शनिवार, 21 मार्च 2015

परमपूज्य डॉ. हेडगेवार : अखण्ड राष्ट्र-साधना




अखण्ड राष्ट्र-साधना : डॉ. मनमोहन वैद्य


वर्ष 2011 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वेबसाइट में एक खण्ड जोड़ा गया- 'जॉइन आऱ एस़ एस़ '। इसका उद्देश्य था उन लोगों को संघ से जुड़ने का अवसर प्रदान करना, जिन लोगों तक संघ अभी पहुंच नहीं पाया था या जो लोग अभी संघ से दूर थे। इसका परिणाम बड़ा चौंकाने वाला आया। बड़ी संख्या में लोग, विशेषकर युवा, संघ से जुड़ने लगे। संघ से जुड़ने वालों की संख्या कितनी थी, इसका अंदाजा इन आंकड़ों में मिलता है। 2012 में प्रतिमास 1000 लोग संघ से जुड़े। यह संख्या 2013 में 2500 और 2014 में 9000 थी। इनसे ही संघ के बढ़ते फैलाव का अनुमान लगाया जा सकता है। यह संघ की बढ़ती विश्वसनीयता और प्रभाव को दर्शाता है। संघ ने यह विश्वसनीयता और प्रभाव निरन्तर निष्काम भाव से काम करने के बाद प्राप्त किया है। संघ का प्रभाव तात्कालिक न होकर विचार की ताकत का परिणाम है। तभी तो दुष्प्रचार के बीच भी बड़ी संख्या में लोग संघ से स्वयं जुड़ रहे हैं। इस विचारधारा को मूर्त रूप देते समय संघ के संस्थापक परम पूज्य डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की कल्पना समय और सन्दर्भ की सीमाओं से ऊपर थी। यही कारण है कि बदलते समय और सन्दभार्ें के बीच संघ का क्षितिज निरंतर बढ़ता जा रहा है। डॉ. हेडगेवार के जीवन और दर्शन संघ के लिए नींव की पत्थर की तरह हैं, जिन्होंने राष्ट्र के वैभव को सवार्ेपरि बना दिया, 'अहं' के स्थान पर 'वयं' को स्थापित किया। उनका जीवन झंझावातों से टकराता रहा, पर राष्ट्र के प्रति समर्पण भाव ने सतत उनके संकल्प को मजबूत किया। यही संकल्प संघ शक्ति के रूप मंे हमारे सामने है।
संघ का यह विशाल वटवृक्ष एक तरफ आसमान को छूने के लिए प्रयत्न करता दिखता है, वहीं दूसरी ओर उसकी अनेक जटाएं फिर से जमीन में जाकर इस विशाल विस्तार के लिए रस-पोषण करने हेतु नई-नई जमीन तलाश रही हैं तथा अपनी जड़ों को और गहराई में गाड़ कर अधिक मजबूती प्रदान कर रही हैं। इस सुदृढ़, विस्तृत और विशाल वट वृक्ष का बीज कितना कसदार एवं शुद्ध होगा, इसकी कल्पना से ही मन रोमांचित हो उठता है। संघ रूपी इस विशाल वटवृक्ष को रोपने वाले डॉ. हेडगेवार की 125वीं जन्मतिथि इस वर्ष प्रतिपदा से शुरू हो रही है। परमपूज्य डॉ. हेडगेवार कैसे थे, यह जानने के लिए संघ को जानना होगा।
नागपुर में वर्ष प्रतिपदा के पावन दिन 1 अप्रैल, 1889 को जन्मे डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जन्मजात देशभक्त थे। आजादी के अन्दोलन की आहट भी मध्य प्रान्त के नागपुर में सुनाई नहीं दी थी और केशव के घर में राजकीय आन्दोलन की ऐसी कोई परम्परा भी नहीं थी, तब भी शिशु केशव के मन में अपने देश को गुलाम बनाने वाले अंग्रेज के बारे में गुस्सा था तथा स्वतंत्र होने की अदम्य इच्छा थी। इस सन्दर्भ से जुड़े अनेक प्रसंग हैं। विक्टोरिया रानी के राज्यारोहण के हीरक महोत्सव के निमित्त विद्यालय में बांटी मिठाई को केशव द्वारा (उम्र 8 साल) कूड़े में फेंक देना या पंचम जॉर्ज के भारत आगमन पर सरकारी भवनों पर की गई रोशनी और आतिशबाजी देखने जाने के लिए केशव (उम्र 9 साल) का मना करना, ये कुछ ऐसे उदाहरण हैं, जो उनके व्यक्तित्व को दर्शाते हैं। बंग-भंग विरोधी आन्दोलन का दमन करने हेतु अंग्रेजों ने वन्देमातरम् के उद्घोष करने पर पाबन्दी लगा दी थी। 1907 में इस पाबन्दी की धज्जियां उड़ाने के लिए केशव ने प्रत्येक कक्षा में वन्देमातरम् का उद्घोष करवा कर विद्यालय निरीक्षक का 'स्वागत' करवाने की योजना बनाई थी। इसके माध्यम से उन्होंने सबको अपनी निर्भयता, देशभक्ति तथा संगठन कुशलता से परिचित कराया। मुम्बई में चिकित्सा शिक्षा की सुविधा होते हुए भी, उन्होंने कोलकाता में यह शिक्षा प्राप्त करने का निर्णय लिया। इसका कारण था कोलकाता उन दिनों क्रान्तिकारी आन्दोलन का प्रमुख केन्द्र था। उन्होंने शीघ्र ही क्रान्तिकारी आन्दोलन की शीर्ष संस्था 'अनुशीलन समिति' में अपना स्थान बना लिया था। वे 1916 में डॉक्टर की उपाधि के साथ नागपुर वापस आए। घर की आर्थिक अवस्था ठीक न होते हुए भी उन्होंने अपना व्यवसाय शुरू नहीं किया। यही नहीं उन्होंने विवाह आदि करने का विचार भी त्याग दिया और पूर्ण शक्ति के साथ स्वतंत्रता आन्दोलन में कूद गए।
1920 में नागपुर में होने वाले कांग्रेस के अधिवेशन की व्यवस्था की जिम्मेदारी डॉक्टर जी के पास थी। इस हेतु उन्होंने 1200 स्वयंसेवकों की भर्ती की थी। कांग्रेस की प्रस्ताव समिति के सामने उन्होंने दो प्रस्ताव रखे थे। भारत के लिए पूर्ण स्वतंत्रता और विश्व को पूंजीवाद के चंगुल से मुक्त करना, यह कांग्रेस का लक्ष्य होना चाहिए। पूर्ण स्वतंत्रता का ऐतिहासिक प्रस्ताव कांग्रेस ने दिसंबर, 1929 में स्वीकार कर पारित किया और 26 जनवरी, 1930 को सम्पूर्ण देश में स्वतंत्रता दिवस मनाने का निर्णय किया। इसलिए डॉक्टर जी ने संघ की सभी शाखाओं पर 26 जनवरी, 1930 को कांग्रेस का अभिनन्दन करने के लिए कार्यक्रम करने की सूचना दी थी। इससे डॉक्टर जी की दूरगामी एवं विश्वव्यापी दृष्टि का परिचय मिलता है।
डॉक्टर जी का सार्वजनिक जीवन, राजनीतिक दृष्टिकोण, दर्शन एवं नीतियां तिलक-गांधी, हिंसा-अहिंसा, कांग्रेस-क्रांतिकारी इन संकीर्ण विकल्पों के आधार पर निर्धारित नहीं था। व्यक्ति अथवा विशिष्ट मार्ग से कहीं अधिक महत्वपूर्ण स्वातंत्र्य प्राप्ति का मूल ध्येय था। इसीलिए 1921 में प्रांतीय कांग्रेस की बैठक में लोकनायक अणे की अध्यक्षता में क्रांतिकारियों की निंदा का प्रस्ताव लेने का प्रयास हुआ। तब डॉक्टर जी ने 'आपको उनका मार्ग पसंद न हो, पर उनकी देशभक्ति पर संदेह नहीं करना चाहिए' यह कह कर उस प्रस्ताव को नहीं आने दिया और राजनीति की तस्वीर बदल दी।
वे कहते थे कि व्यक्तिगत मतभिन्नता होने पर भी साम्राज्य विरोधी आन्दोलन में सभी को साथ रहना चाहिए और इस आन्दोलन को कमजोर नहीं होने देना चाहिए। इस सोच के कारण ही वे खिलाफत आन्दोलन को गांधी जी के समर्थन देने की घोषणा का विरोध होने पर भी चुप रहे और गांधी जी के नेतृत्व में असहयोग आन्दोलन में बेहिचक सहभागी हुए।
संघ की स्थापना
स्वतंत्रता प्राप्त करना किसी भी समाज के लिए अत्यंत आवश्यक एवं स्वाभिमान का विषय होने के बावजूद वह चिरस्थायी रहे तथा समाज आने वाले सभी संकटों का सफलतापूर्वक सामना कर सके इसलिए राष्ट्रीय गुणों से युक्त और सम्पूर्ण दोषमुक्त, विजय की आकांक्षा तथा विश्वास रखकर पुरुषार्थ करने वाला, स्वाभिमानी, सुसंगठित समाज का निर्माण करना अधिक आवश्यक एवं मूलभूत कार्य है, यह सोचकर डॉक्टर जी ने 1925 में विजयादशमी के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। प्रखर ध्येयनिष्ठा, असीम आत्मीयता और अपने आचरण के उदाहरण से युवकों को जोड़कर उन्हें गढ़ने का कार्य शाखा के माध्यम से शुरू हुआ। शक्ति की उपासना, सामूहिकता, अनुशासन, देशभक्ति, राष्ट्रगौरव तथा सम्पूर्ण समाज के लिए आत्मीयता और समाज के लिए नि:स्वार्थ भाव से त्याग करने की प्रेरणा इन गुणों के निर्माण हेतु अनेक कार्यक्रमों की योजना शाखा नामक अमोघ तंत्र में विकसित होती गई। सारे भारत में प्रवास करते हुए अथक परिश्रम से केवल 15 वर्ष मंे ही आसेतु हिमालय सम्पूर्ण भारत में संघ कार्य का विस्तार करने में वे सफल हुए।

अपनी प्राचीन संस्कृति एवं परम्पराओं के प्रति अपार श्रद्धा तथा विश्वास रखते हुए भी आवश्यक सामूहिक गुणों की निर्मिति हेतु आधुनिक साधनों का उपयोग करने में उन्हें जरा सी भी हिचक नहीं थी। अपने आपको पीछे रखकर अपने सहयोगियों को आगे करना और सारा श्रेय उन्हें देने की उनकी संगठन शैली के कारण ही संघ कार्य की नींव मजबूत बनी।
संघ कार्य आरंभ होने के बाद भी स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए समाज में चलने वाले सभी आंदोलनों के साथ उनका न केवल सम्पर्क था, बल्कि समय-समय पर वे व्यक्तिगत तौर पर स्वयंसेवकों के साथ सहभागी भी होते थे। 1930 में गांधी जी के नेतृत्व में शुरू हुआ सविनय अवज्ञा आन्दोलन आरंभ में अप्रभावशाली रहा। विदर्भ तिलकवादियों का गढ़ माना जाता था। परन्तु साम्राज्यवाद विरोधी आन्दोलन में व्यक्तिगत मत को किनारे में रखकर इस आन्दोलन में सहभागी होने के लिए उन्होंने विदर्भ में जंगल सत्याग्रह में स्वयंसेवकों के साथ भाग लिया तथा 9 मास का कारावास भी सहन किया। इस सत्याग्रह के साथ आरंभ में 3 -4 हजार लोग थे। सत्याग्रह स्थल पर पहुंचते-पहुंचते 10 हजार लोग हो गए थे। इस समय भी व्यक्ति निर्माण एवं समाज संगठन का नित्य कार्य अविरल चलता रहे, इस हेतु उन्होंने अपने मित्र एवं सहकारी डॉ. परांजपे को सरसंघचालक पद का दायित्व सौंपा था तथा संघ शाखाओं पर प्रवास करने हेतु कार्यकर्ताओं की योजना भी की थी। उस समय समाज कांग्रेस-क्रान्तिकारी, तिलकवादी-गांधीवादी, कांग्रेस-हिन्दू महासभा ऐसे द्वंद्वों में बंटा हुआ था। डॉक्टर जी इस द्वंद्व मंे न फंस कर, सभी से समान नजदीकी रखते हुए कुशल नाविक की तरह संघ की नाव को चला रहे थे। संघ को समाज में एक संगठन न बनने देने की विशेष सावधानी रखते हुए उन्होंने संघ को सम्पूर्ण समाज का संगठन के नाते ही विकसित किया। संघ कार्य को सम्पूर्ण स्वावलंबी एवं आत्मनिर्भर बनाते हुए उन्होंने बाहर से आर्थिक सहायता लेने की परंपरा को बदल कर संघ के स्वयंसेवक ही ऐसे कार्य के लिए आवश्यक सभी धन, समय, परिश्रम, त्याग देने हेतु तत्पर हों इस हेतु 'गुरु दक्षिणा' की अभिनव परंपरा संघ में शुरू की। इस चिर पुरातन एवं नित्य नूतन हिन्दू समाज को सतत प्रेरणा देने वाला प्राचीन एवं सार्थक प्रतीक के नाते भगवा ध्वज को गुरु के स्थान पर स्थापित करने का उनका विचार उनके क्रांतिदर्शी होने का परिचायक है। व्यक्ति चाहे कितना भी श्रेष्ठ क्यों न हो, उसके जीवन एवं व्यक्तित्व की मर्यादा ध्यान में रखकर व्यक्ति नहीं, तत्वनिष्ठा पर उनका बल रहता था। इसके कारण ही आज 9 दशक बीतने के बाद भी, सात-सात पीढि़यों से संघ कार्य चलने के बावजूद संघ कार्य अपने मार्ग से न भटका, न बंटा, न रुका।
अहंकार-रहित जीवन
संघ संस्थापक होने का अहंकार उनके मन में लेशमात्र भी नहीं था। इसीलिए सरसंघचालक पद का दायित्व सहयोगियों का सामूहिक निर्णय होने के कारण 1929 में उन्होंने स्वीकार तो किया, परन्तु 1933 में संघचालक बैठक में उन्होंने अपना मनोगत व्यक्त किया। उसमें उन्होंने कहा, 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जन्मदाता या संस्थापक मैं न होकर, आप सब हैं, यह मैं भली भांति जानता हूं। आपके द्वारा स्थापित संघ का, आपकी इच्छानुसार, मैं एक दाई का कार्य कर रहा हूं। मैं यह काम आप की इच्छा एवं आज्ञा के अनुसार आगे भी करता रहूंगा तथा ऐसा करते समय किसी प्रकार के संकट अथवा मानापमान की मैं कतई चिंता नहीं करूंगा। आपको जब भी प्रतीत हो कि मेरी अयोग्यता के कारण संघ की क्षति हो रही है तो आप मेरे स्थान पर दूसरे योग्य व्यक्ति को प्रतिष्ठित करने के लिए स्वतंत्र हंै। आपकी इच्छा एवं आज्ञा से जितनी सहर्षता के साथ मैंने इस पद पर कार्य किया है, उतने ही आनंद से आप द्वारा चुने हुए नए सरसंघचालक के हाथ सभी अधिकार सूत्र समर्पित करके उसी क्षण से उसके विश्वासु स्वयंसेवक के रूप में कार्य करता रहूंगा। मेरे लिए व्यक्तित्व के मायने नहीं हैं, संघ कार्य का ही वास्तविक अर्थ में महत्व है। अत: संघ के हित में कोई भी कार्य करने में मैं पीछे नहीं हटूंगा।' डॉ़ हेडगेवार के ये विचार उनकी नि:स्वार्थ वृत्ति एवं ध्येय समर्पित व्यक्तित्व का दर्शन कराते हैं। सामूहिक गुणों की उपासना तथा सामूहिक अनुशासन, अत्मविलोपी वृत्ति स्वयंसेवकों में निर्माण करने हेतु भारतीय परंपरा में नए ऐसे समान गणवेश, संचलन, सैनिकी कवायद, घोष, शिविर आदि कार्यक्रमों को संघ कार्य का अविभाज्य अंग बनाने का अत्याधुनिक विचार भी डॉक्टर जी ने किया। संघ कार्य की होने वालीं आलोचनाओं को अनदेखा कर, उनकी उपेक्षा कर वाद-विवाद में न उलझते हुए सभी से आत्मीय सम्बन्ध बनाए रखने का उनका आग्रह रहता था।
प्रशंसा और आलोचना - दोनों ही स्थिति में डॉ. ़हेडगेवार अपने लक्ष्य, प्रकृति और तौर-तरीकों से तनिक भी नहीं डगमगाते थे। 1929 में राष्ट्र सेवा दल के संस्थापक डॉ़ हर्डीकर ने नागपुर में आकर संघ के गैर-राजनीतिक आन्दोलन होने पर आपत्ति जताते हुए कड़ी आलोचना की। डॉक्टर हेडगेवार ने इसकी अनदेखी की। बाद में 1934 मंे डॉ़ हर्डीकर ने डॉक्टर जी को पत्र लिख कर संघ कार्य पद्धति एवं विचार प्रणाली का प्रत्यक्ष अवलोकन करने की इच्छा प्रकट की। आलोचकों को भी अपना बनाने का डॉक्टर जी का अनोखा तरीका था।
1934 में मध्य प्रान्त की विधानसभा में सरकारी कर्मचारी एवं उनके परिजनों को संघ में सहभागी होने पर प्रतिबन्ध लगाने का प्रस्ताव लाने का प्रयास हुआ। उस समय ब्राह्मण-ब्राह्मणेतर, मराठी -हिन्दी, तिलक-गांधी, हिन्दू-मुसलमान, ऐसी गुटबाजी होने के बावजूद सभी ने संघ के समर्थन में अभूतपूर्व एकता का परिचय दिया और सरकार को प्रस्ताव वापस लेना पड़ा।
1936 में नासिक में शंकराचार्य विद्याशंकर भारती द्वारा डॉक्टर हेडगेवार को 'राष्ट्र सेनापति' उपाधि से विभूषित किया गया। समाचार पत्रों में यह समाचार प्रकाशित भी हुआ और डॉक्टर जी को बधाई सन्देश भी मिले। पर उन्होंने स्वयंसेवकों को सूचना जारी करते हुए कहा कि हम में से कोई भी और कभी भी इस उपाधि का उपयोग न करे। उपाधि हम लोगों के लिए असंगत है। उनका चरित्र लिखने वालों को भी डॉक्टर जी ने हतोत्साहित किया। 'तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहे न रहें', यह परंपरा उन्होंने संघ में निर्माण की। 1939 में पुणे में संघ शिक्षा वर्ग चल रहा था। स्वातंत्र्यवीर सावरकर को जब इसका पता चला तो वे मुंबई से पूना आए और वर्ग में डॉक्टर जी से मिले। उस दिन वर्ग में डॉक्टर जी का भाषण था। उन्होंने स्वयं भाषण नहीं दिया और सावरकर जी से निवेदन किया। सावरकर जी ने अपने भाषण मंें कहा, 'हमारा कार्य मूसलाधार वर्षा जैसा है, जो थोड़े समय मंें ही जलप्लावन उत्पन्न करके अंत में बह जाती है, किन्तु डॉ. हेडगेवार का कार्य उस किसान जैसा है, जो उस पानी को रोककर उसे समाज हित में लगाता है। आप सब लोग डॉ. हेडगेवार के मार्ग का ही अनुसरण करें।'
डॉ. हेडगेवार शब्दों से नहीं, आचरण से सिखाने की पद्धति पर विश्वास रखते थे। संघ कार्य की प्रसिद्धि की चिन्ता न करते हुए, संघ कार्य के परिणाम से ही लोग संघ कार्य को महसूस करेंगे, समझेंगे तथा सहयोग एवं समर्थन देंगे, ऐसा उनका विचार था। 'फलानुमेया प्रारम्भ:' यानी वृक्ष का बीज बोया है। इसकी प्रसिद्धि अथवा चर्चा न करते हुए वृक्ष बड़ा होने पर उसके फलों का जब सब आस्वाद लेंगे तब किसी ने वृक्ष बोया था, यह बात अपने आप लोग जान लेंगे, ऐसी उनकी सोच एवं कार्य पद्धति थी।
इसीलिए उनके निधन होने के पश्चात् भी, अनेक उतार-चढ़ाव संघ के जीवन में आने के बाद भी, संघ कार्य अपनी नियत दिशा में, निश्चित गति से लगातार बढ़ता हुआ अपने प्रभाव से सम्पूर्ण समाज को स्पर्श और आलोकित करता हुआ आगे ही बढ़ रहा है। संघ की इस यशोगाथा में ही डॉक्टर जी के समर्पित, युगदृष्टा, सफल संगठक और सार्थक जीवन की यशोगाथा है। (लेखक रा.स्व.संघ के अ.भा. प्रचार प्रमुख हैं)

परमवैभव की ओर 

_ सूर्यनारायण राव

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज एक सुविख्यात संगठन है। कई दशक पहले बीबीसी ने इसे उस वक्त का सबसे व्यापक गैर सरकारी स्वयंसेवी संगठन बताया था, जो भारत में हिन्दू-एकजुटता के लिए कार्यरत है। तबसे रा.स्व. संघ का व्याप कई गुना बढ़ गया है। इसके बावजूद संघ विचार परिवार से बाहर बहुत कम लोग हैं जो इस सुगठित संगठन के संस्थापक यानी डॉ. केशवराव बलिराम पंत हेडगेवार के बारे में जानते हैं।
डॉ. हेडगेवार जन्म से ही प्रखर देशभक्त थे, उनकी यह उत्कट देशभक्ति उस वक्त सबके सामने आ गई जब वे मात्र 8 साल के थे। बालक केशव ने ब्रिटिश रानी विक्टोरिया के राज्यारोहण की 60वीं वर्षगांठ पर बंटी मिठाई फेंक दी थी। कालांतर में अनेक अवसरों पर उनकी यह राष्ट्रनिष्ठा परिलक्षित हुई। उनके अंदर इस बात को लेकर जबरदस्त मंथन चलता रहता कि भारत माता किसी भी कीमत पर विदेशी दासता से मुक्त होनी चाहिए। स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए उन्होंने हर तरह के आंदोलन में भाग लिया, चाहे वह क्रांतिकारी आंदोलन हों, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस हो या हिन्दू महासभा। उन्होंने एक अखबार भी शुरू किया था। वे उस वक्त जिस भी गतिविधि में भाग लेते उसमें पूरे नि:स्वार्थ भाव से समर्पित रहते। उन्हें न यश की कामना थी, न नाम की, न धन की। वे डाक्टरी की पढ़ाई करने कलकत्ता गए तो उसमें भी उनकी पहली इच्छा उस वक्त की ब्रिटिश राजधानी में क्रांतिकारियों के बारे में जानने और उनके साथ जुड़ने की थी। डाक्टरी की डिग्री लेने के बाद उन्होंने एक दिन के लिए भी डाक्टरी नहीं की। हालांकि उनका जीवन पैसे के अभाव में ही गुजरा, कई बार तो परिस्थितियां बेहद कठिन हो जाती थीं। उनका पूरा जीवन देश के लिए समर्पित था और उनके अन्दर इसके लिए काम करने की उत्कट इच्छा थी।
कलकत्ता से लौटने के बाद, उन्होंने नागपुर और उसके आसपास समाज में काम करते हुए 1922 में प्रांतीय कांग्रेस में संयुक्त महासचिव का पद ग्रहण किया। उनकी वाणी में एक ओज था, उनके शब्द लोगों को आकर्षित करते थे और युवाओं में जोश जगाते थे। इसीलिए अंग्रेज सरकार ने उन पर राजद्रोह का आरोप लगाकर उन्हें अदालत में ला खड़ा किया, जहां उन्होंने पूरी दमदारी से अपने बचाव में दलील दी। मुकदमा सुनने बाले जज ने कहा, 'उनका वह सार्वजनिक भाषण उतना द्रोहकारी नहीं था जितनी उनकी यह बचाव की दलील है।' बचाव में रखे गये अपने तर्कों के बाद डॉ. हेडगेवार ने छोटा सा भाषण भी दिया, जिसमें प्रमुख बात थी- 'भारत भारतीयों का है, इसलिए हम स्वतंत्रता की मांग करते हैं...। हमें पूर्ण स्वतंत्रता से कम कुछ भी नहीं चाहिए, और जब तक हम यह प्राप्त नहीं कर लेंगे हम शांति से नहीं बैठ सकते...।' जज ने उन्हें एक साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई। एक साल बाद उनके जेल से रिहा होने पर मोतीलाल नेहरू सहित कई प्रमुख नेता उन्हें लेने पहुंचे थे। इस अवसर पर मोतीलाल ने भाषण भी दिया था जिसके जवाब में डाक्टर साहब ने बहुत छोटी, परंतु धारदार बात कही- 'हमें आज देश के सामने उच्चतम नैतिक आदर्श रखने होंगे। सम्पूर्ण स्वतंत्रता से कुछ भी कम हमें स्वीकार नहीं होनी चाहिए... चाहे मौत भी सामने आकर खड़ी हो जाए तो भी हम अपने पथ से नहीं डिगेंगे। हमें अपने मन में अंतिम लक्ष्य की लौ सदा जलाए रखनी होगी और चुपचाप संघर्ष करते रहना होगा...'।
डॉ. हेडगेवार कई सामाजिक संगठनों से भी जुड़े थे। उन्होंने राजनीतिक और सामाजिक, दोनों तरह के संगठनों के कार्यकर्ताओं में बहुत ज्यादा अनुशासनहीनता अनुभव की। इसे दूर करने के लिए उन्होंने कांग्रेस के भीतर ही एक अनुशासनबद्ध स्वयंसेवी दल गठित करने की कोशिश की। कुछ लोगों को यह पसंद नहीं आया अत: इस प्रयोग के इच्छित परिणाम नहीं आए। उस दल में स्वार्थ की भावना बहुत गहरी थी, वैचारिक दृष्टि से भी डाक्टर साहब कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति से असंतुष्ट थे। इन अनुभवों पर उन्होंने गहन चिंतन किया और कुछ मौलिक प्रश्नों के जवाब तलाशने की कोशिश की, जैसे भाई-बंधुत्व के इतने वर्षों में क्या कभी मुसलमानों ने हमारी कोशिशों पर सकारात्मक दृष्टिकोण दिखाया? क्या उनमें हिन्दू समाज के प्रति कोई प्रेम पैदा हुआ? क्या उन्होंने सहिष्णुता तथा जियो और जीने दो की हिन्दू परंपरा के प्रति वैसा ही बर्ताव दिखाया? क्या उन्होंने कभी हमारे साथ मिलकर भारत माता को श्रद्धा अर्पित करने में तनिक भी इच्छा दर्शायी? ऐसा क्यों है कि संख्या में कम होते हुए भी मुसलमान पूरी निर्भयता के साथ हिन्दुओं पर हमले कर रहे हैं और बहुसंख्यक हिन्दू अपने को बचाने में सक्षम नहीं हो पा रहे हैं? क्या यह शर्म की बात नहीं है? ऐसा क्यों है?
डाक्टर साहब समझ चुके थे कि हिन्दुओं में एकजुटता और आत्म सम्मान की कमी ही सारी व्याधियों की जड़ है। अत: इसका एकमात्र समाधान था हिन्दुओं में आत्मसम्मान, संगठन और साहस का भाव जगाना। मुसलमानों या अंग्रेजों के बाहरी खतरे से बढ़कर हिन्दू समाज को आंतरिक मनमुटाव और अनुशासनहीनता क्षीण करती जा रही थी। इससे डाक्टर साहब सबसे अधिक चिंतित थे।
1925 में ऐसे वातवरण के बीच बहुत कम राष्ट्रीय नेता थे जिन्होंने हिन्दुओं को संगठित करने की आवश्यकता को भीतर तक महसूस किया था। कुछ अन्य नेताओं ने तो डाक्टर साहब के प्रयासों को 'साम्प्रदायिक', 'बचकाने' आदि तक कहकर उनका मजाक उड़ाया। लेकिन डाक्टर साहब पर इन सब चीजों का कोई असर नहीं हुआ। उन्हें उस काल की घटनाओं के विशद विश्लेषण के बाद जो मिशन ध्यान में आया उसकी उपयोगिता पर पूरा विश्वास था। उनके मन में और गहरे सवालों के जवाब तलाशने का मंथन चल रहा था। जैसे, हमारेे देश की वास्तविक प्रकृति क्या है, जिसकी स्वतंत्रता के लिए हम संघर्ष कर रहे हैं? इसके लक्षण क्या हैं? हमारे राष्ट्रीय पतन और गुलामी का मूल कारण क्या है?
डाक्टर साहब ने इतिहास में गहरे झांकते हुए कुछ मौलिक सचाइयों को रेखांकित किया था। जैसे, हमारा राष्ट्र एक प्राचीन राष्ट्र है जो दुनिया के दूसरे देशों के अस्तित्व में आने से पहले से मौजूद है। जब पश्चिम के ज्यादातर आधुनिक देश जंगलों से बाहर भी नहीं आए थे और दुनिया में ईसा या मोहम्मद के बारे में सुना तक नहीं गया था, तब हमारा देश विज्ञान, कला, वाणिज्य, दर्शन और आध्यात्मिकता के क्षेत्र में चहुंओर सम्मान पाता था और यह सब यहां के मूल निवासियों, जिन्हें हम हिन्दू के नाते जानते हैं, के अथक प्रयासों और त्याग की वजह से ही संभव हो पाया था। यही वजह है कि इस धरती को हिन्दुस्थान कहा जाता है जिससे स्पष्ट है कि यह हिन्दू राष्ट्र है।
राणा प्रताप हो या शिवाजी, विद्यारण्य या गुरुगोविंद सिंह, स्वामी विवेकानंद या महर्षि अरविंद, लोकमान्य तिलक हों या गांधी, राष्ट्रीय पुनरोत्थान को समर्पित सभी विभूतियों ने इस हिन्दू राष्ट्र के विचार को गहराई से समझकर मुगल और ब्रिटिश आक्रांताओं, दोनों से लोहा लिया था। इन सबने उसी हिन्दू भाव को जाग्रत करके लोगों से आगे आने का आह्वान किया था।
डाक्टर हेडगेवार का मानना था कि अगर ब्रिटिश प्रभुत्व और मुस्लिम अलगाव, इन दोनों खतरों का सामना करना है तो इसका एकमात्र प्रभावी मार्ग है हिन्दुओं को जाग्रत करके संगठित करना और उनमें राष्ट्रभक्ति की भावना को गहराई से समाविष्ट कराना। हमारे राष्ट्रीय जीवन के इस मौलिक तथ्य की समझ ही डाक्टर हेडगेवार द्वारा संस्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का वैचारिक अधिष्ठान बनी।
अत: संघ का मिशन है देशवासियों में राष्ट्रीय चरित्र और संगठन का वास्तविक भाव जगाकर उनमें नई ऊर्जा पैदा करना। जात-पात, अस्पृश्यता आदि सभी समाजिक बुराइयां दूर करके हमारी राष्ट्रीय संस्कृति के सनातन मूल्यों का विकास करना जरूरी है। यही व्याधियां थीं जिन्होंने पिछली कई सदियों तक हमारे देश को अस्थिर और ऊर्जाहीन बनाये रखा था। उन्होंने तय किया कि पहले समर्पित और निष्ठावान कार्यकर्ताओं का एक दल बनाकर उन्हें उदासीन हिन्दू समाज को जगाने हेतु प्रशिक्षित किया जाए। ऐसे देशभक्त, अनुशासित और जाग्रत व्यक्ति ही विदेशी बेडि़यों को उतार फेंकने में सक्षम होंगे और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के लिए प्रभावशाली आधार तैयार कर सकेंगे। डाक्टर साहब ने दब्बू और ऊर्जाहीन हिन्दू को एक प्रखर, सक्रिय और प्रभावशाली हिन्दू में रूपांतरित करके उसे एकजुट संगठन में लाने के इस चुनौती भरे काम का बीड़ा उठाया। उन्होंने गंभीरता से विचार किया कि निष्ठावान और समर्पित कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करने का व्यावहारिक तरीका क्या हो सकता है। कुछ शुरुआती प्रयोगों और सावधानीपूर्वक गंभीर चिंतन के बाद उनके दिमाग में एक अनूठी योजना आई कि एक ही स्थान या क्षेत्र के कुछ प्रमुख लोग जातिगत और ओहदे के भेद भुलाकर एक खास जगह खास वक्त पर रोजाना मिलें। उस एक घंटे के दौरान कुछ सरल सी गतिविधि चलाई जाए जो आपसी प्रेम, सौहार्द और विश्वास के वातावरण में अनुशासन रखते हुए शरीर, मन, बुद्धि को प्रशिक्षित करे। इसमें किसी में कोई मन-भेद न हो, जोश दिलाने वाले खेल और शारीरिक व्यायाम, देशभक्ति के सामूहिक गीत, राष्ट्रीय विभूतियों पर लघु चर्चा सत्र और एक सामूहिक प्रार्थना हो, जिसके अंत में भारत माता की जय का उद्घोष हो। इस एक समूह की बैठक को 'शाखा' नाम दिया गया और इसमें भाग लेने वाले हर व्यक्ति को 'स्वयंसेवक' यानी समाज का स्वयं से प्रेरित नि:स्वार्थ सेवक। ऐसी शाखाएं देश में धीरे धीरे हर शहर, गांव के हर इलाके तक पहंुचें। शाखा का आरम्भ भगवा ध्वज आरोहित करने के बाद उसे प्रणाम करने से होता है और अंत प्रणाम के बाद ध्वज को उतारने के साथ।
हर व्यक्ति को रोज एक खास स्थान पर एक खास वक्त पर व्यक्तिगत रूप से कुछ प्राप्ति हुए बिना एकत्र बुलाना कोई आसान काम नहीं था। लेकिन डॉ. हेडगेवार में गजब की प्रतिबद्धता थी और इसीलिए उन्होंने इसका एक अनूठा तरीका अपनाया। वे हर रोज स्वयंसेवकों के घर जाते, उनके खाली वक्त में उनके साथ कुछ वक्त बिताते, हाल-चाल पूछते। डाक्टर हेडगेवार का दुलार, प्रतिबद्धता, देशभक्ति इतनी पारदर्शी थी कि हर कोई उनके प्रति आकर्षित होता था और पूरी निष्ठा से उनका अनुगमन करता था। शाम को भी वे हर एक के घर जाकर उसे शाखा पर साथ लेकर आते थे। धीरे धीरे शाखाओं पर अच्छी संख्या होने लगी, स्वयंसेवकों में उत्साह बढ़ता गया। डाक्टर साहब हर स्वयंसेवक को बारीकी से देखते थे, उसमें विकसित होने वाले सकारात्मक गुणों को परखते थे, उसके प्रशिक्षण को और सुघड़ बनाते थे। वे 15 से 18 वर्ष की आयु के स्वयंसेवकों पर खास ध्यान देते थे, खुद उनको वैचारिक रूप से मजबूत बनाते थे, उन्हें शाखा चलाने के लिए प्रशिक्षित करते थे।
डाक्टर हेडगेवार का खुद का जीवन स्वयंसेवकों के सामने आवश्यक दृष्टि की प्रेरणा जगाने का एक जीता-जागता आदर्श था। उनमें व्यक्तिगत संपर्क का असाधारण गुण था, वे हर एक के साथ जीवंत संवाद बनाए रखते थे। इस वजह से वे सबके प्रिय बन गए थे।
साधारण स्वयंसेवकों को समर्पित और प्रभावशाली कार्यकर्ता बनाने के लिए उन्होंने एक खास तरह की प्रशिक्षण कक्षाओं की व्यवस्था तैयार की थी। एक हफ्ते का प्राथमिक लघु पाठ्यक्रम और उसके आगे तीन साल तक हर साल एक महीने का प्रशिक्षण वर्ग। इस तरह से प्रशिक्षित और तैयार स्वयंसेवक संगठन की रीढ़ बने। आज संघ और इसके आनुषांगिक संगठनों का हिमालय से कन्याकुमारी तक, हर शहर और हर गांव में जो विस्तार दिखता है उसके पीछे ऐसे ही तपोनिष्ठ स्वयंसेवकों की मालिका है। आज स्वयंसेवक लगभग 1.5 लाख सामाजिक सेवा कार्यों में संलग्न हैं, घने जंगलों में रह रहे वनवासियों से लेकर शहरों और गांवों में रहने वाले शोषित, वंचित वर्ग तक की सेवा में जुटे हैं। पिछले कुछ दशकों के दौरान राष्ट्रीय पुनरुत्थान की प्रक्रिया में संघ कार्य में विशेष गति आयी है। हिन्दू राष्ट्र के दर्शन का लगातार विस्तार हो रहा है और ज्यादा से ज्यादा देशवासी इसके आह्वान पर उठ खड़े हो रहे हैं। कल तक जिनका स्वर कमजोर और दबा हुआ था उन्होंने इस भूमि के मौलिक हिन्दू चरित्र के पक्ष में बोलना शुरू कर दिया है। हिन्दू मनोवृत्ति एक बहुत ही सकारात्मक तरीके से गजब के बदलाव से गुजर रही है। संघ ने समाज के सभी वर्गों के उच्चतम और श्रेष्ठतम लोगों के दिलों को छुआ है। रूपान्तरण के उपकरण के तौर पर गढ़े गए स्वयंसेवक आम तौर पर हर उस क्षेत्र में कामयाब साबित हुए हैं जिसमें वे गए हैं। वे राष्ट्र के समग्र पुनरोत्थान के लिए अनथक जुटे हुए हैं। ये सब मिलकर सामाजिक बदलाव के एक महत्वपूर्ण आयाम की ओर इशारा करते हैं। संघ के इन बढ़ते कदमों को कोई रोक नहीं सकता, क्योंकि ऐतिहासिक प्रारब्ध इसके साथ है, इसे इसकी अंतिम और वैभवशाली परिणति तक पहंुचाने में उसका संबल प्राप्त है। डाक्टर हेडगेवार मुख्य रूप से कर्मयोगी थे, व्यावहारिक ज्ञान का ऐसा मूर्तरूप थे जो असंभव को संभव बना देने की क्षमता रखते थे। व्यक्ति निर्माण की दैनिक शाखा की पद्धति के माध्यम से चारित्रिक रूप से संस्कारी और अनुशासनबद्ध स्वयंसेवक तैयार करके हमारे प्राचीन राष्ट्र को बांटने वाली व्याधियों को दूर करने के बाद एक प्रखर और संगठित हिन्दू समाज खड़ा करना डाक्टर हेडगेवार का अपनी मातृभूमि को सबसे बड़ा और अनूठा योगदान है। उन्होंने ऐसा शक्तिशाली और संगठित हिन्दू तैयार किया है जो इस प्राचीन हिन्दू राष्ट्र को परम वैभव के शिखर पर ले जाने में सक्षम है।
(लेखक रा. स्व. संघ के वरिष्ठ प्रचारक हैं और अ.भा. सेवा प्रमुख रहे हंै)

अंग्रेजी राज के विरुद्ध डटकर लिया लोहा

.मा. गो. वैद्य 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम आज दुनियाभर में विख्यात है। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि संघ को सही मायने में सब लोग समझते हैं। संघ को उसके यथार्थ रूप में समझना वैसे आसान भी नहीं है। कारण, विद्यमान या प्राचीन संस्थाओं या संगठनों के किसी भी नमूने में संघ जस का तस नहीं बैठता है। संघ कैसा है? इसका सही उत्तर है संघ, संघ जैसा ही है। संस्कृत काव्यशास्त्र में 'अनन्वय' नाम का अलंकार है। उसके उदाहरण के रूप में एक श्लोक बताया जाता है। वह है-
गगनं गगनकारं सागर: सागरोपम:।
रामरावणयोर्युद्धं रामरामवणयोरिव।।
अर्थात् आकाश का आकार आकाश के समान ही। समुद्र, समुद्र जैसा ही। और राम-रावण युद्ध राम-रावण युद्ध के समान ही। संघ भी केवल संघ के समान ही है। संघ के लिये कोई भी उपयुक्त उपमान नहीं है।
जन्म से ही देशभक्त
इस संघ के संस्थापक हैं डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार। जन्म से ही देशभक्त, ऐसा कहना अतिशयोक्ति नहीं है। पूर्वसंचित के कारण, अनेक लोग जन्म से ही असाधारण कतृर्त्व वाले होते हैं। जैसे विख्यात गणितज्ञ रामानुजम्। आद्य शंकराचार्य के बारे में किसी ने अपने गुरु से पूछा था कि केवल आठ वर्ष की आयु में शंकराचार्य को चारों वेदों का ज्ञान कैसे प्राप्त हुआ होगा? गुरु का उत्तर था, 'सम्भवत: बचपन में शंकराचार्य की प्रतिभा पर्याप्त विकसित नहीं थी, इसलिये उनको चार वेदों का ज्ञान होने में आठ साल लगे'। डॉ. हेडगेवार भी ऐसे ही बचपन से देशभक्त व्यक्तित्व के धनी थे। प्राथमिक तीसरी कक्षा का छात्र। 8-9 साल की उम्र। इंग्लैंड की रानी और हिंदुस्थान की साम्राज्ञी विक्टोरिया के राज्यारोहण को साठ वर्ष पूरे होने का अवसर था। सभी स्कूलों में मिठाई बांटी गयी। बाल केशव हेडगेवार को भी वह मिली। किन्तु उसने उसे मुंह में न डालकर कूड़ेदान में फेंक दिया। कारण, अपने देश पर राज करने वाले विदेशी शासक का गौरव उसे मान्य नहीं था।
वन्देमातरम् का उद्घोष
यह उत्कट देशभक्ति निरन्तर बनी रही। मैट्रिक क्लास का निरीक्षण करने के लिये केशव के कक्षा में मुख्याध्यापक और एक सरकारी इंस्पेक्टर आने वाले थे। केशव की अगुआई में सभी छात्रों ने निश्चय किया कि 'वन्देमातरम्' की घोषणा से उनका स्वागत करेंगे। यह उस जमाने की बात है जब 'वन्देमातरम्' बोलना एक अपराध माना जाता था। इंस्पेक्टर के कक्षा में प्रवेश करते ही सभी छात्रों ने 'वन्देमातरम्' के नारे लगाकर उसका स्वागत किया। इंस्पेक्टर आगबबूला हुये और लौट गये। मुख्याध्यापक की डांट-फटकार पड़ी और यह अपराध करने वाले को कड़ी सजा देने का आदेश दिया गया। इंस्पेक्टर के चले जाने के बाद मुख्याध्यापक कक्षा में आये और पूछताछ की कि इस विद्रोह का नेता कौन है? कोई भी मुंह खोलने को तैयार नहीं था। आखिर पूरी क्लास को स्कूल से निकाल दिया गया। कुछ दिन बीत गये। तब अभिभावक चिन्तित हुए। वे मुख्याध्यापक से मिले और मुख्याध्यापक ने उनको बताया कि छात्रों को क्षमायाचना करनी होगी, तभी उनको प्रवेश मिलेगा। किन्तु कोई भी छात्र क्षमायाचना के लिये तैयार नहीं था। फिर एक मध्य मार्ग निकाला गया कि मुख्याध्यापक एक-एक छात्र से पूछेंगे कि 'तुमसे गलती हुई ना'? जो छात्र केवल सिर हिलाकर 'हां' का संकेत देगा उस छात्र को फिर से प्रवेश मिलेगा। सभी छात्रों ने ऐसा ही किया और फिर से प्रवेश प्राप्त किया। एकमात्र अपवाद था केशव। केशव हेडगेवार को स्कूल से निकाल दिया गया। फिर यवतमाल और पुणे जाकर केशव ने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की।
कलकत्ता में डाक्टरी शिक्षा
मैट्रिक के बाद केशव हेडगेवार की इच्छा हुई कि डाक्टरी की शिक्षा ग्रहण की जाए। इस हेतु केशव ने कलकत्ता जाने का फैसला किया। मुंबई नागपुर से नजदीक था। किन्तु केशव ने कलकत्ता को ही चुना। क्यों? क्योंकि वह क्रांतिकारियों का गढ़ था। उस गढ़ में क्रान्तिप्रवण केशव ने प्रवेश किया और यहां तक प्रगति की कि क्रान्तिकारियों कि जो 'अनुशीलन समिति' नाम की सवार्ेच्च केंद्रीय समिति थी, उसका वह अन्तरंग सदस्य बना। क्रान्तिकारियों की सारी गतिविधियों में उसने भाग लिया। उनकी शिक्षा भी प्राप्त की। 1914 मे केशव ने डाक्टरी में एल. एम. एंड एस. की उपाधि प्राप्त की और 1916 के प्रारम्भ में वे डॉ. केशवराव हेडगेवार बनकर नागपुर आये।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
विदेशी शासकों को हटाना और अपने देश को स्वतन्त्र करना उनका बचपन से प्रण रहा था। उनके ध्यान में आया कि केवल क्रान्तिकारियों के क्रियाकलापों से डरकर अंग्रेज यहां से भागने वाले नहीं हैं। उनके मन में विचार उभरा कि जब तक स्वतंत्रता के लिये सामान्य जनमानस में आकांक्षा पैदा नहीं होगी तब तक क्रान्तिकारियों की बहादुरी का परिणाम नहीं दिखेगा। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के आन्दोलन में शामिल हुये। उस समय लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक कांग्रेस के शीर्ष नेता थे। उनकी स्फूर्तिप्रद घोषणा थी कि 'स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और वह मैं लेकर रहूंगा'।
डाक्टरी पास करने के बाद दवाखाना खोलना डॉ. हेडगेवार का उद्देश्य ही नहीं था। अत: वे प्राणपण से कांग्रेस के आन्दोलन में कूद पडे़। गांव-गांव जाकर बड़े जोशीले भाषण दिए। तब अंग्रेज सरकार ने उन पर भाषण न देने का आदेश लागू किया। किन्तु डक्टर हेडगेवार ने उस आदेश को न मानते हुए अंग्रेजी शासन के विरुद्ध जनजागरण का अपना अभियान जारी रखा।
(लेखक रा. स्व. संघ के प्रवक्ता रहे हैं )


डॉ़ केशव बलिराम हेडगेवार पथिक जो पथ बन गया 

प्रो़ राकेश सिन्हा

21 अक्तूबर, 1938 को अखिल भारतीय कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष सुभाषचन्द्र बोस ने महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष शंकरराव देव को एक पत्र लिखा। दो पृष्ठों के पत्र का विषय था- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का बढ़ता आधार। बोस की चिंता का विषय था कि कांग्रेस का आधार संघ की ओर खिसकता जा रहा है। छात्र-नौजवानों में संघ के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है। इसका कारण क्या है, इसके बारे में वे किसी सुनिश्चित मत के नहीं थे। देव ने 6 नवम्बर, 1938 को इसका विस्तार से जवाब दिया। अपनी समझ के अनुसार विश्लेषण करते हुए उन्होंने लिखा कि संघ देश की जिस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को लेकर अपनी विचारधारा का प्रतिपादन कर रहा है वह लोगों को आकर्षित कर रही है। बोस के इस सवाल का कि कांग्रेस क्यों नहीं इस तरह का स्वयंसेवी संगठन बना सकती है, देव ने लिखा कि जो काम डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने किया, वह कांग्रेस में सम्भव नहीं है। उन्होंने इसका कारण बताया कि कांग्रेस का प्रत्येक नेता या गुट स्वयंसेवकों का उपयोग अपने विचार, राजनीति और हित के लिए करना चाहता है, जबकि संघ की कार्य संस्कृति में संगठन एक उद्देश्य और एक मिशन के लिए काम करता है। आगे उन्होंने लिखा कि ऐसा स्वयंसेवी संगठन बनाने के लिए पर्याप्त ान चाहिए।
बोस एवं देव दोनों ही कांग्रेस के सुलझे, समर्पित और स्वार्थहीन कार्यकर्त्ता थे। परन्तु वे संघ को बाहर से ताक-झांककर और तात्कालिक हित-अहित के आधार पर देख रहे थे। लेकिन संघ की बढ़ती ताकत, जो उन्हें प्रतिस्पर्द्धी 1938 में नजर आ रहा था वह यथार्थ नहीं था। संघ तो स्थापना के दिन से अपनी राह पर चलता रहा है जिसमें राष्ट्रीयता के संवर्द्धन का लक्ष्य रहा है। दूसरे लोग और संगठन अपने हित-अहित के आधार पर संघ को मापते रहे हैं। इसलिए समर्थन-विरोध की प्रक्रिया समय, स्थान सापेक्ष रही है। तभी तो मात्र दो वषार्ें के बाद बोस जब नागपुर में फारवर्ड ब्लॉक के अधिवेशन में आये तो उनके कार्यक्रम का अगला पड़ाव संघ संस्थापक डॉ़ हेडगेवार से साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन में परस्पर सहयोग के लिए परामर्श हेतु मुलाकात थी। नागपुर से प्रकाशित समाचार पत्र 'हितवाद' ने अपने 23 जून, 1940 के अंक में प्रथम पृष्ठ पर बोस का डॉ़ हेडगेवार से मुलाकात की इच्छा का समाचार प्रकाशित किया। वे 20 जून को डॉक्टर जी से मिलने आये, परन्तु उनकी अस्वस्थता के कारण दोनों में बात नहीं हो पायी। अगले ही दिन 21 जून को डॉक्टर जी का निधन हो गया। उनके निधन से महाराष्ट्र और देश के अन्य भागों में शोक की लहर दौड़ गयी। अपने जीवनकाल में इस अजातशत्रु ने सामाजिक सार्वजनिक जीवन में व्याप्त अनेक भ्रमों को तोड़ने का कार्य तो किया ही, मृत्यु के पश्चात् भी एक बड़े भ्रम को तोड़ दिया।
डॉ़ हेडगेवार और संघ एक-दूसरे के पर्याय थे। जब कभी भी किसी प्रभावशाली व्यक्ति का निधन होता है तो उससे जुड़ी संस्था को अपूरणीय क्षति का सामना करना पड़ता है। संघ के बारे में भी इसके मित्र और ईर्ष्यालु भाव से पीडि़त, दोनों प्रकार के लोग ऐसा ही सोचते थे। परन्तु सार्थक उद्देश्य के लिए समर्पित इस सारथी ने संघ को कालजयी बना दिया। तभी तो लोकमान्य तिलक द्वारा स्थापित अंग्रेजी समाचार पत्र 'मराठा' ने 23 अगस्त, 1940 को अपने प्रथम पृष्ठ पर जो पहला बड़ा समाचार प्रकाशित किया उसका शीर्षक था-'डॉ़ हेडगेवार्स संघ स्टिल गोइंग स्ट्रांग'।
जब व्यक्ति साधना पथ पर साध्य के लिए अपने आपको साधन बना देता है तो उसका हर दृष्टांत, उसकी हर बात, उसके जीवन की हर घटना विचार का लौहपुंज बन जाती है और वह इतिहास नहीं, हमेशा वर्तमान रहता है। वह पीढि़यों को प्रेरित करता है। डॉ़ हेडगेवार भी वैसे ही द्रष्टाओं में एक हैं जो पथ पर चलते-चलते स्वयं पथ बन गए हैं। यही कारण है कि उनके निधन के बाद महाराष्ट्र के अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में उन बुनियादी प्रश्नों पर बहस शुरू हो गयी जिनको आधार बनाकर डॉ़ हेडगेवार ने संघ की स्थापना की थी। अकोला से एक अखबार 'मातृभूमि' प्रकाशित होता था। इसके मालिक कांग्रेस के नेता बृजलाल बृयानी थे और प्रमिला ओक सम्पादिका थीं। संघ के प्रति ईर्ष्या भाव रखने वाले इस अखबार ने अपने सम्पादकीय में दो प्रश्नों को सबसे अधिक विचारणीय माना। पहला, डॉ़ हेडगेवार की राष्ट्रीयता की कल्पना और दूसरा, उनका सार्वजनिक जीवन में योगदान। ओक ने लिखा कि डॉ़ हेडगेवार जैसे समर्पित, स्वार्थहीन, कलंकरहित कार्यकर्त्ता मिलना मुश्किल है और उन्होंने सार्वजनिक कार्यकर्त्ताओं के लिए एक मापदंड छोड़ा है। संगठन कालजयी सिर्फ कल्पना मात्र से या विचार प्रवाह से नहीं होता है। डॉ़ हेडगेवार इस बात से सुपरिचित थे। जब पीढ़ी दर पीढ़ी निश्छल भाव से मूल्यों के आइने में प्रयोगधर्मिता के साथ विचार के प्रवाह में शामिल हो जाती है तब संगठन का फलक जो दिखायी पड़ता है वही नहीं होता है। उसका फलक बड़ा हो जाता है। उसकी संरचना समावेशी हो जाती है। उसमें स्वायत्तता और स्वचालन का बोध आ जाता है। व्यक्ति निमित्त हो जाता है। ऐसा कैसे हो, यह प्रश्न डॉक्टर जी के सामने था। उन्होंने सार्वजनिक कार्यकर्त्ता के नाते समाज को प्रयोगशाला के रूप में देखा एवं समाजशास्त्री तथा समाज विज्ञानी के रूप में घटनाओं और विचारों को सतत् तौलते रहे।
उनके जीवन के प्रारंभिक वषार्ें में मध्य प्रांत कांग्रेस ने उन पर एक अहम जिम्मेदारी सौंपी थी। घटना 1919 की है। तब वे कलकत्ता से डाक्टरी की पढ़ाई पूरी कर नागपुर आ चुके थे। उनकी पहचान एक चिकित्सक की जगह एक प्रतिबद्ध राष्ट्रवादी की बन चुकी थी। उन्होंने परिवार बसाने, पैसा अर्जित करने, प्रतिष्ठा पाने, पुष्पहार पहनने जैसी सभी सम्भावनाओं का स्वयं सुव्यवस्थित एवं सुविचारित रूप से अंत करना शुरू कर दिया था। ऐसा लग रहा था कि राष्ट्रीयता की देवी सही पात्र की खोज में शताब्दियों से थी और डॉ़ हेडगेवार के तन, मन, मस्तिष्क में प्रवेश कर हिन्दू सभ्यता के पुनरोदय और पराक्रम के लिए उन्हें तैयार कर रही हो। तभी तो उनका एक-एक कदम असामान्य होता था। हर कदम के पीछे सूत्र और सारगर्भित विचार होता था। उनके व्यक्तित्व में सोने की तरह चमक ने हर असाध्य कार्य के लिए उनकी पात्रता स्थापित की। इसी क्रम में मध्य प्रांत कांग्रेस ने 1 फरवरी, 1919 को सर्कुलर जारी किया जिसमें हिन्दी साप्ताहिक पत्रिका 'संकल्प' के प्रकाशन की योजना थी। मध्य प्रांत के 18 जिलों में 14 हिन्दीभाषी जिले थे। इनके लिए कांग्रेस के विचार-कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार के लिए कोई अधिकृत पत्र-पत्रिका तब तक नहीं थी। छह हजार रुपए संकल्प की अग्रिम सदस्यता के द्वारा इकट्ठे करने थे। प्रत्येक जिले में 50 ग्राहक बनाने का लक्ष्य था। जब डॉ़ हेडगेवार को इस चुनौती से जूझने के लिए कहा गया तो उन्होंने एक बुनियादी प्रश्न उठाया-'अग्रिम चंदा/धन लेकर कुछ महीने या वषार्ें में पत्र-पत्रिकाएं बंद होती रही हैं, इससे लोगों का विश्वास उठ गया है। प्रामाणिकता पर प्रश्न उठाया जाता है। अच्छा होता पहले हम पत्रिका का प्रकाशन कर ग्राहक बनाते।' परन्तु कांग्रेस की प्रांतीय समिति ने उनसे इस कार्य को त्वरित गति एवं तत्परता से पूरा करने का अनुरोध किया। वे तन-मन से जुट गए। धन तो उनके पास कभी नहीं था। तभी तो उनकी मृत्यु के बाद उनके एक अभिन्न मित्र ने 'दैनिक काल' में लिखा था कि जीवन में धन की कमी को उन्होंने अपने मन और हृदय की विशालता से पूरा किया था। वे 'संकल्प' का ग्राहक बनाने उन स्थानों पर गये जहां कांग्रेस नहीं पहुंची थी। वे ग्राहक बनाने के क्रम में राष्ट्रवाद के दूत के नाते लोगों को सम्बोधित करते थे, राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं से संवाद करते थे और फिर एक वैचारिक पक्ष उपजता था।
तत्कालीन मध्य प्रांत कांग्रेस के नेता और बाद में हिन्दू महासभा के अध्यक्ष डॉ़ बी़ एस़ मुंजे को 24 फरवरी, 1919 को लिखे पत्र में उन्होंने परिस्थिति का जीवंत वर्णन किया था, 'कांग्रेस के नेता अच्छे वक्ता हैं। वे लोगों को अपने भाषण से प्रभावित करते हैं परन्तु यह प्रभाव अगले दो-तीन दिनों में खत्म हो जाता है। वे अपने व्यवसाय में व्यस्त हो जाते हैं और उनके पास सार्वजनिक कार्य के लिए समय नहीं रहता।' इस पत्र में कांग्रेस कार्य-संगठन की त्रुटि छिपी थी जिसकी 1938 में बोस अनुभूति नहीं कर पा रहे थे। मंुजे जी की डायरी में डॉक्टर जी के अनेक पत्रों में उन प्रसंगों की चर्चा है जो सार्वजनिक कार्य में अन्तर्निहित न्यूनताओं को प्रकाशित करते हैं। वे एक पत्र में ब्रह्मपुर की स्थिति का वर्णन करते हैं। वे लिखते हैं, 'कांग्रेस में 11 वकील शामिल एवं सक्रिय हैं परन्तु किसी को भी देश की राजनीति की जानकारी नहीं है।' एक पत्र में वे एक कांग्रेस के मजूमदार वकील का जिक्र करते हुए उनके मनोविज्ञान पर प्रकाश डालते हैं-'वकील साहब चाहते हैं दूसरे लोग सक्रिय काम कर जोखिम उठायें, परन्तु वे स्वयं जोखिमों से बचे रहें।'
डॉक्टर जी ने क्रांतिकारी जीवन के अनुभवों के बाद सार्वजनिक जीवन का यह अनुभव 'संकल्प' के ग्राहक अभियान के दौरान प्राप्त किया जो बाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्य-संस्कृति विकसित करने में सहायक सिद्ध हुआ। संगठन के निर्माण और विकास काल, दोनों में धन की आवश्यकता और महत्ता को लेकर रही भ्रांति को उन्होंने गलत साबित किया। शंकर राव देव ने बोस को लिखे पत्र में कहा था कि स्वयंसेवी संगठन बनाने के लिए पर्याप्त धन की आवश्यकता है जो कांग्रेस के पास नहीं है। लेकिन यह धारणा संघ निर्माण में ध्वस्त हुई थी, इसकी जानकारी न तब संघ से इतर ताकतों को थी, न अब है। डॉक्टर जी जानते थे कि संगठन की स्वायत्तता, प्रभाव, शुचिता के लिए धन का स्रोत परिभाषित और पारदर्शी हो। तभी तो उन्होंने गुरुदक्षिणा की परम्परा शुरू की। स्वयंसेवकों के समर्पण से संगठन चलता है तो उसके नीति-निर्धारण एवं कठोर कदम उठाने में पूर्ण स्वतंत्रता रहती है। बाह्य जगत पर निर्भरता संघ का चरित्र न बने, यह संघ की नैतिक ताकत को अक्षुण्ण, उसकी स्वतंत्रता को अबाध बनाये रखता है।
मदन मोहन मालवीय ने 1929 में नागपुर में संघ के स्वयंसेवकों को सम्बोधित किया। वे ऐसी बात कह गये जो भूत, वर्तमान और भविष्य, तीनों के लिए प्रहरी की तरह है। उन्होंने कहा,'अन्य संस्थाओं के पास बड़े भवन हैं, पर मानव शक्ति नहीं है। जबकि संघ के पास अपार मानव शक्ति है, पर कोई भवन नहीं है।' ऐसा नहीं था कि संघ का सहयोग करने के लिए 1928-29 में लोग तत्पर नहीं थे। स्वयं डॉक्टर जी की विश्वसनीयता, लोकप्रियता और संबंध यथेष्ट धन एकत्रित करने के लिए पर्याप्त थे। परन्तु वे प्रतीक्षारत थे। स्वयंसेवकों की टोली बढ़ेगी तो भवन भी बनेगा। और भविष्य में वैसा ही होता रहा। उनके जीवनकाल में नागपुर के संभ्रांत लोगों से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बिरला, स्वयं मालवीय जी जैसे लोगों ने वित्तीय मदद की पेशकश की। डॉक्टर जी बिना उनसे धन लिए अनुग्रहीत महसूस करते रहे। डॉक्टर हेडगेवार की विशेषता थी कि वे सामान्य तरीके से असामान्य कार्य कर दिखाते थे, जो संघ कार्य का चरित्र बन गया है। उनका स्वयं का जीवन भौतिकता से परे था। 4 मार्च, 1929 को उन्होंने डायरी में जो लिखा था वे शब्द वस्तुत: उन पर भी शत-प्रतिशत लागू होते हैं, 'श्री समर्थ रामदास को अपने लिए कुछ भी नहीं चाहिए था। अपनी कृति का अहंकार स्वयं को न हो जाए इसका ध्यान रखकर उन्होंने सम्पूर्ण जीवन स्वधर्म बान्धवों की स्थिति के चिंतन एवं आत्मोन्नति का मार्ग खोजने में ही लगा दिया।'
अपने जीवन और विचार से उन्होंने संघ को धन का दास नहीं बनने दिया। वे प्रगतिगामी सोच के स्पष्टवादी व्यक्ति थे, जिनके व्यक्तित्व में निर्णायकता कूट-कूट कर भरी थी। द्वंद्व उनके जीवन का कभी हिस्सा नहीं बना। राष्ट्र सिर्फ स्वर्णिम इतिहास की व्याख्या और भविष्य की स्वर्णिम कल्पनाओं से सम्पन्न नहीं होता बल्कि दृढ़ इच्छाशक्ति और सामान्य लोगों के सशक्तिकरण से होता है। वे हमेशा सामान्य समाज के साथ संबद्ध रहे। इसका एक असाधारण प्रसंग है। 1923-24 में नागपुर में बंद पड़े 'स्वातंत्र्य' अखबार को फिर से खड़ा करने का काम उन पर आया। व्यक्ति की पात्रता परिस्थिति को परिवर्तित करने की कैसी क्षमता रखती है उसका यह अनुपम उदाहरण है। उनका नाम जुड़ते ही 'स्वातंत्र्य' की प्रसार संख्या 1200 हो गयी। पहले से प्रकाशित हो रहे अखबारों यथा 'महाराष्ट्र', 'प्राणवीर' आदि की प्रसार संख्या प्रभावित हुई। राष्ट्रीय अभिलेखागार में समाचार पत्रों पर भेजी गयी मध्य प्रांत की रिपोर्ट में बताया गया कि 'स्वातंत्र्य' के निकलते ही 'महाराष्ट्र' की प्रसार संख्या छह हजार से पांच हजार हो गयी थी। अखबार ने डॉ़ हेडगेवार के दृढ़ व्यक्तित्व को उजागर करने का काम किया।
राष्ट्रहित एवं जनहित के सामने वे किसी से कभी भी स्वत:स्फूर्त टकराने के लिए तैयार रहते थे। संबंधों का लेखा-जोखा तब अप्रासंगिक हो जाता था। ऐसा ही प्रसंग फरवरी, 1924 का था जब डॉ़ मुंजे ने विधान परिषद में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के स्वागत का प्रस्ताव रखा था। तब डॉ़ हेडगेवार ने 22 फरवरी, 1924 के सम्पादकीय में इसकी कटु आलोचना की थी। यह अखबार वर्ष पूरा होने से पहले क्यों बंद हो गया? इस प्रश्न के उत्तर में एक विचार छिपा है। नागपुर में एक इम्प्रेस मिल थी। यह एक बड़े घराने की मिल थी। अखबारों एवं सामाजिक संगठनों को इससे विज्ञापन एवं वित्तीय सहायता मिलती थी। इस मिल में मजदूरों ने बोनस एवं मजदूरी के प्रश्न पर आंदोलन किया। विज्ञापन पाने वाले अखबारों ने या तो मालिक का साथ दिया या उदासीन रहे। विज्ञापन तो 'स्वातंत्र्य' को भी मिलते थे। पर डॉ़ हेडगेवार ने मजदूरों के हितों को अखबार में मुखर कर दिया। परिणाम बताने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने मजदूर नेता आऱ एस़ रुइकर के इम्प्रेस मिल के मजदूरों को संगठित करने के प्रयास और लेबर यूनियन बनाने के लिए उनको शुभकामना दीं। यह वही वैचारिक बीज था जब संघ ने भारतीय मजदूर संघ की स्थापना को सहज, स्वाभाविक प्रक्रिया में लिया। दत्तोपंत ठेंगड़ी इसके रचनाकार बने। यह उसी आर्थिक विचार का परिणाम है। तब भी 'समाजवाद' और 'पूंजीवाद' के नारे खूब चलते थे। एक बार डॉक्टर जी का रुइकर से संवाद हुआ जिसमें उन्होंने कहा था-'आप धनी सर्वहारा हैं, मैं गरीब पूंजीपति हूं।'
संघ स्थापना के एक दशक बाद उन्होंने 8 मार्च, 1935 को बैरिस्टर अग्रवाल को लिखे पत्र में कहा था, 'अब तक कभी भी किसी कार्य के लिए हमने किसी से धनराशि की याचना नहीं की है।' दो वर्ष के बाद उन्होंने लिमये जी को 30 अक्तूबर को लिखे पत्र में उन मनगढ़ंत आरोपों का जिक्र किया जो बनारस में सोशलिस्टों ने एक पत्रक निकालकर संघ पर लगाए थे, संघ धनवान एवं रियासतदारों के रक्षण के लिए स्थापित हुआ है और सवार्ेपरि उन्हीं के आर्थिक सहयोग से उसका पोषण होता है। उन्होंने एवं संघ ने ऐसे काल्पनिक और शत्रुतापूर्ण भाव से लगाये गये आरोपों की चिंता नहीं की, क्योंकि कल्पना करना तो वैचारिक विरोधियों की अपनी सृजनशीलता है और अपने यथार्थ को संतुष्ट रखना हमारी चुनौती है।
जैसे-जैसे संघ का विस्तार होता गया, कुछ धारणाएं टूटती गयीं और कुछ नयी बनती गयीं। महाराष्ट्र में व्यायामशाला की संस्कृति थी। इसके तहत अनेक आधुनिक एवं परम्परागत व्यायामशालाएं चल रही थीं। हनुमान व्यायामशाला, प्रताप व्यायामशाला इत्यादि। इनके गणवेश भी होते थे और वार्षिक उत्सव भी, जिसमें व्यायाम परेड आदि का प्रदर्शन होता था। आरंभिक वषार्ें में नागपुर के कुलीनों, नेताओं एवं सरकार, तीनों को लगा कि यह व्यायामशाला संस्कृति का ही एक उपक्रम है। लेकिन दो-तीन वषार्ें के अंदर ही इस धारणा का अंत हो गया। संघ का साम्राज्यवाद विरोधी रुख और चरित्र प्रभाव दिखाने लगा। 1930 में साम्राज्यवादी खुफिया विभाग ने पहली बार संघ के बारे में चेताते हुए लिखा कि 'इसमें (साम्राज्यवाद के विरुद्ध) आतंकवादी संगठन बनने की अपरिमित क्षमता है।' दो वर्ष बाद ही संघ सविनय अवज्ञा आंदोलन का हिस्सा बन गया। सविनय अवज्ञा आंदोलन के बारे में रिपोर्ट लिखते समय खुफिया विभाग ने लिखा, 'आंदोलन धीमा हो गया था, उत्साह प्राय: समाप्त हो गया था परन्तु डॉ़ हेडगेवार के आंदोलन में प्रवेश करते ही आंदोलन में जान आ गयी, उत्साह का संचार हो गया़.़. जब वे जंगल सत्याग्रह के लिए जा रहे थे तब दस हजार स्त्री-पुरुष उनके पीछे चल रहे थे।' तब डॉक्टर जी को गिरफ्तार कर सश्रम कारावास की सजा दी गयी थी। यह उनकी तीसरी गिरफ्तारी थी। इससे पूर्व वे दो बार जेल जा चुके थे। साम्राज्यवाद के विरुद्ध उनकी चेतना कांग्रेस आंदोलन या किताबों को पढ़कर जागृत नहीं हुई थी अपितु स्वत:स्फूर्त थी जो एक ऐसा विषय है जिस पर कोई मनोवैज्ञानिक ही प्रकाश डाल सकता है। छोटी उम्र की अनेक घटनाएं हैं जो सामान्य बालकों में नहीं पायी जाती हैं। इसी में महारानी विक्टोरिया के राज्यारोहण की हीरक जयंती के उपलक्ष्य में चाटुकारों, साम्राज्यपरस्त लोगों एवं सुविधाभोगी कुलीनों द्वारा जब 22 जून, 1897 को नागपुर में उत्सव मनाया जा रहा था, स्कूलों में मिठाइयां बांटी जा रही थीं तब मात्र 7 वर्षीय इस बालक ने मिठाई फेंकते हुए कहा था, 'वह हमारी रानी नहीं हैं।'

यह घटना अनायास साधारण घटना बन जाती अगर यह बालक अपने व्यक्तित्व में उसी दृढ़ता, जिसके पीछे भावना, विवेक, मूल्य और संकल्प छिपा था, का प्रतिबिम्ब नहीं बन जाता। 1907 में नागपुर के प्रतिष्ठित स्कूल नील सिटी स्कूल में वंदेमातरम् के जयघोष की प्रेरणा और नेतृत्व उन्हीं का था। पारिवारिक पृष्ठभूमि में आर्थिक बदहाली थी, मां-पिता का स्वर्गवास हो चुका था। नागपुर में ब्रिटिश भक्तों का दबदबा था और राजनीतिक संस्कृति में अभी साम्राज्यवाद-विरोधी तेवर सिर्फ चिंगारी के रूप में ही थे। उन परिस्थितियों में उन्होंने चिंगारी को आग बनाने का काम किया। स्कूल से शुरू हुआ वंदेमातरम् का जयघोष नागपुर के कॉलेजों में पहुंच गया। स्कूल इंस्पेक्टर के सामने वंदेमातरम् के नारे के साथ सांकेतिक प्रतिकार नागपुर की राजनीतिक संस्कृति को बदलने की शुरुआत बन गया। समझौते-सुलह की प्रक्रिया में बड़े-बूढ़े, नामी-ग्रामी, प्रभावी लोग शामिल हुए और बच्चे मान गए। बालक हेडगेवार अपनी बात पर अड़े रहे। परिणामस्वरूप स्कूल से निकाल दिये गए। उनके स्कूली मित्र गोविन्द गणेश अवादे ने 'डॉ़ हेडगेवार यांचे क्रांति अठावनी' लेख 'महाराष्ट्र' अखबार में 28 जुलाई, 1940 को लिखा। अपने संस्मरण में उन्होंने लिखा कि डॉ़ हेडगेवार का मानना था कि अगर वंदेमातरम् के जयघोष, जो मात्र मातृभूमि की वंदना है, को औपनिवेशिक सरकार अपराध मानती है तो मैं इसकी पुनरावृत्ति करता रहूंगा और सभी प्रकार की सजा पाने के लिए तैयार रहूंगा।
राष्ट्रवादियों ने केशव में भविष्य देखना शुरू किया। मैट्रिक की परीक्षा पास करने से पूर्व उन्हें दो बार स्कूल बदलना पड़ा। नागपुर से वे यवतमाल के नेशनल स्कूल में गये। बाबासाहब परांजपे ने इसे स्थापित किया था। एम़ एस़ अणे ने उन्हें संरक्षण दिया। उस शहर में 'हरिकिशोर' नामक एक पत्र निकलता था। उसके सम्पादक केशव के छात्रावास के सुपरिटेन्डेंट थे। इस पत्र ने मध्य प्रांत के तत्कालीन इंस्पेक्टर जनरल क्लीवलैंड की तुलना हिरण्यकश्यपु से कर याद दिलायी कि इस राक्षस का वध एक छोटे बालक प्रहलाद ने किया था। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार 1908 में इसकी प्रसार संख्या 725 थी जो छोटे शहर के लिए बड़ी बात थी। इसी दौर में केशव को आक्रामक भाषण देने और बम फेंकने के आरोप में भंडारा के रामपायली में पहली बार गिरफ्तार होना पड़ा। क्लीवलैंड का यवतमाल में आना हुआ और उसके पूर्व 2 अगस्त, 1909 को स्कूल को सरकार ने अवैधानिक घोषित कर बंद कर दिया। केशव का अगला पड़ाव समर्थ विद्यालय, तेलगांव था। लेकिन कुछ ही दिनों में इस विद्यालय पर भी ताला लगा दिया गया। तब वे मैट्रिक की परीक्षा के लिए नेशनल स्कूल, अमरावती पहुंचे। इस स्कूल से परीक्षा तो उन्होंने दे दी पर अगस्त, 1910 में उस स्कूल पर ताला लगा दिया गया। इस विद्यालय के बारे में सरकार के गृह-राजनीतिक विभाग की रिपोर्ट में 7वीं कक्षा के एक प्रश्न का जिक्र किया गया था। इसमें अंग्रेजी शासन के दुष्प्रभावों पर एक पैरा लिखना था। इसमें यह भी जोड़ दिया गया था कि एक मुक्त पक्षी और सोने के पिंजरे में बंद तोते के बीच क्या अंतर है?
डॉक्टर साहब की साम्राज्यवाद विरोधी छवि उनकी अंतिम सांस तक बनी रही। तभी तो संघ '40 के दशक में क्रांतिकारियों एवं कांग्रेस दोनों के लिए आकर्षण का केन्द्र बन गया था। ऐसी अनगिनत घटनाएं हैं जब वे साम्राज्यवाद के प्रश्न पर अपने-पराये के बीच भेद नहीं करते थे। मंुजे जी से उनका आत्मीय संबंध था। उनके मन में उनके प्रति आदर भाव था। वे उन्हें 'तीर्थस्वरूप मुंजे जी' कहकर पत्र लिखते थे। पर मातृभूमि के प्रति आत्मीयता के सामने वह फीका पड़ जाता था। इसका उदाहरण 1917 में मिलता है। प्रथम विश्वयुद्घ में ब्रिटेन के मायावादी रुख से बड़े-बड़े राष्ट्रवादी भी उसके झांसे में आ गये और युद्ध में उसकी सहायता करने लगे। मध्य प्रांत की प्रांतीय भर्ती समिति का कार्य लोगों को सेना में सेवा देने के लिए प्रेरित करना था। जी़ एस़ खापर्डे इसके अध्यक्ष थे और डॉ़ मुंजे उपाध्यक्ष थे। मुंजे ने ब्रिटिश सरकार को लिखे पत्र में कहा था, 'हमारा प्रांत सबसे अधिक भर्ती क्यों नहीं कर सकता है?' डॉ़ हेडगेवार ने इस दृष्टिकोण का विरोध किया। तिलक के अनुयायियों की संस्था 'राष्ट्रीय मंडल', जो इस कार्य में लगी थी, में उन्होंने विभाजन कराया एवं युद्ध के दौरान साम्राज्यवाद विरोधी गतिविधियों के लिए उन्होंने नागपुर नेशनल यूनियन की स्थापना की। उनका नारा था- 'क्रांति न कि सहयोग'। लेकिन उनका चिंतन साम्राज्यवाद मुक्त भारत तक नहीं रुका था। उनके मन में प्रश्न था कि कल भारतवर्ष का जो अभिप्राय था वह समकालीन भारतवर्ष का अभिप्राय क्यों नहीं है? क्यों हम भू-भाग और भाई खोते गये और सिमटते गए? यह प्रश्न सभ्यतामूलक था। इसमें भू-भाग से कहीं अधिक महत्वपूर्ण एक सभ्यता का पराभव था। विरासत के गौरव और वर्तमान की दीनता/हीनता को उन्होंने भविष्य के भारत के नव-निर्माण के संकल्प के साथ विचार प्रवाह में विलीन कर दिया। इसी से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का बीजारोपण हुआ। विचार का वटवृक्ष एक सूक्ष्म बीज में डालकर उन्होंने भारत की आत्मा को झकझोरने का काम किया। इस कार्य की चौहद्दी अपरिभाषित है।
हम डॉ़ हेडगेवार की इस रचना के बारे में वर्तमान की परिस्थितियों से प्रभावित होकर सोच सकते हैं। इसलिए उनके समकालीन लोगों की राय महत्वपूर्ण हो जाती है। श्री शाम ने 'केसरी' अखबार में 5 जुलाई, 1940 को जो लिखा वह ध्यान देने योग्य है, 'डॉ़ हेडगेवार ने सभी आंदोलनों का करीब से परीक्षण/अवलोकन किया, जिसमें आर्य समाज और स्वामी श्रद्धानन्द का शुद्धि आंदोलन भी था। परन्तु वे उन सबसे संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक बदलाव के अनेक आयामों पर चिंतन-मनन किया। जब प्राय: सभी हिन्दू संगठनकर्त्ता राजनीति में हिन्दू आधिपत्य और मुस्लिम अलगाववाद की दृष्टि से सोच रहे थे तब डॉ. हेडगेवार बुनियादी प्रश्न से जूझ रहे थे-हिन्दू समाज को कैसे फिर से ऊर्जावान बनाएंं? कौन इस महती कार्य को करेगा? कब इसकी शुरुआत होगी? अंतत: वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि एक मजबूत संगठन ही इन सभ्यताई प्रश्नों का समाधान कर हिन्दू समाज को विनाश से बचा पाएगा।' डॉ़ हेडगेवार का विचार सभ्यताई आयाम पर खड़ा था, यह उन समकालीन चिंतकों को समझ में आ चुका था जो तात्कालिकता से ग्रसित होकर संघ को नहीं देख रहे थे।
संघ के द्वारा उन्होंने तीन क्रांतियों की समानान्तर धाराओं का प्रवाह किया है। पहली मानसिक क्रांति, जो प्रत्येक हिन्दू को बड़े क्षितिज पर और व्यापक दृष्टि से सक्रिय करती है। दूसरी, सामाजिक क्रांति जो समाज के भीतर संरचनात्मक एवं गुणात्मक परिवर्तन का प्रवाह है। इसी सामाजिक शक्ति का स्वरूप लोकशक्ति के रूप में होता है जो राज्य शक्ति पर एक नैतिक अंकुश बनती है। और तीसरी, सांस्कृतिक क्रांति, जो हिन्दू राष्ट्र को उस प्राचीन, प्रगतिशील एवं गतिमान सभ्यता का वाहक बना देती है जो कभी राष्ट्र का वाहक हुआ करती थी। आज राष्ट्र की नैतिक, सांस्कृतिक जिम्मेदारी है कि सभ्यताई चेतना को वैश्विक मंच पर प्रभावी रूप में उसी तरह पुनर्स्थापित करे जैसे सदियों पहले हम होते थे। डॉ. हेडगेवार की मृत्यु के बाद 'मराठा' ने सम्पादकीय में जो लिखा वह आज के विमर्शकर्त्ताओं को यथार्थ के दर्शन कराने जैसा है, 'हवा बहती है और घास बढ़ती है। जहां दूसरे अनेक संगठन हवा की तरह बह गये, डॉ़ हेडगेवार का संगठन घास की तरह बढ़ता गया। इसकी जड़ें जमीन में हैं। जहां आलोचक और संशयवादी हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा सही है या गलत, वैज्ञानिक है या नहीं, इस पर विमर्श करते रहे, वहीं दूसरी तरफ पूरे देश में एक लाख समर्पित और अनुशासित स्वयंसेवक तैयार हो गये, जो हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा से जुड़े हैं।'
'राष्ट्रीयता से सभ्यताई उत्थान का यह वैचारिक आंदोलन राष्ट्र के स्व को पुष्पित, पल्लवित और पुष्ट करने का यज्ञ है जिसमें, 'संघ आगे क्या करेगा?' यह प्रश्न निरर्थक है।' अपने अंतिम भाषण में डॉक्टर जी ने यही कहा था, जो सूत्र भी है, गत्यात्मकता का आधार भी और परम वैभव तक पहुंचने का मंत्र भी।



पूजनीय डाक्टर हेडगेवार : कोटि चरण बढ़ रहे निरंतर मातृ भूमि की सेवा में

                                   कोटि चरण बढ़ रहे निरंतर मातृ भूमि की सेवा में                                                                                       :  रंगाहरि


सन् 1889 में वर्ष प्रतिपदा के शुभ दिन संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म हुआ था। 36 वर्ष की आयु में संघ की स्थापना करने के बाद दूसरी पीढ़ी का नेतृत्व उभरने के साथ ही 1940 में वे असमय  कालकवलित हुए। आज उनके जाने के 75 साल के बाद वह रा. स्वयंसेवक संघ भारत में  आसेतुहिमाचल सक्रिय, बहुआयामी निरन्तर बढ़ते हुए विशद् आन्दोलन का रूप ले चुका है। उसका प्रतिस्पंदन देश की सीमा पार भी अनुभूत है। इस परिप्रेक्ष्य में, अर्थात उस आंदोलन के स्रोत-पुरुष के नाते, डॉ. हेडगेवार के जीवन, उनके
मूल्यों पर हम सबको गंभीरता से चिंतन करके उसका नवनीत अपने में आत्मसात करना चाहिए। 

अर्वाचीन इतिहास की दृष्टि से कहा जा सकता है कि 19वीं सदी का उत्तरार्ध और 20वीं सदी का पूर्वार्ध भारत का संगठनात्मक क्रिया युग रहा है। इस जाग्रत कालखंड में अपने देश में अनेक सामाजिक, शैक्षणिक, राजनीतिक,जातीय, भाषायी, पंचीय, आध्यात्मिक, सुधारक आदि संगठन एवं प्रयास प्रारंभ किये गये। प्रत्येक प्रयास के पीछे निष्ठावान, निस्वार्थी, प्रेरणादायी महापुरुष थे।

निसर्ग के नियमानुसार कालान्तर में उन सबकोकाल कवलित होना ही था और उनका स्थान दूसरी पीढ़ी को ग्रहण करना पड़ा। यह कालचक्र घूमता रहा और आज उन विभूतियों की पांचवीं-छठी पीढ़ी सामने है। पीछे
मुड़कर देखते हैं तो एक दुखद सत्य ध्यान में आता है। विशेषत: दूसरी पीढ़ी के तिरोधाम के बाद उपर्युक्त प्रत्येक प्रयास की चेतनता क्षीण होती आती है।  ऊर्जा मन्द पड़ती है मानो मशाल का तेल खत्म हो रहा हो। आम आदमी की भाषा में उन पुराने महान प्रयासों में वैसा तेज नहीं दिखता। मलयालम कहावत के अनुसार, वे उन लंबे ऊंचे नारियल के पेड़ों जैसे हैं जो न गिरते हैं, न उखड़ते हैं, न ही नारियल (फल) देते हैं। 

इस पृष्ठभूमि में पूजनीय डाक्टर हेडगेवार को देखें। बेशक, वे एक ऐसे अपवाद हैं, जिनकी चेतनता आज भी, उनकी मृत्यु के 75 वर्ष बाद भी ओजस्वी है। उनके द्वारा आरंभ किया गया संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उन दिनों बेहद लघु रूप में था। मात्र तीन-चार प्रान्तों में, वह भी मुख्यत: नगरों में सीमित था। किन्तु वर्तमान में पांचवीं-छठी पीढ़ी में भी वह वर्धमान है और उसको समर्थक तथा विरोधी 'संघ परिवार' कहने लगे हैं। अर्थात् आज संस्थापक के तिरोधान के साढ़े सात दशक के बाद भी उनके द्वारा बोये बीज की ओजस्विता और तेजस्विता में किंचित भी कमी नहीं आयी है। संघ आज भारत में संगठन के परे एक विशद आन्दोलन बन चुका है।

देशव्यापी राष्ट्रीय आन्दोलन।

यहां एक तारतम्य प्रबोधक होगा। भारतीय साम्यवादी पार्टी का प्रारंभ भारत की माटी में 1925 में हुआ। संघ का
भी प्रारंभ उसी वर्ष हुआ। साम्यवादी पार्टी के पीछे पूरा रूसी राज्य जुटा था, ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी का आर्थिक, साहित्यिक समर्थन था, नवीन सिद्धांत के नाते वैश्विक आकर्षण था, जाने-माने नेताओं की मालिका थी। किन्तु यहां रा. स्व. संघ के पीछे-आगे उसके संस्थापक के अलावा कोई नहीं था। वे तो स्वयं जाने-माने राष्ट्रीय स्तर के नेता नहीं थे, हां प्रांतीय नेता अवश्य थे। प्रारंभ से ही उसे दकियानूसी, सांप्रदायिक आदि कहा जाता रहा।  कहीं से किसी प्रकार का राजनीतिक समर्थन नहीं था। किन्तु आज क्या स्थिति है? भारतीय साम्यवादी पार्टी कहां रह गई, रा.स्व. संघ कहां पहुंच गया?

देशवासी अच्छे से जानते हैं। इसका हेतु क्या है? सही उत्तर प्राप्त करने के लिए हमें पूजनीय डाक्टर हेडगेवार के सतत् सक्रिय जीवन पर दृष्टि डालनी होगी। सब लोग जानते हैं और मानते भी हैं कि डॉ. हेडगेवार जन्मजात राष्ट्रभक्त थे। वे तत्कालीन सभी स्वातंत्र्य अभियानों में सक्रिय रहे थे। फिर भी उनके मन में कई तरह के प्रश्न उभरते रहते थेे। कई प्रश्न अनुत्तरित थे, कई भ्रान्तिजनक। उनके मन में 'फ्रीडम' और 'इन्डिपेन्डेंस' पर्यायवाची शब्द नहीं थे। प्रथम शब्द पूर्णत: सकारात्मक है, उसका अर्थ है स्वतंत्रता। दूसरा शब्द नकारात्मक है, उसका अर्थ है 'डिपेन्डेन्स' का अभाव अर्थात अनाश्रय अथवा अनावलंबन। अनाश्रय अपने आप में स्वतंत्रता है, यह कहना
गलत होगा। पिंजरे में बंद तोता 'डिपेन्डेन्ट' है। जब उसे मुक्त किया जाता है तो वह 'इन्डिपेन्डेन्ट' हो जाता है, अनाश्रित हो जाता है। परन्तु दीर्घकाल तक बंदी जीवन उसके मन को भी बंदी बनाता है और रिहा करने पर भी वह सामने के अनन्त गगन में उड़ जाने की हिम्मत नहीं कर पाता। बाहर आते ही अपरिचित आवाज सुनने पर वह झट से पिंजरे के अन्दर जा दुबकता है। शारीरिक दृष्टि से वह 'इन्डिपेन्डेन्ट' तो है, पर जीवन में 'डिपेन्डेन्ट' है। 
'इन्डिपेन्डेन्ट' होने पर भी वह स्वतंत्र नहीं, क्योंकि उसने उस अनुकूल अवस्था में भी अपना तंत्र नहीं अपनाया। अत: डाक्टर हेडगेवार ने 'फ्रीडम' और 'इन्डिपेन्डेन्स' को एक नहीं माना।

वे चाहते थे भारत की 'फ्रीडम' अथवा स्वतंत्रता। उस शब्द का भी सांगोपांग विश्लेषण डाक्टर जी ने किया। स्वतंत्रता का अर्थ है स्व की तंत्रता। इसमें स्व को पहचाने बिना तंत्रता निरर्थक है। भारतीय स्वतंत्रता के विवेचन में मूलभूत प्रश्न है भारत का स्वत्व क्या है। स्वत्व को पहचाने बिना तंत्र को कौन, कहां, कैसे लागू करेगा? उसी प्रकार स्वीकृत तंत्र में यदि देश का स्वत्व स्पंदित न हो तो वह कैसी स्वतंत्रता? दूसरे के तंत्र से अगर कोई चलता है तो वह उसके लिए परतंत्रता है या स्वतंत्रता? देश की ऐसी स्वतंत्रता की खोज के लिए निकले डॉ. हेडगेवार देश के स्वत्व की खोज तक आ पहुंचे। इस समस्या का असली समाधान उन दिनों स्वामी विवेकानंद, श्री अरविन्द, भगिनी निवेदिता, स्वामी अभेदानन्द जैसी विभूतियों ने दिया था। स्वामी विवेकानंद ने बार-बार स्पष्ट शब्दों में कहा था कि प्रत्येक राष्ट्र की एक विशेष आत्मा होती है, वह उस राष्ट्र का स्वत्व निर्धारित करती है, उसके अनुसार विश्व के अन्य राष्ट्रों को देने के लिए उस राष्ट्र का एक विशेष संदेश रहता है, वह उस राष्ट्र का विशेष मिशन बन जाता है,  परिणामत: वह उस राष्ट्र की नियति बन जाती है। आगे चलकर, कारावास से मुक्त हुए तप:पूत श्री अरविन्द ने उत्तरपाड़ा के अपने विख्यात भाषण में कहा था कि भारतवर्ष की राष्ट्रीयता का दूसरा नाम है सनातन धर्म। इन्हीं विचारों को शास्त्रीय परिभाषा का रूप देकर भगिनी निवेदिता ने कहा था-देश, जन, धर्म, ये तीनों के मेल से बनता है भारत राष्ट्र।

डाक्टर हेडगेवार ने पाया कि उनकी अपनी खोज से प्राप्त हुए उनके अपने विचार उपर्युक्त विचारों से मेल खाते हैं। इससे वे आश्वस्त और संतुष्ट हुए। उस समय विद्यमान वातावरण में व्यावहारिक तौर पर सोच-विचार कर वे इस निर्णय पर पहुंचे कि ऊपर उल्लेख किए उस राष्ट्रीय स्वत्व का नाम है हिन्दुत्व और यह राष्ट्र हिन्दू राष्ट्र है। हिन्दू राष्ट्र का स्वत्व आधारित तंत्र ही इस देश का स्वातंत्र्य है।

परंतु सर्वसाधारण के बीच कार्य करने वाले कार्यकर्ता के नाते डाक्टर हेडगेवार ने अनुभव किया कि स्वतंत्रता की मांग को लेकर तरह-तरह के आन्दोलन करने वाले पढ़े-लिखे नेता भी स्वतंत्रता की इस अवधारणा से अज्ञान थे। उन लोगों की संकल्पना में हमारा यह देश अंग्रेजों के आगमन के पूर्व कभी राष्ट्र नहीं था, उन्होंने ही हमारी जनता को राष्ट्र बन जाने की प्रक्रिया में भागीदार बनाया, इसे के परिणामस्वरूप भारत निकट भविष्य में नवजात राष्ट्र बन जायेगा। दूसरे शब्दों में उन राष्ट्रीय नेताओं ने विदेशी अंग्रेजों को भारत के राष्ट्र निर्माता का दर्जा अथवा श्रेय दे दिया। इस हालत में अपने इस विशाल देश के आम व्यक्ति में राष्ट्र के स्व के बोध को कैसे जगाया जाए, यह बात डाक्टर हेडगेवार के मन को मथने लगी थी। बाहर कहीं पर उसका उत्तर नजर में न आने के कारण उनको  अन्तर्मुख होकर समाधान खोजना पड़ा।

डाक्टर जी की दूसरी मान्यता थी कि राष्ट्र का मूल घटक उस देश का निवासी मानव है। व्यक्ति निर्माण द्वारा राष्ट्रनिर्माण, यह था उनका कार्यसूत्र। इस दृष्टि से जब उन्होंने अपने देश बांधवों को देखा तो जो उनको अनुभव हुआ वह पीड़ाजनक था। वैयक्तिक दृष्टि से आम आदमी आस्तिक, धार्मिक, ईमानदार था। किन्तु सामूहिक दृष्टि से वह शून्य सा था। पश्चिमी शिक्षा से प्रभावित वह हीन भाव, आत्म निन्दा, स्वार्थ, सद्गुण विकृति, आत्म विस्मृति, पदावलंबिता आदि आत्मघातक दुर्गुणों का अत्युत्तम नमूना बन चुका था। कोटि कोटि भुजैधृत कर वाली मां को  नि:सहाय कहकर 'रक्ष भारता सहाय हीना' गीत गाने वाला बन चुका था। 'दुर्बल के प्राण पुकार रहे जगदीश हरें' भजन दोहराने वाला बन चुका था। इस तरह की राष्ट्र संतान का राष्ट्र स्वत्वानुकूल पुन: प्रतिष्ठापन, यह था  डाक्टरजी के सम्मुख उभरा भगीरथ कर्तव्य। उसके लिए कौन सा मार्ग हो, यह कहीं दिखाई नहीं पड़ता था। पूरी शिक्षा प्रणाली परदेशी हो चुकी थी। सत्संस्कार देने के गुरुकुल निष्क्रिय बन चुके थे। ऐसा में क्या उपाय हो? यह थी उनकी दूसरी समस्या।

तीसरी समस्या उभरी व्यवस्था की। मनुष्य गुणवान हो, किन्तु अलग-अलग रहकर अकेले काम करने से राष्ट्रीय कार्य सफल होगा क्या? अनुभव तो इसका उलट बताता है। विश्वभर में संगठित अल्पसंख्यक असंगठित  बहुसंख्यकों पर हावी हो जाते हैं। अत: राष्ट्र स्वत्वानुकूल संस्कारित व्यक्तियों को संगठन के वज्रसूत्र में गूंथना 
अनिवार्य है, यह महान संगठक डाक्टर जी का दृढ़विश्वास बन गया। अंग्रेजी प्रशासकों के चाल-चलन से भी उन्होंने इस सबक को सीख लिया था।

फिर एक बार, वही समस्या सामने आई कि संगठन का नमूना कौन सा हो? जहां संगठन का भाव विद्यमान है  वहां संगठन को खड़ा करने का तरीका और जहां संगठन का बोध तक नहीं वहां संगठन को गढ़ने का तरीका एक नहीं हो सकता। पहले का काम रूप देने का है, किन्तु दूसरे का काम चेतना जगाने का है। डाक्टर जी ने उसको ठीक से समझा और उसके बारे में मौलिकता से सोचा।

संक्षेप में, जन्म से ही देशभक्त डॉ. हेडगेवार के स्वतंत्रता की पूर्व तैयारी के नाते विचार थे- हमारा भारत प्राचीन है, वह नया बन रहा राष्ट्र नहीं। राष्ट्र का जो विशेष स्वत्व होता है, वह होता है उसकी पहचान। उसको देश का हर व्यक्ति समझे, पहचाने, माने, तभी उसको देशहित में कार्यरत होने की शाश्वत प्रेरणा मिलती रहेगी। वह राष्ट्रीय व्यक्ति राष्ट्रानुकूल गुणों का धनी हो और राष्ट्र हेतु समर्पण भाव से कार्यरत होने के लिए सक्षम-समर्थ बने। वह समर्थ सज्जन अकेला न रहकर समभावी संगठित शक्ति का अभिन्न अंग बने, इन विचारों को घनीभूत आकार देने हेतु उनके मन में कई दिन तक मंथन चलता रहा और 1925 की विजयादशमी के शुभ पर्व पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के रूप में रूपांतरित हुआ।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ डाक्टर हेडगेवार की तीनों समस्याओं का समाधान सामने रखता है। संघ की शाखा  आधुनिक वैकल्पिक गुरुकुल है। उसमें उपस्थित स्वयंसेवक को देश के स्वत्व का ज्ञान प्राप्त होता है और उसका व्यक्तित्व राष्ट्रीय बन जाता है। शाखा के अन्यान्य बौद्धिक, शारीरिक कार्यक्रमों द्वारा वह राष्ट्रीय व्यक्ति, जिसको स्वयंसेवक कहते हैं, राष्ट्रानुकूल संस्कारों से संपन्न हो जाता है, अहितकारी कुसंस्कारों से मुक्त हो जाता है। उसमें 
संघबोध जैसे संगठनात्मक गुण विकसित होते हैं। इसके अलावा सबसे महत्व की बात, ध्येयनिष्ठ आन्दोलन की सृजनशीलता नदी की धारा के समान बनी रहती है।

अतएव आज रा. स्व. संघ विशद आन्दोलन के नाते नित्य बढ़ रहा है। संघ के इस अन्यत्र अदृश्य संगठनात्मक ढांचे की अप्रतिम कल्पना डाक्टर हेडगेवार की मौलिकता की परिचायक है। इन विचारों को ध्यान में रखकर जब डाक्टर हेडगेवार के व्यक्तित्व पर दृष्टि डालते हैं तब स्पष्ट होता है कि उस महात्मा का राष्ट्र समर्पित जीवन  स्वतंत्रता प्राप्त करने की लड़ाई तक सीमित नहीं था। 

स्वतंत्रता प्राप्ति प्रथम सोपान मात्र था। उसके ऊपर के स्वातंत्र्यकालीन सोपान पर भी पदार्पण कर अन्तिम गन्तव्य इस महान देश का धर्माधिष्ठित परम् वैभव था।  अर्थात डाक्टर हेडगेवार की अन्त:प्रेरणा परिस्थिति निरपेक्ष चिरकालीन थी। अतएव उनके द्वारा प्रारंभ किए गए रा. स्व. संघ के स्वयंसेवकों की भी प्रेरणा चिरकालीन है, परिस्थिति निरपेक्ष है यद्यपि उपक्रम परिस्थिति सापेक्ष है। यही एक कारण है कि संघ संस्थापक के निधन के 75 वर्ष पश्चात भी उनके द्वारा दी गई प्रेरणा की ऊर्जा प्रखर एवं अक्षय है। इस परिप्रेक्ष्य में ही हम कहते हैं, डॉ. हेडगेवार आज भी प्रासंगिक हैं।

(लेखक रा. स्व. संघ के अ.भा.बौद्धिक प्रमुख रहे हंै)

वर्ष प्रतिपदा : संघ वटवृक्ष के बीज, परमपूज्य डॉक्टर हेडगेवार जी की जयन्ती


संघ वटवृक्ष के बीज –  परमपूज्य  डॉक्टर हेडगेवार जी की जयन्ती पर नमन
-  डॉ. मनमोहन वैद्य
(अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ)

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम आज सर्वत्र चर्चा में है. संघ कार्य का बढ़ता व्याप देख कर संघ विचार के विरोधक चिंतित होकर संघ का नाम बार-बार उछाल रहे हैं. अपनी सारी शक्ति और युक्ति लगाकर संघ विचार का विरोध करने के बावजूद यह राष्ट्रीय शक्ति क्षीण होने के बजाय बढ़ रही है, यह उनकी चिंता और उद्वेग का कारण है. दूसरी ओर राष्ट्रहित में सोचने वाली सज्जन शक्ति संघ का बढ़ता प्रभाव एवं व्याप देख कर भारत के भविष्य के बारे में अधिक आश्वस्त होकर संघ के साथ या उसके सहयोग से किसी ना किसी सामाजिक कार्य में सक्रिय होने के लिए उत्सुक हैं, यह देखने में आ रहा है. संघ की वेबसाइट पर ही संघ से जुड़ने की उत्सुकता जताने वाले युवकों की संख्या 2012 में प्रतिमास 1000 थी. यही संख्या प्रतिमास 2013 में 2500 और 2014 में 9000 थी. इस से ही संघ के बढ़ते समर्थन का अंदाज लगाया जा सकता है. संघ की इस बढती शक्ति का कारण शाश्वत सत्य पर आधारित संघ का शुद्ध राष्ट्रीय विचार एवं इसके लिए तन–मन–धन पूर्वक कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं की अखंड श्रृंखला है.

संघ का यह विशाल वटवृक्ष एक तरफ नई आकाशीय ऊंचाइयां छूता दिखता है, वहीं उसकी अनेक जटाएं धरती में जाकर इस विशाल विस्तार के लिए रस पोषण करने हेतु नई-नई जमीन तलाश रही हैं, तैयार कर रही हैं. इस सुदृढ़, विस्तृत और विशाल वटवृक्ष का बीज कितना पुष्ट एवं शुद्ध होगा इसकी कल्पना से ही मन रोमांचित हो उठता है. इस संघ वृक्ष के बीज संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार, जिनके जन्म को इस वर्ष प्रतिपदा पर 125 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं. कैसा था यह बीज?

नागपुर में वर्ष प्रतिपदा के पावन दिन 1 अप्रैल, 1889 को जन्मे केशव हेडगेवार जन्मजात देशभक्त थे. आजादी के आन्दोलन की आहट भी मध्य प्रान्त के नागपुर में सुनाई नहीं दी थी और केशव के घर में राजकीय आन्दोलन की ऐसी कोई परंपरा भी नहीं थी, तब भी शिशु केशव के मन में अपने देश को गुलाम बनाने वाले अंग्रेज के बारे में गुस्सा तथा स्वतंत्र होने की अदम्य इच्छा थी, ऐसा उनके बचपन के अनेक प्रसंगों से ध्यान में आता है. रानी विक्टोरिया के राज्यारोहण के हीरक महोत्सव के निमित्त विद्यालय में बांटी मिठाई को केशव द्वारा (उम्र 8 साल) कूड़े में फेंक देना या जॉर्ज पंचम के भारत आगमन पर सरकारी भवनों पर की गई रोशनी और आतिशबाजी देखने जाने के लिए केशव (उम्र 9 साल) का मना करना ऐसे कई उदाहरण हैं.

बंग-भंग विरोधी आन्दोलन का दमन करने हेतु वन्देमातरम के प्रकट उद्घोष करने पर लगी पाबन्दी करने वाले रिस्ले सर्क्युलर की धज्जियाँ उड़ाते हुए 1907 में विद्यालय निरीक्षक के स्वागत में प्रत्येक कक्षा में वन्देमातरम का उद्घोष करवा कर, उनका स्वागत करने की योजना केशव की ही थी. इसके माध्यम से अपनी निर्भयता, देशभक्ति तथा संगठन कुशलता का परिचय  केशव ने सबको कराया. वैद्यकीय शिक्षा की सुविधा मुंबई में होते हुए भी क्रन्तिकारी आंदोलन का प्रमुख केंद्र होने के कारण कोलकाता जाकर वैद्यकीय शिक्षा प्राप्त करने का उन्होंने निर्णय लिया और शीघ्र ही क्रान्तिकारी आन्दोलन की शीर्ष संस्था अनुशीलन समिति के अत्यंत अंतर्गत मंडली में उन्होंने अपना स्थान पा लिया. 1916 में नागपुर वापिस आने पर घर की आर्थिक दुरावस्था होते हुए भी, डॉक्टर बनने के बाद अपना व्यवसाय या व्यक्तिगत जीवन – विवाह आदि करने का विचार त्याग कर पूर्ण शक्ति के साथ स्वतंत्रता आन्दोलन में उन्होंने अपने आप को झोंक दिया.

1920 में नागपुर में होने वाले कांग्रेस के अधिवेशन की व्यवस्था के प्रबंधन की जिम्मेदारी डॉक्टर जी के पास थी. इस हेतु उन्होंने 1200 स्वयंसेवकों की भरती की थी. कांग्रेस की प्रस्ताव समिति के सामने उन्होंने दो प्रस्ताव रखे थे. भारत के लिए पूर्ण स्वतंत्रता और विश्व को पूँजीवाद के चंगुल से मुक्त करना, यह कांग्रेस का लक्ष्य होना चाहिए. पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव कांग्रेस ने संघ स्थापना के बाद 1930 में स्वीकार कर पारित किया, इसलिए डॉक्टर जी ने संघ की सभी शाखाओं पर कांग्रेस का अभिनन्दन करने का कार्यक्रम करने के लिए सूचना दी थी. इससे डॉक्टर जी की दूरगामी एवं विश्वव्यापी दृष्टि का परिचय होता है.

व्यक्तिगत मतभिन्नता होने पर भी साम्राज्य विरोधी आन्दोलन में सभी ने साथ रहना चाहिए. और यह आन्दोलन कमजोर नहीं होने देना चाहिए ऐसा वे सोचते थे. इस सोच के कारण ही खिलाफत आन्दोलन को कांग्रेस का समर्थन देने की महात्मा गाँधी जी की घोषणा का विरोध होने के बावजूद उन्होंने अपनी नाराजगी खुलकर प्रकट नहीं की तथा गांधीजी के नेतृत्व में असहयोग आन्दोलन में वे बेहिचक सहभागी हुए.

स्वतंत्रता प्राप्त करना किसी भी समाज के लिए अत्यंत आवश्यक एवं स्वाभिमान का विषय है किन्तु वह चिरस्थायी रहे तथा समाज आने वाले सभी संकटों का सफलतापूर्वक सामना कर सके, इसलिए राष्ट्रीय गुणों से युक्त और सम्पूर्ण दोषमुक्त, विजय की आकांक्षा तथा विश्वास रख कर पुरुषार्थ करने वाला, स्वाभिमानी, सुसंगठित समाज का निर्माण करना अधिक आवश्यक एवं मूलभूत कार्य है. यह सोच कर डॉक्टर जी ने 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की. प्रखर ध्येयनिष्ठा, असीम आत्मीयता और अपने आचरण के उदाहरण से युवकों को जोड़ कर उन्हें गढ़ने का कार्य शाखा के माध्यम से शुरू हुआ. शक्ति की उपासना, सामूहिकता, अनुशासन, देशभक्ति, राष्ट्रगौरव तथा सम्पूर्ण समाज के लिए आत्मीयता और समाज के लिए निःस्वार्थ भाव से त्याग करने की प्रेरणा इन गुणों के निर्माण हेतु अनेक कार्यक्रमों की योजना शाखा नामक अमोघ तंत्र में विकसित होती गयी. सारे भारत में प्रवास करते हुए अथक परिश्रम से केवल 15 वर्ष में ही आसेतु हिमालय, सम्पूर्ण भारत में संघ कार्य का विस्तार करने में वे सफल हुए.

अपनी प्राचीन संस्कृति एवं परम्पराओं के प्रति अपार श्रद्धा तथा विश्वास रखते हुए भी आवश्यक सामूहिक गुणों की निर्मिती हेतु आधुनिक साधनों का उपयोग करने में उन्हें जरा सी भी हिचक नहीं थी. अपने आप को पीछे रखकर अपने सहयोगियों को आगे करना, सारा श्रेय उन्हें  देने की उनकी संगठन शैली के कारण ही संघ कार्य की नींव मजबूत बनी.

संघ कार्य आरंभ होने के बाद भी स्वातंत्र्य प्राप्ति के लिए समाज में चलने वाले   तत्कालीन सभी आंदोलनों के साथ न केवल उनका संपर्क था, बल्कि उसमें समय-समय पर वे व्यक्तिगत तौर पर स्वयंसेवकों के साथ सहभागी भी होते थे. 1930 में गांधीजी के नेतृत्व में शुरू हुए सविनय कानून भंग आन्दोलन में सहभागी होने के लिए उन्होंने विदर्भ में जंगल सत्याग्रह में व्यक्तिगत तौर पर स्वयंसेवकों के साथ भाग लिया तथा 9 मास का कारावास भी सहन किया. इस समय भी व्यक्ति निर्माण एवं समाज संगठन का नित्य कार्य अविरत चलता रहे, इस हेतु उन्होंने अपने मित्र एवं सहकारी डॉ. परांजपे को सरसंघचालक पद का दायित्व सौंपा था तथा संघ शाखाओं पर प्रवास करने हेतु कार्यकर्ताओं की योजना भी की थी. उस समय समाज कांग्रेस–क्रान्तिकारी, तिलकवादी–गाँधीवादी, कांग्रेस–हिन्दु महासभा ऐसे द्वंद्वों में बंटा हुआ था. डॉक्टर जी इस द्वंद्व में ना फंस कर, सभी से समान नजदीकी रखते हुए कुशल नाविक की तरह संघ की नाव को चला रहे थे.

संघ को समाज में एक संगठन न बनने देने की विशेष सावधानी रखते हुए उन्होंने संघ को सम्पूर्ण समाज का संगठन के नाते ही विकसित किया. संघ कार्य को सम्पूर्ण स्वावलंबी एवं आत्मनिर्भर बनाते हुए उन्होंने बाहर से आर्थिक सहायता लेने की परंपरा नहीं रखी. संघ के घटक, स्वयंसेवक ही कार्य के लिए आवश्यक सभी धन, समय, परिश्रम, त्याग देने हेतु तत्पर हो, इस हेतु गुरु दक्षिणा की अभिनव परंपरा संघ में शुरू की. इस चिरपुरातन एवं नित्यनूतन हिन्दू समाज को सतत् प्रेरणा देने वाले, प्राचीन एवं सार्थक प्रतीक के नाते भगवा ध्वज को गुरु के स्थान पर स्थापित करने का उनका विचार, उनके दूरदृष्टा होने का परिचायक है. व्यक्ति चाहे कितना भी श्रेष्ठ क्यों ना हो, व्यक्ति नहीं, तत्वनिष्ठा पर उनका बल रहता था. इसके कारण ही आज 9 दशक बीतने के बाद भी, सात–सात पीढ़ियों से संघ कार्य चलने के बावजूद संघ कार्य अपने मार्ग से ना भटका, ना बंटा, ना रुका.

संघ संस्थापक होने का अहंकार उनके मन में लेशमात्र भी नहीं था. इसीलिए सरसंघचालक पद का दायित्व सहयोगियों का सामूहिक निर्णय होने कारण 1929  में उसे उन्होंने स्वीकार तो किया, परन्तु 1933 में संघचालक बैठक में उन्होंने अपना मनोगत व्यक्त किया. उसमें उन्होंने कहा – “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जन्मदाता या संस्थापक मैं ना हो कर आप सब हैं, यह मैं भली-भांति जानता हूँ. आप के द्वारा स्थापित संघ का, आपकी इच्छानुसार, मैं एक दाई का कार्य कर रहा हूँ. मैं यह काम आपकी इच्छा एवं आज्ञा के अनुसार आगे भी करता रहूँगा तथा ऐसा करते समय किसी प्रकार के संकट अथवा मानापमान की मैं कतई चिंता नहीं करूँगा.

आप को जब भी प्रतीत हो कि मेरी अयोग्यता के कारण संघ की क्षति हो रही है, तो आप मेरे स्थान पर दूसरे योग्य व्यक्ति को प्रतिष्ठित करने के लिए स्वतंत्र हैं. आपकी इच्छा एवं आज्ञा से जितनी सहर्षता के साथ मैंने इस पद पर कार्य किया है, इतने ही आनंद से आप द्वारा चुने हुए नए सरसंघचालक के हाथ सभी अधिकार सूत्र समर्पित करके उसी क्षण से उसके विश्वासु स्वयंसेवक के रूप में कार्य करता रहूँगा. मेरे लिए व्यक्तित्व के मायने नहीं है; संघ कार्य का ही वास्तविक अर्थ में महत्व है. अतः संघ के हित में कोई भी कार्य करने में मैं पीछे नहीं हटूंगा” संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार के ये विचार उनकी निर्लेप वृत्ति एवं ध्येय समर्पित व्यक्तित्व का दर्शन कराते है. सामूहिक गुणों की उपासना तथा सामूहिक अनुशासन, आत्मविलोपी वृत्ति स्वयंसेवकों में निर्माण करने हेतु भारतीय परंपरा में नए ऐसे समान गणवेश, संचलन, सैनिक कवायद, घोष, शिविर आदि कार्यक्रमों को संघ कार्य का अविभाज्य भाग बनाने का अत्याधुनिक विचार भी डॉक्टर जी ने किया. संघ कार्य पर होने वाली आलोचना को अनदेखा कर, उसकी उपेक्षा कर वादविवाद में ना उलझते हुए सभी से आत्मीय सम्बन्ध बनाए रखने का उनका आग्रह रहता था.

“वादो नाSवलम्ब्यः” और  “सर्वेषाम् अविरोधेन” ऐसी उनकी भूमिका रहती थी. प्रशंसा और आलोचना में – दोनों ही स्थिति में डॉ. हेडगेवार अपने लक्ष्य, प्रकृति और तौर तरीकों से तनिक भी नहीं डगमगाते. संघ की प्रशंसा उत्तरदायित्व बढाने वाली प्रेरणा तथा आलोचना को आलोचक की अज्ञानता का प्रतीक मान कर वह अपनी दृढ़ता का परिचय देते रहे.

1936 में नासिक में शंकराचार्य विद्याशंकर भारती द्वारा डॉक्टर हेडगेवार को “राष्ट्र सेनापति” उपाधि से विभूषित किया गया, यह समाचार, समाचार पत्र में प्रकाशित हुआ. डॉक्टर जी के पास अभिनन्दन पत्र आने लगे. पर उन्होंने स्वयंसेवकों को सूचना जारी करते हुए कहा कि “हम में से कोई भी और कभी भी इस उपाधि का उपयोग ना करे. उपाधि हम लोगों के लिए असंगत है.” उनका चरित्र लिखने वालों को भी डॉक्टर जी ने हतोत्साहित किया. “तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें ना रहें” यह परंपरा उन्होंने संघ में निर्माण की.

शब्दों से नहीं, आचरण से सिखाने की उनकी कार्य पद्धति थी. संघ कार्य की प्रसिद्धि की चिंता ना करते हुए, संघ कार्य के परिणाम से ही लोग संघ कार्य को महसूस करेंगे, समझेंगे तथा सहयोग एवं समर्थन देंगे, ऐसा उनका विचार था. “फलानुमेया प्रारम्भः” याने वृक्ष का बीज बोया है इसकी प्रसिद्धि अथवा चर्चा ना करते हुए वृक्ष बड़ा होने पर उसके फलों का जब सब आस्वाद लेंगे तब किसी ने वृक्ष बोया था, यह बात अपने आप लोग जान लेंगे, ऐसी उनकी सोच एवं कार्य पद्धति थी.

इसीलिए उनके निधन होने के पश्चात् भी, अनेक उतार-चढाव संघ के जीवन में आने के बाद भी, राष्ट्र जीवन में अनेक उथल-पुथल होने के बावजूद संघ कार्य अपनी नियत दिशा में, निश्चित गति से लगातार बढ़ता हुआ अपने प्रभाव से सम्पूर्ण समाज को स्पर्श और आलोकित करता हुआ आगे ही बढ़ रहा है. संघ की इस यशोगाथा में ही डॉक्टर जी के समर्पित, युगदृष्टा, सफल संगठक और सार्थक जीवन की यशोगाथा है.

डॉक्टर हेडगेवार जी के गौरवमय जीवन के 125 वर्ष पूर्ण होने के पावन पर्व पर उनके चरणों में शत-शत नमन.

भारतीय नव वर्ष : आत्मगौरव का प्रतीक





आत्मगौरव का प्रतीक भारतीय नव वर्ष

आत्मगौरव का प्रतीक भारतीय नव वर्ष

यह नव संवत् ही मेरा नववर्ष ! आपका नववर्ष !! प्रत्येक भारतीय का नववर्ष !!!

सोचिए 1 जनवरी तो अंग्रेजों का नववर्ष अथवा उनका नववर्ष जो अंग्रेजियत में जी रहे हैं.

जिन्हें न गुलामी का दंश पता है, न स्वतंत्रता की कीमत, जिन्हें गीता और रामायण का ध्यान  नहीं है, जिन्हें न तो हस्तिनापुर याद है, न ही दुष्यंत पुत्र भरत याद है, जिन्हें राम, कृष्ण, शिवाजी, राणाप्रताप, चन्द्रगुप्त, बुद्ध, महावीर याद नहीं तथा जिन्हें गुरू गोविन्द सिंह, चंद्र शेखर, सुभाष, भगत सिंह और रानी लक्ष्मीबाई की बलिदानी परम्परा याद नहीं. उनको ही भारत याद नहीं-अपना नववर्ष याद नहीं. याद है केवल इण्डिया और उसका न्यू ईयर. न्यू ईयर का अर्थ है जश्न, नृत्य, शराब से मनाया जाने वाला रात्रिकालीन हुड़दंग.

आत्मगौरव का प्रतीक भारतीय नव वर्ष

भारतीय नव वर्ष जैसा दुनिया के किसी नव वर्ष का आनन्दोत्सव न तो देखा गया न ही सुना गया, परन्तु अंग्रेजों की गुलामी से पनपी आत्मविस्मृति के कारण हम अनुभव ही नहीं करते कि यह आनन्द का पर्व हमारे नव वर्ष का शुभारम्भ है. विचार करने पर प्रश्न उठता है कि होली से राम नवमी तक भारत में जो आनन्द का उत्सव होता है उसका मर्म क्या है? रंग-गुलाल, हंसी-मजाक, नये वस़्त्रों को पहनकर नव सम्वत् का सुनना, 15 दिनों तक एक दूसरे से गले मिलना, मिठाई खाना और खिलाना भारतीय नव वर्ष के शुभारम्भ से पहले ही होली के पर्व के रूप में शुरू हो जाता है. नव वर्ष के पहले दिन से 9 दिनों तक नवरात्रि का विशेष पूजन शक्ति अर्जन के लिए किया जाता है. प्रकृति भी इन 20-25 दिनों में आनन्द मनाती है, पौधों में नई-नई कोपलें और पत्तियां निकलती हैं तथा बसन्त का आनन्द होता है. भारतीय नव वर्ष का लगभग चार सप्ताह  तक चलने वाला पूजनयुक्त आनन्द पर्व हमारी श्रेष्ठता और गौरव का प्रतीक है, फिर भी भारत का दुर्भाग्य है कि अपने नव वर्ष पर गर्व करने में हमें संकोच लगता है. परन्तु एक जनवरी आते ही नाच-गाना, शराब परोसना, जश्न के आधुनिक तरीकों का वीभत्स प्रदर्शन करना तथा शुभकामनाएं भेजने का दौर शुरू हो जाता है.

भारतीय काल गणना का विश्व में कोई मुकाबला नहीं है क्योंकि यह काल गणना ग्रह नक्षत्रों की गति पर आधारित है.  यहां तो प्रत्येक मास की पूर्णिमा को जो नक्षत्र होता है, उसी नक्षत्र के नाम पर महीने का नाम रखा जाता है.  चित्रा नक्षत्र के आधार पर चैत्र, विशाखा नक्षत्र के आधार पर बैसाख, ज्येष्ठा नक्षत्र के आधार पर ज्येष्ठ, उत्तराषाढा नक्षत्र के आधार पर  आषाढ़, श्रवण नक्षत्र के आधार पर श्रावण, उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र के आधार पर भाद्रपद, अश्विनी नक्षत्र के आधार पर अश्विनि, कृतिका नक्षत्र के आधार पर कार्तिक, मृगशिरा नक्षत्र के आधार पर मार्गशीर्ष, पुष्य नक्षत्र के आधार पर पौष, मघा पक्षत्र के आधार पर माघ एवं उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र के आधार पर फाल्गुन मास निर्धारित है.  चन्द्र ग्रहण, सूर्य ग्रहण की वर्षों पूर्व की काल गणना भारतीय पंचांग में है फिर भी विक्रमी संवत् पर गर्व करने में संकोच होता है.  कुछ वर्ष पूर्व शताब्दी का सबसे बड़ा सूर्यग्रहण हुआ.  भारतीय ज्योतिष के विद्वानों ने बहुत पहले से बताना प्रारम्भ कर दिया कि अमुक दिन, अमुक समय से सूर्यग्रहण होगा,  किन्तु यूरोपीय विद्वानों ने अविश्वास का वातारण बनाना प्रारम्भ कर दिया. नासा ने 120 करोड़ रूपये खर्च करके पता किया कि भारतीय ज्योतिष में जो कहा गया है, वही ठीक है किन्तु आगे की गणनाएं भारतीय ज्योतिष के अनुसार ठीक होंगी या नहीं इस पर अविश्वास की रेखा फिर से खींच दी.

अपनी कालगणना का हम सदैव स्मरण करते हैं, परन्तु इसका हमें ध्यान नहीं रहता है. अपने घर परिवार के समस्त शुभकार्य पंचांग की तिथि से ही देखकर आयोजित करने का स्वभाव हम सभी का है. जब हम किसी नये व्यक्ति से मिलते हैं तो उसे अपना परिचय देते हैं कि हम अमुक देश, प्रदेश या गांव के निवासी हैं तथा अमुक पिता की संतान हैं. इसी प्रकार जब हम किसी शुभ कार्य को सम्पन्न करने के लिए किसी देव शक्ति का आवाहन करते हैं तो संकल्प करते समय उसे भी अपना परिचय बताते हैं. संकल्प के समय पुरोहितगण एक मंत्र बोलते हैं, जिस पर हम ध्यान तो नहीं देते परन्तु उस संकल्प मंत्र में हमारी कालगणना का वर्णन है.  मंत्रोच्चार कुछ इस प्रकार है – ऊॅं अस्य श्री विष्णु राज्ञया प्रवत्र्य मानस व्रहमणो द्वितीय पराद्र्धे, श्वेतवाराह कल्पे, वैवस्वत मनवन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलि प्रथम चरणे, जम्बूद्वीपे भरतखण्डे अमुक नाम, अमुकगोत्र आदि….. पूजनं/आवाहनम् करिष्यामऽहे.

मंत्र में स्पष्ट है कि ब्रम्हा जी की आयु के दो परार्द्धों में से यह द्वितीय परार्द्ध है, इस समय श्वेत बाराह कल्प चल रहा है,  कल्प को ब्रम्हा जी की आयु का एक दिन माना गया है, परन्तु यह कालगणना की इकाई भी है. एक कल्प में 14 मनवन्तर, एक मनवन्तर में 71 चर्तुयुग तथा एक चर्तुयुग में 43 लाख 20 हजार वर्ष होते हैं. जिसका  भाग सतयुग, भाग त्रेता, भाग द्वापर तथा भाग कलियुग होता है.  इस समय वैवस्वत् नामक मनवन्तर का 28वां कलियुग है.  हमें स्मरण होगा कि महाभारत  का युद्ध समाप्त होने के 36 वर्षों बाद भगवान श्रीकृष्ण ने महाप्रयाण किया था. उस समय द्वापर युग समाप्त हुआ था. यह घटना ईस्वीय सन् प्रारम्भ होने से 3102 वर्ष पहले की है. मान्यता है कि श्रीकृष्ण भगवान के दिवंगत होते ही कलियुग प्रारम्भ हो गया था, इसी कारण ईस्वीय सन् में 3102 वर्ष जोड़ने पर कलि संवत् या युगाब्द की गणना होती है.

बृह्मपुराण में यह भी लिखा गया है कि बृह्माजी ने सृष्टि की रचना भी इसी दिन की है -

’’चैत्रमासे जगदब्रह्मा ससर्ज पृथमेऽहनि, शुक्ल पक्षे समग्रन्तु तदा सूर्योदये गति.’

इसी दिन सम्राट विक्रमादित्य ने श्रेष्ठ राज्य की स्थापना की थी. जिनके कारण न्याय के आसन को आज भी विक्रमादित्य का सिंहासन कहा जाता है.  विक्रम संवत् भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही प्रारम्भ होता है. इसी की भारत में सर्वाधिक स्वीकार्यता है . चैत्रशुक्ल प्रतिपदा जिस दिन (वार) को होती है. वही संवत् का राजा होता है तथा जिस वार को सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, वह संवत् का मंत्री होता है. सूर्य की अन्य संक्रान्तियों द्वारा वर्ष की सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक स्थितियों का निर्धारण होता है.  भारत में होली के बाद संवत् सुनने की परम्परा को गंगा स्नान  के समान फलदायी माना गया है. इसी कारण यह संवत् भारतीय समाज व्यवस्था में समस्त संस्कारों, पर्वों एवं त्योहारों की रीढ़ है.  विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या अन्य किसी कालगणना में इतनी सूक्ष्म व्याख्या है? सारी श्रेष्ठताओं के बाद भी विक्रमी संवत् भारत का राष्ट्रीय पंचांग नहीं बना यह स्वाभाविक कौतूहल का विषय है. आजादी के बाद पंडित नेहरू के द्वारा बनायी गयी पंचांग सुधार समिति इसके लिये जिम्मेदार मानी जा सकती है, परन्तु आजादी के सात दशक भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं.

अपना देश 1947 में अंग्रेजों की गुलामी से एक सीमा तक मुक्त हुआ.  स्वाधीनता के बाद हमने देश से अंग्रेजियत के सारे प्रतीक मिटाने का संकल्प लिया.  कुछ भवनों और सड़कों के नाम भी बदले गये परन्तु आधुनिक समय में किंगजार्ज मेडिकल कालेज का नाम बदलने पर एक नई बहस शुरू हो गयी. यह सब कुछ इस कारण हुआ कि संविधान की प्रथम पंक्ति में हमने अंग्रेजियत को स्वीकार करके ’’इण्डिया दैट इज भारत’’ का शब्द प्रयोग करके भारतीयता को दूसरे दर्जे का नागरिक बना दिया. वैसे तो अंग्रेजों ने बड़ी चतुराई से हमसे यह काम करवा लिया, जिसे हम समझ भी नहीं पाये. इसके पीछे वही भावना काम कर रही थी, जिसका उल्लेख मैकाले ने 12 अक्तूबर 1836 को अपने पिता को लिखे एक पत्र में किया था कि आगामी 100 साल बाद भारत के लोग रूप और रंग में तो भारतीय दिखेंगे, किन्तु वाणी, विचार और व्यवहार  में अंग्रेज हो जायेंगे.  सचमुच ही आज के समाज जीवन में वेशभूषा और भाषा ही नहीं जन्मदिन, पर्व-त्योहार, विवाह संस्कार आदि समारोहों को मनाने के तौर तरीकों में भारतीयता पर अंग्रेजियत हावी हो गयी.  अपने वित्तीय वर्ष के प्रथम दिन 1 अप्रैल को हम मूर्ख दिवस मानने लगे,  ईसा के जन्मदिन को बड़ा दिन मानने लगे, वैलेन्टाइन डे और शादी की वर्षगांठ हमारे जीवन में उतर आये, परन्तु श्राद्ध पर्व भूल गया.  इसी का परिणाम है कि अंग्रेजी नववर्ष तो याद रहा, परन्तु अपना नववर्ष भी भूल गये.

गुलामी की मानसिकता से हम कहां तक दबे रहे कि सन् 1996 तक संसद में आम बजट भी अंग्रेजों की घड़ी के अनुसार प्रस्तुत करते थे.  सरकारी कार्यालय बन्द होने के लिये निर्धारित  सायं 5 बजे के समय पर बजट इसलिए प्रस्तुत किया जाता था कि इंग्लैण्ड में उस समय दिन के साढ़े ग्यारह बजे होते थे. ऐतिहासिक शब्दावली में ईसा से पूर्व (बीसी) तथा ईसा के बाद (एडी) जैसे शब्दों का प्रयोग  किया जाने लगा अर्थात् हमारी कालगणना के आधार भी ईसामसीह बन गये.   आजादी के प्रथम दिन से राष्ट्रभक्ति के भाव में कुछ कमी होने के कारण हमने स्वतंत्र भारत का पहला गर्वनर जनरल माउण्टवेटेन को बना दिया. उन्होंने ही हमारी ओर से प्रथम राष्ट्राध्यक्ष के रूप में किंगजार्ज के प्रति वफादारी की शपथ ली, इसी कारण 14/15 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि को असंख्य शहीदों के बलिदानों को धूलधूसरित करके व्रिटिश झण्डा सलामी देकर सम्मान पूर्वक उतारा गया.  अंग्रेजियत में रचे बसे और माउण्टवेटेन के प्रिय पात्र जवाहर लाल नेहरू के हाथ में देश की बागडोर तो आ गयी, किन्तु इण्डियावादी दृष्टि से भारत को मुक्ति नहीं मिल सकी. उसी का परिणाम था कि जब 1952 में प्रो  मेघनाद साहा की अध्यक्षता में पंचांग सुधार समिति बनी तो उसने भी भारतीयता को आगे बढ़ने से रोक दिया.  भले ही प्रो साहा ने पंचांग का निर्धारण करते समय कहा था कि वर्ष का आरम्भ किसी खगोलीय घटना से होना चाहिए. उन्होंने ग्रेगेरियन कैलेण्डर के विभिन्न महीनों में दिनों की संख्या में असंगतता पर सवाल भी उठाये थे, किन्तु जब पंचांग सुधार समिति की रिपोर्ट देश के सामने आयी तो पता चला कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उपयुक्त मानकर नितांन्त  अवैज्ञानिक शकसंवत को राष्ट्रीय पंचांग तथा ग्रेगेरियन कैलेण्डर को अन्तर्राराष्ट्रीय कैलेण्डर की मान्यता दे दी गयी.  वस्तुतः यह सब कुछ अंग्रेजो को बड़ा दिखाने  के लिए किया गया, क्योंकि शकसंवत् ग्रेगेरियन कैलेण्डर से 79 वर्ष छोटा है, जबकि विक्रम संवत्  57 वर्ष बड़ा है.  ऐसी स्थिति में यदि विक्रमी संवत् को समिति राष्ट्रीय पंचांग बना देती तो अंग्रेज आकाओं के नाराज होने का खतरा था.

कितना हास्यास्पद है कि शकसंवत् में प्रथम दिन का निर्धारण करने के लिए ही ग्रेगेरियन कैलेण्डर का सहारा लिया गया है, क्योंकि शकसंवत् में वर्ष का आरम्भ ही 22 मार्च से होता है, परन्तु लीप वर्ष में वर्ष का आरम्भ 21 मार्च से ही माना जाता है.  वर्ष में कुल 365 दिन होते हैं, जबकि लीप ईयर में 366 दिन होते हैं .यही व्यवस्था ग्रेगेरियन कैलेण्डर में भी है .  शकसंवत् में चैत्र 30 दिन तथा उसके बाद के 5 महीने 31 दिन और अन्त के 6 महीने 30-30 दिनों के होते हैं, जबकि लीप वर्ष में चैत्र भी 31 दिन का ही होता है. लगभग यही स्थित ग्रेगेरियन कैलेण्डर की है. इन दोनों पंचांगों में 365 दिन 6 घण्टे का हिसाब तो है जबकि पृथ्वी अपनी धुरी पर 365 दिन 6 घंण्टे 9 मिनट और 11 सेकेण्ड में सूर्य का एक चक्कर लगाती है यही वास्तविक वर्ष होता है. इन पंचांगों में 9 मिनट 11 सेकेण्ड को कोई हिसाब नहीं है. ग्रेगेरियन कैलेण्डर इससे भी अधिक हास्यास्पद है उसका मुख्य आधार रोमन कैलेण्डर है जो ईसा से 753 साल पहले प्रारम्भ हुआ था. उसमें 10 माह तथा 304 दिन थे उसी के आधार पर सितम्बर सातवां, अक्तूबर 8वां, नवम्बर 9वां तथा दिसम्बर 10वां महीना था. 53 साल बाद वहां के शासक नूमापाम्पीसियस ने जनवरी और फरवरी जोड़कर 12 महीने तथा 355 दिनों का रोमन वर्ष बना दिया.  जिसमें सितम्बर 9वां, अक्तूबर 10वां, नवम्बर 11वां, और दिसम्बर 12वां महीना हो गया.  ईसा के जन्म से 46 साल पहले जूलियस सीजर ने रोमन वर्ष 365 दिनों का कर दिया. 1582 ई0 में पोपग्रेगरी ने आदेश करके 4 अक्तूबर को 14 अक्तूबर कर दिया.  मासों में दिनों का निर्धारण भी मनमाने तरीके से बिना किसी क्रमवद्धता का ध्यान रखते हुए कर दिया गया, किन्तु इन सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इन्हीं पंचांगों को हमने स्वतंत्र भारत में गणना का आधार मानकर भारतीय पंचांग की उपेक्षा कर डाली.

जरूरत इस बात की है कि भारत अपने आत्मगौरव को पहचाने तथा अपने नववर्ष को धूमधाम से सामाजिक और राजकीय स्तर पर मनाये जाने का प्रबन्ध हो.  यह सीधे-सीधे राष्ट्र की अस्मिता   से जुड़ा हुआ प्रश्न है.  हमें ध्यान रखना चाहिए कि 2001 में कुछ लोगों ने ईरान में अंग्रेजी नववर्ष मनाने का प्रयास किया था, जिसके कारण उन्हें 50-50 कोड़े मारने की सजा दी गयी थी.  भारत इस प्रकार का देश तो नहीं है कि किसी को कोड़े मारकर ठीक किया जा सके.  परन्तु चेतना का जागरण आवश्यक है. दुनिया के देश अपने-अपने नववर्ष पर गर्व करते हैं फिर हम उधार के नववर्ष पर क्यों गर्व करें इसका विचार करने की जरूरत है.

आइये अपने पर गर्व करें – नवरात्रि के प्रथम दिन नववर्ष की शुभकामनाएं दें.

साकेन्द्र प्रताप वर्मा, स्वतंत्र लेखक/स्तम्भकार
साभार: vskbharat.com