस्था की रिपोर्ट में बताया गया है कि 2016 में यह शेयर 50 प्रतिशत से अधिक हो जाएगा। ऑक्सफैम के अनुसार, इस ग्रुप के लोगों के पास प्रति व्यस्क व्यक्ति 2.7 मिलियन डॉलर है। बाकी बचे धन में से 46 प्रतिशत धन पर दुनिया के उससे नीचे स्तर के धनी लोगों का कब्जा है यानी शेष 80 प्रतिशत लोगों के पास मात्र 5.5 प्रतिशत धन है जो प्रति व्यस्क व्यक्ति करीब 2 लाख रुपए के करीब है।

यह बात ऑक्सफैम के एमडी ने दावोस में बुधवार से शनिवार तक आयोजित होने जा रही वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम (डब्ल्यूईएफ)की मीटिंग के मद्देनजर कही। वह डब्ल्यूईएफ के उपाध्यक्ष भी हैं। उन्होंने मीटिंग में भाग लेने वाले दुनिया भर के नेताओं से उन निहित स्वार्थों पर शिकंजा कसने को कहा जो दुनिया को न्यायसंगत और अधिक संपन्न बनाने के रास्ते में रुकावट पैदा करते हैं।

ऑक्सफैम ने देशों से कर चोरी पर अंकुश लगाने, पब्लिक सर्विसेज में बेहतरी लाने, श्रम की बजाए पूंजी पर कर लगाने और न्यूनतम आजीविका दिहाड़ी तय करने का आहवान किया ताकि धन संपदा का समान वितरण हो।

डब्ल्यूईएफ की मीटिंग बुधवार से शनिवार तक आयोजित होगी। इसमें भारी संख्या में लोगों को हिस्सा लेने की उम्मीद है जिनमें से 300 से अधिक राष्ट्र प्रमुख और सरकार के प्रतिनिधि होंगे।

फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद, जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्केल और चीन के ली क्विंग इस मीटिंग में शामिल होंगे और पूरी दुनिया जिन समस्याओं से ग्रसित है उन पर चर्चा करेंगे। इटली के प्रधानमंत्री और अमेरिक के सेक्रटरी ऑफ स्टेट को भी इसमें भाग लेने की उम्मीद है। यहां जिन मुद्दों पर चर्चा होने और उनके समाधान पर गौर करने की उम्मीद है उनमें दुनिया भर में बढ़ती हुई असमानता, यूरोप में आतंकवाद का खतरा, इबोला जैसी महामारी का प्रकोप और तेल की गिरती हुई कीमतें अहम हैं।

नरेंद्र मोदी की जनधन योजना ने बनाया गिनेस रेकॉर्ड



पांच महीने से कम समय में 11.5 करोड़ नए बैंक खाते खोले गए

 20 Jan 2015


जनधन योजना ने बनाया गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड,
योजना की सफलता से बड़े बदलाव के लिये मंच तैयार : मोदी

प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत केवल चार महीने में लगभग साढ़े ग्यारह करोड़ खाते खोले गये, जो गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि जन धन योजना के तहत केवल चार महीने में रिकार्ड 11.4 करोड़ खाते खोले गये और 99.74 प्रतिशत परिवार बैंक सुविधा के दायरे में लाये गये. उन्होंने कहा कि बड़े बदलाव के लिये मंच तैयार हो गया है.

योजना को अभूतपूर्व रूप से सफल बताते हुए मोदी ने ट्वीट कर कहा, ‘‘पीएमजेडीवाई (प्रधानमंत्री जन धन योजना) की सफलता ने लोगों के लिये बड़े बदलाव हेतु मंच तैयार किया है और यह भारत की प्रगति को आगे बढ़ाएगा.’’
इससे पहले, संवाददाता सम्मेलन में वित्त मंत्री अरूण जेटली ने कहा, ‘‘देश का ज्यादातर हिस्सा अब बैंकिंग सुविधा के दायरे में आ चुका है.’’ वित्त मंत्री के अनुसार जनधन खातों में 9,000 करोड़ रुपये से अधिक राशि जमा की गयी है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल स्वतंत्रता दिवस के मौके पर वित्तीय समावेशी योजना की घोषणा की थी. इसे अगस्त में शुरू किया गया और 26 जनवरी 2015 तक 7.5 करोड़ गरीब लोगों के बैंक खाते खोलने का लक्ष्य रखा गया. बाद में लक्ष्य को बढ़ाकर 10 करोड़ खाते कर दिया गया.

मोदी ने कहा कि योजना की अभूतपूर्व सफलता पूरे देश के लिये गर्व की बात है. उन्होंने कहा, ‘‘हमने गरीबों को वित्तीय प्रणाली से जोड़ने के लक्ष्य के साथ पीएमजेडीवाई शुरू की. इसका व्यापक विस्तार प्रसन्न करने वाला है.’’

अरूण जेटली ने कहा कि सरकार इन बैंक खातों का उपयोग विभिन्न सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के तहत लोगों को लाभ हस्तांतरित करने में करेगी. वित्तीय सेवा सचिव हसमुख अधिया ने कहा कि गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड ने प्रधानमंत्री जनधन योजना (पीएमजेडीवाई) के तहत हासिल उपलब्धि को दर्ज किया है|
गिनीज बुक ने कहा है, ‘‘वित्तीय समावेशी अभियान के तहत किसी एक सप्ताह में 23 अगस्त से 29 अगस्त 2014 के बीच सर्वाधिक 18,096,130 करोड़ खाते खोले गये और इसे वित्तीय सेवा विभाग ने प्राप्त किया.’’ उन्होंने कहा कि 17 जनवरी तक जो भी खाते खुले, इनमें से 60 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में तथा 40 प्रतिशत शहरी क्षेत्रों में हैं. महिला खाताधारकों की हिस्सेदारी करीब 51 प्रतिशत है.

जेटली ने कहा कि 10 करोड़ से अधिक लाभार्थियों को रूपे कार्ड जारी किया गया. उन्हें एक लाख रुपये का व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा मिलेगा. साथ ही योग्य लाभार्थियों को 30,000 रुपये का जीवन बीमा कवर मिलेगा.

योजना को अर्थव्यवस्था के लिये पाशा पलटने वाला करार देते हुए मंत्री ने कहा कि यह प्रत्यक्ष लाभ अंतरण योजना (डीबीटी) के लिये मंच उपलब्ध कराएगा और सब्सिडी के दुरूपयोग पर रोक लगाने में मददगार बनेगा. उन्होंने कहा कि इससे पहले 2011 में शुरू वित्तीय समावेशी कार्यक्रम का उद्देश्य सीमित था. पीएमजेडीवाई के तहत परिवार को लक्ष्य बनाया गया न कि केवल गांव को.

संप्रग सरकार के वित्तीय समावेशी कार्यक्रम के तहत 2,000 या उससे अधिक आबादी वाले गांवों को बैंक सेवाओं से जोड़ने की बात कही गयी थी.    

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने पीएमजेडीवाई के तहत कुल मिलाकर 9.11 करोड़ खाते खोले. उसके बाद क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों का स्थान रहा जिन्होंने 2.01 करोड़ खाते खोले. दूसरी तरफ निजी क्षेत्र के 13 बैंकों ने केवल 37.58 लाख खाते खोले.

26 जनवरी के बाद योजना के भविष्य के बारे में पूछे जाने पर अरूण जेटली ने कहा कि सरकार इस पर बाद में निर्णय करेगी.

अधिया के अनुसार इन सभी खातों का उपयोग मनरेगा के तहत मजदूरी भुगतान तथा एलपीजी सब्सिडी भुगतान में किया जा रहा है. मनरेगा, एलपीजी तथा अन्य लाभ के तहत 33,000 करोड़ रुपये से अधिक राशि सालाना बैंक खातों के जरिये दी जाएगी.  

जेटली ने कहा कि खाताधारकों को रूपे कार्ड जारी किये जाने से ‘प्लास्टिक मनी’ के उपयोग को प्रोत्साहन मिलेगा और ‘कैशलेस सोसाइटी’ की ओर बढ़ने में मदद मिलेगी.

जेटली ने कहा कि संपर्क स्थिति ठीक नहीं होने और नक्सली हिंसा से प्रभावित क्षेत्र को छोड़कर देश का अधिकतर हिस्सा पीएमजेडीवाई के दायरे में आ गया है.
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पीएम मोदी की जनधन योजना ने बनाया गिनेस रेकॉर्ड
नई दिल्ली
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी जनधन योजना ने गिनेस रेकॉर्ड बना लिया है। इस योजना के तहत कम समय में अधिकतम बैंक खाते खोले जाने पर यह रेकॉर्ड बना है।

सोमवार को गिनेस रेकॉर्ड के अधिकारियों ने आधिकारिक रूप से इसकी घोषणा की। वित्त मंत्री अरुण जेटली को इस बारे में सर्टिफिकेट भी दिया गया।

जनधन योजना के तहत पांच महीने से कम समय में 11.5 करोड़ नए बैंक खाते खोले गए हैं। वित्तीय सेवा सचिव ने मंगलवार को इसकी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि अब तक 99.74 प्रतिशत परिवार जनधन योजना के दायरे में हैं।

उन्होंने कहा कि देश के 300 जिलों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को भी प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण योजना के दायरे में लाया जाएगा।

गौरतलब है कि मोदी सरकार ने यह योजना 28 अगस्त 2014 को लॉन्च की थी। तब 26 जनवरी तक 7.5 करोड़ परिवारों को इससे जोड़ने का टारगेट रखा गया था।


सर्वोत्कृष्ट संस्कृति : भारतीय संस्कृति



भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्व
    श्रीराम शर्मा आचार्य

सर्वोत्कृष्ट संस्कृति : भारतीय संस्कृति
भूमिका
विश्व की सर्वोत्कृष्ट संस्कृति भारतीय संस्कृति है, यह कोई गर्वोक्ति नहीं अपितु वास्तविकता है। भारतीय संस्कृति को देव संस्कृति कहकर सम्मानित किया गया है। आज जब पूरी संस्कृति पर पाश्चात्य सभ्यता का तेजी से आक्रमण हो रहा है, यह और भी अनिवार्य हो जाता है कि, उसके हर पहलू को जो विज्ञान सम्मत भी है तथा हमारे दैनन्दिन जीवन पर प्रभाव डालने वाला भी, हम जनजन के समक्ष प्रस्तुत करें ताकि हमारी धरोहर—आर्य संस्कृति के आधार भूत तत्त्व नष्ट न होने पायें।

भारतीय संस्कृति का विश्व संस्कृतिपरक स्वरूप तथा उसका गौरव गरिमा का वर्णन तो इस वाङ्मय के पैतीसवें खण्ड ‘समस्त विश्व को भारत के अजस्र अनुदान’ में किया गया है किंतु इस खंड में संस्कृति के स्वरूप, मान्यताएँ, कर्म-काण्ड—परम्पराएँ—उपासना पद्धतियाँ एवं अंत में इसके सामाजिक पक्ष पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। इस प्रकार दोनों खण्ड मिलकर एक-दूसरे के पूरक बनते हैं।

भारतीय संस्कृति हमारी मानव जाति के विकास का उच्चतम स्तर कही जा सकती है। इसी की परिधि में सारे विश्वराष्ट्र के विकास के—वसुधैव कुटुम्बकम् के सारे सूत्र आ जाते हैं। हमारी संस्कृति में जन्म के पूर्व से मृत्यु के पश्चात् तक मानवी चेतना को संस्कारित करने का क्रम निर्धारित है। मनुष्य में पशुता के संस्कार उभरने न पायें, यह इसका एक महत्त्वपूर्ण दायित्व है। भारतीय संस्कृति मानव के विकास का आध्यात्मिक आधार बनती है और मनुष्य में संत, सुधारक, शहीद की मनोभूमि विकसित कर उसे मनीषी, ऋषि, महामानव, देवदूत स्तर तक विकसित करने की जिम्मेदारी भी अपने कंधों पर लेती है। सदा से ही भारतीय संस्कृति महापुरुषों को जन्म देती आयी है वह यही हमारी सबसे बड़ी धरोहर है।

भारतीय संस्कृति की अन्यान्य विशेषताओं सुख का केन्द्र आंतरिक श्रेष्ठता, अपने साथ कड़ाई, औरों के प्रति उदारता, विश्व हित के लिए स्वार्थों का त्याग, अनीतिपूर्ण नहीं—नीतियुक्त कमाई पारस्परिक सहिष्णुता, स्वच्छता—शुचिता का दैनान्दिन जीवन में पालन, परिवार—व राष्ट्र के प्रति अपनी नैतिक जिम्मेदारी का परिपालन, अनीति से लड़ने संघर्ष करने का साहस—मन्यु, पितरों की तृप्ति हेतु तथा पर्यावरण संरक्षण हेतु स्थान-स्थान पर वृक्षारोपण कर हरीतिमा विस्तार तथा अवतारवाद का हेतु समझते हुए तदनुसार अपनी भूमिका निर्धारण सभी पक्षों का बड़ा ही तथ्य सम्मत-तर्क समस्त विवेचन पूज्यवर ने इसमें प्रस्तुत किया है।

संस्कृति का अर्थ है वह कृति-कार्य पद्धति जो संस्कार संपन्न हो। व्यक्ति की उच्छृंखल मनोवृत्ति पर नियंत्रण स्थापित कर कैसे उसे संस्कारी बनाया जाय यह सारा अधिकार क्षेत्र संस्कृति के मूर्धन्यों का है एवं इसी क्षेत्र पर हमारे ऋषिगणों ने सर्वाधिक ध्यान दिया है परम पूज्य गुरुदेव ने भारतीय संस्कृति की कुछ मान्यताओं पर बड़ी गहराई से प्रकाश डाला है एवं प्रत्येक का तथ्य सम्मत विवेचन विज्ञान की-शास्त्रों की सम्मति के साथ प्रस्तुत किया है, पुनर्जन्म में विश्वास, स्वर्ग नरक कहाँ है, कैसे हैं, ब्राह्मणत्व क्या है—कैसे अर्जित किया जाता है—वर्णाश्रम धर्म परम्परा क्यों व किस रूप में ऋषियों ने स्थापित की, जीवन के चार पुरुषार्थ धर्म—अर्थ—काम—मोक्ष का आधार क्या है तथा आस्तिकता व कर्मफल के सिद्धांतों को संस्कृति का मूल प्राण क्यों माना जाता है, पूज्यवर ने बड़ी सुगम शैली में यह सब समझाने का प्रयास किया है। आपद धर्म-युगधर्म तथा यज्ञ की व्याख्या भी इसमें सशक्त रूप में आयी है। यद्यपि ये सभी विस्तार से अलग-अलग खण्डों में भी प्रश्नानुसार आये हैं, किंतु यहाँ उनका संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में विवेचन है।

मूर्तिपूजा-प्रतीकों की उपासना के पीछे क्या वैज्ञानिकता है तथा शिखा-सूत्र, तिलक-माला आदि के पीछे क्या रहस्य छिपे पड़े हैं जो हमारे ऋषियों ने उन्हें इतना महत्त्व दिया है, यह विवेचन पाठकगण इसमें पढ़ सकेंगे। षोडष संस्कारों से लेकर पर्व त्योहारों तक तथा तीर्थ यात्राओं मेलों से लेकर कथा पारायण तक देवसंस्कृति का विस्तृत फैलाव है। इन सभी के स्वरूप को एक पाठक को जैसे प्रारंभिक कक्षा के छात्र को पढ़ाया जाता है। पूज्यवर ने समझाया है। बहुदेववाद क्या है—हमें इसके माध्यम से एक पर ब्रह्म की उपासना के मार्ग तक कैसे पहुँचना है, यह समग्र तत्व दर्शन तथा श्राद्ध-तर्पण आदि मान्यताओं की वैज्ञानिक व्याख्या भी इस में है।

अंतिम अध्याय में पूज्यवर ने चारों वर्णों आश्रमों के विभिन्न पक्षों को विस्तार से लिखा है। वर्णाश्रम पद्धति हमारी संस्कृति की विशेषता है एवं समाज की सुव्यवस्था की एक सुदृढ़ आधार शिला है। आज इस संबंध में अनेकानेक भ्रान्तियाँ फैला दी गई हैं पर वस्तुतः यह सारी विधि व्यवस्था मानवी जीवन को उसकी सामाजिक जिम्मेदारियों को एक निर्धारित क्रम में बाँधने के लिए बनी थीं। इसी सामाजिक पक्ष में संस्कृति के खान-पान, जाति-पाँति, ऊँच-नीच, भाषा, वेश, गुण—कर्म—स्वभाव की परिष्कृति से समाज की आराधना जैसे अनेकानेक पक्ष आ जाते हैं इतना वर्णन विस्तार से हुआ है। गुरु, गायत्री, गंगा, गौ व गीता ये पाँच हमारी संस्कृति के महत्त्वपूर्ण आधार स्तम्भ माने जाते हैं। इनके प्रतिश्रद्धा रख हम अपनी सांस्कृतिक गौरव गरिमा का अभिवर्धन करते हैं एवं इनके माध्यम से अनेकानेक अनुदान भी दैनन्दिन जीवन में पाते हैं।
सांस्कृतिक पुनरुत्थान के महत् प्रयोजन व उस निमित्त योजनाओं के विस्तार के साथ इस वाङ्मय का समापन है। भारतीय संस्कृति के आधार भूत तत्त्वों को सीखने-धारण करने वालों के लिए इस खण्ड में बहुत कुछ अमूल्य सामाग्री भरी पड़ी है।

भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्व
पृष्ठभूमि
मानव-जीवन मुख्यतः दो भागों में बँटा है—एक आधिभौतिक और दूसरा आध्यात्मिक। एक साधारण मनुष्य जब संसार के रंगमंच पर आता है तो उसे सबसे पहले भोजन, वस्त्र, निवास स्थान की आवश्यकता ही प्रतीत होती है। और उसका प्रयत्न यही होती है कि ये जीवनोपुयोगी वस्तुएँ। उसे अधिक से अधिक अनुकूल रूप में सुविधापूर्वक प्राप्त हो जायें, क्योंकि इन सब बातों की उचित व्यवस्था और रक्षा अकेले कर सकना बहुत ही कठिन होता है, अतः वह समुदाय बनाता है, परिवार का निर्माण करता है और सब प्रकार की सामग्री का संग्रह भी करता है, जिससे वह सुखपूर्वक जीवनयापन कर सके। जीवन के इसी क्रम में से आधिभौतिक उन्नति का श्रीगणेश हो जाता है और मनुष्य एक के बाद दूसरी प्राकृतिक शक्ति की जानकारी प्राप्त करके अपनी सुख-सामग्री की वृद्धि करता जाता है।

ब्रह्मवर्चस

भारतीय राष्ट्रवाद : सांस्कृतिक राष्ट्रवाद !




इतिहास दृष्टि - डा. सतीश चन्द्र मित्तल
http://panchjanya.com/arch/2009/5/10/File20.htm
भारतीय राष्ट्रवाद का अतीत तथा वर्तमान राष्ट्रीयता की भारतीय अवधारणा तथा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद

आधुनिक युग में राष्ट्रीयता अथवा राष्ट्रवाद एक विश्वव्यापी, अत्यंत महत्वपूर्ण तथा प्रभावी अवधारणा है। यह मानवता के विकास में बाधक नहीं बल्कि उसकी पोषक तत्व है। राष्ट्र, व्यक्ति और मानव जाति के बीच एक अनिवार्य शर्त है। यह विश्व के विभिन्न कालखण्डों में प्रेरक, प्रखर तथा प्रभावी तत्व रहा है। इसकी अवधारणा पूर्वी जगत में अति प्राचीन काल से तथा पाश्चात्य जगत में 18वीं शताब्दी के उत्तराद्र्ध में विकसित मानी जाती है।

राष्ट्रवाद के विकास क्रम के बारे में भ्रामक धारणा

पाश्चात्य विचारकों ने इस गलत तथा भ्रामक धारणा को बल दिया कि राष्ट्रवाद मूलत: एक यूरोपीय विचार है। कुछ ने आगे बढ़कर यह भी भ्रम फैलाया कि यह इंग्लैण्ड की देन है तथा 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश शासन के साथ इसका भारत में भी विकास हुआ। माक्र्सवादी चिंतक ए.आर. देसाई ने इसे एक आधुनिक विचार माना है जिसका विकास भारत में ब्रिटिश शासन तथा विश्व के प्रभावों के फलस्वरूप हुआ। यह सोचना मूर्खतापूर्ण होगा कि प्रत्येक देश का ऐतिहासिक विकासक्रम यूरोप अथवा पश्चिम की देन है। सही बात तो यह है कि इसका विकास विभिन्न देशों में, विभिन्न कालों में, विभिन्न परिस्थितियों में हुआ। सन् 1940 में सर तेजबहादुर सप्रू ने भारत के बारे में ठीक ही कहा, "भारतीय राष्ट्रीयता निश्चित रूप से यूरोप की इस प्रादेशिक राष्ट्रीयता से भिन्न है जो 100 वर्ष पूर्व की गई तथा जो वियाना संधि का फल है, जिसने यूरोप की व्यापारिक प्रतिबद्धता को बढ़ावा दिया।"

भारत में राष्ट्रवाद की अवधारणा

यह एक ऐतिहासिक सच्चाई है कि भारत विश्व के प्राचीनतम राष्ट्रों में से है। वैदिक साहित्य तथा अन्य ग्रंथों में, अंग्रेजी शब्द "नेशन" से हजारों साल पहले भारत में "राष्ट्र" नामक शब्द का उल्लेख मिलता है। वेदों में इस पर विस्तृत चिंतन किया गया है। इसे पवित्रतम मनोभाव माना गया है। महाभारत के शांतिपर्व में युधिष्ठिर भीष्म पितामह से अपनी जिज्ञासा प्रकट करते हैं कि राष्ट्र की रक्षा तथा वृद्धि के लिए क्या उपयोगी है। महाभारत में यह भी कहा गया है कि, युद्ध में प्राणों की बाजी का अवसर आने पर जिस राष्ट्र में ऐसा निश्चय आ जाता है कि इसके संरक्षण तथा देश की रक्षा करता रहूंगा, उसे ब्राहृलोक की प्राप्ति होती है। अत: राष्ट्रहित को सर्वोपरि माना गया है।

लोकमान्य तिलक ने राष्ट्र को धर्म से भी ऊंचा स्थान दिया है। महर्षि अरविन्द ने विश्व विख्यात उत्तर-पाड़ा के भाषण में कहा, "राष्ट्रीयता राजनीति नहीं बल्कि एक धर्म है, एक विश्वास है, एक निष्ठा है, सनातन धर्म है, मेरे लिए राष्ट्रीयता है।" उन्होंने प्रश्न किया, "राष्ट्र क्या है? हमारी मातृभूमि क्या है? साथ ही कहा, यह भूमि का टुकड़ा नहीं, भाषा का अलंकार नहीं, मन की कहानी नहीं है... यह भारत के समस्त लोगों की जीवित जाग्रत शक्ति है।" बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने राष्ट्र को सर्वोत्तम धर्म के रूप में प्रस्तुत किया है। पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई का कथन है कि राष्ट्र का हित ही राष्ट्रीयता है।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद

भारत में प्राचीन काल से राष्ट्रवाद के दो अभिन्न तत्व बताए गए हैं- समान भूमि तथा समान सांस्कृतिक जीवन। भारत भूमि के प्रति जन के अटूट संबंध की अवधारणा को अत्यन्त महत्व दिया गया है। अत: राष्ट्र का आधारभूत तत्व भौगोलिक तथा सांस्कृतिक एकता को माना गया है। संक्षेप में राष्ट्र कोई इकरारनामा या समझौता नहीं है बल्कि स्वयं निर्मित है। राष्ट्र का शरीर इसकी भूमि तथा इसकी आत्मा इसकी संस्कृति है। उपरोक्त दोनों तत्वों को संक्षेप में जानना आवश्यक होगा।

भूमि तथा जन का अटूट संबंध

यजुर्वेद के कुछ मंत्रों में राष्ट्र तथा इसके गुणों की विवेचना की गई। राष्ट्र उन व्यक्तियों से बनता है जो एकत्रित होकर एक निश्चित भू-भाग में रहते हों, साथ ही जो विवेक-बुद्धि को महत्व देते हों, विद्वानों का आदर करते हों तथा बाहरी आक्रमण तथा आन्तरिक प्रकृति प्रकोपों से सुरक्षा करने में सामथ्र्यवान हों। अथर्ववेद के पृथ्वीसूत्र में मातृभूमि के प्रति 63 भावूपर्ण मंत्र दिये गए हैं। भूमि को समुद्र के साथ घिरी बताया गया है तथा जहां के लोग विभिन्न भाषाओं को बोलते हैं तथा अनेक परम्पराओं का निर्वाह करते हैं। प्रसिद्ध विद्वान दामोदर सातवलेकर ने इन मंत्रों को "वेदों का राष्ट्रीय गीत" कहा है। उदाहरण के लिए कुछ मंत्र इस प्रकार से है। जैसे- माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या: अर्थात मेरी माता भूमि है तथा मैं पृथ्वी का पुत्र हूं। सा नो भूमि विसृजनां माता पुत्राय मे पय: अर्थात यह भूमि मेरी माता है जो मुझे दूध पिलाती है। भूमे मातर्निधेहि मा भद्रया: सुप्रतिष्ठितम् अर्थात हे मातृभूमि, मेरी रक्षा कर। वैदिक साहित्य की भांति अन्य ग्रंथों में मातृभूमि का यशोगान किया गया है। विष्णुपुराण का एक पूरा अध्याय भूमि के सन्दर्भ में है। बाल्मीकि रामायण में मातृभूमि की तुलना स्वर्ग से करते हुए इसे महान बताया गया है तथा कहा है-

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरियसी

अत: संक्षेप में राष्ट्र निर्माण में पहला अभिन्न तत्व मातृभूमि के प्रति अटूट प्रेम तथा समर्पण का भाव बताया गया है। इसकी प्राकृतिक सीमाओं को जीवन का आधार माना है। प्राकृतिक सम्पदाओं को- जैसे नदियों, पर्वतों, वृक्षों तथा अन्य वनस्पतियों को यथेष्ठ सम्मान दिया गया है।

भूमि के प्रति अगाध श्रद्धा तथा प्रेम व्यक्त करने के लिए भारत में तीर्थयात्रा की परम्परा को बड़ा महत्व दिया गया है। प्राचीन ग्रंथों- महाभारत, गरुड़ पुराण, दैवी भागवत पुराण, कालिका पुराण, शिवपुराण, स्कन्दपुराण आदि अनेक ग्रंथों में तीर्थ यात्रा के महत्व को दर्शाया गया है। भारतीयों में विभिन्न तीर्थस्थानों के लिए प्राचीनकाल से ही सदैव अगाध श्रद्धा, पूजा तथा एकत्व का भाव रहा है।

समान सांस्कृतिक जीवन मूल्य

राष्ट्रवाद का दूसरा महत्वपूर्ण तत्व समान सांस्कृतिक जीवन मूल्यों को माना गया है। इसमें जीवन के विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं- धर्म, अध्यात्म, अर्थ, राजनीति, भाषा व साहित्य, सभी का गहराई से मंथन किया गया है।

जीवन मूल्यों में धर्म को सर्वोपरि महत्व दिया गया है। धर्म सही अर्थ में न "रिलीजन" है और न ही "मजहब"। धर्म का अर्थ कर्तव्य बताया गया है। धर्म में मतान्तरण, मंदिर या हिंसा से कोई संबंध नहीं है। यह सदैव सकारात्मक तथा मानव के लिए कल्याणकारी है। धर्म व्यक्ति के सम्पूर्ण विकास तथा समाज व्यवस्था के लिए है। राष्ट्र के निर्माण में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। इसे मानव धर्म कहा गया है। इसे सनातन धर्म भी कहा जाता है। सनातन धर्म को शाश्वत धर्म कहा गया है। पं. मदन मोहन मालवीय, महात्मा गांधी, श्री अरविन्द ने सनातन धर्म को बड़ा महत्व दिया है। महर्षि अरविन्द ने लिखा, "हमारे राष्ट्रवाद का अर्थ सनातन धर्म है। सनातन धर्म के साथ हिन्दू राष्ट्र का जन्म हुआ। इसी के साथ पल्लवित पुष्पित हुआ। जब सनातन धर्म का क्षय होता है तो राष्ट्र का भी क्षय होता है।" उन्होंने इसे राष्ट्र की आत्मा बताया। मालवीय जी ने इसे विश्व की सर्वोत्तम वस्तु कहा।

अथर्ववेद में भारतीय राष्ट्र को संतों तथा विद्वानों की निर्मित माना है। यह राजाओं अथवा राजनीतिज्ञों की कृति नहीं है। राज्य बदलते रहते हैं पर राष्ट्र अक्षुण्ण रहता है। भारतीय जीवन में राजनीतिक विकेन्द्रीयकरण तथा शक्ति के विभाजन को सर्वोच्च वरीयता दी है। भारतीय सांस्कृतिक जीवन मूल्यों में अर्थ को भी यथेष्ठ स्थान दिया गया है। अर्थ को जीवन के चार पुरुषार्थों में से एक माना है। यजुर्वेद तथा ईशोपनिषद् में भारत के सांस्कृतिक जीवन मूल्यों में आर्थिक विचारों का निरूपण किया है। एक मंत्र में कहा है-

ईशावास्यमिंद सर्व यÏत्कच जगत्यां जगत। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा:, मा गृध:, कस्य-स्विद्धनम्।।

वस्तुत: इस मंत्र में पांच प्रमुख आर्थिक प्रश्नों को उभारा गया है। यदि मंत्र के अन्त से प्रारंभ की ओर चलें तो पहला प्रश्न है धन का स्वामी कौन है। गंभीर चिंतन के पश्चात धन का स्वामी प्रजापति या प्रजा के रक्षक को बताया है। जो प्रजा की रक्षा न कर सके वह धन का स्वामी नहीं हो सकता। दूसरे प्रश्न में कहा गया कि मनुष्य लालची नहीं चाहिए। आवश्यक धन व्यय करें तथा अपरिग्रह को महत्ता देते हुए उपभोग करें। तीसरे प्रश्न में आवश्यकता से अधिक धन को दान अथवा जनहित कार्यों में लगाने को कहा गया है। चौथे प्रश्न में व्यक्ति से ऊपर समाज को स्थान दिया गया। और पांचवें प्रश्न में कहा कि जो भी प्राप्त है वह ईश्वर की कृपा से है। अत: अर्थ को धर्म तथा नैतिकता के आधार पर प्रयोग करने तथा इसमें व्यक्ति तथा समाज के हितों का समान चिंतन किया गया है।

उपरोक्त सभी सांस्कृतिक जीवन मूल्यों को विभिन्नता में एकता का प्रेरक तथा मार्गदर्शक तत्व बताया गया है। अत: कुल मिलाकर भारत राष्ट्र तथा राष्ट्रवाद मूलत: सांस्कृतिक तथा अध्यात्मिक, सामूहिक तथा विवेकपूर्ण सनातन धर्म (विश्वव्यापी) पर आधारित है। इसकी प्रमुखता सांस्कृतिक तथा सामाजिक है न कि राजनीतिक व आर्थिक, प्रकृति में यह विकासवादी है न कि किसी विशेष परिस्थिति की उपज है। सांस्कृतिक जीवन की यह विचारधारा प्राचीनकाल से वर्तमान तक भारतीयों के मनोभावों को विभिन्न क्षेत्रों में व्यक्त करती रही है। यह सदैव भारतीय जनजीवन में सतत प्रेरणा, स्फूर्ति जागरण के साथ-साथ संघर्ष, त्याग तथा बलिदान के लिए भी प्रेरित कर रही है। इसी भाव को बनाये रखने के लिए आधुनिक काल में भी स्वामी विवेकानन्द, स्वामी रामतीर्थ, महर्षि अरविन्द, लोकमान्य तिलक और बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने निरंतर यशस्वी प्रयत्न किये। इसीलिए कोटि कण्ठों से आज भी एक स्वर निकलता है- भारत माता की जय। द

भारत का आधारभूत तत्व धर्म है : स्वामी विवेकानंद



                            भारत का आधारभूत तत्व धर्म है :स्वामी विवेकानंद

साक्षात्कार 6 फरवरी  1897 को “द हिन्दू” में प्रकाशित
                                          अनुवाद : सुन्दरम आनंद और जयराम विप्लव 
http://janokti.com
    स्वामी जी , आप अमेरिका क्यों गये ?

मुझे लगता है कि संक्षेप में इसका उत्तर दे पाना कठिन है | अभी आंशिक रूप से मैं इतना ही कह सकता हूँ कि मैंने सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया और मैं दूसरे देशों की यात्रा करना चाहता था इसीलिए मैं सुदूर पूर्व से होते हुए अमेरिका गया |
    आपने जापान में क्या देखा ? क्या भारत जापान की प्रगतिशीलता की ओर बढ़ सकता है ?

नहीं , मुझे लगता है जब तक भारत के 30 करोड़ लोग समग्र राष्ट्र की तरह एकजुट ना हो जाएँ तब तक यह संभव नहीं है | विश्व में जापानियों के जैसा राष्ट्रवादी और कलात्मक नस्ल कहीं और नहीं है | जापानियों के सम्बन्ध में एक और विशिष्ट बात मैं कहना चाहूँगा , जहाँ सामान्यतः यूरोप सहित अन्य देशों में कला के साथ-साथ गंदगी देखने को मिलती है वहीँ जापान में कला का अर्थ कला और शुद्धता का सम्मिलन है | मेरे विचार से हमारे देश के हर युवा को अपने जीवन में कम से कम एक बार जापान अवश्य जाना चाहिए |

    क्या आपके विचार से भारत को जापान जैसा बनना चाहिए ?

निस्संदेह नहीं ! भारत को वैसा ही होना चाहिए जैसा वह सदैव रहा है | भारत जापान या औरों की तरह कैसे हो सकता है ! जिस प्रकार संगीत में एक मुख्य राग होता है , एक केन्द्रीय भाव होता है जिसपर सारी स्वर लहरी निर्भर होती है उसी प्रकार प्रत्येक राष्ट्र का एक आधारभूत तत्व होता है जिस पर बाकी सब कुछ निर्भर करता है | भारत का आधारभूत तत्व ‘धर्म’ है | समाज सुधार और अन्य परिवर्तनकारी प्रक्रियाएं उसी पर आधारित हैं |

अतः भारत जापान नहीं हो सकता | कहा जाता है कि जब ह्रदय पर आघात होता है तो विचारों का प्रवाह होता है | भारत के ह्रदय पर निश्चित रूप से आघात होगा और परिणामस्वरूप आध्यात्मिकता का प्रवाह सामने आएगा | भारत भारत है | हम जापानियों की तरह नहीं है , हम हिन्दू हैं | भारत का वातावरण वात्सल्यमय (ममतामय) है | यहाँ निरंतर परिश्रम के बीच मुझे आराम भी मिलता रहा है | भारत में केवल आध्यात्मिक कर्मों द्वारा ही शांति पाई जा सकती है | अगर आप केवल भौतिक कर्मों में ही लिप्त रहेंगे तो परिणति केवल और केवल दुःख ही होगा |

    विश्व धर्म संसद के परिणामों के बारे में आपके क्या विचार हैं ?

मुझे ऐसा लगता है कि विश्व धर्म संसद प्राचीन धर्मों के नकारात्मक स्वरुप को संसार के सामने प्रस्तुत करने के उद्देश्य से आयोजित किया गया था | लेकिन अंततः वहां प्राचीन धर्मों का सकारात्मक स्वरुप ही उभर कर सामने आया |

कुल मिलाकर इसाई धर्म के दृष्टिकोण से धर्म संसद एक असफलता के रूप में सामने आया | ऐसा देखा जा रहा है कि जो रोमन कैथोलिक इस धर्म संसद के आयोजक थे वही पेरिस में प्रस्तावित अगली धर्म संसद का लगातार विरोध कर रहे हैं | किन्तु शिकागो धर्म संसद भारतीय मनीषा और भारत के लिए ऐतिहासिक रूप से सफल रहा | यहीं से वेदान्त के विचारों को वैश्विक मंच पर एक नई प्रतिष्ठा मिली | कुछ धर्मांध तत्वों को छोड़कर अन्य सभी अमेरिकी धर्म संसद के परिणामों से काफी प्रसन्न हैं |

    स्वामी जी , इंग्लैण्ड में आपके मिशन के विस्तार की क्या संभावनाएं हैं ?

व्यापक संभावनाएं हैं | आने वाले थोड़े समय में ही बड़ी संख्या में अंग्रेज लोग वेदान्त का अनुसरण करने लगेंगे | इंग्लैण्ड में अमेरिका से अधिक संभावनाएं हैं | आप पायेंगे कि अमेरिकी लोग अंग्रेजों की तुलना में आत्माभिमानी होते हैं | यहाँ तक कि इसाई भी वेदान्त को समझे बिना न्यू टेस्टामेंट को नहीं समझ सकते | वेदान्त हर धर्म का मूल है | वेदान्त के बिना हर धर्म एक अंधविश्वास है और वेदान्त के सम्मिश्रण से सबकुछ धर्म बन जाता है |

    भारतीय जनमानस के सम्बन्ध में आपकी क्या राय है ?

ओह ! हमारे यहाँ के लोग अत्यंत गरीब हैं और पंथनिरपेक्ष चीजों के सन्दर्भ में उनकी जानकारी कम है | हमारे यहाँ के लोग बहुत अच्छे हैं क्योंकि यहाँ गरीबी कोई अपराध नहीं है | हमारे लोग हिंसक नहीं है | अपने पहनावे के कारण मैं अमेरिका और इंग्लैण्ड में कई बार लुटते–लुटते बचा हूँ | परन्तु भारत में मैंने  वेश-भूषा के कारण किसी के लुटने की घटना नहीं सुनी है | हर प्रकार से भारतीय जनमानस यूरोप के लोगों से कहीं अधिक सभ्य है |

    भारतीयों की स्थिति में सुधार के लिए आपका क्या सझाव है ?

हमें पंथनिरपेक्ष शिक्षा की व्यवस्था करनी होगी | शनै: शनै: मूल्यों को समाविष्ट करने की अपने पूर्वजों की परंपरा का पालन दृढ़ता से करने की आवश्यकता है | हमें उन्हें सोते से जगाना होगा और समानता की ओर प्रेरित करना होगा | धर्म के माध्यम से पंथनिरपेक्ष ज्ञान की गंगा बहानी होगी |

    स्वामी जी , क्या आपको लगता है कि यह इतना आसान होगा ?

निश्चित रूप से इसके लिए सतत प्रयत्नों की आवश्यकता है | यदि मुझे आत्मबलिदानी युवाओं का साथ मिले तो उम्मीद है यह काम शीघ्र हो सकता है | यह सब उत्साह और आत्मबलिदान द्वारा ही संभव है |

    स्वामी जी , अगर वर्तमान दयनीय दशा उनके पूर्व कर्मों का परिणाम है तब आप उनकी मदद कैसे करेंगे ?

कर्म मानवीय स्वतंत्रता की अमर व्याख्या है | अगर हम कर्म के कारण बुरी दशा में हैं तो निश्चित रूप से उस दशा से उबरने का सामर्थ्य भी हमारे भीतर निहित है | और हमारे लोगों की यह दयनीय दशा केवल उनके कर्मों का ही परिणाम नहीं है | इसलिए हमें उन्हें काम करने के लिए उपयुक्त वातावरण प्रदान करना होगा |

वर्ण व्यवस्था एक अच्छी चीज है | वर्ण एक ऐसी योजना है जिसका हम पालन करना चाहते हैं | वास्तव में वर्ण क्या है , अधिकाँश लोगों को इसकी समझ नहीं है | विश्व में कोई भी ऐसा देश नहीं है जहाँ वर्ण विभेद नहीं है | भारत में हम वर्ण व्यवस्था के द्वारा वहां पहुँचते हैं जहाँ वर्णों में कोई विभेद नहीं रह जाता  | वस्तुतः वर्ण व्यवस्था इसी मूलभूत सिद्धांत पर आधारित है | यह भारत में प्रत्येक व्यक्ति को ब्राहमण में परिणत करने की योजना है , वह ब्राह्मण जो मानवता का आदर्श है | अगर आप भारत के इतिहास का अध्ययन करें तो पायेंगे कि यहाँ सदैव पिछड़े वर्गों के उत्थान के प्रयास होते रहे हैं | कई ऐसे वर्ग हैं जिनका उत्थान हुआ है | और आगे भी यह प्रक्रिया चलती रहेगी | बिना किसी को नीचा किये, हमें उत्थान की यह प्रक्रिया आगे बढानी है | और अधिकांशतः ऐसा ब्राह्मणों के द्वारा स्वतः होगा |

    वर्ण और रिवाजों के सम्बन्ध को लेकर आपकी क्या राय है , स्वामी जी ?

विविध रूपों में वर्ण और परम्पराएँ निरंतर परिवर्तित होती रही हैं | अगर कुछ अपरिवर्तित रहता है तो वह है “ तत्व और सिद्धांत “ | वेदों में वर्णित है कि हमें अपने धर्म का अध्ययन करना चाहिए | अपवादस्वरूप वेदों को छोड़कर अन्य सभी ग्रन्थ निश्चित रूप से बदलने चाहिए | वेदों की प्रभुसत्ता सार्वभौमिक है, जबकि अन्य ग्रंथों की एक नियत कालखंड के लिए है | उदहारणस्वरुप , एक ‘स्मृति’, एक अवधि के लिए शक्तिशाली होती है और दूसरी ‘स्मृति’, दूसरी समयावधि के लिए | महान संत हमेशा से आते रहे हैं और रास्ता दिखाने का काम करते रहे हैं | कुछ विभूतियों ने निम्न वर्गों के लिए काम किया है तो माधव जैसे संतों ने महिलाओं को वेद पढने का अधिकार दिलाया है | वर्ण व्यवस्था समाप्त नहीं होनी चाहिए | परन्तु यदा कदा पुनर्व्यवस्थित होती रहनी चाहिए | पुरानी संरचना के भीतर हजारों नए निर्माण की सम्भावना रहती है | वर्ण व्यवस्था के उन्मूलन की मंशा मूर्खता मात्र है | नई पद्धति वस्तुतः पुरानी पद्धति का ही परिमार्जित विकास हुआ करती है |

व्यवहारिकता से कोई सम्बन्ध न रखने वाले आदर्शवादी  सुधारों के पीछे अपनी उर्जा व्यर्थ करने के बजाय हमें समाज में व्याप्त बुराईयों के मूल तक जाना होगा और एक विधायी संस्था बनानी होगी | कहने का अर्थ है कि पहले हमें लोगों को शिक्षित करना होगा ताकि वे अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं करने में सक्षम हो सकें | और जब तक ऐसा नहीं किया जाता है तब तक ये सारे आदर्शवादी सुधार केवल आदर्श ही बने रहेंगे |

    क्या आपको लगता है हिन्दू समाज यूरोपीय सामाजिक नियमों को सफलतापूर्वक अपना सकता है ?

नहीं , पूर्णत: नहीं , मेरे विचार से बाह्य यूरोपीय शक्तियों  द्वारा प्रस्तुत यूनानी मनीषा और हिन्दू आध्यात्मिकता का संयोग भारतीय समाज के लिए आदर्श होगा | द्रष्टव्य के रूप में यह हमारे लिए अतिआवश्यक है | निरर्थक आदर्शों के पीछे अपनी समय और उर्जा नष्ट करने के बजाय हमें अंग्रेजों से अनुशासन, आत्मविश्वास , आपसी आत्मीयता का पाठ सीखना होगा |

    स्वामी जी ! धर्म में परम्पराओं का क्या स्थान  है ?

परम्परा धर्म की प्राथमिक पाठशाला है | विश्व की यथा-स्थिति के लिए परम्पराएँ अतिआवश्यक हैं | हमें केवल लोगों के बीच नई और ताजा परम्पराओं का संचार करना होगा | विचारकों को निश्चित रूप से इस कर्तव्य का निर्वहन करना चाहिए | पुरानी मान्यताओं के स्थान पर नई परम्पराओं को प्रतिष्ठित करते  रहना  चाहिए |

    तो क्या आप परम्पराओं को समाप्त करने की वकालत नहीं करते ?

नहीं , मेरा आशय विध्वंसात्मक नहीं बल्कि रचनात्मक है | तमाम प्रचलित परम्पराओं के बीच ही नई परम्पराओं का उदभव होते रहना चाहिए | मेरी  मान्यता है कि हर चीज में विकास की असीम शक्तियां निहित हैं | हर कण में पूरी सृष्टि की शक्ति समाहित है | पूरे हिन्दू धर्म के इतिहास में विध्वंस के बजाय निर्माण के उद्धरण मिलते हैं | बौद्ध मत के रूप में एक संप्रदाय ने निर्माण की इस अवधारणा को खंडित करने का प्रयास किया और वे भारत में नकार दिए गए | हमारे यहाँ शंकराचार्य , रामानुज, माधव और चैतन्य जैसे  धर्म – सुधारकों की एक लम्बी परंपरा रही  है | ये सभी  महान सुधारक थे जिन्होंने  हमेशा निर्माण का रास्ता अपनाया और परिस्थितियों के अनुरूप परिष्करण का प्रयास किया | यही हमारे कार्यशैली की विशिष्टता रही है | जिन आधुनिक सुधारकों ने विध्वंसात्मक सुधारों की यूरोपीय शैली को अपनाया है उनसे न कभी किसी का भला हुआ है और न होगा |

हिन्दुओं की विकास यात्रा वेदांत के आदर्शों के साकार होने की यात्रा है | सौभाग्य और दुर्भाग्य से गुजरते हुए भारतीय जन–जीवन का पूरा इतिहास ही वेदांत के आदर्शों को साकार करने के लिए संघर्ष, का इतिहास है |