रविवार, 25 जनवरी 2015

नेहरूजी ने गणतंत्र दिवस परेड में संघ के स्वयंसेवकों को आमंत्रित किया था



गणतंत्र दिवस परेड में स्वंय सेवक
इतिहास के झरोखे से -
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राष्ट्र हितैषी भूमिका
  http://www.krantidoot.in/2014/11/blog-post_30.html 
नेहरू जी के विशेष आग्रह पर 1963 में गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेते संघ स्वयंसेवक

सामान्यतः आज की पीढ़ी के अधिकाँश लोगों को ज्ञात नही है कि 1962 में भारत चीन युद्ध के समय आरएसएस स्वयंसेवकों द्वारा भारतीय सशस्त्र सेनाओं की जो सहायता की गई उसके आभार स्वरुप 1963 में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. जवाहर लाल नेहरू ने गणतंत्र दिवस की परेड में आर एस एस को आमंत्रित किया था |
1962 में चीन युद्ध के दौरान आरएसएस के स्वयंसेवक व्यापक तौर पर सरकारी कार्यों में सहयोग और विशेष रूप से जवानों के लिए समर्थन जुटाने में जुट गए थे | पंडित नेहरू ने 26 जनवरी 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए संघ को आकस्मिक रूप से आमंत्रित किया किन्तु एक मात्र दो दिन की सूचना पर 3500 से अधिक स्वयंसेवकों ने पूर्ण संघ गणवेश में परेड में भाग लिया जोकि मार्च कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण बन गया | बाद में कुछ कांग्रेसी नेताओं ने संघ को निमंत्रित किये जाने के पंडित नेहरू के निर्णय पर आपत्ति जताई तो उन आपत्तियों को दरकिनार कर नेहरू जी ने कहा कि सभी देशभक्त नागरिकों को परेड में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया था |
श्री जवाहर लाल नेहरू ने आरएसएस स्वयंसेवकों की भावना को देखते हुए यहां तक कहा कि “यह दर्शाने के लिए कि केवल लाठी के बल पर भी सफलतापूर्वक बम और चीनी सशस्त्र बलों से लड़ा सकता है, विशेष रूप से 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए आरएसएस को आकस्मिक आमंत्रित किया गया !”
इन दिनों कांग्रेस और अन्य छद्म धर्मनिरपेक्ष नेताओं के बीच एक फैशन सा है कि लोगों को आरएसएस और संघ परिवार के बारे में मिथ्या प्रचार करो कि वे नफरत फैलाते हैं, सांप्रदायिक तनाव पैदा करते है और समाज को विभाजित करते हैं |
दुनिया के सबसे बड़े और सबसे सम्मानित स्वयंसेवी संगठन के खिलाफ जहर उगलने से पहले इन तथाकथित छद्म धर्मनिरपेक्ष नेताओं को भारत के इतिहास को पढ़ना चाहिए | महात्मा गांधी की हत्या के मामले में भी कानून की अदालत में स्पष्ट तौर पर कहा गया कि यह एक व्यक्ति का दुष्कृत्य था तथा इसके पीछे कोई संगठन नही जुड़े थे | उन्हें पता होना चाहिए कि उनके अपने आदर्श और नायक आरएसएस का सम्मान करते रहे हैं तथा उन्होंने समय समय पर संघ की प्रशंसा भी की है |
सन 1934 में जब गांधी जी वर्धा में आयोजित 1500 संघ स्वयंसेवकों के एक शिविर में पहुंचे तब यह देखकर आश्चर्यचकित रह गए कि स्वयंसेवक एक दूसरे की जाति से अनजान थे | वहां अस्पृश्यता जैसी कोई चर्चा ही नहीं थी | इस अनुभव ने गांधी जी को इतना अधिक प्रभावित किया ने 13 साल बाद भी उन्होंने इसे स्मरण रखा तथा इसका उल्लेख किया | 16 सितंबर 1947 को दिल्ली की भंगी कालोनी में संघ के कार्यकर्ताओं के समक्ष अपने संबोधन में उन्होंने कहा था कि “जब संघ संस्थापक श्री हेडगेवार जिंदा थे, मैंने आरएसएस के शिविर का दौरा किया था तथा अनुशासन, अस्पृश्यता के पूर्ण अभाव और कठोर सादगी से प्रभावित हुआ था | तब से मैं मानता हूँ कि संघ सेवा और आत्म बलिदान के उच्च आदर्श से प्रेरित है, जो किसी भी संगठन की ताकत होता है" (हिंदू : 17 सितंबर, 1947 ) .
डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर 1939 में पुणे में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग में गए तो वे भी इस द्रश्य से आश्चर्यचकित रह गए कि वहां स्वयंसेवक बिना एक दूसरे की जाति पता किये पूर्ण समानता और भाईचारे के साथ रह रहे हैं | जब उन्होंने डॉ. हेडगेवार से पूछा कि शिविर में कितने अछूत हैं तो उन्होंने उत्तर दिया कि यहाँ केवल हिन्दू हैं, न तो स्पर्श्य न अस्पर्श्य | यहाँ छूत - अछूत का कोई विचार नहीं करता |
विभाजन के बाद कश्मीर के महाराजा एक स्वतंत्र राज्य के रूप में कश्मीर को बनाए रखने के इच्छुक थे | सरदार वल्लभ भाई पटेल ने भारत में शामिल होने के लिए महाराजा को समझाने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गुरु गोलवलकर को भेजा था | श्रीगुरुजी 17 अक्टूबर 1947 को वायुयान द्वारा श्रीनगर पहुंचे | श्री गुरुजी के साथ विचार विमर्श के बाद अंततः महाराजा ने भारत के साथ विलयपत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए सहमति दी | श्रीगुरुजी ने 19 अक्टूबर को नई दिल्ली लौटकर विलय हेतु महाराजा की सहमति के सम्बन्ध में सरदार पटेल को सूचना दी |
विभाजन के बाद दिल्ली मुस्लिम लीग द्वारा हिंसा और साजिशों की चपेट में था | महान विद्वान और भारत रत्न पुरस्कार से सम्मानित डा. भगवान दास ने उन संकटपूर्ण दिनों में आरएसएस की भूमिका का विवरण पता करने का प्रयत्न किया | 16 अक्टूबर 1948 को उन्होंने लिखा कि " मुझे विश्वस्त रूप से ज्ञात हुआ है कि आरएसएस के स्वयंसेवकों ने सरदार पटेल और नेहरू जी को सूचित किया कि ` लीगियों ने सरकार के सभी सदस्यों और सभी हिंदू अधिकारियों के साथ हजारों हिन्दुओं की हत्याकर 10 सितंबर 1947 को तख्ता पलट की योजना बनाई है तथा उनका इरादा लाल किले पर पाकिस्तान का झंडा फहराकर समूचे हिन्दुस्थान को सीज कर देने का है |
उन्होंने आगे कहा कि मैं यह सब क्यों कह रहा हूँ ? यदि उन उत्साही और आत्माहुति को तत्पर युवाओं ने नेहरू जी और पटेल जी को समय पर सूचना नहीं दी होती तो आज कोई भारत सरकार ही नहीं होती | सम्पूर्ण देश का नाम बदलकर पाकिस्तान हो गया होता | करोड़ों हिन्दू काट दिए जाते और शेष इस्लाम स्वीकारने या गुलामी करने के लिए विवश होते |
कांग्रेस नेताओं ने कब कब क्या कहा था ?
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन विदेशी गणमान्य व्यक्तियों के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ आरएसएस शाखा में पहुंचे जो भारी भारी बारिश के बावजूद चल रही थी | शाखा में शामिल अनुसंधान विद्वानों , व्याख्याताओं , ग्रेजुएट और स्नातकोत्तर छात्रों से मिलकर आगंतुक और राधाकृष्णन बेहद खुश और प्रभावित हुए |

सर्वप्रमुख घटना है जब गांधीजी ने मीरा बेन और महादेव देसाई के साथ वर्धा में 24 दिसंबर, 1934 को एक आरएसएस शिविर का दौरा किया | उनके सम्मान में आयोजित परेड देखने पर , उन्होंने कहा: " मैं काफी खुश हूँ | मैंने इसके पहले देश में कहीं इस प्रकार का द्रश्य नहीं देखा है |"वे इस बात से अत्यंत प्रभावित हुए कि शिवर में न तो जाति भेद है और न अस्पृश्यता | अपनी यात्रा के अंत में उन्होंने घोषित किया कि जो कुछ उन्होंने आरएसएस में देखा बैसा इसके पूर्व कहीं नहीं देखा |
" आप हर द्रष्टि से उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं | अगर कोई कमी है तो केवल यह कि यह संगठन " अन्य धर्मों के लोगों को स्वीकार नहीं करता है” | गांधी जी के आमंत्रण पर अगले दिन डॉ. हेडगेवार वर्धा पहुंचे और गांधी जी के सभी प्रश्नों का उत्तर दिया और संगठन के बारे में उठाये गए मुद्दों को स्पष्ट किया |
मैंने आरएसएस के शिविर का दौरा किया था और उनके अनुशासन और अस्पृश्यता के पूर्ण अभाव से प्रभावित हुआ था | - आरएसएस रैली में महात्मा गांधी , दिल्ली 1947/09/16
कांग्रेस में जो लोग सत्ता में हैं वे सोचते हैं कि वे अपने प्रभाव से आरएसएस को कुचलने में सक्षम हैं | किन्तु आप डंडे के जोर से आरएसएस जैसे संगठन को नहीं दबा सकते हैं बैसे भी आरएसएस डंडे का उपयोग राष्ट्र की रक्षा के लिए करता है | अंततः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक महान देशभक्त हैं | वे अपने देश से प्यार करते है | - 16 जनवरी 1948 को लखनऊ की एक सार्वजनिक सभा में सरदार वल्लभ भाई पटेल

मैं अचंभित हूँ कि स्वयंसेवक दूसरों की जाति पता किये बिना पूर्ण समानता और भाईचारे के साथ आगे बढ़ रहे हैं | - पुणे शिविर में बाबा साहेब अंबेडकर, मई 1939

20 नवंबर, 1949 को डॉ. जाकिर हुसैन ने मुंगेर की एक मिलाद महफ़िल में कहा कि " मुसलमानों के विरुद्ध हिंसा और घृणा फैलाने के जो आरोप आरएसएस के विरुद्ध लगाए जाते हैं, पूरी तरह गलत हैं | मुसलमानों को आरएसएस से आपसी प्यार का सबक, पारस्परिक सहयोग और संगठन सीखना चाहिए " | - डॉ. जाकिर हुसैन
3 नवंबर 1977 को पटना में आयोजित आरएसएस के प्रशिक्षण शिविर में जयप्रकाश नारायण ने कहा, " इस क्रांतिकारी संगठन ने एक नया भारत बनाने की जिस चुनौती को हाथ में लिया गया है उससे मुझे महान उम्मीद है | मैं पूरे दिल से आपके उद्यम का स्वागत करता हूँ |".............आपका क्रांतिकारी संगठन सामाजिक परिवर्तन के क्षेत्र में अग्रणी है | तुममें अकेले जातिवाद समाप्त करने और गरीब की आँखों से आँसू पोंछने की क्षमता है |
आरएसएस का नाम पूरे देश में नि: स्वार्थ सेवा के लिए एक सुपरिचित शब्द है | - कोका सुब्बा राव , सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट . भारत , 1968/08/25
आरएसएस ने पंजाब , दिल्ली और अन्य स्थानों पर इंदिरा गांधी की हत्या के पहले और बाद में हिंदू सिख एकता को बनाए रखने में एक सम्मानजनक भूमिका निभाई है . - रविवार कॉलम में सरदार खुशवंत सिंह
भ्रष्टाचार से ध्यान हटाने के लिए कांग्रेस के नेताओं द्वारा आरएसएस की छवि धूमिल करने के प्रयास कोई आश्चर्य की बात नहीं है | लंबे वर्षों से स्वयंभू छद्म धर्मनिरपेक्ष राजनेता एक सांप्रदायिक संगठन के रूप में आरएसएस की आलोचना करते रहे हैं | आलोचकों को पहले प्रमुख लोगों द्वारा पूर्व में व्यक्त किये विचारों को जानने की जहमत उठाना चाहिए |
1967 के आम चुनाव के बाद से आरएसएस को हव्वा बताकर मुसलमानों को जताया जाता है कि आलोचक ही धर्मनिरपेक्षतावादी हैं जबकि आज भी मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के बेनर तले राष्ट्रभक्त मुसलमान संघ स्वयंसेवकों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर देश और समाजहित में कार्य कर रहे हैं |

एटमी डील को लेकर मतभेद दूर : मोदी-ओबामा ने लिखा नया अध्याय



पीएम नरेंद्र मोदी से हाथ मिलाते अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा
मोदी-ओबामा ने लिखा रिश्ते का नया अध्याय, एटमी डील को लेकर सारे मतभेद दूर
aajtak.in [Edited By: अमरेश सौरभ] | नई दिल्ली, 25 जनवरी 2015
http://aajtak.intoday.in/story/narendra-modi-and-barack-obama-joint-statement-after-bilateral-talks-1-796772.html
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ मिलकर दोनों देशों के बीच रिश्ते को नई बुलंदी तक पहुंचा दिया है. भारत और अमेरिका के बीच न्यूक्लियर डील पर फंसा पेच अब खत्म हो गया है. इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की दावेदारी को अमेरिका का समर्थन मिल गया है. अमेरिका रक्षा क्षेत्र में भी भारत की मदद करने को तैयार है. एटमी डील पर आगे बढ़ेंगे भारत और अमेरिका

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि हाल के दिनों में भारत और अमेरिका के बीच रिश्ते में नया उत्साह और भरोसा पैदा हुआ है. उन्होंने कहा कि इस रिश्ते की सफलता से हमारी तरक्की होगी और दुनिया में भी स्थ‍िरता और संपन्नता बढ़ेगी.

अमेरिका से परमाणु करार की बाधा दूर
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से बातचीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि छह साल पहले हुए असैन्य परमाणु करार को लेकर अब दोनों अपने कानून, अपनी अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही, तकनीकी व वाणिज्यिक सहयोग की दिशा में बढ़ रहे हैं. साथ ही दोनों देश आतंकवाद से लड़ने के लिए व्यापक रणनीति की जरूरत पर सहमत हुए हैं.

मोदी ने कहा, ‘मुझे खुशी है कि हम छह साल पहले हुए अपने द्विपक्षीय समझौते (असैन्य परमाणु करार) को लेकर आगे बढ़ रहे हैं.’ उन्होंने कहा कि असैन्य परमाणु करार हमारे बदलते रिश्तों का एक केंद्र बिन्दु और एक नए विश्वास का प्रतीक भी है. पिछले चार महीनों में हमने इसे आगे ले जाने पर दृढ़ता से काम किया है.'


आतंकवाद के ख‍िलाफ भारत-अमेरिका
मोदी ने कहा, ‘आतंकवाद पूरी दुनिया के लिए खतरा बना हुआ है. आतंकवाद की मौजूदा चुनौतियां बने रहने के बीच यह एक नया रूप रूप ले रहा है. हम इस बात पर सहमत हुए हैं कि हमें इससे लड़ने के लिए एक व्यापक रणनीति और नजरिया अपनाने की जरूरत है.’

प्रधानमंत्री ने साथ ही इस बात पर भी जोर दिया कि आतंकी गुटों के बीच कोई भेद नहीं किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा, ‘हर देश आतंकी पनाहगाहों को खत्म करने और आतंकियों को न्याय के कटघरे में लाने की अपनी प्रतिबद्धताओं को अवश्य पूरा करे.’

उन्होंने कहा, ‘हम दोनों देश आतंकी समूहों के खिलाफ अपने द्विपक्षीय सुरक्षा सहयोग को और गहरा करेंगे. हम अपनी आतंकवाद विरोधी क्षमताओं को और मजबूत बनाएंगे, जिसमें प्रौद्योगिकी का क्षेत्र भी शामिल है.’

जलवायु परिवर्तन पर बोले मोदी- भारत पर दबाव नहीं
जलवायु परिवर्तन को लेकर दोनों देशों के बीच सहमति के बारे में पूछे जाने पर प्रधानमंत्री ने कहा कि चीन और अमेरिका के बीच जलवायु परिवर्तन को लेकर जो समझौता हुआ है, उसका भारत पर दबाव नहीं पड़ेगा. भारत एक सम्प्रभु देश है और उस पर किसी देश या व्यक्ति का दबाव नहीं आता है. उन्होंने कहा, ‘हां, यह दबाव जरूर है कि भावी पीढ़ी को हम कैसी पृथ्वी देना चाहते हैं. जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग बहुत बड़ा विषय है. जिनके मन में भावी पीढ़ी को लेकर चिंताएं हैं, उनका दायित्व है कि वे इसके प्रति सचेत बने.’ उन्होंने कहा कि यह दबाव हर सरकार, हर देश और हर व्यक्ति पर होना चाहिए और उसी दबाव पर हम अपनी भूमिका निभा रहे हैं

दिल्ली के हैदराबाद हाउस में मीडिया के सामने ओबामा का शुक्रिया अदा करते हुए मोदी ने कहा, 'यह हमारे के लिए खुशी की बात है कि आपने हमारा न्योता कबूल किया. हाल के महीनों में भारत और अमेरिका के बीच रिश्ते में सकारात्मक बदलाव आया है. आपसी रिश्ते की कामयाबी से पूरी दुनिया में खुशहाली आएगी.'

PM मोदी ने साफ किया कि अमेरिका के साथ भारत का रिश्ता कभी भी शक में घेरे में नहीं था. उन्होंने कहा, 'हमें एक अच्छी शुरुआत को लंबे समय तक चलने वाली तरक्की के रूप में बदलना होगा. अगले कुछ सालों में हम इन समझौतों को और ऊंचाई पर ले जाएंगे'

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का जिक्र करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत को यह सीट दिलाने का भरोसा दिलाया है.

दोनों देशों के बीच समझौतों का जिक्र करते हुए मोदी ने कहा, 'डिजि‍टल युग में हमें नए तरीके से आगे बढ़ना होगा. हम समुद्री सुरक्षा को लेकर भी समझौते की तरफ आगे बढ़े हैं. हमने सामरिक तौर पर भी साथ आने की बात की.'

मोदी ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ आतंकवाद को खत्म करने के लिए और आतंकवाद को पनाह मिलने वाली जगह को खत्म करने पर बात हुई. आतंकवाद निरोध पर भी चर्चा हुई.

PM ने कहा कि अर्थव्यवस्था व व्यापार को लेकर हम अमेरिका के साथ आगे बढ़े हैं. मोदी ने डिजिटल टेक्नोलॉजी, अक्षय ऊर्जा पर भी साथ काम करने का भरोसा जताया.

'हॉटलाइन' से बढ़ेगी रिश्ते में गरमाहट
दोनों देशों ने अमेरिकी राष्ट्रपति और भारतीय प्रधानमंत्री, साथ ही दोनों ओर के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच ‘हॉटलाइन’ स्थापित करने पर सहमति जताई. प्रधानमंत्री ने बताया कि दोनों देशों ने अपने बढ़ते रक्षा सहयोग को एक नये स्तर तक ले जाने का भी निर्णय किया है. उन्होंने कहा, ‘हमने अत्याधुनिक रक्षा परियोजनाओं के लिए भी सिद्धांत के तौर सहमति जताई है. इससे हमारे घरेलू रक्षा उद्योगों की तरक्की में मदद मिलेगी.’

भारत के साथ रिश्ता टॉप प्रायोरिटी पर: बराक ओबामा
बराक ओबामा ने अपने संबोधन में कहा कि अमेरिका के लिए भारत के साथ रिश्ता टॉप प्रायोरिटी पर है. ओबामा ने कहा, 'हम दोनों देश दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था हैं. अमेरिका में लाखों भारतीय रहते हैं. हमारे रिश्ते बेहद गहरे हैं.'

ओबामा ने कहा, 'जिस देश में अर्थव्यवस्था मजबूत होती है और सरकार मजबूत होती है, वहां आतंकवाद जड़ें नहीं जमा पाता है.' उन्होंने आतंकवाद के ख‍िलाफ मिलकर लड़ने की बात कही.

ओबामा ने इकोनॉमी का जिक्र करते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच व्यापार लगातार बढ़ रहा है. उन्होंने कहा कि हमारे बीच सामरिक अभ्यास भी बढ़े हैं.

एनर्जी सेक्टर में भारत की तरक्की को स्वीकारते हुए ओबामा ने कहा कि भारत तेजी से स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ रहा है. उन्होंने कहा कि अमेरिका भारतीय शहरों में स्वच्छ हवा के लिए मिलकर प्रोजेक्ट शुरू करेगा.

ओबामा ने आगे की योजना के बारे में कहा, 'एश‍िया पैसिफिक के लिए दोनों ही देशों ने प्लान तैयार किया है.' उन्होंने अफगानिस्तान में सहयोग के लिए भारत को शुक्रिया कहा.

दिलचस्प बात यह रही कि ओबामा ने 'नमस्कार' शब्द के साथ सभी का अभ‍िवादन किया. उन्होंने भारत में गणतंत्र दिवस पर चीफ गेस्ट के तौर पर बुलाने के लिए पीएम मोदी के प्रति आभार जताया.

ओबामा ने कहा, मोदी मुझसे कम सोते हैं



साझा बयान जारी करते राष्ट्रपति ओबामा ओर प्रधानमंत्री मोदी
                                 aajtak.in [Edited By: स्वपनल सोनल] | नई दिल्ली, 25 जनवरी 2015
http://aajtak.intoday.in
रविवार सुबह पालम एयरपोर्ट पर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गले लगाया. हैदराबाद हाउस में चाय की केतली की गर्माहट दोनों के रिश्तों में घुलती दिखी, तो साझा बयान के दौरान प्रधानमंत्री ने ओबामा के साथ दोस्ती की नई केमिस्ट्री पर खुशी जताई. दोनों नेताओं के बीच रिश्तों की यह इबारत और भी पक्की तब हुई, जब ओबामा ने हंसी-ठिठोली में सही, यह जता दिया कि दोनों आपस में राजनीति से इतर आपसी मुद्दों पर, यहां तक कि सोने की आदतों पर भी चर्चा करते हैं.

हैदराबाद हाउस में साझा बयान के दौरान एक सवाल का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि उनमें और बराक ओबामा में अच्छी दोस्ती हो गई है और दोनों के बीच जो बातचीत हुई है, उसे पर्दे में ही रहने देना बेहतर है. मोदी ने कहा, 'मैं और बराक अब अच्छे दोस्त हो गए हैं. हमने कई मुद्दों पर बातचीत की, जिन्हें पर्दे में रहने दिया जाए, तो अच्छा है. हमने आपस में मजाक भी साझा करते हैं.'

दूसरी ओर, बराक ओबामा ने पीएम की बात पर स‍हमति जताते हुए कहा, 'यह सच है कि हमने कई मुद्दों पर बात की. हमने यह भी बात की कि कौन कितना सोता है और मुझे प्रधानमंत्री ने बताया कि वह मुझसे भी कम सोते हैं. हालांकि इसका एक कारण यह हो सकता है कि वह अभी नए हैं. मुझे लगता है जब उन्हें भी शासन करते हुए 6 साल हो जाएंगे, तो उनकी नींद एक घंटे बढ़ जाएगी.'

राष्ट्र ध्वज



                                                           हिंदू भगवा ध्वज

http://www.ugtabharat.com 

विजय कुमार सिंघल
भगवा ध्वज हिन्दू संस्कृति और धर्म का शाश्वत प्रतीक है। यह हिन्दू धर्म के प्रत्येक आश्रम, मन्दिर पर फहराया जाता है। यही श्रीराम, श्रीकृष्ण और अर्जुन के रथों पर फहराया जाता था और छत्रपति शिवाजी सहित सभी मराठों की सेनाओं का भी यही ध्वज था। यह धर्म, समृद्धि, विकास, अस्मिता, ज्ञान और विशिष्टता का प्रतीक है। इन अनेक गुणों या वस्तुओं का सम्मिलित द्योतक है अपना यह भगवा ध्वज।
भगवा ध्वज का रंग केसरिया है। यह उगते हुए सूर्य का रंग है। इसका रंग अधर्म के अंधकार को दूर करके धर्म का प्रकाश फैलाने का संदेश देता है। यह हमें आलस्य और निद्रा को त्यागकर उठ खड़े होने और अपने कर्तव्य में लग जाने की भी प्रेरणा देता है। यह हमें यह भी सिखाता है कि जिस प्रकार सूर्य
स्वयं दिनभर जलकर सबको प्रकाश देता है, इसी प्रकार हम भी निस्वार्थ भाव से सभी प्राणियों की नित्य और अखंड सेवा करें।
यह यज्ञ की ज्वाला का भी रंग है। यज्ञ सभी कर्मों में श्रेष्ठतम कर्म बताया गया है। यह आन्तरिक और बाह्य पवित्रता, त्याग, वीरता, बलिदान और समस्त मानवीय मूल्यों का प्रतीक है, जो कि हिन्दू धर्म के आधार हैं। यह केसरिया रंग हमें यह भी याद दिलाता है कि केसर की तरह ही हम इस संसार को महकायें।
भगवा ध्वज में दो त्रिभुज हैं, जो यज्ञ की ज्वालाओं के प्रतीक हैं। ऊपर वाला त्रिभुज नीचे वाले त्रिभुज से कुछ छोटा है। ये त्रिभुज संसार में विविधता, सहिष्णुता, भिन्नता, असमानता और सांमजस्य के प्रतीक हैं।
ये हमें सिखाते हैं कि संसार में शान्ति बनाये रखने के लिए एक दूसरे के प्रति सांमजस्य,
सहअस्तित्व, सहकार, सद्भाव और सहयोग भावना होना आवश्यक है।
भगवा ध्वज दीर्घकाल से हमारे इतिहास का मूक साक्षी रहा है। इसमें हमारे पूर्वजों, ऋषियों और माताओं के तप की कहानियां छिपी हुई हैं। यही हमारा सबसे बड़ा गुरु, मार्गदर्शक और प्रेरक है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने किसी व्यक्ति विशेष को अपना गुरु नहीं माना है, बल्कि अपने परम पवित्र भगवा ध्वज को ही गुरु के रूप में स्वीकार और अंगीकार किया है। साल में एक बार हम सभी स्वयंसेवक अपने गुरु भगवा ध्वज के सामने ही अपनी गुरु दक्षिणा समर्पित करते हैं. मौलिक भगवा ध्वज में कुछ भी लिखा नहीं जाता।
लेकिन मंदिरों पर लगाये जाने वाले ध्वजों में ओउम् आदि लिखा जा सकता है। इसी प्रकार संगठन या व्यक्ति विशेष के ध्वज में अन्य चिह्न हो सकते हैं, जैसे अर्जुन के ध्वज में हनुमान का चिह्न था। लेकिन किसी भी स्थिति में उनका रंग भगवा ही होना चाहिए।
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                                   डा.हेडगेवार, राष्ट्र-ध्वज और कांग्रेस - कृष्णानंद सागर
http://panchjanya.com/arch/2009/4/12/File31.htm
पूर्ण स्वातंत्र्य के अग्रदूत और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डा. केशव बलिराम हेडगेवार की मान्यता थी कि भारत अत्यंत प्राचीन काल से एक राष्ट्र है और राष्ट्र जीवन के सभी प्रतीक, यहां सदा विद्यमान रहे हैं। फलत: हमारी राष्ट्रीय आकांक्षाओं, जीवन की आध्यात्मिक दृष्टि एवं सम्पूर्ण इतिहास के गौरव को हमारे सम्मुख रखने वाला भगवा ध्वज सदैव से राष्ट्र के मानबिन्दुओं के रूप में हमारे आदर और श्रद्धा का केन्द्र रहा है। इसलिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कभी यह विचार करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी कि संघ का ध्वज कौन सा हो। परंपरा से चले आ रहे राष्ट्रध्वज रूपी भगवाध्वज को ही संघ ने अपने ध्वज के नाते अपना लिया।

किंतु राजनीतिक क्षेत्र में भारत के राष्ट्रीय ध्वज के संबंध में लोगों में बहुत अज्ञान दिखायी देता है। सन् 1906 से लेकर 1929 तक विभिन्न व्यक्तियों और विभिन्न संस्थाओं ने अपनी-अपनी कल्पना के अनुसार समय-समय पर अनेक झंडों को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार किया था। इन्हीं में तिरंगे झंडे का भी भारत की राजनीति में आविर्भाव हुआ। ये सारे झंडे भारतीय राष्ट्र जीवन से संबंधित अज्ञान और विस्मरण में से उत्पन्न हुए थे।

कांग्रेस के तिरंगे का जन्म

भारत सरकार के प्रकाशन विभाग ने "अवर फ्लैग" नामक पुस्तक प्रकाशित की हुई है। इस पुस्तक के पृष्ठ क्र.6 पर निम्नलिखित विवरण दिया है-

"1929 के लगभग बैजवाड़ा में हुए कांग्रेस अधिवेशन में आंध्र के एक युवक ने एक ध्वज तैयार किया और उसे गांधी जी के पास ले गया। यह दो रंग का था-लाल और हरा-दो प्रमुख समुदायों का प्रतीक। गांधी ने बीच में एक सफेद पट्टी जोड़ने का सुझाव दिया ताकि भारत के शेष समुदायों का भी प्रतिनिधित्व हो सके और चर्खे का भी सुझाव दिया जोकि प्रगति का प्रतीक था। इस प्रकार तिरंगे का जन्म हुआ। पर अभी इसे अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने अधिकृत रूप से स्वीकार नहीं किया था। फिर भी गांधी जी के अनुमोदन का प्रभाव यह पड़ा कि वह पर्याप्त लोकप्रिय हो गया और सभी कांग्रेस अधिवेशनों के अवसर पर फहराया जाने लगा।"

राष्ट्र ध्वज का प्रश्न

इसी कारण 1931 की कराची कांग्रेस में राष्ट्र ध्वज का प्रश्न विचार के लिए आया। तब तक हिन्दू, मुसलमान तथा अन्यों का प्रतिनिधित्व करते हुए तीन रंग कांग्रेस के झंडे में प्रयुक्त होते जा रहे थे। अब सिखों ने अपना अलग से पीला रंग जोड़ने का आग्रह किया। वास्तव में उन्होंने तिरंगे झंडे में तीन रंगों के चयन पर आपत्ति भी की। उनका कहना था कि ध्वज असाम्प्रदायिक होना चाहिए और यदि वह साम्प्रदायिक आधार पर ही रहता है तो उसमें सिख समुदाय के प्रतीक पीले रंग का भी समावेश किया जाए।

ध्वज समिति का प्रतिवेदन

अत: राष्ट्रीय ध्वज के विषय में ठीक से निर्णय करने के लिए सात सदस्यों की एक समिति बना दी गई। इस समिति के सदस्य थे-1-सरदार वल्लभ भाई पटेल, 2-पं.जवाहर लाल नेहरू, 3-डा.पट्टाभि सीतारमैया, 4-डा.ना.सु.हर्डीकर, 5-आचार्य काका कालेलकर, 6-मास्टर तारा सिंह और 7-मौलाना आजाद।

इस ध्वज समिति ने सब दृष्टि से विचार कर सर्वसम्मति से अपना जो प्रतिवेदन दिया, उसमें लिखा-"हम लोगों का एक मत है कि अपना राष्ट्रीय ध्वज एक ही रंग का होना चाहिए। भारत के सभी लोगों का एक साथ उल्लेख करने के लिए उन्हें सर्वाधिक मान्य केसरिया रंग ही हो सकता है। अन्य रंगों की अपेक्षा यह रंग अधिक स्वतंत्र स्वरूप का तथा भारत की पूर्व परंपरा के अनुकूल है।" निष्कर्ष के रूप में उन्होंने आगे लिखा, "भारत का राष्ट्रीय ध्वज एक रंगा हो और उसका रंग केसरिया रहे तथा उसके दंड की ओर नीले रंग में चर्खे का चित्र रहे।"

ध्वज समिति का यह प्रतिवेदन राष्ट्रीय एकात्मता की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण था, क्योंकि इसमें अलग अलग सम्प्रदायों के प्रतिनिधित्व के रूप में अलग-अलग रंगों को स्थान नहीं दिया गया था, जैसा कि तब तक तिरंग झंडे में चला आ रहा था।

यद्यपि यह ध्वज समिति की सर्वसम्मत संस्तुति थी, तो भी इस पर कांग्रेस कार्यसमिति की मुहर लगना आवश्यक था। अंतिम निर्णय वहीं होना था।

डा.हेडगेवार के प्रयत्न




ध्वज समिति का यह प्रतिवेदन प्रकाशित होने पर डा.हेडगेवार को बहुत प्रसन्नता हुई। किंतु उन्हें आशंका थी गांधी जी की ओर से। गांधी जी को मुसलमानों की बहुत चिंता रहती थी और तिरंगा गांधी जी द्वारा ही प्रचलित किया गया था, किंतु ध्वज समिति ने तिरंगे को पूरी तरह से नकार दिया था, अत: गांधी जी इस प्रतिवेदन को अस्वीकार कर सकते हैं। यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति होगी। डाक्टर हेडगेवार ऐसी स्थिति को टालने के लिए सक्रिय हो गए।

लोकनायक बापूजी अणे कांग्रेस कार्य समिति के सदस्य थे। कार्य समिति की बैठक दिल्ली में होने वाली थी और लोकनायक अणे भी उसमें भाग लेने दिल्ली जाने वाले थे। वे केसरिया रंग के पक्षधर नहीं थे, भगवा रंग के पक्षधर थे। डाक्टर हेडगेवार उनके पास गए और उन्हें समझाया कि केसरिया और भगवा रंग कोई दो रंग नहीं हैं। इनमें बहुत ही मामूली सा अंतर है, मूलत: वे एक ही हैं। दोनों ही लाल व पीले रंग के सम्मिश्रण हैं। केसरिया रंग में लाल की तुलना में पीला रंग थोड़ा सा अधिक होता है और भगवा रंग में पीले की अपेक्षा लाल रंग थोड़ा सा अधिक होता है। अत: केसरिया ध्वज के समर्थन का अर्थ भगवा ध्वज का ही समर्थन है। डाक्टर जी ने आगे कहा-"यद्यपि काफी अध्ययन और खोज के उपरांत समिति ने केसरिया रंग का सुझाव दिया है, पर गांधी जी के सम्मुख सब मौन हो जाएंगे। गांधी जी ने केसरिया को अमान्य कर तिरंगे को ही बनाए रखने का आग्रह किया, तो ये नेता मुंह नहीं खोलेंगे। अत: आपको आगे आकर निर्भयतापूर्वक अपने पक्ष का प्रतिपादन करना चाहिए।"-डा.हेडगेवार चरित्र, प्रथम संस्करण, पृ.251

डाक्टर जी के यह बताने पर कि केसरिया रंग और भगवा रंग में कोई विशेष अंतर नहीं है, बापू जी मान गए और उन्होंने कांग्रेस कार्य समिति में केसरिया ध्वज का समर्थन करने का आश्वासन दे दिया। किंतु डा.हेडगेवार जी ने अपने कर्तव्य की इतिश्री यहीं नहीं मान ली। वे किसी भी विषय में प्रयत्न एक साथ कई दिशाओं से करते थे। अत: वे स्वयं भी दिल्ली पहुंच गए और लोकनायक अणे के आवास पर ही जम गए। लोकनायक के ही कथनानुसार-"वे दिन भर दिल्ली में इधर उधर घूमते रहते थे। अत: निश्चय ही वे कार्यसमिति के अन्य सदस्यों से भी इस संबंध में मिले होंगे।"

लेकिन हुआ वही, जिसकी डाक्टर जी को आशंका थी। श्री हो.वे. शेषाद्रि के अनुसार-"परंतु, अखिल भारतीय कांग्रेस समिति गांधीजी के मन की तिरंगी योजना से मतभेद करने का साहस न कर सकी और उसने सीधे उसे ही स्वीकृति दे दी। जिस मानसिक पृष्ठभूमि के कारण यह निर्णय लिया गया, वह घोर दुर्भाग्यपूर्ण सिद्ध हुआ।"(...और देश बंट गया, पृष्ठ-138)

डा.हेडगेवार की सारी मेहनत बेकार गई। ध्वज समिति का प्रतिवेदन अमान्य कर दिया गया और तिरंगे को बनाए रखने का निर्णय ले लिया गया। हां, डाक्टर जी की दौड़ धूप का इतना परिणाम अवश्य निकला कि तिरंगे में गहरे लाल रंग के स्थान पर केसरिया रंग मान लिया गया और इस रंग का क्रम सबसे ऊपर कर दिया गया। इससे पहले लाल रंग की पट्टी सबसे नीचे रहती थी।

चारों ओर से होने वाली साम्प्रदायिकता विषयक आलोचनाओं से बचने के लिए कांग्रेस द्वारा रंगों की व्याख्या में परिवर्तन किया गया और कहा गया कि तीन रंग विभिन्न सम्प्रदायों के द्योतक न होकर गुणों के प्रतीक हैं-केसरिया रंग त्याग का, सफेद रंग शांति का तथा हरा रंग हरियाली का प्रतीक है। किंतु यह व्याख्या आज तक किसी के गले नहीं उतरी, स्वयं कांग्रेस के भी नहीं। यदि वास्तव में यह कांग्रेस के गले उतर गई होती, तो आज कांग्रेस भगवाकरण अथवा केसरिया से इतना बिदकती नहीं।

नारायण हरि पालकर के अनुसार, "इस प्रकार समिति के सारे परिश्रम पर पानी फिर गया तथा राष्ट्र ध्वज का प्रश्न इतिहास और परंपरा के आधार पर निश्चित न होते हुए, व्यक्ति की इच्छा और धारणा से तय हुआ। (डा.हेडगेवार चरित्र, पृ.251)

राष्ट्र ध्वज के विषय में चर्चा करते समय हमें इतिहास के इस पृष्ठ की ओर से आंख नहीं मूंदनी चाहिए।


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भारतीय ध्वज


http://hindi.mapsofindia.com/indian-flag.html

भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को स्वतंत्रता के प्रतीक के तौर पर डिजाइन किया गया था। स्वर्गीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने इसके लिए कहा था ‘यह ना सिर्फ हमारी स्वतंत्रता का ध्वज हैै बल्कि सबकी आजादी का प्रतीक है’।

भारतीय राष्ट्रीय ध्वज एक हाॅरीजोंटल तिरंगा है, जिसमें बराबर अनुपात में गहरा भगवा रंग सबसे उपर, मध्य में सफेद और गहरा हरा रंग नीचे है। ध्वज की लंबाई चैड़ाई का अनुपात 2:3 है। सफेद पट्टी के बीच में एक गहरे नीले रंग का पहिया है जो धर्म चक्र का प्रतीक है। इस पहिये की 24 तीलियां हैं।

ध्वज में भगवा रंग साहस, बलिदान और त्याग का प्रदर्शन करता है। इसका सफेद रंग पवित्रता और सच्चाई तथा हरा रंग विश्वास और उर्वरता का प्रतीक है।


भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का इतिहास


भारतीय राष्ट्रीय ध्वज बहुत महत्वपूर्ण है और यह भारत के लंबे स्वतंत्रता संग्राम का प्रतिनिधित्व करता है। यह भारत के एक स्वतंत्र गणतंत्र होने का प्रतीक है। भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के वर्तमान स्वरुप का अस्तित्व 22 जुलाई 1947 को हुई संवैधानिक सभा की बैठक मेें आया। इस ध्वज ने 15 अगस्त 1947 से 26 जनवरी 1950 तक डोमिनीयन आॅफ इंडिया और उसके बाद से भारत गणराज्य के राष्ट्रीय ध्वज के तौर पर देश का प्रतिनिधित्व किया। भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को पिंगली वैंकया ने डिजाइन किया और इसमें भगवा, सफेद और हरे रंगों की समान पट्टियां हैं। इसकी चैड़ाई का अनुपात इसकी लंबाई के मुकाबले 2:3 है।

सफेद पट्टी के बीच स्थित चक्र को अशोक चक्र कहा जाता है और इसमें 24 तीलियां होती हैं। भारतीय मानक संस्थान यानि आईएसआई के द्वारा निर्धारित मानक के अनुसार चक्र सफेद पट्टी के 75 प्रतिशत भाग पर फैला होना चाहिये। राष्ट्रीय ध्वज हमारे सबसे सम्मानजनक राष्ट्रीय चिन्हों में से एक है। इसके निर्माण और इसे फहराने को लेकर सख्त कानून बनाए गए हैं। आधिकारिक ध्वज ब्यौरे के अनुसार ध्वज का कपास, सिल्क और वूल को हाथ से कात कर बनाई खादी से बना होना आवश्यक है।

1904 : भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का इतिहास स्वतंत्रता मिलने से भी पहले का है। सन् 1904 में पहली बार राष्ट्रीय ध्वज अस्तित्व में आया। इसे स्वामी विवेकानंद की एक आयरिश शिष्य ने बनाया था। उनका नाम सिस्टर निवेदिता था और कुछ समय बाद यह ‘सिस्टर निवेदिता का ध्वज’ के नाम से पहचाना जाने लगा। उस ध्वज का रंग लाल और पीला था। लाल रंग स्वतंत्रता के संग्राम और पीला रंग उसकी विजय का प्रतीक था। उस पर बंगाली में ‘बाॅन्दे मातरम्’ लिखा था। इसके साथ ही ध्वज पर भगवान इन्द्र के हथियार वज्र का भी निशान था और बीच में एक सफेद कमल बना था। वज्र का निशान शक्ति और कमल शुद्धता का प्रतीक था।

1906 में भारतीय ध्वज 1906 : सिस्टर निवेदिता के ध्वज के बाद सन् 1906 में एक और ध्वज डिजाइन किया गया। यह एक तिरंगा झंडा था और इसमें तीन बराबर पट्टियां थीं जिसमें सबसे उपर इसमें नीले, बीच में पीले और तल में लाल रंग था। इसकी नीली पट्टी में अलग अलग आकार के आठ सितारे बने थे। लाल पट्टी में दो चिन्ह थे, पहला सूर्य और दूसरा एक सितारा और अर्द्धचन्द्राकार बना था। पीली पट्टी पर देवनागरी लिपि में ‘वंदे मातरम्’ लिखा था।

सन् 1906 में इस ध्वज का एक और संस्करण बनाया गया। यह भी एक तिरंगा था पर इसके रंग अलग थे। इसमें नारंगी, पीला और हरा रंग था और इसे ‘कलकत्ता ध्वज’ या ‘लोटस ध्वज’ के नाम से जाना जाने लगा, इसमें आठ आधे खुले कमल थे। माना जाता है कि इसे सचिन्द्र प्रसाद बोस और सुकुमार मित्रा ने बनाया था। इसे 7 अगस्त 1906 को कलकत्ता के पारसी बागान में फहराया गया था। इसे बंगाल के विभाजन के खिलाफ बहिष्कार दिवस के दिन सर सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने भारत की एकता के प्रतीक के तौर पर फहराया था।

1907 में भारतीय ध्वज 1907 : यह ध्वज रंगों और इस पर बने फूल के अलावा सन् 1906 के ध्वज से काफी मिलता जुलता था। इस झंडे के तीन रंग थे, नीला, पीला और लाल और इसमें फूल का आकार काफी बड़ा था।

इसके बाद मैडम भीकाजी रुस्तम कामा का झंडा आया। इस ध्वज को मैडम भीकाजी कामा, वीर सावरकर और कृष्णा वर्मा ने मिलकर बनाया था। इस झंडे को मैडम कामा नेे जर्मनी में स्टूटग्राट में 22 अगस्त 1907 को फहराया और यह ध्वज विदेशी धरती पर फहराया जाने वाला पहला ध्वज बन गया। उस दिन से इसे बर्लिन कमेटी ध्वज भी कहा जाने लगा। यह ध्वज तीन रंगों से बना था, जिसमें सबसे उपर हरा, मध्य में भगवा और आखिरी में लाल रंग था। इस के उपर ‘वंदे मातरम’ लिखा था।

1916 : पूरे राष्ट्र को जोड़ने के उद्देश्य से सन् 1916 में एक लेखक और भूभौतिकीविद पिंगली वैंकया ने एक ध्वज डिजाइन किया। उन्होंने महात्मा गांधी से मिलकर ध्वज को लेकर उनकी मंजूरी मांगी। महात्मा गांधी ने उन्हें ध्वज पर भारत के आर्थिक उत्थान के प्रतीक के रुप में चरखे का चिन्ह बनाने का सुझाव दिया। पिंगली ने हाथ से काती गई खादी का एक ध्वज बनाया। उस झंडे पर दो रंग थे और उन पर एक चरखा बना था, लेकिन महात्मा गांधी ने उसे यह कहते हुए नामंजूर कर दिया कि उसका लाल रंग हिंदू और हरा रंग मुस्लिम समुदाय का तो प्रतिनिधित्व करता है पर भारत के अन्य समुदायों का इसमें प्रतिनिधित्व नहीं होता।

1917 : बाल गंगाधर तिलक द्वारा गठित होम रुल लीग ने सन् 1917 में एक नया झंडा अपनाया। उस समय भारत द्वारा डोमिनियन के दर्जे की मांग की जा रही थी। झंडे पर सबसे उपर यूनियन जैक बना था। ध्वज के बचे हुए हिस्से पर पांच लाल और चार नीली पट्टियां थी। इस पर हिंदुओं में पवित्र माने जाने वाले सप्तर्षि नक्षत्र के सात तारे भी बने थे। इस पर उपर की ओर एक सितारा और एक अर्धचन्द्र भी बना था। यह ध्वज आम जनता में ज्यादा लोकप्रिय नहीं हुआ।

1921 में भारतीय ध्वज 1921 : महात्मा गांधी चाहते थे कि राष्ट्रीय ध्वज में भारत के सभी समुदायों का प्रतिनिधित्व हो, इसलिए एक नया ध्वज बनाया गया। इस झंडे में तीन रंग थे। इसमें सबसे उपर सफेद, मध्य में हरा और सबसे नीचे लाल रंग था। इस ध्वज का सफेद रंग अल्पसंख्यकों का, हरा रंग मुस्लिमों का और लाल रंग हिंदू और सिख समुदायों का प्रतीक था। एक चरखा इन तीन पट्टियों पर फैलाकर बनाया गया था जो इनकी एकता का प्रतीक था। यह ध्वज आयरलैंड के ध्वज की तर्ज पर बनाया गया था जो कि भारत की तरह ही ब्रिटेन से स्वतंत्रता पाने के लिए संघर्ष कर रहा था। हालांकि कांग्रेस कमेटी ने इसे आधिकारिक ध्वज के तौर पर नहीं अपनाया पर भारत के स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रीयता के प्रतीक के तौर पर इसका व्यापक इस्तेमाल हुआ।

1931 में भारतीय ध्वज 1931 : ध्वज की सांप्रदायिक व्याख्या से कुछ लोग खुश नहीं थे। इसे ध्यान में रखते हुए एक नया झंडा बनाया गया जिसमें लाल की जगह गेरुआ रंग रखा गया। यह रंग दोनों समुदायों की संयुक्त भावना का प्रतीक था क्योंकि भगवा हिंदू योगियों और मुस्लिम दरवेशों का रंग है। सिख समुदाय ने ध्वज में अपने प्रतिनिधित्व की मांग की अथवा धार्मिक रंगों को ध्वज से हटाने को कहा। नतीजतन, पिंगली वैंकया ने एक और ध्वज बनाया। इस नए ध्वज में तीन रंग थे। सबसे उपर भगवा, उसके नीचे सफेद और सबसे नीचे हरा रंग। सफेद पट्टी के मध्य में चरखा बना था। सन् 1931 में कांग्रेस कमेटी की बैठक में इस ध्वज को कमेटी के आधिकारिक ध्वज के तौर पर अपनाया गया था।


1947 में भारतीय ध्वज 1947 : भारत को आजादी मिलने के बाद भारत के राष्ट्रीय ध्वज पर चर्चा के लिए राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई। कमेटी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के ध्वज को कुछ संशोधनों के साथ अपनाना तय किया। नतीजतन, 1931 के ध्वज को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के तौर पर अपनाया गया, लेकिन चरखे की जगह मध्य में चक्र रखा गया और इस तरह भारतीय राष्ट्रीय ध्वज अस्तित्व में आया।


ब्रिटिश भारत ध्वज 1858 1947 ब्रिटिश भारत ध्वज 1858-1947 : ब्रिटिश भारत का ध्वज सन् 1858 में लाया गया। इसका डिजाइन पश्चिमी हेरैल्डिक मानकों के आधार पर था और यह कनाडा और आॅस्ट्रेलिया सहित अन्य ब्रिटिश काॅलोनियों के ध्वजों से मिलता जुलता था। इस नीले बैनर पर उपरी बाएं चतुर्थांश में यूनियन ध्वज और दाहिनीं तरफ मध्य में शाही ताज और स्टार आॅफ इंडिया बना हुआ था।


उत्पादन
ध्वज के उत्पादन के मानक तय करने के लिए एक कमेटी है। कमेटी ने इसे फहराने के लिए भी नियम बनाए हैं। इस कमेटी का नाम भारतीय मानक ब्यूरो है। इसने ध्वज संबंधी सभी बातों जैसे कपड़ा, डाई, रंग, धागों की गिनती और सभी बातों का विस्तृत विवरण दिया है। भारतीय ध्वज केवल खादी से बनाया जा सकता है। यह दो प्रकार की खादी से बनाया जाता है, एक प्रकार मुख्य हिस्से के काम आता है और दूसरा प्रकार जो ध्वज को डंडे से बांधे रखता है।

आचार संहिता


राष्ट्रीय प्रतीक होने के नाते हर भारतीय इसका सम्मान करता है। आम लोगों के लिए भारतीय ध्वज संबंधी कुछ नियम बनाए गए हैं।
  • राष्ट्रीय ध्वज को फहराते समय भगवा रंग सबसे उपर होना चाहिए।
  • कोई भी ध्वज या प्रतीक राष्ट्रीय ध्वज से उपर या दाहिनी ओर नहीं रखा जाना चाहिए।
  • यदि राष्ट्रीय ध्वज के साथ अन्य ध्वज भी एक ही कतार में लगाने हांे तो उन्हें बांई ओर लगाना चाहिए।
  • यदि राष्ट्रीय ध्वज को किसी परेड या जुलूस में थामा जाता है तो उसे दाहिनी ओर लेकर मार्च करना होता है। यदि दूसरे ध्वज भी साथ हांे तो उसे कतार के मध्य में रखना होता है।
  • सामान्यतः राष्ट्रीय ध्वज को महत्वपूर्ण इमारतों पर फहराया जाता है, जैसे राष्ट्रपति भवन, संसद भवन, सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, सचिवालय, आयुक्त कार्यालय आदि।
  • राष्ट्रीय ध्वज या उसकी नकल का इस्तेमाल व्यापार, व्यवसाय या पेशे के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
  • राष्ट्रीय ध्वज को सूर्यास्त के समय उतारना आवश्यक है।

ध्वज संहिता के अनुसार भारत के नागरिकों को राष्ट्रीय ध्वज को कुछ महत्वपूर्ण दिन, जैसे गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस और महात्मा गांधी के जन्मदिन के अलावा फहराने का अधिकार नहीं है। प्रसिद्ध उद्योगपति नवीन जिंदल ने अपने कार्यालय के भवन पर झंडा फहराने पर दी गई चेतावनी को कोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने इसके खिलाफ एक जनहित याचिका दायर की जो कि अभी विचाराधीन है, लेकिन फैसला आने तक कोर्ट ने आम लोगों को सम्मानजनक तरीके से ध्वज फहराने की अस्थाई अनुमति दी है।

कुछ रोचक तथ्य


विश्व की सबसे उंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर 29 मई 1953 में भारतीय झंडा फहराया गया। विदेशी धरती पर पहली बार भारतीय झंडा मैडम भीकाजी कामा ने फहराया। उन्होंने इसेे जर्मनी में स्टूटग्राट में 22 अगस्त 1907 को फहराया।

भारतीय राष्ट्रीय ध्वज पहली बार अंतरिक्ष में विंग कमांडर राकेश शर्मा के साथ 1984 में गया। राकेश शर्मा के स्पेस सूट पर वह एक पदक की तरह जोड़ा गया था।

अंतिम संशोधन : अक्टूबर 3, 2014

भारत का गणतंत्र दिवस समारोह






                                                              भारत का गणतंत्र दिवस
भारत में हर साल 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाया जाता है। यह दिन देश की संप्रभुता का प्रतीक है क्योंकि इस दिन सन् 1950 में भारत के संविधान को अपनाया गया था। इस दिन को मनाने का सबसे खास और जाना पहचाना तरीका गणतंत्र दिवस की परेड है जो देश की राजधानी नई दिल्ली में होती है।

2015 की मुख्य बातें
इस साल अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि होंगे।

गणतंत्र दिवस का महत्व
गणतंत्र दिवस इसलिए मनाया जाता है क्योंकि इस दिन भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य बना था। 26 जनवरी 1950 को भारत के संविधान को लागू किया गया था जब भारत के शासी दस्तावेज को भारत के अधिनियम 1935 से बदला गया था।

इस दिन का महत्व इसलिए भी है क्योंकि इस दिन भारत की स्वतंत्रता यानि पूर्ण स्वराज की घोषणा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 26 जनवरी 1930 को की थी।

गणतंत्र दिवस की तारीख और समय
गणतंत्र दिवस 2015, 26 जनवरी को मनाया जाएगा। इस दिन राष्ट्रीय अवकाश होता है। देशभक्ति की भावना को मनाने के लिए इस दिन सभी सरकारी कार्यालय और स्कूल बंद रहेंगे।

गणतंत्र दिवस समारोह
इस दिन पूरा देश देशभक्ति के रंग में रंग जाता है लेकिन मुख्य तौर पर गणतंत्र दिवस का समारोह राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में सुबह 9 बजे से होता है जो लगभग तीन घंटे चलता है। पूरे देश से लोगों के शामिल होने की वजह से यह ऐतिहासिक अवसर राष्ट्रीय त्यौहार बन जाता है। यह दिन राष्ट्र की एकता का प्रतीक है क्योंकि इस दिन विभिन्न जाति, पंथ, धर्म और क्षेत्र के लोग आपस मेें मिलकर एक भारतीय होने के गर्व को उत्सव के रुप में मनाते हैं।

यह समारोह राजपथ पर बहुत उत्साह और गर्व के साथ मनाया जाता है जिसका अनुभव कोई भी गणतंत्र दिवस परेड के टिकट खरीद कर ले सकता है। इस समारोह के टिकट समारोह के कुछ हफ्ते पहले खरीदे जा सकते हैं।

देश भर मेें गणतंत्र दिवस समारोह
राजधानी के भव्य समारोह के अलावा गणतंत्र दिवस को देश के विभिन्न हिस्सों में कई स्तरों पर मनाया जाता है, जैसे शहरों, जिला मुख्यालय, पंचायत, स्कूल और दफ्तरों में ।

    मुंबई में लोग गणतंत्र दिवस की परेड में शिवाजी पार्क या मरीन ड्राइव पर भाग लेते हैं।
    बेंगलुरु में लोग गणतंत्र दिवस समारोह फील्ड मार्शल माॅनक शाॅ परेड मैदान में मनाते हैं जहां परेड और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं।
    कोलकाता में लोग गणतंत्र दिवस परेड का मजा रेड रोड पर लेते हैं।
    चैन्नई में गणतंत्र दिवस समारोह मरीना बीच और कामराज सालै पर होता है।


बीटिंग रिट्रीट
गणतंत्र दिवस समारोह आधिकारिक रुप से बीटिंग रिट्रीट समारोह के साथ खत्म होता है जो कि हर साल 29 जनवरी को होती है। नई दिल्ली में रायसीना हिल पर राष्ट्रपति के सामने इस समारोह में भारतीय वायु सेना, भारतीय नौसेना और भारतीय सेना भाग लेते हैं।

गणतंत्र दिवस परेड
भारत के गणतंत्र दिवस की भव्यता को भव्य परेड से देखा जा सकता है जो राष्ट्रपति भवन के पास रायसीना हिल से शुरु होकर इंडिया गेट पर खत्म होती है।

इस अवसर पर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और कई उच्च रैंक के अधिकारी मौजूद होते हैं। यह परेड तब शुरु होती है जब प्रधानमंत्री इंडिया गेट पर अमर जवान ज्योति पर भारतीय सेना के शहीदों की याद में पुष्पांजलि अर्पित करते हैं।

भारतीय सशस्त्र सेनाओं के कमांडर इन चीफ भारत के राष्ट्रपति राष्ट्रीय ध्वज को फहराते हैं। इसके बाद राष्ट्रीय गान की धुन बजती है और 21 तोपों की सलामी दी जाती है।

नौसेना, सेना और वायु सेना की विभिन्न रेजिमेंट राष्ट्रपति को सलाम करते हुए राजपथ पर अपना पराक्रम प्रदर्शित करती हैं। सशस्त्र बलों के कर्मी मोटर साइकिल की सवारी करते हैं जबकि भारतीय वायु सेना के जवान लड़ाकू विमानों में उड़ान परेड करते हैं।

गणतंत्र दिवस पर भारत की समृद्ध और रंगीन संस्कृति प्रदर्शित की जाती है। विभिन्न क्षेत्रों के पेशेवर लोग पारंपरिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश करते हैं। स्कूली बच्चे सुंदर पोशाकों में इस दिन भारत के गौरवमयी इतिहास के विभिन्न पहलुओं को प्रदर्शित करते हैं।

देश के असली नायकों को इस दिन बहादुरी पुरस्कार और पदक से सम्मानित किया जाता है। बच्चों को बहादुरी और निस्वार्थ बलिदान के लिए राष्ट्रीय अवार्ड दिया जाता है।

भारतीय वायु सेना के जेट विमानों की तिरंगा धुंआ छोड़ती पंक्ति भव्य समारोह के संपन्न होने का प्रतीक है। एकत्र दर्शकों को अलविदा करने के लिए यह उन पर गुलाब की पंखुडि़यां बरसाती है।