शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

21 मार्च 2015 से प्रारंभ होगा हिन्दू नव वर्ष विक्रम संवत् 2072




                                    21 मार्च 2015 को विक्रम संवत् के नये साल का आरम्भ


क्या है गुड़ी पड़वा या हिन्दू नववर्ष या चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (21 मार्च 2015 को) ?
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चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को गुड़ी पड़वा या नववर्ष का आरम्भ माना गया है। ‘गुड़ी’ का अर्थ होता है विजय पताका । ऐसा माना गया है कि शालिवाहन नामक कुम्हार के पुत्र ने मिट्टी के सैनिकों का निर्माण किया और उनकी एक सेना बनाकर उस पर पानी छिड़ककर उनमें प्राण फूँक दिये। उसमें सेना की सहायता से शक्तिशाली शत्रुओं को पराजित किया। इसी विजय के उपलक्ष्य में प्रतीक रूप में ‘‘शालीवाहन शक’ का प्रारम्भ हुआ। पूरे महाराष्ट्र में बड़े ही उत्साह से गुड़ी पड़वा के रूप में यह पर्व मनाया जाता है। कश्मीरी हिन्दुओं द्वारा नववर्ष के रूप में एक महत्वपूर्ण उत्सव की तरह इसे मनाया जाता है।

इसे हिन्दू नव संवत्सर या नव संवत् भी कहते हैं।इस वर्ष 21 मार्च 2015 को कीलक नामक विक्रम संवत् 2072 का प्रारंभ होगा| 21 मार्च 2015 (शनिवार) को इस धरा की 1955885115वीं वर्षगांठ है| पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री के अनुसार ऐसी मान्यता है कि भगवान ब्रह्मा ने इसी दिन सृष्टि की रचना प्रारम्भ की थी। इसी दिन से विक्रम संवत् के नये साल का आरम्भ भी होता है। सिंधी नववर्ष चेटीचंड उत्सव से शुरू होता है जो चैत्र शुक्ल द्वितीया को मनाया जाता है। सिंधी मान्यताओं के अनुसार इस शुभ दिन भगवान् झूलेलाल का जन्म हुआ था जो वरूण देव के अवतार हैं।

चैत्रे मासि जगत्‌ ब्रह्म ससर्ज प्रथमे हनि
शुक्ल पक्षे समग्रे तु तदा सूर्योदये सति॥


कहा जाता है कि ब्रह्मा ने सूर्योदय होने पर सबसे पहले चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सृष्टि की संरचना शुरू की। उन्होंने इसे प्रतिपदा तिथि को प्रवरा अथवा सर्वोत्तम तिथि कहा था। इसलिए इसको सृष्टि का प्रथम दिवस भी कहते हैं। इस दिन से संवत्सर का पूजन, नवरात्र घटस्थापन, ध्वजारोपण, वर्षेश का फल पाठ आदि विधि-विधान किए जाते हैं।चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा वसन्त ऋतु में आती है। इस ऋतु में सम्पूर्ण सृष्टि में सुन्दर छटा बिखर जाती है। विक्रम संवत के महीनों के नाम आकाशीय नक्षत्रों के उदय और अस्त होने के आधार पर रखे गए हैं। सूर्य, चन्द्रमा की गति के अनुसार ही तिथियाँ भी उदय होती हैं। मान्यता है कि इस दिन दुर्गा जी के आदेश पर श्री ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी। इस दिन दुर्गा जी के मंगलसूचक घट की स्थापना की जाती है।

पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री के अनुसार आज भी हमारे भारत देश में प्रकृति, शिक्षा तथा राजकीय कोश आदि के चालन-संचालन में मार्च अप्रेल के रूप में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही देखते हैं। यह समय दो ऋृतुओं का संधिकाल माना जाता है। इसमें रात्रि छोटी और दिन बड़े होने लगते हैं। प्रकृति एक नया रूप धारण कर लेती है। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रकृति नव पल्लव धारण कर नव संरचना के लिए ऊर्जावान हो रही हो। मानव, पशु-पक्षी यहाँ तक की जड़-चेतन प्रकृति भी प्रमाद एवं आलस्य का परित्याग कर सचेतन हो जाती है। इसी समय बर्फ पिघलने लग जाती है। आमों पर बौर लगना प्रारम्भ हो जाता है। प्रकृति की हरितिमा नवजीवन के संचार का प्रतीक बनकर हमारे जीवन से जुड़ सी जाती है।

इसी प्रतिपदा के दिन आज से 2072 वर्ष पूर्व उज्जयिनी नरेष महाराज विक्रमादित्य ने विदेषी आक्रांत शकों से भारत भूमि की रक्षा की और इसी दिन से कालगणना प्रारम्भ की गई। उपकृत राष्ट्र ने भी उन्हीं महाराज के नाम से विक्रमीसंवत् का नामकरण किया। महाराज विक्रमादित्य ने आज से 2072 वर्ष पूर्व राष्ट्र को सुसंगठित कर शकों की शक्ति का जड़ से उन्मूलन कर देश से पराजित कर भगा दिया और उनके मूल स्थान अरब में विजय की पताका फहरा दी। साथ ही साथ यवन, हूण, तुषार, पारसिक तथा कम्बोज देशों पर अपनी विजय ध्वजा फहरा दी। इन्हीं विजय की स्मृति स्वरूप वर्ष प्रतिपदा संवत्सर के रूप में मनाई जाती रही और आज भी बड़े उत्साह एवं ऐतिहासिक धरोहर की स्मृति के रूप में मनाई जा रही है। इनके राज्य में कोई चोर या भिखारी नहीं था। विक्रमादित्य ने विजय के बाद जब राज्यारोहण हुआ तब उन्होंने प्रजा के तमाम ऋणों को माफ कर दिया तथा नये भारतीय कैलेण्डर को जारी किया, जिसे विक्रम संवत् नाम दिया।

हिन्दू मान्यताओं के अनुसार, यह दिन सृष्टि रचना का पहला दिन है| करीब एक अरब 97 करोड़ 39 लाख 49 हजार 111 वर्ष पूर्व इसी दिन ब्रह्मा जी ने जगत की रचना की थी| इस दिन चैत्र नवरात्रि भी प्रारंभ होती है| हिन्दू परम्परा के अनुसार इस दिन को ‘नव संवत्सर’ या ‘नव संवत’ के नाम से भी जाना जाता है|

पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री के अनुसार हिंदू पंचांग के मुताबिक, इस वर्ष 21 मार्च 2015 को कीलक नामक विक्रम संवत् 2072 का प्रारंभ होगा| 21 मार्च 2015 को इस धरा की 1955885115वीं वर्षगांठ है| इसी दिन ब्रह्मा जी ने जगत की रचना प्रारंभ की थी इसीलिए हम चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नए साल का आरम्भ मानते हैं| हिन्दू पंचांग का पहला महीना चैत्र होता है| यही नहीं शक्ति और भक्ति के नौ दिन यानी कि नवरात्रि स्थापना का पहला दिन भी यही है| ऐसी मान्यता है कि इस दिन नक्षत्र शुभ स्थिति में आ जाते हैं और किसी भी नए काम को शुरू करने के लिए यह मुहूर्त शुभ होता है|

सबसे प्राचीन काल गणना के आधार पर ही प्रतिपदा के दिन विक्रमी संवत् के रूप में इस शुभ एवं शौर्य दिवस को अभिषिक्त किया गया है। इसी दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामचन्द्रजी के राज्याभिषेक अथवा रोहण के रूप में मनाया गया। यह दिन वास्तव में असत्य पर सत्य की विजय को याद करने का दिवस है। इसी दिन महाराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हुआ था।अगर ज्योतिष की माने तो प्रत्येक संवत् का एक विशेष नाम होता है| विभिन्न ग्रह इस संवत् के राजा, मंत्री और स्वामी होते हैं| इन ग्रहों का असर वर्ष भर दिखाई देता है| सिर्फ यही नहीं समाज को श्रेष्ठ (आर्य) मार्ग पर ले जाने के लिए स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसी दिन को ‘आर्य समाज’ स्थापना दिवस के रूप में चुना था| इसी शुभ दिन महर्षि दयानन्द ने आर्यसमाज की स्थापना की थी। यह दिवस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक श्री केशव बलिराम हेडगेवार के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। पूरे भारत में इसी दिन से चैत्र नवरात्र की शुरूआत मानी जाती है।

वैदिक संस्कृति से जोड़ता है हमें विक्रम संवत्—-

पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री के अनुसार गुलामी के बाद अंग्रेजों ने हम पर ऐसा रंग चढ़ाया ताकि हम अपने नववर्ष को भूल उनके रंग में रंग जाए| उन्ही की तरह एक जनवरी को ही नववर्ष मनाये और हुआ भी यही लेकिन अब देशवासियों को यह याद दिलाना होगा कि उन्हें अपना भारतीय नववर्ष विक्रमी संवत बनाना चाहिए, जो आगामी 21 मार्च 2015 (शनिवार)को है|

पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री के अनुसार वैसे अगर देखा जाये तो विक्रम संवत् ही हमें अपनी संस्कृति से जोड़ता है| भारतीय संस्कृति से जुड़े सभी समुदाय विक्रम संवत् को एक साथ बिना प्रचार और नाटकीयता से परे होकर मनाते हैं और इसका अनुसरण करते हैं| दुनिया का लगभग हर कैलेण्डर सर्दी के बाद बसंत ऋतु से ही प्रारम्भ होता है| यही नहीं इस समय प्रचलित ईस्वी सन बाला कैलेण्डर को भी मार्च के महीने से ही प्रारंभ होना था| आपको बता दें कि इस कैलेण्डर को बनाने में कोई नयी खगोलीय गणना करने के बजाए सीधे से भारतीय कैलेण्डर (विक्रम संवत) में से ही उठा लिया गया था|

हिंदी में 12 महीनों के नाम—

ऐसा कहा जाता है कि पृथ्वी द्वारा 365/366 दिन में होने वाली सूर्य की परिक्रमा को वर्ष और इस अवधि में चंद्रमा द्वारा पृथ्वी के लगभग 12 चक्कर को आधार मानकर कैलेण्डर तैयार किया और क्रम संख्या के आधार पर उनके नाम रखे गए हैं| हिंदी महीनों के 12 नाम हैं चैत्र, बैशाख, ज्‍येष्‍ठ, आषाढ, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्‍गुन|

हम कैसे मनायें नव वर्ष-नव संवत्सर..????

पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री के अनुसार इस भारतीय और वैदिक नव वर्ष की पूर्व संध्या पर हमें दीपदान करना चाहिये। घरों में शाम को 7 बजे लगभग घण्टा-घडियाल व शंख बजाकर मंगल ध्वनि से नव वर्ष का स्वागत करें। इष्ट मित्रों को एसएमएस, इमेल एवं दूरभाष से नये वर्ष की शुभकामना भेजना प्रारम्भ कर देना चाहिये। नव वर्ष के दिन प्रातःकाल से पूर्व उठकर मंगलाचरण कर सूर्य को प्रणाम करें। हवन कर वातावरण शुद्ध करें। नये संकल्प करें। नवरात्रि के नो दिन साधना के शुरू हो जाते हैं तथा नवरात्र घट स्थापना की जाती है।

पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री के अनुसार नव वर्ष का स्वागत करने के लिए अपने घर-द्वार को आम के पत्तों से अशोक पत्र से द्वार पर बन्दनवार लगाना चाहिये। नवीन वस्त्राभूषण धारण करना चाहिये। इसी दिन प्रातःकाल स्नान कर हाथ में गंध, अक्षत, पुष्प और जल ले कर ‘ओम भूर्भुवः स्वः संवत्सर-अधिपति आवाहयामि पूजयामि च’ मंत्र से नव संवत्सर की पूजा करनी चाहिये एवं नव वर्ष के अशुभ फलों के निवारण हेतु ब्रह्माजी से प्रार्थना करनी चाहिये। हे भगवन्! आपकी कृपा से मेरा यह वर्ष मंगलमय एवं कल्याणकारी हो। इस संवत्सर के मध्य में आने वाले सभी अनिष्ट और विघ्न शांत हो जाये।

नव संवत्सर के दिन नीम के कोमल पत्तों और ऋतु काल के पुष्पों का चूर्ण बनाकर उसमें काली मिर्च, नमक, हींग, जीरा, मिश्री, इमली और अजवाइन मिलाकर खाने से रक्त विकार आदि शारीरिक रोग होने की संभावना नहीं रहती है तथा वर्षभर हम स्वस्थ रह सकते हैं। इतना न कर सके तो कम-से-कम चार-पाँच नीम की कोमल पत्त्यिाँ ही सेवन कर ले तो पर्याप्त रहता है। इससे चर्मरोग नहीं होते हैं। महाराष्ट्र में तथा मालवा में पूरनपोली या मीठी रोटी बनाने की प्रथा है। मराठी समाज में गुड़ी सजाकर भी बाहर लगाते हैं। यह गुड़ी नव वर्ष की पताका का ही स्वरूप है।

गुड़ी का अर्थ विजय पताका होती है। ‘युग‘ और ‘आदि‘ शब्दों की संधि से बना है ‘युगादि‘ । आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में ‘उगादि‘ और महाराष्ट्र में यह पर्व ‘ग़ुड़ी पड़वा‘ के रूप में मनाया जाता है। विक्रमादित्य द्वारा शकों पर प्राप्त विजय तथा शालिवाहन द्वारा उन्हें भारत से बाहर निकालने पर इसी दिन आनंदोत्सव मनाया गया । इसी विजय के कारण प्रतिपदा को घर-घर पर ‘ध्वज पताकाएं’ तथा ‘गुढि़यां’ लगाई जाती है गुड़ी का मूल …संस्कृत के गूर्दः से माना गया है जिसका अर्थ… चिह्न, प्रतीक या पताका ….पतंग….आदि- कन्नड़ में कोडु जिसका मतलब है चोटी, ऊंचाई, शिखर, पताका आदि। मराठी में भी कोडि का अर्थ है शिखर, पताका। हिन्दी-पंजाबी में गुड़ी का एक अर्थ पतंग भी होता है। आसमान में ऊंचाई पर फहराने की वजह से इससे भी पताका का आशय स्थापित होता है।

भारत भर के सभी प्रान्तों में यह नव-वर्ष विभिन्न नामों से मनाया जाता है जो दिशा व स्थानानुसार सदैव मार्च-अप्रेल के माह में ही पड़ता है | गुड़ी पड़वा, होला मोहल्ला, युगादि, विशु, वैशाखी, कश्मीरी नवरेह, उगाडी, चेटीचंड, चित्रैय तिरुविजा आदि सभी की तिथि इस नव संवत्सर के आसपास ही आती है।

सच तो यह है कि विक्रम संवत् ही हमें अपनी संस्कृति की याद दिलाता है और कम से कम इस बात की अनुभूति तो होती है कि भारतीय संस्कृति से जुड़े सारे समुदाय इसे एक साथ बिना प्रचार प्रसार और नाटकीयता से परे हो कर मनाते हैं। हम सब भारतवासियों का कर्तव्य है कि पूर्ण रूप से वैज्ञानिक और भारतीय कैलेण्डर विक्रम संवत् के अनुसार इस दिन का स्वागत करें। पराधीनता एवं गुलामी के बाद अंग्रेजों ने हमें एक ऐसा रंग चढ़ाया कि हम अपने नव वर्ष को भूल कर-विस्मृत कर उनके रंग में रंग गये। उन्हीं की तरह एक जनवरी को नव वर्ष अधिकांश लोग मनाते आ रहे हैं। लेकिन अब देशवासी को अपनी भारतीयता के गौरव को याद कर नव वर्ष विक्रमी संवत् मनाना चाहिये जो आगामी 21 मार्च को है।

क्या करें नव-संवत्सर के दिन (गुड़ी पड़वा विशेष)—-
—घर को ध्वजा, पताका, तोरण, बंदनवार, फूलों आदि से सजाएँ व अगरबत्ती, धूप आदि से सुगंधित करें।
—-दिनभर भजन-कीर्तन कर शुभ कार्य करते हुए आनंदपूर्वक दिन बिताएँ।
—सभी जीव मात्र तथा प्रकृति के लिए मंगल कामना करें।
—नीम की पत्तियाँ खाएँ भी और खिलाएँ भी।
—ब्राह्मण की अर्चना कर लोकहित में प्याऊ स्थापित करें।
—इस दिन नए वर्ष का पंचांग या भविष्यफल ब्राह्मण के मुख से सुनें।
—इस दिन से दुर्गा सप्तशती या रामायण का नौ-दिवसीय पाठ आरंभ करें।
—इस दिन से परस्पर कटुता का भाव मिटाकर समता-भाव स्थापित करने का संकल्प लें।

पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री के द्वारा आप सभी को नव वर्ष की अनेक-अनेक शुभकामनाएँ… यह वर्ष भारतीयों के लिये ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व के लिये भी सुख, शांति एवं मंगलमय हो।

धन्यवाद…
पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री,(ज्योतिष-वास्तु सलाहकार)
राष्ट्रिय महासचिव-भगवान परशुराम राष्ट्रिय पंडित परिषद्
मोब. 09669290067 (मध्य प्रदेश) एवं 09024390067 (राजस्थान)
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संवत 2072 का मंत्रीमण्डल एवं फलादेश 
भोपाल. गुड़ी पड़वा पर 21 मार्च से विक्रम संवत्सर 2072 का शुभारंभ होगा। कीलक नाम के इस नए संवत्सर का राजा शनि और मंत्री पद मंगल के पास रहने से भारत समेत कई देशों की न्याय व्यवस्था पहले से काफी मजबूत होगी। मंगल प्रशासनिक क्षेत्र में अनुशासन को बढ़ावा देगा। चंद्रमा के पास दुर्गेश (रक्षा) का पद रहेगा। इसके स्त्रीकारक ग्रह होने के कारण महिलाओं का वर्चस्व बढ़ेगा, सुरक्षा बढ़ेगी और कई महिलाओं को उच्च पद की प्राप्ति होगी।

नया विक्रम संवत्सर 13 माह का होगा क्योंकि इस वर्ष दो अाषाढ़ मास रहेंगे। इनमें एक को अधिकमास (पुरुषोत्तम मास) कहा जाता है। हिंदू नए वर्ष की शुरूआत जिस वार को होती है, उस वार का स्वामी ही आकाशीय ग्रहों के मंत्रिमंडल का राजा होता है।
अन्य पदों का भार भी शास्त्रोक्त विधि से की गई गणना के मुताबिक निर्धारित होता है। इस बार 21 मार्च, शनिवार को गुड़ीपड़वा से विक्रम संवत 2072 का शुभारंभ होगा। भगवान ब्रह्मा ने इसी दिन सृष्टि की रचना की थी। इस दिन से चैत्र नवरात्र का शुभारंभ होता है। भगवान विष्णु का मत्स्यावतार इसी दिन हुआ था।
कीलक नाम है नए वर्ष का
प्रत्येक संवत्सर का एक विशेष नाम होता है। इस संवत्सर का नाम कीलक है, जिसका अर्थ पंडितों ने रहस्य माना है। चूंकि शनिदेव इस वर्ष के राजा हैं, इसलिए इस वर्ष न्याय प्रक्रिया से जुड़े कई रहस्यों के उजागर होने की संभावना है। वर्तमान में शनि, मंगल के अधिपत्य वाली वृश्चिक राशि में है। इसका यह प्रभाव होगा कि पुलिस, प्रशासन, सेना में न्याय तंत्र व अनुशासन का पालन सख्ती से होगा। शुक्र व चंद्रमा के प्रभावी पदों पर होने से सालभर लोगों का वैभव विलासिता के प्रति अधिक रुझान रहेगा और वर्षा की स्थिति संतोषजनक रहेगी। चंद्रमा के दुर्गेश के साथ ही धनेश होने से विदेशी व्यापार के लिए केंद्र सरकार सरल नीतियां लागू करेगी। कृषि उत्पादों, पेट्रोलियम व दूरसंचार उपकरणों के क्षेत्र में भी विदेशी निवेश बढ़ेगा।
भारत की साख बढ़ेगी, परंतु भूमि व भवन संबंधी कानूनों के सख्त होने के कारण उद्योगों पर एक बार फिर कुछ दिनों मंदी की मार दिखाई देगी। सोना-चांदी के भाव में नवंबर से तेजी से उतार-चढ़ाव की स्थित बनेगी। किसानों के लिए यह साल सुख-समृद्धिदायक रहेगा।
इस साल होंगे दो अाषाढ़ मास
पं. धर्मेंद्र शास्त्री के मुताबिक सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश को संक्राति होना कहते हैं। जब दो पक्षों में संक्रांति नहीं होती तब अधिकमास होता है। आमतौर पर यह स्थिति 32 माह व 16 दिन में एक बार यानी हर तीसरे वर्ष में बनती है। इसकी वजह सूर्य व पृथ्वी की गति में होने वाला परिवर्तन है। इस वर्ष आषाढ़ 3 जून से 30 जुलाई तक रहेगा। इसमें 17 जून से 16 जुलाई की अवधि अधिकमास कहलाएगी।

किस ग्रह के पास कौन सा पद
ज्योतिषी अंजना गुप्ता के अनुसार नए संवत्सर में ग्रह व विभाग इस प्रकार होंगे। शनि-राजा, मंत्री-मंगल, चंद्रमा-दुर्गेश-धनेश, बुध-धान्येश, गुरु नीरसेश, शनि-शुक्र-रसेश होंगे। ग्रह स्थितियां व पदों के कारण महिलाओं का वर्चस्व बढ़ेगा। चंद्रमा के दुर्गेश होने से गौ-वंश की सुरक्षा बढ़ेगी।

'करप्शन' के खिलाफ शनि लेंगे 'एक्शन'

शरद द्विवेदी, इलाहाबाद
विक्रम संवत 2072 में 'करप्शन' पर जोरदार 'रिएक्शन' होगा। न्याय के अधिपति शनि देव 'एक्शन' लेंगे। नव संवत्सर पर वह आकाशीय मंत्रिमंडल के प्रधानमंत्री होंगे। युद्ध के कारक माने जाने वाले अग्नि (मंगल) देव मंत्री होंगे, ऐसे में ज्योतिर्विदों का यही मानना है कि कुछ हो ना हो, भ्रष्टाचार पर जरूर अंकुश लगेगा। हां, सत्यमार्ग का अनुशरण करने वाले पुरस्कृत होंगे, इसलिए परोपकारी व सदाचारी लोगों के लिए दिन मंगलकारी ही रहेंगे।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से शुरू हो रहे नए विक्रम संवत में ग्रहों, देवताओं को नई जिम्मेदारी मिलेगी। इस बार 21 मार्च से 'कीलक' नामक संवत्सर शुरू होगा। इसके राजा शनि होंगे। भारतीय मनीषी शनि को चिंतन, विचार, रहस्य एवं न्याय के देवता मानते हैं। मंगल मंत्री होंगे। आकाशीय मंत्रिमंडल में इनका नंबर दो का दर्जा रहेगा। ज्योतिर्विद आचार्य अविनाश राय कहते हैं कि भरण-पोषण एवं मन के कारक चंद्रमा नए सेनापति होंगे। खाद्य आपूर्ति व जल के प्रभारी शुक्र होंगे। देवगुरु वृहस्पति, दुर्गो का प्रभाग चलाएंगे। सूर्य तरल पदार्थो एवं बुध अन्न के स्वामी होंगे। बुध के पास वित्त मंत्रालय रहेगा। नए आकाशीय मंत्रिमंडल की वजह से भारतीय वैज्ञानिक जहां नए शोध एवं आविष्कार से अपना परचम लहराएंगे, वहीं विश्व के अलग-अलग क्षेत्रों में भूकंप जैसी स्थिति भी बन सकती है।
ज्योतिर्विद वैश्विक महाशक्ति अमेरिका की स्थिति कमजोर पड़ने व चीन-भारत को और मजबूत होने की संभावना भी व्यक्त कर रहे हैं। उनका कहना है कि युद्ध के कारक मंगल मंत्री हैं, इसलिए चीन व पाकिस्तान की सीमा पर तनाव रहेगा, अलबत्ता भारत का अधिक नुकसान नहीं हो सकेगा। वरिष्ठ ज्योतिर्विद डॉ. जय नारायण मिश्र व श्रीधर्मज्ञानोपदेश संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य देवेंद्र प्रसाद त्रिपाठी का मत है कि शिक्षा, तकनीकी में विकास होने के साथ सत्ता-प्रशासन का बेहतर तालमेल होगा।
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क्या है नवसंवत्सर
भारतीय विद्या भवन के निदेशक डॉ. रामनरेश त्रिपाठी के अनुसार परमपिता ब्रह्मा ने चैत्र शुक्ल प्रतिप्रदा को सृष्टि रची थी। समय, वर्ष, मास, ऋतु, दिन-रात, घंटा-मिनट, कला-बिकला स्वरूप की रचना आज से लगभग एक अरब, 95 करोड़, 58 लाख, 85 हजार, 117 वर्ष पहले हुई थी। बकौल त्रिपाठी, विक्रम संवत का संबंध विश्व की प्रकृति, खगोल सिद्धांत, ब्रह्मांड के ग्रहों व नक्षत्रों से है। विक्रम संवत्सर के बाद वर्ष 12 माह और सप्ताह सात दिन का माना गया। महीनों का हिसाब सूर्य व चंद्रमा की चाल पर होता है। माह को कृष्णपक्ष व शुक्लपक्ष में बांटा गया है। दिन का नामकरण आकाश में ग्रहों की स्थिति सूर्य से प्रारम्भ होकर क्रमश: मंगल, बुध, वृहस्पति, शुक्र, शनि और चंद्र से हुआ है। महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने चैत्र शुक्ल प्रतिप्रदा को ही सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीना व वर्ष की गणना करते हुए पंचांग की रचना की थी।
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राशियों के प्रभाव
वरिष्ठ ज्योतिर्विद डॉ. जय नारायण मिश्र के अनुसार नवसंवत्सर में हर राशि पर प्रभाव पड़ेगा।
-मेष : धन सुख व आनंद में वृद्धि होगी, हनुमत उपासना करें।
-वृष : मन में अशांति, धन व स्वास्थ्य हानि होगी, शुक्र की पूजा करें।
-मिथुन : पारिवारिक झगड़ा बढ़ेगा, भगवान कार्तिकेय की पूजा करें।
-कर्क : सुख एवं समृद्धि की बढ़ोत्तरी होगी, चंद्रमा की पूजा करें।
-सिंह : रोजगार व व्यवसाय में बाधा आएगी, सूर्योपासना करें।
-कन्या : विश्वासपात्र परेशानी देंगे, गणेश की पूजा करें।
-तुला : साढ़े साती व रोग से मुक्ति मिलेगी, शुक्र की पूजा करें।
-वृश्चिक : मानहानि व धन हानि की संभावना, हनुमत उपासना करें।
-धनु : धन की वृद्धि, पुत्र का सुख मिलेगा, भगवान शंकर की पूजा करें।
-मकर : समाजिक अपमान की संभावना, शिव स्तुति करें।
-कुंभ : धन हानि व कर्मचारियों से दिक्कत आएगी, शिव स्तुति करें।
-मीन : रोग में बढ़ोत्तरी की संभावना है, वृहस्पति की पूजा करें।

संसद भवन की डिजाइन : चौसठ योगिनी मंदिर की







                     हमारे संसद भवन की डिजाइन चौसठ योगिनी मंदिर जैसी है

                                                   रविन्द्र झारखरिया    Apr 13, 2014,

मुरैना. हमारा संसद भवन ब्रिटिश वास्तुविद् सर एडविन लुटियंस की मौलिक परिकल्पना माना जाता है। लेकिन, इसका मॉडल हू-ब-हू मुरैना जिले के मितावली में मौजूद चौसठ योगिनी शिव मंदिर से मेल खाता है। 9वीं सदी में प्रतिहार वंश के राजाओं द्वारा बनाए गए मंदिर में 101 खंभे कतारबद्ध हैं। और 64 कमरों में एक-एक शिवलिंग है। मंदिर के मुख्य परिसर में भी एक बड़ा शिवलिंग स्थापित है।
माना जाता है कि हर कमरे में शिवलिंग के साथ देवी योगिनी की मूर्ति भी रही होगी, जिसके आधार पर इसका नाम चौसठ योगिनी मंदिर पड़ा। इकंतेश्वर महादेव के नाम से भी प्रतिष्ठित यह मंदिर कभी तांत्रिक अनुष्ठान के विश्वविद्यालय के रूप में जाना जाता था। छह एकड़ में फैली संसद में 12 दरवाजे और 27 फीट ऊंचे 144 खंभे कतारबद्ध हैं। इसका व्यास 560 फीट और घेरा 533 मीटर है। इसके निर्माण में 1927 में 83 लाख रुपए की राशि खर्च हुई थी।
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अतुलनीय भारत का दिल बेहद खूबसूरत है। घुमक्कड़ी के शौकीनों के लिए मध्यप्रदेश में कई ठिकाने हैं। यह अलग बात है कि कई शानदार पर्यटन स्थल अब भी पर्यटकों की बाट जोह रहे हैं। मुरैना जिले के मितावली गांव में स्थित चौसठ योगिनी शिवमंदिर अपनी वास्तुकला और गौरवशाली परंपरा के लिए आसपास के इलाके में तो प्रसिद्ध है लेकिन मध्यप्रदेश पर्यटन के मानचित्र पर जगह नहीं बना सका है। अपने क्रियेटिव विज्ञापनों को लेकर चर्चित मध्यप्रदेश का पर्यटन विभाग चौसठ योगिनी शिवमंदिर की मार्केटिंग ढंग से नहीं कर सका है। आप यदि मितावली आएंगे और नौवीं सदी के इस मंदिर को निहारेंगे तो हैरत से भर उठेंगे। जमीन से करीब ३०० फीट ऊंचाई पर एक पहाड़ी पर बने गोलाकार शिवमंदिर को देखकर अनायास ही आपको मशहूर ब्रिटिश वास्तुकार सर एडविन लुटियंस की याद आएगी। सर लुटियंस, जिन्होंने दिल्ली को एक नया रूप, रंग और आकार दिया था। भारत के खूबसरत संसद भवन की रचना के लिए आज भी उन्हें तहेदिल से याद किया जाता है। मितावली में इकंतेश्वर महादेव मंदिर के नाम से भी पहचाने जाने वाला चौसठ योगिनी शिवमंदिर हू-ब-हू हमारी संसद के जैसा दिखता है। मंदिर परिसर में आकर दिमाग की कुछ खिड़कियां खुलने लगती हैं और हवा के साथ कुछ प्रश्न इन खिड़कियों से होकर भीतर घुस आते हैं। क्या वाकई हमारी संसद के भवन की परिकल्पना लुटियंस की मौलिक सोच थी? १२ फरवरी १९२१ को दिल्ली में जिस संसद भवन की आधारशिला रखी गई, क्या उसके वास्तु की प्रेरणा लुटियंस को चम्बल के चौसठ योगिनी शिवमंदिर से मिली थी? ये कुछ सवाल हैं जो इतिहास के विद्यार्थियों के लिए शोध का विषय तो बनते ही हैं। गहन शोध के जरिए ही इन सवालों के सही जवाब भी हमारे सामने आएंगे। तब ही हम गर्व के साथ कह सकेंगे कि दुनिया में अपनी खूबसूरती के लिए विख्यात भारतीय संसद की इमारत की परिकल्पना सर लुटियंस के दिमाग की उपज नहीं बल्कि गौरवशाली भारतीय वास्तुकला का ही एक नायाब नमूना है।
मितावली का यह चौसठ योगिनी शिवमंदिर मुरैना जिला मुख्यालय से करीब ३५ किलोमीटर की दूर पर स्थित है। यहां तक पहुंचने के लिए सिंगललेन सड़क है, कई जगह जिसकी हालत खराब है। यहां तक पहुंचने में पर्यटकों को थोड़ी मुश्किल का सामना जरूर करना पड़ता है लेकिन यहां आने के बाद उन्हें महसूस होगा कि यदि वे इस मंदिर को न देखते तो देखने के लिए बहुत कुछ छूट जाता। नौवीं सदी में शिवमंदिर का निर्माण तत्कालीन प्रतिहार राजवंश ने कराया था। मंदिर गोलाकार है, ठीक भारतीय संसद के भवन की तरह। मंदिर की गोलाई में चौसठ कमरे हैं। प्रत्येक कमरे में एक-एक शिवलिंग है। कभी इन कमरों में भगवान शिव के साथ देवी योगिनी की मूर्तियां भी थीं। देवी योगिनी की चौसठ मूर्तियों के कारण ही इसका नाम चौसठ योगिनी शिवमंदिर पड़ा। देवी योगिनी की काफी मूर्तियां ग्वालियर किले के संग्रहालय में रखी हैं। परिसर के बीचों-बीच एक बड़ा गोलाकार शिवमंदिर भी है। मुख्य मंदिर में १०१ खंभे कतारबद्ध खड़े हैं, जो संसद भवन के गलियारे की याद दिलाते हैं। मंदिर के निर्माण में लाल-भूरे बलुआ पत्थरों का उपयोग किया गया है, जो मितावली और उसके आसपास के इलाके में पाए जाते हैं। स्थानीय लोग कहते हैं कि प्राचीन समय में मंदिर में तांत्रिक साधना की जाती थीं। यह तांत्रिक अनुष्ठान का बड़ा केन्द्र था।
भव्य शिवमंदिर को देखने के लिए जनवरी-फरवरी के माह में हम घुमक्कड़ मित्रों की टोली ने योजना बनाई थी। इस टोली में मेरे साथ युवा पत्रकार हरेकृष्ण दुबोलिया, महेश यादव और गिरीश पाल भी शामिल थे। हम ग्वालियर से किराए की टैक्सी से मितावली की ओर निकले। मितावली के नजदीक पहुंचकर जब कुछ स्थानीय लोगों से हमने मंदिर तक पहुंचने के रास्ते के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा- ‘चम्बल की संसद देखने जा रहे हो।’ इस कथन से स्पष्ट होता है कि स्थानीय लोगों के लिए देश में दो संसद भवन हैं। एक दिल्ली में तो दूसरा उनके गांव मितावली में। वैसे रास्ता बताने में गूगल मैप ने भी हमारी खूब मदद की। आखिर गूगल मैप और ग्रामवासियों की मदद से हम जल्द ही चौसठ योगिनी शिवमंदिर पहुंच गए। टैक्सी नीचे छोड़कर पैदल ही करीब २०० सीढिय़ां चढ़कर पहाड़ी के ऊपर मंदिर के सामने पहुंचे। पर्यटकों की ज्यादा संख्या नहीं थी। किसी दूसरे शहर से आए करीब पांच-छह और लोग वहां मौजूद थे। मंदिर को लेकर उनसे काफी देर तक बातचीत हुई। वे भी आश्चर्यचकित थे चम्बल में संसद भवन का प्रतिरूप देखकर। पर्यटकों के उस समूह में एक बुजुर्ग धोती-कुर्ता पहने हुए थे। बातचीत में पता चला कि वे पंडित हैं और मुम्बई से आए हैं। उनके साथ अप्रवासी भारतीय थे, जो उनके यजमान थे। पंडितजी भारत के गौरव से रू-ब-रू कराने के लिए अपने यजमानों को कुछ चिह्नित जगहों पर घुमाने निकले थे। उनकी भारत दर्शन की योजना में चम्बल का यह हिस्सा भी शामिल था, यह जानकर सुखद अनुभव हुआ।
मितावली के आसपास बिखरा पड़ा है सांस्कृतिक इतिहास : मध्यप्रदेश सरकार और केन्द्र सरकार चाहे तो चम्बल में पर्यटकों की संख्या को आसानी के साथ बढ़ाया जा सकता है। इसका फायदा यहां के ग्रामवासियों को तो होगा ही साथ ही सरकारों के राजकोष में भी इजाफा हो सकेगा। आगरा का ताजमहल और ग्वालियर का किला तो दुनिया के लोगों को आकर्षित कर अपने पास बुलाता ही है। अगर सरकार थोड़े से प्रयास करे तो आगरा और ग्वालियर आने वाले इन मेहमानों को डकैतों-बागियों के लिए कुख्यात चम्बल की खूबसूरत और ऐतिहासिक रूप से समृद्ध तस्वीर भी दिखाई जा सकेगी। ग्वालियर-चम्बल क्षेत्र पर्यटन के नजरिए से काफी समृद्ध है। मुरैना से सिहोनिया गांव (ककनमठ), मितावली, पडावली, बटेश्वर होते हुए नूराबाद तक के बेल्ट में गौरवशाली इतिहास के दर्शन होते हैं। मुरैना शहर से उत्तर-पूर्व दिशा में करीब २० किलोमीटर दूर सिहोनिया गांव में आठवीं सदी का ककनमठ मंदिर है। ककनमठ मंदिर खजुराहो के कंदारिया महादेव मंदिर से भी विशाल है। ककनमठ मंदिर से पश्चिम की दिशा में करीब ३० किलोमीटर की दूरी पर मितावली का चौसठ योगिनी मंदिर स्थित है। मितावली से दक्षिण-पश्चिम दिशा में करीब चार किलोमीटर ही आगे बढऩे पर पडावली आता है। पडावली में विशाल विष्णु मंदिर है। मंदिर के मण्डप की चार दीवारों पर चार युगों, सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलयुग में मनुष्य की प्रवृत्ति को दिखाने का प्रयास किया गया है। इसके लिए सेंड स्टोन पर खूबसूरती से संभोग से लेकर समाधि में लिप्त आकृतियां उकेरी गई हैं। पडावली में शानदार नक्काशी को देखकर करीब एक किलोमीटर ही आगे बढऩा होगा कि शिवमंदिरों का खजाना हमारी प्रतीक्षा कर रहा होता है। कहते हैं आठवीं शताब्दी में कभी यहां ३००-४०० शिवमंदिरों का समूह था। एक समय में ये सभी मंदिर जमींदोज हो गए थे। पुरातत्व विभाग के प्रयासों से यहां फिर से आधा सैकड़ा से अधिक मंदिर पुनर्जन्म ले चुके हैं। यहां आकर पर्यटकों को अलौकिक शांति का अनुभव होता है। अब यहां से उत्तर-पूर्व की दिशा में करीब आठ किलोमीटर आगे बढऩे पर शनिश्चरा मंदिर के दर्शन होते हैं। यह भारत का दूसरा शनिमंदिर है। यह पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। यहां से ग्वालियर की दूर २७ किमी रह जाती है। पर्यटन के नजरिए से इस बेल्ट पर ध्यान दिया जाए तो ग्वालियर-चम्बल को डकैत, बीहड़, बंदूक के अलावा उसकी खूबसूरती, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक समृद्धि के लिए भी पहचाना जाएगा।
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भारत का संसद भवन