सोमवार, 30 मार्च 2015

भाजपा : दुनिया की नंबर वन पार्टी राजनीति बनी



राजनीति के मैदान में दुनिया की नंबर वन पार्टी बनी BJP

Mar 30 2015

नई दिल्ली (एसएनएन): भारतीय जनता पार्टी यानी बीजेपी दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बन गई है. सदस्यों के मामले में बीजेपी ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को पीछे छोड़ते हुए यह उपलब्धि हासिल की है. चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के जहां अब 8.4 करोड़ सदस्य हैं तो वहीं बीजेपी के सदस्यों की संख्या 8 करोड़ 79 लाख हो गई है.

पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद अमित शाह ने सदस्यों की संख्या बढ़ाने के लिए अभियान चलाने का फैसला किया था. पीएम नरेंद्र मोदी ने एक नवंबर, 2014 को नई दिल्ली में सदस्यता अभियान का शुभारंभ किया. उसी वक्त शाह ने यह घोषणा की थी कि वे बीजेपी को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बनाना चाहते हैं. इसके लिए 10 करोड़ सदस्य बनाने का लक्ष्य रखा गया था. इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए पार्टी का सदस्यता अभियान अभी भी जारी है. पार्टी सूत्रों के अनुसार, एक अप्रैल के बाद भी सदस्यता अभियान जारी रहेगा. इसके जरिये बीजेपी 10 करोड़ सदस्य बनाने का लक्ष्य हासिल करने का प्रयास करेगी.

आपको बता दें कि इस समय चीन में भी कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्यता अभियान चल रहा है लेकिन बीजेपी ने उसे फिलहाल पीछे छोड़ दिया है. इस सदस्यता अभियान में बीजेपी ने दक्षिण भारत में भी नए सदस्य बनाए हैं. पार्टी विस्तार की दिशा में यह अभियान काफी अहम माना जा रहा है.

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राष्ट्रीय सदस्यता अभियान के प्रभारी डॉ. दिनेश शर्मा के मुताबिक


नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी अब विश्व की सबसे बडी पार्टी बन गई है। राष्ट्रीय सदस्यता अभियान के प्रभारी डॉ. दिनेश शर्मा के मुताबिक चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को पीछे छोड़ते हुए बीजेपी ने पूरे देश में 8 करोड़ 82 लाख सदस्य बनाए हैं। भाजपा ने इस मामले में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को पछाड़ा है जिसकी सदस्य संख्या पिछले साल नवंबर में आठ करोड़ 67 लाख थी।
शर्मा ने बताया कि हर रोज पार्टी के 13 से 14 लाख नए सदस्य बन रहे हैं। सदस्यता अभियान 31 मार्च को खत्म हो रहा है लेकिन उत्तर प्रदेश, बिहार और असम में स्थानीय निकाय के चुनावों और झारखंड में विधानसभा चुनावों के कारण सदस्यता अभियान प्रभावित हुआ। उन्होंने कहा कि इन राज्यों के कार्यकर्ता सदस्यता अभियान को 31 मार्च से आगे भी जारी रखने का अनुरोध कर रहे हैं। वह पार्टी अध्यक्ष अमित शाह से इस पर विचार करने का आग्रह करेंगे।
भाजपा के विधान के अनसुार हर छह साल में पार्टी के सभी सदस्यों का नवीकरण होता और नए सदस्य बनाए जाते हैं। सदस्यता अभियान की शुरुआत नवंबर में की गई थी। तब शाह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पहला सदस्य बनाया था। उसी वक्त शाह ने यह घोषणा की थी कि वह बीजेपी को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बनाना चाहते हैं। इसके लिए दस करोड़ सदस्य बनाने का लक्ष्य रखा गया है।
बीजेपी के इस सदस्यता अभियान में सबसे ज्यादा सदस्य उत्तर प्रदेश में बनाए हैं। प्रदेश में करीब डेढ़ करोड़ सदस्य बीजेपी से जुड़े हैं। पार्टी का लक्ष्य उत्तर प्रदेश में दो करोड़ सदस्य बनाने का है। राज्य में 2017 में विधानसभा चुनाव होने हैं। इस लिहाज से पार्टी इस सदस्यता अभियान को लेकर काफी उत्साहित है।

आतंक के संदर्भ में श्रीराम की प्रासंगिकता - प्रमोद भार्गव



आतंक के संदर्भ में श्रीराम की प्रासंगिकता
- प्रमोद भार्गव

(28 मार्च, श्रीरामनवमी पर प्रासंगिक लेख)
दुनिया में बढ़ रहे आतंकवाद को लेकर अब जरूरी हो गया है कि इनके समूल विनाश के लिए
भगवान श्री राम जैसी सांगठनिक शक्ति और दृढ़ता दिखाई जाए। आतंकवादियों की
मंशा दहशत के जरिए दुनिया को इस्लाम धर्म के बहाने एक रूप में ढालने की है।
जाहिर है, इससे निपटने के लिए दुनिया के आतंक से पीड़ित देशों में परस्पर
समन्वय और आतंकवादियों से संघर्ष के लिए भगवान राम जैसी दृढ़ इच्छा शक्ति की
जरुरत है।
- प्रमोद भार्गव
दुनिया के शासकों अथवा महानायकों में भगवान राम ही एक ऐसे अकेले योद्धा हैं, जिन्होंने आतंकवाद के समूल विनाश के लिए एक ओर जहां आतंक से पीड़ित मानवता को संगठित  किया, वहीं आतंकी स्त्री हो अथवा पुरुष किसी के भी प्रति उदारता नहीं बरती। अपनी इसी रणनीति और दृढ़ता के चलते ही राम त्रेतायुग में भारत को राक्षसी  या आतंकी शक्तियों से मुक्ति दिलाने में सफल हो पाए। उनकी आतंकवाद पर विजय ही इस बात की पर्याय रही कि सामूहिक जातीय चेतना से प्रगट राष्ट्रीय भावना ने इस महापुरुष का दैवीय मूल्यांकन किया और भगवान विष्णु के अवतार का अंश मान लिया। क्योंकि अवतारवाद जनता-जर्नादन को निर्भय रहने का विश्वास, सुखी व संपन्न रहने के अवसर और दुष्ट लोगों से सुरक्षित रहने का भरोसा दिलाता है।

अवतारवाद के मूल में यही मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति काम करती है। लेकिन राम  वाल्मीकि के रहे हों चाहे गोस्वामी तुलसीदास के अलौकिक शक्तियों से संपन्न  होते हुए भी वे मनुष्य हैं और उनमें मानवोचित गुण व दोष हैं।
राम के पिता अयोध्या नरेश भले ही त्रेतायुग में आर्यावर्त के चक्रवर्ती सम्राट थे, किंतु उनके कार्यकाल में कुछ न कुछ ऐसी कमियां जरुर थीं कि रावण की लंका से थोपे गए आतंकवाद ने भारत में मजबूती से पैर जमा लिए थे। गोस्वामी तुलसीदास ने  इस सर्वव्यापी आतंकवाद का उल्लेख कुछ इस तरह से किया है -
निसिचर एक सिंधु महुं रहई। करि माया नभु के खग गहई।
गहई छांह सक सो न उड़ाई। एहि विधि सदा गगनचर खाई।

यानी ये आतंकी अनेक मायावी व डरावने रूप रखकर नगरों तथा ग्रामों को आग के हवाले कर देते थे। ये उपद्रवी ऋषि, मुनियों और आम लोगों को दहशत में डालने की  दृष्टि से पृथ्वी के अलावा आकाश एवं सागर में भी आतंकी घटनाओं को अंजाम  देने से नहीं चूकते थे। इनके लिए एक संप्रभु राष्ट्र की सीमा, उसके कानून  और अनुशासन के कोई अर्थ नहीं रह गए थे। बल्कि इनके विंध्वंस में ही इनकी  खुशी छिपी थी।

ऐसे विकट संक्रमण काल में महर्षि विश्वामित्र ने आतंकवाद से कठोरता से निपटने  के रास्ते खोजे और राम से छात्र जीवन में ही राक्षसी ताड़का का वध कराया। उस समय लंकाधीश रावण अपने साम्राज्य विस्तार में लगा था। ताड़का कोई मामूली स्त्री नहीं थी। वह रावण के पूर्वी सैनिक अड्ढे की मुख्य सेना नायिका थी। राम का पहला आतंक विरोधी संघर्ष इसी महिला से हुआ था। जब राम ने ताड़का पर स्त्री होने के नाते, उस पर हमला करने में संकोच किया, तब  विश्वामित्र ने कहा, आततायी स्त्री हो या पुरुष वह आततायी होता है, उस पर  दया धर्म - विरुद्ध है। राम ने ऋषि की आज्ञा मिलते ही महिला आतंकी ताड़का को सीधे युद्ध में मार गिराया। ताड़का के बाद राम ने देश के लिए संकट बनीं  सुरसा और लंकिनी का भी वध किया। शूर्पनखा के नाक-कान लक्ष्मण ने कतरे। भारत की धरती पर आतंकी विस्तार में लगे सुबाहु, खरदूषण और मारीच को मारा।
दरअसल राजनीति के दो प्रमुख पक्ष हैं, शासन धर्म का पालन और युद्ध धर्म का पालन। रामचरितमानस की यह विलक्षणता है कि उसमें राजनीतिक सिद्धांतों और  लोक-व्यवहार की भी चिंता की गई है। इसी परिप्रेक्ष्य में रामकथा संघर्ष और  आस्था का प्रतीक रूप ग्रहण कर लोक कल्याण का रास्ता प्रशस्त करती है। 

महाभारत में भी कहा गया है कि ‘राजा रंजयति प्रजा’ यानी राजा वही है, जो प्रजा के सुख-दुख की चिंता करते हुए उसका पालन करे।

राम-रावण युद्ध भगवान राम ने श्रीलंका को आर्यावर्त के अधीन करने की दृष्टि से नहीं लड़ा था, यदि उनकी ऐसी इच्छा होती तो वे रावण के अंत के बाद विभीषण को लंका का अधिपति बनाने की बजाए, लक्ष्मण को बनाते या फिर हनुमान, सुग्रीव या  अंगद में से किसी एक को बनाते? उनका लक्ष्य तो केवल अपनी मातृभूमि से जहां  आतंकवाद खत्म करना था, वहीं उस देश को भी सबक सिखाना था, जो आतंक का  निर्यात करके दुनिया के दूसरे देशों की शांति भंग करके, साम्राज्यवादी
विस्तार की आकांक्षा पाले हुए था। ऐसे में भारत के लिए राम की प्रासंगिकता वर्तमान आतंकी परिस्थितियों में और बढ़ गई है। इससे देश के शासकों को  अभिप्रेरित होने की जरुरत है।
- लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है।
शिवपुरी (मध्य प्रदेश)


संगठन के कार्यकर्ताओं को श्रीराम-चरित से सन्देश




संगठन के कार्यकर्ताओं को श्रीराम-चरित से सन्देश'
 - राघवलु, संयुक्त महामंत्री, विहिंप
राम शब्द में तीन बीजाक्षर है- ‘र’कार, ‘अ’कार, और ‘म’कार| ‘र’ अग्नि बीज है, ‘अ’ आदित्य बीज है, ‘म’ चंद्र बीज है|
सृष्टि में अग्नि, सूर्य और चंद्रमा यह तीन ही प्रकाश देनेवाले है| ये तीन एक राम शब्द में समाविष्ट है| यदि हम एक बार मनसे राम कहेंगे तो शरीर के अंदर प्रकाश उत्पन्न होता है| कोटी-कोटी बार राम जप करनेसे ही शबरी सशरीर स्वर्ग पहुँची, हनुमान देवता स्वरूप बने और वाल्मीकि ऋषी बनें| इतना सामर्थ्य है राम शब्द में|
श्रीराम का आदर्श जीवन
त्रेतायुग में बहुत आतंकवाद फैला था| उस समय ऋषि-मुनियों की हत्या करना, यज्ञ-याग आदि का विध्वंस करना, कन्या-अपहरण, अपनी राज्य सत्ता के लिए समाज में पूरा आतंक निर्माण करना, ऐसी उस समय की परिस्थिति रही| इस पृष्ठभूमि में श्रीराम एक आदर्श राजा एवं सामान्य मानव के रूप में कैसे जीवन चलाएँ, यह उनके जीवन से हमें सीखना हैं|
स्थितप्रज्ञ राम
श्रीराम को राज्याभिषेक की जानकारी मिली, उसके बाद दो घंटे के अंदर कोपगृह में बुलाकर १४ वर्ष जंगल जाने के लिए आज्ञा मिली| लेकिन दोनों को सहर्ष स्वीकार करते हुए श्रीराम ने अपने जीवन में कृती में लाया है|
उदये सविता रक्तो रक्तश्चालस्तमने तथा|
सम्पतौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता॥
(सूर्योदय के समय जैसे सूरज का वर्ण होता है, वहीं वर्ण सूर्यास्त के समय भी होता है| वैसे ही समृद्धि तथा
विपत्काल में भी श्रेष्ठ लोग स्थितप्रज्ञ रहते हैं|)
राज्याभिषेक की वार्ता सुनकर तथा वनगमन की जानकारी सुनकर, दोनों ही स्थितियों में श्रीराम अचल थे| इतना ही नहीं, सब प्रकार से सरल जीवन अपनाया| अयोध्या का संपन्न अंत:पुर छोड़कर जंगल में आए| पर्ण-कुटिर में रहने लगे| फल-पत्ते खाकर जीने लगे| जमीन पर सोने लगे|
निरंतर और प्रभावी संपर्क
अगस्त्य ऋषि से संपर्क करते हुए आदित्य हृदय महामंत्र पाया है और भरद्वाज ऋषि से संपर्क करते हुए समंत्रित अस्त्र-शस्त्र पाए| अत्रि-अनसूया से संपर्क करते हुए समंत्रित वस्त्र पाए| सुग्रीव से संपर्क करते हुए महाबल वानरसेना पाए| नील-नल को भी संपर्क करके रामसेतु निर्माण किया| शक्तिमान महारावण को संहार करके अयोध्या वापस आए| संपर्क से सबकुछ पाए| किसी भी स्थिति में भरत से ना सैन्य मॉंगा ना धन|
कार्यकर्ता का चयन
सीता की खोज चल रही थी, उस समय श्रीराम के सामने वाली और सुग्रीवआए| किसको चुनना? वाली के पास शक्ति, साम्राज्य, सेना, संपत्ती सब कुछ है| लेकिन चरित्र, सत्य, धर्म और नम्रता आदि गुण नहीं है| ऐसी व्यक्ति धर्म संस्थापना के लिए योग्य नहीं है| इसलिए वाली को समाप्त कर दिया| जो गुण आवश्यक थे वे सुग्रीव के पास थे| इसके कारण उसको स्वीकारा| संगठन का कार्य करते समय व्यक्ति का या सहयोगी का चयन करना हो तो राम का आदर्श आवश्यक है|
यश मिला तो साथियों में बॉंटना
रावण-संहार के बाद अंगद, सुग्रीव, नील,नल, विभिषण, हनुमान, जांबुवंत सभी को लेकर श्रीराम अयोध्या पहुँचे| वहॉं इन सभी सहयोगीयों का अयोध्या वासीयोंको परिचय कराया| सेतु-बंधन इन्ही लोगों ने किया है| रावण-संहार इन्ही लोगों ने किया है, ऐसा बताया| यह सब मैंने किया, मैंने करवाया ऐसा एक भी शब्द बोले नहीं| यही संगठन कार्यकर्ता की विशेषता है|
शत्रु से भी सीखना
रावण बाणसे विद्ध होकर गिरने के बाद राम और लक्ष्मण रावण के पास पहुँचकर ‘तुमने जीवन मे क्या सीखा है’ ऐसा प्रश्न किया| तब रावण ने बताया ‘मैंने धरती से स्वर्ग तक सिढ़िया बनाने के लिए सोचा था| अष्टदिग्पाल, नवग्रह मेरे नियंत्रण में थे इस लिए यह काम कभी भी कर सकता हूँ ऐसा सोचकर उस काम को तुरंत न करते हुए छोड़ दिया| लेकिन जानकी का अपहरण करने की लालसा मन में आयी तो यह काम तुरंत कर दिया| गलत काम तुरंत करने से मेरा पतन हो गया|’
रावण का पछताना भी श्रीराम को कुछ सीखा गया| तात्पर्य, अच्छा काम को छोड़कर गलत काम जल्दी करने  से किसी का भी पतन हो सकता है|
कनक, कांता, कीर्ति का मोह
जब सुवर्ण लंका प्राप्त हुई तब, लक्ष्मण ने इसका क्या करना इस बारे में श्रीराम के विचार जानने चाहे| श्रीराम ने कहा-
अपि स्वर्णमयि लंका न मे लक्ष्मण रोचते
जननी जन्मभूमिश्चक स्वर्गादपि गरीयसी|

लोक कल्याण कार्य में धन, व्यामोह रुकावट होगा इसलिए यह तुच्छ है, अपने जननी जन्मभूमि स्वर्ग से अधिक सुख देने वाली है| ऐसा कहकर लक्ष्मण का मार्गदर्शन किया|
शूर्पणखा अतिसुंदरी बनकर श्रीराम के पास आकर, ‘मैंने आपके लिए ही जन्म लिया है; कृपया मुझे स्वीकार करो’ ऐसी बोली तब श्रीराम ने शूर्पणखा के अनुरोध को ठुकरा दिया| इतना ही नहीं, जानकी के साथ १३ वर्ष रहे; लेकिन मुनिवृत्ति अपनाकर पूर्ण रूप से इंद्रियों को नियंत्रण कर दिया|

जब सुवर्ण लंका मिली तो वह विभिषण को दे दी| किष्किंधा का राज्य मिला तो वह सुग्रीव को दे दिया| अयोध्या का राज्य मिला तो वह भरत को दे दिया| इस प्रकार श्रीराम पदवी तथा व्यामोह से दूर रहे|
अच्छे लोगों की पहचान
रावण कुल में विभिषण एक दैवी गुण का व्यक्ति है, यह श्रीराम ने जाना| जब विभिषण श्रीराम के शरण में आ गये तो सब लोग विभिषण के बारे में संदेह करने लगे| लेकिन श्रीराम ने उनका व्यवहार देखकर विभिषण पर अनुग्रह किया| इतनाही नहीं, शत्रु भावना रखने वाले रावण के दहन संस्कार कार्यक्रम संपन्न करने के लिए विभिषण को प्रोत्साहित किया|
समरसता का कार्य
श्रीराम प्रेम के सागर है| समरसता के निर्माता है| जंगल में वनवासी महिला शबरी के झुटे फल खाकर उसपर अनुग्रह किया है| केवट को आलिंगन कर के अनुग्रह किया है| जटायु का दहन संस्कार करते हुए उसे मोक्ष उपलब्धी करायी| गिल्लरी को हस्तस्पर्श करके अनुग्रह किया|
इस प्रकार अयोध्या वासीयों के साथ परिवारपर भी अनंत प्रेम की वृष्टि की|
सभी वर्गों के विचारों का आदर
लंका से वापस आने के बाद जब धोबी समाज के एक व्यक्ति ने सीता पर कलंक लगाया, तो उसके विचार का आदर करते हुए प्राणसमान सीता को वनवास भेजने के लिए भी श्रीराम तैयार हुए| उस समय श्रीराम ने प्रतिज्ञा की-
स्नेहम् दयां च सौख्यं च यदि वा जानकी मति
आराधनाय लोकस्य मुंचते नास्ति मे व्यथा॥
लोककल्याण के लिए स्नेह, दया, स्वीय सुख, इतना ही नहीं अत्यंत प्रिय जानकी को भी छोड़ने में किंचित भी व्यथित नहीं है|
कठोर अनुशासन
त्रेता युग के अंत में कलि अयोध्या में प्रवेश करते हुए श्रीराम के साथ एकांत में बात करने के लिए आ गये| उस समय किसी का भी अंदर प्रवेश ना हो इसलिए श्रीराम ने लक्ष्मण को द्वार पर खड़ाकिया| ‘किसी को अंदर आने नहीं देना, यदि इस आज्ञा का उल्लंघन होता तो कठिन दंड भोगना पड़ेगा’ ऐसा बताकर श्रीराम अंदर गए| इतने में दुर्वास महर्षि आकर ‘मुझे अभी श्रीराम से बात करनी है| अनुमति नहीं मिली तो तुम्हारा पुरा इक्ष्वाकु वंश का नाश करुंगा|’ ऐसा क्रोधित हो कर कहा| लक्ष्मण दुविधा में पड़े| प्रवेश की अनुमति देते तो श्रीराम क्रोधित होंगे और अनुमति नहीं दी तो दुर्वास महर्षि इक्ष्वाकु वंश का नाश कर देंगे| अंतत: लक्ष्मण दुर्वास महर्षि को अंदर जाने की अनुमति देते है| तब राम बाहर आ रहे थे| आज्ञा का उल्लंघन देखकर अति प्रिय भ्राता लक्ष्मण को कठिन दंड देते हुए श्रीराम अपने शरीर को भी शरयु नदी में छोडकर अवतार समाप्त कर देते है|
निन्दन्तु नीतिनिपुणा: यदि वा स्तुवन्तु|
लक्ष्मी: समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्|
मरणमद्यास्तु युगान्तरे वा
न्यायात्पथ: प्रविचलन्ति पदं न धीरा॥

नीतिज्ञ लोग निन्दा करे या स्तुति,  संपत्ति का लाभ हो या हानी, मृत्यु आज आये या युगों के बाद, श्रेष्ठ लोग
कभी भी न्यायपथ से दूर नहीं जाते |

श्रीराम का जीवन भी इसी प्रकार का है | उन्होंने किसी भी स्थिति में आदर्शों को तिलांजली नहीं दी| सामाजिक जीवन में संगठन का कार्य करते हुए, अनेक बाधाएँ, व्यवधान, मोह-माया के प्रसंग पग पग पर आ सकते हैं| क्या करना, क्या नहीं करना, ऐसी किंकर्तव्यमूढ़ स्थिति बनती है| किस से मार्गदर्शन लेना, समझ में नहीं आता| उस समय श्रीराम हमारे सहायक हो सकते है| उनका जीवन चरित हमें दिग्दर्शन करा सकता है| श्रीराम
नवमी के पावन पर्व श्रीराम चरित का चिंतन करने पर यह विश्वाबस हमें मिलता है|