बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

विदेशी इशारों पर विकास को अवरुद्ध करते एनजीओ

                                       





  पश्चिम के इशारे पर विकास को अवरुद्ध करते एन जी ओ

 साभार - पाथेयकण, जयपुर, राजस्थान 

http://www.patheykan.in
देश की गुप्तचर संस्था आई.बी.ने हाल ही में एक बड़ा खुलासा किया है कि देश के अनेक एनजीओ (गैर सरकारी संगठन- Non Governmental Organisation) पर्यावरण सुरक्षा, विस्थापन आदि के नाम पर भारत में विकास की बड़ी परियोजनाओं का विरोध पश्चिमी देशों के इशारे पर करते हैं। इसके लिए उन्हें अमरीका व दूसरे पश्चिमी देशों से अथाह धनराशि प्राप्त होती है। ये एनजीओ पश्चिमी देशों के हितों को आगे बढ़ाने का माध्यम बन गये हैं। आई बी का तो यहॉं तक कहना है कि एनजीओ की इस भूमिका के कारण भारत का आर्थिक विकास धीमा हो गया है।  इंटेलिजेंस ब्यूरो का अनुमान है कि इससे भारत की जीडीपी वृद्धिदर 2 से 3 प्रतिशत कम हो रही है।


एन जी ओ के बारे में आम धारणा रही है कि ये संगठन ग्रामीण विकास, स्वच्छता, शिक्षा,स्वास्थ्य, साक्षरता, अनाथालय आदि सामाजिक सेवा करने वाले संगठन हैं। परन्तु आई बी ने अपनी रपट में खुलासा किया है कि मानवाधिकार, पर्यावरण सुरक्षा, धार्मिक स्वतंत्रता, असमानता आदि के नाम पर अनेक एनजीओ देश के विकास की बड़ी परियोजनाओं का विरोध करते हैं। ये आसपास की गरीब ग्रामीण जनता तथा वनवासियों को बेघरबार होने का झूठा डर दिखा कर प्रदर्शन करते हैं। अपनी जमात के प्रशांत भूषण जैसे कुछ वकीलों से मिल कर न्यायालय में जनहित याचिका लगाकर उन योजनाओं को उपरोक्त वर्णित कारणों के आधार पर रोकने का प्रयास करते हैं।
विकास परियोजनायें अटकी-आई बी ने देश की ऐसी 7 परियोजनाओं का उदाहरण दिया हैजो देश के बुनियादी विकास में महत्वपूर्ण हैं, परन्तु एनजीओ के विरोध प्रदर्शन के कारण रुकी पड़ी हैं। इस प्रकार एनजीओ विदेशी एजेंट की भूमिका में नजर आने लगे हैं।
आई बी के अनुसार "ग्रीन पीस' नाम के एनजीओ ने देशभर में पर्यावरण सुरक्षा के नाम पर परमाणु प्लांट विरोधी माहौल तैयार कर कोयले की खानों एवं कोयला आधारित पावर प्लांट को रोकने का जबर्दस्त प्रयास किया। मध्य प्रदेश में "हिंडाल्को' की एल्यूमिनियम उत्पादन सम्बन्धी परियोजना का भी ग्रीनपीस ने ही विरोध किया, जिसकी लागत 9,200 करोड़ रु. है।
मेधा पाटेकर ने नर्मदाबांध परियोजना का विरोध इस आधार पर किया कि इससे वहॉं के निवासी बेघर हो जायेंगे। विरोध के कारण परियोजना 8 वर्ष लटकी रही तथा उसका बजट 6,40,604 करोड़ से बढ़कर 39,24,245 करोड़ रु. हो गया। परियोजना का उद्‌देश्य गुजरात के सूखाग्रस्त इलाकों को पानी पहुँचाना तथा बिजली पैदा करना है। इससे महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश व राजस्थान को सिंचाई व पीने के लिए पानी तथा बिजली मिलेगी।
इस परियोजना को रोकने में मेधा पाटेकर को आगे करने में अमरीका तथा
वर्ल्ड बैंक की  बड़ी भूमिका है। अमेरिका पर्यावरण तथा पुनर्वास के नाम पर इस परियोजना को बंद कराना चाहता था ताकि भारत ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर न बन सके। इसीलिए मेधा पाटेकर सर्वोच्च न्यायालय तक गयी। परन्तु, न्यायालय ने बांध निर्माण रोकने से मना कर दिया। तब मेघा पाटेकर, प्रशांत भूषण तथा अरूंधति राय ने सुप्रीम कोर्ट पर हमला करते हुए न्यायालय के समक्ष प्रदर्शन तक किया। न्यायालय ने इसे अपनी अवमानना माना तो मेधा पाटेकर व प्रशांत भूषण ने माफी मांग ली परन्तु अरूधंति राय द्वारा मांफी न मांगने पर न्यायालय ने उसे एक दिन के लिये जेल भेजा। उल्लेखनीय है कि नर्मदा बांध परियोजना से एक भी वनवासी बेघर नहीं हुआतथा गुजरात सरकार के पुनर्वास कार्यक्रम की पूरे विश्व में सराहना हुई।  इतना ही नहीं इससे वनवासियों को भी फल व सब्जियों की खेती के लिए पानी उपलब्ध हुआ।
20 लाख एनजीओ- सर्वोच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान भारत की प्रमुख जॉंच एजेंसी सीबीआई को भारत में कार्यरत एनजीओ तथा उन्हें विदेशों से प्राप्त धन के बारे में जानकारी एकत्र करने के निर्देश दिये थे। सीबीआई के अनुसार इस समय भारत में लगभग 20 लाख एनजीओ कार्यरत हैं। देश की कुल आबादी  में इनका हिसाब लगाया जाय तो प्रति 600 व्यक्तियों पर एक एनजीओ है। प्रत्येक एनजीओ में अनेक व्यक्ति काम करते हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता हैकि एनजीओ तंत्र का फैलाव कितना व्यापक है।


अथाह धनराशि का दुरुपयोग-

एनजीओ को समाजसेवा के विविध प्रकल्प चलाने के लिए केन्द्र व राज्य सरकारों के साथ ही विदेशों से अपार धनराशि प्राप्त होती है। एक अनुमान के अनुसार सन्‌ 2002 से 2009 के मध्य केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा एनजीओ को छःहजार करोड़ रुपये से अधिक की राशि दी गई। इस अवधि में विदेशों से उनको प्राप्त धन की जानकारी सामने नहीं आयी है। परन्तु 2010-11 में इन्हें विदेशों से एक खरब 25 अरब रुपये प्राप्त हुए। इसमें केन्द्र व राज्य सरकारों से प्राप्त राशि जोड़ दी जावे तो इतनी भारी भरकम राशि से देश के सामाजिक क्षेत्र का कायापलट हो जाना चाहिए था। परन्तु हुआ क्या?

ये संस्थाएं नियमानुसार प्रतिवर्ष अपनी आय-व्यय का ब्यौरा तथा आयकर रिटर्न आदि प्रस्तुत नहीं करते। हाल यह है कि समाज सेवा के नाम पर एनजीओ में काम करने वाले लोग एनजीओ को रोजगार व कमाई का साधन तथा नाम, यश व देश-विदेश की यात्राओं का माध्यम  बना बैठे हैं।
"कबीर' नाम के एनजीओ के सर्वेसर्वा आप पार्टी के अरविन्द केजरीवाल तथा मनीष सिसोदिया हैं। इस एनजीओ को फोर्ड फाउन्डेशन ने लाखों डालर दिये। इसके माध्यम से अमरीका  ने भारत की अनेक विकास परियोजनाओं को रोकने के साथ ही सरकार  के अन्दर तक अपनी पहुँच बना ली थी।
तमिलनाडु के कुडनकुलम में परमाणु ऊर्जा  संयंत्र रूस के सहयोग से लग रहा है। आर्थिक संकट में फॅंसा अमरीका यह ठेका लेना चाह रहा था। ठेका न मिलने पर उसने पी.उदय कुमार के एनजीओ सहित कुछ अन्य एनजीओ को भारी पैसा देकर उन्हें परमाणु संयंत्र के विरुद्ध खड़ा कर दिया। उदयकुमार ने अमरीकी पैसे से पर्यावरण सुरक्षा के नाम पर कुडनकुलम संयंत्र के विरोध में आंदोलन चलाया तथा अदालतों में इसे रोकने की कोशिश की।  आखिर सर्वोच्च न्यायालय ने कुडनकुलम परमाणु प्लॉंट को देश के विकास में उपयोगी मानकर अपनी अनुमति प्रदान कर दी।
यू.पी.ए. सरकार का भ्रष्टाचार-

लगभग एक वर्ष पूर्व प्रस्तुत एसीएचआर (Asian Centre for Human Rights) की रपट के अनुसार पिछली यू.पी.ए. सरकार के कई मंत्रालयों ने एनजीओ को अनुदान देने में भारी भ्रष्टाचार किया था। मंत्रालयों के पास एनजीओ को दिये धन का कोई लेखा-जोखा तक नहीं है। एक उदाहरण लें- मानव संसाधन मंत्रालय ने सूचित किया कि 2008-09 की अवधि में मंत्रालय ने एनजीओ की सहायतार्थ 22 करोड़ रु. दिये जबकि मंत्रालय की रपट के अनुसार 120 करोड़ रु. दिये गये।

परिवार कल्याण मंत्रालय ने सूचना के अधिकार के तहत  बताया था कि मंत्रालय द्वारा एनजीओ को उक्त अवधि में 123 करोड़ रु. दिये गये जबकि सम्बन्धित मंत्री गुलाम नबी आजाद ने लोकसभा में  218 करोड़ रु. देना बताया। यही हाल अन्य मंत्रालयों का था। स्पष्ट है कि पिछली यूपीए सरकार के स्तर पर भी खूब भ्रष्टाचार हुआ। एनजीओ के पदाधिकारी बताते हैं कि सरकार से अनुदान प्राप्त करने में उन्हें 15 से 30 प्रतिशत तक घूस देनी प़डी। समाजसेवा के लिए धन प्राप्त करने हेतु घूस देना कितना विचित्र मामला है।
आईबी, सीबीआई तथा एसीएचआर की रपट आँखें खोल देने वाली हैं। पर्यावरण, विस्थापन आदि के नाम पर देश की विकास परियोजनाओं का विरोध करना भयंकर अपराध से कम नहीं है। यह सब पश्चिमी देशों के इशारे पर करना और भी खतरनाक है। देश की जनता के सामने ऐसे एनजीओ का असली चेहरा आना चाहिए। सरकार को भी ऐसे एनजीओ की गतिविधियों का पर्दा-फाश करते हुए उनके विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करनी चाहिये।
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                                                 कांग्रेसी भी नही थे धर्मांतरण के पक्षधर

September 17, 2013 उगता भारत ब्यूरो प्रमुख समाचार/संपादकीय, राजनीति/धर्मचिंतन
राकेश कुमार आर्य
भारत धर्मान्तरण का जहर फेेलता ही जा रहा है। धर्म के नाम पर भारतीय उपहाद्वीप विभाजन की भयानक पीड़ा पूर्व में झेल चुका है। आगे क्या हो सकता है ये सोचकर भी मन सिहर उठता है। परंतु देश का बहुसंख्यक यदि किसी गफलत में सोता रहा तो कुछ भी संभव है, देश के पूर्वोत्तर भाग का ईसाईकरण कर दिया गया है। वहां से अलगाव की बातें उठ रही हैं। स्मरण रहे कि चीन इस भूभाग को भारत से अलग कराने में ईसाई देशों के साथ होगा। क्योंकि वह नही चाहता कि उसके पड़ोस में भारत एक महाशक्ति बनकर उभरे। वह खंडित भारत को अपने लिए अधिक उपयुक्त मानता है। ऐसा नही है कि भारत के पूर्वोत्तर में ही धर्मांतरण का खेल खेला जा रहा है, अपितु देश के अन्य भागों में भी इस्लाम और ईसाइयत के द्वारा यह भयानक स्तर पर चल रहा है। शाहबुद्दीन का वह वाक्य काम कर रहा है कि हमने हिंदुस्तान पर कभी तलवार के बल पर शासन किया था पर अब वक्त बदल चुका है, आज तलवार का काम वोट करेगी।

संविधान सभा में धर्मांतरण के मुद्दे पर बड़ी तार्किक बहस हुई थी। उस समय कांग्रेस के बड़े नेताओं तक ने भी धर्मांतरण के प्राविधान का विरोध किया था। संविधान सभा में इस विषय पर बोलते हुए सरदार पटेल ने कहा था कि ‘श्रीमान जी! यह सभी जानते हैं कि बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है, जो ताकत के बल पर, भय और प्रलोभन के बल पर छल और षडयंत्र से हो रहा है। बच्चे मां बाप के साथ धर्म परिवर्तन करने को विवश हैं। अनाथ बच्चों का धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है। ऐसे में क्या करना उचित होगा? मेरी राय में धर्म परिवर्तन के प्राविधानों को पुनर्विचार के लिए सलाहकार समिति को वापस कर दिया जाए।’ (इस पर सदन ने अपनी सहमति व्यक्त की थी) तब सदन के विचार से सहमत होकर सलाहकार समिति ने इन प्राविधानों को संविधान में न रखने की सलाह दी थी।

कांग्रेस के ही पुरूषोत्तम दास टण्डन ने बहस में भाग लेते हुए कहा था-’अध्यक्ष महोदय, हमारे ईसाई भाइयों के यहां दिये गये भाषणों से मैं हतप्रभ हूं। हम कांग्रेसी धर्मपरिवर्तन को अनुचित मानते हैं और इसके पक्ष में नही हैं। मेरी राय में किसी को अपने धर्म में परिवर्तन कराने का काम निरर्थक है। यह तभी हो जबकि कोई व्यक्ति अपना धर्म परिवर्तन कराने का आवेदन स्वेच्छा से करे। अब यह कहा जा रहा है कि उन्हें (ईसाईयों को) युवाओं का धर्म परिवर्तन कराने का अधिकार हो….यह क्या है? श्रीमान जी मैं अवाक हूं, यह देखकर कि मेरे कुछ ईसाई मित्र अल्पवयस्कों के धर्म परिवर्तन को अधिकार बनाने के पक्ष में तर्क दे रहे हैं।

हम कांग्रेसी धर्म परिवर्तन को किसी भी तरह सही नही मानते हैं। लेकिन हमें अपने ईसाई मित्रों को साथ लेकर चलना है। हम तो धर्म प्रचार तक को भी मूल अधिकार बनाए जाने तक के विरूद्घ थे। पर हम सहमत हो गये हैं।’
इसी विषय पर लोकनाथ मिश्रा ने अपने विचार यूं प्रकट किये थे-’श्रीमान जी…आप जानते हैं कि धर्म प्रचार ने ही भारत की यह दशा की है, और इसी के कारण भारत पाकिस्तान का बंटवारा हुआ। अगर इस्लाम ने भारत आकर अपनी आस्थाएं न थोपी होतीं तो भारत पूर्णत: पंथ निरपेक्ष तथा सर्वधर्म समभाव वाला देश बना रहता और इसके खंडित होने का, बंटवारे का कोई सवाल ही नही उठता (माननीय सदस्य के ये शब्द विचारणीय हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि मुस्लिम लीग का साम्प्रदायिक दृष्टिकोण ही विभाजन के लिए उत्तरदायी था) वर्तमान संदर्भों में धार्मिक प्रचार के क्या माने हैं? ….ईसाइयों ने पिछले दरवाजे से यह गुपचुप शांति से घुसपैठ बनाने की युद्घ नीति अपनाई है गलती हमारी है कि हम सुरक्षा के लिए बाड न ही लगाते हैं। अगर लोग धर्म प्रचार करना चाहते हैं तो मैं कहूंगा कि उन्हें करने दो, लेकिन संविधान में इसे मूल अधिकार का दर्जा देकर धर्म प्रचार को प्रोत्साहन मत दो।’

इस विषय में गांधी जी के विचार भी उल्लेखनीय हैं। उन्होंने ‘यंग इंडिया’ में 24 अप्रैल 1931 को तथा ‘हरिजन’ में 7 फरवरी 1931 को लिखा था-’यदि वे पूरी तरह से मानवीय कार्यों तथा गरीबों की सेवा करने की बजाए डॉक्टरी सहायता व शिक्षा आदि के द्वारा धर्म परिवर्तन करते हैं तो मैं चाहूंगा कि वे ईसाई यहां से चले जाएं। प्रत्येक राष्ट्र का धर्म अन्य राष्ट्र के धर्म के समान ही श्रेष्ठ है। हमें धर्म परिवर्तन की कोई आवश्यकता नही।’

कांग्रेस के ही अनंत शयनम आयंगर (पूर्व लोकसभा अध्यक्ष) ने भी कहा था-’यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मजहब का उपयोग किसी की आत्मा को बचाने के लिए नही बल्कि समाज को तोड़ने के लिए किया जा रहा है। इसीलिए मैं चाहता हूं कि भारतीय संविधान में एक मूल अधिकार जोड़ा जाए जिसमें धर्मांतरण पर रोक की व्यवस्था हो।’
राष्ट्रवादी मुस्लिम नेता हुसैन इमाम ने कहा था…’जबरदस्ती धर्म परिवर्तन घोर अवांछनीय है। इसलिए जैसा कि सरदार पटेल ने स्वीकार किया कि इन्हें मूल अधिकारों में नही रखना चाहिए’ (यही उचित है)।
तजम्मुल हुसैन साहब ने कहा था ‘धर्म निजी मामला होना चाहिए। मैं क्यों आपसे कहूं कि आप मेरे तरीके से अपनी आत्मा को शांति दें और आप क्यों मुझसे कहें कि मैं आपके तरीके से अपनी आत्मा को शांति दूं। अगर इस पर सिद्घांतत: सहमति है तो फिर धर्म के प्रचार की बात क्यों?…ईमानदारी से अपने घर पर धर्म को मानो और आचरण करो।

….अगर आपने इस देश में धर्म का प्रचार करना आरंभ कर दिया तो आप समस्या बन जाएंगे।
यह सारे तर्क अपने आप में विचारणीय हैं। इनसे सिद्घ होता है कि कांग्रेस भी मूल रूप में धर्म प्रचार के माध्यम से धर्मांतरण के विरूद्घ थी और यहां तक कि उसके मुस्लिम सदस्य भी धर्मांतरण के राष्ट्रघाती खेल के विरोधी थे। परंतु केवल नेहरू परिवार की विपरीत धर्मालंबियों से विवाह करने की पारिवारिक पृष्ठभूमि ने इस सोच को पलीता लगा दिया। कांग्रेस की चारण संस्कृति ने सदा ही नेता के इशारे पर काम किया है, इसलिए जैसा नेता ने चाहा वैसा ही नाच किया। नेहरू का लेडीमाउंट बेटन के प्रति ल गाव, इंदिरा का फिरोज से विवाह करना और राजीव का सोनिया से विवाह करना ये वो लम्बा सफर है, जिसके कमजोर पेंचों ने देश की इस सबसे बड़ी पार्टी को वैचारिक खोखले पन तक ला खड़ा किया। सोनिया के कारण ही मदर टेरेसा जैसी उस स्त्री का भारत में महिमामंडन हुआ जिसने अपने समय में पूर्वोत्तर का सर्वाधिक धर्मांतरण कराया।

अब यदि भारत का भविष्य उज्ज्वल करना है तो हमें श्रीमती ऐनीबीसेंट के इन शब्दों पर ध्यान देना ही होगा-’यदि अपने भविष्य को मूल्यवान समझते हो व अपनी मातृभूमि से प्रेम करते हो तो अपने प्राचीन धर्म की अपनी पकड़ को छोड़िए नही। उस निष्ठा से च्युत न होइए जिस पर भारत का प्राण निर्भर है। हिंदू धर्म के अतिरिक्त अन्य किसी मत की रक्तवाहिनियां ऐसी शुद्घ स्वर्ण की नही है, जिनमें आध्यात्मिक जीवन का रक्त प्रवाहित किया जा सके। भारत और हिंदू धर्म एक रूप है। मैं यह कार्य भार आपको सौंप रही हूं। जो हिंदू धर्म के प्रति निष्ठावान रहा, वही आपका सच्चा जीवन है। कोई धर्म भ्रष्ट कलंकित हाथ आपको सौंपी गयी इस पवित्र धरोहर को स्पर्श कर सकें।’ (हिंदू जीवनादर्श से)

इसलिए जागिए किसी को चोट पहुंचाने के लिए नही, अपितु स्वयं को मिटने से बचाने के लिए जागिए। 2014 का चुनाव सभी देशभक्त और राष्ट्रप्रेमी लोगों के विवेक की परीक्षा के रूप में आ रहा है। चुनावी जंग राष्ट्रवादियों और छद्म वादी गद्दरों के बीच है। देखते हैं आप क्या निर्णय लेते हैं?

मुजफ्फर नगर के दंगे छद्मनीतियों और वोटों की राजनीति के गंदे खेल का परिणाम हैं। धर्मांतरण की प्रक्रिया को यदि प्रारंभ में ही अवैध घोषित कर दिया जाता और मजहब को व्यक्ति का नेतांत निजी मामला मान लिया जाता तो आज सैकड़ों जानें इन दंगों में चली गयीं हैं वो न गयी होतीं। कांग्रेस और कांग्रेसी नीतियों पर चलने वाले सभी राजनीतिक दलों के लिए यह चिंतन का विषय होना चाहिए कि जब प्रारंभ में ही धर्मांतरण को उचित नही माना गया तो भारतीय लोकतंत्र के राजपथ पर चली रेल में यह कहां से और क्यों कर सवार हो लिया था? यदि अब भी नही चेते तो क्या सर्वनाश कराके ही चेतेंगे?

मदर टेरसा और उनका मकसद





---------- संघ के परम पूज्य सरसंघचालक मोहनजी भगवत ने क्या कहा और उसे तोड़ मरोड़ कर क्या पेश किया यह सभी समझते हैं । उनका कहना था सेवा के पीछे कोई निहित स्वार्थ नहीं होना चाहिए । और यह भी सब जानते हैं की ईसाई मिशनरियां शुद्ध रूप से धर्मांतरण करवाती हैं । विदेशों से इस हेतु अरबों रूपये आते हैं । महात्मा  गांधी भी ईसाईयों के इस कुकृत्य के खिलाफ थे । ईसाईयों के रोम रोम में धर्मांतरण है , मात्र 2000 साल में यूरोप , दोनों अमरीका , ऑस्ट्रेलिया  , अफ्रीका महाद्वीपों पर इन्होनें वहां के मूल पंथों को समाप्त कर दिया है । ईसाई और इस्लाम ने बहुतसे धर्मयुद्ध लड़े हैं । एशिया को ईसाई बनाने  के लिए , भारत को ईसाई बनाओ के उद्देश्य से ईसाई मिशनरियां और ईसाई देश काम कर रहे हैं । ईसाई धर्मांतरण की रक्षा और उसके पोषण के लिए उनके धन से स्थापित मिडिया और व्यापारिक तथा रणनीतिक संस्थान तरह तरह के पाखंडों में लिप्त रहते हैं । ---------अरविन्द सिसोदिया, कोटा राजस्थान 

आखिर मदर टेरेसा का मकसद क्या था?
By  एबीपी न्यूज Tuesday, 24 February 2015
http://abpnews.abplive.in/ind/2015/02/24/article510902.ece/mother-teresa
नई दिल्ली: मदर टेरेसा एक बार फिर चर्चा में हैं. मदर टेरेसा की पहचान गरीबों के लिए काम करने वाले मसीहा की जैसी है लेकिन इस बार चर्चा है उनकी सेवा के पीछे छिपे हुए मकसद के लिए जिसे आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत ने धर्मांतरण कहा है. तो क्या है मदर टेरेसा का पूरा सच?

एक आम भारतीय के जहन में मदर टेरेसा की ये तस्वीर उस बेमिसाल सेवा का प्रतीक है जिसने दीन-दुखियारों के दुख को अपना दुख बना लिया. हर उस शख्स को गले लगा लिया जिसे दुनिया ने ठुकरा दिया करती है. 1910 में युगोस्लाविया में जन्मी मदर टेरेसा 1929 में भारत आकर कोलकाता में बस गई थीं. साल 1950 में उन्होंने मिशनरीज ऑफ चैरिटी की स्थापना की और इसके जरिए उन्होंने गरीबों और कुष्ठ रोगियों की जो सेवा की उसकी मिसाल बहुत कम मिलती है. साल 1979 में उन्हें शांति का नोबल पुरस्कार मिला. 73 साल की उम्र तक बिना रुके बिना थके वो गरीबों और कुष्ठ रोगियों के बीच प्यार लुटाती रहीं और साल 1997 में उनका देहांत हो गया.

मदर टेरेसा की ये कहानी उनकी मत्यु के 18 बरस बाद हम आपको क्यों सुना रहे हैं? इसकी भी वजह है. वजह है आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का बयान. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर संघ चालक यानी मुखिया हैं मोहन भागवत और उनका बयान आते ही आरएसएस के समर्थक और बीजेपी – शिवसेना जैसी राजनीतिक पार्टियां उनके समर्थन में उतर आई हैं.

  मोहन भागवत ने क्या कहा था-
गैर सरकारी संगठन ‘अपना घर’ की ओर से आयोजित समारोह में भागवत ने कहा, ‘‘मदर टेरेसा की सेवा अच्छी रही होगी. परंतु इसमें एक उद्देश्य हुआ करता था कि जिसकी सेवा की जा रही है उसका ईसाई धर्म में धर्मांतरण किया जाए.’’ उन्होंने कहा, ‘‘सवाल सिर्फ धर्मांतरण का नहीं है लेकिन अगर यह (धर्मांतरण) सेवा के नाम पर किया जाता है तो सेवा का मूल्य खत्म हो जाता है.’’

भागवत ने कहा, ‘‘परंतु यहां (एनजीओ) उद्देश्य विशुद्ध रूप से गरीबों और असहाय लोगों की सेवा करना है.’’ सरसंघचालक यहां से करीब आठ किलोमीटर दूर बजहेरा गांव में एक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे. गांव में उन्होंने ‘महिला सदन’ और ‘शिशु बाल गृह’ का उद्घाटन किया.

आरएसएस का पक्ष-
आरएसएस का हालांकि कहना है कि उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया गया. संगठन के आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर कहा गया है, "मीडिया गलत तरीके से रिपोर्ट दे रहा है.  भरतपुर में सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के पूर्व महानिदेशक ने कहा था कि मदर टेरेसा ने उद्देश्य के साथ सेवा की थी. इसके जवाब में भागवत ने कहा था कि जैसा कि डॉ. एम. वैद्य ने कहा है कि मदर टेरेसा के सेवा का उद्देश्य था, लेकिन हम बदले में किसी चीज की अपेक्षा किए बगैर सेवा करते हैं."

दूसरी तरफ है मदर टेरेसा जैसी शख्सियत पर भागवत के बयान का तीखा विरोध – बहस शुरू हो चुकी है. कांग्रेस, सपा, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है. अरविंद केजरीवाल ने आज ट्वीट करके कहा, 'मैंने कुछ महीने कोलकाता स्थित निर्मल हृदय आश्रम में मदर टेरेसा के साथ काम किया है. वह महान इंसान थीं, उन्हें बख्श दिया जाए.'

बहस के बीच हैं मदर टेरेसा. आखिर मदर टेरेसा का मकसद क्या था – सेवा या धर्मांतरण.

मदर टेरेसा की ईसाई धर्म में आस्था बेहद गहरी थी. जीसस क्राइस्ट के लिए उनका समर्पण ही उन्हें ईसाई मिशनरी बनाकर भारत ले आया था. कोलकाता के कालीघाट इलाके से शुरु हुआ ये सेवा का सफर मदर टेरेसा के लिए लाया बेशुमार शोहरत. उनका गरीबों से ये प्रेम दुनिया के सामने तब आया जब 1969 में इंग्लैंड के खबरिया चैनल बीबीसी ने उनके इस काम को अपने कैमरे में कैद कर दुनिया के सामने पहुंचा दिया.

मदर टेरेसा को जो शोहरत मिली वो जल्द ही विवादों में भी आ गई. साल 1989 में बड़ा सवाल उठाया कोलकाता में उनके साथ 9 साल काम करने वाली सुजैन शील्ड ने सुजैन ने लिखा कि मदर को इस बात की बेहद चिंता थी कि हम खुद को गरीब बनाए रखें. पैसे खर्च करने से गरीबी खत्म हो सकती है. उनका मानना था इससे हमारी पवित्रता बनी रहेगी और पीड़ा झेलने से जीसस जल्दी मिलेगा. यहां तक कि वह जिनकी सेवा करती थीं उन्हें पुराने इंजेक्शन की सुई खराब हो जाने से दर्द होता था लेकिन वह नए इंजेक्शन भी नहीं खरीदने देती थीं.
मदर टेरेसा ऐसा क्यों चाहती थीं?  इसका जवाब 1989 में मदर टेरेसा ने खुद टाइम मैगजीन को दिए एक इंटरव्यू में दिया था.
सवाल – भगवान ने आपको सबसे बड़ा तोहफा क्या दिया है?

मदर टेरेसा – गरीब लोग

सवाल – (चौंकते हुए) वो तोहफा कैसे हो सकते हैं?

मदर टेरेसा –उनके सहारे 24 घंटे जीसस के पास रहा जा सकता है.

मदर टेरेसा ने इसी इंटरव्यू में धर्मांतरण पर भी अपना रुख साफ किया था

सवाल – भारत में आपकी सबसे बड़ी उम्मीद क्या है?

जवाब – सब तक जीसस को पहुंचाना.

सवाल – आपके दोस्तों का मानना है कि आपने भारत जैसे हिंदू देश में ज्यादा धर्मांतरण ना करके उन्हें निराश किया है?

जवाब – मिशनरी ऐसा नहीं सोचते. वे सिर्फ जीसस के शब्दों पर भरोसा करते हैं. संख्या का इसके कोई लेना देना नहीं है. लोग लगातार सेवा करने और खाना खिलाने आ रहे हैं. जाइए और देखिए. हमें कल का पता नहीं लेकिन क्राइस्ट के दरवाजे खुले हैं. हो सकता है ज्यादा बड़ा धर्मांतरण ना हुआ हो लेकिन हम अभी नहीं जान सकते कि आत्मा पर क्या असर हो रहा है.

सवाल – क्या उन लोगों को जीसस से प्यार करना चाहिए?

जवाब – सामान्य तौर पर अगर उन्हें शांति चाहिए, उन्हें खुशी चाहिए तो उन्हें जीसस को तलाशने दीजिए. अगर लोग हमारे प्यार से बेहतर हिंदू बनें, बेहतर मुसलमान बनें, बेहतर बौद्ध बनें तो इसका मतलब है उनमें कुछ और जन्म ले रहा है. वो ऊपरवाले के पास जा रहे हैं. जब वो उसके और करीब जाएंगे तो वो उसे चुन लेंगे.

क्या यही वजह है कि अब आरएसएस के समर्थक और बीजेपी दोनों मदर टेरेसा की सेवा को धर्मांतरण से जोड़ कर देख रहे हैं.

मीनाक्षी लेखी ने कहा कि मदर टेरेसा अपने बारे बेहतर जानती थीं, उनकी बायोग्राफी लिखने वाले नवीन चावला खुद स्वीकार कर रहे हैं कि मदर टेरेसा ने खुद कहा था कि मैं कोई सोशल वर्कर नहीं हूं. मेरा काम जीसस की बातों को लोगों तक पहुंचाना है.

मीनाक्षी जिस पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला का जिक्र कर रही हैं मदर टेरेसा के अच्छे दोस्त थे और उन्होंने मदर टेरेसा की जीवनी लिखी है. इसके मुताबिक उन्होंने नवीन चावला से पूछा था.


नवीन चावला - क्या आप धर्मांतरण करवाती हैं?

मदर टेरेसा – बिल्कुल. मैं धर्मांतरण करवाती हूं. मैं बेहतर हिंदू बनाती हूं या बेहतर मुसलमान या बेहतर इसाई. एक बार आपको आपका भगवान मिल गया तो आप तय कर सकते हैं किसे पूजना है.

ये वही बात थी जो वो टाइम मैगजीन से पहले भी कह चुकी थीं. 90 के दशक में भगवान में भरोसा ना रखने वाले क्रिस्टोफर हिचिन्स ने भी मदर टेरेसा पर गंभीर आरोप लगाते हुए एक डाक्यूमेंट्री बनाई जिसकी आज भी चर्चा होती है. इसी डाक्यूमेंट्री में एक सीनियर पत्रकार ने भी कहा कि उनका मकसद धर्म था ना कि सेवा.

भारत में भी मदर टेरेसा के मकसद को लेकर कई बार सवाल उठते रहे हैं.

हालांकि मदर टेरेसा के साथ काम करने वाली सुनीता कुमार उनके मकसद पर देश और दुनिया में बार बार उठने वाले सवालों को गलत ठहराती हैं. मदर टेरेसा ने भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को धर्म की आजादी का कानून बनाते वक्त भी एक खत लिख कर इसका विरोध किया था.

एम एस चितकारा की किताब के मुताबिक मदर टेरेसा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री को 1978 में एक खुला खत लिखा था और इसकी प्रतियां सांसदों में बांटी थीं. खत का रिश्ता धार्मिक स्वतंत्रता के कानून से था. मदर टेरेसा इसके विरोध में थीं क्योंकि इससे धर्मांतरण की प्रक्रिया खतरे में पड़ सकती थी.

मदर टेरेसा की जिंदगी पर उठे से सवाल पिछले 20 साल से बार बार सामने आते रहे हैं. इल्जाम ये भी लगा कि वो अपने मरीजों की देखभाल इसलिए नहीं करती थीं ताकि वो भगवान को याद करते रहें.

ये बेहद खूबसूरत है कि कोई भी बिना सेंट पीटर के स्पेशल टिकट के नहीं मर सकता. हम इसे सेंट पीटर का बपतिस्मा टिकट कहते हैं. हम लोगों से पूछते हैं क्या तुम्हें अपने पापों को माफ करने वाला आशीर्वाद और भगवान चाहिेए. उन्होंने कभी मना नहीं किया. कालीघाट में 29 हजार लोगों की मौत हुई है.

मदर टेरेसा
कैलिफोर्निया, 1992

मदर टेरेसा को लेकर मोहन भागवत ने भले ही आरोप लगाया है लेकिन इसाई आस्था से जुड़े लोग मदर टेरेसा को अब भी चाहते हैं और पूजते हैं.