सोमवार, 23 मार्च 2015

त्रिकालज्ञ संत मावजी महाराज : - डॉ. दीपक आचार्य



मावजी महाराज के चौपड़े को अब हिन्दी में पढ़ पाएंगे

  Bhaskar News Network    Sep 03, 2014
लिंक http://www.bhaskar.com
तीन नदियों के संगम पर स्थित प्रसिद्ध श्रद्धास्थल बेणेश्वरधाम के पहले महंत और भविष्यवक्ता के रूप में पहचाने जाने वाले मावजी महाराज के चौपड़े को अब आम श्रद्धालु हिन्दी और अंग्रेजी में पढ़ पाएंगे।

एक साल के प्रयासों के बाद धाम के महंत अच्युतानंद महाराज के सानिध्य में फाउंडेशन के विद्वानों ने अनुवाद का काम पूरा कर लिया है। लगभग 600 पेज के अनुवाद को 200-200 पेजों के तीन खंड में विभाजित कर आम श्रद्धालुओं के सामने इस चौपड़े को रखा जाएगा। पिछली राज्य सरकार ने मावजी महाराज के चौपड़े का हिन्दी और अंग्रेजी अनुवाद करने के लिए जनजाति क्षेत्रीय विकास विभाग से 43.50 लाख रुपए की वित्तीय सहायता स्वीकृत कराई थी। इसके बाद इस कार्य को टीआरई (ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट़्यूट) और मावजी फाउंडेशन के माध्यम से पूरा करने का जिम्मा दिया गया था। अनुवाद के लिए बनाई समिति के संरक्षक और मार्गदर्शक महंत अच्युतानंद महाराज रहे हैं। इस काम की पहल तत्कालीन मंत्री महेंद्रजीतसिंह मालवीया और प्रमुख शासन सचिव प्रीतमसिंह ने की थी।

पांच में से चार चौपड़े ही सुरक्षित
मावजीमहाराज के 5 चौपड़ों में से 4 इस समय सुरक्षित हैं। ऐसी लोकमान्यता है कि इनमें ‘मेघसागर’ हरिमंदिर साबला में है, जिसमें गीता-ज्ञान उपदेश, भौगोलिक परिवर्तनों की भविष्यवाणियां हैं। ‘सामसागर’ शेषपुर में है। इसे हेपर कहा जाता है। जिसमें शेषपुर और धोलागढ़ का वर्णन और दिव्य वाणियां हैं। तीसरा ‘प्रेमसागर’ डूंगरपुर जिले के ही पुंजपुर में है, जिसमें धर्मोपदेश, भूगोल, इतिहास और भावी घटनाओं की प्रतीकात्मक जानकारी है। ‘अनंत सागर’ नामक एक ओर चौपड़ा मराठा आमंत्रण के समय बाजीराव पेशवा द्वारा ले जाया गया, जिसे बाद में अंग्रेज ले गए। बताया जाता है कि इस समय यह लंदन के किसी म्यूजियम में सुरक्षित है। इसमें ज्ञान-विज्ञान की जानकारियां समाहित हैं।

अब प्रकाशन के लिए चाहिए बजट, सरकार बदल गई
मावजीमहाराज के चौपड़े का अनुवाद होने के बाद ग्रंथ के रूप में प्रकाशन के लिए बजट और वित्तीय सहायता की जरूरत है। यह प्रोजेक्ट कांग्रेस राज में बना और इस पर काम हुआ था, बाद में सरकार बदल गई है। हालांकि उम्मीद की किरण मुख्यमंत्री ने जगाई है, अपने उदयपुर के दौरे के दौरान उनके द्वारा चौपड़े को लेकर जानकारी ली गई थी, लेकिन टीएडी मंत्री की ओर से फिलहाल कोई पहल नहीं की गई है। 

----------------------

लिंक http://www.nayaindia.com

मावजी के चौपड़ों का प्रकाशन होगा

Posted By: नया इंडिया टीम Posted date: August 28th, 2013
उदयपुर। राजस्थान सरकार ने वागड के संत मावजी महाराज द्वारा तीन शताब्दी पहले लिखे गए धार्मिक चौपडों के अनुवाद, संरक्षण व प्रकाशन कार्य के लिए 43.50 लाख रूपए स्वीकृत किए हैं। जनजाति क्षेत्रीय विकास आयुक्त सुबोध अग्रवाल ने मंगलवार को जानकारी देते हुए बताया कि इस स्वीकृत राशि में से मावजी महाराज के चौपडों का प्रकाशन चार खंडों में किया जाएगा।
साथ ही इसके लिए लगभग 4 हजार पृष्ठों का अनुवाद कार्य पूरा हो चुका है। उन्होंने बताया कि मावजी फाउण्डेशन की ओर से किए जा रहे इस प्रकाशन का संपादन व पुस्तक रूप प्रदान करनें व कम्पयूटरीकरण का कामजल्द ही पूरा कर लिया जाएगा। डा. अग्रवाल ने बताया कि चारों चौपडों के संरक्षण डिजिटल फोंटोग्राफी व मूल स्वरंप को बनाए रखने के लिए केमिकल ट्रीटमेंट नेशनल आरचीव्ज आफ इंडिया के माध्यम से कराया जाने का निर्णय लिया गया है। उन्होंने बताया कि श्रीहरि मंदिर साबला व शेषपुर के वस्त्र पट चित्रों का भी केमिकल ट्रीटमेंट, प्रेमिंग आदि कार्य कराया जाएगा। इसके तहत श्रीमावजी महाराज के जीवन चरित्र व रास लीलाओं पर आधारित डाक्यूमेंट्री फिल्म के निर्माण कराए जाने का भी निर्णय लिया गया। इसके लिए फिल्म व टीवी इन्स्टीट्युट पूना से भी संपर्क किया जा रहा है। गौरतलब है कि मावजी महाराज आदिवासी बहुल उदयपुर संभाग के वागड अंचल के महान संत थे। उनका जन्म विक्रम सम्वत 1771 को माघ शुक्ल बसंत पंचमी को साबला में दालम रिषि के घर हुआ था। उनकी मां का नाम केसर बाई था।  मावजी महाराज ने साम्राज्यवाद के अंत प्रजातंत्र की स्थापना, अछूतोद्धार, पाखंड व कलियुग के प्रभावों में वृद्धि, सामाजिक व सांसारिक परिवर्तनों पर स्पष्ट भविष्यवाणियां की थी। जनश्रुति के मुताबिक द्वापर युग की अधूरी रासलीला को पूर्ण करनें के लिए श्रीकृष्ण ने ही श्रीमावजी महाराज का रूप लिया। इस कारण इन्हें इस क्षेत्र में कृष्ण का अवतार माना जाता है। श्रीमावजी महाराज ने करीब तीन सौ वर्ष पहले माही, सोम व जाखम नदी के संगम पर बाणेश्वर में तपस्या की थी व  जनजाति समाज में सामाजिक चेतना जागृत करने के भी प्रयास किए थे। मावजी महाराज द्वारा चार वृहद ग्रंथ, चौपडें, कई लघु ग्रंथ व गुटके लिखे गए। इसमें वागड की गौरव गाथा के साथ ही आधुनिक जीवनकी नवीन तकनीक व सामाजिक व्यवस्था पर कई भविष्यवाणियां भी की गई। मावजी महाराज के पांच चौपडों में से चार इस समय सुरक्षित हैं। इनमें मेघसागर डूंगरपुर जिलें में साबला के हरि मंदिर में है, जिसमें गीता ज्ञान उपदेश, भागोलिक परिवर्तनों की भविष्यवाणियां है। दूसरा साम सागर शेषपुर में है, जिसमें शेषपुर व धोलागढ़ का वर्णन व दिव्य वाणियां है। तीसरा प्रेमसागर डूंगरपुर जिलें के ही पुंजपुर में है, जिसमें धर्मोपदेश, भूगोल, इतिहास व भावी घटनाओं की प्रतीकात्मक जानकारी है।
चौथा चौपडा, रतनसागर, बांसवाडा शहर के त्निपोलिया रोड स्थित विश्वकर्मा मंदिर में सुरक्षित है। इनमें रंगीन चित्र रामलीला, कृष्णलीलाओं आदि की मनोहारी वर्णन सजीव उठा है। मावजी महाराज का पांचवां चौपडा अनन्त सागर मराठा के आक्रमण के समय बाजीराव पेशवा द्वारा ले जाया गया, जिसें बाद में अंग्रेज ले गए। बताया जाता है कि इस समय यह लंदन के किसी संग्रहालय में सुरक्षित है। इसमें ज्ञान-विज्ञान की जानकारियां समाहित हैं।
--------------------------

त्रिकालज्ञ संत मावजी महाराज 

- डॉ. दीपक आचार्य

लिंक http://www.pressnote.in

याद में लहराता है अगाध आस्थाओं का महासागर
त्रिकालज्ञ संत मावजी महाराज भविष्य के संकेतों को जानने-समझने की ललक मनुष्य में पौराणिक काल से रही है। प्राचीन ऋषि-मुनियों एवं तपस्वियों ने ध्यान और समाधिगम्य दृश्य के माध्यम से भविष्य दर्शन कर इनके संकेत प्राप्त कर जग में प्रचारित किया। बेणेश्वर धाम के आद्य पीठाधीश्वर एवं जन-जन की अगाध आस्था के प्रतीक संत मावजी महाराज की भविष्यवाणियां इसी परंपरा का अंग रही हैं, जो जाने कितने युगों से लोगों को आगत की झलक दिखाती रही हैं। समय-समय पर ये भविष्यवाणियां अक्षरशः सही साबित हुई हैं। डूंगरपुर जिले के साबला गांव में संवत् 1771 में वसन्त पंचमी के दिन अवतरित तथा घोर तपस्या के उपरान्त त्रिकालज्ञ संत के रूप में जन-जन के समक्ष संवत् 1784 में प्रकट हुए मावजी महाराज को भक्तगण भगवान श्रीकृष्ण के लीलावतार के रूप में पूजते हैं। संत मावजी की स्मृति में आज भी हर वर्ष उनके प्राकट्य दिवस माघ पूर्णिमा को बेणेश्वर महाधाम पर विराट मेला भरता है, जिसमें देश-विदेश के सैलानियों के अलावा राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश के समीपवर्ती अंचल के कई लाख लोग हिस्सा लेते हैं। दस दिन चलने वाला यह मेला देश के आदिवासी अंचलों का सबसे बडा मेला है। इस बार मुख्य मेला माघ पूर्णिमा के दिन 30 जनवरी को भरेगा। यह दस दिवसीय मेला 3 फरवरी को सम्पन्न होगा। अलौकिक संत मावजी महाराज ने अपनी रचनाओं में आने वाले युगों को लेकर ढेरों भविष्यवाणियां की है, जो लोक मन को आरंभ से ही प्रभावित एवं विस्मित करती रही हैं। मावजी की भविष्यवाणियां प्रतीकात्मक हैं। आज से लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व ही मावजी महाराज को इक्कीसवीं सदी की घटनाओं के संकेतों का पता चला और उन्होंने जो-जो भविष्यवाणियां की है वे तमाम अक्षरशः खरी उतरी हैं। वर्ष में अनेक अवसरों पर इन भविष्यवाणियों, जिन्हें ‘आगलवाणी’ कहा जाता है, का वाचन होता है, जिसमें बडी संख्या में श्रद्धालु जमा होते हैं। आज की बढती जनसंख्या और नियंत्रित मूल्य पर राशन वितरण के दृश्य उन्होंने दिव्य दृष्टि से देखकर ही कहा था- ‘गऊं चोखा गणमा मले महाराज’ अर्थात गेहूं-चावल राशन से मिलेंगे। लगभग पौने तीन सौ वर्ष पूर्व जब पानी की कोई कमी नहीं थी तब उन्होंने आज के हालातों को जानकर कहा था ‘परिये पाणी वेसाये महाराज’ अर्थात तोल (लीटर) के अनुसार पानी बिकेगा। ‘डोरिया दीवा बरे महाराज’ अर्थात वायर-वायर बिजली लगेगी। सामन्ती सत्ता के पराभव को उन्होंने दिव्य दृष्टि से देखकर ही कहा था- ‘पर्वत गरी ने पाणी थासे।’
खारे समुद्र के पानी से पेयजल, सामाजिक कुरीतियों, घर-परिवार के झगडों, जातिगत समानताओं आदि पर उनकी ये वाणियां अक्षरशः सिद्ध हो रही हैं-खारा समुद्र मीठडा होसे,
बेटी ने तो बाप परणसे,
सारी न्यात जीमावेगा,
वऊ-बेटी काम भारे,
ने सासु पिसणा पीसेगा,
ऊंच नू नीच थासेनीच नूं ऊंच थासे,
हिन्दु-मुसलमान एक होसे,
एक थाली में जमण जीमासे,
न रहे जाति नो भेद,...’
खेती-बाडी में बैलों की बजाय ट्रैक्टरों एवं यंत्रों के इस्तेमाल को उन्होंने दिव्य दृष्टि से देखकर ही कहा था- ‘बडद ने सर से भार उतरसे’। अर्थात् बैल के सर से भार उतर जाएगा। कलियुग के प्रभाव से पृथ्वी पर पाप बढ जाने पर निष्कलंक अवतार (पुराणों के अनुसार कल्कि अवतार) के आविर्भाव के बारे में उनकी आगमवाणी में कहा गया है कि जब पाप एवं अत्याचारों स जमीन का भार बढ जाएगा तब निष्कलंक अवतार होगा, जो लोगों को सारी पीडाओं से मुक्ति दिलाएगा। उन्हीं के शब्दों में आगामी भविष्य को संकेत करती यह आगमवाणी आज भी भक्तों द्वारा गायी जाती है-सब देवन का डेरा उठसेनिकलंक का डेरा रेसे,
धोलागढ ढोलकी वागे महाराज,
बेणेश्वर बेगको रसासे महाराज,
दिल्ली तम्बू तणाए महाराज,
चित्तौड ऊपर सोरी सितराए महाराज,
माण्डवगढ माण्डवो रोपाए महाराज,
तलवाडे तोरण बंदाए महाराज,
जती ने सती ने साबरमतीत्यां होते सूरा नो संग्रामकांकरिया तरावे तम्बु तणासे महाराजबतरी हाथ नो पुरुष प्रमाणपेला-पेला पवन फरूकसे, नदिए नहीं होवे नीरउत्तर दिशा थी साहेबो आवसे,
धरती माथे रे हेमर हालसे, सूना नगरे बाजारलक्ष्मी लुटसे लुकतणी, तेनी बारे ने बोमे देव रेकेटलाक खडक से हरसे, केटलाक मरसे रोगे रेहरे भाई स्त्री सणगार संजसी ने मंगल गावे मेग रेपर्णा नर सू प्रीत तोडे और करे नर आदिन रे...’
हस्ती ना दूधे माट भरासीधोबी ने घेरे गाय सरेगा, बामण बकरी राखेगा। इन आगमवाणियों में मावजी महाराज ने मानव धर्म की स्थापना, साबरमती में संग्राम होने, बत्तीस हाथ का पुरुष, उत्तर दिशा से अवतार के आने, धरती पर अत्याचार बढने, व्यभिचारों में अभिवृद्धि, अकाल, भ्रष्टाचार, स्वेच्छाचारिता आदि का संकेत दिया है। अश्लीलता बढने, अत्याचारों में बढोतरी, पाखण्ड फैलने आदि का जिक्र किया गया है-‘अनन्त कुंवारियां नू दल जुनि मेलाण ऐसी लाख मयें हेमण हणसी,
चौदह लोक मए पाखण्डी पडसी,
असुरी आवी सामा-सामी मणसी....’
दानवों के अंततोगत्वा संहार के आशावादी भविष्य को अभिव्यक्त करते हुए मावजी की भविष्यवाणी है-‘दृष्टि दानव न तो संगल कटासीदाहित दानव न संगल कटासीसमुद्री पानी के मीठे होने तथा सागर किनारे खेती होने की संभावनाओं को इन पंक्तियों में जाहिर किया गया है-‘खारं समुद्र मीठडं होसेसमुद्र ने तीरे करसण ववासेकलमी कोदरो करणी कमासी,...’
इसके बाद जब निकलंक भगवान अवतार लेकर पृथ्वी से अधर्म का नाश करेंगे तब सतयुग जैसा माहौल कर फिर स्थापित होगा। इस बारे में ढेरों भविष्यवाणियां आज भी आशावाद का संचार करती हैं। विभिन्न अवसरों पर इन वाणियों का गान होता है, जिसे सुनकर लोग भविष्य के अनुमान लगाते हैं और संत मावजी के प्रति अनन्य श्रद्धा भाव व्यक्त करते हैं।
----000-----

विक्रम संवत्सर : श्रीकृष्ण जुगनू जी का तथ्यात्मक आलेख



http://blog.sureshchiplunkar.com/2015/03/hindu-new-year-vikram-samvat.html

Hindu New Year Vikram Samvat Calculations
विक्रम संवत्सर की बधाईयों के पीछे के अनथक प्रयास...
(अतिथि ब्लॉगर की श्रृंखला में पेश है विक्रम संवत पर श्रीकृष्ण जुगनू जी का तथ्यात्मक आलेख)

विक्रमीय संवत्‍सर की बधाइयां देते-लेते पूरा दिन हो गया...। भारत कालगणनाओं की दृष्टि से बहुत आगे रहा है। यहां गणित को बहुत रुचि के साथ पढ़ा और पढ़ाया जाता था। यहां खास बात पर्व और उत्‍सवों के आयोजन की थी और उसके लिए अवसरों को तय करना बड़ा ही कठिन था। कई संस्‍कृतियां अपने-अपने ढंग को लेकर आई कई संस्‍कृतियां यहां रची-बसी, मगर सबको यहां की रवायतों के साथ तालमेल करना ही था। कुछ तो प्रयास और कुछ सहजता से यह कार्य हुआ।

गणितज्ञों ने बहुत परिश्रम किया... इस परिश्रम काे साश्‍चर्य स्‍वीकारा था अलबीरुनी ने जो भारत में 30 अप्रैल 1030 से लेकर 30 सितंबर 1030 तक रहा, रेनाद ने उसके कार्य का फ्रांसिसी अनुवाद 'फ्रेगमां अरेबीज ए परसां' के नाम से किया। इसे प्रथमतया यूं अनूदित किया गया -

सामान्‍यताया लोग श्रीहर्ष के, विक्रमादित्‍य के, शक के, वल्‍लभ के तथा गुप्‍तों के संवत का प्रयोग करते हैं। वल्‍लभ, जिसका नाम एक संवत के साथ भी संबद्ध है, अ‍नहिलवाड के दक्षिण में लगभग 30 योजनों की दूरी पर स्थित वलभी नामक स्‍थान का शासक था, यह संवत शक संवत से 241 साल बाद का है, शक संवत की तिथि में से छह का घन अर्थात् 216 तथा पांच का वर्ग 25 घटाने पर वल्‍लभी संवत की प्राप्ति होती है.. गुप्‍तों का संवत उनकी सत्‍ता जाने के बाद आरंभ हुआ... जो कि शक के 241 वें साल से आरंभ होता है। ब्रह्मगुप्‍त की खंडखाद्यक (कन्‍दरवातक) की सारणियां इसी संवत में रखी जाती है, इस कृति को हम अरकंद के नाम से जानते हैं। इस प्रकार मज्‍दर्जिद के संवत के 400 वें साल में रखने पर हम स्‍वयं को श्री हर्ष संवत के 1488वें वर्ष में, विक्रमादित्‍य संवत के 1088वें वर्ष में, शक संवत के 953 वें वर्ष में, वल्‍लभी संवत तथा गुप्‍तों के संवत के 712वें वर्ष में पाते हैं...। मित्रों को यह जानकर हैरानी होगी कि नवंबर, 1887 ईस्‍वी में जॉन फैथफुल फ्लीट को यह अनुवाद नहीं रुचा और उसने प्रो. सचाऊ आदि के अनुवाद व मूलपाठ को जमा किया :


'' व लि धालिक अरडू अन् हा व इला तवारीख श्रीह्रिश व बिगरमादित व शक व बिलब व कूबित व अम्‍मा तारीख बल्‍ब...।''

यह विषय बहुत जटिल था, है और रहेगा, इस पर फ्लीट ने अपने जमाने में करीब दो सौ पन्‍ने लिखे हैं जिनका प्रकाशन 'कोर्पस इंस्‍क्रीप्‍शनम इंडिकेरम' के तीसरे भाग में हुआ हैं। उसकी गणित और गणनाओं को निर्धारित करने के लिए भारतीयों ने अपना पराक्रम दिखाया। उस जमाने के मशहूर भारतीय गणितज्ञ और पंचांगकारों ने कमरतोड़, कल्‍पनातीत प्रयास किया। इनमें भगवानलाल इंद्रजी, शंकर बालकृष्‍ण दीक्षित जैसे अपूर्व प्रतिभा के धनी विद्वान भी शामिल थे। भारत के सभी गौरवशाली ग्रंथों और अन्‍यान्‍य प्रमाणों, संदर्भों को भी सामने रखा गया था। जे. फरर्गुसन जैसों के निर्णयों को भी कसौटी पर कसा गया... बहुत अच्‍छा हुआ कि मंदसौर नगर से यशोधर्मन का लेख मिल गया जिसके लिए 533-34 ईस्‍वी की तिथि मिली।

समस्‍या यहीं पर खत्‍म नहीं हुई... लंबी गणनाएं हुईं। अनेकानेक शिलालेखों के आधार पर गणनाओं के लिए कई कागज रंगे गए, तब केलुलेटर कहां थे और यह स्‍वीकारा गया कि ईस्‍वी सन् 58 से प्रारंभ होने वाला विक्रम संवत है किंतु सामान्‍यतया 57 ईस्‍वी से प्रारंभ हुआ माना जाता है। यह पश्चिमी भारत की उत्‍पत्ति का संवत कहा गया जिसे उज्‍जैन के शासक विक्रम या विक्रमादित्‍य के शासनकाल के प्रारंभ से माना जाता है। फरगुसन का विचार था कि यह छठीं सदी में आविष्‍कृत हुआ लेकिन इसका ऐतिहासिक प्रारंभ बिंदु ईस्‍वी सन 544 था, तथा इसको पीछे की ति‍थि से संबद्ध किया गया किंतु मन्‍दसौर लेख से प्रमाणित होता है कि यह इस समय के पूर्व मालव नाम के अंतर्गत अ‍स्तित्‍वमान था। मध्‍यभारत में यह 9वीं सदी ईस्‍वी तक ज्ञात था और 11वीं शताब्‍दी ईस्‍वी में विक्रम के नाम के साथ संबद्ध रूप में इस संवत का एक प्राचीन दृष्‍टांत खोजा गया।
है न जंजाली जटिलताओं के बीच एक रोचक खोज के निर्धारण का प्रयास जो डेढ़ सदी पहले हुआ... मगर आज हमारे पास कई नए प्रमाण मौजूद हैं, उज्‍जैन स्थित विक्रमादित्‍य शोधपीठ के खोजे गए प्रमाण भी कम नहीं। कई प्रकाशन हुए हैं, उसके निदेशक डॉ. भगवतीलालजी राजपुरोहित तो 'विक्रमार्क' शोधपत्रिका संपादन कर रहे हैं। और तो और, अश्‍विनी रिसर्च सेंटर, माहीदपुर के चेयरमेन डॉ. आर. सी. ठाकुर ने विक्रमादित्‍य के सिक्‍के और छापें भी खोज निकाली हैं। ये प्रमाण गणना मूलक एक संवत के प्रवर्तक के लिए तो है ही, संवत के अस्तित्‍व में आने के कारणों को भी पु‍ष्‍ट करेंगे। काम एक दिमाग के सोच से ज्‍यादा है, कई लोग लगे हैं... मगर, हमारे लिए तो यह उचित होगा कि हम कालीमिर्च, नीम की कोपल, मिश्री का सेवन करें और परस्‍पर बधाइयों का आदान प्रदान करें।
जय-जय।

रावी नदी के किनारे हुआ भगत सिंह का अंतिम संस्कार





शहीद दिवस: ...बाद में रावी नदी के किनारे हुआ भगत सिंह का अंतिम संस्कार

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को अंग्रेजों ने फांसी के तय समय से एक दिन पहले ही फांसी पर लटका दिया था और फिर बर्बर तरीके से उनके शवों के टुकड़े-टुकड़े कर सतलुज नदी के किनारे स्थित हुसैनीवाला के पास जला दिया था, लेकिन बाद में लोगों ने अगाध सम्मान के साथ इन तीनों वीर सपूतों का अंतिम संस्कार लाहौर में रावी नदी के किनारे किया था. अंग्रेज 23 मार्च 1931 को इन तीनों सेनानियों को फांसी पर लटकाने और शवों के टुकड़े करने के बाद चुपचाप उन्हें सतलुज के किनारे स्थित हुसैनीवला के पास ले गए थे और वहां बहुत ही अमानवीय तरीके से उनके शवों को जला दिया था.

उसी दौरान वहां लाला लाजपत राय की बेटी पार्वती देवी और भगत सिंह की बहन बीबी अमर कौर सहित हजारों की संख्या में लोग पहुंच गए. इससे वहां मौजूद अंग्रेज पुलिसकर्मी शवों को अधजला छोड़कर भाग गए.

शहीद ए आजम भगत सिंह पर कई पुस्तकें लिख चुके प्रोफेसर चमनलाल ने बताया कि लोगों ने तीनों शहीदों के अधजले शवों को आग से निकाला और फिर उन्हें लाहौर ले जाया गया.

लाहौर में तीन अर्थियां बनाई गईं और 24 मार्च की शाम हजारों की भीड़ ने पूरे सम्मान के साथ उनकी शव यात्रा निकाली और उनका अंतिम संस्कार रावी नदी के किनारे उस स्थल के नजदीक किया गया जहां लाला लाजपत राय का अंतिम संस्कार हुआ था.

चमन लाल के अनुसार रावी नदी के किनारे हुए इस अंतिम संस्कार का व्यापक वर्णन सुखदेव के भाई मथुरा दास थापर की किताब ‘मेरे भाई सुखदेव’ में है.

-------

नई दिल्ली: शहीद-ए-आजम भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को अंग्रेजों ने फांसी के तय समय से एक दिन पहले ही फांसी पर लटका दिया था और फिर बर्बर तरीके से उनके शवों के टुकड़े-टुकड़े कर सतलुज नदी के किनारे स्थित हुसैनीवाला के पास जला दिया था, लेकिन बाद में लोगों ने अगाध सम्मान के साथ इन तीनों वीर सपूतों का अंतिम संस्कार लाहौर में रावी नदी के किनारे किया था।

अंग्रेज 23 मार्च 1931 को इन तीनों सेनानियों को फांसी पर लटकाने और शवों के टुकड़े करने के बाद चुपचाप उन्हें सतलुज के किनारे स्थित हुसैनीवला के पास ले गए थे और वहां बहुत ही अमानवीय तरीके से उनके शवों को जला दिया था। उसी दौरान वहां लाला लाजपत राय की बेटी पार्वती देवी और भगत सिंह की बहन बीबी अमर कौर सहित हजारों की संख्या में लोग पहुंच गए । इससे वहां मौजूद अंग्रेज पुलिसकर्मी शवों को अधजला छोड़कर भाग गए । शहीद-ए-आजम भगत सिंह पर कई पुस्तकें लिख चुके प्रोफेसर चमनलाल ने बताया कि लोगों ने तीनों शहीदों के अधजले शवों को आग से निकाला और फिर उन्हें लाहौर ले जाया गया ।

लाहौर में तीन अर्थियां बनाई गईं और 24 मार्च की शाम हजारों की भीड़ ने पूरे सम्मान के साथ उनकी शव यात्रा निकाली तथा उनका अंतिम संस्कार रावी नदी के किनारे उस स्थल के नजदीक किया गया जहां लाला लाजपत राय का अंतिम संस्कार हुआ था। चमन लाल के अनुसार रावी नदी के किनारे हुए इस अंतिम संस्कार का व्यापक वर्णन सुखदेव के भाई मथुरा दास थापर की किताब ‘मेरे भाई सुखदेव’ में है। उन्होंने कहा कि नौजवावन भारत सभा चाहती थी कि इन शहीदों का स्मारक रावी नदी के किनारे बने, लेकिन राजनीतिक कारणों से एेसा नहीं हो पाया।